अयोध्या विवाद पर अंतिम फैसले की घड़ी!

अजय कुमार, लखनऊ

अयोध्या विवाद (बाबरी मस्जिद-रामजन्मभूमि विवाद) फिर सुर्खिंया बटोर रहा है। देश की सर्वोच्च अदालत कल (11 अगस्त 2017) से इस एतिहासिक विवाद का हल निकालने के लिये नियमित सुनवाई करने जा रही है। अदालत जो भी फैसला करेगा उसे दोंनो ही पक्षों को मानना होगा, लेकिन देश में मोदी और प्रदेश में योगी सरकार बनने के बाद ऐसा लगने लगा है कि अब इस मसले पर सियासत बंद होगी और कोई फैसला सामने आयेगा। उक्त विवाद करोड़ों हिन्दुओं की आस्था से जुड़ा हुआ मसला है तो कुछ मुस्लिम संगठन इस पर अपनी दावेदारी ठोेक रहे हैं। करीब पांच सौ वर्ष पुराने इस विवाद ने कई उतार-चढ़ाव देखे हैं।

उम्रदराजी की छूट अगर नीलाभ को मिली तो वागीश सिंह को क्यों नहीं?

Amitesh Kumar : हिंदी का लेखक रचना में सवाल पूछता है, क्रांति करता है, प्रतिरोध करता है..वगैरह वगैरह..रचना के बाहर इस तरह की हर पहल की उम्मीद वह दूसरे से करता है. लेखक यदि एक जटिल कीमिया वाला जीव है तो उसका एक विस्तृत और प्रश्नवाचक आत्म भी होगा. होता होगा, लेकिन हिंदी के लेखक की नहीं इसलिये वह अपनी पर चुप्पी लगा जाता है. लेकिन सवाल फिर भी मौजूद रहते हैं.

दैनिक जागरण नोएडा के 18 मीडियाकर्मी टर्मिनेट, प्रबंधन ने बाउंसर बुलाया, पुलिस फोर्स तैनात

दैनिक जागरण नोएडा की हालत बेहद खराब है. यहां मीडियाकर्मियों का जमकर उत्पीड़न किया जा रहा है और कानून, पुलिस, प्रशासन, श्रम विभाग, श्रम कानून जैसी चीजें धन्नासेठों के कदमों में नतमस्तक हैं. बिना किसी वजह 18 लोगों को टर्मिनेट कर उनका टर्मिनेशन लेटर गेट पर रख दिया गया. साथ ही प्रबंधन ने बाउंसर बुलाकर गेट पर तैनात करा दिया है. भारी पुलिस फोर्स भी गेट पर तैनात है ताकि मीडियाकर्मियों के अंदर घुसने के प्रयास को विफल किया जा सके. टर्मिनेट किए गए लोग कई विभागों के हैं. संपादकीय, पीटीएस से लेकर मशीन, प्रोडक्शन, मार्केटिंग आदि विभागों के लोग टर्मिनेट किए हुए लोगों में शामिल हैं.

ओम थानवी के लिए एक लाख रुपये चंदा इकट्ठा करने की अपील ताकि वो फिर किसी कल्याण के हाथों एवार्ड न लें

Mohammad Anas : ओम थानवी जी की मदद की अपील —- दोस्तों, हम सबके बेहद प्रीय जनसत्ता के पूर्व सम्पादक ओम थानवी जी अब नौकरी से रिटायर हो गए हैं. उन्होंने केके बिरला फाउंडेशन द्वारा अपनी किताब के लिए बाबरी विध्वंस के आरोपी कल्याण सिंह के हाथ से एक लाख रुपए का पुरूस्कार लिया है. कल्याण न सिर्फ बाबरी विध्वंस के आरोपी हैं बल्कि उन पर सांप्रदायिक माहौल बिगाड़ने के लिए हेट स्पीच, दंगा भड़काने, घोटाले तक के आरोप लगे हुए हैं. जैसे तालिबान का मुल्ला उमर वैसे ही भाजपा के कल्याण सिंह. फेसबुक पर श्री ओम थानवी जी ने लिखा है कि पुरूस्कार लेने से मेरे दुश्मनों को दिक्कत हो गई है.

Om जी के पास के.के. बिड़ला पुरस्‍कार देने वाले को चुनने की सुविधा नहीं थी!

Abhishek Srivastava : जिस तरह Om जी के पास के.के. बिड़ला पुरस्‍कार देने वाले को चुनने की सुविधा नहीं थी, उसी तरह Uday जी को मुख्‍य अतिथि चुनने की सुविधा नहीं थी या काशीनाथ सिंह को भारत भारती लेते वक्‍त उत्‍तर प्रदेश की मनपसंद सरकार चुनने की सुविधा नहीं थी। जिस तरह ओमजी ने पुरस्‍कार कल्‍याण सिंह के हाथों नहीं बल्कि राज्‍यपाल के हाथों से लिया है, ठीक वैसे ही नरेश सक्‍सेना ने रमण सिंह से नहीं बल्कि एक जनप्रतिनिधि से हाथ मिलाया था और नामवरजी ने नरेंद्र मोदी के साथ नहीं बल्कि लोकतंत्र में चुने गए एक प्रधानमंत्री के साथ ज्ञानपीठ का मंच साझा किया था।

कल्याण सिंह के हाथों पुरस्कार लेने पर ओम थानवी सोशल मीडिया पर घिरे

Neelabh Ashk : मत छेड़ फ़साना कि ये बात दूर तलक जायेगी. ओम तो गुनहगार है ही, हिन्दी के ढेरों लोग किसी न किसी मौक़े पर और किसी न किसी मात्रा में गुनहगार हैं. इस हमाम में बहुत-से नंगे हैं. पुरस्कार पाने वाले की पात्रता के साथ पुरस्कार देने वाली की पात्रता भी देखी जानी चाहिए। ऐसी मेरी मान्यता है. मैंने साहित्य अकादेमी का पुरस्कार लौटा दिया था. मेरी मार्क्स की पढ़ाई ने मुझे पहला सबक़ यह दिया था कि कर्म विचार से प्रेरित होते हैं. 55 साल बाद तुम चाहते हो मैं इस सीख को झुठला दूं. ओम की कथनी और करनी में इतना फ़र्क़ इसलिए है कि सभ्यता के सफ़र में इन्सान ने पर्दे जैसी चीज़ ईजाद की है. ईशोपनिषद में लिखा है कि सत्य का मुख सोने के ढक्कन के नीचे छुपा है. तुम सत्य को उघाड़ने की बजाय उस पर एक और सोने का ढक्कन रख रहे हो. ये ओम के विचार ही हैं जो उसे पुरस्कार>बिड़ला>राज्यपाल>कल्याण सिंह की तरफ़ ले गये. मैं बहुत पहले से यह जानता था. मुझे कोई अचम्भा नहीं हुआ. मैं ओम की कशकोल में छदाम भी न दूं. और अगर यह मज़ाक़ है तो उम्दा है, पर हिन्दी के पद-प्रतिष्ठा-पुरस्कार-सम्मान-लोभी जगत पर इसका कोई असर नहीं होगा.

म.प्र. : एक बार फिर सुर्खियों में सिविल सेवा परीक्षा विवाद

मध्यप्रदेश लोक सेवा आयोग द्बारा आयोजित होने वाली प्रतियोगी परीक्षाएं बिना किसी विवाद के संचालित हो जाएं, यह कई वर्षों से सम्भव नहीं हो पा रहा है। ताजा मामला प्रदेश की सिविल सेवा परीक्षा-2०14 की प्रारम्भिक परीक्षा का है। यह परीक्षा 9 मई 2०15 को सम्पन्न हुई जिसके परिणाम जुलाई माह में जारी हुए हैं। आयोग ने अपनी बेवसाइट पर विभिन्न कटेगरी के लिए ‘कटऑफ’ मार्क्स जारी किए हैं, जिसको लेकर प्रतियोगी परीक्षार्थियों में असंतोष है और उनका दावा है कि उन्होंने आयोग द्बारा घोषित ‘कटऑफ ’ मार्क्स से अधिक अंक हासिल किए हैं, लेकिन आयोग को इससे कोई लेना-देना नहीं है। 

इबलीस की शैतानी ताकत के खिलाफ एकजुट हों आध्यात्मिकतावादी

केरल के बाद अब दिल्ली में भी मैगी की बिक्री को पंद्रह दिन के लिए प्रतिबंधित कर दिया गया है। उधर सेना ने भी अपने डिपार्टमेंटल स्टोरों से मैगी की बिक्री पर रोक लगा दी है। मैगी को लेकर जबरदस्त हंगामा मचा हुआ है। इसकी शुरूआत उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जनपद से हुई जहां मैगी के नमूने प्रयोगशाला में परीक्षण के लिए भेजे गए थे जिसमें यह रिपोर्ट आई कि मैगी में जस्ते की मात्रा सुरक्षा मानकों से काफी ज्यादा है। इसके बाद उत्तर प्रदेश के अन्य जिलों में और साथ ही दूसरे राज्यों में भी ताबड़तोड़ मैगी के नमूनों का परीक्षण कराया गया। लगभग सभी जगह अभी तक की रिपोर्ट के अनुसार मैगी के नूडल्स को खाना स्वास्थ्य के लिए हानिप्रद माना गया है। हालांकि बंगला देश ने मैगी को क्लीन चिट दे दी है। 

मुकेश ने एफबी पर हुई कुछ चैट सार्वजनिक कर दोष ऋचा पर भी मढ़ा, बाद में ‘सॉरी’ बोल दिया

Mukesh Kumar Sinha : ऋचा से मेरी पहले कभी बात नहीं हुई. शुरुआत उसने की कविता शेयर करने से लेकर और फिर उसने बातों को मोड़ा. मैं कन्फर्म हो गया एक फेक प्रोफाइल है इसलिए अंत उसके अनुसार हुआ.

(चैट पढ़ने के लिए उपरोक्त पिक्चर पर क्लिक कर दें.)

‘हमिंग बर्ड’ वाले मुकेश कुमार सिन्हा की कविता क्या पसन्द कर ली, वह ‘किस’ मांगने लगा!

रश्मि ऋचा सिंह : ये है साहित्य का असली चेहरा. यही तो करने आते हैं आप यहाँ? दोस्ती करो तो हद से आगे निकल जाओगे आप… ये आपके मुकेश कुमार सिन्हा हैं ‘हमिंग बर्ड’ वाले. जरा सा कविता क्या पसन्द कर ली. जरा सा दोस्ती क्या कर ली, ये तो अपनी पर ही उतर आये. इनको मेरा ‘किस’ चाहिए. अब यहाँ से मन भर गया. नमस्कार!

नीलाभ अश्क ने दुखी मन से चुप्पी तोड़ी, भूमिका की चौंकाने वाली अनकही दास्तान से पर्दा उठाया

प्रसिद्ध साहित्यकार उपेंद्रनाथ अश्क के पुत्र एवं जाने माने लेखक-रंगकर्मी नीलाभ अश्क ने कई दिन बाद आज अपने घरेलू घटनाक्र में चुप्पी तोड़ी। भड़ास4मीडिया से अपना दुख-दर्द साझा करते हुए उन्होंने कहा कि जो कुछ हो रहा है, ठीक नहीं है। मेरे लिए असहनीय है। मैं मर्यादाओं की सीमा तोड़कर ऐसी नीजी बातें सार्वजनिक रूप से साझा नहीं करना चाहता था लेकिन मुझे विवश किया गया है। बाकी जिन्हें करीब से सारी सच्चाई मालूम है, वे भी मेरी अप्रसन्नता के साथ भूमिका द्विवेदी उनकी मां की ताजा घिनौनी हरकतों पर क्षुब्ध और अचंभित हैं। मेरा पूरा अतीत देश के ज्यादातर हिंदी साहित्यकारों, पत्रकारों, रंगकर्मियों, सामाजिक सरोकार रखने वाले लोगों के बीच सुपरिचित है। मुझे अपने रचनाकर्म, अपनी आदमीयत और अपने शानदार पारिवारिक अतीत के बारे में कुछ नहीं बताना है। मुझ पर थोपे जा रहे घटिया लांछन विचलित करते हैं, इसलिए अब कुछ कहना आवश्यक हो गया है। 

लखनऊ सहारा में तुगलकी फरमान पर मचा बवाल, हालात विस्फोटक

लखनऊ : राष्ट्रीय सहारा की लखनऊ यूनिट में इन दिनो एक तुगलकी फरमान को लेकर माहौल काफी तनावपूर्ण है। स्थिति विस्फोटक होने का अंदेशा जताया गया है। सारा बवाल यूनिट हेड मुनीश सक्सेना के उस नोटिस पर मचा हुआ है, जिसमें उन्होंने समस्त स्टॉफ को आदेश दिया है कि अब एक बार इंटर करने के बाद कोई भी व्यक्ति चाय पीने अथवा अन्य किसी काम से बाहर निकला तो उसे रजिस्टर में उल्लेख करने के साथ ही आदेश की स्लिप लेनी होगी और लौटने के बाद वह स्लिप विभागाध्यक्ष को देकर अवगत कराना पड़ेगा कि वह ड्यूटी पर आ गया है। 

पांडे, तिवारी और बोधिसत्व का बाभनावतार… तीनों एकसाथ गालियां बक रहे हैं : अनिल कुमार सिंह

Anil Kumar Singh : उदय प्रकाश जी को गरियाते -गरियाते खूंखार जातिवादी और सांप्रदायिक भेडियों का झुण्ड मुझ पर टूट पड़ा है. ये दुष्प्रचारक अपने झूठ की गटर में मुझे भी घसीट लेना चाहते हैं. दो कौड़ी के साम्प्रदायिकता और अन्धविश्वास फ़ैलाने वाले टी वी सीरियलों का घटिया लेखक मुझे गुंडा बता रहा है. ये परम दर्जे का झूठा है और अपने घटिया कारनामों के लिए शिवमूर्ति जैसे सरल और निश्छल लेखक को ढाल बनाता रहा है. इसे मेरी भाषा पर आपत्ति है. कोई बताओ कि ऐसे गिरे व्यक्ति के लिए किस भाषा का प्रयोग किया जाय. और, आमना -सामना होने पर इससे कैसा व्यवहार किया जाय.

छुट्टी से लौटे रिपोर्टर को संपादक ने काम से रोका, दोनो में मारपीट होते होते बची, माहौल तनावपूर्ण

भोपाल : मजीठिया वेतनमान की मांग को लेकर दैनिक जागरण के सीईओ संजय गुप्ता के खिलाफ नई दुनिया, भोपाल के कर्मचारियों द्वारा सुप्रीम कोर्ट में अवमानना याचिका दायर होने के बाद जागरण अखबार प्रबंधन बौखला गया है। छुट्टी से लौटे रिपोर्टर को काम से रोकने पर गत दिनो यहां नई दुनिया के संपादक से मारपीट होते होते रह गई। इसके बाद दफ्तर का माहौल काफी तनावपूर्ण हो गया है।   

एबीपी न्यूज के एडिटर इन चीफ शाजी जमां अपने चैनल में न्याय क्यों नहीं कर रहे?

: कानाफूसी : एबीपी न्यूज चैनल से खबर है कि पीसीआर में कार्यरत एक वरिष्ठ महिला मीडियाकर्मी को इन दिनों न्याय की तलाश है. एडिटर इन चीफ शाजी जमां को सब कुछ पता है. लेकिन पीड़िता को न्याय नहीं मिल पा रहा. हुआ ये कि पीसीआर में कार्यरत वरिष्ठ महिला मीडियाकर्मी ने एक रोज अपने फेसबुक पेज पर बिना किसी का नाम लिए यह लिख दिया कि ‘एंकर ने कितना घटिया सवाल पूछा’.

डीडी महिला रिपोर्टर के बचाव में उतरे मुंबई हेड मुकेश शर्मा, लेकिन सीईओ जवाहर सिरकार नाराज, जांच शुरू

गोवा फिल्म फेस्टिवल की घटिया रिपोर्टिंग करने वाली दूरदर्शन की महिला रिपोर्टर के बचाव में उतर गए हैं डीडी के मुंबई ऑफिस के हेड मुकेश शर्मा. रिपोर्टर का बचाव करते हुए मुकेश ने कहा है कि उसके साथ कुछ तकनीकी दिक्कतें थीं, उसका इयरफोन काम नहीं कर रहा था, जिस वजह से वह शो के प्रोड्यूसर से निर्देश नहीं ले पा रही थी. वहां इतनी भीड़ थी जिसे देखकर वह नर्वस हो गई थी. हालांकि उन्होंने स्वीकार किया कि महिला रिपोर्टर की रिपोर्टिंग स्तरीय नहीं थी.

मेरे साथ न्याय नहीं हुआ, बुलाया गया तो मोदी के साथ रहने दिल्ली जाऊंगी : जसोदा बेन

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पत्नी जसोदाबेन का कहना है कि उनके साथ न्याय नहीं हुआ है और उन्हें वे सुविधाएं नहीं मिली हैं, जो एक पीएम की पत्नी होने के नाते उन्हें मिलनी चाहिए थीं। यदि उन्हें बुलाया जाता है तो वह दिल्ली मोदी के साथ रहने जाएंगी। सोमवार को मेहसाणा में स्कूटर की पिछली सीट पर बैठकर घर लौट रहीं जसोदाबेन से जब एक न्यूज चैनल के पत्रकार ने पूछा कि उन्होंने आरटीआई आवेदन क्यों दिया है, तो उन्होंने कहा कि उन्हें न्याय नहीं मिला है और कोई सुविधा भी नहीं मिल रही है।

तरुण तेजपाल को टीओआई ने अपने समारोह में वक्ता के रूप में बुलाया, विवाद के बाद कदम पीछे हटाया

तरुण तेजपाल को टीओआई (टाइम्स ऑफ़ इंडिया) द्वारा आयोजित एक साहित्यिक समारोह में निमंत्रण देने पर विवाद खड़ा हो गया है. कई वरिष्ठ पत्रकारों ने इस पर आपत्ति जताते हुए कहा है कि यौन शोषण के एक हाई प्रोफाइल अभियुक्त को इस तरह का प्लेटफार्म देना महिलाओं को ग़लत पैग़ाम देने जैसा होगा. लगभग एक साल पहले तेजपाल यौन शोषण के आरोप में गिरफ़्तार हुए थे और उन्हें इस साल जुलाई में ज़मानत मिली थी. हालाँकि उन्होंने लगातार ख़ुद पर लगों आरोपों को बेबुनियाद कहते हुए ख़ारिज किया है.

Shubhranshu Choudhary झूठा व्यक्ति, झूठ की बुनियाद पर खड़ी इमारत का सच जानिए : Smita Choudhary

Smita Choudhary : मेरी इस फेसबुक पोस्ट को कृपया पढें और share करें. साथ ही Shubhranshu Choudhary से प्रश्न करें. इतने झूठे व्यक्ति को अवार्ड मिलने का आधार ही यह है कि वे इंटरनेट का दुरुपयोग कर रहे हैं. यूँ तो किसी को अवार्ड मिले तो वह बधाई का पात्र होता है, लेकिन आधारभूत रूप से झूठ की बुनियाद पर खड़ी इमारत को बधाई नहीं दी जा सकती. झूठ की बुनियाद पर खड़ी इमारत तभी तो ढहेगी जब लोग सच को समझने का प्रयत्न करेंगे. मेरी पोस्ट ये है…

शुभ्रांशु चौधरी


 

अपनी जाति बताने के लिये शुक्रिया राजदीप सरदेसाई

Vineet Kumar : राजदीप की इस ट्वीट से पहले मुझे इनकी जाति पता नहीं थी..इनकी ही तरह उन दर्जनों प्रोग्रेसिव मीडियाकर्मी, लेखक और अकादमिक जगत के सूरमाओं की जाति को लेकर कोई आईडिया नहीं है..इनमे से कुछ वक्त-वेवक्त मुझसे जाति पूछकर अपनी जाति का परिचय दे जाते हैं..और तब हम उनकी जाति भी जान लेते हैं.

मौलाना आजाद की जयंती पर मेनस्ट्रीम मीडिया द्वारा पुरानी स्टोरी गरम करके परोसने के मायने

Vineet Kumar : आज यानी 11 नवम्बर को मौलादा अबुल कलाम आजाद की जयंती है. इस मौके पर मेनस्ट्रीम मीडिया ने तो कोई स्टोरी की और न ही इसे खास महत्व दिया. इसके ठीक उलट अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय में उनके ना से जो लाइब्रेरी है, उससे जुड़ी दो साल पुरानी बासी स्टोरी गरम करके हम दर्शकों के आगे न्यूज चैनलों ने परोस दिया. विश्वविद्यालय के दो साल पहले के एक समारोह में दिए गए बयान को शामिल करते हुए ये बताया गया कि इस लाइब्रेरी में लड़कियों की सदस्यता दिए जाने की मनाही है. हालांकि वीसी साहब ने जिस अंदाज में इसके पीछे वाहियात तर्क दिए हैं, उसे सुनकर कोई भी अपना सिर पीट लेगा. लेकिन क्या ठीक मौलाना आजाद की जयंती के मौके पर इस स्टोरी को गरम करके परोसना मेनस्ट्रीम मीडिया की रोचमर्रा की रिपोर्टिंग और कार्यक्रम का हिस्सा है या फिर अच्छे दिनवाली सरकार की उस रणनीति की ही एक्सटेंशन है जिसमे बरक्स की राजनीति अपने चरम पर है. देश को एक ऐसा प्रधानसेवक मिल गया है जो कपड़ों का नहीं, इतिहास का दर्जी है. उसकी कलाकारी उस दर्जी के रूप में है कि वो भले ही पाजामी तक सिलने न जानता हो लेकिन दुनियाभर के ब्रांड की ट्राउजर की आल्टरेशन कर सकता है. वो एक को दूसरे के बरक्स खड़ी करके उसे अपनी सुविधानुसार छोटा कर सकता है. मेनस्ट्रीम मीडिया की ट्रेंनिंग कहीं इस कलाकारी से प्रेरित तो नहीं है?