Om जी के पास के.के. बिड़ला पुरस्‍कार देने वाले को चुनने की सुविधा नहीं थी!

Abhishek Srivastava : जिस तरह Om जी के पास के.के. बिड़ला पुरस्‍कार देने वाले को चुनने की सुविधा नहीं थी, उसी तरह Uday जी को मुख्‍य अतिथि चुनने की सुविधा नहीं थी या काशीनाथ सिंह को भारत भारती लेते वक्‍त उत्‍तर प्रदेश की मनपसंद सरकार चुनने की सुविधा नहीं थी। जिस तरह ओमजी ने पुरस्‍कार कल्‍याण सिंह के हाथों नहीं बल्कि राज्‍यपाल के हाथों से लिया है, ठीक वैसे ही नरेश सक्‍सेना ने रमण सिंह से नहीं बल्कि एक जनप्रतिनिधि से हाथ मिलाया था और नामवरजी ने नरेंद्र मोदी के साथ नहीं बल्कि लोकतंत्र में चुने गए एक प्रधानमंत्री के साथ ज्ञानपीठ का मंच साझा किया था।

इसी तर्ज पर सुषमा स्‍वराज ने विदेश मंत्री के बतौर नहीं बल्कि पारिवारिक मित्र के रूप में ललित मोदी की मानवीय मदद की है। मोदीजी प्रधानमंत्री की हैसियत से नहीं बल्कि एक मित्र की हैसियत से अडानीजी को विदेश यात्रा पर ले गए थे। मुकेश भाई ने प्रधानमंत्री के नहीं, अपने दोस्‍त की पीठ पर हाथ रखा था। राजनाथ सिंह गृह मंत्री के बतौर नहीं, एक बाप की हैसियत से अपने बेटे को ट्रांसफर-पोस्टिंग में पैसा खाने का मौका दे रहे थे। ठीक ऐसे ही नीतिश कुमार और लालू यादव का गठजोड़ राजनीतिक अवसरवाद नहीं, पुराने दोस्‍तों का पुनर्मिलन है। बिलकुल इसी तर्ज पर बिहार उच्‍च न्‍यायालय के दो जजों ने सवर्ण होने के नाते नहीं, साक्ष्‍यों के अभाव में बिहार के पांच दलित नरसंहारों के दोषियों को छोड़ दिया था।

कोई शक? अगर आपके पेट में बल पड़ रिया है, तो आप इन सब लोगों के दुश्‍मन हैं। मस्‍त रहिए। साहित्‍य अकादमी से पुरस्‍कार लीजिए, कमरे में सजाइए, अकादमी पुरस्‍कार पाने वाले प्रो. कलबुर्गी की हत्‍या का साथ में विरोध भी करते रहिए। इस देश में conflict of interest एक लुप्‍तप्राय पक्षी का नाम है। यह पक्षी कहीं ग़लती से मिल भी जाए, तो तत्‍काल भून कर निगल जाइए और किसी राजभवन में जाकर संविधान के नाम पर डकार मार आइए। फिर मुअनजोदड़ो के इतिहास में आपका नाम भी दर्ज होना तय है।

पत्रकार अभिषेक श्रीवास्तव के फेसबुक वॉल से.


उपरोक् स्टेटस पर आए कुछ कमेंट्स इस प्रकार हैं…

Satya Narayan थानवी जी की रीढ की हड्डी तो सांप के जैसी लचीली निकली। फासीवाद फासीवाद चिल्‍लाते चिल्‍लाते कल्‍याण सिंह शरणागत हो गये। थानवी जी तो बड़े बेशर्म निकले। इतनी तेजी से ब्‍लॉक तो गाली गलौच करने वाले संघियों को भी नहीं किया जाता जितने तेजी से वो मुझे कर गये।

Om Thanvi तो नामवर सिंह, नरेश सक्सेना, उदय प्रकाश, काशीनाथ सिंह, नरेंद्र मोदी, मुकेश अम्बानी, गौतम अडानी सब इस आधार पर एक-से हो गए कि कौन कब कहाँ किसके साथ जा बैठा! वाह, क्या तर्कशास्त्र है!

Akhilesh Pratap Singh ना….बिल्कुल ना……नरेंद्र मोदी, अडानी, अंबानी की तरह तो होने का सवाल ही नहीं बनता….उनसे क्या शिकायत हो सकती है ? सवाल तो उनसे है जो सवाल करने वालों की पांत से उचककर गमलों में सज जाते हैं.. वाजिब सवाल है अभिषेक भाई… पर जवाब में सवाल ही मिलेगा….मने आप ही जस्टिफाई कीजिए कि आपका सवाल जायज है……

Mohammad Ehtasham Om Ji itne senior hain aur record itna achcha k is 1 incident ko andaze ki ghalti hi maan sakte hain ….. itna kade shabdon mein virodh k bajaye sirf yeh kahna kafi ho sakta tha k “Om Ji yeh ghalat hai”

Abhishek Srivastava तर्क तो आपका ही दिया हुआ है Om Thanvi, मैंने तो बस उसका सहज अनुप्रयोग किया है। तर्कशास्‍त्रीय शब्‍दावली में आपके तर्क को अर्धकुक्‍कुट न्‍याय की संज्ञा दी जाती है, जहां आधी मुर्गी खाने के बाद आधी को अंडा देने के लिए छोड़ दिया जाता है।

आशीष सागर सब अपनी सुविधा के अनुसार ही तो सम्मान,मंच और प्रतिमान तय कर रहे है ….पात्र तो !!!

Anil Pushker ॐ जी जिन्दगी भर जन सत्ता का खाते रहे Abhishek Srivastava ji. अब राज सत्ता की जूठन के एक कौर का अंश मात्र भी चाटने को मिले तो खुशी से खा लेंगे. तर्क वही रहेगा. जनसेवक का जूठा खाया है तो क्या बुरा किया? जनसत्ता के ओहदे पर जनसेवक होने का कुछ तो मोल मिले व्ही पुरस्कार है मेरा. जनसेवक ही तो रहा मैं जिन्दगी भर…. हाँ इतनी औकात नहीं रही – जन सत्ता के सेवक की, कि राज भोग मिल जाय. ये तो अपनी अपनी किस्मत है. बिडला ने बर्षों से लेखक बिरादरी को सांड बनकर शियारों को अपना पिंड (एक लाख) हिलाता हुआ लुभाए रहा. और खुद खरबों की दौलत का मालिक बना गया. कोई शियार कुछ नहीं बोला. इन शियारों से क्या उम्मीद करना और क्यूँ उम्मीद करना? इनकी काहे की जवाबदेही. दरबार में नगरवधू की भी एक हैसियत हुआ करती थी. मगर आप देखिये दरबारी लेखक तो दरबारी संस्कृति में हमेशा से बादशाह की खुशी के लिए लेखकीय वेश्यावृति करता रहा है. लिखने की मजबूरी थी या पेट की पता नहीं. पर मजबूर रहा है. अब उन दरबारी लेखकों की अगली पुश्तें भी तो लोकतंत्र के राजाओं को खुश करने के लिए कुछ न कुछ तो करेंगी……

Shashank Dwivedi कुछ समय पहले जब कथित साहित्यकार उदय प्रकाश ने सांसद आदित्यनाथ के हाथ से सम्मान लिया था तो सेकुलरिज्म पर करारी चोट हुई थी लेकिन अब ओम थानवी ने जब यह सम्मान कल्याण सिंह से लिया तो वो राज्यपाल के हांथो हो गया ..क्या मजेदार और सुविधाजनक तर्क है ..लगे रहिये कामरेड ,लगे रहिये और ऐसे ही मलाई खाते रहिये ..इसी मलाई ने ही तो तुम लोगों का पतन करा दिया और आज कोई नामलेवा नहीं रह गया पूरे देश में वामपंथियो का…

Umesh Chaturvedi अभिषेक…आपसे ऐसी ही उम्मीद थी….ऐसा आप ही लिख सकते हैं और अवसरवाद की कलई ऐसे शब्दों में आप ही खोल सकते हैं…

Abhishek Srivastava बटोही जी, कंल्‍याण सिंह से थानवी जी का कोई बौद्धिक आदान-प्रदान नहीं हुआ है। पुरस्‍कार मिला है। इसमें बौद्धिक अछूतवाद कहां से आ गया।

Om Thanvi मैंने तब भी उदयजी का पुरजोर समर्थन किया था Shashank Dwivedi, मंगलेश डबराल (ईश्वर से प्रार्थना है वे जल्द स्वस्थ हों) जब संघ से जुड़े एक मंच पर गए और उनकी आलोचना हुई तब भी मैंने इस आवाजाही का समर्थन किया था। मेरा स्टैंड शुरू से साफ है। कहीं और जाकर अगर अपनी बात कही तो अपनी बात का दायरा बढ़ाया ही, अपने लोगों के बीच तो अपनी बात रोज कहते हैं।

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