पलाश दा जैसा विद्रोही और उन्मुक्त स्वभाव वाला इंसान 25 साल तक किसी अख़बार में कैसे टिक गया?

जनसत्ता कोलकाता से शैलेंद्र (दाएं) के रिटायरमेंट के दिन उन्हें विदाई देते और यादगार के बतौर तस्वीर खिंचाते पलाश विश्वास (बाएं)

पलाश विश्वास का संस्मरण पढ़ा कि वो एक सप्ताह के अंदर ही रिटायर हो रहे हैं. जनसत्ता में लम्बी अवधि गुजरने के बाद अब वो नौकरी वाली पत्रकारिता से निजात पा जायेंगे. दरअसल   नौकरी वाली पत्रकारिता आपको बाँध कर रखती है. आप अपनी मर्ज़ी से कुछ भी नहीं लिख सकते. आपका पूरा दिमाग और विचार अख़बार के प्रबंधन के पास गिरवी रखा होता है. मुझे तो इस बात पर आश्चर्य हुआ है कि पलाश दा जैसा विद्रोही और उन्मुक्त स्वभाव वाला इंसान 25 साल तक किसी अख़बार में कैसे टिक गया? 1991 में जब मैं अमर उजाला बरेली में उनके साथ काम करता था तब उन्हें अच्छी तरह समझने का अवसर मिला. वह मुझसे सीनियर थे और हम दोनों सेंट्रल डेस्क पर थे. न्यूज़ एडिटर थे इंदु भूषण रस्तोगी. एडिटर अख़बार के मालिक खुद होते थे.

बरेली के एडिटर अशोक अग्रवाल जी थे. लेकिन पूरे यूनिट की जिम्मेदारी राजुल माहेश्वरी जी सँभालते थे. ऑफिस काफी विशाल कैंपस में है. पलाश  दा को मैंने सुबह चार बजे तक सिटी एडिशन निकालते  देखा  है.. पांच-छह लोगों की सेंट्रल डेस्क टीम में मई भी शामिल था. सुनील शाह के अलावा अन्य थे- पंकज जोशी, मनोज मिश्र, देशपाल सिंह पंवार. टीम का हर सदस्य दक्ष था. मनोज पत्रकारिता में एकदम नए थे और नीरवता के साथ उनमे जबरदस्त जुझारूपन था. जब पलाश दा डेस्क प्रभारी होते थे तो वे  सबसे कठिन किन्तु महत्वपूर्ण तार (UNI /PTI  क़ी ख़बरें ) बनाने को मुझे ही देते थे. शाम  सात बजे आने के बाद एडिशन छोड़ने तक उनमे जोश भरा रहता था. रोज़ ही पहले पेज पर कुछ नया करने का जूनून रहता था. यही कारण था कि 1989 में दैनिक जागरण वहाँ से लांच होने के दो साल  बाद भी रफ़्तार नहीं पकड़ पा रहा था. मैंने उनके साथ काम करके बहुत कुछ सीखा.  वामपंथी विचारों से प्रभावित होने के बावजूद वह कभी ख़बरों में अपने विचार हावी नहीं होने देते थे.

क्यों नहीं बन सके संपादक?

अक्सर अशोक अग्रवाल जी शाम 6-7 बजे के बीच कमरे में आ जाते थे और आज की न्यूज़ पूछते थे और कुछ कुछ देश-समाज-शहर की बातें करते थे. बहुधा खबरों को लेकर पलाश दादा उनकी राय से सहमत नहीं होते थे. अशोक जी अपनी राय में तर्क-वितरक पसंद नहीं करते थे. इसी कारण अशोकजी पलाश दा से चिढ़े रहते थे. पलाश दा को मैंने और स्वर्गीय सुनील शाह जी ने कई बार समझाया कि जो अशोक जी कहें, उस पर हां कर दिया करें, बेवजह क्यों हम लोगों को भी उनके कोप का भाजन बनवाते हैं. पलाश जी दो टूक कहते थे कि  मैं अपनी बात कहूंगा, अगर किसी के विचार से सहमत नहीं हूँ तो क्यों कहूं हाँ.  लेकिन ठीक इसके विपरीत पलाश दा अख़बार के दूसरे मालिक स्वर्गीय अतुल माहेश्वरी के अत्यन्त नज़दीक थे. समूचे सम्पादकीय टीम में अतुल जी या तो पलाश दा को या सुनील जी को सबसे ज्यादा अहमियत देते थे. पांच-छह लोगों की सेंट्रल डेस्क टीम में मई भी शामिल था. सुनील शाह के अलावा अन्य थे- पंकज जोशी, मनोज मिश्र, विनोद कापड़ी, देशपाल सिंह पंवार. टीम का हर सदस्य दक्ष था. मनोज और कापड़ी पत्रकारिता में एकदम नए थे. मनोज में लेख लिखने की भारी उत्कंठा थी. अशोकजी के जाने के २ घंटे बाद राजुल जी कमरे में आते थे और न्यूज़ पूछते थे, वे राय तो कुछ नहीं देते थे पर और मामलों में निर्देश जरूर देते थे जैसे कल एडिशन देर से क्यों छूटा, लखनऊ से फलां  खबर क्यों नहीं आई जबकि आज जागरण में है आदि. पहाड़ का एडिशन छूटने के बाद रात 10 -10 ,30 बजे राजुल जी मुझे अपने चैम्बर में बुलाते थे और 20  -25  मिनट तक ऑफिस से लेकर काम-काज की तमाम बातें होती थी. बाद में उनका मुझ पर इतना भरोसा जमा कि बड़े फैसले में भी मेरी राय लेने लगे. परिस्थितयां बदली, अमर उजाला का समूचा ढांचा बदला,  अमर उजाला छोड़ने के 11 साल बाद भी मैंने यह भरोसा आज तक नहीं टूटने दिया. जब उनके कमरे से बाहर आता था तो कोई भी सहयोगी यह नहीं पूछता था कि क्या बात हुई? सभी को मुझ पर बहुत विश्वास था.

पलाश दा अमर उजाला में वह मात्र दो साल ही नौकरी कर सके. कोलकाता से जनसत्ता लांच होने वाला था उन्होंने उसमे अर्जी लगा दी मुझसे और शाह जी से भी अर्जी लगाने  को कहा तो दोनों ने अनिच्छा जता दी. सुनील जी बरेली छोड़कर कही और नहीं जाना चाहते थे क्योंकि नैनीताल में उनकी एस्टेट थी. और  इसी कारण जनसत्ता दिल्ली छोड़कर अमर उजाला आये थे. मैं अपनी पत्नी की वजह से नहीं जाना चाहता था जो वही एक बड़े पब्लिक स्कूल में प्रिंसिपल हो गयी थीं.

जब पलाश दा को जनसत्ता से इंटरव्यू के लिए बुलाया गया तो न्यूज़ एडिटर रस्तोगी जी ने हम लोगो से कहा कि देखना, पलाश दा अपने स्वभाव के कारण वहां एक साल से ज्यादा नहीं टिक पाएंगे. हम लोगों ने उनकी बात से इत्तेफ़ाक़ भी किया. अब जब दो दिन पहले उनका संस्मरण पढ़ा तो निश्चित तौर पर उस घटना की याद आ गयी जब हम लोग उनके कही भी ज्यादा दिन न टिक पाने की सम्भावना जता  रहे थे. पलाश दा के किसी अख़बार में 25 साल तक काम करने की घटना को  चमत्कारिक  कहा जायेगा.

मैं यह बात इसीलिए भी कह रहा हूँ कि पलाश दा एक बेहद योग्य और खबरों की विस्तृत समझ वाले इंसान हैं. उनमे टीम को लीड करने की अपार  क्षमता है लेकिन समस्या बस वही है कि वे विद्रोही प्रवृति के कारण अख़बारों के मालिकान के कृपापात्र नहीं बन सकते और बने भी नहीं.

मैंने तो ऐसे- ऐसे ढीठ और अज्ञानी किस्म के संपादक/समूह संपादक  देखे हैं जिनमे पत्रकारिता के अंशमात्र गुण नहीं होते, उनमे जो कुछ दीखता है वह ईंट भट्टा के ठेकेदार  का दूसरा रूप ही है.  ग्वालियर में मैं दो ऐसे संपादक के साथ काम कर चूका हूँ जो ठीक से चार वाक्य भी नहीं लिख सकते हैं. बस अपने आका की कृपा से संपादक की कुर्सी का सुख भोग रहे हैं. दोनों चीफ सब पद योग्य भी नहीं हैं. इन सम्पादकों के ऐसे-ऐसे कृत्यों की घटनाएं मेरे जेहन में हैं जिसे सुनने पर लोग सिर पीट लें. कई और सम्पादकों को नज़दीकी से जानता हूँ, कोई लड़कियों का प्रेमी है तो कोई धन वसूली का, 90 फीसदी संपादक अपनी योगयता की बदौलत नहीं, अपने आका को खुश करके बने रहते हैं. यही वजह है कि जब आका बदलते हैं तो उनकी भी कुर्सी खिसक जाती है. अब आप बताईये, उधमसिंह नगर (उत्तराखंड) के दिनेशपुर गांव निवासी पलाश दा इसमें कहाँ से फिट बैठेंगे?

जब एनडी तिवारी ने जागरण से निकालने को कहा

मुझे एक घटना याद है. अमर उजाला में आने से पहले पलाश दा दैनिक जागरण मेरठ में कार्यरत थे. 1990  के पहले की बात है. एक बार उन्होंने तत्कालीन मुख्यमंत्री  नारायण दत्त तिवारी के खिलाफ कोई लेख लिख दिया था. श्री तिवारी इतने नाराज़ हुए कि उन्होंने जागरण के मेरठ प्रभारी (मालिक) धीरेंद्र मोहन को फ़ोन कर पलाश दा को निकाल देने को कहा. मालिक दबाव में आ गए. इस बीच किसी ने श्री तिवारी को बताया कि पलाश दा को नाराज़ करने का मतलब है पुरे दिनेशपुर और आसपास गांव के बंगालियों को नाराज़ करना. इन गाँवो में हज़ारों बंगाली हैं जो देश के विभाजन के समय पाकिस्तान से यहाँ आकर बसे थे. और श्री तिवारी का विधानसभा चुनाव क्षेत्र भी यही है. अगर बंगाली भड़क  गए तो उनका जीतना मुश्किल हो जायेगा.   श्री तिवारी को गलती का अहसास हुआ और धीरेंद्र मोहन को पुनः फ़ोन करके कोई कदम न उठाने का कहा. बाद में पलाश दा का मन इतना खट्टा हुआ कि उन्होंने जागरण छोड़ ही दिया.

अप्रकाशित पड़ी हैं कहानियां

पलाश दा को कहानी लिखने का शौक है लेकिन उनकी कहानी जो प्रकाशक एक बार छाप देता है तो दोबारा कहानी से कुछ शब्द निकालने की शर्त पर ही छापने को तैयार होता है. उनकी कहानी होती तो शुद्ध पारिवारिक और सामाजिक है पर उसमे कही एक-दो जगह आपको ऐसे नॉन वेज शब्द मिल जायेंगे जो अश्लील से कम नहीं हैं. पलाश दा कहते हैं शब्द कहानी की आत्मा है, इसे हटाने पर मूलता ख़त्म हो जाएगी, जहाँ जैसा भाव वहां वैसा शब्द. 3-4 साल पहले एक बार फ़ोन पर उन्होंने मुझे बताया था कि सैकड़ों कहानिया अप्रकाशित पड़ी हैं, इलाहाबाद का कोई प्रकाशक बताईये जो इस संग्रह को छाप दे. मैंने कहा कि क्या कोलकाता में प्रकाशक नहीं हैं, तो बोले, हैं तो पर अपनी शर्त लगाते हैं जो मुझे मंज़ूर नहीं. मैंने कहा कि तो क्या इलाहाबाद के प्रकाशक बिना शर्त लगाए छाप देंगे? आप क्यों नहीं कहानी से नॉन वेज शब्दों को निकाल देते? पलाश दा बोले, पंडितजी देखना कोई न कोई तो मिल ही जायेगा. रिटायर्ड होने के बाद पलाश दा गांव लौंटेंगे कि कोलकाता में ही बसेंगे, मुझे नहीं पता. हाँ दोनों जगह उनके पास बहुत कुछ है करने के लिए, वह ख़ाली नहीं बैठेंगे.

वह रीता बहुगुणा नहीं, कुमुदिनी पति थीं.

भड़ास में पलाश दा ने अपने संस्मरण में लिखा है कि रीता बहुगुणा PSO की थी जो इलाहाबाद यूनिवर्सिटी की उपाध्यक्ष  बनी. मैं बता दूँ कि वह रीता बहुगुणा नहीं बल्कि कुमुदिनी पति थीं. कुमुदिनी PSO की सक्रिय नेता थीं और छात्र संघ उपाध्यक्ष पद का चुनाव लड़ी, भरी मतों से जीतीं. रीता बहुगुणा कभी छात्र राजनीति में सक्रिय नहीं रहीं. कुमुदिनी ने बाद में CPI (ML ) के महासचिव विनोद मिश्र (अब स्वर्गीय) से शादी कर ली थी. वह इसी यूनिवर्सिटी  के तत्कालीन प्रो-वाईस चांसलर प्रो. टी पति की  बेटी हैं.

लेखक इंद्र कांत मिश्र से संपर्क 9827434787 या heritagemental@yahoo.in के जरिए किया जा सकता है.


पलाश विश्वास का वो संस्मरण पढ़िए जिसका जिक्र इंद्र कांत मिश्र ने अपने उपरोक्त आलेख में किया है… नीचे दिए शीर्षक पर क्लिक करें…

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Comments on “पलाश दा जैसा विद्रोही और उन्मुक्त स्वभाव वाला इंसान 25 साल तक किसी अख़बार में कैसे टिक गया?

  • I.K.Mishra ji se mai poori tarah sahmat hoon. Palash Da ke sath maine bhi kaam kiya hai, par kisi dusre dept. mein. Parantu unke tewar mainey 1991 se hi dekhe, jab humlog eksath Jansatta Kolkata launch honey waqt miley. Behad Hansod, behad Khilandra aur kaam ke prati Nishtha, yahi ek wajah rahi ki wey 25 saal Jansatta me tikey rah gaye. Palash Da ki ek-ek Mastiyan aur Khilandrapan barbas manaspatal par ghoom jata hai. Mujhe yaad nahi ki itne warson ek jagah kaam karney ke bawjud bhi unse kissi ki bakjhak hui hogi. Han, News Editor ke sath unki tu-tu-mai-mai jaroor hoti thi. Kaaran wahi thha, jo aapney likha hai. Aise shakhsh ke sath, jo itna widwan honey ke bawjood bhi itna saral ho, kaam karney ka mazaa hi kuchh aur hai. Mujhe unhone kuchh zerox “America se Sawdhan” diye thhe, jo unhoney kabhi likhe aur kissi akhbar mein anwarat chhapa bhi. Shayad aaj bhi wo zerox mere paas hoga.
    4-5 dinon pahley hi meri unse baat hui. Sanjog se ussi din wey Retire ho rahey thhe aur Jansatta office me thhe. Unhin se pataa chala ki wey abhi filhal Kolkata mein hi rahenge. Aise log jis akhbaar mein rahenge aur yadi hain, to uss akhbaar ka kya kehna…. Parantu, aaj ke daur mein mujhe nahin lagta ki itna nishchhal aur saral vyaktitwa ab kissi akhbaar mein hoga….
    Bhadas4media ek aisa platform hai, jahan aapko aise shakhsh ki jankari mil jati hai. Aur aap apni kuchh bebak batein likh aur kah sakte hain… Yashvant ji iske liye badhai ke patra hain.

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