अयोध्या विवाद पर अंतिम फैसले की घड़ी!

अजय कुमार, लखनऊ

अयोध्या विवाद (बाबरी मस्जिद-रामजन्मभूमि विवाद) फिर सुर्खिंया बटोर रहा है। देश की सर्वोच्च अदालत कल (11 अगस्त 2017) से इस एतिहासिक विवाद का हल निकालने के लिये नियमित सुनवाई करने जा रही है। अदालत जो भी फैसला करेगा उसे दोंनो ही पक्षों को मानना होगा, लेकिन देश में मोदी और प्रदेश में योगी सरकार बनने के बाद ऐसा लगने लगा है कि अब इस मसले पर सियासत बंद होगी और कोई फैसला सामने आयेगा। उक्त विवाद करोड़ों हिन्दुओं की आस्था से जुड़ा हुआ मसला है तो कुछ मुस्लिम संगठन इस पर अपनी दावेदारी ठोेक रहे हैं। करीब पांच सौ वर्ष पुराने इस विवाद ने कई उतार-चढ़ाव देखे हैं।

रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद में गत दिनों उस समय एक नया मोड़ आ गया,जब यूपी के शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दायर करके अपना पक्ष रखते हुए दावा किया,‘ विवाद खत्म करने के लिए बोर्ड का मत है कि अयोध्या में विवादित स्थल से उचित दूरी पर मुस्लिम बहुल इलाके में मस्जिद बनाई जा सकती है।’ अयोध्या के रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद टाइटल विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में कल (11 अगस्त 2017) से सुनवाई होनी है। शिया बोर्ड भी सुप्रीम कोर्ट में एक पार्टी है। ऐसे में यह हलफनामा अहम माना जा रहा है।

यूपी शिया सेंट्रल वक्फ बोर्ड के चेयरमैन की ओर से दाखिल 30 पेज के हलफनामे में कहा गया है कि बाबरी मस्जिद मीर बकी ने बनवाई थी। वह शिया थे और शिया वक्फ बोर्ड की स्थापना उन्होंने की थी। ऐसे में मस्जिद की प्रॉपर्टी शिया वक्फ बोर्ड की है। मस्जिद सुन्नी वक्फ बोर्ड की नहीं है। ऐसे में मस्जिद के बारे में शिया वक्फ बोर्ड ही बातचीत कर सकता है। इस मामले में सुन्नी सेंट्रल वक्फ बोर्ड के स्टैंड पर ऐतराज जताते हुए शिया बोर्ड ने यह भी कहा कि तमाम मुद्दों पर समझौते के लिए एक कमिटी बनाए जाने के लिए वक्त दिया जाए।

गौरतलब हो बीते मार्च महीने में सुप्रीम कोर्ट ने भी सुझाव दिया था कि मंदिर-मस्जिद विवाद का कोर्ट के बाहर निपटारा होना चाहिए। इस पर सभी संबंधित पक्ष मिलकर बैठें और आम राय बनाएं। बातचीत नाकाम रहती है तो हम दखल देंगे,लेकिन इस पर दोनों ही पक्षों की तरफ से कोई सार्थक शुरूआत नहीं की गई,जिस कारण से सुप्रीम कोर्ट अब इस विवाद की नियमित सुनवाई करने जा रहा है।

अभी तक बाबरी मस्जिद के सबसे बड़े पैरोकार हाशिम अंसारी (अब मृत) और बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी ही विवादित स्थल पर अपनी दावेदारी ठोक रही थी।उत्तर प्रदेश शिया वक्फ बोर्ड ने अयोध्या में राम मंदिर के पक्ष में हलफनामा देकर मुस्लिम सियासत को और गरमा दिया है। मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड के सदस्य इसके औचित्य पर सवाल खड़े कर रहे हैं तो सुन्नी वक्फ बोर्ड का मानना है कि शिया वक्फ को इसका अधिकार ही नहीं है। शिया वक्फ बोर्ड के हलफनामें पर मुस्लिम पक्ष के कुछ पैरोकारों का यह भी मानना है कि इससे सुप्रीम कोर्ट में चल रहे विवाद पर कोई असर नहीं पड़ेगा।

शिया वक्फ बोर्ड ने यह हलफनामा ऐसे समय में दिया है जबकि वह सपा सरकार में संपत्तियों के दुरुपयोग जैसे कई आरोपों से घिरा हुआ है। हालांकि वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष वसीम रिजवी ऐसे आरोपों को बेबुनियाद बताते हुए कह रह हैं,‘हम न्यायालय में चल रहे मुकदमे में पक्षकार हैं और अन्य पार्टियों की तरह अपना जवाब रखने का हमें हक है। उससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि हमने कब अपना पक्ष रखा। यह सुप्रीम कोर्ट देखेगा कि हमने हलफनामा देर में रखा या समय से। दूसरी ओर इस मुकदमे में पैरोकार पूर्व अपर महाधिवक्ता जफरयाब जीलानी मानते हैं कि इस हलफनामे का मुकदमे की सुनवाई पर असर नहीं पड़ेगा। उन्होंने आरोप लगाया कि इसका उद्देश्य सियासी है और यह भाजपा को फायदा पहुंचाने के लिए किया गया है। सुन्नी वक्फ बोर्ड के चेयरमैन जुफर फारुकी कहते हैं कि 1946 में यह तय हो चुका है कि मस्जिद पर शिया का हक नहीं है। 71 साल बाद इस मामले को अदालती लड़ाई में उठाना गलत है।

बताते चलें कि 30 सितंबर 2010 को हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने विवादित 2.77 एकड़ जमीन में से निर्मोही अखाड़े को राम चबूतरा और सीता रसोई वाली जगह, रामलला विराजमान को मूर्ति वाली जगह और सुन्नी वक्फ बोर्ड को बचा हुआ तिहाई हिस्सा देने को कहा था,जिस पर कोई भी पक्ष राजी नहीं हुआ जिसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुच गया था।

किसने क्या कहा–

यह मस्जिद मीरबाकी ने बनवाई थी, जो शिया था। 1946 तक मस्जिद उनके पास थी लेकिन, अंग्रेजों ने गलत कानूनी प्रक्रिया से इसे सुन्नी वक्फ बोर्ड को दे दिया। मस्जिद और मंदिर पास-पास नहीं होने चाहिए क्योंकि दोनों समुदाय के लोग लाउडस्पीकर का इस्तेमाल करते हैं। हम चाहते हैं कि राम जन्मभूमि स्थल से उचित दूरी पर मुस्लिम इलाके में मस्जिद बनवाई जाए। -शिया वक्फ बोर्ड

अयोध्या में विवाद मस्जिद का नहीं, बल्कि भूमि का है। इसे शिया-सुन्नी के विवाद के रूप में नहीं देखा जा सकता। शिया वक्फ बोर्ड का हलफनामा औचित्य से परे है। इसका कोई अर्थ नहीं है। -वरिष्ठ सदस्य आल इंडिया पर्सनल लॉ बोर्ड खालिद रशीद फरंगी महली

मंदिर और मस्जिद दोनों बनें। मंदिर वहीं बने, जहां वह है। मस्जिद सरयू नदी के दूसरी तरफ बननी चाहिए। -बीजेपी नेता सुब्रमण्यन स्वामी

शिया वक्फ बोर्ड का हलफनामा झूठ के सिवा कुछ नहीं है। चंद बिके लोगों की यह करतूत है। इससे सुनवाई पर कोई असर नहीं पड़ेगा। -हाजी महबूब, सुन्नी सेंट्रल बोर्ड

इस हलफनामे से दुनिया भर में बड़ा संदेश गया है। देश में रहने वाला हर राष्ट्रप्रेमी मुसलमान चाहता है कि राममंदिर जन्मभूमि पर बने। -महंत रामदास, निर्मोही अखाड़ा

लेखक अजय कुमार लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं.

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उम्रदराजी की छूट अगर नीलाभ को मिली तो वागीश सिंह को क्यों नहीं?

Amitesh Kumar : हिंदी का लेखक रचना में सवाल पूछता है, क्रांति करता है, प्रतिरोध करता है..वगैरह वगैरह..रचना के बाहर इस तरह की हर पहल की उम्मीद वह दूसरे से करता है. लेखक यदि एक जटिल कीमिया वाला जीव है तो उसका एक विस्तृत और प्रश्नवाचक आत्म भी होगा. होता होगा, लेकिन हिंदी के लेखक की नहीं इसलिये वह अपनी पर चुप्पी लगा जाता है. लेकिन सवाल फिर भी मौजूद रहते हैं.

नीलाभ जी को रंग प्रसंग का संपादक बनने की बधाई. वैसे इससे क्या फ़र्क पड़ता है कि अजित राय को एक बकियौता अंक का संपादन मिलने से वे क्षुब्ध थे. वैसे क्षुब्ध तो वो रानावि प्रशासन के रुख से भी थे जिसने, बकौल उनके, उनके संपादन में निकलने वाले दूसरे अंक की तैयारी के समय दिखाया था. और वह अंक भी क्या था! उसमें संपादक ने नाट्य आलेख के बारे में जो बचकाने सवाल पूछे थे उनकी चर्चा का ये समय नहीं है. ये बधाई का वक्त है. क्या हुआ कि नामवर सिंह के पैनल में रहते हुए भी वे संपादक बन गये, क्या हुआ कि उनकी उम्र सत्तावन से खासी अधिक है. लोगों को हैरत होती है तो होती रहे. उन्हें बधाई.

बधाई की बारी आती है अब राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय की जिसने ये साबित किया कि युवा पीढ़ी में कोई भी रंग प्रसंग का संपादक बनने के योग्य नहीं है. लेकिन उम्रदराजी की छूट अगर नीलाभ को मिली तो वागीश सिंह को क्यों नहीं? क्योंकि उनके संपादन में निकलने वाले दो रंग प्रसंग के अंक में एक दृष्टि थी, एक योजना थी. तभी तो अभिनय वाला अंक दुबारा छपा.

थिएटर से जुड़े और शोध छात्र अमितेश कुमार के फेसबुक वॉल से.

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दैनिक जागरण नोएडा के 18 मीडियाकर्मी टर्मिनेट, प्रबंधन ने बाउंसर बुलाया, पुलिस फोर्स तैनात

दैनिक जागरण नोएडा की हालत बेहद खराब है. यहां मीडियाकर्मियों का जमकर उत्पीड़न किया जा रहा है और कानून, पुलिस, प्रशासन, श्रम विभाग, श्रम कानून जैसी चीजें धन्नासेठों के कदमों में नतमस्तक हैं. बिना किसी वजह 18 लोगों को टर्मिनेट कर उनका टर्मिनेशन लेटर गेट पर रख दिया गया. साथ ही प्रबंधन ने बाउंसर बुलाकर गेट पर तैनात करा दिया है. भारी पुलिस फोर्स भी गेट पर तैनात है ताकि मीडियाकर्मियों के अंदर घुसने के प्रयास को विफल किया जा सके. टर्मिनेट किए गए लोग कई विभागों के हैं. संपादकीय, पीटीएस से लेकर मशीन, प्रोडक्शन, मार्केटिंग आदि विभागों के लोग टर्मिनेट किए हुए लोगों में शामिल हैं.

 दरअसल पूरा मामला मार्केटिंग की दो लड़कियों को टर्मिनेट किए जाने से शुरू हुआ. बिना कारण बताए जब दो लड़कियों को टर्मिनेट कर दिया गया तो विभिन्न विभागों के करीब दो दर्जन लोग एकजुट होकर सीजीएम नीतेंद्र श्रीवास्तव के पास गए और बिना किसी कानूनी प्रक्रिया पूरी किए टर्मिनेट किए जाने को अनुचित बताया. कर्मियों के दबाव में लड़कियों को आफिस में आने और काम करने की अनुमति तो दी गई लेकिन जैसे ही सब लोग अपने अपने काम पर लौटे, प्रबंधन ने इन दो दर्जन लोगों के खिलाफ विभिन्न धाराओं में मुकदमा करा दिया.

उधर, मार्केटिंग की लड़कियों ने साफ साफ बताया कि दरअसल उन्हें टर्मिनेट परफारमेंट से कारण नहीं किया गया है बल्कि वे बासेज की कई अनुचित मांगों को पूरा नहीं कर रहीं थी, इसलिए उन्हें निशाना बनाया गया. लड़कियों ने भी छेड़छाड़ समेत कई धाराओं में प्रबंधन के खिलाफ मुकदमा लिखाया. इससे परेशान प्रबंधन ने खुद को वजनदार और दमदार दिखाने की कोशिश करते हुए 18 मीडियाकर्मियों को टर्मिनेट कर दिया. फिलहाल नोएडा स्थित दैनिक जागरण के गेट पर भारी तनाव पसरा हुआ है.

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ओम थानवी के लिए एक लाख रुपये चंदा इकट्ठा करने की अपील ताकि वो फिर किसी कल्याण के हाथों एवार्ड न लें

Mohammad Anas : ओम थानवी जी की मदद की अपील —- दोस्तों, हम सबके बेहद प्रीय जनसत्ता के पूर्व सम्पादक ओम थानवी जी अब नौकरी से रिटायर हो गए हैं. उन्होंने केके बिरला फाउंडेशन द्वारा अपनी किताब के लिए बाबरी विध्वंस के आरोपी कल्याण सिंह के हाथ से एक लाख रुपए का पुरूस्कार लिया है. कल्याण न सिर्फ बाबरी विध्वंस के आरोपी हैं बल्कि उन पर सांप्रदायिक माहौल बिगाड़ने के लिए हेट स्पीच, दंगा भड़काने, घोटाले तक के आरोप लगे हुए हैं. जैसे तालिबान का मुल्ला उमर वैसे ही भाजपा के कल्याण सिंह. फेसबुक पर श्री ओम थानवी जी ने लिखा है कि पुरूस्कार लेने से मेरे दुश्मनों को दिक्कत हो गई है.

सर, हम सब आपके बच्चे हैं, दोस्त हैं, आपकी बातों को खुद में जीने का प्रयास करते हैं. यह जानकार बेहद अफ़सोस हुआ कि आपने एक लाख रुपए के लिए अपनी विचारधारा, अपनी बातों, अपने संघर्षों से किनारा करने में एक मिनट का भी समय नहीं लगाया. उनके समक्ष गिर गए जिनके सामने सीना ताने खड़े होने का एहसास कराते थे. राजभवन में आपने कुछ भी कहा हो लेकिन पुरूस्कार लेने के लिए जब आपने हाथ बढ़ाया था तभी आपने कल्याण सिंह को स्वीकार कर लिया था.

हम नहीं चाहते की आगे आप जैसा कोई संघर्षशील बुजुर्ग अपने सारे किये धरे पर यूं मिट्टी लीप दे इसलिए आपके बैंक अकाउंट में उतना अमाउंट भेज रहे हैं जितना की आपने कल्याण सिंह के हाथों से लिया है. ताकि आपको एहसास हो जाए की कल्याणों और तोगड़ियों से लड़ने वाले लोग भी एक लाख दे सकते हैं. मैं अपने दोस्तों से अपील करूंगा की वे कमेन्ट में उस धनराशी का उल्लेख करें जितना वे ओम थानवी जी को देना चाहते हैं. रुपयों का कलेक्शन होते ही ओम जी को पहुंचा दिया जाएगा. यदि फेसबुक से इतना पैसा नहीं मिल सका तो मैं व्यक्तिगत रूप से इसे जुटाऊंगा. लेकिन उम्मीद है यहाँ से मायूसी नहीं मिलेगी. न्यूनतम -सौ रुपए. अधिकतम- दस हजार रुपए. मैं दस हजार रुपए की पहली मदद करने की घोषणा करता हूँ..

सर हम आपके दुश्मन नहीं हैं,इसलिए पैसा जुटा रहे हैं ताकि एक दंगाई के हाथों से एक लाख रुपए लिए जाने को न्यायोचित ठहराने को आप अपनी गलती माने. हम ऐसी किसी परम्परा के विरोधी हैं. यह वैचारिक अस्मिता की लड़ाई है जिसमें आप मात्र एक व्यक्ति नहीं बल्कि विचार हैं. और हम सब मात्र पैसों के लिए आपका पतन होते नहीं देख सकते/

निवेदनकर्ता-
-ओम थानवी जी के विचारों के लिए उनका सम्मान करने वाले हम सब लोग.

पत्रकार और सोशल एक्टिविस्ट मोहम्मद अनस के फेसबुक वॉल से.


मूल पोस्ट :

कल्याण के हाथों पुरस्कार लेने का विरोध करने वालों को ओम थानवी ने दुश्मन करार दिया

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Om जी के पास के.के. बिड़ला पुरस्‍कार देने वाले को चुनने की सुविधा नहीं थी!

Abhishek Srivastava : जिस तरह Om जी के पास के.के. बिड़ला पुरस्‍कार देने वाले को चुनने की सुविधा नहीं थी, उसी तरह Uday जी को मुख्‍य अतिथि चुनने की सुविधा नहीं थी या काशीनाथ सिंह को भारत भारती लेते वक्‍त उत्‍तर प्रदेश की मनपसंद सरकार चुनने की सुविधा नहीं थी। जिस तरह ओमजी ने पुरस्‍कार कल्‍याण सिंह के हाथों नहीं बल्कि राज्‍यपाल के हाथों से लिया है, ठीक वैसे ही नरेश सक्‍सेना ने रमण सिंह से नहीं बल्कि एक जनप्रतिनिधि से हाथ मिलाया था और नामवरजी ने नरेंद्र मोदी के साथ नहीं बल्कि लोकतंत्र में चुने गए एक प्रधानमंत्री के साथ ज्ञानपीठ का मंच साझा किया था।

इसी तर्ज पर सुषमा स्‍वराज ने विदेश मंत्री के बतौर नहीं बल्कि पारिवारिक मित्र के रूप में ललित मोदी की मानवीय मदद की है। मोदीजी प्रधानमंत्री की हैसियत से नहीं बल्कि एक मित्र की हैसियत से अडानीजी को विदेश यात्रा पर ले गए थे। मुकेश भाई ने प्रधानमंत्री के नहीं, अपने दोस्‍त की पीठ पर हाथ रखा था। राजनाथ सिंह गृह मंत्री के बतौर नहीं, एक बाप की हैसियत से अपने बेटे को ट्रांसफर-पोस्टिंग में पैसा खाने का मौका दे रहे थे। ठीक ऐसे ही नीतिश कुमार और लालू यादव का गठजोड़ राजनीतिक अवसरवाद नहीं, पुराने दोस्‍तों का पुनर्मिलन है। बिलकुल इसी तर्ज पर बिहार उच्‍च न्‍यायालय के दो जजों ने सवर्ण होने के नाते नहीं, साक्ष्‍यों के अभाव में बिहार के पांच दलित नरसंहारों के दोषियों को छोड़ दिया था।

कोई शक? अगर आपके पेट में बल पड़ रिया है, तो आप इन सब लोगों के दुश्‍मन हैं। मस्‍त रहिए। साहित्‍य अकादमी से पुरस्‍कार लीजिए, कमरे में सजाइए, अकादमी पुरस्‍कार पाने वाले प्रो. कलबुर्गी की हत्‍या का साथ में विरोध भी करते रहिए। इस देश में conflict of interest एक लुप्‍तप्राय पक्षी का नाम है। यह पक्षी कहीं ग़लती से मिल भी जाए, तो तत्‍काल भून कर निगल जाइए और किसी राजभवन में जाकर संविधान के नाम पर डकार मार आइए। फिर मुअनजोदड़ो के इतिहास में आपका नाम भी दर्ज होना तय है।

पत्रकार अभिषेक श्रीवास्तव के फेसबुक वॉल से.


उपरोक् स्टेटस पर आए कुछ कमेंट्स इस प्रकार हैं…

Satya Narayan थानवी जी की रीढ की हड्डी तो सांप के जैसी लचीली निकली। फासीवाद फासीवाद चिल्‍लाते चिल्‍लाते कल्‍याण सिंह शरणागत हो गये। थानवी जी तो बड़े बेशर्म निकले। इतनी तेजी से ब्‍लॉक तो गाली गलौच करने वाले संघियों को भी नहीं किया जाता जितने तेजी से वो मुझे कर गये।

Om Thanvi तो नामवर सिंह, नरेश सक्सेना, उदय प्रकाश, काशीनाथ सिंह, नरेंद्र मोदी, मुकेश अम्बानी, गौतम अडानी सब इस आधार पर एक-से हो गए कि कौन कब कहाँ किसके साथ जा बैठा! वाह, क्या तर्कशास्त्र है!

Akhilesh Pratap Singh ना….बिल्कुल ना……नरेंद्र मोदी, अडानी, अंबानी की तरह तो होने का सवाल ही नहीं बनता….उनसे क्या शिकायत हो सकती है ? सवाल तो उनसे है जो सवाल करने वालों की पांत से उचककर गमलों में सज जाते हैं.. वाजिब सवाल है अभिषेक भाई… पर जवाब में सवाल ही मिलेगा….मने आप ही जस्टिफाई कीजिए कि आपका सवाल जायज है……

Mohammad Ehtasham Om Ji itne senior hain aur record itna achcha k is 1 incident ko andaze ki ghalti hi maan sakte hain ….. itna kade shabdon mein virodh k bajaye sirf yeh kahna kafi ho sakta tha k “Om Ji yeh ghalat hai”

Abhishek Srivastava तर्क तो आपका ही दिया हुआ है Om Thanvi, मैंने तो बस उसका सहज अनुप्रयोग किया है। तर्कशास्‍त्रीय शब्‍दावली में आपके तर्क को अर्धकुक्‍कुट न्‍याय की संज्ञा दी जाती है, जहां आधी मुर्गी खाने के बाद आधी को अंडा देने के लिए छोड़ दिया जाता है।

आशीष सागर सब अपनी सुविधा के अनुसार ही तो सम्मान,मंच और प्रतिमान तय कर रहे है ….पात्र तो !!!

Anil Pushker ॐ जी जिन्दगी भर जन सत्ता का खाते रहे Abhishek Srivastava ji. अब राज सत्ता की जूठन के एक कौर का अंश मात्र भी चाटने को मिले तो खुशी से खा लेंगे. तर्क वही रहेगा. जनसेवक का जूठा खाया है तो क्या बुरा किया? जनसत्ता के ओहदे पर जनसेवक होने का कुछ तो मोल मिले व्ही पुरस्कार है मेरा. जनसेवक ही तो रहा मैं जिन्दगी भर…. हाँ इतनी औकात नहीं रही – जन सत्ता के सेवक की, कि राज भोग मिल जाय. ये तो अपनी अपनी किस्मत है. बिडला ने बर्षों से लेखक बिरादरी को सांड बनकर शियारों को अपना पिंड (एक लाख) हिलाता हुआ लुभाए रहा. और खुद खरबों की दौलत का मालिक बना गया. कोई शियार कुछ नहीं बोला. इन शियारों से क्या उम्मीद करना और क्यूँ उम्मीद करना? इनकी काहे की जवाबदेही. दरबार में नगरवधू की भी एक हैसियत हुआ करती थी. मगर आप देखिये दरबारी लेखक तो दरबारी संस्कृति में हमेशा से बादशाह की खुशी के लिए लेखकीय वेश्यावृति करता रहा है. लिखने की मजबूरी थी या पेट की पता नहीं. पर मजबूर रहा है. अब उन दरबारी लेखकों की अगली पुश्तें भी तो लोकतंत्र के राजाओं को खुश करने के लिए कुछ न कुछ तो करेंगी……

Shashank Dwivedi कुछ समय पहले जब कथित साहित्यकार उदय प्रकाश ने सांसद आदित्यनाथ के हाथ से सम्मान लिया था तो सेकुलरिज्म पर करारी चोट हुई थी लेकिन अब ओम थानवी ने जब यह सम्मान कल्याण सिंह से लिया तो वो राज्यपाल के हांथो हो गया ..क्या मजेदार और सुविधाजनक तर्क है ..लगे रहिये कामरेड ,लगे रहिये और ऐसे ही मलाई खाते रहिये ..इसी मलाई ने ही तो तुम लोगों का पतन करा दिया और आज कोई नामलेवा नहीं रह गया पूरे देश में वामपंथियो का…

Umesh Chaturvedi अभिषेक…आपसे ऐसी ही उम्मीद थी….ऐसा आप ही लिख सकते हैं और अवसरवाद की कलई ऐसे शब्दों में आप ही खोल सकते हैं…

Abhishek Srivastava बटोही जी, कंल्‍याण सिंह से थानवी जी का कोई बौद्धिक आदान-प्रदान नहीं हुआ है। पुरस्‍कार मिला है। इसमें बौद्धिक अछूतवाद कहां से आ गया।

Om Thanvi मैंने तब भी उदयजी का पुरजोर समर्थन किया था Shashank Dwivedi, मंगलेश डबराल (ईश्वर से प्रार्थना है वे जल्द स्वस्थ हों) जब संघ से जुड़े एक मंच पर गए और उनकी आलोचना हुई तब भी मैंने इस आवाजाही का समर्थन किया था। मेरा स्टैंड शुरू से साफ है। कहीं और जाकर अगर अपनी बात कही तो अपनी बात का दायरा बढ़ाया ही, अपने लोगों के बीच तो अपनी बात रोज कहते हैं।

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कल्याण सिंह के हाथों पुरस्कार लेने पर ओम थानवी सोशल मीडिया पर घिरे

Neelabh Ashk : मत छेड़ फ़साना कि ये बात दूर तलक जायेगी. ओम तो गुनहगार है ही, हिन्दी के ढेरों लोग किसी न किसी मौक़े पर और किसी न किसी मात्रा में गुनहगार हैं. इस हमाम में बहुत-से नंगे हैं. पुरस्कार पाने वाले की पात्रता के साथ पुरस्कार देने वाली की पात्रता भी देखी जानी चाहिए। ऐसी मेरी मान्यता है. मैंने साहित्य अकादेमी का पुरस्कार लौटा दिया था. मेरी मार्क्स की पढ़ाई ने मुझे पहला सबक़ यह दिया था कि कर्म विचार से प्रेरित होते हैं. 55 साल बाद तुम चाहते हो मैं इस सीख को झुठला दूं. ओम की कथनी और करनी में इतना फ़र्क़ इसलिए है कि सभ्यता के सफ़र में इन्सान ने पर्दे जैसी चीज़ ईजाद की है. ईशोपनिषद में लिखा है कि सत्य का मुख सोने के ढक्कन के नीचे छुपा है. तुम सत्य को उघाड़ने की बजाय उस पर एक और सोने का ढक्कन रख रहे हो. ये ओम के विचार ही हैं जो उसे पुरस्कार>बिड़ला>राज्यपाल>कल्याण सिंह की तरफ़ ले गये. मैं बहुत पहले से यह जानता था. मुझे कोई अचम्भा नहीं हुआ. मैं ओम की कशकोल में छदाम भी न दूं. और अगर यह मज़ाक़ है तो उम्दा है, पर हिन्दी के पद-प्रतिष्ठा-पुरस्कार-सम्मान-लोभी जगत पर इसका कोई असर नहीं होगा.

Dilip C Mandal : एक मित्र पूछ रहे हैं कि क्या मैं योगी आदित्यनाथ या कल्याण सिंह के हाथों कोई पुरस्कार लेता? चूँकि ऐसा कोई अवसर मेरे सामने नहीं आया है, इसलिए कल्पना से ही उत्तर देना होगा। शायद नहीं। भारत सरकार के दो नेशनल अवार्ड मैंने लिए हैं। एक उप राष्ट्रपति हामिद अंसारी के हाथो और दूसरा तत्कालीन केंद्रीय सूचना और प्रसारण राज्य मंत्री जगतरक्षकन साहेब से। एक प्रेस कौंसिल का और दूसरा सूचना और प्रसारण मंत्रालय का। पुरस्कार पाने वाले की पात्रता के साथ पुरस्कार देने वाली की पात्रता भी देखी जानी चाहिए। ऐसी मेरी मान्यता है। मुझे नहीं लगता कि योगी आदित्यनाथ या कल्याण सिंह मुझे पुरस्कार देने के लिए सही पात्र हैं। मुझे नहीं लगता है कि कभी मौक़ा मिला भी तो मैं इनके हाथों पुरस्कार लेना चाहूँगा। अभी तक तो यही सोच है मेरी। मैं अपने लिए कामना करता हूँ कि मुझमें इतना नैतिक बल बचा रहे कि इन्हें मना कर सकूँ। आमीन!

Mohammad Anas : जनसत्ता के पूर्व संपादक श्री ओम थानवी जी द्वारा भाजपा के नेता, उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और बाबरी मस्जिद विध्वंस में शामिल कल्याण सिंह के हाथों अपनी किताब के लिए पुरूस्कार लिया जाना वाकई आलोचना की श्रेणी में आता है। श्री थानवी जी को यह पुरूस्कार एक प्राइवेट संस्था द्वारा दिया गया है, यदि वह न लेने का नैतिक दबाव बनाते तो संस्था कल्याण सिंह के अलावा किसी और से भी उनको यह पुरूस्कार दे सकती थी या फिर बिमारी का बहाना बना कर राजभवन न जाते। करने को वे बहुत कुछ कर सकते थे। ऐसा मेरा मानना है। पर वे ऐसा कुछ करने का साहस नहीं जुटा सके। अफसोस। राज्यपाल बन जाने भर से कल्याण सिंह के पिछले सारे कारनामें धुल गए? राज्यपाल कौन लोग बनाए गए हैं, किसी से छिपा नहीं है। भाजपा के इस फासीवाद को एक गहरा तमाचा होता यदि ओम थानवी कल्याण के हाथों पुरूस्कार लेने से मना कर देते। क्या आप तालिबान के हाथों, अफगानिस्तान के किसी प्राइवेट संस्था का पुरूस्कार लेना पसंद करेंगे? और यह कहते हुए कि मैंने तालिबान को धार्मिक हिंसा पर लेक्चर दिया। लेकिन इसे आधार बना कर आप ऐसे लोगों से सम्मानित होने को न्यायोचित कैसे कह सकते हैं? दिन रात सांप्रदायिकता पर लेक्चर देने वाले लोग जब दंगाईयों के हाथों से सम्मानित होने को बड़े गर्व से प्रस्तुत कर सकते हैं तो फिर हम ऐसे लोगों के पीछे क्यों खड़े हो? ओम थानवी का सम्मान मेरी नज़र में हमेशा से रहा है। यदि वे कल्याण के हाथ से एक लाख रूपए का इनाम लेने से मना कर देते तो मेरी नज़र और उन तमाम लोगों की नज़र में उनकी इज्जत दो लाख गुना बढ़ जाती।

वरिष्ठ पत्रकार नीलाभ अश्क, दिलीप मंडल और मोहम्मद अनस के फेसबुक वॉल से.


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कल्याण के हाथों पुरस्कार लेने का विरोध करने वालों को ओम थानवी ने दुश्मन करार दिया

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Om जी के पास के.के. बिड़ला पुरस्‍कार देने वाले को चुनने की सुविधा नहीं थी!

 

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म.प्र. : एक बार फिर सुर्खियों में सिविल सेवा परीक्षा विवाद

मध्यप्रदेश लोक सेवा आयोग द्बारा आयोजित होने वाली प्रतियोगी परीक्षाएं बिना किसी विवाद के संचालित हो जाएं, यह कई वर्षों से सम्भव नहीं हो पा रहा है। ताजा मामला प्रदेश की सिविल सेवा परीक्षा-2०14 की प्रारम्भिक परीक्षा का है। यह परीक्षा 9 मई 2०15 को सम्पन्न हुई जिसके परिणाम जुलाई माह में जारी हुए हैं। आयोग ने अपनी बेवसाइट पर विभिन्न कटेगरी के लिए ‘कटऑफ’ मार्क्स जारी किए हैं, जिसको लेकर प्रतियोगी परीक्षार्थियों में असंतोष है और उनका दावा है कि उन्होंने आयोग द्बारा घोषित ‘कटऑफ ’ मार्क्स से अधिक अंक हासिल किए हैं, लेकिन आयोग को इससे कोई लेना-देना नहीं है। 

दरअसल, दाल में काला तब ही से नजर आने लगा था, जब आयोग ने परीक्षा की आंसर सीट के साथ कार्बन कॉपी लगाई थी, लेकिन उसे छात्रों को न देकर परीक्षा होने के बाद अपने पास ही रख ली। हास्यास्पद है कि जब यह देना ही नहीं था तो फिर सीट लागाई ही क्यों गई? सीट लगाने के पीछे क्या उद्देश्य हो सकते हैं? दरअसल, विगत वर्षों में लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं में धांधली के आरो लगे हैं जिनकी जांच चल है इसलिए आयोग ने पैंतरा अपनाया था पर कार्बन सीट न देना यह महज दिखावे की ईमानदारी नहीं तो और क्या है? गौरतलब है कि अन्य प्रदेशों मसलन- उत्तराखंड, हिमांचल, राजस्थान जैसे राज्यों में भी कार्बन कॉपी लगाने और परीक्षा के बाद विद्यार्थिंयों को लौटाने का प्रावधान किया है तो सवाल उठता है कि क्या मध्यप्रदेश लोक सेवा आयोग संविधान के अनुच्छेद-315 से परे संचालित है। जो यहां मनमानी से नियम बनाने और उनको अपनी तरह से हांकने छूट मिली हुई है। यहां तक कि यूजीसी और नेट की कई परीक्षाओं में भी आंसर सीट के साथ कार्बन कॉपी लगाई जाती है और परीक्षा के बाद प्रमाण स्वरूप परीक्षार्थी को सौंप दी जाती है ताकि वह परिणाम आने पर अपने को जांच सके कि उसने कितना किया था और कट ऑफ से वह कितने अंक पीछे रह गया। इस तरह परीक्षा में पारदर्शिता अपनाने की व्यवस्थागत जांच स्वत: बनी रहती है। 

बहरहाल, प्रदेश की लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं में विवाद न हो यह सम्भव नहीं। इस बार भी यही हुआ सामान्य ज्ञान और सी-सेट की प्रश्न पत्रों में कुछ सवाल विवादित होने से उन्हें दो बार मान मनौव्वल के बाद विलोपित तो किया गया, लेकिन साथ ही सामान्य अध्ययन के तीन प्रश्नों के उत्तर भी बदल दिए गए। आयोग के सचिव मनोहर दुबे का कहना है कि हम उत्तरों का निर्धारण एक्सपर्ट से कराते हैं और ये तीनों प्रश्नों के उत्तर उसने एक्पर्ट की राय से बदले गए हैं। प्रारम्भिक परीक्षा में जहां एक-एक प्रश्न से हजारों छात्र चयनित होने से वंचित रह जाते हैं, तो फिर तीन प्रश्नों के उत्तर जिन्हें पहले आयोग ने सही माना था और विद्यार्थियों की राय में सही भी हैं, लेकिन उत्तरों में बदलाव पर आयोग का अड़ियल रवैया किसी की एक सुनने को तैयार नहीं। 

गौरतलब है कि वर्ष-2०13 की प्रारम्भिक परीक्षा के समान्य ज्ञान के प्रश्न-पत्र में भी एक प्रश्न ऐसा था जिसका उत्तर आयोग के कथित एक्सपर्ट ने प्रदेश की ऊर्जा राजधानी जो कि सिंगरौली है को इंदौर माना था। प्रदेश की ऊर्जा राजधानी जिसे मुख्यमंत्री, सरकारी आंकड़ों में और सामान्य जन तक जानता है कि वह सिंगरौली है। बाद में यह प्रश्न को ठीक करने के बजाय इसे विलोपित करके आयोग ने लीपापोती करने की कोशिश की थी। आयोग के एक्सपर्ट कैसे हैं इसका अंदाजा सहज लगाया जा सकता है। बीते कई वर्षों से आयोग की गतिविधियों को लेकर लगने लगा है कि आयोग अयोग्यों का गढ़ बनता जा रहा। 

हाल यह है कि कई छात्र हैं जिन्हें अपने चयन की जारी ‘कटऑफ’ सूची के मुताबिक है, लेकिन वे इससे बाहर हैं। यह सवाल प्रदेश के मीडिया में उठा है, लेकिन ज्यादा समर्थन न मिल पाने से बड़ा नहीं बन पाया। यदि कार्बन कॉपी दी गई होती तो पहले यह होता कि सभी छात्र अपनी उत्तर सीट को आयोग की उत्तर सीट से मिलान कर सकते थे। दूसरा बड़ा सवाल है वह आयोग की कार्यशैली को लेकर है कि जिन उत्तरों को बदला गया है क्या वे पहले तुक्के में जारी कर दिए गए थे?

अलबत्ता, यह कोई नई बात नहीं है कि आयोग का विवादों से गहरा नाता रहा है। गौरतलब है कि पहले से ‘प्री’ और ‘मुख्य परीक्षा’ के पेपर बेचने के आरोप और उसकी जांच के चलते वर्ष 2०12 की मुख्य परीक्षा के परिणाम, साक्षात्कार न होने के वजह से लटके हुए हैं। क्या सरकार की यही संवेदनशीलता है कि वह अपनी मेहनत से रात दिन एक कर तैयार करें और संस्थाओं की कारगुजारियों के चलते छात्र दर-दर की ठोकरें खाते रहें और अपनी मनमानी पर उतारू रहे। व्यापमं मसले में वैसे भी कई योग्य छात्रों की प्रतिभा का हनन हो चुका है। ऐसे में भी आयोग इन लापरवाहियों से सबक कब लेगा चिंता का विषय है। लोकतंत्र में चाहे सरकार हो अथवा संवैधानिक संस्थाएं दोनों की जबावदेही अवाम के प्रति है जिसका संज्ञान यहा बैठे साहबानों को होनी चाहिए।

श्रीश पांडेय से संपर्क : smspandey@gmail.com

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इबलीस की शैतानी ताकत के खिलाफ एकजुट हों आध्यात्मिकतावादी

केरल के बाद अब दिल्ली में भी मैगी की बिक्री को पंद्रह दिन के लिए प्रतिबंधित कर दिया गया है। उधर सेना ने भी अपने डिपार्टमेंटल स्टोरों से मैगी की बिक्री पर रोक लगा दी है। मैगी को लेकर जबरदस्त हंगामा मचा हुआ है। इसकी शुरूआत उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जनपद से हुई जहां मैगी के नमूने प्रयोगशाला में परीक्षण के लिए भेजे गए थे जिसमें यह रिपोर्ट आई कि मैगी में जस्ते की मात्रा सुरक्षा मानकों से काफी ज्यादा है। इसके बाद उत्तर प्रदेश के अन्य जिलों में और साथ ही दूसरे राज्यों में भी ताबड़तोड़ मैगी के नमूनों का परीक्षण कराया गया। लगभग सभी जगह अभी तक की रिपोर्ट के अनुसार मैगी के नूडल्स को खाना स्वास्थ्य के लिए हानिप्रद माना गया है। हालांकि बंगला देश ने मैगी को क्लीन चिट दे दी है। 

बहरहाल मैगी विवाद को लेकर एक बात सामने आई है कि आज प्रोपोगंडा की मशीनरी इतनी ताकतवर हो गई है कि समाज ने अपने विवेक पर ताला लगाकर उसकी कुंजी जैसे समुद्र में फेक€ डाली है जिसकी वजह से संचार और प्रचार माध्यम जिसे फैशन के रूप में स्थापित कर दें उसका अंधानुकरण होना अनिवार्य है। यहां तक कि खानपान के मामले में भी एहतियात नहीं बरता जाता। इस भेड़चाल के चलते खास तौर से भारतीय समाज को व्यापक नुकसान हो रहा है। बिगड़ते सिस्टम का मैगी विवाद तो केवल एक सिरा है लेकिन संपूर्णता में विचार करें तो इस अनर्थ की व्यापकता का कोई छोर नहीं है।

मानवीय विवेक को पंगु करने वाले प्रोपोगंडा तंत्र के पीछे मुनाफे की लूट करने वाली बाजार व्यवस्था है। बाजार का सबसे बड़ा दुश्मन संस्कृति है। इस कारण संस्कृति का निर्माण खानपान, पहनावे सहित जिन घटकों से मुख्य रूप से होता है बाजार उन्हें सबसे पहले अपने शैतानी रंग से संक्रमित करता है। दरअसल उच्छृंखलता एक तरह की उन्मुक्तता ही है लेकिन दोनों के बीच काफी बड़ा फर्क भी है। बुनियादी तौर पर जंगलीपन के मायने है आदिम उच्छृंखलता या उन्मुक्तता। आदमी जब इस जंगलीपन से संस्कृति के जरिए आगे बढ़ा तभी उसने सभ्यता के ऊंचे सोपानों पर कदम रख पाया। कहने की जरूरत नहीं है कि संस्कृति निर्माण की प्रक्रिया आदमी द्वारा अपने व्यवहार, लिप्सा आदि को संयमित करने की साधना के बीच शुरू हुई। दूसरी ओर बाजार के विस्तार के रास्ते में सबसे बड़ी रुकावट किसी भी तरह का संयम है इसलिए गौरव के प्रतिमान के रूप में सदियों से स्थापित संस्कृति को विगलित करके बहा देना बाजार के सैलाब का अभीष्ट भी है। सभी जगह खानपान वहां की जलवायु प्राकृतिक रूप से उपलब्ध भोज्य संसाधनों के आधार पर अस्तित्व में आया है। परंपरागत खानपान न केवल निरापद है बल्कि वह अपने क्षेत्र में स्वास्थ्य संवद्र्धन के लिए भी अनुकूल है लेकिन यह बाजार का कमाल है कि जब वह विवेक का अपहरण कर लेता है तो बाजार फैशन के आकर्षण में लपेट कर ऐसे खानपान को दूसरे समाजों पर थोप देता है जो उसके लिए तो ज्यादा से ज्यादा मुनाफादेह हैं लेकिन हो सकता है कि एक जगह की अच्छी खाद्य सामग्री दूसरी जगह जीवन पर विपरीत प्रभाव डालने वाली बन जाए। कभी-कभी अपरिचित खाद्य सामग्री को इसलिए थोपा जाता है कि स्वाद में वह बहुत प्रीतिकर लगे लेकिन इसकी आड़ में उसमें बहुत सस्ते घटिया सामान की मिलावट करने की गुंजायश रहे जिससे उसे कई गुना मुनाफा बटोरने का हथियार बनाया जा सके। मैगी ही नहीं जंक फूड भी बहुत हानिकारक है। खुद विकसित देशों में इन पर प्रतिबंध लगता जा रहा है लेकिन यहां के अभिभावक अपने बच्चों को आधुनिक बनाने के लिए उन्हें जंक फूड का अभ्यस्त बनाना अनिवार्य समझने लगे हैं। बाबा रामदेव ने कुछ वर्ष पहले साफ्ट ड्रिंक के खिलाफ सशक्त अभियान चलाया था तब पहली बार लोगों ने आज के समय में खानपान में अपने विवेक के प्रयोग की जरूरत महसूस की थी। बाबा रामदेव के कारण कोल्ड ड्रिंक बेचने वाली कंपनियां इतनी बुरी तरह हिल गई थीं कि बाबा की हत्या तक का षड्यंत्र किया जाने लगा था। बाद में बाबा राजनीतिक महत्वाकांक्षा के शिकार होकर अपने रास्ते से भटक गए और जिसकी वजह से आज फिर कोल्ड ड्रिंक कंपनियों का मोहपाश सशक्त होने लगा है। बाबा रामदेव के जोर के समय लोग कोल्ड ड्रिंक के विकल्प में फिर से अपने परंपरागत पेय यानी मट्ठे की तरफ मुड़ गए थे जो वास्तविक शीतलता प्रदान करने के साथ-साथ सेहतमंद भी है लेकिन दुर्भाग्य का विषय है कि मट्ठा को अपनाने में अब नई पीढ़ी में पहले जैसा उत्साह नहीं रह गया। यही बात पहनावे में भी है। स्त्री स्वातंत्रय के नारे को आड़ बनाकर वैज्ञानिक और सांस्कृतिक रूप से घातक पहनावे को बाजार भारतीय समाज पर थोप रहा है। खेल के क्षेत्र में क्रिकेट के प्रति उन्माद लोगों के उसके प्रति स्वाभाविक प्रेम का नतीजा नहीं है। बाजार ने क्रिकेट को एक दैवीय खेल के रूप में गढ़ा है जबकि जलवायु के हिसाब से भारत जैसे देश के लिए बेहद प्रतिकूल होने से यह खेल पूरी तरह से अमान्य होना चाहिए। कोई देश किसी खेल का चुनाव अपने यहां के लोगों के शारीरिक सौष्ठव के विकास के लिए करता है। जैसे चीन और सोवियत संघ में जिमनास्ट को दिया जाने वाला प्रोत्साहन लेकिन बाजार की भेड़चाल के पीछे चलने के लिए अभिशप्त भारत खेल के मामले में अपने गलत फैसले की वजह से जन स्वास्थ्य के लिए मुफीद पहलवानी, कबड्डी, हाकी जैसे परंपरागत खेलों का परित्याग कर चुका है। क्रिकेट के समानांतर असली खेल सट्टे का चलता है। यह दिन पर दिन इतना जोर पकड़ता जा रहा है कि आज जब आईपीएल चलता है तो दूरदराज के गांव तक में सट्टेबाजों के यहां लाखों रुपए की बुकिंग करा दी जाती है। सट्टा यानी जुए का दूसरा रूप और जुआ कितना अनर्थकारी है यह भारत के लोगों के अलावा कौन जानता है। दुनिया में पहला साम्राज्य भारत में हस्तिनापुर का बना था और यह पूरा साम्राज्य जुए की वजह से हुए महाभारत की भेंट चढ़ गया जिसमें सारे तत्कालीन महारथी योद्धा वीरगति को प्राप्त हो गए। फिर भी भारतीय इस खतरे को लेकर सावधान नहीं हैं। यह आश्चर्य का विषय है। इस तरह से कई क्षेत्रों में बाजार के द्वारा की जाने वाली चोट के उदाहरण गिनाए जा सकते हैं जिनका मुख्य लक्ष्य सांस्कृतिक तानेबाने को कमजोर करना यानी नैतिक रूप से समाज को पथ भ्रष्ट करके कुछ सोफिस्टीकेटिड ढंग से आदमी को जंगलीपन के युग में वापस लाना है।

मैगी को लेकर कुछ फिल्मी हस्तियों के खिलाफ भी मुकदमे कायम हुए हैं जिनमें मिलेनियम स्टार अमिताभ बच्चन भी शामिल हैं जिनको उनके प्रशंसक उनके नाम के मंदिर बनवाकर भगवान तक का दर्जा दे चुके हैं। क्या श्री अमिताभ बच्चन की अभिनय कला सचमुच ऐसी है कि वे बालीवुड में अभिनय के बेताज बादशाह के रूप में माने जाने वाले दिलीप कुमार, संजीव कुमार और नाना पाटेकर के ही मुकाबले बीस हों। इस प्रश्न का उत्तर सही तरीके से तभी दिया जा सकता है जब कि समाज में लोगों का विवेक जाग्रत हो। अमिताभ बच्चन के पिता की नेहरू परिवार से नजदीकी के कारण अगर इंदिरा गांधी के समय चौदह फिल्में पिट जाने के बावजूद भी उन्हें पीएमओ के दबाव से बार-बार अवसर न मिले होते तो शायद वे हीरो बनने का सपना छोड़कर शुरू में ही भाग खड़े होते। उनमें राजेश खन्ना की तरह वो कुदरती दिलकश अंदाज नहीं था जिसकी वजह से लोग उनके दीवाने होते। सही बात यह है कि उनके सुपर स्टार बनने में मुख्य कारक उनके व्यक्तित्व का आकर्षण या अभिनय न होकर उनके बालसखा राजीव गांधी के प्रधानमंत्री बन जाने के बाद सत्ता के शिखर पर उनके पैर मजबूती से जमे होने का आभास था। वे कांग्रेस के मुख्यमंत्रियों तक को चपरासी की तरह ट्रीट करते थे और उनकी यह सुपर हस्ती मनोवैज्ञानिक तौर पर लोगों में उन्हें सुपर स्टार के रूप में देखने की भावना का कारण बनी। व्यक्तिगत रूप से भी अमिताभ बच्चन सुनील दत्त तो छोडि़ए शत्रुघन सिन्हा से भी बेहतर नहीं हैं। जब वे इलाहाबाद के सांसद थे तो उनसे मिलने गए उनके पिता के साथी प्रोफेसरों को उनका जो अपमानजनक व्यवहार झेलना पड़ा था उसके बाद इलाहाबाद विश्वविद्यालय शिक्षक संघ ने फिर उनसे कभी भेंट न करने की प्रतिज्ञा कर ली थी। मीडिया की तत्कालीन रिपोर्टें इसकी गवाह हैं। एबीसीएल घोटाले का कलंक भी उन पर है जिसमें हीरो बनने के शौक में देश के करोड़ों नौजवान उनकी ठगी का शिकार हुए थे और आज तक हीरो बनने के लिए उनसे जमा कराए गए ड्राफ्ट का पैसा वापस करने का बड़प्पन अमिताभ बच्चन ने नहीं दिखाया है। बीपीएल के साथ विज्ञापन का पच्चीस करोड़ रुपए का करार करने के बाद उन्होंने देश में इनकम टैक्स भरने से निजात पाने के लिए अमेरिका की ग्रीन कार्ड नागरिकता स्वीकार कर ली थी। यह भी उनके व्यक्तित्व के घटियापन का एक नमूना रहा। जिन सोनिया गांधी का अमिताभ बच्चन ने भाई की हैसियत से कन्यादान लिया था उन्हें राजनीति के मैदान में न आने देकर भारत से सपरिवार पलायन कर जाने को मजबूर करने का ठेका भी उन्होंने मुलायम सिंह जैसे लोगों से ले रखा था। बाद में जब पोल खुली और उनके स्व. सुरेंद्र नाथ अवस्थी जैसे शिष्यों के खिलाफ कांग्रेस में कार्रवाई हुई तो अमिताभ बच्चन अपनी धर्म बहन के खिलाफ खुलेआम हमलावर होने से नहीं चूके। बाराबंकी के उनके जमीनी कागज तैयार कराने संबंधी घोटाले से भी सब परिचित हैं। संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार में जब उन्होंने यह स्यापा मीडिया में साया करवाया कि वे जब अस्पताल में भर्ती थे तब उन्हें सोनिया गांधी द्वारा निर्देशित सरकार ने आयकर का नोटिस भिजवाया। इसके बाद आयकर बोर्ड के अध्यक्ष का स्पष्टीकरण आया कि उनके अस्पताल में भर्ती होने के कई महीने पहले करापवंचन के बेहद तथ्य परक संदेह की वजह से उन्हें नोटिस भेजा गया था जिसका उन्होंने जवाब देने की जहमत नहीं उठाई थी और जब वे अचानक बीमार हो गए तो लोगों की सहानुभूति लूटने के लिए आज बीमारी के समय सोनिया गांधी द्वारा नोटिस भिजवाने का सफेद झूठ उन्होंने गढ़ डाला। अमिताभ बच्चन इसका खंडन नहीं कर पाए थे। अमिताभ बच्चन अपनी अभियन कला में निखार के लिए जिनकी कद्रदानी को सबसे अमूल्य मानते हैं वे पहलवान से शिखर के राजनेता बने मुलायम सिंह हैं जिन्होंने शायद तब तक कोई फिल्म नहीं देखी होग जब तक कि वे एक दो बार उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री नहीं बन चुके होंगे। सर्वश्रेष्ठ फिल्म मर्मज्ञ के रूप में मुलायम सिंह उनके प्रति कृतज्ञ हों या न हों लेकिन फिल्म जगत की बारीकियां जानने वाले जरूर उनकी इस दरियादिली पर निसार हो गए होंगे। जब कुली फिल्म की शूटिंग के दौरान वे एक स्टंट शूट के दौरान घायल हो गए थे तब उनके लिए दुआ करने वालों में सबसे ज्यादा देश भर के मुसलमान थे और मुस्लिम दर्शकों की दीवानगी की वजह से ही उन्हें सुपर स्टार का तमगा हासिल हो सका था। इसी कारण वे आगे की फिल्मों में मुस्लिम दर्शकों की संवेदनाओं को छूने वाले दृश्य डलवाना कभी नहीं भूलते थे लेकिन मोदी के पिट्ठू बनकर अपने व्यवसायिक फायदे के लिए उन्होंने मुस्लिम जज्बातों के साथ खिलवाड़ करने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी। अमिताभ बच्चन की विश्वसनीयता का आलम यह है कि उन्होंने मैगी तो हो सकता है खाई हो लेकिन न तो उन्होंने कभी नवरत्न तेल होगा और न वे लगाएंगे और इसी तरीके से कायमचूर्ण तो उन्होंने देखा तक न होगा लेकिन दोनों का वे विज्ञापन कर रहे हैं। भले ही उनकी साख के कारण प्रेरित होने वाले उपयोग कर्ता इनका उपयोग करके बर्बाद हो जाएं। अरुण शौरी ने बाबा साहब अंबेडकर जैसी दिव्य आत्मा को झूठा भगवान ठहराने की कोशिश की थी जिसकी सजा अपनी ही सरकार में कोई पद न मिलने से सामने रही उनकी कुंठा से मालूम हो रही है लेकिन अगर कोई नकली भगवान है तो यह अमिताभ बच्चन है। आज जब उनके खिलाफ मुजफ्फरपुर बिहार की अदालत ने माधुरी दीक्षित और प्रीति जिंटा के साथ मैगी का विज्ञापन करने के कारण न केवल मुकदमा दर्ज करने के आदेश दिए हैं बल्कि यह लिखा है कि अगर जरूरत पड़े तो उन्हें जेल भी भेज दिया जाए तो यह सवाल उठाने का इस समय सही वक्त है कि जिसका चरित्र व आचरण शुरू से ही संदिग्ध था उसे लोगों ने भगवान मान कैसे लिया था। यह करिश्मा है इबलीस का अवतार उस प्रोपोगंडा मशीनरी का जो उन कंपनियों की बंधक है जिनके अमिताभ बच्चन ब्रांड एंबेसडर हैं। चूंकि इन कंपनियों के विज्ञापन से ही मीडिया की रोजीरोटी चलती है इसलिए अगर यह कहेंगे कि अमिताभ बच्चन को सिद्धिविनायक मंदिर जाते हुए रात तीन बजे कवर करना है तो रिपोर्टरों का जाना मजबूरी है क्योंकि उन्हें अपनी नौकरी बचानी है और मालिक का आदेश है और यह काम उनको अमिताभ बच्चन के गार्डों से लातें खाते हुए भी करना पड़ता है। ऐसे एंद्रजालिक भगवान जहर का भी विज्ञापन कर सकते हैं और लोग विश्वास कर लेंगे क्योंकि प्रोपोगंडा मशीनरी के सम्मोहक प्रभाव की वजह से उनकी विवेक शक्ति जवाब दे चुकी है। विवेक शक्ति के जवाब देने की मुख्य वजह यह भी है कि जातिगत पूर्वाग्रहों की वजह से उन्होंने कुदरती तौर पर प्राप्त न्याय भावना जिसे प्राकृतिक न्याय कहा जाता है को अपने आप में समाप्त कर लिया है। इस कारण यह एक कठिन समय है। इस समय जरूरत तो तालिबान जैसी जिद की है जो अमेरिका जैसी साम्राज्यवादी ताकतों की हर बात को नकारे बिना यह सोचे कि इससे कुछ फायदा भी है या नहीं। तालिबान की यह जिद बेहद रचनात्मक बन गई है क्योंकि साम्राज्यवादी ताकतों का कोई नैतिक उद्देश्य नहीं है। तात्कालिक तौर पर किसी नैतिक उद्देश्य की पूर्ति हो भी रही हो तो साम्राज्यवादी ताकतों द्वारा पोषित तंत्र की जरूरत अंततोगत्वा आदमी के जंगलीपन को वापस लाना है जिसे किसी भी आध्यात्मिक सांस्कृतिक समाज को स्वीकार नहीं करना चाहिए।

यहां मैं कोई राजनीतिक पार्टी से नहीं चाहता। दक्षिणपंथी ताकतें जो कि सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की प्रवक्ता हैं मैं चाहता हूं कि वे और तालिबानी ताकतें दोनों साहचर्य के स्वाभाविक रूप से उपस्थित बिंदुओं को समझें। नारा देने से सांस्कृतिक राष्ट्र्रवाद नहीं होता उसके लिए क्रिया और प्रक्रियाएं तय करनी होती हैं। वे क्या हो सकती हैं यह आलेख मैगी से शुरू हुआ था यानी थोपे हुए ऐसे खानपान जिसमें औचित्य का विचार न किया गया हो। उसके प्रतिकार न करने से हुए हानि के चलते। हमारा अपना वजूद है कोई हमारे ऊपर किसी चीज को कैसे थोप सकता है। जिस तरह से पंजाबियों ने अमेरिका के सेविन स्टार होटल की प्रमुख डिसों में मक्के की रोटी, चने का साग स्थापित करके देश का गौरव बढ़ाया वैसे ही उत्तर प्रदेश के लोगों को भी कहना होगा कि हमें मैगी, मोमोज, पिज्जा, बर्गर, ढोकला नहीं चाहिए क्योंकि हमारी बिड़हीं, टपका, चीला, मिथौरी, आम पापड़ जैसे व्यंजन दुनिया की किसी भी डिस से ज्यादा बेहतर हैं और हमें यही चाहिए। हमें कहना होगा कि हमारे परंपरागत परिधान हिंदुओं का कुर्ता पाजामा या धोती कुर्ता और मुसलमानों की पठानी ड्रेस दुनिया में सबसे सौंदर्यपूर्ण है। हमें कहना होगा कि भारतीय मुसलमानों और कन्याभोज करने वाले भारतीय हिंदुओं के लिए नाबालिग लड़कियों की अस्मिता की रक्षा से बड़ा कोई ईश्वरीय कर्तव्य नहीं है इसलिए हम मांगलिक समारोह में कन्याओं से साफ्ट ड्रिंक सहित कोई भी चीज सर्व कराने की हरकत गवारा नहीं करेंगे। हमें बिना धार्मिक भेदभाव के भारतीय उप महाद्वीप के धर्म के पार के कुदरती भाईचारे के नाते यह देखना होगा कि कहीं मलाला साम्राज्यवादी ताकतों द्वारा इस्तेमाल की जाने वाली लड़की तो नहीं है जो ऊपरी तौर से तो स्त्री सशक्तिकरण की प्रतीक लग रही हो लेकिन असल में बाजार की स्त्री देह को सामान बेचने का हथियार समझने वाली मानसिकता की टूल हो। साम्राज्यवादी ताकतों ने संस्कृतिवादियों को बहुत लड़ा लिया अब इसका अंत हो और दुनिया की सारी आध्यात्मिक और संस्कृतिवादी ताकतें एक जुट हों।

केपी सिंह से संपर्क : bebakvichar2012@gmail.com

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मुकेश ने एफबी पर हुई कुछ चैट सार्वजनिक कर दोष ऋचा पर भी मढ़ा, बाद में ‘सॉरी’ बोल दिया

Mukesh Kumar Sinha : ऋचा से मेरी पहले कभी बात नहीं हुई. शुरुआत उसने की कविता शेयर करने से लेकर और फिर उसने बातों को मोड़ा. मैं कन्फर्म हो गया एक फेक प्रोफाइल है इसलिए अंत उसके अनुसार हुआ.

(चैट पढ़ने के लिए उपरोक्त पिक्चर पर क्लिक कर दें.)

उपरोक्त स्टेटस के बाद मुकेश कुमार सिन्हा का ताजा स्टेटस ये है, जिसमें उन्हें सॉरी लिखकर अपनी गलती के लिए माफी मांगी है…

उपरोक्त दोनों स्टेटस पर जनता की मिलीजुली प्रतिक्रिया कुछ यूं है…

Ila Varma Aisa kaam Kara hi kyu

सोनाली मिश्रा शोधार्थी-इग्नू वाकई ऐसा काम किया ही क्यों?

Anita Singh किस बात का sorry

Robin Singh sambhav hai ,tag ,kar ke kaho jiske tum apraadhi ho … ye to aap kee kavita ka ans jaisa lag rahaa hai …

Rajeev Bhutani गलती तो गम्भीर हो गई —

Kumar Gulshan Anant Sorry की जरूरत ही क्या है सर जब फेक प्रोफाईल था…

Anjana Dutta sry मैं आपको unfrnd कर रही हूँ

Saurabh Jha dost sharminda hone ki jarurat nhi hai.. Shudhar sakte hai to shudhar jaiye bus…frown emoticon

Shahnawaz Khan कोई गलतफहमी हुई है

Lakshmi Sharma फेक आई डी है तो सॉरी क्यों । पहले सच तो सामने आए

Saurabh Jha n galti akele inki nhi hai.. aap inka post pade,,, Agar bandi frank ho rhi hai to fir walmiki v fisle the ye to Mukesh g hai…grin emoticon

Aparna Anekvarna I appreciate this step.. take care.

Abha Khare Aap hamare mitra the aur rahenge hamesha ….

Veeru Sonker मुकेश भाई आपको शर्म आनी चाहिए ! बाकि और ज्यादा कुछ कहने का मन नहीं है id के असली नकली होने से आप का गुनाह कम नहीं होता !…See More

Lakshmi Sharma लेकिन इस प्रकरण में रश्मि की चेट भी ध्यान देने की बात है। उसके स्क्रीन शॉट भी देखे मैंने। मैं यह नहीं कहती कि उस से मुकेश जी सुर्खरू हो जाते हैं लेकिन उससे ये स्पष्ट हो रहा है कि चेट में हम लोगों को भी सामने वाले को किसी गलत या खुश फहमी का मौका नहीं देना चाहिए

आकाँक्षा सेठ आपको दादा कहती हूँ…बुरा लगा बहुत

Vani Geet क्या हुआ !!??

सुनीता शानू अरे क्या हुआ भाई किस बात की सॉरी बोल रहे हो?

सुभाष शर्मा कोई गल नहीं। पश्चाताप कर लिया बहुत है। मेरे मन में आपके लिए पहले जैसा ही सम्मान है।

Neeta Mehrotra आप मित्र और छोटे भाई हैं मेरे …… और सदा रहेंगें।

Priyanka Om sorry kyu keh rahe aap?

सुशीला शिवराण श्योराण अगर fake id है तो kiss की उम्मीद किससे थी मुकेश जी?

Nanda Pandey तुम हमारे अपने हो और रहोगे हमेशा

Anjani Kumar कोई बात नहीं…!

Samar Anarya एक स्त्री के बार बार मना करने पर भी ‘किस’ माँगने की बेशर्मी के बाद ‘सॉरी’ बोलते हुए घटना का जिक्र भी नहीं? झूठा सॉरी है फिर यह।

सुशीला शिवराण श्योराण Abha Khare कल कोई तुमसे जबरन kiss माँगेगा और हम उसे मित्र बनाए रखेंगे? तुम्हारे निर्णय से हैरान हूँ। flirting का साथ दे रही हैं आप?

Puneeta Chanana What happened? Don’t understand.

सुशीला शिवराण श्योराण Neeta Mehrotra जी छोटे भाई को kiss प्रकरण पर कुछ नहीं कहेंगी?
धन्य हैं आप दिदिया!
ऐसे ही छोटे भाई तैयार कीजिए ताकि कल बहुत सी दामिनी नंगी सड़क पर पड़ी मिलें हो सकता है उनमें से कोई आपकी बहन-बेटी भी निकल जाए!
कैसी फ़सल उगा रही हैं आप?
क्या काटेंगी?

Sandeep Sharma First identify truth …. meantime preference to sorry .

Samar Anarya और आपकी कमेंट से थोड़ा हतप्रभ हूँ Lakshmi.. स्त्री पुरुष संबंधों में चुहल कह लें, फ़्लर्टिंग कह लें, वह भी होता ही है। कितनी दोस्तों को जानेमन कहके पब्लिक पोस्ट लगाता रहता हूँ मैं, आपने तो देखें हैं सारे! लेख भी। पर बिना सहमति के नहीं। रश्मि ऋचा सिंह की बात में वह चुहल दिख रही है पर फिर ‘किस’ माँगने का सीधा नकार भी। और इन जनाब ने ठीक पहले का हिस्सा ग़ायब कर दिया है जहाँ वह पहले से ब्लाक की धमकी दे चुकी हैं। सो पहले कुछ रहा भी हो तो भी न का मतलब न ही होता है न? पर ये साहब तो अड़े हुए हैं।

सीमा संगसार अब तो मैं आपको सौरी बोल रही हूँ—-

Lakshmi Sharma तुम्हारा हतप्रभ होना स्वाभाविक है Samar लेकिन मेरी बात को तुम दूसरे नज़रिये से समझो जहां लोग लिफ्ट लेने को आकुल व्याकुल बैठे रहते हैं। मैं सिर्फ ये कह रही हूँ कि मर्दों के (इसे भी सामान्यीकृत कर के पढ़ा जाए) इस समाज में बिना ठीक से परिचित हुए बात करने का कुपरिणाम से ही सचेत करना चाहती हूँ मैं। तुम जब किस या जानेमन कहते हो तो सरे आम साफ मन से उस को कहते हो जिसका विश्वास तुम्हें मिल चुका है। बिना जाने तो तुम नहीं कहोगे इतना मैं तुम्हे जानती हूँ। और सबसे ऊपर मैंने लिखा न कि मेरे इस पक्ष से मुकेश सुर्खरू नहीं हो जाते। उनकी गलती अक्षम्य है

Samar Anarya बिलकुल ठीक बात है Lakshmi, पर आकुल बैठे लोगों को भी लड़की के न बोलने पर चला ही जाना चाहिये! ये तो मान ही नहीं रहे हैं।

Aanchal Singh Dono kasurvar hai …aur maafi khud se mangiye ki bhavisya mai dobara aisi galti na ho …….

Lakshmi Sharma हाँ यहाँ मैं तुमसे सहमत हूँ Samar । ये नहीं मान रहे तो ये एक्सपोज हों बहिस्कृत हों और ऋचा इनके विरुद्ध शिकायत दर्ज़ कराए। हम साथ हैं

सोनाली मिश्रा शोधार्थी-इग्नू अगर मैं कहूं तो थोड़ी बहुत चुहल तो चलती है पर ये? सार्वजनिक जीवन में सावधान होकर चलने की आवश्यकता होती है.

Neha Agarwal Soory mai bhi aapko unfriend kar rahi hu.

Samar Anarya थोड़ी बहुत नहीं, जितनी हो जाये कुछ बुरा नहीं सोनाली अगर सहमति से हो। पर इनके स्क्रीनशॉट्स से साफ है कि मना करने पर भी अड़े हुए हैं, मुझे वह सबसे ज़्यादा खटक रहा है।

Lakshmi Sharma जब तक ये प्रकरण चल रहा है अनफ्रेंड कर के किसका हित होगा ये सोच के अन फ्रेंड करें

सोनाली मिश्रा शोधार्थी-इग्नू जी, और फिर इस तरह से सार्वजनिक करना, अगर दो लोगों के बीच की बात थी, तो उसे आपस में सुलझा लेना चाहिए, ऐसे आरोपों के कीचड से खुद का दामन ही दागदार होगा

Ruchi Bhalla दोनों ही मेरी मित्र सूची में हैं …. रश्मि कुछ दिन हुए और मुकेश एक साल से भी ज्यादा । दो – एक बार हमिंग बर्ड के सिलसिले में उनसे फोन पर बात हुई है। जब आज ये पोस्ट देखी .. तो मैं खुद को रोक नहीं सकी फोन करने से … सिर्फ एक सवाल किया मैंने … ये क्या है मुकेश और
उनका जवाब था … मेरी गलती थी।
मैंने कहा …. आप जब दिल से मान रहे हैं और कह रहे हैं …
तो कह दीजिए वाल पर सारी ….
उन्होंने कहा है दोस्तों …. खुद से …
दिल से….

Samar Anarya @Ruchi Bhalla- पर माफी तो उससे माँगी जाती है जिसका दिल दुखाया हो, जिसे नुक़सान पहुँचाया हो।

Samar Anarya और ये जरा भी ईमानदार हैं तो उन्हें किस के ठीक पहले वाली चैट सार्वजनिक करनी चाहिये क्योंकि साफ है कि रश्मि ने उसी पर ब्लाक की धमकी दे दी थी Lakshmi, सोनाली। पर ये अड़े रहे। हाँ अमित्र करने का कोई फ़ायदा नहीं पर जो चाहे, ख़ासतौर पर स्त्रियाँ उन्हें पूरा हक है।

सुशीला शिवराण श्योराण सोनाली मिश्रा शोधार्थी-इग्नू जी पुरुष के अमर्यादित और कामुक व्यवहार से स्त्री का दामन दाग़दार कैसे हुआ भला? हैरान होती हूँ जब उच्च शिक्षितों को ऐसे अविवेकी, तर्कहीन विचार प्रकट करते हुए देखती हूँ ! गलती पुरुष करे शर्म स्त्री को आए ! शिक्षा और ज्ञान प्राप्त करके भी हम दोषी को नहीं भुक्तभोगी को दोष देते हैं !!!!! If education can’t teach us to think logically and to be righteous…..then what is the difference between the educated people and illiterates ?

सुशीला शिवराण श्योराण Ruchi Bhalla जी शुक्रिया आपने कुछ प्रकाश तो डाला । अपने मित्र से कहिए जिसके कसूरवार हैं उससे माफ़ी माँगें।

सोनाली मिश्रा शोधार्थी-इग्नू मैंने दोनों के बारे ये कहा था, मेरा अभिप्राय कतई भी एकतरफा नहीं था, हां हो सकता है बात sसही से नहीं कह सकी सुशीला जी

Anju Choudhary फेक id के लिए इतना बवाल….कोई ये क्यों नहीं समझ रहा कि ये मुकेश को बदनाम करने के लिए रची गई सोची समझी साजिश भी हो सकती है |कुछ दिन पहले मैंने भी एक पोस्ट डाली थी कि यहाँ फेसबुक पर बहुत से पुरुष औरतों के नाम रख कर घूम रहे हैं और अपने ही दोस्त (पुरुष ही) उनकी हर पोस्ट पर वाह..वाह करते नज़र आते हैं ……..इस बेकार के बवाल का कोई मतलब ही नहीं है और सॉरी कहना तो बनता ही नहीं है |

Mukesh Sharma मुकेश जी बहुत विस्फोटक स्वरूप हो चुका है यह प्रकरण । कुछ समझ नहीं आ रहा है ।

Niharika Neelkamal Arora gasp emoticon gasp emoticon gasp emoticon gasp emoticon gasp emoticon gasp emoticon

Archana Kumari चाहे कुछ भी हुआ हो सतर्क और सचेत आपको ही रहना था अपनी छवि,गरिमा और सम्मान के लिए। कहीं न कहीं चूक तो आपसे ही हुई। आग को हवा नहीं,पानी देते हैं कि घर जलने से बच जाए। अब इन सबका क्या फायदा,जो नुकसान होना था हो चुका। कोई बीमा पाॅलिसी नहीं है।

Nanda Pandey कैसे पड़ गए पचड़े में तुम ……

Alpika Jaiswal कुछ समझ ही नही आरहा हमे तो

डॉ. अपर्णा त्रिपाठी वो id fake नहीं है. जो भी है शर्मनाक है. दोनों ही तरफ़ से. कोई एक नहीं दोनों ही बराबर के अपराधी.

निर्गुण मनीषा हाँ दोनों की गलती है !

Bhuwan Gupta किस चक्कर में हो बाबूजी ???

Anjana Dutta नाम आपने ऋचा लिखा इनबॉक्स में रशिम कह रहे है चक्कर क्या है मुकेश बाबू

डॉ. अपर्णा त्रिपाठी रश्मि ऋचा की पोस्ट देखिये. क्या आप kiss मांगते हुए शोभा दे रहे हैं.

Parveen Salar Be careful

Shachii Kacker अगर पता चल गया था कि फेक है तो आगे बात नही करनी थी….

Nanda Pandey ओह्ह्ह्ह

Ranjana Srivastava उसने बात को मोड़ा तो आप मुड़ क्यूँ गए जनाब…गलती तो आपसे भी हुई है।

सुदेश आर्या Mukesh Kumar Sinha जी ! ये क्या है… महिलाओं को बदनाम करने से पहले मुझे इन बातों का जवाब चाहिए …

Mittal Shashi Mukesh Kumar Sinha ji acha nhi laga ye sab dekh pad kar chahe wo koi b ho pahle bat ki fir sareaam kar di

डॉ. अपर्णा त्रिपाठी मेरी छोटी बहन है ! इसका कमेन्ट शो हुआ तो तब रश्मि की वॉल देखी …..मैं तो मुकेश जी को बहुत अच्छा मित्र मानती हूं इनकी पुस्तक की समीक्षा भी लिख रही हूं ….लेकिन आज ये महान लेखक मुझे जवाब देंगे …वरना …

डॉ. अपर्णा त्रिपाठी सुदेश दी आज सचमुच बहुत आहत हुई. आज कहीं ना कहीं साहित्य भी शर्मसार हुआ है.

Shachii Kacker सुदेश आर्या जी ,लड़की कोई भी हो,गलत किसी के साथ हो आवाज तो सब को उठानी होगी

सुदेश आर्या बिल्कुल ! मैं पोस्ट डालूंगी ,,,,मगर चाहती हूं पहले ये जवाब दें कि आखिर ये है क्या ?? आज किसी और के साथ तो कल हमारे साथ होगा …औरत औरत की दुश्मन नहीं दोस्त होती है …यह मर्दों को बता देना है …

विष्णुप्रिया चौधरी शर्मनाक।

निधि जैन इतनी बात बढ़ी कैसे

सुदेश जी ताली दोनों हाथो से बजती है

सुदेश आर्या निधि जैन ! जो है सब सामने है !

डॉ. अपर्णा त्रिपाठी निधि जैन जी वही मैं कह रही. दोनो ही अपराधी हैं, दोनों ही सफ़ाई दे रहे.

Anjani Kumar ऐसे सरेआम / गलत बात / अब क्या अंतर आप में और रोड छाप फेसबुक हैंडलर में / या कहीं मार्केटिंग का कोई नया फंडा तो नहीं/”कोई आप पर ध्यान नहीं देता/ध्यान खीचना पड़ता है” शोभा डे

Archana Kumari सहमत हूँ मैं। गलती दोनों ने की है। देखिएगा कोई बस लड़की होने का फायदा न उठा ले। गलती दोनों ने की है तो सजा भी दोनों को मिलनी चाहिए

Rinku Chatterjee हैरान हूँ।

सोना श्री आखिर यह माजरा क्या हैं Mukesh Kumar Sinha सर जी ?

विजय कुमार सिंघल अगर अकाउंट फेक भी है तो भी ऐसी बातें नहीं करनी चाहिए.

Rajeev Bhutani फंसा—-

विजय कुमार सिंघल आप सार्वजनिक रूप से क्षमा मांग लीजिये.

Rajeev Bhutani समय रहते यदि आप सफाई पेश नही कर पाये तो अगला स्कीन शाट् के जरिये आपको ब्लैक मेल करेगा —बहुत सतर्क रहने की जरूरत है —फेक id की तुरंत complaint करे–

सुदेश आर्या फेक अकाउंट तो प्रोफाइल देखकर ही पता चल जाता है ! न भी पता चले तो ऐसी बात करने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता ..इसका मतलब आप भी आनंद ले रहे हैं …

Rajeev Bhutani नही सुदेश जी ये बात नही मैने तो वजह बताई है –गलत तो 100 % वो है ही —

उद्दण्ड मार्तण्ड मणि बिक गयी “हमिंग बर्ड”… इसलिए “सर” कहलाना नहीं पसन्द करते हैं… देखा सुदेश दी…

Prashant Aryapriyam हे भगवान मौत दे दो। दोनों दोषी हैं।दोनों को सजा मिले।

रवि कुमार कुछ तो लोग कहेंगे लोगो का काम है कहना ।

Suresh Agarwal सावधानी बरते..ऐसी बाते सार्वजानिक करके क्या हासील

Rajeev Bhutani Mukesh Kumar Sinha माफी मांगो

सुदेश आर्या अगर आप बराबर के हकदार हैं और दोनों के मध्य कुछ था भी तो आपको पोस्ट डालनी ही नहीं चाहिए थी …..हमें उससे कोई लेना देना नहीं था….लेकिन ऐसा करके आपने बहुत ही गलत किया ….जानते नहीं थे कि यहां आपकी बहुत सारी अम्मा बैठी हैं ? क्यों अपनी व दूसरों की छिछालेदर करनी व करानी थी ? चलो इससे बहुत बहनों को सीख तो मिलेगी ….इसी कारण अन्य पुरूष मित्र भी शक के दायरे में आते हैं !!

सुभाष शर्मा विनम्रता से निवेदन है सुदेश जी कि महिलाओं की बकील न बनें क्यों कि मामला इनबॉक्स कन्वर्सेशन का है इसलिए पुरुष महिला के चश्मे से न देखकर उचित अनुचित आचरण तक ही रखें तो ज्यादा उचित होगा।

उद्दण्ड मार्तण्ड मणि “सिन्हा सर” ने सोचा था कि मित्र उनका साथ देंगें लेकिन अम्मियों ने उनकी ही क्लास लगा दी.

सुदेश आर्या मैं वकालत नहीं कर रही सुभाष शर्मा जी! एक बार मेरा कमेन्ट फिर से पढ़िये …मुझे ज्यादा दुख इस कारण हो रहा है कि मैं ऋचा को जानती भी नहीं और मुकेश जी मेरे अच्छे मित्र रहे हैं …शिकायत वहीं होती है जहां अपनापन होता है …औऱ मैं गलत लोगों की वकालत नहीं करती ….जो दिख रहा है क्या उसे आप नहीं देख पा रहे तो अफसोस है …frown emoticon

उद्दण्ड मार्तण्ड मणि अगर “सिन्हा सर” सफाई नहीं देगें तो उन्हें ब्लॉक कर दिया जाए। वरना सफाई दे…

सुदेश आर्या सफाई दें न दें मैं तो ब्लॉक कर ही रही हूं …साथ में उनके चाहने वालों को भी ..

उद्दण्ड मार्तण्ड मणि और सबसे अच्छी बात है शुरू से लेकर आखिर तक की पूरी चैट डाल दे। फैसला खुद ब खुद हो जायगा. पहले पूरा मामला तो देखा जाय मैं तब ब्लॉक करुँगी. दोनों ने जो स्क्रीन शॉट दिये वो अपनी अपनी गलती छुपाई और दुसरे की गलत बातो को सर्वजनिक किया.

Rajesh Shrivastava मित्रो एक तरफ़ा फैसला मत कीजिये मुकेश जी एक सुलझे हुए इंसान हैं पहले उनकी बात सुनिए फिर किसी के बारे में निर्धारण कीजिये

Samar Anarya स्त्री पुरुष संबंधों में चुहल कह लें, फ़्लर्टिंग कह लें, वह भी होता ही है। मैं खुद चैट क्या कितनी दोस्तों को जानेमन कहके पब्लिक पोस्ट लगाता रहता हूँ पर बिना सहमति के नहीं। रश्मि ऋचा सिंह की बात में वह चुहल दिख रही है पर फिर ‘किस’ माँगने का सीधा नकार भी। और इन जनाब ने ठीक पहले का हिस्सा ग़ायब कर दिया है जहाँ वह पहले से ब्लाक की धमकी दे चुकी हैं। सो पहले कुछ रहा भी हो तो भी न का मतलब न ही होता है न? पर ये साहब तो अड़े हुए हैं।

Robin Singh try kar rahe honge .. kabhi kabhi galti se galat number daayal ho jaata hai .. maanga hee to tha .. bchara uski stithi samjo mili bhee nahi aur badnaam ho gaye.


पूरे प्रकरण को जानने के लिए इसे पढ़ें:

‘हमिंग बर्ड’ वाले मुकेश कुमार सिन्हा की कविता क्या पसन्द कर ली, वह ‘किस’ मांगने लगा!

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‘हमिंग बर्ड’ वाले मुकेश कुमार सिन्हा की कविता क्या पसन्द कर ली, वह ‘किस’ मांगने लगा!

रश्मि ऋचा सिंह : ये है साहित्य का असली चेहरा. यही तो करने आते हैं आप यहाँ? दोस्ती करो तो हद से आगे निकल जाओगे आप… ये आपके मुकेश कुमार सिन्हा हैं ‘हमिंग बर्ड’ वाले. जरा सा कविता क्या पसन्द कर ली. जरा सा दोस्ती क्या कर ली, ये तो अपनी पर ही उतर आये. इनको मेरा ‘किस’ चाहिए. अब यहाँ से मन भर गया. नमस्कार!

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मुकेश कुमार सिन्हा के साथ हुई मेरी चैट को एडिट कर के यहाँ पेश किया जा रहा है. ये मुझे सच्ची दोस्ती का हवाला दे कर बहकाने की पूरी कोशिश कर रहा था….. जब इसने किस की बात कही तभी मैंने इन्हें हड़का दिया! अब यहाँ ग्रुपिंग का खेल हो रहा है मेरे साथ.  मुकेश कुमार सिन्हा से कोई ये पूछे की वो ये किस क्या अपनी बहन को कर सकता है?  इस नीच ने मेरे हड़काने के बाद भी मुझे आँख मारी. जो लोग पैरवी के लिए यहाँ आ रहे है वो लोग मुकेश से ये पूछे की दोस्ती के नाम पर आप क्या किस तक पहुच जायेंगे? मुकेश कुमार सिन्हा जी का ग्रुप बहुत बड़ा है. इनकी ‘हमिंग बर्ड’ नाम की पुस्तक आ चुकी है. अभी “गूंज” और “तुहिन” नाम के दो काव्य संकलन भी आ चुके हैं. मैं इनसे नहीं जीत पाऊँगी. मुझे जो कहना था कह दिया ऐसे गंगा के सामान पवित्र लोग इनके गैंग को ही मुबारक हो.

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मुकेश जी की खुद की वाल देख आइये आप सभी, जो महिलाये अभी तक चुप थीं मेरी पहल पर, अब एक एक करके सामने आ रही है ये बहुत समय से ऐसा खेल खेल रहे थे यही लगता है. मैंने इनसे जितनी भी बाते की वह सब इनको एक अच्छा कवि मान कर एक मित्र की तरह की. पर ये बिलकुल से खुल गए. आरके भैया, आप सब का साथ ही ऐसी मानसिकता वालो को साहित्य के संसार से दूर रख पायेगा. अभी तक 50 महिलाओं ने ये स्वीकार किया है की मुकेश उनके साथ भी कभी न कभी इस तरह की घटिया हरकत कर चुके हैं. मेरा विरोध करने वालो को सिर्फ ये ही कहना चाहूंगी की अगर आज मैं भी चुप रहती तो शायद आपको ज्यादा अच्छा लगता? फिर शायद अगला नंबर आप अपना ही लगाते.

फेसबुक पर एक्टिव महिला रश्मि ऋचा सिंह के फेसबुक वॉल से.


उपरोक्त स्टेटस पर आए कुछ कमेंट्स इस प्रकार हैं…

Krishna Pandey : साहित्य के नाम पर फेसबुक पर कुछ लोग ऐसे सक्रिय हैं जो अपने कुत्सित भावनाओं का नंगा नाच इनबॉक्स में चैट के माध्यम से करते हैं। वैसे आपकी बात कितनी सच है ये तो नही पता कौन सही है या कौन गलत। किन्तु आपको जिस दिन पहला अश्लील मैसेज आया था उसी दिन ब्लॉक कर देना चाहिए था, पता नही इतने दिन आपने क्यों बर्दाश्त किया? मेरा कुछ ऐसे लोगों से पाला पड़ा है जो साहित्य से जुड़े हैं / जुडी हैं और काफी नामी लोग हैं ,किन्तु उनके हरकत बहुत ही निम्न स्तर के हैं । मेरे मित्रों के मिले फीडबैक के बाद मैंने उनसे दुरी बना ली और कुछ लोगों को ब्लॉक भी कर दिया।

सुशीला शिवराण श्योराण : ऐसे मंजनू हर क्षेत्र में हैं साहित्य भी अपवाद नहीं। मैं इस शर्मनाक हरकत की भर्त्सना करती हूँ और मुकेश कुमार सिन्हा जी से पूछती हूँ यह दोस्ती कब से है, यह क्यों हुआ क्योंकि कुछ टिप्पणियाँ डिलीट की गई लग रही हैं। सन्तोषजनक जवाब न मिलने पर ये मेरी मित्र सूची से हटा दिए जाएँगे. रश्मि को अपनी तस्वीर नहीं भेजनी चाहिए थी। इससे हिम्मत बढ़ती है लोलुप मर्दों की। किन्तु माँगने पर अगर तस्वीर भेज भी दी तो इसका मतलब यह हरगिज़ नहीं कि कोई भी पुरुष किसी भी महिला पर खुद को ज़बरदस्ती थोप सकता है। मर्यादा से बाहर जा सकता है। दो कदम के बाद यदि महिला को लगे कि यह आदमी मित्रता के लायक नहीं तो पुरुष को उसकी इच्छा का, उसके निर्णय का सम्मान करना ही चाहिए। मित्रता कैसी, कहाँ तक दो इंसानों का निजी निर्णय है कोई भी एक कह दे कि बस यहीं तक तो दूसरे को शालीनता से स्वीकार करना चाहिए वह निर्णय। कोई भी इंसान ख़ुद को दूसरे पर थोप नहीं सकता…..स्त्री-पुरुष से, लिंग-भेद से ऊपर उठ कर आप क्यों नहीं देखते मित्रता को? मित्रता और लोलुपता व बेशर्मी में अंतर पहचानिए। मैं जब 19 वर्ष की थी तो मुझसे 2 साल बड़े और शरीर से दुगुने लड़के को DTC की बस में उसकी निर्लज्जता के लिए पीटकर पुलिस लॉक अप में बंद करवाया था। पिछले साल सुरेन्द्र साधक को मना किया था सख्ती से कि मेरे चैट बॉक्स में आकर फ़ालतू बकवास न करे। कहने के बावज़ूद नहीं माना था। दूसरी बार फिर घटिया बात कही तो मैंने भी screen shots दिखा कर उस की घटिया हरकत फेसबुक पर सप्रमाण पोस्ट की। ऐसे पाशविक प्रवृत्ति वाले कामुक पुरुषों को बेनकाब करना ज़रूरी है।

Kiran Dixit : कोई भी व्यक्ति जो दो चार किताबें छपवा कर साहित्यकार बनने का दावा करता है जरूरी नहीं वह चारित्रिक दृष्टि से भी सही होगा. इस इन्सान ने मित्र बनते ही अपनी पुस्तक खरीदने का मुझसे भी आग्रह किया था. लेकिन हमने इस तरीके को बिल्कुल सही नहीं माना कि आप मित्र इसलिए बने हैं कि हम आपकी पुस्तक खरीदें. खैर, जो भी हुआ बहुत ही दुःखद और निंदनीय है। इस व्यक्ति की जितनी भर्त्सना की जाये, कम होगी. ऐसे लोग मित्रता के नाम को कलंकित करते हैं. वैसे मेरा मानना है कि हर इन्सान को अपनी हद भी पहचाननी चाहिए. जिस समय ये लगे कि दूसरा इन्सान अपनी हद पार कर रहा है तुरंत ही अपने को विथड्रा कर लेना चाहिए। किसी को भी इतना आगे बढ़ने की इजाजत नहीं दी जा सकती. बहरहाल उनको तो अपनी हद पार करने का नतीजा तो पता ही चल गया •••••दिन में ही तारे नजर आने लगे होंगे. इससे ज्यादा सजा उनको और कहाँ मिल सकती थी.

Ranjana Singh : अइयो Mukesh Kumar Sinha जी,, हम तो समझते थे कवि हृदय आप केवल काँग्रेस के लिए कमजोर पड़ जाते हैं,,,, लेकिन आप तो …..साहित्य बिरादरी का नमवे माटी में मिलवा दिए…. भेरी भेरी बैड जी।

Veeru Sonker : मुकेश कुमार सिन्हा जी अब माफ़ी मांग रहे है सार्वजानिक रूप से. उनकी पोस्ट देखी मैंने अभी. माफ़ी वाली पोस्ट अभी भी मुकेश की वाल पर है उन्होंने किया तो बहुत गन्दा काम पर अब माफ़ी मांग कर गंगा नहाने की कोशिश कर रहे हैं.

उमाशंकर सिंह परमार : कविता लिखने और कविता जीने मे बहुत बडा अन्तर है तुकबन्दी करके या चन्द वायावी अल्फाजों का जमघट जमा कर कोई भी फेसबुक मे कवि होने का दम्भ भरने लगता है…

Padm Singh : इनकी हरकतों के कारण ही लगभग एक साल पहले ही इनसे दोस्ती टूट गयी थी… दो कौड़ी की कविताएं लिखने वाला ब्लागर एक किताब छपवा कर साहित्यकार बन गया…लेकिन इनकी कांग्रेसी मानसिकता कभी नहीं मरी। धिक्कार है !!

Richa Vimal Kumar : इन पर मुझे पहले से ही शक था !! बीसियों बार fr req भेजा मगर मैंने कभी एक्सेप्ट नहीं किया!! मैं बार बात डिलीट करती रही,, मगर ये जनाब बार बार req भेजते रहे। एक दिन इनबॉक्स में इन्हें हड़का कर ब्लोक कर दिया !! अफ़सोस की बात है कि लोग मुकेश जी की पैरवी में उतर रहे। ऐसे कई दो चार पुस्तकें छपवा लेने वाले तथा कथित साहित्य के पुरोधाओं का असली चेहरा सुंदर महिलाओं के inbox में पता चलता है। ऐसे लोगों का पर्दाफाश होना ही चाहिए। आपने ठीक किया ऋचा जी!


इसके आगे का पढ़ें….

मुकेश ने एफबी पर हुई कुछ चैट सार्वजनिक कर दोष ऋचा पर भी मढ़ा

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नीलाभ अश्क ने दुखी मन से चुप्पी तोड़ी, भूमिका की चौंकाने वाली अनकही दास्तान से पर्दा उठाया

प्रसिद्ध साहित्यकार उपेंद्रनाथ अश्क के पुत्र एवं जाने माने लेखक-रंगकर्मी नीलाभ अश्क ने कई दिन बाद आज अपने घरेलू घटनाक्र में चुप्पी तोड़ी। भड़ास4मीडिया से अपना दुख-दर्द साझा करते हुए उन्होंने कहा कि जो कुछ हो रहा है, ठीक नहीं है। मेरे लिए असहनीय है। मैं मर्यादाओं की सीमा तोड़कर ऐसी नीजी बातें सार्वजनिक रूप से साझा नहीं करना चाहता था लेकिन मुझे विवश किया गया है। बाकी जिन्हें करीब से सारी सच्चाई मालूम है, वे भी मेरी अप्रसन्नता के साथ भूमिका द्विवेदी उनकी मां की ताजा घिनौनी हरकतों पर क्षुब्ध और अचंभित हैं। मेरा पूरा अतीत देश के ज्यादातर हिंदी साहित्यकारों, पत्रकारों, रंगकर्मियों, सामाजिक सरोकार रखने वाले लोगों के बीच सुपरिचित है। मुझे अपने रचनाकर्म, अपनी आदमीयत और अपने शानदार पारिवारिक अतीत के बारे में कुछ नहीं बताना है। मुझ पर थोपे जा रहे घटिया लांछन विचलित करते हैं, इसलिए अब कुछ कहना आवश्यक हो गया है। 

उन्होंने कहा कि भूमिका द्विवेदी लगातार झूठा प्रचार कर रही हैं। उसके पीछे और कोई बात नहीं, सिर्फ इतनी भर मंशा है कि मैं उस घर में दोबारा न लौटूं और उसमें वह अपनी मां के साथ आजीवन रह सकें, साथ उनके निजी दोस्तों के साझा होने में मैं आड़े न आऊं। मेरे अलावा भी बहुत संख्या में ऐसे लोग हैं, जिन्हें भूमिका के तौर तरीकों के बारे में कुछ कम मालूम नहीं, अच्छी तरह से उन्हें जानते हैं। मैंने तो आखिरी तक निभाने का प्रयास किया है। पानी नाक से ऊपर हो गया और भूमिका की मां ने जब घर न छोड़ने पर तरह तरह की धमकियों, गाली-गलौज का सहारा लेना शुरू किया, तब उन्हें वहां से हट जाना ही उपयुक्त लगा।    

उन्होंने कहा कि भूमिका सारी बातें झूठी और मनगढ़ंत तरीके से दुष्प्रचारित कर रही हैं। उनकी रोज रोज की घटिया हरकतों से लोनी पुलिस चौकी का स्टॉफ भी क्षुब्ध है। एक पुलिस वाले ने परसों यहां तक कहा कि अगर ये मां बेटी कहीं देहाती क्षेत्र में होतीं, तो गांव वाले ही इन्हें इनकी इस तरह की हरकतों का मजा चखा देते। अब तो उसका नाम लेते भी शर्म आ रही है। मैंने उससे रिश्ते में भी साफगोई रखी थी। 

उन्होंने कहा कि शादी से पहले मैंने तो अपने मित्र उमेश सिंह के कहने पर उसे अपने यहां एक रंगकर्मी के रूप उसकी मदद एवं काम करने के लिए बुलाया था। तब मैं उसे जानता भी नहीं था। उन दिनो वह मुझे मीठे-मीठे ई-मेल करती रहती थी। परिचय के बाद जब मैंने उमेश सिंह के कहे अनुसार उसे पहली बार अपने यहां बुलाया तो उसने कहा, अकेले नहीं आती, आओ मुझे ले जाओ। मैंने उसे तब साफ मना कर दिया था। फिर बोली थी कि गाड़ी भेजो, तब आऊंगी। फिर मैंने अपने भतीजे को फोन किया। भतीजे की मौसेरी बहनें मेरे यहां आ रही थीं। मैंने कहा, उनके साथ गाड़ी में आ जाओ। तब भी नहीं आई। बाद में खुद आ गई। 

भारी मन से दुखद अतीत के पन्ने पलटते हुए नीलाभ अश्क ने कहा कि जिस समय वह मेरे यहां आई, मेरी पहली पत्नी मर चुकी थी। घर पर बेटी थी। रात में वह मुझे अपनी पलंग पर बुलाने लगी। तब मैंने अगले दिन उससे पूछा कि क्या तुम मुझसे शादी करना चाहती हो। वह पहले से इसके लिए मन बनाकर आई हुई थी। दरअसल, उसके पीछे जो उसकी दूरगामी मंशा थी, उसी का अब विस्फोट हुआ है। खैर, शादी हो गई। यद्यपि उस समय मेरे कुछ साथियों ने ऐसा करने से मना किया था और उसके बारे में पूरी जानकारी भी दी थी, लेकिन निर्णय गलत रहा। मैंने उससे शादी की बात पूछ कर ही अपने पांव में कुल्हाड़ी मार ली थी। उम्रदराज हूं लेकिन आर्यसमाज के सार्टिफिकेट हैं। आंख में धूल झोककर मैंने शादी नहीं की है।  

उन्होंने बताया कि उसके कुछ समय बाद मेरे उम्र की दुहाई देते हुए भूमिका ने मुझसे अपने भविष्य की सुरक्षा के नाम पर चाहा कि पहली पत्नी के नाम का मकान मैं उसके नाम कर दूं। मकान अपने नाम करा लेने के बाद शुरू हुआ उसकी मां का असली खेल, जो पर्दे के पीछे से रणनीति बना रही थी, क्योंकि वह मेरे घर में ही अपनी बेटी भूमिका के साथ परित्यक्ता की तरह रहने लगी थी। उसका अपने घर में गुजर बसर नहीं था क्योंकि उसकी भी हरकतों को बताना ठीक नहीं होगा। यद्यपि मकान बेटी के नाम हो जाने के बाद उसने मेरे साथ बड़ी ज्यादतियां करना शुरू कर दिया था। 

उन्होंने बताया कि पहले शादी, उसके बाद मकान अपने नाम करा लेने के बाद भूमिका अब मुखर होने लगी थी। तरह तरह से उसने खुली उड़ानें भरना शुरू किया। नित-रोज उसकी नई नई हरकतें सामने आने लगीं। किसी तरह एडजस्ट करते रहने के लिए मैं एक साल तक जिंदा मक्खी निगलता रहा। मां-बेटी को अब मेरे हर काम में हजार खामियां नजर आने लगीं, क्योंकि घर-संपत्ति पर कब्जा कर अब वे दोनो मुझे पैदल कर चुकी थीं। अब उनका इरादा सिर्फ एक था, किसी भी तरह से वे मुझे वहां से निकाल बाहर करें। जिस दिन मैंने घर छोड़ा है, मां-बेटी ने मेरे साथ मारपीट की। जबकि उल्टे मुझपर इल्जाम लगाया जा रहा है। मैं घर छोड़ना नहीं चाहता था लेकिन चीख चीख कर कई दिनो तक गंदी गंदी गालियां सुनना, मारपीट झेलना मेरे लिए असहनीय हो गया। उसी दिन उसकी मां ने मुझपर डंडे से प्रहार और बेशर्म हरकतें कीं। तब चुपचाप मेरे पास ठिकाना छोड़ देने के अलावा और कोई चारा नहीं रहा।  

भूमिका की हरकतों से पर्दा उठाते हुए नीलाभ अश्क ने कई चौंकाने वाली बातें भी भड़ास4मीडिया से साझा कीं। उन्होंने बताया कि वह तो अपनी उम्र के बारे में भी गलतबयानी करती है। इस समय वह तीस वर्ष की है। वह मनीषा पांडेय आदि के साथ सीमा आजाद डीपी गर्ल कालेज में पढ़ी है। मनीषा से वह उम्र में तीन साल बड़ी है। उन्होंने बताया कि मुझसे शादी रचनाने के बाद वह कई एक लोगों के निजी संपर्क में खुलकर रहने लगी। ऐसे ही एक आईएएस अधिकारी से भी उसके अभिन्न संबंध हो गए। उसकी अब तक पांच सगाइयां हो चुकी हैं, जिनमें एक सगाई इलाहाबाद दूरदर्शन के निदेशक श्याम विद्यार्थी के बेटे के साथ मुझसे शादी से पहले हो चुकी थी। पढ़ाई के दिनों में वह जिस सरोजनी नगर गर्ल्स हास्टल में रहती थी, वहां से भी उसका इतिहास मुझे बहुत बाद में पता चला। 

उन्होंने बताया कि वह संतानोत्पत्ति के संबंध में अपने घिनौने झूठ सार्वजनिक कर रही है कि मैं शादी के समय सेक्स के लायक नहीं था। शादी के बाद उसे बच्चा होने वाला था। सच्चाई ये है कि मेरी संपत्ति पर निगाह गड़ाते हुए उसने जानबूझकर स्वयं गर्भपात कर दिया। बच्चा हो जाता तो संपत्ति कब्जियाने की मां-बेटी की सारी रणनीति फेल हो जाती। मैं उनकी उस चाल को तब तक नहीं भांप सका था। गर्भपात कर देने पर उसे तीस हजारी क्षेत्र स्थित तीरथराम चैरिटेबल अस्पताल के सामने की डॉ.सुषम धवन ने भी उसकी जानीबूझी असावधानी पर झिड़का और इलाज किया था। उसे बताना चाहिए कि वह गर्भ किसका था? 

उसने तो अपने फेसबुक वॉल पर भी फ्राड कर रखा है। एक बार फ्रांसीसियों के साथ अपने किसी ब्वॉय फ्रेंड को लेकर पचमढ़ी गई थी। वह कभी फ्रांस नहीं गई है लेकिन फेसबुक पर उसी तरह से खुद को शो करती है। वह कभी आज तक विदेश नहीं गई। उसकी ये हकीकत भी उसके पासपोर्ट से जानी जा सकती है। गाजियाबाद से गली-मोहल्ले का कोई ‘जागरूरता मेल’ का पत्रकार भूमेश शर्मा, जो लंबे समय से इसके साथ मेरे घर आता रहा है, उसने कभी मुझे उससे मिलने नहीं दिया क्योंकि दाल में कुछ काला था। 

उन्होंने भूमिका को लक्ष्य कर कहा कि वह बार बार शशि थरूर से क्यों मिलती रही है। वह पीएम नरेंद्र मोदी से आज तक कभी नहीं मिली लेकिन अपना भौकाल बनाने के लिए फेसबुक पर इस तरह लिखती है, जैसे सचमुच मुलाकात हुई हो। हर तरह के झूठ बोल लेती है। मां-बेटी ने मुझे पीटा और उल्टे भड़ास को बता दिया कि मैंने उसे मारा है। ये हकीकत लोनी पुलिस से पता चल जाएगी। भड़ास ने खबर दी कि मैंने नशे में परसो उसको मारापीटा, जबकि मैं सारा दिन थाने में रहा।  वह मुझे अपनी कार नहीं ले आने दे रही थी। पुलिस की मदद लेनी पड़ी। वह कहती है कि मैं कार मैकेनिक के यहां से ले आया, जबकि कार पुलिस चौकी से मैं ले आया था।   

उन्होंने बताया कि वह अफवाह फैला रही है कि मैं सारा सामान उठा ले आया हूं। हकीकत कुछ और है। वह ऐसा इसलिए कर रही है कि उस घर में जो कुछ भी मेरा है, सब वह लोगों की सहानुभूति जुटाकर हथिया ले। मेरा अभी सारा सामान वही है। पड़ोसियों को भी ये सारी सच्चाई मालूम है। उस घर में मेरे पिता उपेंद्रनाथ अश्क की उनकी राइटिंग टेबल, धरोहर जैसी दुर्लभ साहित्यिक सामग्रियों से भरी दस लाख की लायब्रेरी पड़ी है। वहां मेरा पांच लाख का खानदानी फर्नीचर है। मैंने उसे चार लाख का चेक से पेमेंट किया है। उस मां-बेटी ने जो गहने समेट रखे हैं, उनकी कीमत सुनार जानता है, जो लगभग बीस लाख के हैं। मैंने उसे नौ रत्न तक बनवा के दिया है। साठ लाख से अधिक तो मेरे उस मकान की कीमत हो चुकी है। 

कभी मिले तो यशवंत सिंह जरूर पूछूंगा कि मेरे बारे में इतना गलत क्यों छापा ! 

वार्ता के दौरान नीलाभ अश्क ने अपने घरेलू मसले पर एकतरफा भूमिका द्विवेदी के अनुसार खबर देने का भड़ास4मीडिया पर आरोप लगाते हुए कहा कि संपादक यशवंत सिंह को मैं अच्छी तरह से जानता हूं। वह भी मुझे जानते हैं। मैं उनकी पुस्तक के विमोचन समारोह में गया था। उन्हें खबर देने से पहले मुझसे या मेरे लोगों से, जो हकीकत जानते हैं, मेरे घर के पड़ोसियों से मौके पर सही बातों की जानकारी तो कर लेनी चाहिए थी। भूमिका जैसी झूठी को वे इतना महत्व क्यों दे रहे हैं, समझ से परे है। ये कैसी पत्रकारिता है भाई, कभी मिले तो यशवंत सिंह जरूर पूछूंगा। अब तो मुझे शर्म आ रही है कि इतने दिनों तक हिंदी की सेवा क्यों करता रहा?

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लखनऊ सहारा में तुगलकी फरमान पर मचा बवाल, हालात विस्फोटक

लखनऊ : राष्ट्रीय सहारा की लखनऊ यूनिट में इन दिनो एक तुगलकी फरमान को लेकर माहौल काफी तनावपूर्ण है। स्थिति विस्फोटक होने का अंदेशा जताया गया है। सारा बवाल यूनिट हेड मुनीश सक्सेना के उस नोटिस पर मचा हुआ है, जिसमें उन्होंने समस्त स्टॉफ को आदेश दिया है कि अब एक बार इंटर करने के बाद कोई भी व्यक्ति चाय पीने अथवा अन्य किसी काम से बाहर निकला तो उसे रजिस्टर में उल्लेख करने के साथ ही आदेश की स्लिप लेनी होगी और लौटने के बाद वह स्लिप विभागाध्यक्ष को देकर अवगत कराना पड़ेगा कि वह ड्यूटी पर आ गया है। 

बताते हैं कि इसे पूरे वाकये के पीछे देवकीनंदन मिश्रा को नीचा दिखाने की रणनीति है। गौरतलब है कि वह हाल ही में बनारस सहारा के संपादक पद से यहां स्थानांतरित किए गए हैं। मिश्रा बनारस से पहले पटना यूनिट के भी हेड रह चुके हैं। योग्यता और अनुभव में वह सक्सेना से काफी सीनियर हैं। सक्सेना उन्हें नीचा दिखाने के अंदाज में पेश आ रहे हैं, वह विज्ञापन हेड से प्रमोटी प्रभारी बने हैं। पहले वह सहारा का विज्ञापन प्रभार देखते थे। अपने तबादले से पूर्व देवकी नंदन मिश्रा का प्रबंधन से अनुरोध रहा था कि बनारस सहारा में संपादक और प्रबंधक एक ही व्यक्ति रहे। इससे कंपनी का अनावश्यक खर्चा बचेगा। ऐसी ही अन्य दैनिक जागरण आदि में भी व्यवस्था है। मिश्रा अब अपने चैंबर में दो एक घंटे बैठ रहे हैं। काम कोई है नहीं। उनको लेकर खामख्वाह मुनीश सक्सेना कुंठाग्रस्त हैं। वरीयता क्लैस है।

पूरा घटनाक्रम कुछ इस तरह का पता चला है। गुरुवार की शाम स्थानीय संपादक मनोज तोमर, प्रबंधक आदि की सहमति से लखनऊ सहारा यूनिट प्रभारी मुनीश सक्सेना द्वारा एक नोटिस जारी किया गया। तुगलकी नोटिस का फरमान रहा कि लखनऊ सहारा कार्यालय में अब जो भी कर्मी एक बार कार्ड पंच कर अंदर आ जाएगा, फिर काम की समयावधि में वह चाय पीने भी बाहर जाना चाहे तो संपादक या प्रबंधक से स्लिप पर अनुमति लेकर ही जाना होगा। लौटने पर फिर वह स्लिप संबंधित विभागाध्यक्ष के पास जमा करना अनिवार्य होगा। आदेश शुक्रवार से लागू हो गाय। इसके पीछे चाल ये बताई गई है कि आदेश के अनुपालन में अब देवकीनंदन मिश्रा को भी पूरे समय ड्यूटी पर उपस्थित रहना होगा। उनके जाने पर रोक लगेगी। यदि जाते भी हैं तो रिकार्ड बनेगा। अन्य मीडियाकर्मी भी इससे दबाव में रहेंगे।

शुक्रवार को इस तुगलकी आदेश से क्षुब्ध डिप्टी ब्यूरो चीफ मनमोहन सहकर्मियों कमल दुबे, कमल तिवारी, किशोर निगम, के. बख्श सिंह आदि के साथ मुनीश सक्सेना से मिले। उन्होंने ताजा फरमान पर गंभीर ऐतराज जताया। पूछा कि क्या चाय पीने के लिए भी स्लिप पर आदेश लेना पड़ेगा? बार बार रजिस्टर भरना पड़ेगा। एसी शाम छह बजे के बाद बंद रहता है तो क्या अब सफोकेशन से बचने के लिए बाहर जाने पर भी स्टॉफ के लोगों को स्लिप लेनी पड़ेगी। उन्होंने चेतावनी दी कि इस फरमान को तुरंत वापस लिया जाए वरना वह सहाराश्री सुव्रत राय से इसकी शिकायत करेंगे। इस पर मुनीश सक्सेना से उनकी काफी गर्मागर्मी हुई। काफी देर तक दफ्तर में हंगामा हुआ। 

मनमोहन ने कहा कि यदि फरमान जारी हुआ है तो संपादक-प्रबंधक पर भी ये नियम लागू होना चाहिए। इतना ही नहीं, समान रूप से ये आदेश लखनऊ यूनिट ही क्यों, सभी यूनिटों में लागू किया जाए। संपादक खुद कभी समय से आते नहीं हैं। काम के समय एसी नहीं चलता और पंखे हैं नहीं, वॉटर कूलर खराब। ऑफिस प्रबंधन को ये सब जरूरी व्यवस्थाएं ठीक करनी चाहिए या ऊलजुलूस फरमान जारी कर ऑफिस में काम का माहौल बिगाड़ने के लिए वह प्रबंधक और संपादक बनाए गए हैं। 

मुनीश सक्सेना ने फरमान लौटाने से असमर्थता जताते हुए कहा कि ये आदेश ग्रुप हेड ओपी श्रीवास्तव के स्तर से जारी हुआ है। संपादक मनोज तोमर की भी आपत्ति है कि पीक ऑवर में लोग चाय पीने निकल जाते हैं। मैंने तो फरमान पर केवल हस्ताक्षर किया है। इसे वापस नहीं किया जा सकता है। इससे पिछले तीन दिन से ऑफिस का माहौल तनावपूर्ण बना हुआ है। हालात नहीं सुधरे तो अंदेशा है कि आने वाले दिनों में स्थिति विस्फोटक हो सकती है। 

एक पत्रकार द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित

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पांडे, तिवारी और बोधिसत्व का बाभनावतार… तीनों एकसाथ गालियां बक रहे हैं : अनिल कुमार सिंह

Anil Kumar Singh : उदय प्रकाश जी को गरियाते -गरियाते खूंखार जातिवादी और सांप्रदायिक भेडियों का झुण्ड मुझ पर टूट पड़ा है. ये दुष्प्रचारक अपने झूठ की गटर में मुझे भी घसीट लेना चाहते हैं. दो कौड़ी के साम्प्रदायिकता और अन्धविश्वास फ़ैलाने वाले टी वी सीरियलों का घटिया लेखक मुझे गुंडा बता रहा है. ये परम दर्जे का झूठा है और अपने घटिया कारनामों के लिए शिवमूर्ति जैसे सरल और निश्छल लेखक को ढाल बनाता रहा है. इसे मेरी भाषा पर आपत्ति है. कोई बताओ कि ऐसे गिरे व्यक्ति के लिए किस भाषा का प्रयोग किया जाय. और, आमना -सामना होने पर इससे कैसा व्यवहार किया जाय.

मैंने इलाहाबाद वि वि के यूनियन हाल पर तो इससे विनम्र भाईचारे का व्यवहार किया था जिसे इसने अपनी जाति-विरादरी में मेरे द्वारा धमकाने का प्रचार किया था. तब शायद इसे अपनी जरायम महत्वाकांक्षी योजनावों के लिए अपनी ब्राह्मण बिरादरी की सहानुभूति और गोलबंदी की जरूरत रही होगी. लेकिन अब तो इसका जरायम पेशा फल फूल चूका है. अब शायद यह आदतन ऐसा घटियापन कर रहा है. जातिवादी भेडियों तुम्हारी ताक़त और एकजुटता का मुझे खूब अनुभव है. मैं जानता हूँ गिरोहबंदी और दुष्प्रचार ही तुम्हारी ताक़त है. मैं कैसे कहूं कि मुझे तुमसे डर नहीं लगता? पांडे, तिवारी और बोधिसत्व का बाभनावतार… तीनों एकसाथ गालियां बक रहे हैं.

फैजाबाद के सोशल एक्टिविस्ट अनिल कुमार सिंह के फेसबुक वॉल से.

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छुट्टी से लौटे रिपोर्टर को संपादक ने काम से रोका, दोनो में मारपीट होते होते बची, माहौल तनावपूर्ण

भोपाल : मजीठिया वेतनमान की मांग को लेकर दैनिक जागरण के सीईओ संजय गुप्ता के खिलाफ नई दुनिया, भोपाल के कर्मचारियों द्वारा सुप्रीम कोर्ट में अवमानना याचिका दायर होने के बाद जागरण अखबार प्रबंधन बौखला गया है। छुट्टी से लौटे रिपोर्टर को काम से रोकने पर गत दिनो यहां नई दुनिया के संपादक से मारपीट होते होते रह गई। इसके बाद दफ्तर का माहौल काफी तनावपूर्ण हो गया है।   

बताया गया है कि जागरण प्रबंधन नई दुनिया भोपाल के कर्मचारियों को प्रताड़ित करने लगा है, जिसको लेकर वहां माहौल तनावपूर्ण हो गया है। इसकी एक बानगी विगत दिनो उस समय देखने को मिली, जब नई दुनिया के सीनियर जर्नलिस्ट और क्राइम रिपोर्टर समर सिंह यदुवंशी छुट्टी से लौटकर कार्यालय ड्यूटी पर पहुंचे। 

यदुवंशी को ऑफिस में देखते ही संपादक सुनील शुक्ला ने सिटी चीफ को आदेश दे दिया कि समर से कोई काम न लिया जाए। इसके बाद शुक्ला ने समर को अपने चैंबर में बुलाकर उनसे छुट्टी से लौटने के बहाने आपत्तिजनक बातें कहीं। इस पर समर ने भी मुंहतोड़ जवाब देते हुए खरीखोटी सुना दी। दोनों के बीच लगभग बीस मिनट तक आपस में वाद-विवाद हुआ।

बताया जाता है कि मामला इतना बढ़ गया कि बीच बचाव के लिए स्टेट ब्यूरो और अन्य डेस्क के मीडियाकर्मियों को संपादक के चैंबर में घुसना पड़ा। संपादक हमला ही करने वाले थे कि उन्हें लोगों ने पकड़ कर रोक लिया। इस घटनाक्रम के बाद से यहां के संपादकीय स्टॉफ में काफी रोष है। उनका कहना है कि जिस व्यक्ति ने अपने पूरे पत्रकारीय जीवन में केवल मेडिकल बीट की रिपोर्टिंग की है, उसको जागरण मैनेजमेंट ने यहां का संपादक बना दिया है। जब तक प्रबंधन चुप था तो हम भी चुप रहे। अब यदि हमे परेशान किया जाएगा तो संपादक समेत अन्य अधिकारियों को भी लेबर कोर्ट में घसीटा जाएगा। 

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एबीपी न्यूज के एडिटर इन चीफ शाजी जमां अपने चैनल में न्याय क्यों नहीं कर रहे?

: कानाफूसी : एबीपी न्यूज चैनल से खबर है कि पीसीआर में कार्यरत एक वरिष्ठ महिला मीडियाकर्मी को इन दिनों न्याय की तलाश है. एडिटर इन चीफ शाजी जमां को सब कुछ पता है. लेकिन पीड़िता को न्याय नहीं मिल पा रहा. हुआ ये कि पीसीआर में कार्यरत वरिष्ठ महिला मीडियाकर्मी ने एक रोज अपने फेसबुक पेज पर बिना किसी का नाम लिए यह लिख दिया कि ‘एंकर ने कितना घटिया सवाल पूछा’.

बस, इतना लिखते ही एबीपी न्यूज चैनल की एंकर महोदय इस स्टेटस के नीचे कमेंट बाक्स में अपनी भड़ास निकालने लगीं. सूत्रों का कहना है कि एंकर ने वाकई बहुत घटिया सवाल पूछा था और इस तरह के सवाल का कल्पना कम से कम एबीपी न्यूज के एंकर से तो नहीं की जा सकती थी. फेसबुक पर विवाद बढ़ता देख बाद में आफिस के लोगों ने बीच-बचाव कर एंकर का कमेंट और महिला मीडियाकर्मी का स्टेटस हटवाया व दोनों को शांत कराया. लेकिन इसके बाद बौखलाई एंकर ने एक ग्रुप मेल भेज दिया ढेर सारे लोगों को जिसमें महिला मीडियाकर्मी पर कई तरह के आरोप लांछन लगाए गए थे.

इसे देख पीसीआर की महिला मीडियाकर्मी गुस्सा हो गईं और पुलिस में कंप्लेन कराने को तत्पर हो गईं. तब चैनल के सीनियर्स, जिसमें शाजी जमां भी शामिल हैं, ने महिला मीडियाकर्मी को शांत कराया और आफिस के अंदर ही कमेटी बनाकर पूरे मामले की जांच कराने और न्याय दिलाने का आश्वासन दिया. पर कई हफ्ते बीत गए, अब तक न तो आंतरिक जांच कमेटी बनी और न ही कोई कार्रवाई हुई. ऐसे में लोग कहने लगे हैं कि मीडिया के मसलों पर बढ़ चढ़ कर जांच कराने और न्याय दिलाने वाले शाजी जमां अपने चैनल के आंतरिक विवाद में न्याय दिलाने को क्यों तत्पर नहीं हो पा रहे हैं?

कानाफूसी कैटगरी की खबरें सुनी सुनाई बातों पर आधारित होती है. कृपया इस पर यकीन करने से पहले अपने स्तर पर तथ्यों को जांच ले. जिस किसी को उपरोक्त बातों में कोई गल्ती / असहमति नजर आती है तो वह अपनी बात नीचे कमेंट बाक्स के जरिए कह सकता है.

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डीडी महिला रिपोर्टर के बचाव में उतरे मुंबई हेड मुकेश शर्मा, लेकिन सीईओ जवाहर सिरकार नाराज, जांच शुरू

गोवा फिल्म फेस्टिवल की घटिया रिपोर्टिंग करने वाली दूरदर्शन की महिला रिपोर्टर के बचाव में उतर गए हैं डीडी के मुंबई ऑफिस के हेड मुकेश शर्मा. रिपोर्टर का बचाव करते हुए मुकेश ने कहा है कि उसके साथ कुछ तकनीकी दिक्कतें थीं, उसका इयरफोन काम नहीं कर रहा था, जिस वजह से वह शो के प्रोड्यूसर से निर्देश नहीं ले पा रही थी. वहां इतनी भीड़ थी जिसे देखकर वह नर्वस हो गई थी. हालांकि उन्होंने स्वीकार किया कि महिला रिपोर्टर की रिपोर्टिंग स्तरीय नहीं थी.

उधर, प्रसार भारती ने पूरे घटनाक्रम को ‘सिस्टम फेल्योर’ करार दिया और जांच के लिए एडीजी यानि एडिशनल डायरेक्टर जनरल को मुंबई भेजा है. प्रसार भारती के सीईओ जवाहर सिरकार का कहना है कि वह जानना चाहते हैं एक अप्रशिक्षित व्यक्ति को ऐसे महत्वपूर्ण कार्यक्रम को लाइव कवर करने के लिए क्यों भेजा गया? पिछले 7 महीनों में दूरदर्शन की यह चौथी गलती है. यह बहुत दुखद और अपमानजनक है. कैजुअल कर्मचारियों के लिए जब स्किल टेस्ट लागू किया जाता है तो इसका विरोध शुरू हो जाता है. लेकिन अब इसे लागू करना ही पड़ेगा.

अब बात खराब रिपोर्टिंग करने वाली महिला रिपोर्टर की. वीडियो वायरल होने के बाद महिला रिपोर्टर अवसाद में चली गई है. अखबार द टेलीग्राफ में छपी खबर के मुताबिक सोशल मीडिया पर अपना मजाक बनाए जाने की वजह से रिपोर्टर ने खाना-पीना भी छोड़ दिया है. उसके घरवाले बहुत परेशान हैं. रिपोर्टर की मां कहती हैं कि मेरी लड़की बहुत परेशान है और बार-बार यही कह रही है कि उसकी जिंदगी और करियर खत्म हो गया. वह 2 दिन से खाना नहीं खा रही है. अब मुंबई पुलिस की साइबर क्राइम ब्रांच में शुक्रवार को शिकायत दर्ज कराई गई है, ताकि वह वीडियो ब्लॉक किया जा सके. ज्ञात हो कि वह महिला रिपोर्टर डीडी की कैजुअल एंकर है. वह पेशेवर पत्रकार नहीं है. उसे नियमित एंकरों से कम तनख्वाह मिलती है.

मूल खबर…

दूरदर्शन की इस रिपोर्टर का लाइव कवरेज देखिए, हंसे बिना नहीं रह पाएंगे

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मेरे साथ न्याय नहीं हुआ, बुलाया गया तो मोदी के साथ रहने दिल्ली जाऊंगी : जसोदा बेन

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पत्नी जसोदाबेन का कहना है कि उनके साथ न्याय नहीं हुआ है और उन्हें वे सुविधाएं नहीं मिली हैं, जो एक पीएम की पत्नी होने के नाते उन्हें मिलनी चाहिए थीं। यदि उन्हें बुलाया जाता है तो वह दिल्ली मोदी के साथ रहने जाएंगी। सोमवार को मेहसाणा में स्कूटर की पिछली सीट पर बैठकर घर लौट रहीं जसोदाबेन से जब एक न्यूज चैनल के पत्रकार ने पूछा कि उन्होंने आरटीआई आवेदन क्यों दिया है, तो उन्होंने कहा कि उन्हें न्याय नहीं मिला है और कोई सुविधा भी नहीं मिल रही है।

अपनी सुरक्षा व्यवस्था से नाखुश जसोदाबेन ने आरटीआई के तहत आवेदन देकर खुद को मिल रही सुरक्षा का ब्योरा भी मांगा है। उन्होंने यह भी जानना चाहा है कि पीएम की पत्नी के तौर पर वह किन-किन सुविधाओं की हकदार हैं। जब उनसे पूछा गया कि यदि उन्हें बुलाया जाए तो क्या वह मोदी के साथ रहने के लिए तैयार हैं। इस पर उनका जवाब था कि बुलाया जाता है तो वह दिल्ली जाएंगी। जसोदाबेन अपने भाई अशोक मोदी के साथ गुजरात के मेहसाणा जिले के ऊंझा कस्बे में रहती हैं। मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद मेहसाणा पुलिस ने उन्हें सुरक्षा मुहैया कराई है।

सूचना के अधिकार (आरटीआई) के तहत दिए आवेदन में जसोदाबेन ने उन्हें प्रोटोकॉल के तहत मिल रही सुरक्षा से संबंधित कई दस्तावेज पुलिस विभाग से मांगे हैं। इसमें सुरक्षा मुहैया कराने के बारे में सरकार से जारी वास्तविक आदेश की प्रमाणित कॉपी भी शामिल है। उन्होंने एक प्रधानमंत्री की पत्नी को सुरक्षा मुहैया कराने के बारे में भारतीय संविधान में प्रावधान और कानूनों की भी जानकारी मांगी है। इसमें उन्होंने खुद को मुहैया मौजूदा सुरक्षा व्यवस्था पर भी नाखुशी जाहिर की है और कहा है कि पीएम की पत्नी होने के बावजूद वह सार्वजनिक वाहन से यात्रा करती हैं जबकि उनके सुरक्षा गार्ड सरकारी वाहन से चलते हैं।

जसोदाबेन ने लिखा है कि पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या उनके ही सुरक्षा गार्डों ने कर दी थी। इसके चलते उन्हें अपने सुरक्षा गार्डों से भय महसूस होता है। इसलिए सरकार उन्हें उनकी सुरक्षा में लगे हर गार्ड की तैनाती के आदेश की कॉपी दे। मेहसाणा पुलिस अधीक्षक (एसपी) जेआर मोठालिया ने बताया कि जसोदाबेन ने आरटीआई के तहत जानना चाहा है कि प्रधानमंत्री की पत्नी होने के नाते सुरक्षा को लेकर उनके क्या अधिकार हैं। उन्होंने बताया कि सोमवार को वह हमारे दफ्तर आईं और एक आरटीआई आवेदन दिया। जसोदाबेन की सुरक्षा के लिए सशस्त्र गार्डों के समेत 10 पुलिसकर्मी तैनात हैं। ये सभी दो शिफ्ट में काम करते हैं। हर शिफ्ट में पांच-पांच जवान होते हैं।

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तरुण तेजपाल को टीओआई ने अपने समारोह में वक्ता के रूप में बुलाया, विवाद के बाद कदम पीछे हटाया

तरुण तेजपाल को टीओआई (टाइम्स ऑफ़ इंडिया) द्वारा आयोजित एक साहित्यिक समारोह में निमंत्रण देने पर विवाद खड़ा हो गया है. कई वरिष्ठ पत्रकारों ने इस पर आपत्ति जताते हुए कहा है कि यौन शोषण के एक हाई प्रोफाइल अभियुक्त को इस तरह का प्लेटफार्म देना महिलाओं को ग़लत पैग़ाम देने जैसा होगा. लगभग एक साल पहले तेजपाल यौन शोषण के आरोप में गिरफ़्तार हुए थे और उन्हें इस साल जुलाई में ज़मानत मिली थी. हालाँकि उन्होंने लगातार ख़ुद पर लगों आरोपों को बेबुनियाद कहते हुए ख़ारिज किया है.

आयोजकों की तरफ से अब संपादक बच्ची करकरिया ने तरुण तेजपाल से कहा है कि वो समारोह में शामिल न हों. तरुण ‘सत्ता के अत्याचार’ विषय पर बोलने वाले थे. कुछ प्रसिद्ध हस्तियां तेजपाल को दिए गए न्योता के कारण इस समारोह में भाग नहीं ले रही हैं. प्रधानमंत्री के क़रीबी समझे जाने वाले पत्रकार स्वपन दास गुप्ता इनमें शामिल हैं. ब्लॉगर स्मिता बरूआ ने कहा तरुण तेजपाल को न्योता देने से महिलाओं को ग़लत पैग़ाम जाएगा. पैनल में तरुण तेजपाल के अलावा कांग्रेस के नेता मणिशंकर अय्यर, लेखक बशारत पीर और पत्रकार मनु जोसेफ थे.

क़ानूनी तौर पर तरुण तेजपाल का समारोह में भाग लेना अवैध नहीं था. उन्हें फ़िलहाल दोषी क़रार नहीं दिया गया है लेकिन आरोपो के कारण वे विवावदास्पद व्यक्ति ज़रूर हैं. टाइम्स ऑफ़ इंडिया की ओर से उन्हें न्योता देना भी ग़लत नहीं था. लेकिन मार्केटिंग और पब्लिसिटी क्षेत्र के कुछ लोगों को लगता है इस कदम से समारोह को पब्लिसिटी ज़रूर मिलती. अब तक टाइम्स लिट्रेरी फेस्टिवल के बारे में ज़्यादा लोगों को जानकारी नहीं थी लेकिन अब तरुण तेजपाल के सुर्ख़ियों में लौटने के बाद साहित्यिक समारोह भी सुर्ख़ियों में है.

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Shubhranshu Choudhary झूठा व्यक्ति, झूठ की बुनियाद पर खड़ी इमारत का सच जानिए : Smita Choudhary

Smita Choudhary : मेरी इस फेसबुक पोस्ट को कृपया पढें और share करें. साथ ही Shubhranshu Choudhary से प्रश्न करें. इतने झूठे व्यक्ति को अवार्ड मिलने का आधार ही यह है कि वे इंटरनेट का दुरुपयोग कर रहे हैं. यूँ तो किसी को अवार्ड मिले तो वह बधाई का पात्र होता है, लेकिन आधारभूत रूप से झूठ की बुनियाद पर खड़ी इमारत को बधाई नहीं दी जा सकती. झूठ की बुनियाद पर खड़ी इमारत तभी तो ढहेगी जब लोग सच को समझने का प्रयत्न करेंगे. मेरी पोस्ट ये है…

शुभ्रांशु चौधरी


 

Smita Choudhary : It is interesting to note that two of the nominees are known to have cases of domestic violence pending against them. They are known to have disregarded the people, the law and all that they say they stand for. I am learning the politics behind the awards. There was a time when we ( as in the CGNet Swara that I co founded) said that Awards were given to crush possibilities that were not convenient. And then our friends said that we had sold out for the growth of CGNet- actually what they meant was that the founder had sold out. They were right.

I can see that the name and fame game went to my husbands head and the person who could stand up for injustice done by his friends is now being feted for making CGNet a voluntary platform which stands for cheap technology which can grown like temples- after accepting 400,000 dollars in foreign funds and not being able to account for it? And that too by the way was not the idea of the man who claims to be the sole founder – it was the idea of a young Ashoka Fellow- Arjun Venkatraman,
And what is the credibility? The divorce petition filed by my husband in which he acknowledges both our contributions to CGNet albeit in a manner which was that of a bully. And yet, he fails to acknowledge me as co founder in any award winning ceremony. And he takes credit for Hacker Gram, and did all he could to damage both of us. Do I mind- Like Hell I do !

The idea and its implementation was mine- He was the face. Did I mind? No. Because I could say I was his wife. Proudly. Then I see that in spite of being such a horrible husband he is one of the top 100 thinkers. Then I wonder if the world is thinking at all. And then I don’t wonder. I know. And what can one mind about mindlessness. They say that people with the personality disorder he has cannot think beyond themselves. I wait for him to get insight- unlikely he will turn up at the psychiatrists or the courts.

स्मिता चौधरी के फेसबुक वॉल से.

पूरे प्रकरण को जानने-समझने के लिए इन्हें भी पढ़ें…

शुभ्रांशु चौधरी ग्लोबल थिंकर सूची में शामिल

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शुभ्रांशु पर ‘सीजी नेट’ की को-फाउंडर स्मिता चौधरी ने लगाए कई आरोप

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सीजीनेट वाले शुभ्रांशु चौधरी को एक्सपोज करेंगी उनकी पत्नी स्मिता चौधरी, पढ़िए मेल

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अपनी जाति बताने के लिये शुक्रिया राजदीप सरदेसाई

Vineet Kumar : राजदीप की इस ट्वीट से पहले मुझे इनकी जाति पता नहीं थी..इनकी ही तरह उन दर्जनों प्रोग्रेसिव मीडियाकर्मी, लेखक और अकादमिक जगत के सूरमाओं की जाति को लेकर कोई आईडिया नहीं है..इनमे से कुछ वक्त-वेवक्त मुझसे जाति पूछकर अपनी जाति का परिचय दे जाते हैं..और तब हम उनकी जाति भी जान लेते हैं.

वैसे तो इस देश में जहाँ अधिकाँश चीजें जाति से ही तय होती है,ऐसे में अपने परिचित क्या,राह चलते किसी भी व्यक्ति की जाति जान लेना बेहद आसान काम है लेकिन उतना ही मुश्किल है किसी प्रोग्रेसिव की जान लेना..वो बताते तो हैं और बरतते भी हैं,बस अपने को उस नॉक पॉइंट को पकड़ना आना चाहिये..और तब आप जो उनकी जाति जानेंगे वो सामाजिक रूप से तो आपके किसी काम का नहीं होगा लेकिन आपकी समझदारी बढ़ाने के बहुत काम आयेगा..आपको क्या लगता है, राजदीप का शुक्रिया अपनी जाति सारस्वत ब्राह्मण बताने पर अदा किया है?

युवा मीडिया विश्लेषक विनीत कुमार के फेसबुक वॉल से.

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मौलाना आजाद की जयंती पर मेनस्ट्रीम मीडिया द्वारा पुरानी स्टोरी गरम करके परोसने के मायने

Vineet Kumar : आज यानी 11 नवम्बर को मौलादा अबुल कलाम आजाद की जयंती है. इस मौके पर मेनस्ट्रीम मीडिया ने तो कोई स्टोरी की और न ही इसे खास महत्व दिया. इसके ठीक उलट अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में उनके ना से जो लाइब्रेरी है, उससे जुड़ी दो साल पुरानी बासी स्टोरी गरम करके हम दर्शकों के आगे न्यूज चैनलों ने परोस दिया. विश्वविद्यालय के दो साल पहले के एक समारोह में दिए गए बयान को शामिल करते हुए ये बताया गया कि इस लाइब्रेरी में लड़कियों की सदस्यता दिए जाने की मनाही है. हालांकि वीसी साहब ने जिस अंदाज में इसके पीछे वाहियात तर्क दिए हैं, उसे सुनकर कोई भी अपना सिर पीट लेगा. लेकिन क्या ठीक मौलाना आजाद की जयंती के मौके पर इस स्टोरी को गरम करके परोसना मेनस्ट्रीम मीडिया की रोचमर्रा की रिपोर्टिंग और कार्यक्रम का हिस्सा है या फिर अच्छे दिनवाली सरकार की उस रणनीति की ही एक्सटेंशन है जिसमे बरक्स की राजनीति अपने चरम पर है. देश को एक ऐसा प्रधानसेवक मिल गया है जो कपड़ों का नहीं, इतिहास का दर्जी है. उसकी कलाकारी उस दर्जी के रूप में है कि वो भले ही पाजामी तक सिलने न जानता हो लेकिन दुनियाभर के ब्रांड की ट्राउजर की आल्टरेशन कर सकता है. वो एक को दूसरे के बरक्स खड़ी करके उसे अपनी सुविधानुसार छोटा कर सकता है. मेनस्ट्रीम मीडिया की ट्रेंनिंग कहीं इस कलाकारी से प्रेरित तो नहीं है?

मीडिया के पास इस बात का तर्क हो सकता है कि ऐसे मौके पर अगर मौलादा आजाद के नाम की लाइब्रेरी का सूरत-ए-हाल लिया जाता है तो इसमें बुराई क्या है ? तब तो उन्हें सरदार वल्लभ भाई पटेल के नाम पर पिछले दिनों जब देश ने एकता दिवस मनाया तो मेनस्ट्रीम मीडिया को ये बात प्रमुखता से शामिल की जानी चाहिए थी कि जो शख्स आकाशवाणी से मिराशियों को इस बिना पर गाने से रोक दिए जाने के आदेश देता है कि इससे समाज पर बुरा असर पड़ेगा, आखिर उसके नाम पर एकता दिवस कैसे मनाया जा सकता है ? मीडिया इतिहास और वर्तमान के तार जोड़ने में अगर इतना ही माहिर है तो फिर उसके तार एक के लिए जुड़कर राग मालकोश क्यों फूटते हैं और दूसरे के लिए कर्कश क्या पूरी तरह तार ही टूट जाते हैं.

मेरी ही एफबी स्टेटस पर टिप्पणी करते हुए( Animesh Mukharje) ने हमें ध्यान दिलाया है कि एएमयू के वीसी के बयान और लाइब्रेरी में लड़की-छात्र के साथ भेदभाव मामले को लेकर हंगामा मचा हुआ है, इस पर निधि कुलपति ने बहुत पहले स्टोरी की थी लेकिन किसी ने इसे सीरियली नहीं लिया.. अनिमेश एक तरह से बता रहे हैं कि हम दर्शकों की यादाश्त कई बार चैनलों से ज्यादा होती है.

Vineet Kumar : दो साल बाद मीडिया ने अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के वीसी के बयान को जिस तरह यूट्यूब से खोदकर निकाला है, ये उस बयान को ऐसे दौर में इस्तेमाल करने की कोशिश है जिससे पूरे देश को ये संदेश दिया जा सके कि देखो मुसलमानों के नाम का ये मशहूर विश्वविद्यालय जिस पर खामखां आप गर्व करते रहे, लड़कियों को लेकर क्या रवैया रखता है ? नहीं तो वीसी साहब के इस बयान पर आज से दो साल पहले जब सभागार में तालियां पिटी थी, उस वक्त मीडिया क्या सुंदरकांड का पाठ कर रहा था ? तब यूपीए की सरकार थी और इस पर ज्यादा बात करने का मतलब था- सेकुलर राजनीति पर चोट करना लेकिन अब ? बाकी ऐसी बातें क्या मुस्लिम क्या हिन्दू संस्थान, कुढ़मगजी क्या जाति और संप्रदाय देखकर पनपती है?

Vineet Kumar : देश के हिन्दू शैक्षणिक संस्थानों में सब मामला ठीक है न ? मतलब वहां तो लड़कियों को लेकर कोई भेदभाव नहीं है कि हवन-पूजन स्थल पर रजस्वला( पीरियड्स) के दौरान यहां गमन करना मना है..इसे अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के वीसी के अंग्रेजी में दिए गए बयान की बायनरी मत समझ लीजिएगा, बस ये है कि हमें इन संस्थानों को लिंग-भेद रहित संस्थान करार देने की बेचैनी है.

Vineet Kumar : आपको निजी संस्थान स्वर्ण मुकुट से नवाजेंगे एमयू के वीसी साहब… आप देश के किसी भी निजी शिक्षण संस्थान चाहे वो मेडिकल, इंजीनियरिंग, मीडिया, एमबीए,बीएड या सामान्य कोर्स के कॉलेज, यूनिवर्सिटी हों, के विज्ञापन, होर्डिंग्स, पोस्टर पर एक नजर मार लें.. आप पाएंगे कि लैब में मेंढ़क का चीरा लड़की लगा रही है, ताम्रपत्र की तरह एक्सेल सीट लड़की फैलाकर आंख गड़ाए हुई है, स्केल-फीते से वो नाप-जोख का काम कर रही है.वही कैमरे से शूट कर रही है, उसी के हाथ में चैनल की माइक है. कुछ संस्थानों में तो कोएड होने के बावजूद सिरे से लड़के ऐसे गायब होते हैं कि एकबारगी तो आपको “सिर्फ लड़कियों के लिए” होने का भ्रम पैदा हो जाए…सवाल है, ये सब किसलिए और किसके लिए ? स्वाभाविक है संस्थान की ब्रांड पोजिशनिंग इस तरह से करने के लिए कि लड़के एडमिशन लेकर चट न जाएं. अंडरटोन यही होती है कि यहां वो खुलापन है, उस दोस्ती की गुंजाईश है जिसकी उम्मीद में आप कॉलेज-संस्थान जाते हो..फर्क सिर्फ इतना है कि सलून और जिम अलग से यूनिसेक्स लिख देते हैं और ये इसके लिए कोएड या सहशिक्षा शब्द का प्रयोग करते हैं.. ग्लैमरस बनाने के लिए और दूसरी तरफ लगे हाथ लड़कियों को भी ये भी बताने के लिए जहां पहले से आपकी इतनी सीनियर्स और दीदीयां पढ़ती आयीं हैं, वहां आप बिल्कुल सुरक्षित हो. गार्जियन को ये कन्विंस करने के लिए कि जो संस्थान लड़कियों को ये सब करने की छूट दे रहा है वो भला ऐेंवे टाइप का संस्थान कैसे हो सकता है ? कुल मिलाकर इन निजी संस्थान को बाजार की गहरी समझ है. उन्हें पता है कि छात्रनुमा ग्राहक सार्वजनिक शिक्षण संस्थानों से किस बात का मारा है, किस बात से चट चुका है और किस चीज पर लट्टू होता है ? लड़कियों की तस्वीरें थोक में लगाने के पीछे उनकी ये बिजनेस स्ट्रैटजी काम करती है. वो ऐसा करके एक ही साथ बाजार को भी साध लेता है, उस तथाकथित प्रोग्रेसिव समाज को भी जिसे और बंदिशें नहीं चाहिए और सार्वजनिक संस्थानों का बाप बनकर भी खड़ा हो जाता है. नहीं तो इन तस्वीरों के पीछे जाकर देखिए, क्या आप दावा कर सकते हैं कि इन निजी संस्थानों में लड़कियों के साथ किसी तरह के भेदभाव नहीं किए जाते, शोषण नहीं होता. इधर सार्वजनिक संस्थान, ताजा मामला अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के कुलपति के उस बेहूदा बयान और रवैये को ही लें जिसे पिछले दो साल से मीडिया अंडे की तरह सेवता रहा और अब यूटीवी की खान से खोदकर लाया है- लड़कियों को लेकर बिल्कुल उलट रवैया..उसके लिए कम से कम जगह..एक तरह से अघोषित रुप से ये कहने की कोशिश-यहां लड़कियां न ही आएं तो अच्छा..अब देखिए इसकी मीडिया में आलोचना..जमकर, धुंआधार..और हो भी क्यों न..एक तो महावाहियात बात और दूसरा कि हर तीसरे चैनल का प्रायोजक अमेटी इन्टरनेशनल, मानव रचना, गलगोटिया जैसे निजी संस्थान हों..ऐसे कुलपति तो उनके सपूत बनकर काम कर रहे हैं. लेकिन गंभीरता से सोचें तो क्या ये अपने आप में सवाल नहीं है कि जब निजी संस्थान अपने बाजार से रग-रग वाकिफ है तो क्या सार्वजनिक संस्थानों को अपने समाज को इसका आधा भी वाकिफ नहीं होना चाहिए ? कुलपति का ये बयान ये बताने के लिए काफी है कि वो न तो अपने इस बदलते समाज को समझ रहे हैं, न समाज की जरूरत को और लड़कियों के शिक्षित होने के महत्व..खैर, इसे तो रहने ही दीजिए..लाइब्रेरी में वैसे ही पहले से जानेवालों की संख्या तेजी से घटी है, वो जल्द ही किताबों की कब्रगाह बनकर रह जाए, आप जैसे महाशय देते रहिए ऐसे बयान.

युवा मीडिया विश्लेषक विनीत कुमार के फेसबुक वॉल से.

Samar Anarya : कई तथ्य गड़बड़ हो गए हैं विनीत. जैसे कि यह 2 साल पुराना बयान नहीं बल्कि परसों का है. बाकी यह रहे.

1. यह मामला मीडिया ने किसी साजिश में नहीं उछाला है. वीसी साहब का एएमयू छात्रसंघ के उद्घाटन के वक्त अपना बयान है. यह बयान उन्होंने वीमेंस कॉलेज छात्रसंघ की माँग के जवाब में दिया है, और कॉलेज की प्रिंसिपल बयान/फैसले के समर्थन में हैं.

2. वीसी साहब ने कहा है कि लड़कियाँ आयीं तो लाइब्रेरी में चार गुना ज्यादा लड़के आएंगे, जगह नहीं बचेगी। यह वह नुक्ता है जिसको सारे ‘सेकुलर’ भूले बैठे हैं. इस बयान की अपनी मिसाजाइनी, औरतों से नफ़रत, पर उनका कोई ध्यान नहीं है.

3. तीसरा तर्क कि मौलाना आज़ाद लाइब्रेरी में पोस्टग्रेजुएट (परास्नातक) लडकियों को पढ़ने की इजाजत है इसीलिए यह मीडिया साजिश है. इस बयान का नुक्ता यह है कि इसी लाइब्रेरी में अंडरग्रेजुएट लड़कों को भी पढ़ने की इजाजत है. जगह नहीं है तो किसी के लिए न होगी, लड़कों के लिए है लड़कियों के लिए नहीं? इस पर सोचने का वक़्त कट्टर सेकुलरों के पास नहीं है. (यह बात पता न हो यह मानना जरा मुश्किल है).

4. वीमेंस कॉलेज छात्रसंघ की सदर गुलफिज़ां खान ने कहा था कि जगह की दिक्कत हो तो किताबें इश्यू की जायें वह इस पर भी तैयार हैं, यह मसला भी बहस से खारिज है. तमाम लोग दूरी का तर्क दे रहे हैं, वीमेंस कैम्पस लाइब्रेरी से 3 किलोमीटर दूर है, वहाँ तक आने में लड़कियों को दिक्कत होगी। पर फिर केवल अंडरग्रेजुएट लड़कियों को? पोस्टग्रेजुएट लड़कियाँ कैसे पँहुच जाती हैं?

5. एक और तर्क है कि यह कैम्पस के भीतर के एक तबके की साजिश है. दिक्कत यह कि यह तर्क बहुत पुराना है. एक लड़की का दुपट्टा खींचने के आरोपों के बीच जेएनयू तक में हुई तीखी लड़ाइयों के दौर से दिया जा रहा तर्क। तब के जनरल सेक्रेटरी ने बाकायदा बयान दिया था कि दुपट्टा खींचा भी गया हो तो दुपट्टा खींचना कोई सेक्सुअल हरैसमेंट नहीं है. उस दौर में जिन कुछ एएमयू वालों से हाथापाई तक की नौबत आ गयी थी, लोगों ने बड़ी मुश्किल से अलग किया था वह अब अच्छे दोस्त हैं. जैसे Shadan Khan, Khalid Sharfuddin… इनसे भी इस नुक्ते की दरयाफ़्त की जा सकती है. इसकी भी कि एएमयू को बदनाम करने की साजिश वाला तर्क भी तभी से चला आ रहा है.
6. अंत में यह कि जनाब दुनिया के किसी ठीक ठीक शहर में अलीग बोल देने पर तमाम आँखों में चमक भर देने वाला एएमयू किसी इमाम बुखारी का इस्लाम या किसी तोगड़िया का हिन्दू धर्म नहीं है जो किसी वीसी की मर्दवादी सोच के विरोध से, उसकी मुखालफत से खतरे में पड़ जाए.

अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकारवादी समर अनार्या के फेसबुक वॉल से.

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