नई दिल्ली | भारत में BBC Hindi के न्यूज़रूम को लेकर इन दिनों मीडिया हलकों में नई बहस छिड़ी हुई है। चर्चाओं का केंद्र यह है कि बीते कुछ समय में कई मुस्लिम पत्रकारों ने संस्थान से दूरी क्यों बनाई और क्या न्यूज़रूम का माहौल पहले जैसा नहीं रहा।
दिल्ली स्थित बीबीसी हिंदी का संचालन अब ‘Collective Newsroom’ नाम की एक अलग भारतीय कंपनी के जरिए किया जा रहा है, जो बीबीसी के लिए कंटेंट तैयार करती है। मार्च 2024 में बने इस नए ढांचे के बाद से कामकाज और संपादकीय माहौल में बदलाव की बातें सामने आ रही हैं।
न्यूज़रूम कल्चर पर सवाल
द लेंस नामक वेबसाइट में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, बीबीसी से जुड़े कुछ वर्तमान और पूर्व पत्रकारों ने नाम न छापने की शर्त पर दावा किया कि न्यूज़रूम में अब पहले जैसी समानता और पेशेवर स्वतंत्रता का माहौल नहीं रहा। एक पूर्व पत्रकार ने उदाहरण देते हुए बताया कि दफ्तर में शाकाहारी और मांसाहारी भोजन के लिए अलग-अलग माइक्रोवेव रखने जैसे फैसलों ने भी अंदरूनी माहौल को लेकर चर्चाएं बढ़ा दीं।
कुछ पत्रकारों का कहना है कि बातचीत में भले भेदभाव साफ न दिखे, लेकिन अंदरूनी माहौल में जाति और धर्म से जुड़ी “वाइब्स” महसूस की जा रही हैं। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो पाई है।
मुस्लिम पत्रकारों के जाने पर चर्चा
मीडिया सर्कल में यह भी चर्चा है कि पिछले दो वर्षों में कई मुस्लिम पत्रकार बीबीसी हिंदी से अलग हुए हैं। इनमें Zubair Ahmed, Faisal Mohammad Ali, Majid Jahangir, Moazziz Imam, Salman Ravi और Ilma Hasan जैसे नाम शामिल बताए जाते हैं।
इनमें से कुछ पत्रकारों ने कथित तौर पर कार्य परिस्थितियों और संपादकीय स्वतंत्रता को लेकर असंतोष जताया, जबकि कुछ मामलों में ट्रांसफर और कॉन्ट्रैक्ट से जुड़े विवाद भी सामने आए।
पुराने आरोप फिर चर्चा में
इस मुद्दे के साथ ही बीबीसी हिंदी पर पहले भी लगे जातिगत और धार्मिक भेदभाव के आरोपों की चर्चा फिर तेज हो गई है। Meena Kotwal के पुराने मामले का भी जिक्र किया जा रहा है, जिसमें उन्होंने अपने कार्यकाल के दौरान भेदभाव का आरोप लगाया था।
कुछ मीडिया विश्लेषकों का कहना है कि यह समस्या संस्थागत कम और व्यक्तिगत स्तर पर ज्यादा हो सकती है, जबकि अन्य इसे संपादकीय नीतियों और बदलते राजनीतिक-सामाजिक माहौल से जोड़कर देख रहे हैं।
‘कलेक्टिव न्यूज़रूम’ का पक्ष
इस पूरे विवाद पर ‘कलेक्टिव न्यूज़रूम’ की ओर से यह स्पष्ट किया गया है कि वह एक स्वतंत्र भारतीय कंपनी है और सीधे तौर पर बीबीसी का प्रतिनिधित्व नहीं करती। कंपनी की सीईओ Rupa Jha के कार्यालय की ओर से कहा गया कि सवाल यह स्पष्ट होना चाहिए कि वे बीबीसी से जुड़े हैं या कलेक्टिव न्यूज़रूम से।
कंपनी ने यह भी बताया कि मीडिया और शिकायतों से जुड़े सवालों के लिए अलग आधिकारिक प्रक्रिया है और संबंधित अधिकारी की अनुपस्थिति के कारण जवाब में देरी हो सकती है।
बदलते ढांचे के बाद नई बहस
दरअसल, 2020 में बीबीसी हिंदी की रेडियो सेवा बंद होने और 2024 में कंटेंट आउटसोर्सिंग मॉडल लागू होने के बाद से संस्थान की कार्यप्रणाली में बड़ा बदलाव आया है। अब कंटेंट उत्पादन का जिम्मा ‘कलेक्टिव न्यूज़रूम’ जैसी कंपनियों के पास है।
इसी बदलाव के बाद से न्यूज़रूम की संस्कृति, संपादकीय स्वतंत्रता और विविधता को लेकर सवाल उठने लगे हैं।
कुछ दिनों पहले बीबीसी हिन्दी के दिल्ली दफ्तर में एक बैठक हुई जिसमें मांसाहार और शाकाहार का मुद्दा उठा तो यह तय हुआ कि पैंट्री में दो माइक्रोवेव रखे जायेंगे – एक शाकाहार के लिए और दूसरा मांसाहार के लिए। इस बैठक में बीबीसी, भारत के नए संस्थान ‘कलेक्टिव न्यूज रूम’ के सीईओ और पत्रकार शामिल थे। दो माइक्रोवेव को लेकर हुई चर्चा और इसके इंतजाम को बीबीसी का नया दिलचस्प चेहरा कहा गया।
द मूकनायक की संस्थापक और दलित पत्रकार मीना कोतवाल के प्रकरण को लें तो यहां तक कह सकते हैं कि बीबीसी हिंदी में जातिगत और धार्मिक भेदभाव की घटनाएं नई नहीं हैं। पत्रकारों में चर्चा है कि मीना कोतवाल को 2011 में इसी किस्म के भेदभाव की वजह से नौकरी छोड़नी पड़ी थी।
अब जिस बात को लेकर दिल्ली के पत्रकारों में बीबीसी, भारत का ‘कलेक्टिव न्यूज रूम’ चर्चा में आया है वो हैरान करने वाला ही नहीं चिंता का भी कारण है। चर्चा इस बात को लेकर है कि अचानक बीबीसी हिंदी सेवा से मुस्लिम पत्रकार अलग होने लगे हैं। क्यों?
जब ‘कलेक्टिव न्यूज रूम’ अस्तित्व में आया उस समय ज़ुबैर अहमद, जो बीबीसी के बहुत वरिष्ठ संवाददाता थे, उनकी नौकरी गई।
इसी तरह वरिष्ठ पत्रकार फैसल मोहम्मद अली, जो लगभग पांच वर्ष बीबीसी के मध्य भारत संवाददाता रहे, उन्होंने कंपनी की नौकरी छोड़ दी। इसके अलावा माजिद जहांगीर, मोअज्ज़िज़ इमाम, सलमान रावी और इलमा हसन को बीबीसी को अलविदा कहना पड़ा। -आवेश तिवारी, वरिष्ठ पत्रकार
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