वैभव अग्रवाल-
नोएडा में जो लेबर अनरेस्ट देखने को मिल रहा है, उसे सिर्फ हरियाणा में 35% मिनिमम वेज बढ़ने से जोड़कर देखना बहुत सतही समझ होगी। कहानी इससे कहीं ज़्यादा गहरी है।
गारमेंट और कई अन्य इंडस्ट्रीज़ में एक कड़वी सच्चाई यह है कि 8 घंटे की तनख्वाह पर 12 घंटे काम कराया जाता है। ..ओवरटाइम का प्रीमियम तो दूर, कई जगह ओवरटाइम का भुगतान ही नहीं होता। वीकली ऑफ, बोनस, ये सब कागज़ों में ज़्यादा और ज़मीन पर कम दिखते हैं। … जहाँ कंपनियाँ देती भी हैं, वहाँ ठेकेदारी सिस्टम में काफी हिस्सा रास्ते में ही “गायब” हो जाता है।
एक बड़ी विसंगति यह भी है कि छोटे कस्बों और नोएडा जैसे महंगे औद्योगिक क्षेत्र के लिए मिनिमम वेज लगभग समान हैं। .. जहाँ छोटे शहर में 800 रुपये में कमरा मिल जाता है, वहीं नोएडा में वही खर्च 4000 रुपये तक पहुंच जाता है। यह अंतर असंतोष को बढ़ाता है।
लेकिन तस्वीर का दूसरा पक्ष भी उतना ही वास्तविक है। ,.. हर जगह सिर्फ फैक्ट्री मालिक गलत नहीं होते। कई जगह लेबर में भी अनुशासन और नीयत की समस्या दिखती है। .. हमारी अपनी कंपनी नोरेक्स में, जहाँ पूरी HR प्रणाली लागू है, insurance, weekly off, कैजुअल लीव, sick leave, earned leave, maternity leave, सब कुछ होने के बावजूद रोज़ाना ऑपरेशनल चुनौतियाँ रहती हैं।
आज जो स्थिति बनी है, वह चिंताजनक है। सेक्टर 63 में, हमारे Innovation Centre के सामने की फैक्ट्रियों में भी तोड़फोड़ की खबरें आई हैं। .. अगर इसे तुरंत नियंत्रित नहीं किया गया, तो यह आर्थिक समस्या से निकलकर राजनीतिक अस्थिरता का रूप ले सकती है, शायद ले भी चुकी है।
सरकार को यहाँ संतुलित लेकिन सख्त भूमिका निभानी होगी, जो उद्योग श्रम कानूनों का पालन नहीं कर रहे, उनके खिलाफ कार्रवाई , और जो लोग श्रमिकों के नाम पर हिंसा और अराजकता फैला रहे हैं, उन्हें भी सख्ती से रोकना पड़ेगा।
आखिरकार, उद्योग और श्रमिक, दोनों एक-दूसरे के पूरक हैं, विरोधी नहीं।
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