अशोक कुमार पांडेय-
एपस्टीन फाइल में नेता, बिजनेसमैन और दलाल तो हैं ही लेकिन नोम चोम्स्की जैसे अपने समय के अत्यंत प्रतिष्ठित बुद्धिजीवी को देखकर दिल टूट जाता है।
एक मोसाद एजेंट के अय्याशी के अड्डे को मिस करते उसके बारे में फ़ैंटासी करते नोम की तस्वीर दिमाग़ में बनाए नहीं बनती। Et tu Brutus!
प्रकाश के रे-
एप्स्टीन फ़ाइल्स: नोम चोमस्की की घुलाटी… पहले एप्स्टीन से चोमस्की के संबंधों के बारे में पहले यह माना गया था कि यह केवल वित्तीय सलाह तक सीमित था. लेकिन अब जारी ईमेल बताते हैं कि इन दोनों का नाता बहुत गहरा था.
जब एप्स्टीन पर केस होने लगे, तब चोमस्की ने उसे बचाव के बारे में सलाह दी. एक सलाह यह भी थी कि कुछ बोलो ही मत. अब तो यह शक़ हो रहा है कि कुछ समय से चोमस्की के बोलने की क्षमता चली गई है, वह बुढ़ापे का नतीजा नहीं है, बल्कि यह बचाव का बहाना हो सकता है.
ईमेल से पता चलता है कि एप्स्टीन से चोमस्की दंपत्ति का बहुत गहरा नाता था. उनकी पत्नी एप्स्टीन के लिए व्यंजन बनाती थीं, कार्ड डिज़ाइन करती थीं, लगातार हाल-चाल पूछती थीं.
एक मेल में एप्स्टीन ब्रेक्ज़िट, यूक्रेन आदि अनेक मसलों पर चोमस्की से बात करने की इच्छा जताता है. चोमस्की लिखते हैं कि एक अच्छी शाम साथ गुज़ारी जाए और ब्राज़ीलियन जैज़ सुना जाए. अपने लगभग हर मेल में चोमस्की एप्स्टीन के कुख्यात द्वीप पर फिर जाने की इच्छा व्यक्त करते हैं. एक में तो वे लिखते हैं कि आइलैंड को लेकर वे ‘फ़ैंटेसाइज़’ करते रहते हैं.
प्रोपेगैंडा, मीडिया, मनोविज्ञान, भाषा आदि के ज्ञाता होने के नाते चोमस्की इनका इस्तेमाल करना और फ़ायदा उठाना भली-भाँति जानते थे. इन्होंने सोवियत संघ और वामपंथ को बदनाम कर तथा पश्चिमी प्रगतिशील राजनीति को कुंद कर अपने हैंडलरों को ही फ़ायदा पहुँचाया है. भारत समेत दुनिया में जहाँ-जहाँ चोमस्की के विचारों को लेफ़्ट और लिबरल समूहों ने पढ़ा-पढ़ाया, वहाँ-वहाँ इनकी दुकान बंद हो गई.
हैरत की बात है कि मीडिया, प्रोपेगैंडा, युद्धों आदि पर चोमस्की से पहले बोल-लिख चुके और बेहतर बोल-लिख चुके माइकल पैरेंटी जैसे विद्वानों को कई देशों में लेफ़्ट ने परे रखा. आज की दुर्गति समझ में आ रही है.
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