सरकारी विज्ञापन का दावा और स्वाभाविक सवाल का जवाब नहीं

आज के अखबारों में उत्तर प्रदेश से संबंधित दो विज्ञापन हैं। एक उत्तर प्रदेश सरकार का दूसरा राष्ट्रीय स्वच्छ गंगा मिशन का। दूसरा विज्ञापन केंद्र सरकार के जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्रालय के मिशन का है। इस विज्ञापन में घोषणा की गई है, “12 नवंबर 2018, निर्मल गंगा की ओर से एक महत्वपूर्ण कदम, वाराणसी शहर से अब 14 करोड़ लीटर प्रतिदिन दूषित पानी गंगा नदी में नहीं बहेगा।” सवाल उठता है कि वाराणसी का इतना पानी कहां जाएगा? इसके नीचे उतने ही बड़े अक्षरों में लिखा है, “नरेन्द्र मोदी, प्रधानमंत्री के कर कमलों द्वारा वाराणसी में सीवरेज परियोजनाओं का उद्घाटन, राम नगर में एसटीपी का शिलान्यास।”

इन बातों से आप अंदाजा लगा सकते हैं कि मामला वाराणसी के सीवरेज को साफ करके गंगा में बहाने का है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं हुआ कि, “अब 14 करोड़ लीटर प्रतिदिन दूषित पानी गंगा नदी में नहीं बहेगा।” नहीं बहेगा तो इतने पानी का क्या किया जाएगा बताए बगैर बात पूरी नहीं होगी। इसलिए मानकर चला जाए कि सीवर के पानी को साफ करके गंगा में डालने की योजना है और यह बड़ा काम है। पर यही क्यों नहीं कहा जाए। इस तरह, “वाराणसी का प्रदूषित पानी या सीवर अब साफ करके गंगा में बहाया जाएगा”।

असल में गंगा को प्रदूषण मुक्त करने की सबसे बड़ी जरूरत यही है कि उसके किनारे के शहरों का सीवर इसमें न डाला जाए। यह संभव नहीं है तो तय हुआ था (बहुत पहले) कि इसे साफ करके नदी में बहाया जाए। पर यह काम हुआ नहीं, ठीक से नहीं हुआ या हुआ पर लागू नहीं हुआ और गंगा प्रदूषित है। अब जब विज्ञापन के जरिए बताया जा रहा है कि 14 करोड़ लीटर गंगा में नहीं बहेगा तो यह भी बताया जा रहा है कि इससे संबंधित दो एसटीपी – एक गोइया में 120 एमएलडी का और दूसरा रामना में 50 एमएलडी का निर्माण चल रहा है। राम नगर में 10 एमएलडी के एसटीपी का आज शिलान्यास होगा।

विज्ञापन में बताया गया है कि 140 एमएलडी का एक एसटीपी (दीनापुर) बनकर तैयार है जो आज के उद्घाटन के बाद काम करेगा। इसी आधार पर कहा गया है कि 14 करोड़ लीटर सीवर गंगा में नहीं बहेगा। विज्ञापन में बताया गया है कि 120 और 50 एमएलडी के दो एसटीपी निर्माणाधीन हैं और 10 एमएलडी के एक एसटीपी का तो आज शिलान्यास होना है। निर्माणाधीन और शिलान्यास वाले एसटीपी कब तक तैयार हो जाएंगे और किस लिए बन हैं (वाराणसी में तो अब सीवर बचेगा नहीं) यह विज्ञापन में नहीं बताया गया है।

यही नहीं, विज्ञापन के अनुसार आज उद्घाटन वाले एसटीपी (सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट) की क्षमता 140 एमएलडी है। यानी रोज 24 घंटे पूरी क्षमता पर काम करे तो 14 करोड़ लीटर सीवर का ट्रीटमेंट हो पाएगा। क्या यह संभव है कि कोई (सरकारी) प्लांट रोज 24 घंटे पूरी क्षमता पर काम करेगा औऱ करेगा तो कितने दिन? सरकारी विज्ञापनों में ऐसे जवाब नहीं होते और सरकारी दावों पर ऐसे सवाल करने भी नहीं चाहिए। ऐसा नहीं है कि पहले ऐसे प्लांट नहीं बने हैं। पहले वाले कितने प्लांट चल रहे हैं और किस क्षमता पर यह अखबारों में नहीं छपता, सरकार नहीं बताती है।

तथ्य यह भी है कि गंगा किनारे के सैकड़ों शहरों में से एक का पानी साफ करके उसमें डालने से भी कोई खास फर्क नहीं पड़ने वाला है पर यहां तो जानकारी देने में ही गोलमाल है। अगर हम यह मानकर चलें कि मामला सीवर को साफ करके ही गंगा में बहाने का है तो विज्ञापन में यही क्यों नहीं लिखा है।

वरिष्ठ पत्रकार और अनुवादक संजय कुमार सिंह की रिपोर्ट। संपर्क : anuvaad@hotmail.com

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