संजय कुमार सिंह
आज की खबरों में सबसे प्रमुख है, द हिन्दू की लीड और उसका शीर्षक। खबर देश के मुख्य न्यायाधीश का सवाल है, राज्यपाल जब विधेयकों को रोके रहें तो क्या सुप्रीम कोर्ट को बिना अधिकार बैठे रहना चाहिये। उपशीर्षक है – मुख्य न्यायधीश ने कहा, सुप्रीम कोर्ट संविधान का संरक्षक है। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता (यानी सरकार) ने कहा है, अदालत ने कानून निर्माण के क्षेत्र में अतिक्रमण कर लिया है। उनका कहना है कि विधेयकों में देरी से राजनीतक तौर पर निपटा जाना चाहिये न कि अदालत के आदेश के जरिये। खबर के साथ मुख्य न्यायाधीश का एक सवाल हाईलाइट किया गया है, मान लीजिये, कतिपय जिम्मेदारियों वाला कोई संवैधानिक अधिकारी किसी वैध कारण के बिना अपने कार्य करने से मना कर देता है तो क्या संवैधानिक अदालतों के हाथ बंधे हुए हैं? क्या हम शक्ति हीन हैं? यह खबर राज्यपालों के लिए विधेयकों पर सहमति देने की समय सीमा तय करने के मामले में है। इससे संबंधित सुप्रीम कोर्ट के एक पुराने आदेश पर राष्ट्रपित ने भी सुप्रीम कोर्ट से सवाल किया है। पर राज्यपालों के मामले में केंद्र सरकार का रवैया दिलचस्प है। खासकर तब जब हम देख रहे हैं कि कई राज्यपाल कैसे काम कर रहे हैं, कौन राज्यपाल बने, किन्हें तरक्की मिली, तबादला हुआ, पद छोड़ना पड़ा और उसके बाद जो हुआ। निश्चित रूप से सब सम्मानजनक तो नहीं ही है।
यही नहीं, एक उपराज्यपाल के खिलाफ मारपीट का पुराना मामला है। उन्हें अदालत से इसलिये राहत मिल गई कि वे संवैधानिक पद पर हैं। यही नहीं, बिहार में एसआईआर पूरी मनमानी है। विपक्ष या तमाम स्टेकहोलडर्स के साथ सलाह किये बगैर, विरोध और मामला सुप्रीम कोर्ट में होने के बावजूद जारी है। चुनाव आयोग कह रहा है कि जिनकी राय नहीं ली गई, जिन्हें शामिल नहीं किया गया, जिनके नाम न जाने कैसे हटाये या शामिल किये गये उसके सही (या गलत) होने की पुष्टि संबंधित (जिम्मेदार) लोग करें। नहीं करने वाले अपना काम नहीं कर रहे हैं और फिर भी यह माना जा सकता है कि जो हुआ वही ठीक है या किसी ने कुछ कहा ही नहीं तो हम क्या करें? ऐसे सरकार नहीं चलती है। यह स्थिति है तो इसीलिये कि मीडिया इनके बारे में लोगों को बताता नहीं है। जहां तक राज्यपाल के अधिकार की बात है, उनका जो अधिकार है उसका उपयोग सही ढंग से समय पर या समय सीमा के अंदर ही किया जाना चाहिये। अधिकार यह नहीं हो सकता है कि निर्णय अनंत काल में आयेगा। कोई भी समझता है कि निर्णय नहीं देने का मतलब हां नहीं ना ही होता है। अगर जरूरी हो तो राज्यपाल को ना कहने का अधिकार दिया जाये या हां कहने की मजबूरी खत्म की जाये पर अनंत काल तक निर्णय नहीं लेने की छूट से अराजकता फैलेगी जबकि दावा उल्टा किया जा रहा है। निश्चित रूप से यह मुख्य न्यायाधीश पर सरकारी दबाव का मामला है। सरकार का यह दबाव हर क्षेत्र में दिखता है।
राहुल गांधी ने वोट चोरी का आरोप लगाया तो उनपर जो दबाव बनाये गये सर्वविदित है। उससे काम नहीं चला तो यह प्रचारित किया गया कि उनके आरोप सीएसडीएस वाले संजय कुमार की सूचनाओं पर आधारित हैं। उन्हें डिसक्रेडिट करने के प्रयास किये जा रहे हैं। लोग सहयोग कर रहे हैं। कुछ जानते हुए, कुछ अनजाने में, सिर्फ पार्टी या धर्म के आधार पर। सरकार समर्थकों का यह सवाल सोशल मीडिया पर खूब है कि राहुल गांधी का आरोप कैसे सही है। लेकिन कैसे गलत है यह कोई नहीं बता रहा है। ना पूछ रहा है। राहुल गांधी या मुख्य न्यायाधीश भले सरकार के दबाव में न आयें पर मामला स्पष्ट है और खबर है। सरकार का यह काम नहीं है। इसलिये जनता को मालूम होना चाहिये। अखबारों का यही काम है लेकिन मीडिया का बड़ा हिस्सा प्रचार ही करता है। और सरकार की ज्यादती या मनमानी निर्बाध जारी है। इसके लिए, नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारतीय जनता पार्टी हेडलाइन मैनेजमेंट और नैरेटिव सेट करके (कहानियां गढ़ और सुना कर) अपने पक्ष में माहौल बनाती है – यह पुरानी बात हो गई। राहुल गांधी (सरकार के लिए) नैरेटिव सेट करके (उसे मजबूर) करने लगे हैं यह भी अब समझ में आने लगा है। अमृतकाल में हेडलाइन मैनेजमेंट की कोशिशें सर्वविदित हैं। इन सबमें नई बात यह है कि अब अखबारों में प्रचार वाली खबरों को पहले की तरह प्रमुखता नहीं मिल रही है। संभव है, ऐसा पहले पन्ने पर ही हो लेकिन पहले पन्ने पर जरूर है। आज नैरेटिव सेट करने वाली खबरें और उसी से संबंधित चर्चा। सबसे पहले अमर उजाला की खबर, मानसून सत्र स्थगित… हंगामे से संसद के 166 घंटे बर्बाद, जनता के टैक्स के 248 घंटे डूबे। लीड के ऊपर आठ कॉलम का यह शीर्षक तब है जब मानसून सत्र की मूल घोषित अवधि 21 जुलाई से 12 अगस्त 2025 थी, लेकिन सत्र 21 अगस्त तक चला, मानसून सत्र को समाप्त करने (adjourn sine die) की बजाय, सरकार ने इसे कुछ दिनों तक और चलाया।
इकनोमिक टाइम्स और टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट्स में बताया गया कि सत्र 21 अगस्त 2025 को समाप्त हुआ। अमर उजाला ने स्थगित लिखा है। ईटी की रिपोर्ट में साफ तौर पर कहा गया है कि 21 अगस्त को लोकसभा को अनिश्चित काल के लिए स्थगित किया गया। मानसून सत्र पूरा हो गया, विस्तार के साथ संपन्न हुआ, स्थगति नहीं हुआ है। स्थगित लोकसभा की कार्यवाही हुई है, संसद भी नहीं। लोकसभा और राज्यसभा के गठन के लिए देश का पैसा खर्च होता है और यह सिर्फ कार्यकाल और कार्यवाही के लिए नहीं है। कार्यवाही, स्थगन, भाषणबाजी सब संसद (लोकसभा और राज्यसभा) के गठन का उद्देश्य है और उसे खर्च कहा जा सकता है, बर्बादी नहीं। मीडिया को इसे बर्बादी कहने का काम सौंपा गया है और सरकार के लिए नैरेटिव सेट करना है तो ऐसे शीर्षक लगाये जाते हैं। आइये हम इसे तथ्यों की कसौटी पर भी परख लें। प्रधानमंत्री ने संसद सत्र शुरू होने पर कहा था, “मानसून सत्र राष्ट्र के लिए विजयोत्सव की तरह है”। अगर ऐसा है तो सत्र जैसे भी पूरा हुआ विजयोत्सव मना और प्रधानमंत्री ने यह भाषण संसद परिसर में दिया था और सत्र का खर्च तो उससे भी वसूल हुआ। वरना वे इस बात को किसी टीवी स्टूडियो से या अपने घर या दफ्तर के किसी कोने में कैमरे के सामने भी कह देते तो सुनने वाले सुन लेते, उन तक पहुंच जाता। क्या यह संसद पर हो रहे खर्च का सही उपयोग है? मीडिया में चर्चा के लिए यह भी मुद्दा हो सकता था पर नैरेटिव सरकार के पक्ष में बनाना हो तो मुद्दे चुने जाते हैं और मैं यही बताना चाहता हूं कि मुद्दे अक्सर या ज्यादातर सरकार के पक्ष में माहौल बनाने वाले होते हैं।
प्रधानमंत्री ने अपने इस भाषण में और वैसे भी, डिजिटल इंडिया का बखान करते रहे हैं लेकिन राहुल गांधी डिजिटल मतदाता सूची की मांग कर रहे हैं। नहीं दिया जा रहा है और बिहार का एसआईआर भी (पूरी तरह) डिजिटल नहीं है। उसे बनाने के लिए डिजिटल इंडिया से पहले का ही तरीका अपनाया जा रहा है पर वह सब मीडिया में चर्चा का विषय नहीं है क्योंकि वह मोदी सरकार का हित नहीं साधता। देशबन्धु में अमर उजाला की इस खबर का शीर्षक है, हंगामे की भेंट चढ़ा मानसून सत्र। इस खबर के हाईलाइट किये अंश के अनुसार इस दौरान 15 विधेयक पारित हुए हैं और 55 प्रश्नों के जवाब भी दिये गये हैं। ससंद या संसद का कोई सत्र मशीन नहीं है कि निश्चित अवधि में निश्चित उत्पादन होना ही चाहिये। द टेलीग्राफ में यह खबर लीड है लेकिन शीर्षक और खबर से यह बताया गया है कि संसद के इस सत्र के दौरान बिहार के एसआईआर को असंवैधानिक कहा गया और अंत में पेश किये गये विधेयक से सत्ता और विपक्ष के बीच का अंतर बढ़ा है और यह इतना ज्यादा हो गया कि इंडिया समूह के नेता सत्र के समापन पर लोकसभा अध्यक्ष द्वारा आयोजित परंपरागत और रिवाजी चाय पार्टी में शामिल नहीं हुए। संसद के इस सत्र के दौरान पेश विधेयक की प्रतियां फाड़ कर गृहमंत्री के मुंह पर फेंकी गई, यह भी बड़ी खबर है और अगर समय बर्बाद हुआ, टैक्स के पैसे डूबे तो यह क्या मुफ्त में हुआ? विधेयक बिना विरोध पास कर दिया जाना चाहिये था और इस सरकार की मेहरबानी से जेल में रहे दिल्ली सरकार के मंत्री मनीष सिसोदिया की सलाह बेमतलब है?
आप जानते हैं कि मानसून सत्र की घोषणा, ऑपरेशन सिन्दूर के बाद विशेष सत्र की मांग पर की गई थी और इसमें विशेष सत्र न बुलाने से हुआ बचत शामिल माना जाना चाहिये। ऑपरेशन सिन्दूर, पाकिस्तान से युद्ध और नुकसान का खर्च भी जोड़ा जाना चाहिये था। ऑपरेशन सिन्दूर के बाद देश को संबंधित जानकारी देने के लिए विशेष सत्र बुलाने की मांग को सरकार ने औचित्यहीन बताया था। संसदीय कार्य मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा था, “हर सत्र हमारे लिए विशेष होता है” और सभी विषयों को मानसून सत्र में उठाया जा सकता है, जैसे कि ऑपरेशन सिंदूर। लिहाजा मानसून सत्र की घोषणा समय से पहले कर दी गई। मानसून सत्र की तारीख, 21 जुलाई से 12 अगस्त 47 दिन पहले घोषित कर दी गई थी। विपक्ष ने आरोप लगाया था कि इसका उद्देश्य ऑपरेशन सिंदूर पर विशेष सत्र की मांग को दबाना और घटकों की तैयारी खराब करना था। वैसे भी संसद का कार्यकाल पाँच वर्षों का होता है और हर सत्र एक निश्चित अवधि के लिए होता है। जब एक सत्र का कार्यकाल पूरा हो जाता है तो वह सत्र समाप्त कहा जाता है लेकिन संसद का कार्यकाल जारी रहता है। केवल सत्र की कार्यवाही रुक जाती है। अगला सत्र नियत समय पर ही बुलाया ही जाएगा।
अखबारों की रिपोर्ट बताती है कि लोकसभा का मानसून सत्र समाप्त हो गया स्थगित नहीं हुआ है जबकि अमर उजाला के शीर्षक से लगता है कि हंगामे के कारण स्थगित किया गया या करना पड़ा। टाइम्स ऑफ इंडिया ने लिखा है (पेज 12) कि संसद का मानसून सत्र धुल गया (वाश्ड आउट)। मोटे तौर पर इसका मतलब है, सत्र पूरा हुआ, बहुत उत्पादक नहीं रहा। 166 घंटे बर्बाद हो गये, 248 करोड़ डूब गये जैसी बातें तकनीकी तौर पर तो गलत हैं ही, संसद में सरकार के विरोध को हतोत्साहित करने के लिए है। मुद्दा यह होना चाहिये था कि विपक्ष की मांग के अनुसार चर्चा क्यों नहीं कराई गई और यह कैसे ठीक या गलत है। अखबारों का काम यही है कि वे चर्चा करें, विचार दें जनता को निर्णय करने दे। पर जनता की सोच को कुंद कर उन्हें एक लाइन पर सोचने वाली जानकारी परोसी जा रही है। यह और चाहे जो हो न तो देशहित में है न लोकतंत्र के हित में। बेशक संसद में कुछ विधायी कार्य हुए। इनमें सीएम, पीएम को 30 दिन जेल में रहने पर पद से हटाने का विधेयक शामिल है जबकि मुद्दा यह होना चाहिये था कि सरकार या सरकार के लोगों के कारण जो जनप्रतिनिधि जेल में रहे अपना काम नहीं कर पाये उन्हें क्या सजा होनी चाहिये। उससे क्या नुकसान हुआ या उसकी भरपाई कैसे होगी। मनीष सिसोदिया ने यह मुद्दा उठाया है। सिसोदिया ने कहा कि यह एक अच्छा कदम है, लेकिन जैसा कि पहले ईडी और सीबीआई का दुरुपयोग हुआ है, वैसे ही इस कानून का भी दुरुपयोग होने की आशंका है। सिसोदिया ने कहा कि भ्रष्ट नेताओं को डर होना चाहिए कि वे हटाए जा सकते हैं। आम आदमी पार्टी ईमानदार लोगों की पार्टी है, इसलिए हम ऐसे नियमों का समर्थन करते हैं। लेकिन यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि यह विधेयक सत्ताधारी पार्टी को बहुत अधिक शक्ति देता है। ऐसे में उन्होंने आशंका जताई है कि इस विधेयक का दुरुपयोग हो सकता है।
मुझे लगता है कि भाजपा सरकार और अमित शाह के नैतिकता के दावों के मद्देनजर आज इस मांग को ये प्रमुखता मिलनी चाहिये थी जो अमर उजाला ने घंटे और पैसे बर्बाद करने की खबर को दी है। भाजपा सरकार की भ्रष्ट और स्वार्थी नीतियों के कारण देश बर्बाद हो रहा है, देश का युवा भ्रष्ट हो रहा है और भविष्य अंधकारमय नजर आ रहा है। फिर भी एक जायज और जरूरी विरोध को गलत साबित करने के लिए समाप्त को “स्थगित” कहा गया है। यह इरादतन न हो तो भारी चूक है। वैसे भी, कोई खबर तब बड़ी या महत्वपूर्ण होती है जब नई हो, वैसा पहली बार हुआ हो। चैट जीपीटी से पता चला कि 14वीं लोकसभा (2004–2009) का लगभग 22% समय व्यर्थ गया (हंगामों और अवरोधों के कारण) था और इंडिया टुडे की संबंधित रिपोर्ट में उल्लेख था कि संसद पर हर मिनट ₹26,035 खर्च होता है। इसी तरह 2012 में संसद के शीतकालीन सत्र संसद ने कार्यवाही के 106 घंटे खोए। ज्यादातर आरक्षण विरोध जैसे मुद्दों पर हंगामों के कारण। 15वीं लोकसभा (2009–2014) में कार्यवाही के कुल 577 घंटे बेकार गये थे जबकि राज्यसभा में 442 घंटे नहीं चल पाई थी और कुल 1000 घंटे से अधिक बर्बाद हुआ था। टाइम्स ऑफ इंडिया की (सितंबर 2010) एक रिपोर्ट के अनुसार उस साल मानसून सत्र के दौरान लोकसभा ने कार्यवाही के 45 घंटे और राज्यसभा ने 35 घंटे खोये थे। बाद में वे देर तक बैठकर और समय बढ़ाकर कुछ काम पूरा करने की कोशिश भी की गई थी। इस तरह यह न तो नया है न बहुत ही अलग या अनूठा या वैसा नुकसानदेह जैसा बताया जा रहा है। कारण भी वही है, विरोध लेकिन अब विरोध करने वाले बदल गये हैं, सामना करने वाले परेशान हैं तो अखबार उनकी मदद कर रहे हैं। यह भी कहा जा सकता है कि पहले विरोध करने वालों की मदद करते थे।
इंडिया टुडे और इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार विपक्ष के भारी विरोध के कारण बजट सत्र में लगभग 250 घंटे बेकार गये, काम किए बिना खो गए। यानी लगभग 10 दिन की पूरी कार्यवाही बर्बाद हो गई। जब चुने हुए सांसद वेतन भत्ते लेकर भी रोज संसद नहीं आते हैं तो क्या यह कहा जा सकता है कि वे पैसे लेकर काम नहीं करते हैं? जाहिर है उनका काम संसद की कार्यवाही में हिस्सा लेना ही नहीं है और अगर वही है तो विरोध और उसका सामना करना भी है। ऐसी खबरों से लोकतंत्र में संसद की पूरी कार्यशैली के बारे में न सिर्फ गलत छवि बनाई जा रही है बल्कि गलत जानकारी दी जा रही है। पहले अखबारों में ऐसी खबरें नहीं छपती थीं या बहुत कम छपती थीं और आज भी मुझे ज्यादातर विवरण इंडिया टुडे से मिले जो दैनिक नहीं है। यह तो हुई नैरेटिव सेट करने वाली एक खबर की कहानी। आज ऐसी दूसरी खबर, दि एशियन एज में है। इसके अनुसार, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा है, ‘असुरक्षित कांग्रेस प्रतिभाशाली युवाओं को बोलने नहीं देती’। यह खबर पहले पन्ने पर सिंगल कॉलम में है और कहने की जरूरत नहीं है कि दूसरे अखबारों में नहीं है। प्रधानमंत्री को अपनी और अपनी पार्टी की बात करनी चाहिये और कांग्रेस के बारे में जो सब बोलते रहे हैं वह सब अब उनकी पार्टी में है और उनकी नाक के नीचे हो रहा है। पहले तो खबर अखबारों में भी छपती थी अब नहीं छपती है और ऐसे में उन्हें अगर विपक्ष के बारे में कुछ कहना है तो यह सुनिश्चित किया जाना चाहिये कि उनकी पार्टी में वैसा नहीं हो। भाजपा में नरेन्द्र मोदी और अमित शाह के अलावा कौन बोलता है या बोल सकता है और यह समझना मुश्किल नहीं है कि वही बोल पाता है जिसे बोलने के लिए कहा जाता है और इसमें अनुराग ठाकुर से लेकर चुनाव आयोग के मुखिया सब शामिल हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि भाजपा लोगों को बोलने देने में उदार है जो लोग वर्षों महीनों से नहीं सुने गये उनकी सूची बहुत बड़ी है। यह अलग बात है कि भाजपा अपने नेता के खिलाफ भी अपने ही लोगों को उतार कर देख चुकी है और कांस्टीट्यूशन क्लब का चुनाव चर्चा में है। ऐसे में इस तरह की खबर को महत्व देने का कोई मतलब नहीं है और आज नहीं मिला है। दि एशियन एज ने अंदर के पन्ने पर इस खबर के बाकी हिस्से को छापने की बजाय पूरी खबर को प्रधानमंत्री की फोटो के साथ छह कॉलम में छापा है उसका एक आखिरी कॉलम भी पूरा ऐसा नहीं है जो पहले पन्ने पर नहीं है।
सरकारी प्रचार वाली ये दोनों खबरें मेरे बाकी अखबारों में पहले पन्ने पर नहीं है। सरकार की कार्यशैली बताने वाली एक खबर दिल्ली के नये पुलिस आयुक्त की है। दिल्ली के पुलिस आयुक्त की नियुक्ति या बदली वैसे भी दिल्ली के लिए बड़ी खबर है। मुख्यमंत्री पर हमले के बाद पुलिस आयुक्त को बदला जाना भी महत्वपूर्ण है। टाइम्स ऑफ इंडिया के अनुसार खबर यह है कि, पूर्व आयुक्त 31 जुलाई को रिटायर हो गये थे। उनकी जगह नई नियुक्ति नहीं हुई थी। डीजी होमगार्ड्स एसबीके सिंह कार्यवाहक पुलिस प्रमुख थे और हमला होने के बाद खबर छपी है कि महज 21 दिन में पुलिस प्रमुख को बदल दिया गया। कहने की जरूरत नहीं है कि कार्यवाहक की जगह पूर्ण कालिक की नियुक्ति होनी ही थी। खबर यह थी कि उत्तराधिकारी का निर्णय 31 जुलाई से पहले नहीं किया जा सका था और बाद में भी 21 दिन लग गये। पर खबर ऐसे छपी है जैसे हमले को बहुत गंभीरता से लिया गया है और सुरक्षा चाक चौबंद कर दी गई है। जबकि मामला यह है कि सुरक्षा व्यवस्था ऐसी थी कि मुख्यमंत्री पर ही हमला हो गया। यह चयन और नियुक्ति में देरी के अलावा पुलिस की साख और सतर्कता का भी मामला है। हमले के बाद सीआरपीएफ ने मुख्यमंत्री की सुरक्षा का जिम्मा संभाल लिया है – कई अखबारों में प्रमुखता से है। इंडियन एक्सप्रेस में सिंगल कॉलम की खबर का शीर्षक है, हमले के बाद मुख्यमंत्री को सीआरपीएफ की सुरक्षा मिली, दिल्ली को नया पुलिस प्रमुख। कार्यवाहक पुलिस प्रमुख से मुक्ति मिली भी लिखा जा सकता था। मैं लिखता, मुख्यमंत्री पर हमले के बाद दिल्ली को पुलिस आयुक्त मिला। हिन्दुस्तान टाइम्स में पुलिस प्रमुख बदलने की खबर के साथ है सीआरपीएफ की सुरक्षा मिलने की सूचना है। नवोदय टाइम्स ने इसे लीड बनाया है और बताया है कि उसने पहले ही कहा था कि सतीश गोलचा दिल्ली के नए पुलिस प्रमुख होंगे।
भले यह सब बिल्कुल सामान्य हो पर यह तो खास है ही कि हमलावर गुजरात का है। छपी खबरों के अनुसार, राजेश भाई खिमजी भाई सकरिया (41) राजकोट का निवासी है। वह पहली बार दिल्ली आया है और हाल में ट्रेन से पहुंचा है। वह सिविल लाइन्स स्थित गुजराती भवन में ठहरा था, जहां से उसने मुख्यमंत्री के आवास की रेकी की। पेशे से वह ऑटो रिक्शा चालक बताया गया है। गुजरात में उसके खिलाफ पांच मुकदमे दर्ज हैं—तीन शराब तस्करी के और दो हमले के। इसमें चाकू से हमला भी शामिल है। कुछ मामलों में वह बाद में बरी भी हो चुका है। परिवार के अनुसार, वह एक भावुक जानवर प्रेमी था, विशेषकर कुत्तों का। उसकी इच्छा थी कि वह एक पशु अस्पताल खोले। साथ ही, उसकी माँ ने संकेत दिया कि वह मानसिक रूप से अस्थिर है। दिल्ली पुलिस की जानकारी है कि हमला ठीक-ठाक ढंग से सोचा-समझा था, न कि अचानक हुआ। इसमें गौर करने वाली बात है कि कुत्तों के प्रेमी ने दिल्ली में मुख्यमंत्री के कुत्ता विरोधी अभियान के क्रम में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद मुख्यमंत्री पर हमला किया। मैंने इस बात पर ध्यान नहीं दिया था कि मुख्यमंत्री कुत्ता विरोधी कोई अभियान चला रही हैं। यह सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद मुझे सोशल मीडिया से पता चला। लेकिन हमले के बारे में यह प्रचारित किया गया है कि वह कुत्ता प्रेमी है। लेकिन हाल में यहां आया था। उसे मुख्यमंत्री के कुत्ता विरोध की जानकारी थी या नहीं या कैसे मिली यह सब पता नहीं चला है। मुझे लगता है कि उसका गुजराती होना भी खबर करने लायक एक विषय है लेकिन इसपर कोई खबर नहीं मिली।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। चैट जीपीटी का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद भी होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


