चिरकुट अखबारों ने खुद को बचाने के लिए कैसा दांव खेला, देखें

अपने अस्तित्व को बनाए रखने के लिए दूसरे को नीचे ग़िराना अख़बार की नैतिकता में नहीं था लेकिन ये नैतिकता अब टूट रही है।

नई परंपराएँ लिखी जा रही हैं….

इसी अख़बार को ये हेडलाइन लिखते वक्त ये भी ध्यान रखना चाहिए था कि क्या इन्होंने अपने ही मालिक के सपने को चकनाचूर नहीं कर दिया है।

अभी लॉक डाउन में यही अख़बार अपने मोबाइल एप को जमकर प्रोमोट कर रहा था….

इनसे पूछिए जब भास्कर एप खोलेंगे तब मोबाइल पर कोरोना नहीं आता क्या?

अख़बार अपनी जगह हमेशा रहेगा… लेकिन नए माध्यम को अपने एजेंडे के लिए नकारात्मक दिखाना आपकी नैतिकता पर सवाल खड़े कर देता है।

खैर डिजिटल मीडिया भविष्य है और उसी भविष्य को हिंदुस्तान के युवाओं ने अपनाया और बनाया है।

-सुशील पाल



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