रवीश कुमार-
लोकसभा में गोदी मीडिया और आईटी सेल का बनाया कंटेंट टिक नहीं पाया। विपक्ष के सांसदों ने ठीक से घेरा और तैयारी के साथ सवाल रखे। सरकार चर्चा में आई मगर सवालों के जवाब के साथ नहीं, डायलॉग के साथ आई। रक्षा मंत्री विमान को पेंसिल बता रहे थे। डायलॉग के हिसाब से ठीक है लेकिन सवाल का जवाब नहीं। हिंदी अख़बारों के हिसाब से हेडलाइन सोच कर भाषण लिख कर लाए थे। ऑरवेल की लाइन को नायपॉल की बता रहे थे।
सबको पता है कि जंग में लड़ाकू विमान गिरते हैं तब आपने यह बात छिपाई क्यों? अभी तक नहीं बताया कि कितनी पेंसिलें टूटी हैं? एक पेंसिल की क़ीमत कुछ हज़ार करोड़ की होती है। ये दो रुपये वाली पेंसिल नहीं है।
जब लड़ाकू विमानों के गिरने की खबर आई तो रिपोर्टर को ट्रोल किया गया। कई दिनों की चुप्पी के बाद सिंगापुर में भारत के सीडीएस ने इशारे में बात कही।
वैसे कोई इसका हिसाब नहीं पूछ रहा कि गराज में कितने विमान हैं। पाँच कहाँ गए। सवाल रफ़ाल के गिरने का है। इसकी क्षमता को लेकर बड़े बड़े दावे किए जाते हैं। आप बताइये कौन सा विमान गिरा और क्यों गिरा?
क्या चीन ने पाकिस्तान की मदद की? भारत की सेनाओं के उप प्रमुख ने कहा है कि चीन ने पाकिस्तान को लाइव डेटा दिया। अपने हथियार टेस्ट किए। इस वजह से विमानों के गिरने को लेकर पूछा जा रहा है। ऐसा क्यों है कि रक्षा मंत्री चीन का नाम ही नहीं ले सके। ब्रिक्स में चीन के सामने आतंक की निंदा हुई इस पर ताली ठोकना हल्की बात है। नाम लेकर बताते कि चीन ने पाकिस्तान की मदद की तो हमने चीन को जवाब दिया है लेकिन यहाँ तो वीजा दे दिया गया। इस पर उन्हें बोलना था। चीन का नाम लेना था।
मनीष सिंह-
जीत के बाद गड़गड़ाहट होती है। जीतने वाले मिमियाते नहीं। युद्ध के अरसे बाद तक उसके विषय में बात करने से कतराना.. औऱ बात छेड़ने पर मजबूर हुए तो मिमियाने लगना, ये विजय के लक्षण नहीं होते।
आज संसद में अनमना सा सरकारी उद्बोधन बताता है ऑपरेशन सिन्दूर के नाम पर किया गया तमाशा बुरी तरह उल्टा पड़ा है। यह एक ऐसा ऑपरेशन था जिसका कोई मिल्ट्री लक्ष्य ही नहीं था। दरअसल सरकार को चला रहे बतोलेबाजों मे जितना चीन से भय भरा है, उतना ही पाकिस्तान के खिलाफ ओवर कॉन्फिडेन्स भरा है।
अब चूंकि आतंकी घटना हुई, जो आंतरिक सुरक्षा के फेलियर था। संभावित आलोचना का रूख मोड़ने के लिए आनन फानन में पाक पर हवाई हमला कर दिया। पाकिस्तान बालाकोट के वक्त शायद आशा न किया हो, कि भारत क्रॉस बॉर्डर विमान भेजेगा। पर उस अनुभव ने, इस बार उन्हें तैयार रखा था।
जिन भारतीय विमानों की मारक रेंज 100 किमी है, उन्हें सवा सौ किलोमीटर दूर हवा में तैनात, चीनी विमानों की मिसाइलों से निशाना बनाया गया।
घबराई मोदी सरकार ने हमला रोक दिया। और विमान भेजने की हिम्मत न हुई। एस्केलेशन का भय सताने लगा, तो ब्लेक आउट जैसे पब्लिक तमाशे शुरू कर दिए। गोदी मीडिया ने इज्जत बचाये रखी। इस्लामाबाद कराची तबाह होने, और वीडियो गेम की फुटेज से युद्ध का भौकाल बना रहा। अंततः कुछ मिसाइलों के आदान प्रदान के बाद ट्रम्प की डांट खाकर सरकार ने सीजफायर कर दिया।
कोई कहता है भारत के 2 विमान गिरे, कोई कहता है 5 विमान। ये छोटी मोटी बात नहीं। पाकिस्तान के लिए ये बडी कामयाबी और मोरेल बूस्टर है। अभी तक चीनी मिलिट्री हार्डवेयर, रियल कॉम्बेट में टेस्ट नही हुए थे। अब हो गए, और धूमधाम से सफल हुए। साथी देश के रूप में चीन पर उनका विश्वास बढ़ा है।
ऑपरेशन सिंदूर दरअसल चीन पाकिस्तान को एक करने वाला गोंद बन गया। यह मिलिट्री फेलियर के साथ कूटनीतिक असफलता, बेहतर कहे तो कूटनीतिक आत्महत्या साबित हुआ है।
बिना योजना, बिना लक्ष्य, बिना तैयारी, बच्चो को खुश करने वाली आतिशबाजी करने के फेर में, देश की मिलिट्री कमजोरियों को एक्सपोज करवा दिया। दुश्मनों के एक करना, विमान खोना और आर्म्ड फोर्सज सेना का सरकार से कॉंफिडेंस हिल जाना.. (जो जनरलों के बयानों से जाहिर है) इस ऑपरेशन सिन्दूर का हासिल है।
किसी जीत के बाद गड़गड़ाहट होती है, वह सरकार के हल्कों से गायब है। डरपोक प्रधानमंत्री मुंह बिसूरे कोने में बैठे हैं। झेलने को कागजी रक्षामन्त्री को खड़ा कर दिया गया है। जो सवालों के सामने मिमिया रहे है। और याद रहे, जीतकर आने वाले कभी मिमियाते नहीं।
दिलीप मिश्रा-
आज भारतीय संसद में ऑपरेशन सिंदूर और पहलगाम आतंकी हमले पर बहस की शुरुआत हुई। ये मुद्दा सरकार के लिए कठिन प्रश्नों और संभावित जवाबदेही की दस्तक लेकर आए थे। लेकिन ठीक इसी समय टीवी चैनलों पर एक ब्रेकिंग न्यूज़ फ्लैश होती है—
“श्रीनगर के पास हरवन, लिडवास और दाचीगाम इलाकों में तीन आतंकवादी मारे गए। ये आतंकवादी वही तो जिन्होंने पहलगाम को अंजाम दिया इसमें पहलगाम हमले का मास्टरमाइंड भी शामिल था।”
लेकिन जब आप पुलिस और सेना के आधिकारिक बयानों को देखें तो तस्वीर एकदम अलग है। कश्मीर IGP वी. के. बर्डी का बयान साफ़ है- “मुठभेड़ में मारे गए आतंकवादियों की पहचान अभी नहीं हुई है। फ़िलहाल हमारी टीमें मौके पर जांच कर रही हैं, अंतिम पुष्टि फोरेंसिक जांच के बाद ही संभव होगी।”
तो सवाल उठता है कि जब सेना और पुलिस स्वयं पुष्टि नहीं कर रही तो टीवी चैनलों को कैसे और किसने यह जानकारी दी? क्या यह वही “सूत्र” हैं जो ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारतीय सेना को इस्लामाबाद तक पहुँचा चुके थे? जो कराची पोर्ट को तोप से उड़वा चुके थे?
इससे एक गंभीर बात सामने आती है कि क्या यह ख़बर “सूत्रों” की देन है या संसद में हो रही कठिन बहसों से जनता का ध्यान भटकाने के लिए सत्ता का “सूत्रधार प्रयोग” है? जिस समय सरकार से संसद में सवाल हो रहे हों ठीक उसी समय टीवी पर एक राष्ट्रवादी विजयगाथा परोस दी जाती है। क्या यह मात्र संयोग है या एक सोचा-समझा प्रयोग?
हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि कश्मीर घाटी में आतंकियों के साथ मुठभेड़ एक आम बात है। वहाँ रोज़ कहीं न कहीं सुरक्षा बल ऑपरेशन में लगे रहते हैं, जान पर खेलते हैं। कई बार बड़ी सफलताएँ मिलती हैं तो कई बार हमें अपने कुछ वीर जवान खोने भी पड़ते हैं। और चूंकि आतंकवादी पाकिस्तान समर्थित संगठनों से आते हैं तो उनका किसी न किसी आतंकी वारदात से कनेक्शन होना भी बहुत सामान्य सी बात होती है। लेकिन यह कनेक्शन किसी विशेष अटैक से तुरंत, बिना जांच और बिना प्रमाण स्थापित कर देना उत्साहित टीवी वालों का सरकार के पक्ष में माहौल बनाने जैसा है।
मास्टरमाइंड की बात करें तो मेरी याद में पिछले पाँच सालों में पुलवामा हमले के 4-5 कई मास्टरमाइंड मार गिराने के दावे हो चुके हैं। अगर हर बार एक नया मास्टरमाइंड सामने आता है तो असली मास्टरमाइंड कौन है? या फिर ‘मास्टरमाइंड’ शब्द केवल टीआरपी और भावनात्मक उबाल का औजार बन चुका है?
यह सब सत्ता की सोची समझी रणनीति है जिसमें मीडिया एक सक्रिय उपकरण की तरह इस्तेमाल हो रहा है। संसद में जब सरकार से सवाल किए जाते हैं तो टीवी पर ‘राष्ट्रवाद की स्क्रिप्ट’ चला दी जाती है। नतीजा यह होता है कि “जवाबदेही” की आवाज़ “जयकारे” में दब जाती है और लोकतंत्र की खोज खबरों में खो जाती है।
बाक़ी हम जैसे दर्शकों के लिए तो कुछ ही दिनों में भारत-पाकिस्तान का क्रिकेट मैच आने वाला है। हम फिर से राष्ट्रभक्ति के उफान में बह जाएंगे। सीमा पर गोली चले या टीवी पर मास्टरमाइंड मरे ताली हम ही बजाएँगे।
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