रायपुर। मुकेश चंद्राकर की हत्या के बाद अब एक और पत्रकार पर खतरा मंडराने लगा है। सड़क निर्माण में खराब गुणवत्ता उजागर करने पर ठेकेदार ने पत्रकार को फोन पर जान से मारने की धमकी दी। धमकी का वीडियो भी सामने आया है, जिसमें ठेकेदार खुलेआम गाली-गलौज करता सुना जा सकता है।
पूरा मामला गोबरा नवापारा थाना क्षेत्र का है। पत्रकार नागेंद्र निषाद, जो खुद का यूट्यूब चैनल चलाते हैं, ने 18 अगस्त को वार्ड क्रमांक 3 की नवनिर्मित सड़क की खराब गुणवत्ता पर रिपोर्ट चलाई थी। खबर में स्थानीय लोगों की शिकायतें भी शामिल थीं। इसी कवरेज से नाराज होकर ठेकेदार रजत बंगानी ने उन्हें फोन कर धमकाया।
फोन कॉल में ठेकेदार ने न सिर्फ अश्लील भाषा का इस्तेमाल किया बल्कि धमकी देते हुए कहा कि वह “कैमरे के सामने 10 लोगों के साथ मिलकर पीटेगा।” उसने खबर हटाने का दबाव भी बनाया। हालांकि पत्रकार ने साफ इनकार कर दिया, जिसके बाद धमकी और तेज हो गई।
पत्रकारों ने इस पूरे मामले की शिकायत पुलिस थाने के साथ गृहमंत्री और डीजीपी तक पहुंचाई है। वहीं, ठेकेदार रजत बंगानी ने स्वीकार किया है कि गाली-गलौज उसने गुस्से में की, लेकिन सड़क निर्माण में कमी नहीं है।
पत्रकारों का कहना है कि यह घटना प्रदेश में पत्रकारों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े करती है। मुकेश चंद्राकर की हत्या के बाद अब एक और साथी को सड़क घोटाले की रिपोर्टिंग पर धमकियां मिलना बताता है कि दबंग ठेकेदारों के हौसले कितने बुलंद हैं।
जयदास मानिकपुरी-
ठेकेदार की दबंगई या लोकतंत्र पर हमला?
छत्तीसगढ़ के जिला Raipur District के गोबरा नवापारा में पत्रकार nagendra nishad को सड़क निर्माण की ख़राब क्वालिटी उजागर करने पर मिली जान से मारने की धमकी सिर्फ़ एक व्यक्ति पर हमला नहीं है, बल्कि यह लोकतंत्र के चौथे स्तंभ पर सीधा वार है।
सवाल यह है कि अगर जनता की आवाज़ उठाने वाले पत्रकार ही सुरक्षित नहीं हैं, तो फिर आम लोग अपनी समस्या किसके सामने रखेंगे? क्या ठेकेदारों और दबंगों की मनमानी पर सवाल उठाना अब अपराध बन गया है?
पत्रकार की शिकायत दर्ज हो चुकी है, लेकिन क्या केवल एफआईआर दर्ज कर देना पर्याप्त है? क्या पुलिस प्रशासन ठेकेदार पर सख्त कार्रवाई करेगा, या मामला दबा दिया जाएगा? यह भी सोचने की बात है कि ऐसे मामलों में पुलिस की ढिलाई ही दबंगों को और ताकतवर बनाती है।
आज नागेंद्र निषाद को धमकी मिली है, कल किसी और पत्रकार को मिलेगी। क्या पत्रकारिता का काम अब केवल “सरकार की प्रेस रिलीज़ पढ़ना” भर रह जाएगा? अगर जमीनी सच्चाई दिखाना ही जान जोखिम में डालना है, तो लोकतंत्र के चौथे स्तंभ का अस्तित्व ही खतरे में है।
इस पूरे मामले ने एक बार फिर सवाल खड़े किए हैं- क्या पत्रकारिता करने का मतलब आज भी खतरे से खेलना है? क्या ठेकेदार और रसूखदार लोग कानून से ऊपर हैं? और सबसे बड़ा सवाल क्या पुलिस और प्रशासन सच बोलने वाले पत्रकार के साथ खड़े होंगे?
अब देखना यह होगा कि यह घटना भी बाकी घटनाओं की तरह “कागज़ी कार्रवाई” तक सीमित रह जाती है या सचमुच पत्रकार की सुरक्षा और लोकतंत्र की गरिमा बचाने के लिए कठोर कदम उठाए जाते हैं।
पत्रकार मुकेश चंद्राकर से जुड़ी खबर…


