अयोध्या विवाद पर अंतिम फैसले की घड़ी!

अजय कुमार, लखनऊ

अयोध्या विवाद (बाबरी मस्जिद-रामजन्मभूमि विवाद) फिर सुर्खिंया बटोर रहा है। देश की सर्वोच्च अदालत कल (11 अगस्त 2017) से इस एतिहासिक विवाद का हल निकालने के लिये नियमित सुनवाई करने जा रही है। अदालत जो भी फैसला करेगा उसे दोंनो ही पक्षों को मानना होगा, लेकिन देश में मोदी और प्रदेश में योगी सरकार बनने के बाद ऐसा लगने लगा है कि अब इस मसले पर सियासत बंद होगी और कोई फैसला सामने आयेगा। उक्त विवाद करोड़ों हिन्दुओं की आस्था से जुड़ा हुआ मसला है तो कुछ मुस्लिम संगठन इस पर अपनी दावेदारी ठोेक रहे हैं। करीब पांच सौ वर्ष पुराने इस विवाद ने कई उतार-चढ़ाव देखे हैं।

रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद में गत दिनों उस समय एक नया मोड़ आ गया,जब यूपी के शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दायर करके अपना पक्ष रखते हुए दावा किया,‘ विवाद खत्म करने के लिए बोर्ड का मत है कि अयोध्या में विवादित स्थल से उचित दूरी पर मुस्लिम बहुल इलाके में मस्जिद बनाई जा सकती है।’ अयोध्या के रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद टाइटल विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में कल (11 अगस्त 2017) से सुनवाई होनी है। शिया बोर्ड भी सुप्रीम कोर्ट में एक पार्टी है। ऐसे में यह हलफनामा अहम माना जा रहा है।

यूपी शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड के चेयरमैन की ओर से दाखिल 30 पेज के हलफनामे में कहा गया है कि बाबरी मस्जिद मीर बकी ने बनवाई थी। वह शिया थे और शिया वक्फ बोर्ड की स्थापना उन्होंने की थी। ऐसे में मस्जिद की प्रॉपर्टी शिया वक्फ बोर्ड की है। मस्जिद सुन्नी वक्फ बोर्ड की नहीं है। ऐसे में मस्जिद के बारे में शिया वक्फ बोर्ड ही बातचीत कर सकता है। इस मामले में सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड के स्टैंड पर ऐतराज जताते हुए शिया बोर्ड ने यह भी कहा कि तमाम मुद्दों पर समझौते के लिए एक कमिटी बनाए जाने के लिए वक्त दिया जाए।

गौरतलब हो बीते मार्च महीने में सुप्रीम कोर्ट ने भी सुझाव दिया था कि मंदिर-मस्जिद विवाद का कोर्ट के बाहर निपटारा होना चाहिए। इस पर सभी संबंधित पक्ष मिलकर बैठें और आम राय बनाएं। बातचीत नाकाम रहती है तो हम दखल देंगे,लेकिन इस पर दोनों ही पक्षों की तरफ से कोई सार्थक शुरूआत नहीं की गई,जिस कारण से सुप्रीम कोर्ट अब इस विवाद की नियमित सुनवाई करने जा रहा है।

अभी तक बाबरी मस्जिद के सबसे बड़े पैरोकार हाशिम अंसारी (अब मृत) और बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी ही विवादित स्थल पर अपनी दावेदारी ठोक रही थी।उत्तर प्रदेश शिया वक्फ बोर्ड ने अयोध्या में राम मंदिर के पक्ष में हलफनामा देकर मुस्लिम सियासत को और गरमा दिया है। मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड के सदस्य इसके औचित्य पर सवाल खड़े कर रहे हैं तो सुन्नी वक्फ बोर्ड का मानना है कि शिया वक्फ को इसका अधिकार ही नहीं है। शिया वक्फ बोर्ड के हलफनामें पर मुस्लिम पक्ष के कुछ पैरोकारों का यह भी मानना है कि इससे सुप्रीम कोर्ट में चल रहे विवाद पर कोई असर नहीं पड़ेगा।

शिया वक्फ बोर्ड ने यह हलफनामा ऐसे समय में दिया है जबकि वह सपा सरकार में संपत्तियों के दुरुपयोग जैसे कई आरोपों से घिरा हुआ है। हालांकि वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष वसीम रिजवी ऐसे आरोपों को बेबुनियाद बताते हुए कह रह हैं,‘हम न्यायालय में चल रहे मुकदमे में पक्षकार हैं और अन्य पार्टियों की तरह अपना जवाब रखने का हमें हक है। उससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि हमने कब अपना पक्ष रखा। यह सुप्रीम कोर्ट देखेगा कि हमने हलफनामा देर में रखा या समय से। दूसरी ओर इस मुकदमे में पैरोकार पूर्व अपर महाधिवक्ता जफरयाब जीलानी मानते हैं कि इस हलफनामे का मुकदमे की सुनवाई पर असर नहीं पड़ेगा। उन्होंने आरोप लगाया कि इसका उद्देश्य सियासी है और यह भाजपा को फायदा पहुंचाने के लिए किया गया है। सुन्नी वक्फ बोर्ड के चेयरमैन जुफर फारुकी कहते हैं कि 1946 में यह तय हो चुका है कि मस्जिद पर शिया का हक नहीं है। 71 साल बाद इस मामले को अदालती लड़ाई में उठाना गलत है।

बताते चलें कि 30 सितंबर 2010 को हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने विवादित 2.77 एकड़ जमीन में से निर्मोही अखाड़े को राम चबूतरा और सीता रसोई वाली जगह, रामलला विराजमान को मूर्ति वाली जगह और सुन्नी वक्फ बोर्ड को बचा हुआ तिहाई हिस्सा देने को कहा था,जिस पर कोई भी पक्ष राजी नहीं हुआ जिसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुच गया था।

किसने क्या कहा–

यह मस्जिद मीरबाकी ने बनवाई थी, जो शिया था। 1946 तक मस्जिद उनके पास थी लेकिन, अंग्रेजों ने गलत कानूनी प्रक्रिया से इसे सुन्नी वक्फ बोर्ड को दे दिया। मस्जिद और मंदिर पास-पास नहीं होने चाहिए क्योंकि दोनों समुदाय के लोग लाउडस्पीकर का इस्तेमाल करते हैं। हम चाहते हैं कि राम जन्मभूमि स्थल से उचित दूरी पर मुस्लिम इलाके में मस्जिद बनवाई जाए। -शिया वक्फ बोर्ड

अयोध्या में विवाद मस्जिद का नहीं, बल्कि भूमि का है। इसे शिया-सुन्नी के विवाद के रूप में नहीं देखा जा सकता। शिया वक्फ बोर्ड का हलफनामा औचित्य से परे है। इसका कोई अर्थ नहीं है। -वरिष्ठ सदस्य आल इंडिया पर्सनल लॉ बोर्ड खालिद रशीद फरंगी महली

मंदिर और मस्जिद दोनों बनें। मंदिर वहीं बने, जहां वह है। मस्जिद सरयू नदी के दूसरी तरफ बननी चाहिए। -बीजेपी नेता सुब्रमण्यन स्वामी

शिया वक्फ बोर्ड का हलफनामा झूठ के सिवा कुछ नहीं है। चंद बिके लोगों की यह करतूत है। इससे सुनवाई पर कोई असर नहीं पड़ेगा। -हाजी महबूब, सुन्नी सेंट्रल बोर्ड

इस हलफनामे से दुनिया भर में बड़ा संदेश गया है। देश में रहने वाला हर राष्ट्रप्रेमी मुसलमान चाहता है कि राममंदिर जन्मभूमि पर बने। -महंत रामदास, निर्मोही अखाड़ा

लेखक अजय कुमार लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं.

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उम्रदराजी की छूट अगर नीलाभ को मिली तो वागीश सिंह को क्यों नहीं?

Amitesh Kumar : हिंदी का लेखक रचना में सवाल पूछता है, क्रांति करता है, प्रतिरोध करता है..वगैरह वगैरह..रचना के बाहर इस तरह की हर पहल की उम्मीद वह दूसरे से करता है. लेखक यदि एक जटिल कीमिया वाला जीव है तो उसका एक विस्तृत और प्रश्नवाचक आत्म भी होगा. होता होगा, लेकिन हिंदी के लेखक की नहीं इसलिये वह अपनी पर चुप्पी लगा जाता है. लेकिन सवाल फिर भी मौजूद रहते हैं.

नीलाभ जी को रंग प्रसंग का संपादक बनने की बधाई. वैसे इससे क्या फ़र्क पड़ता है कि अजित राय को एक बकियौता अंक का संपादन मिलने से वे क्षुब्ध थे. वैसे क्षुब्ध तो वो रानावि प्रशासन के रुख से भी थे जिसने, बकौल उनके, उनके संपादन में निकलने वाले दूसरे अंक की तैयारी के समय दिखाया था. और वह अंक भी क्या था! उसमें संपादक ने नाट्य आलेख के बारे में जो बचकाने सवाल पूछे थे उनकी चर्चा का ये समय नहीं है. ये बधाई का वक्त है. क्या हुआ कि नामवर सिंह के पैनल में रहते हुए भी वे संपादक बन गये, क्या हुआ कि उनकी उम्र सत्तावन से खासी अधिक है. लोगों को हैरत होती है तो होती रहे. उन्हें बधाई.

बधाई की बारी आती है अब राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की जिसने ये साबित किया कि युवा पीढ़ी में कोई भी रंग प्रसंग का संपादक बनने के योग्य नहीं है. लेकिन उम्रदराजी की छूट अगर नीलाभ को मिली तो वागीश सिंह को क्यों नहीं? क्योंकि उनके संपादन में निकलने वाले दो रंग प्रसंग के अंक में एक दृष्टि थी, एक योजना थी. तभी तो अभिनय वाला अंक दुबारा छपा.

थिएटर से जुड़े और शोध छात्र अमितेश कुमार के फेसबुक वॉल से.

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दैनिक जागरण नोएडा के 18 मीडियाकर्मी टर्मिनेट, प्रबंधन ने बाउंसर बुलाया, पुलिस फोर्स तैनात

दैनिक जागरण नोएडा की हालत बेहद खराब है. यहां मीडियाकर्मियों का जमकर उत्पीड़न किया जा रहा है और कानून, पुलिस, प्रशासन, श्रम विभाग, श्रम कानून जैसी चीजें धन्नासेठों के कदमों में नतमस्तक हैं. बिना किसी वजह 18 लोगों को टर्मिनेट कर उनका टर्मिनेशन लेटर गेट पर रख दिया गया. साथ ही प्रबंधन ने बाउंसर बुलाकर गेट पर तैनात करा दिया है. भारी पुलिस फोर्स भी गेट पर तैनात है ताकि मीडियाकर्मियों के अंदर घुसने के प्रयास को विफल किया जा सके. टर्मिनेट किए गए लोग कई विभागों के हैं. संपादकीय, पीटीएस से लेकर मशीन, प्रोडक्शन, मार्केटिंग आदि विभागों के लोग टर्मिनेट किए हुए लोगों में शामिल हैं.

 दरअसल पूरा मामला मार्केटिंग की दो लड़कियों को टर्मिनेट किए जाने से शुरू हुआ. बिना कारण बताए जब दो लड़कियों को टर्मिनेट कर दिया गया तो विभिन्न विभागों के करीब दो दर्जन लोग एकजुट होकर सीजीएम नीतेंद्र श्रीवास्तव के पास गए और बिना किसी कानूनी प्रक्रिया पूरी किए टर्मिनेट किए जाने को अनुचित बताया. कर्मियों के दबाव में लड़कियों को आफिस में आने और काम करने की अनुमति तो दी गई लेकिन जैसे ही सब लोग अपने अपने काम पर लौटे, प्रबंधन ने इन दो दर्जन लोगों के खिलाफ विभिन्न धाराओं में मुकदमा करा दिया.

उधर, मार्केटिंग की लड़कियों ने साफ साफ बताया कि दरअसल उन्हें टर्मिनेट परफारमेंट से कारण नहीं किया गया है बल्कि वे बासेज की कई अनुचित मांगों को पूरा नहीं कर रहीं थी, इसलिए उन्हें निशाना बनाया गया. लड़कियों ने भी छेड़छाड़ समेत कई धाराओं में प्रबंधन के खिलाफ मुकदमा लिखाया. इससे परेशान प्रबंधन ने खुद को वजनदार और दमदार दिखाने की कोशिश करते हुए 18 मीडियाकर्मियों को टर्मिनेट कर दिया. फिलहाल नोएडा स्थित दैनिक जागरण के गेट पर भारी तनाव पसरा हुआ है.

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ओम थानवी के लिए एक लाख रुपये चंदा इकट्ठा करने की अपील ताकि वो फिर किसी कल्याण के हाथों एवार्ड न लें

Mohammad Anas : ओम थानवी जी की मदद की अपील —- दोस्तों, हम सबके बेहद प्रीय जनसत्ता के पूर्व सम्पादक ओम थानवी जी अब नौकरी से रिटायर हो गए हैं. उन्होंने केके बिरला फाउंडेशन द्वारा अपनी किताब के लिए बाबरी विध्वंस के आरोपी कल्याण सिंह के हाथ से एक लाख रुपए का पुरूस्कार लिया है. कल्याण न सिर्फ बाबरी विध्वंस के आरोपी हैं बल्कि उन पर सांप्रदायिक माहौल बिगाड़ने के लिए हेट स्पीच, दंगा भड़काने, घोटाले तक के आरोप लगे हुए हैं. जैसे तालिबान का मुल्ला उमर वैसे ही भाजपा के कल्याण सिंह. फेसबुक पर श्री ओम थानवी जी ने लिखा है कि पुरूस्कार लेने से मेरे दुश्मनों को दिक्कत हो गई है.

सर, हम सब आपके बच्चे हैं, दोस्त हैं, आपकी बातों को खुद में जीने का प्रयास करते हैं. यह जानकार बेहद अफ़सोस हुआ कि आपने एक लाख रुपए के लिए अपनी विचारधारा, अपनी बातों, अपने संघर्षों से किनारा करने में एक मिनट का भी समय नहीं लगाया. उनके समक्ष गिर गए जिनके सामने सीना ताने खड़े होने का एहसास कराते थे. राजभवन में आपने कुछ भी कहा हो लेकिन पुरूस्कार लेने के लिए जब आपने हाथ बढ़ाया था तभी आपने कल्याण सिंह को स्वीकार कर लिया था.

हम नहीं चाहते की आगे आप जैसा कोई संघर्षशील बुजुर्ग अपने सारे किये धरे पर यूं मिट्टी लीप दे इसलिए आपके बैंक अकाउंट में उतना अमाउंट भेज रहे हैं जितना की आपने कल्याण सिंह के हाथों से लिया है. ताकि आपको एहसास हो जाए की कल्याणों और तोगड़ियों से लड़ने वाले लोग भी एक लाख दे सकते हैं. मैं अपने दोस्तों से अपील करूंगा की वे कमेन्ट में उस धनराशी का उल्लेख करें जितना वे ओम थानवी जी को देना चाहते हैं. रुपयों का कलेक्शन होते ही ओम जी को पहुंचा दिया जाएगा. यदि फेसबुक से इतना पैसा नहीं मिल सका तो मैं व्यक्तिगत रूप से इसे जुटाऊंगा. लेकिन उम्मीद है यहाँ से मायूसी नहीं मिलेगी. न्यूनतम -सौ रुपए. अधिकतम- दस हजार रुपए. मैं दस हजार रुपए की पहली मदद करने की घोषणा करता हूँ..

सर हम आपके दुश्मन नहीं हैं,इसलिए पैसा जुटा रहे हैं ताकि एक दंगाई के हाथों से एक लाख रुपए लिए जाने को न्यायोचित ठहराने को आप अपनी गलती माने. हम ऐसी किसी परम्परा के विरोधी हैं. यह वैचारिक अस्मिता की लड़ाई है जिसमें आप मात्र एक व्यक्ति नहीं बल्कि विचार हैं. और हम सब मात्र पैसों के लिए आपका पतन होते नहीं देख सकते/

निवेदनकर्ता-
-ओम थानवी जी के विचारों के लिए उनका सम्मान करने वाले हम सब लोग.

पत्रकार और सोशल एक्टिविस्ट मोहम्मद अनस के फेसबुक वॉल से.


मूल पोस्ट :

कल्याण के हाथों पुरस्कार लेने का विरोध करने वालों को ओम थानवी ने दुश्मन करार दिया

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Om जी के पास के.के. बिड़ला पुरस्‍कार देने वाले को चुनने की सुविधा नहीं थी!

Abhishek Srivastava : जिस तरह Om जी के पास के.के. बिड़ला पुरस्‍कार देने वाले को चुनने की सुविधा नहीं थी, उसी तरह Uday जी को मुख्‍य अतिथि चुनने की सुविधा नहीं थी या काशीनाथ सिंह को भारत भारती लेते वक्‍त उत्‍तर प्रदेश की मनपसंद सरकार चुनने की सुविधा नहीं थी। जिस तरह ओमजी ने पुरस्‍कार कल्‍याण सिंह के हाथों नहीं बल्कि राज्‍यपाल के हाथों से लिया है, ठीक वैसे ही नरेश सक्‍सेना ने रमण सिंह से नहीं बल्कि एक जनप्रतिनिधि से हाथ मिलाया था और नामवरजी ने नरेंद्र मोदी के साथ नहीं बल्कि लोकतंत्र में चुने गए एक प्रधानमंत्री के साथ ज्ञानपीठ का मंच साझा किया था।

इसी तर्ज पर सुषमा स्‍वराज ने विदेश मंत्री के बतौर नहीं बल्कि पारिवारिक मित्र के रूप में ललित मोदी की मानवीय मदद की है। मोदीजी प्रधानमंत्री की हैसियत से नहीं बल्कि एक मित्र की हैसियत से अडानीजी को विदेश यात्रा पर ले गए थे। मुकेश भाई ने प्रधानमंत्री के नहीं, अपने दोस्‍त की पीठ पर हाथ रखा था। राजनाथ सिंह गृह मंत्री के बतौर नहीं, एक बाप की हैसियत से अपने बेटे को ट्रांसफर-पोस्टिंग में पैसा खाने का मौका दे रहे थे। ठीक ऐसे ही नीतिश कुमार और लालू यादव का गठजोड़ राजनीतिक अवसरवाद नहीं, पुराने दोस्‍तों का पुनर्मिलन है। बिलकुल इसी तर्ज पर बिहार उच्‍च न्‍यायालय के दो जजों ने सवर्ण होने के नाते नहीं, साक्ष्‍यों के अभाव में बिहार के पांच दलित नरसंहारों के दोषियों को छोड़ दिया था।

कोई शक? अगर आपके पेट में बल पड़ रिया है, तो आप इन सब लोगों के दुश्‍मन हैं। मस्‍त रहिए। साहित्‍य अकादमी से पुरस्‍कार लीजिए, कमरे में सजाइए, अकादमी पुरस्‍कार पाने वाले प्रो. कलबुर्गी की हत्‍या का साथ में विरोध भी करते रहिए। इस देश में conflict of interest एक लुप्‍तप्राय पक्षी का नाम है। यह पक्षी कहीं ग़लती से मिल भी जाए, तो तत्‍काल भून कर निगल जाइए और किसी राजभवन में जाकर संविधान के नाम पर डकार मार आइए। फिर मुअनजोदड़ो के इतिहास में आपका नाम भी दर्ज होना तय है।

पत्रकार अभिषेक श्रीवास्तव के फेसबुक वॉल से.


उपरोक् स्टेटस पर आए कुछ कमेंट्स इस प्रकार हैं…

Satya Narayan थानवी जी की रीढ की हड्डी तो सांप के जैसी लचीली निकली। फासीवाद फासीवाद चिल्‍लाते चिल्‍लाते कल्‍याण सिंह शरणागत हो गये। थानवी जी तो बड़े बेशर्म निकले। इतनी तेजी से ब्‍लॉक तो गाली गलौच करने वाले संघियों को भी नहीं किया जाता जितने तेजी से वो मुझे कर गये।

Om Thanvi तो नामवर सिंह, नरेश सक्सेना, उदय प्रकाश, काशीनाथ सिंह, नरेंद्र मोदी, मुकेश अम्बानी, गौतम अडानी सब इस आधार पर एक-से हो गए कि कौन कब कहाँ किसके साथ जा बैठा! वाह, क्या तर्कशास्त्र है!

Akhilesh Pratap Singh ना….बिल्कुल ना……नरेंद्र मोदी, अडानी, अंबानी की तरह तो होने का सवाल ही नहीं बनता….उनसे क्या शिकायत हो सकती है ? सवाल तो उनसे है जो सवाल करने वालों की पांत से उचककर गमलों में सज जाते हैं.. वाजिब सवाल है अभिषेक भाई… पर जवाब में सवाल ही मिलेगा….मने आप ही जस्टिफाई कीजिए कि आपका सवाल जायज है……

Mohammad Ehtasham Om Ji itne senior hain aur record itna achcha k is 1 incident ko andaze ki ghalti hi maan sakte hain ….. itna kade shabdon mein virodh k bajaye sirf yeh kahna kafi ho sakta tha k “Om Ji yeh ghalat hai”

Abhishek Srivastava तर्क तो आपका ही दिया हुआ है Om Thanvi, मैंने तो बस उसका सहज अनुप्रयोग किया है। तर्कशास्‍त्रीय शब्‍दावली में आपके तर्क को अर्धकुक्‍कुट न्‍याय की संज्ञा दी जाती है, जहां आधी मुर्गी खाने के बाद आधी को अंडा देने के लिए छोड़ दिया जाता है।

आशीष सागर सब अपनी सुविधा के अनुसार ही तो सम्मान,मंच और प्रतिमान तय कर रहे है ….पात्र तो !!!

Anil Pushker ॐ जी जिन्दगी भर जन सत्ता का खाते रहे Abhishek Srivastava ji. अब राज सत्ता की जूठन के एक कौर का अंश मात्र भी चाटने को मिले तो खुशी से खा लेंगे. तर्क वही रहेगा. जनसेवक का जूठा खाया है तो क्या बुरा किया? जनसत्ता के ओहदे पर जनसेवक होने का कुछ तो मोल मिले व्ही पुरस्कार है मेरा. जनसेवक ही तो रहा मैं जिन्दगी भर…. हाँ इतनी औकात नहीं रही – जन सत्ता के सेवक की, कि राज भोग मिल जाय. ये तो अपनी अपनी किस्मत है. बिडला ने बर्षों से लेखक बिरादरी को सांड बनकर शियारों को अपना पिंड (एक लाख) हिलाता हुआ लुभाए रहा. और खुद खरबों की दौलत का मालिक बना गया. कोई शियार कुछ नहीं बोला. इन शियारों से क्या उम्मीद करना और क्यूँ उम्मीद करना? इनकी काहे की जवाबदेही. दरबार में नगरवधू की भी एक हैसियत हुआ करती थी. मगर आप देखिये दरबारी लेखक तो दरबारी संस्कृति में हमेशा से बादशाह की खुशी के लिए लेखकीय वेश्यावृति करता रहा है. लिखने की मजबूरी थी या पेट की पता नहीं. पर मजबूर रहा है. अब उन दरबारी लेखकों की अगली पुश्तें भी तो लोकतंत्र के राजाओं को खुश करने के लिए कुछ न कुछ तो करेंगी……

Shashank Dwivedi कुछ समय पहले जब कथित साहित्यकार उदय प्रकाश ने सांसद आदित्यनाथ के हाथ से सम्मान लिया था तो सेकुलरिज्म पर करारी चोट हुई थी लेकिन अब ओम थानवी ने जब यह सम्मान कल्याण सिंह से लिया तो वो राज्यपाल के हांथो हो गया ..क्या मजेदार और सुविधाजनक तर्क है ..लगे रहिये कामरेड ,लगे रहिये और ऐसे ही मलाई खाते रहिये ..इसी मलाई ने ही तो तुम लोगों का पतन करा दिया और आज कोई नामलेवा नहीं रह गया पूरे देश में वामपंथियो का…

Umesh Chaturvedi अभिषेक…आपसे ऐसी ही उम्मीद थी….ऐसा आप ही लिख सकते हैं और अवसरवाद की कलई ऐसे शब्दों में आप ही खोल सकते हैं…

Abhishek Srivastava बटोही जी, कंल्‍याण सिंह से थानवी जी का कोई बौद्धिक आदान-प्रदान नहीं हुआ है। पुरस्‍कार मिला है। इसमें बौद्धिक अछूतवाद कहां से आ गया।

Om Thanvi मैंने तब भी उदयजी का पुरजोर समर्थन किया था Shashank Dwivedi, मंगलेश डबराल (ईश्वर से प्रार्थना है वे जल्द स्वस्थ हों) जब संघ से जुड़े एक मंच पर गए और उनकी आलोचना हुई तब भी मैंने इस आवाजाही का समर्थन किया था। मेरा स्टैंड शुरू से साफ है। कहीं और जाकर अगर अपनी बात कही तो अपनी बात का दायरा बढ़ाया ही, अपने लोगों के बीच तो अपनी बात रोज कहते हैं।

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कल्याण सिंह के हाथों पुरस्कार लेने पर ओम थानवी सोशल मीडिया पर घिरे

Neelabh Ashk : मत छेड़ फ़साना कि ये बात दूर तलक जायेगी. ओम तो गुनहगार है ही, हिन्दी के ढेरों लोग किसी न किसी मौक़े पर और किसी न किसी मात्रा में गुनहगार हैं. इस हमाम में बहुत-से नंगे हैं. पुरस्कार पाने वाले की पात्रता के साथ पुरस्कार देने वाली की पात्रता भी देखी जानी चाहिए। ऐसी मेरी मान्यता है. मैंने साहित्य अकादेमी का पुरस्कार लौटा दिया था. मेरी मार्क्स की पढ़ाई ने मुझे पहला सबक़ यह दिया था कि कर्म विचार से प्रेरित होते हैं. 55 साल बाद तुम चाहते हो मैं इस सीख को झुठला दूं. ओम की कथनी और करनी में इतना फ़र्क़ इसलिए है कि सभ्यता के सफ़र में इन्सान ने पर्दे जैसी चीज़ ईजाद की है. ईशोपनिषद में लिखा है कि सत्य का मुख सोने के ढक्कन के नीचे छुपा है. तुम सत्य को उघाड़ने की बजाय उस पर एक और सोने का ढक्कन रख रहे हो. ये ओम के विचार ही हैं जो उसे पुरस्कार>बिड़ला>राज्यपाल>कल्याण सिंह की तरफ़ ले गये. मैं बहुत पहले से यह जानता था. मुझे कोई अचम्भा नहीं हुआ. मैं ओम की कशकोल में छदाम भी न दूं. और अगर यह मज़ाक़ है तो उम्दा है, पर हिन्दी के पद-प्रतिष्ठा-पुरस्कार-सम्मान-लोभी जगत पर इसका कोई असर नहीं होगा.

Dilip C Mandal : एक मित्र पूछ रहे हैं कि क्या मैं योगी आदित्यनाथ या कल्याण सिंह के हाथों कोई पुरस्कार लेता? चूँकि ऐसा कोई अवसर मेरे सामने नहीं आया है, इसलिए कल्पना से ही उत्तर देना होगा। शायद नहीं। भारत सरकार के दो नेशनल अवार्ड मैंने लिए हैं। एक उप राष्ट्रपति हामिद अंसारी के हाथो और दूसरा तत्कालीन केंद्रीय सूचना और प्रसारण राज्य मंत्री जगतरक्षकन साहेब से। एक प्रेस कौंसिल का और दूसरा सूचना और प्रसारण मंत्रालय का। पुरस्कार पाने वाले की पात्रता के साथ पुरस्कार देने वाली की पात्रता भी देखी जानी चाहिए। ऐसी मेरी मान्यता है। मुझे नहीं लगता कि योगी आदित्यनाथ या कल्याण सिंह मुझे पुरस्कार देने के लिए सही पात्र हैं। मुझे नहीं लगता है कि कभी मौक़ा मिला भी तो मैं इनके हाथों पुरस्कार लेना चाहूँगा। अभी तक तो यही सोच है मेरी। मैं अपने लिए कामना करता हूँ कि मुझमें इतना नैतिक बल बचा रहे कि इन्हें मना कर सकूँ। आमीन!

Mohammad Anas : जनसत्ता के पूर्व संपादक श्री ओम थानवी जी द्वारा भाजपा के नेता, उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और बाबरी मस्जिद विध्वंस में शामिल कल्याण सिंह के हाथों अपनी किताब के लिए पुरूस्कार लिया जाना वाकई आलोचना की श्रेणी में आता है। श्री थानवी जी को यह पुरूस्कार एक प्राइवेट संस्था द्वारा दिया गया है, यदि वह न लेने का नैतिक दबाव बनाते तो संस्था कल्याण सिंह के अलावा किसी और से भी उनको यह पुरूस्कार दे सकती थी या फिर बिमारी का बहाना बना कर राजभवन न जाते। करने को वे बहुत कुछ कर सकते थे। ऐसा मेरा मानना है। पर वे ऐसा कुछ करने का साहस नहीं जुटा सके। अफसोस। राज्यपाल बन जाने भर से कल्याण सिंह के पिछले सारे कारनामें धुल गए? राज्यपाल कौन लोग बनाए गए हैं, किसी से छिपा नहीं है। भाजपा के इस फासीवाद को एक गहरा तमाचा होता यदि ओम थानवी कल्याण के हाथों पुरूस्कार लेने से मना कर देते। क्या आप तालिबान के हाथों, अफगानिस्तान के किसी प्राइवेट संस्था का पुरूस्कार लेना पसंद करेंगे? और यह कहते हुए कि मैंने तालिबान को धार्मिक हिंसा पर लेक्चर दिया। लेकिन इसे आधार बना कर आप ऐसे लोगों से सम्मानित होने को न्यायोचित कैसे कह सकते हैं? दिन रात सांप्रदायिकता पर लेक्चर देने वाले लोग जब दंगाईयों के हाथों से सम्मानित होने को बड़े गर्व से प्रस्तुत कर सकते हैं तो फिर हम ऐसे लोगों के पीछे क्यों खड़े हो? ओम थानवी का सम्मान मेरी नज़र में हमेशा से रहा है। यदि वे कल्याण के हाथ से एक लाख रूपए का इनाम लेने से मना कर देते तो मेरी नज़र और उन तमाम लोगों की नज़र में उनकी इज्जत दो लाख गुना बढ़ जाती।

वरिष्ठ पत्रकार नीलाभ अश्क, दिलीप मंडल और मोहम्मद अनस के फेसबुक वॉल से.


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Om जी के पास के.के. बिड़ला पुरस्‍कार देने वाले को चुनने की सुविधा नहीं थी!

 

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मुकेश ने एफबी पर हुई कुछ चैट सार्वजनिक कर दोष ऋचा पर भी मढ़ा, बाद में ‘सॉरी’ बोल दिया

Mukesh Kumar Sinha : ऋचा से मेरी पहले कभी बात नहीं हुई. शुरुआत उसने की कविता शेयर करने से लेकर और फिर उसने बातों को मोड़ा. मैं कन्फर्म हो गया एक फेक प्रोफाइल है इसलिए अंत उसके अनुसार हुआ.

(चैट पढ़ने के लिए उपरोक्त पिक्चर पर क्लिक कर दें.)

उपरोक्त स्टेटस के बाद मुकेश कुमार सिन्हा का ताजा स्टेटस ये है, जिसमें उन्हें सॉरी लिखकर अपनी गलती के लिए माफी मांगी है…

उपरोक्त दोनों स्टेटस पर जनता की मिलीजुली प्रतिक्रिया कुछ यूं है…

Ila Varma Aisa kaam Kara hi kyu

सोनाली मिश्रा शोधार्थी-इग्नू वाकई ऐसा काम किया ही क्यों?

Anita Singh किस बात का sorry

Robin Singh sambhav hai ,tag ,kar ke kaho jiske tum apraadhi ho … ye to aap kee kavita ka ans jaisa lag rahaa hai …

Rajeev Bhutani गलती तो गम्भीर हो गई —

Kumar Gulshan Anant Sorry की जरूरत ही क्या है सर जब फेक प्रोफाईल था…

Anjana Dutta sry मैं आपको unfrnd कर रही हूँ

Saurabh Jha dost sharminda hone ki jarurat nhi hai.. Shudhar sakte hai to shudhar jaiye bus…frown emoticon

Shahnawaz Khan कोई गलतफहमी हुई है

Lakshmi Sharma फेक आई डी है तो सॉरी क्यों । पहले सच तो सामने आए

Saurabh Jha n galti akele inki nhi hai.. aap inka post pade,,, Agar bandi frank ho rhi hai to fir walmiki v fisle the ye to Mukesh g hai…grin emoticon

Aparna Anekvarna I appreciate this step.. take care.

Abha Khare Aap hamare mitra the aur rahenge hamesha ….

Veeru Sonker मुकेश भाई आपको शर्म आनी चाहिए ! बाकि और ज्यादा कुछ कहने का मन नहीं है id के असली नकली होने से आप का गुनाह कम नहीं होता !…See More

Lakshmi Sharma लेकिन इस प्रकरण में रश्मि की चेट भी ध्यान देने की बात है। उसके स्क्रीन शॉट भी देखे मैंने। मैं यह नहीं कहती कि उस से मुकेश जी सुर्खरू हो जाते हैं लेकिन उससे ये स्पष्ट हो रहा है कि चेट में हम लोगों को भी सामने वाले को किसी गलत या खुश फहमी का मौका नहीं देना चाहिए

आकाँक्षा सेठ आपको दादा कहती हूँ…बुरा लगा बहुत

Vani Geet क्या हुआ !!??

सुनीता शानू अरे क्या हुआ भाई किस बात की सॉरी बोल रहे हो?

सुभाष शर्मा कोई गल नहीं। पश्चाताप कर लिया बहुत है। मेरे मन में आपके लिए पहले जैसा ही सम्मान है।

Neeta Mehrotra आप मित्र और छोटे भाई हैं मेरे …… और सदा रहेंगें।

Priyanka Om sorry kyu keh rahe aap?

सुशीला शिवराण श्योराण अगर fake id है तो kiss की उम्मीद किससे थी मुकेश जी?

Nanda Pandey तुम हमारे अपने हो और रहोगे हमेशा

Anjani Kumar कोई बात नहीं…!

Samar Anarya एक स्त्री के बार बार मना करने पर भी ‘किस’ माँगने की बेशर्मी के बाद ‘सॉरी’ बोलते हुए घटना का जिक्र भी नहीं? झूठा सॉरी है फिर यह।

सुशीला शिवराण श्योराण Abha Khare कल कोई तुमसे जबरन kiss माँगेगा और हम उसे मित्र बनाए रखेंगे? तुम्हारे निर्णय से हैरान हूँ। flirting का साथ दे रही हैं आप?

Puneeta Chanana What happened? Don’t understand.

सुशीला शिवराण श्योराण Neeta Mehrotra जी छोटे भाई को kiss प्रकरण पर कुछ नहीं कहेंगी?
धन्य हैं आप दिदिया!
ऐसे ही छोटे भाई तैयार कीजिए ताकि कल बहुत सी दामिनी नंगी सड़क पर पड़ी मिलें हो सकता है उनमें से कोई आपकी बहन-बेटी भी निकल जाए!
कैसी फ़सल उगा रही हैं आप?
क्या काटेंगी?

Sandeep Sharma First identify truth …. meantime preference to sorry .

Samar Anarya और आपकी कमेंट से थोड़ा हतप्रभ हूँ Lakshmi.. स्त्री पुरुष संबंधों में चुहल कह लें, फ़्लर्टिंग कह लें, वह भी होता ही है। कितनी दोस्तों को जानेमन कहके पब्लिक पोस्ट लगाता रहता हूँ मैं, आपने तो देखें हैं सारे! लेख भी। पर बिना सहमति के नहीं। रश्मि ऋचा सिंह की बात में वह चुहल दिख रही है पर फिर ‘किस’ माँगने का सीधा नकार भी। और इन जनाब ने ठीक पहले का हिस्सा ग़ायब कर दिया है जहाँ वह पहले से ब्लाक की धमकी दे चुकी हैं। सो पहले कुछ रहा भी हो तो भी न का मतलब न ही होता है न? पर ये साहब तो अड़े हुए हैं।

सीमा संगसार अब तो मैं आपको सौरी बोल रही हूँ—-

Lakshmi Sharma तुम्हारा हतप्रभ होना स्वाभाविक है Samar लेकिन मेरी बात को तुम दूसरे नज़रिये से समझो जहां लोग लिफ्ट लेने को आकुल व्याकुल बैठे रहते हैं। मैं सिर्फ ये कह रही हूँ कि मर्दों के (इसे भी सामान्यीकृत कर के पढ़ा जाए) इस समाज में बिना ठीक से परिचित हुए बात करने का कुपरिणाम से ही सचेत करना चाहती हूँ मैं। तुम जब किस या जानेमन कहते हो तो सरे आम साफ मन से उस को कहते हो जिसका विश्वास तुम्हें मिल चुका है। बिना जाने तो तुम नहीं कहोगे इतना मैं तुम्हे जानती हूँ। और सबसे ऊपर मैंने लिखा न कि मेरे इस पक्ष से मुकेश सुर्खरू नहीं हो जाते। उनकी गलती अक्षम्य है

Samar Anarya बिलकुल ठीक बात है Lakshmi, पर आकुल बैठे लोगों को भी लड़की के न बोलने पर चला ही जाना चाहिये! ये तो मान ही नहीं रहे हैं।

Aanchal Singh Dono kasurvar hai …aur maafi khud se mangiye ki bhavisya mai dobara aisi galti na ho …….

Lakshmi Sharma हाँ यहाँ मैं तुमसे सहमत हूँ Samar । ये नहीं मान रहे तो ये एक्सपोज हों बहिस्कृत हों और ऋचा इनके विरुद्ध शिकायत दर्ज़ कराए। हम साथ हैं

सोनाली मिश्रा शोधार्थी-इग्नू अगर मैं कहूं तो थोड़ी बहुत चुहल तो चलती है पर ये? सार्वजनिक जीवन में सावधान होकर चलने की आवश्यकता होती है.

Neha Agarwal Soory mai bhi aapko unfriend kar rahi hu.

Samar Anarya थोड़ी बहुत नहीं, जितनी हो जाये कुछ बुरा नहीं सोनाली अगर सहमति से हो। पर इनके स्क्रीनशॉट्स से साफ है कि मना करने पर भी अड़े हुए हैं, मुझे वह सबसे ज़्यादा खटक रहा है।

Lakshmi Sharma जब तक ये प्रकरण चल रहा है अनफ्रेंड कर के किसका हित होगा ये सोच के अन फ्रेंड करें

सोनाली मिश्रा शोधार्थी-इग्नू जी, और फिर इस तरह से सार्वजनिक करना, अगर दो लोगों के बीच की बात थी, तो उसे आपस में सुलझा लेना चाहिए, ऐसे आरोपों के कीचड से खुद का दामन ही दागदार होगा

Ruchi Bhalla दोनों ही मेरी मित्र सूची में हैं …. रश्मि कुछ दिन हुए और मुकेश एक साल से भी ज्यादा । दो – एक बार हमिंग बर्ड के सिलसिले में उनसे फोन पर बात हुई है। जब आज ये पोस्ट देखी .. तो मैं खुद को रोक नहीं सकी फोन करने से … सिर्फ एक सवाल किया मैंने … ये क्या है मुकेश और
उनका जवाब था … मेरी गलती थी।
मैंने कहा …. आप जब दिल से मान रहे हैं और कह रहे हैं …
तो कह दीजिए वाल पर सारी ….
उन्होंने कहा है दोस्तों …. खुद से …
दिल से….

Samar Anarya @Ruchi Bhalla- पर माफी तो उससे माँगी जाती है जिसका दिल दुखाया हो, जिसे नुक़सान पहुँचाया हो।

Samar Anarya और ये जरा भी ईमानदार हैं तो उन्हें किस के ठीक पहले वाली चैट सार्वजनिक करनी चाहिये क्योंकि साफ है कि रश्मि ने उसी पर ब्लाक की धमकी दे दी थी Lakshmi, सोनाली। पर ये अड़े रहे। हाँ अमित्र करने का कोई फ़ायदा नहीं पर जो चाहे, ख़ासतौर पर स्त्रियाँ उन्हें पूरा हक है।

सुशीला शिवराण श्योराण सोनाली मिश्रा शोधार्थी-इग्नू जी पुरुष के अमर्यादित और कामुक व्यवहार से स्त्री का दामन दाग़दार कैसे हुआ भला? हैरान होती हूँ जब उच्च शिक्षितों को ऐसे अविवेकी, तर्कहीन विचार प्रकट करते हुए देखती हूँ ! गलती पुरुष करे शर्म स्त्री को आए ! शिक्षा और ज्ञान प्राप्त करके भी हम दोषी को नहीं भुक्तभोगी को दोष देते हैं !!!!! If education can’t teach us to think logically and to be righteous…..then what is the difference between the educated people and illiterates ?

सुशीला शिवराण श्योराण Ruchi Bhalla जी शुक्रिया आपने कुछ प्रकाश तो डाला । अपने मित्र से कहिए जिसके कसूरवार हैं उससे माफ़ी माँगें।

सोनाली मिश्रा शोधार्थी-इग्नू मैंने दोनों के बारे ये कहा था, मेरा अभिप्राय कतई भी एकतरफा नहीं था, हां हो सकता है बात sसही से नहीं कह सकी सुशीला जी

Anju Choudhary फेक id के लिए इतना बवाल….कोई ये क्यों नहीं समझ रहा कि ये मुकेश को बदनाम करने के लिए रची गई सोची समझी साजिश भी हो सकती है |कुछ दिन पहले मैंने भी एक पोस्ट डाली थी कि यहाँ फेसबुक पर बहुत से पुरुष औरतों के नाम रख कर घूम रहे हैं और अपने ही दोस्त (पुरुष ही) उनकी हर पोस्ट पर वाह..वाह करते नज़र आते हैं ……..इस बेकार के बवाल का कोई मतलब ही नहीं है और सॉरी कहना तो बनता ही नहीं है |

Mukesh Sharma मुकेश जी बहुत विस्फोटक स्वरूप हो चुका है यह प्रकरण । कुछ समझ नहीं आ रहा है ।

Niharika Neelkamal Arora gasp emoticon gasp emoticon gasp emoticon gasp emoticon gasp emoticon gasp emoticon

Archana Kumari चाहे कुछ भी हुआ हो सतर्क और सचेत आपको ही रहना था अपनी छवि,गरिमा और सम्मान के लिए। कहीं न कहीं चूक तो आपसे ही हुई। आग को हवा नहीं,पानी देते हैं कि घर जलने से बच जाए। अब इन सबका क्या फायदा,जो नुकसान होना था हो चुका। कोई बीमा पाॅलिसी नहीं है।

Nanda Pandey कैसे पड़ गए पचड़े में तुम ……

Alpika Jaiswal कुछ समझ ही नही आरहा हमे तो

डॉ. अपर्णा त्रिपाठी वो id fake नहीं है. जो भी है शर्मनाक है. दोनों ही तरफ़ से. कोई एक नहीं दोनों ही बराबर के अपराधी.

निर्गुण मनीषा हाँ दोनों की गलती है !

Bhuwan Gupta किस चक्कर में हो बाबूजी ???

Anjana Dutta नाम आपने ऋचा लिखा इनबॉक्स में रशिम कह रहे है चक्कर क्या है मुकेश बाबू

डॉ. अपर्णा त्रिपाठी रश्मि ऋचा की पोस्ट देखिये. क्या आप kiss मांगते हुए शोभा दे रहे हैं.

Parveen Salar Be careful

Shachii Kacker अगर पता चल गया था कि फेक है तो आगे बात नही करनी थी….

Nanda Pandey ओह्ह्ह्ह

Ranjana Srivastava उसने बात को मोड़ा तो आप मुड़ क्यूँ गए जनाब…गलती तो आपसे भी हुई है।

सुदेश आर्या Mukesh Kumar Sinha जी ! ये क्या है… महिलाओं को बदनाम करने से पहले मुझे इन बातों का जवाब चाहिए …

Mittal Shashi Mukesh Kumar Sinha ji acha nhi laga ye sab dekh pad kar chahe wo koi b ho pahle bat ki fir sareaam kar di

डॉ. अपर्णा त्रिपाठी मेरी छोटी बहन है ! इसका कमेन्ट शो हुआ तो तब रश्मि की वॉल देखी …..मैं तो मुकेश जी को बहुत अच्छा मित्र मानती हूं इनकी पुस्तक की समीक्षा भी लिख रही हूं ….लेकिन आज ये महान लेखक मुझे जवाब देंगे …वरना …

डॉ. अपर्णा त्रिपाठी सुदेश दी आज सचमुच बहुत आहत हुई. आज कहीं ना कहीं साहित्य भी शर्मसार हुआ है.

Shachii Kacker सुदेश आर्या जी ,लड़की कोई भी हो,गलत किसी के साथ हो आवाज तो सब को उठानी होगी

सुदेश आर्या बिल्कुल ! मैं पोस्ट डालूंगी ,,,,मगर चाहती हूं पहले ये जवाब दें कि आखिर ये है क्या ?? आज किसी और के साथ तो कल हमारे साथ होगा …औरत औरत की दुश्मन नहीं दोस्त होती है …यह मर्दों को बता देना है …

विष्णुप्रिया चौधरी शर्मनाक।

निधि जैन इतनी बात बढ़ी कैसे

सुदेश जी ताली दोनों हाथो से बजती है

सुदेश आर्या निधि जैन ! जो है सब सामने है !

डॉ. अपर्णा त्रिपाठी निधि जैन जी वही मैं कह रही. दोनो ही अपराधी हैं, दोनों ही सफ़ाई दे रहे.

Anjani Kumar ऐसे सरेआम / गलत बात / अब क्या अंतर आप में और रोड छाप फेसबुक हैंडलर में / या कहीं मार्केटिंग का कोई नया फंडा तो नहीं/”कोई आप पर ध्यान नहीं देता/ध्यान खीचना पड़ता है” शोभा डे

Archana Kumari सहमत हूँ मैं। गलती दोनों ने की है। देखिएगा कोई बस लड़की होने का फायदा न उठा ले। गलती दोनों ने की है तो सजा भी दोनों को मिलनी चाहिए

Rinku Chatterjee हैरान हूँ।

सोना श्री आखिर यह माजरा क्या हैं Mukesh Kumar Sinha सर जी ?

विजय कुमार सिंघल अगर अकाउंट फेक भी है तो भी ऐसी बातें नहीं करनी चाहिए.

Rajeev Bhutani फंसा—-

विजय कुमार सिंघल आप सार्वजनिक रूप से क्षमा मांग लीजिये.

Rajeev Bhutani समय रहते यदि आप सफाई पेश नही कर पाये तो अगला स्कीन शाट् के जरिये आपको ब्लैक मेल करेगा —बहुत सतर्क रहने की जरूरत है —फेक id की तुरंत complaint करे–

सुदेश आर्या फेक अकाउंट तो प्रोफाइल देखकर ही पता चल जाता है ! न भी पता चले तो ऐसी बात करने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता ..इसका मतलब आप भी आनंद ले रहे हैं …

Rajeev Bhutani नही सुदेश जी ये बात नही मैने तो वजह बताई है –गलत तो 100 % वो है ही —

उद्दण्ड मार्तण्ड मणि बिक गयी “हमिंग बर्ड”… इसलिए “सर” कहलाना नहीं पसन्द करते हैं… देखा सुदेश दी…

Prashant Aryapriyam हे भगवान मौत दे दो। दोनों दोषी हैं।दोनों को सजा मिले।

रवि कुमार कुछ तो लोग कहेंगे लोगो का काम है कहना ।

Suresh Agarwal सावधानी बरते..ऐसी बाते सार्वजानिक करके क्या हासील

Rajeev Bhutani Mukesh Kumar Sinha माफी मांगो

सुदेश आर्या अगर आप बराबर के हकदार हैं और दोनों के मध्य कुछ था भी तो आपको पोस्ट डालनी ही नहीं चाहिए थी …..हमें उससे कोई लेना देना नहीं था….लेकिन ऐसा करके आपने बहुत ही गलत किया ….जानते नहीं थे कि यहां आपकी बहुत सारी अम्मा बैठी हैं ? क्यों अपनी व दूसरों की छिछालेदर करनी व करानी थी ? चलो इससे बहुत बहनों को सीख तो मिलेगी ….इसी कारण अन्य पुरूष मित्र भी शक के दायरे में आते हैं !!

सुभाष शर्मा विनम्रता से निवेदन है सुदेश जी कि महिलाओं की बकील न बनें क्यों कि मामला इनबॉक्स कन्वर्सेशन का है इसलिए पुरुष महिला के चश्मे से न देखकर उचित अनुचित आचरण तक ही रखें तो ज्यादा उचित होगा।

उद्दण्ड मार्तण्ड मणि “सिन्हा सर” ने सोचा था कि मित्र उनका साथ देंगें लेकिन अम्मियों ने उनकी ही क्लास लगा दी.

सुदेश आर्या मैं वकालत नहीं कर रही सुभाष शर्मा जी! एक बार मेरा कमेन्ट फिर से पढ़िये …मुझे ज्यादा दुख इस कारण हो रहा है कि मैं ऋचा को जानती भी नहीं और मुकेश जी मेरे अच्छे मित्र रहे हैं …शिकायत वहीं होती है जहां अपनापन होता है …औऱ मैं गलत लोगों की वकालत नहीं करती ….जो दिख रहा है क्या उसे आप नहीं देख पा रहे तो अफसोस है …frown emoticon

उद्दण्ड मार्तण्ड मणि अगर “सिन्हा सर” सफाई नहीं देगें तो उन्हें ब्लॉक कर दिया जाए। वरना सफाई दे…

सुदेश आर्या सफाई दें न दें मैं तो ब्लॉक कर ही रही हूं …साथ में उनके चाहने वालों को भी ..

उद्दण्ड मार्तण्ड मणि और सबसे अच्छी बात है शुरू से लेकर आखिर तक की पूरी चैट डाल दे। फैसला खुद ब खुद हो जायगा. पहले पूरा मामला तो देखा जाय मैं तब ब्लॉक करुँगी. दोनों ने जो स्क्रीन शॉट दिये वो अपनी अपनी गलती छुपाई और दुसरे की गलत बातो को सर्वजनिक किया.

Rajesh Shrivastava मित्रो एक तरफ़ा फैसला मत कीजिये मुकेश जी एक सुलझे हुए इंसान हैं पहले उनकी बात सुनिए फिर किसी के बारे में निर्धारण कीजिये

Samar Anarya स्त्री पुरुष संबंधों में चुहल कह लें, फ़्लर्टिंग कह लें, वह भी होता ही है। मैं खुद चैट क्या कितनी दोस्तों को जानेमन कहके पब्लिक पोस्ट लगाता रहता हूँ पर बिना सहमति के नहीं। रश्मि ऋचा सिंह की बात में वह चुहल दिख रही है पर फिर ‘किस’ माँगने का सीधा नकार भी। और इन जनाब ने ठीक पहले का हिस्सा ग़ायब कर दिया है जहाँ वह पहले से ब्लाक की धमकी दे चुकी हैं। सो पहले कुछ रहा भी हो तो भी न का मतलब न ही होता है न? पर ये साहब तो अड़े हुए हैं।

Robin Singh try kar rahe honge .. kabhi kabhi galti se galat number daayal ho jaata hai .. maanga hee to tha .. bchara uski stithi samjo mili bhee nahi aur badnaam ho gaye.


पूरे प्रकरण को जानने के लिए इसे पढ़ें:

‘हमिंग बर्ड’ वाले मुकेश कुमार सिन्हा की कविता क्या पसन्द कर ली, वह ‘किस’ मांगने लगा!

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‘हमिंग बर्ड’ वाले मुकेश कुमार सिन्हा की कविता क्या पसन्द कर ली, वह ‘किस’ मांगने लगा!

रश्मि ऋचा सिंह : ये है साहित्य का असली चेहरा. यही तो करने आते हैं आप यहाँ? दोस्ती करो तो हद से आगे निकल जाओगे आप… ये आपके मुकेश कुमार सिन्हा हैं ‘हमिंग बर्ड’ वाले. जरा सा कविता क्या पसन्द कर ली. जरा सा दोस्ती क्या कर ली, ये तो अपनी पर ही उतर आये. इनको मेरा ‘किस’ चाहिए. अब यहाँ से मन भर गया. नमस्कार!

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मुकेश कुमार सिन्हा के साथ हुई मेरी चैट को एडिट कर के यहाँ पेश किया जा रहा है. ये मुझे सच्ची दोस्ती का हवाला दे कर बहकाने की पूरी कोशिश कर रहा था….. जब इसने किस की बात कही तभी मैंने इन्हें हड़का दिया! अब यहाँ ग्रुपिंग का खेल हो रहा है मेरे साथ.  मुकेश कुमार सिन्हा से कोई ये पूछे की वो ये किस क्या अपनी बहन को कर सकता है?  इस नीच ने मेरे हड़काने के बाद भी मुझे आँख मारी. जो लोग पैरवी के लिए यहाँ आ रहे है वो लोग मुकेश से ये पूछे की दोस्ती के नाम पर आप क्या किस तक पहुच जायेंगे? मुकेश कुमार सिन्हा जी का ग्रुप बहुत बड़ा है. इनकी ‘हमिंग बर्ड’ नाम की पुस्तक आ चुकी है. अभी “गूंज” और “तुहिन” नाम के दो काव्य संकलन भी आ चुके हैं. मैं इनसे नहीं जीत पाऊँगी. मुझे जो कहना था कह दिया ऐसे गंगा के सामान पवित्र लोग इनके गैंग को ही मुबारक हो.

xxx

मुकेश जी की खुद की वाल देख आइये आप सभी, जो महिलाये अभी तक चुप थीं मेरी पहल पर, अब एक एक करके सामने आ रही है ये बहुत समय से ऐसा खेल खेल रहे थे यही लगता है. मैंने इनसे जितनी भी बाते की वह सब इनको एक अच्छा कवि मान कर एक मित्र की तरह की. पर ये बिलकुल से खुल गए. आरके भैया, आप सब का साथ ही ऐसी मानसिकता वालो को साहित्य के संसार से दूर रख पायेगा. अभी तक 50 महिलाओं ने ये स्वीकार किया है की मुकेश उनके साथ भी कभी न कभी इस तरह की घटिया हरकत कर चुके हैं. मेरा विरोध करने वालो को सिर्फ ये ही कहना चाहूंगी की अगर आज मैं भी चुप रहती तो शायद आपको ज्यादा अच्छा लगता? फिर शायद अगला नंबर आप अपना ही लगाते.

फेसबुक पर एक्टिव महिला रश्मि ऋचा सिंह के फेसबुक वॉल से.


उपरोक्त स्टेटस पर आए कुछ कमेंट्स इस प्रकार हैं…

Krishna Pandey : साहित्य के नाम पर फेसबुक पर कुछ लोग ऐसे सक्रिय हैं जो अपने कुत्सित भावनाओं का नंगा नाच इनबॉक्स में चैट के माध्यम से करते हैं। वैसे आपकी बात कितनी सच है ये तो नही पता कौन सही है या कौन गलत। किन्तु आपको जिस दिन पहला अश्लील मैसेज आया था उसी दिन ब्लॉक कर देना चाहिए था, पता नही इतने दिन आपने क्यों बर्दाश्त किया? मेरा कुछ ऐसे लोगों से पाला पड़ा है जो साहित्य से जुड़े हैं / जुडी हैं और काफी नामी लोग हैं ,किन्तु उनके हरकत बहुत ही निम्न स्तर के हैं । मेरे मित्रों के मिले फीडबैक के बाद मैंने उनसे दुरी बना ली और कुछ लोगों को ब्लॉक भी कर दिया।

सुशीला शिवराण श्योराण : ऐसे मंजनू हर क्षेत्र में हैं साहित्य भी अपवाद नहीं। मैं इस शर्मनाक हरकत की भर्त्सना करती हूँ और मुकेश कुमार सिन्हा जी से पूछती हूँ यह दोस्ती कब से है, यह क्यों हुआ क्योंकि कुछ टिप्पणियाँ डिलीट की गई लग रही हैं। सन्तोषजनक जवाब न मिलने पर ये मेरी मित्र सूची से हटा दिए जाएँगे. रश्मि को अपनी तस्वीर नहीं भेजनी चाहिए थी। इससे हिम्मत बढ़ती है लोलुप मर्दों की। किन्तु माँगने पर अगर तस्वीर भेज भी दी तो इसका मतलब यह हरगिज़ नहीं कि कोई भी पुरुष किसी भी महिला पर खुद को ज़बरदस्ती थोप सकता है। मर्यादा से बाहर जा सकता है। दो कदम के बाद यदि महिला को लगे कि यह आदमी मित्रता के लायक नहीं तो पुरुष को उसकी इच्छा का, उसके निर्णय का सम्मान करना ही चाहिए। मित्रता कैसी, कहाँ तक दो इंसानों का निजी निर्णय है कोई भी एक कह दे कि बस यहीं तक तो दूसरे को शालीनता से स्वीकार करना चाहिए वह निर्णय। कोई भी इंसान ख़ुद को दूसरे पर थोप नहीं सकता…..स्त्री-पुरुष से, लिंग-भेद से ऊपर उठ कर आप क्यों नहीं देखते मित्रता को? मित्रता और लोलुपता व बेशर्मी में अंतर पहचानिए। मैं जब 19 वर्ष की थी तो मुझसे 2 साल बड़े और शरीर से दुगुने लड़के को DTC की बस में उसकी निर्लज्जता के लिए पीटकर पुलिस लॉक अप में बंद करवाया था। पिछले साल सुरेन्द्र साधक को मना किया था सख्ती से कि मेरे चैट बॉक्स में आकर फ़ालतू बकवास न करे। कहने के बावज़ूद नहीं माना था। दूसरी बार फिर घटिया बात कही तो मैंने भी screen shots दिखा कर उस की घटिया हरकत फेसबुक पर सप्रमाण पोस्ट की। ऐसे पाशविक प्रवृत्ति वाले कामुक पुरुषों को बेनकाब करना ज़रूरी है।

Kiran Dixit : कोई भी व्यक्ति जो दो चार किताबें छपवा कर साहित्यकार बनने का दावा करता है जरूरी नहीं वह चारित्रिक दृष्टि से भी सही होगा. इस इन्सान ने मित्र बनते ही अपनी पुस्तक खरीदने का मुझसे भी आग्रह किया था. लेकिन हमने इस तरीके को बिल्कुल सही नहीं माना कि आप मित्र इसलिए बने हैं कि हम आपकी पुस्तक खरीदें. खैर, जो भी हुआ बहुत ही दुःखद और निंदनीय है। इस व्यक्ति की जितनी भर्त्सना की जाये, कम होगी. ऐसे लोग मित्रता के नाम को कलंकित करते हैं. वैसे मेरा मानना है कि हर इन्सान को अपनी हद भी पहचाननी चाहिए. जिस समय ये लगे कि दूसरा इन्सान अपनी हद पार कर रहा है तुरंत ही अपने को विथड्रा कर लेना चाहिए। किसी को भी इतना आगे बढ़ने की इजाजत नहीं दी जा सकती. बहरहाल उनको तो अपनी हद पार करने का नतीजा तो पता ही चल गया •••••दिन में ही तारे नजर आने लगे होंगे. इससे ज्यादा सजा उनको और कहाँ मिल सकती थी.

Ranjana Singh : अइयो Mukesh Kumar Sinha जी,, हम तो समझते थे कवि हृदय आप केवल काँग्रेस के लिए कमजोर पड़ जाते हैं,,,, लेकिन आप तो …..साहित्य बिरादरी का नमवे माटी में मिलवा दिए…. भेरी भेरी बैड जी।

Veeru Sonker : मुकेश कुमार सिन्हा जी अब माफ़ी मांग रहे है सार्वजानिक रूप से. उनकी पोस्ट देखी मैंने अभी. माफ़ी वाली पोस्ट अभी भी मुकेश की वाल पर है उन्होंने किया तो बहुत गन्दा काम पर अब माफ़ी मांग कर गंगा नहाने की कोशिश कर रहे हैं.

उमाशंकर सिंह परमार : कविता लिखने और कविता जीने मे बहुत बडा अन्तर है तुकबन्दी करके या चन्द वायावी अल्फाजों का जमघट जमा कर कोई भी फेसबुक मे कवि होने का दम्भ भरने लगता है…

Padm Singh : इनकी हरकतों के कारण ही लगभग एक साल पहले ही इनसे दोस्ती टूट गयी थी… दो कौड़ी की कविताएं लिखने वाला ब्लागर एक किताब छपवा कर साहित्यकार बन गया…लेकिन इनकी कांग्रेसी मानसिकता कभी नहीं मरी। धिक्कार है !!

Richa Vimal Kumar : इन पर मुझे पहले से ही शक था !! बीसियों बार fr req भेजा मगर मैंने कभी एक्सेप्ट नहीं किया!! मैं बार बात डिलीट करती रही,, मगर ये जनाब बार बार req भेजते रहे। एक दिन इनबॉक्स में इन्हें हड़का कर ब्लोक कर दिया !! अफ़सोस की बात है कि लोग मुकेश जी की पैरवी में उतर रहे। ऐसे कई दो चार पुस्तकें छपवा लेने वाले तथा कथित साहित्य के पुरोधाओं का असली चेहरा सुंदर महिलाओं के inbox में पता चलता है। ऐसे लोगों का पर्दाफाश होना ही चाहिए। आपने ठीक किया ऋचा जी!


इसके आगे का पढ़ें….

मुकेश ने एफबी पर हुई कुछ चैट सार्वजनिक कर दोष ऋचा पर भी मढ़ा

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कहां जा छिपे नीलाभ, अब और किसकी जिंदगी बिगाड़ोगे : भूमिका

रंगकर्मी एवं लेखक नीलाभ अश्क की मार-पिटाई से उनकी पत्नी भूमिका अश्क के बाएं हाथ में फ्रैक्चर हो गया है। घटना के दिन से लगतार दर्द बने रहने पर आज उन्होंने एक्स-रे कराया तो फ्रैक्चर का पता चला। बाएं हाथ पर आज प्लास्टर चढ़ गया। इस बीच उन्होंने भड़ास4मीडिया से अपनी तकलीफें साझा करते हुए कहा है कि ”नीलाभ की पूरी तरह से बेबुनियाद मुझ पर लगाई गई आरोपों की झड़ी का जवाब लोगों ने दे दिया है, जिनमें कुछेक उनके मित्र भी हैं। भड़ास4 मीडिया पर प्रकाशित नीलाभ अश्क के बयान से वह काफी दुखी होते हुए कहती हैं – ‘चोर की तरह कहां जा छिपे हो नीलाभ, तुम्हारे झूठ और पाप का घड़ा फूटने वाला है। अब और किस औरत की जिंदगी बर्बाद करोगे।’ 

वह भड़ास4मीडिया को बताती हैं – ”उन्होंने (नीलाभ अश्क ने) अपने आरोपों में एक बेटी का भी ज़िक्र किया है। जी हाँ, ये है वो तथाकथित बेटी, 14 जून 2014 के “हिन्दू” और “राष्ट्रीय सहारा” की इस फोटो से, उसकी सच्चाई जानी जा सकती है। मैं बता दूँ , 19 मई 2013 के ”जनसत्ता” अखबार में छपी मेरी कहानी ‘काला गुलाब’ पढ़कर उन्होंने मेरा मोबाइल नम्बर खोजा था और तब से लेकर 6 जून 2013 की सुबह तक कम-से-कम दो हज़ार बार उन्होंने मुझे फोन किया था। उस दौरान की कॉल डिटेल्स देखने पर मेरी बात की पुष्टि हो जाएगी।

भूमिका के बांए हाथ में आज प्लास्टर चढ़ गया, नीलाभ की पिटाई से जो टूट गया था

”उस दौरान नीलाभ ने सुबह 5 बजे से लेकर रात 11 बजे तक फोन कर करके मेरा जीना दुश्वार कर दिया था। मैं उस दौरान अपनी माँ के घर इलाहाबाद भी गई और मेरी माँ ने ऩीलाभ को फोन करके बुरी तरह झिड़का और मेरा पीछा छोड़ देने की सख्त फटकार भी लगाई थी। नीलाभ तब मेरी माँ से अनुनय-विनय कर-करके खूब गिड़गिड़ाते रहे थे कि भूमिका से बात हो जाने दीजिए।

”मैंने खुद भी कई बार नीलाभ को फोन न करने की चेतावनी दी थी लेकिन वे अपने दयनीय हालात का रोना रोते रहे। मुझे झूठ-पर-झूठ अपने वैभव के किस्से सुनाते रहे कि वे चार मकानों एक लंदन, एक इलाहाबाद, एक बुराड़ी और एक यही वर्तमान वाले मकान के अकेले मालिक हैं। उन्होंने ये भी बताया था कि वो किसी बिहारी लड़की के प्रेमजाल मे फंसे हुए थे, जिससे उनकी मित्रता फेसबुक पर हुई थी। वो लड़की उन्हें अनाथ, विकल और तन्हा छोड़कर चली गई है। वह कहते थे, इसीलिए उनको एक साहित्यिक रुचि वाली लड़की की इतनी जरूरत है कि वे इसके लिए ट्रेन के आगे लेटने को भी तैयार हैं।

”बहरहाल, मैं अपनी माँ से विदा लेकर 5 जून 2013 को अपने सरोजनी नगर के गर्ल्स हॉस्टल के लिए दिल्ली को रवाना हुई। प्रयागराज एक्सप्रेस में मेरी सीट और बोगी नम्बर नीलाभ ने किस विधि से जानी, ये तो वही जानें लेकिन ट्रेन रुकते ही वे मेरे सामने आकर कुली की तरह मेरा बैग मेरे हाथ से लेकर अपनी कार की ओर चल पड़े थे। एक बुज़ुर्ग का कॉलेज गोइंग लड़के वाला रवैया बड़ा हैरान करने वाला था उस दिन। मैं उम्र का लिहाज करते हुए बराबर अपने हॉस्टल जाने के लिए कहती रही। नीलाभ अतिशय विनम्रता टपकाते रहे और मेरी लेखनी के सबसे बड़े फैन के रूप में उस दिन मुझे अपने घर की एक कप चाय पिलाकर वापस हॉस्टल छोड़ने पर अड़ गए।

” मैंने बूढ़े आदमी की इज़्जत करते हुए उनके घर की वो मायावी चाय पी। अगले दिन ऩीलाभ ने बताया कि हमारी शादी हो चुकी है और वो मेरे पति हैं। उस शादी में मेरा कोई नहीं था। गवाह उनके, जगह उनकी, विवाह का तरीका उनका। मेरी माँ को ये खबर तीन दिन बाद बताई गई। माँ अगले ही दिन फौरन नीलाभ के घर पँहुची और खूब तमाशा हुआ। नीलाभ ने माँ के पैर पकड़कर माफी के साथ भूमिका के पैर मे काँटा तक न चुभने देने की गारंटी दी। माँ इस पर भी राज़ी नहीं हुई और उलटे पाँव मुझे लेकर इलाहाबाद लौट गई थीं। पीछे-पीछे चल पड़े नीलाभ आँसू बहाते, रोते गिड़गिड़ाते माँ को मनाते रहे। नीलाभ जैसे बुज़ुर्ग को यूँ रोते-कलपते देखकर मैं पसीज गई और वापस आ गई उनके घर। लेकिन वापस आकर कुछ दिनों तक तो वह लट्टू की तरह मेरे आगे-पीछे नाचते रहे। फिर भी मौका पाते ही ऊल-जलूल औरतों से छिपकर मोबाइल पर बात करते रहे। पकड़ लेने पर हज़ार कसमें खा लिया करते, मेरा पैर पकड़ कर माफी माँग लिया करते थे।  

” इस तरह की लड़ाइयों के तहत मैंने तीन बार अपना सारा सामान बाँधा और घर छोड़कर जाने लगी थी। हमारे मोहल्ले के वे लोग इस सच्चाई को बयान कर सकते हैं, जो मेरा सामान लाने वाली गाड़ी का प्रबन्धक करते थे। हर बार नीलाभ अपनी रोती हुई आँखों के साथ मेरे पैरों से लिपट जाते कि तुम्हे नहीं जाने दूँगा।

”धीरे-धीरे मामला शांत हुआ। उन दिनों मैं लिखने-पढ़ने में व्यस्त रहा करती थी लेकिन नीलाभ की चोरी-चकारी वाली चिरकुट आदतें नहीं सुधर रही थीं। एक बार मेरी काम वाली के सामने किसी औरत से वह मुलाकात का तय कर रहे थे। काम वाली ने मुझे बताया तो कहने लगे पुरुष से बात कर रहा था, उसकी आवाज़ महीन है, इसलिए मेड को शक हुआ। उस दिन मैंने डायल्ड नम्बर पर कॉल किया तो फिर एक महिला ही अवतरित हुई। मैंने इस तरह की कई घटनाएं अपनी मां से साझा कीं। माँ ने बीच-बीच में आकर नीलाभ को बहुत समझाया और वे दिन याद दिलाए, जब वह मुझे फोन पर लगातार तंग करते रहे थे। अबकी मेरी माँ ने साथ रहकर मामला नियंत्रित करने की कोशिश की तो नीलाभ ने घर का सारा क़ीमती सामान समेटा और चुपचाप किसी गोपनीय जगह पर चले गये। पहले कम्प्यूटर लेकर गए कि हार्ड डिस्क बदलवाने जा रहा हूँ। फिर करीब बीस कपड़े कार से ले गए कि दरज़ी से ढीले करवाने ले जा रहा हूँ। मैंने कहा 5-5 करके दर्जी को दो तो नहीं माने। बोले, एक साथ दे देता हूँ सभी कपड़े। वापस एक एक कर लाता जाऊँगा, जिससे सही नाप का हुआ या नहीं, पता चलता रहेगा।

”फिर एक दिन खूब किताबें ले जाने लगे। बोले, NSD में मँगवाई गई हैं। जब वह तीन मई 2015 को गये तो मैं घर के लिए परदे सिलवा रही थी। दरज़ी मैंने घर बुला रखा था। मुझसे हँसते-मुस्कुराते कहते रहे कि भूमिका अब पक्की गृहस्थिन बन गई है। तब तक कोई विवाद नहीं, कोई झगड़ा नहीं। अब थाने में जाकर कह रहे हैं कि उनकी जान को खतरा है। ऐसी कौन सी माँ होगी, जो अपनी बेटी को विधवा बनाना चाहेगी। सांसत में डालना चाहेगी। उनके मित्र को मैंने शर्बत दिया था, उन्होंने भी घर पर चाय पी थी। इतना ही नहीं, सबने मिल बैठकर साथ-साथ उस दिन नाश्ता किया था। अब उनका पता नहीं कि किसके साथ कहां रह रहे हैं।

”उस दिन बीच में एक बार 13 मई 2015 को कार लेने घर पहुंचे। मेरे पूछने पर कि कहाँ रह रहे हैं, किसके साथ हैं, कुछ भी नहीं बताया। बात बात में मारपीट करने लगे। मेरा हाथ तोड़ दिया। उसका एक्स-रे करवाने के बाद प्लास्टर चढ़वाना पड़ा है। अब वह मुझ पर घिनौने आरोप लगा रहे हैं। मेरे छात्र जीवन की कथा सुना रहे हैं। हॉस्टल में मेरा नाम पूछ कर कोई भी हकीकत जान सकता है। वहां बड़े सम्मान से लायब्रेरी में मेरी पहली किताब ‘द लास्ट ट्रुथ’ यादगार के तौर पर सहेजी हुई है। शेष कुछ कहने की ज़रूरत नहीं।”

वह नीलाभ को लक्ष्य कर लिखती हैं – ”तुम अभी और कितनी ज़िन्दगियों को मोहरें बनाओगे, कितनी कवर फोटो बदलोगे, कितनी फोटुओं पर माला चढ़ाओगे, जब थाने में बैठकर अपने बुढ़ापे का रोना रोते हो, जब मुझे सड़क के बीच दौड़ते हुए मारपीट कर भागते हो, या जब घर की सारी क़ीमती चीज़े लेकर अज्ञातवास पर चले जाते हो। कभी सोचते हो कि तुम्हारे झूठ और पाप का घड़ा फूटने ही वाला है अब। सब तुम्हारा पता जानना चाहते हैं। बताओ सबको, तुम कहाँ चोर जैसे छिपे बैठे हो। अब किस महिला के साथ हो। यहां ज़िन्दगियां दांव पर लगी हैं, और तुम फ़्रांस, पैरिस और हंगरी की बातें कर रहे हो। शर्म करो। माफ़ी मांगो।”

वह बताती हैं – ”एक बच्चे की हसरत लिए मैं मरी जा रही थी। तब उसने हज़ार तरीके की दवाएं खाईं। फलस्वरूप एक विकलांग बच्चे का भ्रूण बना, जिसे डॉक्टर बेदी ने बढ़ने नहीं दिया। मेरा तकरीबन कई लीटर खून बहाया गया। डॉक्टर इस बूढ़े का मुँह देखकर बहुत नाराज़ थीं क्योंकि इसके द्वारा वहाँ लिवा जाने वाली मैं पहली लड़की नहीं थी। डॉक्टर बेदी का नम्बर आज भी मेरे पास है। नीलाभ तो खाली अकाउंट की एक बैक डेटेड चेक की तरह हैं, जिन्हें मैं लिए फिर रही थी कि कहीं तो इनकी कद्र हो जाए, लेकिन वो अपनी आदतों से बाज़ नहीं आए। नतीजा सबके सामने है। आज भी राजस्थान पत्रिका में उनको मिला हुआ काम मेरे ही प्रयासों का फल है, जिसकी तनख्वाह वो अपने गोपनीय निवास पर अय्याशियों में उड़ा रहे हैं और मेरे घर-गृहस्थी का पूरा दारोमदार उन्होंने मेरी माँ पर डाल दिया है।”

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एबीपी न्यूज के एडिटर इन चीफ शाजी जमां अपने चैनल में न्याय क्यों नहीं कर रहे?

: कानाफूसी : एबीपी न्यूज चैनल से खबर है कि पीसीआर में कार्यरत एक वरिष्ठ महिला मीडियाकर्मी को इन दिनों न्याय की तलाश है. एडिटर इन चीफ शाजी जमां को सब कुछ पता है. लेकिन पीड़िता को न्याय नहीं मिल पा रहा. हुआ ये कि पीसीआर में कार्यरत वरिष्ठ महिला मीडियाकर्मी ने एक रोज अपने फेसबुक पेज पर बिना किसी का नाम लिए यह लिख दिया कि ‘एंकर ने कितना घटिया सवाल पूछा’.

बस, इतना लिखते ही एबीपी न्यूज चैनल की एंकर महोदय इस स्टेटस के नीचे कमेंट बाक्स में अपनी भड़ास निकालने लगीं. सूत्रों का कहना है कि एंकर ने वाकई बहुत घटिया सवाल पूछा था और इस तरह के सवाल का कल्पना कम से कम एबीपी न्यूज के एंकर से तो नहीं की जा सकती थी. फेसबुक पर विवाद बढ़ता देख बाद में आफिस के लोगों ने बीच-बचाव कर एंकर का कमेंट और महिला मीडियाकर्मी का स्टेटस हटवाया व दोनों को शांत कराया. लेकिन इसके बाद बौखलाई एंकर ने एक ग्रुप मेल भेज दिया ढेर सारे लोगों को जिसमें महिला मीडियाकर्मी पर कई तरह के आरोप लांछन लगाए गए थे.

इसे देख पीसीआर की महिला मीडियाकर्मी गुस्सा हो गईं और पुलिस में कंप्लेन कराने को तत्पर हो गईं. तब चैनल के सीनियर्स, जिसमें शाजी जमां भी शामिल हैं, ने महिला मीडियाकर्मी को शांत कराया और आफिस के अंदर ही कमेटी बनाकर पूरे मामले की जांच कराने और न्याय दिलाने का आश्वासन दिया. पर कई हफ्ते बीत गए, अब तक न तो आंतरिक जांच कमेटी बनी और न ही कोई कार्रवाई हुई. ऐसे में लोग कहने लगे हैं कि मीडिया के मसलों पर बढ़ चढ़ कर जांच कराने और न्याय दिलाने वाले शाजी जमां अपने चैनल के आंतरिक विवाद में न्याय दिलाने को क्यों तत्पर नहीं हो पा रहे हैं?

कानाफूसी कैटगरी की खबरें सुनी सुनाई बातों पर आधारित होती है. कृपया इस पर यकीन करने से पहले अपने स्तर पर तथ्यों को जांच ले. जिस किसी को उपरोक्त बातों में कोई गल्ती / असहमति नजर आती है तो वह अपनी बात नीचे कमेंट बाक्स के जरिए कह सकता है.

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कल्पतरु एक्सप्रेस, हर शाख पर उल्लू बैठा है….

एक समय था जब वरिष्ठ पत्रकार पंकज सिंह के समय में कल्पतरु एक्सप्रेस अखबार ने नई उंचाइयां प्राप्त की थीं। उस समय अखबार द्वारा चलाए गए मीडिया विमर्शों में जिस तरह मीडिया की नामी गिरामी हस्त‍ियां शामिल हुई थीं उसे देख तमाम स्थानीय मीडिया इकाइयों में हलचल-सी मचने लगी थीं। पर अरुण त्रिपाठी का प्रयोग कर पहले तो प्रबंधन ने अखबार के कर्मचारियों में दरार डाली। फिर मजीठिया से बचने के लिए उपर से नीचे तक तमाम लोगों को धीरे-धीरे बाहर कर दिया।

तमाम संपादकों, उपसंपादकों और निचले स्तर के कर्मचारियों से लेकर एचआर तक को बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। अब अखबार में जो हो रहा है उसका अंदाजा अखबार के पहले पन्ने पर 31 दिसंबर और 5 जनवरी को छपी विज्ञप्ति से लगाया जा सकता है। विज्ञप्ति में जिन सरोज अवस्थी के बारे में पहले बताया गया कि वे आफिस में शराब के नशे में आकर हंगामा करते रहे और अखबार के नाम पर धन उगाही करते रहे। अगली विज्ञप्त‍ि में उनसे कोई विवाद नहीं होने की खबर छापी गयी।

इससे यह साफ जाहिर हो गया कि अखबार के दफ्तर में अब क्या हो रहा है। शाम ढलते ही वहां शराब की महफिल जमने लगती है और जो माहौल होता है उसमें हंगामा मारपीट की आशंका बराबर रहती है। जिस घटना का विज्ञापन 31 को छपा है उसमें जैसी की खबर है, अवस्थी ने मालिकान में से एक की पिटाई कर दी थी और खुद भी पिटे थे। फिर कई दिनों तक मालिकान को पुलिस खोजती रही। वे छुपते रहे। उसके बाद वे मालिकान ठंडे पड़ गए हैं, नहीं तो हर अखबार के कर्मचारी की नाक में वे दम किए रहते थे।

अन्य मालिकान की इसी बीच आफिस के आगे से गाड़ी चोरी हो गयी। पंकज सिंह के आने के पहले भी बताया जाता है कि ऐसा ही माहौल था। चर्चा है कि प्रबंधन अब सेबी के कसते शि‍कंजे के कारण अखबार को नये मालिकों के सहारे बेच बाच कर जो भी निकल आए वह निकाल लेना चाहता है।  नीचे अखबार में छपे दोनों विज्ञापनों की जेपीजी संलग्न है। साथ एक और जेपीजी है एक खबर की जिसे देखकर यह अंदाजा लगाया जा सकता है कि अब किस तरह की कल्प्ना के अधार पर बे-सिर पैर की खबरें छप रही हैं अखबार में। कल्पतरु अब रसातल को जा रहा है।

एक कर्मचारी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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सलाम मांझी! सलाम कंवल भारती!

दलित-पिछड़ों यानी मूलनिवासी की वकालत को द्विज पचा नहीं पा रहे हैं। सामाजिक मंच पर वंचित हाषिये पर तो हैं ही, अब राजनीतिक और साहित्यिक मंच पर भी खुल कर विरोध में द्विज आ रहे हैं। बिहार के मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी के आर्यों के विदेशी होने के बयान से उच्च जाति वर्ग पार्टी और विचार धारा से ऊपर जाकर बौखलाहट और तीखा विरोध के साथ सामने आया तो वहीं लखनउ में कथाक्रम की संगोष्ठी ‘लेखक आलोचक, पाठक सहमति, असहमति के आधार और आयाम’, में लेखक कंवल भारती के यह कहने पर कि ‘साहित्य और इतिहास दलित विरोधी है। ब्राह्मण दृष्टि असहमति स्वीकार नहीं करती।

सत्ता में बदलाव और संघ परिवार के मजबूत होने से दलित साहित्य के ज्यादा बुरे दिन आने वाले हैं।’ बस इतना ही कहना था कि संगोष्ठी में मौजूद द्विजों ने कंवल पर मुद्दे को भटकाने का आरोप लगाते हुए हमला बोल दिया। साहित्यिक माहौल में द्विजों का एक दलित लेखक पर उसकी अभिव्यक्ति पर हमला, साबित करता है कि राजनीतिक और सामाजिक मंच की तरह साहित्यिक मंच भी जातिवादी जड़ता से बाहर नहीं आ पाया है। जातिवादी जड़ता पूरी मजबूती से कायम है। तथाकथित जातिवादी नहीं होने का जो मुखौटा दिखता है वह नकली है।

जीतन राम मांझी के आर्यों के विदेशी होने के बयान पर द्विजों की बौखलाहट और तीखा विरोध से एक बात बिलकुल साफ है कि उच्च जाति वर्ग के बुद्धिजीवियों, राजनेताओं और कार्यकर्ताओं में पार्टी और विचार धारा से ऊपर जाकर उच्च जाति के मुद्दे पर एक एकता है। पीएमएआरसी के अध्यक्ष और दलित चिंतक अरूण खोटे मानते हैं कि उन सबके बीच इस बात की भी आम सहमति है कि सत्ता व्यवस्था पर चाहें कोई भी दल, व्यक्ति या विचाधारा का कब्जा हो लेकिन वह पूर्णरूप से उच्च जाति वर्ग के अधीन हो और जो उच्च जाति की वर्चास्यता को चुनौती न दे सके वहीं दलित और पिछड़े वर्ग के नेता और बुद्धिजीवी अपनी पार्टी, नेता और विचारधारा को अपने वर्ग से ज्यादा महत्त्व देते हैं बल्कि अनेक अवसरों पर अपने वर्गीय हितों के खिलाफ होने वाली गोलबंदी के समथन में भी खड़े हो जाते हैं। सच भी है मांझी के बयान से सभी द्विज गोलबंद हो गये। हिन्दूवादी मीडिया भी मांझी के बयान के विपक्ष में खड़ा दिखा। सोषल मीडिया पर जीतन राम मांझी के ज़ज्बे को सलाम किया गया। सत्ता व व्यवस्था के शिखर पर पहुंच कर जिस तरह से मांझी ने वंचित वर्ग की अस्मिता, पहचान और हक-हूक के सवाल को पूरी ताकत के साथ रखा है वह काबिले तारीफ है। महत्वपूर्ण बात यह है कि जीतन राम मांझी ने अपने बयान में दलित, आदिवासी और पिछड़ों को एक पहचान दिलाने की भरपूर कोषिष की। मूल निवासियों के हक की बात की। वह भी व्यवस्था के उच्च पद से।

मूल निवासी की बात को लेकर मुख्यधारा की मीडिया कभी सामने नहीं आयी। सोशल मीडिया में मूल निवासी की अवधारणा पर बहस करने वालों को इस बहस को आगे बढ़ाने में बल मिलेगा। साथ ही जीतनराम मांझी के समर्थन में मजबूती से साथ खड़ा सार्थक भूमिका होगी। जीतन राम मांझी  और कंवल भारती के बयान से बौखलाये द्विजों की प्रतिक्रिया ने बुद्धिजीवियों, राजनेताओं और सामाजिक कार्यकत्ताओं के चेहरे से नकाब हटा दिया है। बल्कि खुद ही उनके असली और नकली होने का प्रमाण दे दिया। थोड़ी देर के लिए राजनीतिक मंच को छोड़ दिया जाये और साहित्यकारों व बुद्धिजीवियों को देखा जाये तो, जो कुछ कथाक्रम की संगोष्ठी में दलित मुद्दे की बात कहने पर घटित हुई वह द्विजों के लिए अक्षम है। संस्कृति की राह दिखाने वाले खुद जब अपसंस्कृति की राह पकड़ ले तो इसे क्या कहा जाये?

इस हंगामे पर प्रो रमेश दीक्षित कहते हैं, कंवल भारती बढि़या बोल रहे थे। किसी को कोई दिक्कत थी, तो उसके लिए मंच था। वैचारिक स्वतंत्रता है, देश में अभी फासीवाद नहीं आया। वहीं जलेस के नलिन रंजन सिंह मानते हैं कि लोकतंत्र में अपनी बात कहने का हक है। ऐसे में कंवल भारती का विरोध करना गलत था। उनसे असहमति रखने के बाद भी उनके बोलने के अधिकार पर रोक का विरोध करता हूं। लेखक पंकज प्रसून कहते हैं, कंवल भारती तय करके के आए थे कि उनको क्या बोलना है। ऐसा कई बार लोग लोकप्रियता के लिए भी करते हैं। वे मुद्दों पर रहते तो विवाद नहीं होता। साहित्य में विवाद न हो तो संवाद नहीं होगा। विरोध पर कंवल भारती कहते हैं, ऐसा विरोध मेरे लिए नया नहीं है। मेरे साथ अक्सर ऐसा होता रहता है मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। मैं अपनी बात तो कहूंगा ही आप असहमत हैं तो अपना पक्ष रख सकते हैं।

द्विजों ने मूल निवासी पर मांझी को एवं साहित्य-इतिहास दलित विरोधी पर कंवल भारती को जिस तरह से धेरा वह सवाल खड़ा करता है। क्या कोई दलित-पिछड़ा (वंचित वर्ग) अपनी बात नहीं कह सकता? मांझी या फिर कंवल भारती ने कौन सी गलत बात कर दी? जब किसी वंचित को सत्ता-व्यवस्था में उच्च स्थान मिलता है तो उसे उसकी जाति से जोड़ कर क्यों देखा जाता है? सवाल उठाया जाता है। मुद्दों-बयानों में धेरा जाता है और साबित करने की कोषिष की जाती है कि दलित-पिछड़े-आदिवासी है इसलिये मोरचे पर असफल हैं! जबकि द्विजों पर यह हमला दलित-पिछड़े-आदिवासी की ओर से नहीं होता है। बहरहाल, दलित-पिछड़े-आदिवासी की आवाज को बुलंद करने के लिये जीतन राम मांझी और कंवल भारती को सलाम!

लेखक संजय कुमार बिहार के वरिष्ठ पत्रकार हैं.

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Shubhranshu Choudhary झूठा व्यक्ति, झूठ की बुनियाद पर खड़ी इमारत का सच जानिए : Smita Choudhary

Smita Choudhary : मेरी इस फेसबुक पोस्ट को कृपया पढें और share करें. साथ ही Shubhranshu Choudhary से प्रश्न करें. इतने झूठे व्यक्ति को अवार्ड मिलने का आधार ही यह है कि वे इंटरनेट का दुरुपयोग कर रहे हैं. यूँ तो किसी को अवार्ड मिले तो वह बधाई का पात्र होता है, लेकिन आधारभूत रूप से झूठ की बुनियाद पर खड़ी इमारत को बधाई नहीं दी जा सकती. झूठ की बुनियाद पर खड़ी इमारत तभी तो ढहेगी जब लोग सच को समझने का प्रयत्न करेंगे. मेरी पोस्ट ये है…

शुभ्रांशु चौधरी


 

Smita Choudhary : It is interesting to note that two of the nominees are known to have cases of domestic violence pending against them. They are known to have disregarded the people, the law and all that they say they stand for. I am learning the politics behind the awards. There was a time when we ( as in the CGNet Swara that I co founded) said that Awards were given to crush possibilities that were not convenient. And then our friends said that we had sold out for the growth of CGNet- actually what they meant was that the founder had sold out. They were right.

I can see that the name and fame game went to my husbands head and the person who could stand up for injustice done by his friends is now being feted for making CGNet a voluntary platform which stands for cheap technology which can grown like temples- after accepting 400,000 dollars in foreign funds and not being able to account for it? And that too by the way was not the idea of the man who claims to be the sole founder – it was the idea of a young Ashoka Fellow- Arjun Venkatraman,
And what is the credibility? The divorce petition filed by my husband in which he acknowledges both our contributions to CGNet albeit in a manner which was that of a bully. And yet, he fails to acknowledge me as co founder in any award winning ceremony. And he takes credit for Hacker Gram, and did all he could to damage both of us. Do I mind- Like Hell I do !

The idea and its implementation was mine- He was the face. Did I mind? No. Because I could say I was his wife. Proudly. Then I see that in spite of being such a horrible husband he is one of the top 100 thinkers. Then I wonder if the world is thinking at all. And then I don’t wonder. I know. And what can one mind about mindlessness. They say that people with the personality disorder he has cannot think beyond themselves. I wait for him to get insight- unlikely he will turn up at the psychiatrists or the courts.

स्मिता चौधरी के फेसबुक वॉल से.

पूरे प्रकरण को जानने-समझने के लिए इन्हें भी पढ़ें…

शुभ्रांशु चौधरी ग्लोबल थिंकर सूची में शामिल

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शुभ्रांशु पर ‘सीजी नेट’ की को-फाउंडर स्मिता चौधरी ने लगाए कई आरोप

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सीजीनेट वाले शुभ्रांशु चौधरी को एक्सपोज करेंगी उनकी पत्नी स्मिता चौधरी, पढ़िए मेल

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