अब हमारे जैसे लोगों के लिए मीडिया में कोई जगह नहीं बची है

मीडियाकर्मी इसे अच्छी तरह समझ लें कि उनकी कार्यस्थितियों को नर्क बनाने से लेकर उनका सीआर खराब करने और उसी के आधार पर उन्हें काम से निकालने में मीडिया के मसीहा तबके की शैतानी भूमिका हमेशा निर्णायक होती है। कारपोरेट हितों के मुताबिक अपनी चमड़ी बचाने और जल्दी जल्दी सीढ़ियां छलांगने के लिए यह तबका किसी की भी बलि चढ़ाने से हिचकता नहीं है।

1991 से मीडिया में गैरपत्रकारों की छंटनी का विरोध पत्रकारों ने कभी नहीं किया है और यूनियनों के नेतृत्व में रहे पत्रकारों ने सबसे पहले गैरपत्रकारों की कुर्बानी देकर आटोमेशन तेज किया है। यह भोगा हुआ यथार्थ है कि यूनियनें मालिकान की पहल पर चुनिंदा पत्रकारों की अगुवनाई में ही बनीं, जिसने पत्रकारों और गैरपत्रकारों की बलि चढ़ाकर अपनाकैरियर सवांरने में कोई कसर नहीं छोड़ी। आज के हालात के लिये यह क्रांतिकारी मसीहा तबका मालिकानव से ज्यादा जिम्मेदार हैं। आगे मीडियाकर्मी ऐसी गलती न दुहरायें तो बेहतर।

इसी आटोमेशन के खिलाफ आवाज उठाने में मेरा अपने सीनियर साथियों से दुश्मनी भी मोल लेनी पड़ी है। लेकिन हम अपने साथियों को बचाने में नाकाम रहे हैं। अब हम अनेक संपादकों और अपने पुराने सीनियर जूनियर साथियों के क्रांतिकारी तेवर से ज्यादा चकित हैं, जिन्होंने पेशेवर जिंदगी में हमेशा कारपोरेट हितों के मुताबिक बाजार के व्याकरण के मुताबिक पत्रकारिता की है और नौकरी में रहते हुए कारपोरेट लूट खसोट और जल जंगल जमीन के हकहकूक की आवाज उठाते जनपदों और जनसमूहों के उत्पीड़न सैन्य दमन से लेकर मेहनतकश तबकों के आंदोलन और बहुजनों पर सामंती अत्याचारों के खिलाफ बाकी मीडियाकर्मियों की तुलना में नीतिगत फैसलों की बेहतर स्थिति के बावजूद पिछले छब्बीस सालों में एक पंक्ति भी नहीं लिखी है और न अपने साथियों के हकहकूक के लिए कभी जुबान खोली है।

मीडिया का यह पाखंडी मसीहा तबका, सत्तावर्ग ही बाकी मीडियाकर्मियों के सबसे बड़े दुश्मन हैं क्योंकि वे बाकायदा मीडिया प्रबंधन के हिस्सा बने रहे हैं। इन लोगों से सावधान रहने की जरुरत है। कारपोरेट हितों के लिए वे हमेशा पेरोल पर हैं।

हमने अपनी पेशेवर पत्रकारिता के 36 सालों में अपने साथियों को बचाने की हर संभव कोशिशें की हैं। जरुरत पड़ी तो किसी किसी पर हाथ भी उठाया है,लेकिन ऐन मौके पर उनकी गलतियों की जिम्मेदारी लेकर सजा भुगतने में और अपने कैरियर का बंटाधार करने में भी हिचकने की जरुरत महसूस नहीं की है।

हमने किसी की शिकायत करने के बजाये हमेशा खुद हालात से निबटने की कोशिशें की हैं और जाहिर है कि मैनेजमेंट की आंखों में किरकिरी बने रहने में या उसे डराने में मुझे मजा आता रहा है। हस्तक्षेप पर अरविंद घोष की रपट से सदमा जरुर लगा है, लेकिन हमारे लिए यह कोई अचरज की बात नहीं है। मीडिया में पेशेवर नौकरी में रहते हुए हमें बहुत कुछ झेलना पड़ा है।

एबीपी समूह शुरु से ही मुक्तबाजार व्यवस्था का सबसे मुखर प्रवक्ता रहा है और इस मायने में टाइम्स समूह उसका देश एकमात्र प्रतिद्वंद्वी है। दुनियाभर में ट्रंप समर्थक अमेरिकी फाक्स न्यूज के साथ उसकी तुलना की जा सकती है जो वर्चस्ववादी नस्ली रंगभेद के सत्तावर्ग की संस्कृति का प्रचार प्रसार करता है।

टीवी 18 समूह और हिंदुस्तान समूह के रिलायंस के हवाले हो जाने के बाद मीडिया कर्मियों के लिए एबीपी समूह में व्यापक छंटनी  भयंकर दुःसमय की सबसे बड़ी चेतावनी है। अरविंद ने लिखा हैः

”Strongly condemn the retrenchment on 7th February, 2017 with only 2 hours notice, of about 750 workers, journalists and reporters of Ananda Bazar Patrika group of  newspapers of Kolkata. Express solidarity with the retrenched workers and journalists and their affected families.”

यह हालत अचानक नहीं बनी है।

मीडियाकर्मियों के जनपक्षधर चरित्र के लगातार हो रहे स्खलन और उनके आत्मघाती तरीके से मार्केटिंग और सत्ता की पैदल सेना बन जाने से समूचा मीडिया इस वक्त बारुदी सुंरगों से भरी मौत की घाटी में तब्दील है। गैरपत्रकार तबकों की छंटनी का कभी विरोध न करने वाले पत्रकार अब मीडिया में गैरपत्रकारों के सारे काम मसलन कंपोजिंग, प्रूफ रीडिंग, लेआउट, फोटोशाप, पेजमेकिंग से लेकर विज्ञापन लगाकर सीधे मशीन तक अखबार छापने के लिए तैयार करने का काम करते थे,जहां 1991 से पहले इन सारे कामों के लिए अलग अलग विभाग गैरपत्रकारों के थे। आटोमेशन मुहिम के चलते एक एक करके वे सारे विभाग बंद होते चले गये। अखबारों में अब दो ही सेक्शन हैं, संपादकीय और प्रिंटिंग मशीन।

संपादकीय विभाग का काम भी मूल सेंटर के अलावा बाकी सैटेलाइट संस्करणों में इलेक्ट्रानिक इंजीनियर कर देते हैं। इसके खातिर पत्रकारों की संख्या बहुत तेजी से घटी है। प्रिंटिंग सेक्शन में भी बचे खुचे कर्मियों को अपने संस्थान के अखबारों के अलावा एक साध दर्जन भर से ज्यादा अखबारों का काम संस्था के जाब वर्क बतौर काम के घंटों के अंदर अपने वेतनमान के अलावा बिना किसी अतिरिक्त भुगतान के करना होता है।

मीडिया संस्थानों में स्थाई नौकरी वाले पत्रकार गैर पत्रकार विलुप्त प्राय हैं। जो हैं वे रिटायर करने वाले ही हैं।उन्हें आगे एक्सटेंशन मिलने की कोई संभावना नहीं है। अगले पांच सालों में मीडिया में सारे कर्मचारी ठेके की नौकरी पर होंगे। आटोमेशन के सौजन्य से किसीकी खास काबिलियत का कोई मूल्य नहीं है। इसलिए बाजार के मुताबिक छंटनी का यह सिलसिला चलने वाला है।

वेज बोर्ड से बचने के लिए देशभर में असंख्य संस्करण आटोमेशन के जरिये छापते रहने की वजह से मीडिया में कोई पत्रकार या गैरपत्रकार, चाहे उनकी काबिलियत या हैसियत कुछ भी हो, अपरिहार्य नहीं हैं, जैसे हम लोग 1991 से पहले हुआ करते थे। सिर्फ अपने काम और अपनी दक्षता के लिए उन दिनों पत्रकारों के सात खून माफ थे।

मीडिया ने मुझ जैसे बदतमीज पत्रकार को भी 36 साल तक झेल लिया और आजादी का चस्का लग जाने से मैंने भी 36 साल तक मीडिया को झेला। अब हमारे जैसे लोगों के लिए मीडिया में कोई जगह नहीं बची है। इसलिए मीडिया में हर छोटे बड़े पत्रकार गैरपत्रकार के सर पर छंटनी की तलवार लटकी हुई है। आंखें बंद करके कारपोरेट या मार्केट के हित में कमा करते रहने की वफादारी से भी कुछ हासिल होने वाला नहीं है, जब प्रेतात्माओं से मीडिया का काम चल सकता है, तो मनुष्यों को मीडिया की कोई जरुरत नहीं है।

हम जब दैनिक जागरण में मुख्य उपसंपादक बतौर काम कर रहे थे,1984 और 1989 के दौरान, तब माननीय नरेंद्र मोहन समूह के प्रधान संपादक थे। संपादकीय विभाग के कामकाज में वे हस्तक्षेप नहीं करते थे। संस्करण मैं ही निकालता था। ऐसा वक्त भी आया कि रातोंरात सारे पत्रकार भाग निकले और डेस्क के सामने सबएडीटर की कुर्सी पर सिर्फ नरेंद्रमोहन जी अकेले थे। उस वक्त नये पत्रकारों की भरती का विज्ञापन सबसे पहले तैयार करना होता था और आवेदन मिलते न मिलते उन्हें नियुक्ति देकर ट्रेनी पत्रकार बतौर उन्हें काम के लायक बनाना होता था। विज्ञापन छापने से लेकर भर्ती और प्रशिक्षण मेरठ में मेरी जिम्मेदारी थी तो कानपुर में आदरणीय बीके शर्मा की और समूह के समाचार संपादक तब हरिनारायण निगम थे।

मुश्किल यह था कि छह सौ रुपल्ली से ज्यादा छात्रवृत्ति किसी को दी नहीं जाती थी। यह मेरठ की पगार थी। लखनऊ में तीन सौ रुपये की छात्रवृत्ति थी। खुराफात की वजह से जब उन्हीं तीनसौ रुपये की पगार पर उन्हें मेरठ स्थानांतरित कर दिया जाता था, हमारे लिए मानवीय संकट खड़ा हो जाता था।

सबसे बड़ी मुश्किल यह थी कि नरेंद्र मोहन जी का आदेश था कि स्टिक बाई स्टिक मापकर पांच कालम का अनुवाद और पांच कालम के संपादन का काम सबसे लेना हो चाहे अखबार में कुल दस कालम की भी जगह न बची हो।

हम लगातार प्रशिक्षुओं को स्थाई बनाने पर जोर देते रहते थे और अक्सर ऐसा नहीं हो पाता था। काम सीखते ही एक साथ भर्ती तमाम प्रशिक्षु झुंड बनाकर कहीं भी किसी भी अखबार में भाग निकलते थे क्योंकि तब जागरण ट्रेनिंग सेंटर से निकले पत्रकारों की बाजार में भारी मांग होती थी। स्थाई पत्रकार भी वेतन सात सौ आठ सौ रुपये से ज्यादा न होने की हालत में अक्सर निकल भागते थे।

फिर नये सिरे से भर्ती और प्रशिक्षण की कवायद। आदरणीय बीके शर्मा के बाद शायद मैने ही सबसे ज्यादा पत्रकारों को जागरण में नियुक्ति दी है और प्रशिक्षित किया है। इसलिए साथी पत्रकारों की नौकरी के आखिरी दिनों में भी मुझे बेहद परवाह होती थी।

प्रभात खबर, जागरण और अमर उजाला में हम कंप्यूटर पर बैठते नहीं थे। कंपोजीटर, प्रूफरीडर, पेजमेकर अलग थे। कैमरा और प्रोसिंसग के विभाग अलग थे। कोलकाता में आये तो लेआउट आर्टिस्टभी दर्जनभर से ज्यादा थे।

बीके पाल एवेन्यू में दोनों अखबारों में सौ से ज्यादा पत्रकार थे और लगभग सभी स्थाई थे। इनके अलावा जनसत्ता के करीब डेढ़ सौ स्ट्रींगर थे।दस साल पहले भी ग्रांट लेन के आफिस में इंडियन एक्सपेर्स की शुरुआत पर सौ से ज्यादा पत्रकार थे। फाइनेंशियल एक्सप्रेस का आटोमेशन सबसे पहले हुआ। फिर जनसत्ता का। आटोमेशन ने सारी भीड़ छांट दी।

अब जनसत्ता कोलकाता में मेरे और शैलेंद्र के रिटायर होने के बाद स्थाई पत्रकार सिर्फ दो डा. मांधाता सिंह और जयनारायण प्रसाद रह गये तो एकमात्र स्टाफ रिपोर्टर प्रभाकरमणि तिवारी। बाकी दो अखबारों में एक भी स्थाई पत्रकार नहीं हैं। आफिस और मार्केटिंग में सारे के सारे मैनेजर भी ठेके पर हैं। दो आर्टिस्ट सुमित गुहा और विमान बचे हैं स्थाई। कंपोजिग के पुराने साथियों में प्रमोद कुमार और संपादकीय सहयोगी महेंद्र राय स्थाई हैं जो मार्केटिंग के लिए काम करते हैं। मशीन में पुराने कुछ लोगों के अलावा बाकी सारे ठेके पर हैं।

यह किस्सा हकीकत की जमीन पर कयामती फिजां की तस्वीर है।

एबीपी भाषाई अखबार समूह है, जहां आटोमेशन शायद सबसे पहले शुरू हुआ। लेकिन बांग्ला में इंटरनेट से हिंदी और अंग्रेजी की तरह सारा कांटेट रेडीमेड लेने की स्थिति न होने और करीब पंद्रह करोड़ बांग्ला पाठकों की वजह से उन्हीं मौलिक कांटेंट की जरुरत पड़ती है। इसलिए आटोमेशन और ठेके की नौकरी के बावजूद वहां पत्रकारों गैरपत्रकारों की फौज बनी हुई थी। यानी बांग्ला और दूसरी भारतीय भाषाओं के  मीडिया में भी  हिंदी और अंग्रेजी की तरह प्रेतात्माओं से अब काम लिया जाना है।

प्रेतात्माओं का वर्चस्व मनुष्यों के वजूद को खत्म करने वाला है। इंसानियत का जज्बा खतम है तो जाहिर है कि अब सिर्फ मसीने बोलेंगी। अभी रोबाट आया नहीं है और यह हाल है, आगे क्या होगा, मीडियाकर्मी सोच समझ लें तो बेहतर।

जाहिर है कि आटोमेशन, मशीनीकरण, आधुनिकीकरण, उपभोक्ता वाद और मुकतबाजार का पत्रकारों ने जिस अंधेपन से समर्थन किया है, उससे सत्तावर्ग और मुक्तबाजारी राजनीति के नरसंहारी अश्वमेधी अभियान में चुनिंदा मौकापरस्त पत्रकारों के राजनीति, सत्ता और यहां तक कि पूंजीवादी तबक में एडजस्ट होने की कीमत अब मीडियाकर्मियों को हर हालत में चुकानी होगी।

साथियों की निरंतर छंटनी का प्रतिरोध पत्रकार जमात ने चूंकि कभी नहीं किया है और छंटनी का सिलसिला पत्रकारों के सहयोग से निर्विरोध जारी रहने की वजह से यूनियन बनाकर लड़ने की संख्या और ताकत भी उनके पास नहीं है। दूसरी तरफ श्रम कानून सिरे से खत्म हो जाने पर ऐसी लड़ाई से भी अब पायदा नहीं है। वेज बोर्ड का किस्सा काफी है प्रेस और मीडिया में कानून के राज का सच बताने के लिए।

हाल में भड़ास के मजीठिया मंच से कानूनी लड़ाई का एकमोर्चा जरुर खुला है लेकिन मीडिया में इस वक्त संपूर्ण आटोमेशन होने की वजह से वेतनमान की लड़ाई भले आप लड़ लें,तेज होती छंटनी रोकने का आसार बेहद कम है।

अब मीडियाकर्मियों को फर्जी मसीहा वर्ग की प्रेतात्माओं के शिकंजे से बाहर निकालकर अपनी जनमुखी भूमिका में वापस आने का सही वक्त है क्योंकि अब खोने का कुछ भी नहीं है। हमने यह फैसला 1991 में ही कर लिया था। सिर्फ तरक्की और प्रोमोशन के मौके के अलावा मैंने कुछ नहीं खोया है। अब रिटायर होने के बाद भी बाकायदा जिंदा हूं और अपने मोर्चे पर अडिग हूं।

जीवित मृत मसीहा संप्रदाय से मैरी स्थिति बेहतर है क्योंकि मैंने पाखंड जिया नहीं है और आम जनता के साथ सड़क पर खड़े होने में मुझे कोई शर्म नहीं है। मेरी नियति तो अपने पुरखों की तरह अपने गांव खेत खलिहान में किसी आपदा में मर जाने की थी। पढ़ लिखकर मैं अपने लोगों के साथ मजबूती के साथ खड़े होने की हिम्मत जुटा सका और पत्रकरिता को उनके हक हकूक की लड़ाई के हथियार बतौर इस्तेमाल करने की हमेशा कोशिश की, मरते वक्त कम स कम मुझे मामूली पत्रकार होने का अफसोस नहीं होगा।चाहे हासिल कुछ नहीं हुआ हो।

मेरे पत्रकार मित्रों, पानी सर से ऊपर है और पांव तले जमीन भी खिसक रही है।बतौर पत्रकार जनता के साथ खड़े होने का इससे बेहतर मौका नहीं है।

लेखक पलाश विश्वास वरिष्ठ पत्रकार हैं. लंबे समय तक जनसत्ता, कोलकाता में कार्यरत रहे. रिटायर होने के बाद सोशल मीडिया और वेब मीडिया के माध्यम से जनसरोकारी पत्रकारिता की अलख जगाए हुए हैं.

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‘नैनीताल समाचार’ और राजीव लोचन साह के बिना उत्तराखंड की जागरूक पत्रकारिता की कल्पना नहीं की जा सकती

क्षेत्रीय पत्रकारिता का प्रतिमान ‘नैनीताल समाचार’

चार-पांच दिन से मैं भाई साहब की बरसी की वजह से गाँव में था. परसों पंकज बिष्ट जी का हैरानी भरा फोन आया कि क्या ‘नैनीताल समाचार’ बंद हो रहा है? मैं खुद भी इस खबर को सुन कर हैरान हुआ. नैनीताल लौटकर फेसबुक टटोला तो काफी बाद में महेश जोशी की खबर के साथ एक बहुत अशिष्ट भाषा में लिखी पोस्ट पर नजर पड़ी. मुझे लगता है, यह पोस्ट एकदम व्यक्तिगत दुराग्रहों के आधार पर लिखी गयी है, ठीक ही हुआ कि इसे व्यापक प्रचार नहीं मिला. जहाँ तक ‘नैनीताल समाचार’ और राजीव लोचन साह का प्रश्न है, आज के दिन इन दोनों के बिना नैनीताल ही नहीं, उत्तराखंड की जागरूक पत्रकारिता की कल्पना नहीं की जा सकती.

इसके शुरुआती दिनों से ही मैं राजीव को सताता रहा हूँ, बल्कि कहना चाहिए, उकसाता रहा हूँ. एक अंक तो इसका मैंने भी सम्पादित किया है. मुझे हमेशा लगता रहा है कि एक क्षेत्रीय अख़बार के रूप में ही नहीं, एक जागरूक पत्रकारिता के प्रतिमान के रूप में यह अख़बार हिंदी पत्रकारिता में याद किया जायेगा. (राजेन्द्र यादव का जब भी फोन आता था, वे ‘नैनीताल समाचार’ का जरूर जिक्र करते थे.) एक छोटी जगह से, जहाँ हर छोटी-सी बात को भी व्यक्तिगत आक्षेप के रूप में लिया जाता हो, इतना जिंदादिल और निष्पक्ष समाचार-पत्र निकाल ले जाना छोटी बात नहीं है.

मुझे इस अख़बार की सबसे बड़ी बात यह लगती है कि इसके संपादक ने कभी भी इसे अपने प्रचार के लिए इस्तेमाल नहीं किया. (अगर मैं गलत नहीं हूँ तो यह बात उन्होंने निश्चय ही शैलेश मटियानी से सीखी होगी) हाल के अंकों में संपादक के नाम से टिप्पणियां दिखाई देने लगी हैं, पहले तो वह अपनी बात छद्म नाम से या दूसरों के नाम से लिखा करते थे. यह इस अख़बार की निष्पक्षता और वस्तुनिष्ठता ही है कि किसी ज़माने में इस अख़बार को लोग शेखर पाठक और गिर्दा का अख़बार समझते थे. आज इन दोनों बड़ी प्रतिभाओं की जो राष्ट्रीय स्तर की पहचान बनी है, उसमें इस समाचार पत्र के योगदान को नकारा नहीं जा सकता. नैनीताल के रहने वाले हम सब जानते हैं कि इस अख़बार के लिए किस तरह राजीव ने मांग-मांग कर पैसा एकत्र किया है. ऐसे व्यक्तित्व के लिए ओछी बातें शोभा नहीं देतीं, बल्कि ये खुद की ही संस्कारहीनता दर्शाती हैं.

बटरोही जी की फेसबुक वॉल से.

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‘नैनीताल समाचार’ बंद होने की आहट से अब नये सिरे से घर से बेदखली का अहसास हो रहा है

पलाश विश्वास

मुझे बहुत चिंता हो रही है नैनीताल और ‘नैनीताल समाचार’ को लेकर। इससे पहले राजीव नयन बहुगुणा ने ‘नैनीताल समाचार’ बंद होने की आहट लिखकर चेतावनी के साथ इसे बचाने की अपील भी की है। अब डीएसबी कालेज में हिंदी विभाग के अद्यक्ष रहे प्रख्यात साहित्यकार बटरोही जी ने फिर ‘नैनीताल समाचार’ पर लिखा है। ‘नैनीताल समाचार’ न होता तो अंग्रेजी माध्यम से बीए पास करने वाला मैं अंग्रेजी साहित्य से एमए करते हुए हिंदी पत्रकारिता से इस तरह गुंथ न जाता।

यह सही है कि गुरुजी ताराचंद्र त्रिपाठी की प्रेरणा से हाई स्कूल पास करते ही मैं बांग्ला के साथ हिंदी में भी लिखने लगा था।लेकिन तब मैं कविताएं और कहानियां लिख रहा था।दैनिक पर्वतीय में भी मैं कविताएं ज्यादा लिखा करता था और कभी कभार पन्ना भरने के मकसद से धीरेंद्र शाह के कहने पर टिप्पणी वगैरह कर देता था। जनपक्षधर पत्रकारिता की दीक्षा मेरी नैनीताल समाचार में ही हुई। शेखर पाठक और गिरदा से मैंने रपटें लिखनी सिखी।

कितने लोग उस टीम में थे। विपिन त्रिपाठी और निर्मल जोशी, जो बाद में हाईकोर्ट के वकील बने, दिवंगत हो गये। भगत दाज्यू दिवंगत हो गये। षष्ठीद्तत भट्ट नहीं रहे। शेरदा अनपढ़ नहीं रहे। उप्रेती जी नहीं रहे। गोविंद पंत राजू बड़े पत्रकार बन गये तो धीरेंद्र अस्थाना बड़े सहित्यकार। कैलाश पपनै भी नैनीताल समाचार से जुड़े थे तो दिवंगत सुनील साह और प्रमोद जोशी भी। वाया गिरदा देशभर के रंगकर्मी भी हमसे जुड़े रहे हैं। शेखर जोशी से लेकर शैलेश मटियानी तक सारे लोगं से नैनीताल समाचार की वजह से घरेलू संबंध बने। नैनीताल समाचार की वजह से महाश्वेता देवी हमें कुमायूंनी बंगाली कहती लिखती रहीं।

हरीश पंत और पवन राकेश नैनीताल में और लखनऊ से नवीन जोशी व्यवस्था की कमान संभाले रहते थे। सुंदरलाल बहुगुणा, चंडी प्रसाद भट्ट, ज्ञान रंजन, वीरेन डंगवाल, देवेन मेवाडी, पंकज बिष्ट से लेकर हिंदी साहित्य के तमाम लोग और हिमालय से हर शख्स नैनीताल समाचार से जुड़ा था। उमा भट्ट से लेकर उत्तराखंड की कितनी महिला कार्यकर्ता, शमशेर सिंह बिष्ट की अगुवाई में उत्तराखंड संघर्ष वाहिनी के तमाम कार्यकर्ता जिनमें मौजूदा मुख्यमत्री हरीश रावत, सांसद प्रदीप टमटा, राजनेता राजा बहुगुणा और पीसी तिवारी किसका नामोल्लेख करुं और किसका न करुं।

नैनीताल के तमाम रंगकर्मी जहूर आलम की अगुवाई में नैनीताल समाचार से जुड़े थे तो डीएसबी कालेज के हर अध्यापक का जुड़ाव नैनीताल समाचार से था। इनमें से चंद्रेश शास्त्री तो दिवंगत हो गये। फेड्रिक स्मैटचेक भी नहीं रहे। बटरोही जी हैं। अजय रावत जी से अब बहुत दिन हुए हमारा संपर्क नहीं रहा। नैनीताल समाचार हर मायने में नैनीताल, उत्तराखंड और हिमालय का प्रतिनिधित्व करता रहा है। उसके बिना न नैनीताल और न हिमालय की कोई कल्पना कर सकता हूं।

नैनीताल समाचार को हम गिरदा जैसे लोगों की विरासत कह सकते हैं लेकिल इसे संपादक राजीव लोचन शाह का निजी उद्यम न माने तो बेहतर हो। चिपको आंदोलन से लेकर पहाड़ के जीवन मरण के हर मसले को लगातार संबोधित करने का यह सिलसिला बंद हो जायेगा तो यह न सिर्फ हिमालयी जनता का, बल्कि हिंदी पत्रकारिता का भारी अपूरणीय नुकसान होगा। हम नैनीताल समाचार के माध्यम से ही लघु पत्रिका आंदोलन होकर समयांतर और समकालीन तीसरी दुनिया से जुड़े।

राजीवदाज्यू को मैं किशोर वय से जानता रहा हूं और वे सचमुच मेरे बड़े भाई रहे हैं। उनका परिवार मेरा परिवार रहा है और उनका घर मेरा घर रहा है। मैं जब भी पिछले 36 साल की पत्रकारिता में बसंतीपुर अपने घर गया तो नैनीताल हर हाल में जाता रहा है क्योंकि नैनीताल समाचार की वजह से हमेशा नैनीताल मेरा घर रहा है। अब नये सिरे से घर से बेदखली का अहसास हो रहा है।

लेखक पलाश विश्वास लंबे समय तक जनसत्ता कोलकाता में कार्यरत रहे और इन दिनों आजाद पत्रकार के रूप में सक्रिय हैं.

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पलाश दा जैसा विद्रोही और उन्मुक्त स्वभाव वाला इंसान 25 साल तक किसी अख़बार में कैसे टिक गया?

जनसत्ता कोलकाता से शैलेंद्र (दाएं) के रिटायरमेंट के दिन उन्हें विदाई देते और यादगार के बतौर तस्वीर खिंचाते पलाश विश्वास (बाएं)

पलाश विश्वास का संस्मरण पढ़ा कि वो एक सप्ताह के अंदर ही रिटायर हो रहे हैं. जनसत्ता में लम्बी अवधि गुजरने के बाद अब वो नौकरी वाली पत्रकारिता से निजात पा जायेंगे. दरअसल   नौकरी वाली पत्रकारिता आपको बाँध कर रखती है. आप अपनी मर्ज़ी से कुछ भी नहीं लिख सकते. आपका पूरा दिमाग और विचार अख़बार के प्रबंधन के पास गिरवी रखा होता है. मुझे तो इस बात पर आश्चर्य हुआ है कि पलाश दा जैसा विद्रोही और उन्मुक्त स्वभाव वाला इंसान 25 साल तक किसी अख़बार में कैसे टिक गया? 1991 में जब मैं अमर उजाला बरेली में उनके साथ काम करता था तब उन्हें अच्छी तरह समझने का अवसर मिला. वह मुझसे सीनियर थे और हम दोनों सेंट्रल डेस्क पर थे. न्यूज़ एडिटर थे इंदु भूषण रस्तोगी. एडिटर अख़बार के मालिक खुद होते थे.

बरेली के एडिटर अशोक अग्रवाल जी थे. लेकिन पूरे यूनिट की जिम्मेदारी राजुल माहेश्वरी जी सँभालते थे. ऑफिस काफी विशाल कैंपस में है. पलाश  दा को मैंने सुबह चार बजे तक सिटी एडिशन निकालते  देखा  है.. पांच-छह लोगों की सेंट्रल डेस्क टीम में मई भी शामिल था. सुनील शाह के अलावा अन्य थे- पंकज जोशी, मनोज मिश्र, देशपाल सिंह पंवार. टीम का हर सदस्य दक्ष था. मनोज पत्रकारिता में एकदम नए थे और नीरवता के साथ उनमे जबरदस्त जुझारूपन था. जब पलाश दा डेस्क प्रभारी होते थे तो वे  सबसे कठिन किन्तु महत्वपूर्ण तार (UNI /PTI  क़ी ख़बरें ) बनाने को मुझे ही देते थे. शाम  सात बजे आने के बाद एडिशन छोड़ने तक उनमे जोश भरा रहता था. रोज़ ही पहले पेज पर कुछ नया करने का जूनून रहता था. यही कारण था कि 1989 में दैनिक जागरण वहाँ से लांच होने के दो साल  बाद भी रफ़्तार नहीं पकड़ पा रहा था. मैंने उनके साथ काम करके बहुत कुछ सीखा.  वामपंथी विचारों से प्रभावित होने के बावजूद वह कभी ख़बरों में अपने विचार हावी नहीं होने देते थे.

क्यों नहीं बन सके संपादक?

अक्सर अशोक अग्रवाल जी शाम 6-7 बजे के बीच कमरे में आ जाते थे और आज की न्यूज़ पूछते थे और कुछ कुछ देश-समाज-शहर की बातें करते थे. बहुधा खबरों को लेकर पलाश दादा उनकी राय से सहमत नहीं होते थे. अशोक जी अपनी राय में तर्क-वितरक पसंद नहीं करते थे. इसी कारण अशोकजी पलाश दा से चिढ़े रहते थे. पलाश दा को मैंने और स्वर्गीय सुनील शाह जी ने कई बार समझाया कि जो अशोक जी कहें, उस पर हां कर दिया करें, बेवजह क्यों हम लोगों को भी उनके कोप का भाजन बनवाते हैं. पलाश जी दो टूक कहते थे कि  मैं अपनी बात कहूंगा, अगर किसी के विचार से सहमत नहीं हूँ तो क्यों कहूं हाँ.  लेकिन ठीक इसके विपरीत पलाश दा अख़बार के दूसरे मालिक स्वर्गीय अतुल माहेश्वरी के अत्यन्त नज़दीक थे. समूचे सम्पादकीय टीम में अतुल जी या तो पलाश दा को या सुनील जी को सबसे ज्यादा अहमियत देते थे. पांच-छह लोगों की सेंट्रल डेस्क टीम में मई भी शामिल था. सुनील शाह के अलावा अन्य थे- पंकज जोशी, मनोज मिश्र, विनोद कापड़ी, देशपाल सिंह पंवार. टीम का हर सदस्य दक्ष था. मनोज और कापड़ी पत्रकारिता में एकदम नए थे. मनोज में लेख लिखने की भारी उत्कंठा थी. अशोकजी के जाने के २ घंटे बाद राजुल जी कमरे में आते थे और न्यूज़ पूछते थे, वे राय तो कुछ नहीं देते थे पर और मामलों में निर्देश जरूर देते थे जैसे कल एडिशन देर से क्यों छूटा, लखनऊ से फलां  खबर क्यों नहीं आई जबकि आज जागरण में है आदि. पहाड़ का एडिशन छूटने के बाद रात 10 -10 ,30 बजे राजुल जी मुझे अपने चैम्बर में बुलाते थे और 20  -25  मिनट तक ऑफिस से लेकर काम-काज की तमाम बातें होती थी. बाद में उनका मुझ पर इतना भरोसा जमा कि बड़े फैसले में भी मेरी राय लेने लगे. परिस्थितयां बदली, अमर उजाला का समूचा ढांचा बदला,  अमर उजाला छोड़ने के 11 साल बाद भी मैंने यह भरोसा आज तक नहीं टूटने दिया. जब उनके कमरे से बाहर आता था तो कोई भी सहयोगी यह नहीं पूछता था कि क्या बात हुई? सभी को मुझ पर बहुत विश्वास था.

पलाश दा अमर उजाला में वह मात्र दो साल ही नौकरी कर सके. कोलकाता से जनसत्ता लांच होने वाला था उन्होंने उसमे अर्जी लगा दी मुझसे और शाह जी से भी अर्जी लगाने  को कहा तो दोनों ने अनिच्छा जता दी. सुनील जी बरेली छोड़कर कही और नहीं जाना चाहते थे क्योंकि नैनीताल में उनकी एस्टेट थी. और  इसी कारण जनसत्ता दिल्ली छोड़कर अमर उजाला आये थे. मैं अपनी पत्नी की वजह से नहीं जाना चाहता था जो वही एक बड़े पब्लिक स्कूल में प्रिंसिपल हो गयी थीं.

जब पलाश दा को जनसत्ता से इंटरव्यू के लिए बुलाया गया तो न्यूज़ एडिटर रस्तोगी जी ने हम लोगो से कहा कि देखना, पलाश दा अपने स्वभाव के कारण वहां एक साल से ज्यादा नहीं टिक पाएंगे. हम लोगों ने उनकी बात से इत्तेफ़ाक़ भी किया. अब जब दो दिन पहले उनका संस्मरण पढ़ा तो निश्चित तौर पर उस घटना की याद आ गयी जब हम लोग उनके कही भी ज्यादा दिन न टिक पाने की सम्भावना जता  रहे थे. पलाश दा के किसी अख़बार में 25 साल तक काम करने की घटना को  चमत्कारिक  कहा जायेगा.

मैं यह बात इसीलिए भी कह रहा हूँ कि पलाश दा एक बेहद योग्य और खबरों की विस्तृत समझ वाले इंसान हैं. उनमे टीम को लीड करने की अपार  क्षमता है लेकिन समस्या बस वही है कि वे विद्रोही प्रवृति के कारण अख़बारों के मालिकान के कृपापात्र नहीं बन सकते और बने भी नहीं.

मैंने तो ऐसे- ऐसे ढीठ और अज्ञानी किस्म के संपादक/समूह संपादक  देखे हैं जिनमे पत्रकारिता के अंशमात्र गुण नहीं होते, उनमे जो कुछ दीखता है वह ईंट भट्टा के ठेकेदार  का दूसरा रूप ही है.  ग्वालियर में मैं दो ऐसे संपादक के साथ काम कर चूका हूँ जो ठीक से चार वाक्य भी नहीं लिख सकते हैं. बस अपने आका की कृपा से संपादक की कुर्सी का सुख भोग रहे हैं. दोनों चीफ सब पद योग्य भी नहीं हैं. इन सम्पादकों के ऐसे-ऐसे कृत्यों की घटनाएं मेरे जेहन में हैं जिसे सुनने पर लोग सिर पीट लें. कई और सम्पादकों को नज़दीकी से जानता हूँ, कोई लड़कियों का प्रेमी है तो कोई धन वसूली का, 90 फीसदी संपादक अपनी योगयता की बदौलत नहीं, अपने आका को खुश करके बने रहते हैं. यही वजह है कि जब आका बदलते हैं तो उनकी भी कुर्सी खिसक जाती है. अब आप बताईये, उधमसिंह नगर (उत्तराखंड) के दिनेशपुर गांव निवासी पलाश दा इसमें कहाँ से फिट बैठेंगे?

जब एनडी तिवारी ने जागरण से निकालने को कहा

मुझे एक घटना याद है. अमर उजाला में आने से पहले पलाश दा दैनिक जागरण मेरठ में कार्यरत थे. 1990  के पहले की बात है. एक बार उन्होंने तत्कालीन मुख्यमंत्री  नारायण दत्त तिवारी के खिलाफ कोई लेख लिख दिया था. श्री तिवारी इतने नाराज़ हुए कि उन्होंने जागरण के मेरठ प्रभारी (मालिक) धीरेंद्र मोहन को फ़ोन कर पलाश दा को निकाल देने को कहा. मालिक दबाव में आ गए. इस बीच किसी ने श्री तिवारी को बताया कि पलाश दा को नाराज़ करने का मतलब है पुरे दिनेशपुर और आसपास गांव के बंगालियों को नाराज़ करना. इन गाँवो में हज़ारों बंगाली हैं जो देश के विभाजन के समय पाकिस्तान से यहाँ आकर बसे थे. और श्री तिवारी का विधानसभा चुनाव क्षेत्र भी यही है. अगर बंगाली भड़क  गए तो उनका जीतना मुश्किल हो जायेगा.   श्री तिवारी को गलती का अहसास हुआ और धीरेंद्र मोहन को पुनः फ़ोन करके कोई कदम न उठाने का कहा. बाद में पलाश दा का मन इतना खट्टा हुआ कि उन्होंने जागरण छोड़ ही दिया.

अप्रकाशित पड़ी हैं कहानियां

पलाश दा को कहानी लिखने का शौक है लेकिन उनकी कहानी जो प्रकाशक एक बार छाप देता है तो दोबारा कहानी से कुछ शब्द निकालने की शर्त पर ही छापने को तैयार होता है. उनकी कहानी होती तो शुद्ध पारिवारिक और सामाजिक है पर उसमे कही एक-दो जगह आपको ऐसे नॉन वेज शब्द मिल जायेंगे जो अश्लील से कम नहीं हैं. पलाश दा कहते हैं शब्द कहानी की आत्मा है, इसे हटाने पर मूलता ख़त्म हो जाएगी, जहाँ जैसा भाव वहां वैसा शब्द. 3-4 साल पहले एक बार फ़ोन पर उन्होंने मुझे बताया था कि सैकड़ों कहानिया अप्रकाशित पड़ी हैं, इलाहाबाद का कोई प्रकाशक बताईये जो इस संग्रह को छाप दे. मैंने कहा कि क्या कोलकाता में प्रकाशक नहीं हैं, तो बोले, हैं तो पर अपनी शर्त लगाते हैं जो मुझे मंज़ूर नहीं. मैंने कहा कि तो क्या इलाहाबाद के प्रकाशक बिना शर्त लगाए छाप देंगे? आप क्यों नहीं कहानी से नॉन वेज शब्दों को निकाल देते? पलाश दा बोले, पंडितजी देखना कोई न कोई तो मिल ही जायेगा. रिटायर्ड होने के बाद पलाश दा गांव लौंटेंगे कि कोलकाता में ही बसेंगे, मुझे नहीं पता. हाँ दोनों जगह उनके पास बहुत कुछ है करने के लिए, वह ख़ाली नहीं बैठेंगे.

वह रीता बहुगुणा नहीं, कुमुदिनी पति थीं.

भड़ास में पलाश दा ने अपने संस्मरण में लिखा है कि रीता बहुगुणा PSO की थी जो इलाहाबाद यूनिवर्सिटी की उपाध्यक्ष  बनी. मैं बता दूँ कि वह रीता बहुगुणा नहीं बल्कि कुमुदिनी पति थीं. कुमुदिनी PSO की सक्रिय नेता थीं और छात्र संघ उपाध्यक्ष पद का चुनाव लड़ी, भरी मतों से जीतीं. रीता बहुगुणा कभी छात्र राजनीति में सक्रिय नहीं रहीं. कुमुदिनी ने बाद में CPI (ML ) के महासचिव विनोद मिश्र (अब स्वर्गीय) से शादी कर ली थी. वह इसी यूनिवर्सिटी  के तत्कालीन प्रो-वाईस चांसलर प्रो. टी पति की  बेटी हैं.

लेखक इंद्र कांत मिश्र से संपर्क 9827434787 या heritagemental@yahoo.in के जरिए किया जा सकता है.


पलाश विश्वास का वो संस्मरण पढ़िए जिसका जिक्र इंद्र कांत मिश्र ने अपने उपरोक्त आलेख में किया है… नीचे दिए शीर्षक पर क्लिक करें…

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शैलेंद्र की जनसत्ता कोलकाता से हो गयी विदाई, अगले हफ्ते मेरी बारी

माननीय ओम थानवी का आभार कि शैलेंद्र जी और मेरे करीबन पच्चीस साल एक साथ काम करते हुए साथ साथ विदाई की नौबत आ गयी। पिछले साल जब शैलेंद्र रिटायर होने वाले थे, तब हमने उनसे निवेदन किया था कि 1979 से शैलेंद्र हमारे मित्र रहे हैं और अगले साल मेरी विदाई है तो कमसकम उन्हें एक साल एक्सटेंशन दे दिया जाये। वैसे ओम थानवी से मेरे संबंध मधुर नहीं थे लेकिन उनने तुरंत फेसबुक पर सूचना करीब दो महीने पहले दे दी कि शैलेंद्र की सेवा जारी है।

अबकी दफा आज तक हमें मालूम नहीं था कि शैलेंद्र जा रहे हैं जबकि डेस्क पर हम लोग कुल पांच लोग थे। शैलेंद्र, मैं, डा.मांधाता सिंह, जयनारायण और रामबिहारी। राम बिहारी वेज बोर्ड पर नही हैं। चूंकि दस्तूर है कि संपादक मैनेजर की सेवा में विस्तार सामान्य बात है और उपसंपादक विदा कर दिये जाते हैं। हम मान रहे थे कि इस बार हम विदा होंगे जरूर, लेकिन शैलेंद्र रहेंगे। वैसा नहीं हुआ।

माननीय प्रभाष जोशी ने आईएएस जैसी परीक्षा लेकर हमें चुना तो उनने अगस्त्य मुनि की तरह जो यथावत रहने का वरदान दिया,उसके मुताबिक हम यथावत विदा हो रहे हैं हालांकि मजीठिया वेतन बोर्ड में दो प्रमोशन का प्रावधान है। वेतनमान बदल गया है लेकिन हैसियत नहीं बदली। अखबार भी अब खबरों का अखबार हो गया है और संपादक भी बदल गये हैं। जिन्हें मैं निजी तौर पर नहीं जानता। वे कृपापूर्वक कोलकाता आये और हमने उनसे कहा कि दस साल तक कोलकाता कोई संपादक आये नहीं हैं तो आप आये हैं तो आपका आभार।

हमने उनसे कहा कि हमें अब तक कुछ नहीं मिला तो आगे भी कोई उम्मीद नहीं है और न हमारी कोई मांग है। वैसे भी हम जा रहे हैं तो हम बस इतना चाहते हैं कि हमारे साथी रामबिहारी का वेतन थोड़ा बढ़ा दिया जाये और स्ट्रींगरों का कुछ भला हो जाये। हमें तब भी उम्मीद थी कि अगर संस्करण जारी रहता है तो कमसकम शैलेंद्र बने रहेंगे। कल तक यही उम्मीद बनी हुई थी जबकि हम जाने की पूरी तैयारी कर चुके हैं और बाद में क्या करना है, यह भी तय कर चुके हैं।

मेरे जाने से हफ्तेभर पहले ही शैलेंद्र की विदाई 25 साल का साथ छूटने का दर्द दे गयी और इसके लिए हम कतई तैयार न थे। खुशी इस बात की है कि कोलकाता में हम लोग एक परिवार की तरह आखिर तक बने रहे। अब यह परिवार टूटने के आसार हैं।  जिस तेजी से सूचना परिदृश्य बदला है, उससे परिवर्तन तो होना ही था और इस परिवर्तन में जाहिर है कि सनी लिओन की प्रासंगिकता हो भी सकती है, हिंदी पत्रकारिता और साहित्य में हमारी कोई प्रसंगिकता नहीं है। जाते जाते हमें कोई अफसोस नहीं है।

मामूली पत्रकार होने के बवजूद जनसत्ता में होने की वजह से जो प्यार, सम्मान और पहचान मुझे मिली, मेरी जाति और मेरे तबके के लोगों के लिए इस केसरिया समय में हासिल करना बेहद मुश्किल है। फिर पिछले 25 साल में अपनी बातें कहने लिखने और संपादक की आलोचना तक कर देने की बदतमीजियां जैसे मैंने की, उसके मद्देनजर मुझे किसी भी स्तर पर रोका टोका नहीं गया। हम संपादक या मैनेजर नहीं हुए, इसका भी कोई अफसोस नहीं है। हमने विशुद्ध पत्रकारिता की है चाहे कोई हैसियत हमारी हो न हो, जनसत्ता ने हमें इतनी आजादी दी, इसके लिए हम आभारी हैं।

शैलेंद्र से हमारी मुलाकात 1979 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय में डा.रघुवंश की कक्षा में हुई थी, जहां इलाहाबाद पहुंचते ही शैलेश मटियानी जी ने मुझे भेज दिया था। इलाहाबाद में मैं जबतक रहा तब तक लगातार हम साथ साथ रहे। वैसे शुरू से शैलेंद्र वामपंथी रहे हैं और पत्रकारिता में भी उनने वामपंथ का निर्वाह किया और यह आज के केसरिया दौर में उनकी अपनी उपलब्धि है। इलाहाबाद में तब वामपंथी कम नहीं थे। उदितराज तब रामराज थे और एसएफआई के सक्रिय कार्यकर्ता थे और जिनके साथ वे जेएनयू लैंड हुए, वे देवीप्रसाद त्रिपाठी भी वामपंथी थे।

अनुग्रह नारायण सिंह तब एसएफआई की तरफ से इलाहाबाद विश्विद्यालय के अध्यक्ष थे जिनने सबसे पहले दलबदल किया। इसलिए इलाहाबाद विश्वविद्यालय की मौजूदा अध्यक्ष की राजनीति पर मुझे कोई अचरज नहीं हुआ। रीता बहुगुणा भी पीएसओ से इलाहाबाद विश्वविद्यालय की उपाध्यक्ष बनी थीं। तमाम लोग बदल गये लेकिन शैलेंद्र नहीं बदले और न हम बदले। हम जब तक रहे, पूरे मिजाज और तेवर के साथ रहे, शायद जनसत्ता जैसे अखबार की वजह से ऐसा संभव हुआ।

शायद प्रभाष जी संपादक थे तो हम लोगों की नियुक्तियां जनसत्ता में हो सकीं और हमने पच्चीस साल बिता भी लिये। वैसे अपने सरोकार और सामाजिक सक्रियता जारी रखते हुए दैनिक आवाज में अप्रैल 1980 से शुरू पत्रकारिता 2016 तक बिना किसी व्यवधान के जारी रख पाना कुदरत का करिश्मा ही कहा जायेगा। अब मौसम बदल रहा है। फिजां बदल रही है। देश मुक्तबाजार है तो पत्रकारिता भी मुक्तबाजार है।

सूचना और विचार की बजाय सर्वोच्च प्राथमिकता बाजार और  मनोरंजन है और हम जैसे बूढ़े लोग न बाजार के लायक हैं और न मनोरंजन के लिहाज से काम के हैं, इसलिए ऐसा होना ही था। हिंदी समाज के लिए जनसत्ता के होने न होने के अलग मतलब होसकते हैं।आज के दौर में नहीं भी  हो सकते हैं। बहरहाल हम चाहते हैं कि हम रहे या न रहे, जनसत्ता अपने मिजाज और तेवर के साथ जारी रहे।

लेखक पलाश विश्वास जनसत्ता कोलकाता में कार्यरत हैं.

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हस्तक्षेप डाट काम के संपादक अमलेंदु की चोटें गंभीर, हाथ में क्रैक और कंधे पर जख्म

-पलाश विश्वास-

हमारे लिए बुरी खबर है कि हस्तक्षेप के संपादक अमलेंदु को सड़क दुर्घटना में चोट कुछ ज्यादा आयी है। आटो के उलट जाने से उनके दाएं हाथ में क्रैक आ गया है और इसके अलावा उन्हें कंधे पर भी चोटें आयी है। भड़ास के दबंग यशवंत सिंह ने यह खबर लगाकर साबित किया है कि वे भी वैकल्पिक मीडिया के मोर्चे पर हमारे साथ हैं। हम तमाम दूसरे साथियों से भी साझा मोर्चे की उम्मीद है ताकि हम वक्त की चुनौतियों के मुकाबले डटकर खडे हो और हालात के खिलाप जीत भी हमारी हो। हमारी लड़ाई जीतने की लड़ाई है। हारने की नहीं।

हम उनके आभारी हैं, जिनने सहयोग का वादा किया है या जो अब भी हमारे साथ हैं।लेकिन जुबानी जमाखर्च से काम चलने वाला नहीं है, जिससे जो संभव है, वह कम स कम उतना करें तो गाड़ी बढ़ेगी वरना फुलस्टाप है। मीडिया में पिछले 36 साल कतक नौकरी करने के अनुभव और लगातार भोगे हुए यथार्थ के मुताबिक हम यकीनन यह दावा कर सकते हैं कि भड़ास की वजह से ही मीडिया में काम कर रहे पत्रकार और गैर पत्रकारों की समस्याओं पर फोकस बना है और बाकी दूसरे पोर्टल मीडिया केंद्रित शुरु होने की वजह से मीडिया की खबरें किसी भी कीमत पर दबी नहीं रह सकती।

यह मोर्चाबंदी यकीनन पत्रकारों और गैर पत्रकारों के हक हकूक के बंद दरवाजे खोलती हैं। हमारे लिए यही महत्वपूरण है और यशवंत की बाकी गतिविधियों को हम नजरअंदाज भी कर सकते हैं। पत्रकारिता का यह मोर्चा यशवंत ने खोला और अपनी सीमाओं में काफी हद तक उसका नेतृत्व भी किया, इसके महत्व को कतई नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। यह आत्मघाती होगा। ऐसे सभी प्रयासों में हम शामिल हैं बिना शर्त।

हमें बडा़ झटका इसलिए लगा है कि हम बहुत जल्द कम स कम गुरमुखी, बांग्ला और मराठी में हस्तक्षेप का विस्तार करना चाहते थे। क्योंकि जनसुनवाई कहीं नहीं हो रही है और जनसरोकार की सूचनाएं और खबरें आ नहीं रही हैं। भड़ास अपना काम कर रहा है और हमारा सोरकार बाकी मुद्दों को संबोधित करना है।इसके लिए पूंजी के वर्चस्व को तोड़ बिना काम नहीं चलेगा और बाजार के नियम तोड़कर हमें कारपोरेट मीडिया के मुकाबले खड़ा होना होगा।

इसकी निश्चित योजना हमारे पास है और हम यकीनन उस पर अमल करेंगे। फिलहाल हफ्तेभर से लेकर चार हफ्ते तक हस्तक्षेप बाधित रहेगा और कोई फौरी बंदोबस्त संभव नहीं है। क्योंकि लेआउट, संपादन और समाग्री के साथ लेकर तात्कालिक बंदोबस्त बतौर पर कोई छेड़छाड़ की कीमत पर कहीं से भी अपडेट कर लेने का विकल्प हम सोच नहीं रहे हैं। क्योंकि हस्तक्षेप के तेवर और परिप्रेक्ष्य में कोई फेरबदल मंजूर नहीं है।

लेखकों और मित्रों से निवेदन है कि अमलेंदु के मोर्चे पर लौटने से पहले वे अपनी सामग्री मुझे भेज दें ताकि उन्हें अपने ब्लागों में डालकर रियल टाइम कवरेज का सिलसिला हम बनाये रख सकें और हस्तक्षेप का अपडेट शुरु होने पर जरुरी सामग्री वहां पोस्ट कर सकें। पाठकों और मित्रों से निवेदन है पिछले पांच सालों से हम लागातार हस्तक्षेप कर रहे हैं तो हस्तक्षेप पर पिछले पांच साल के तमाम मुद्दों पर महत्वपूर्ण सामग्री मौजूद है। कृपया उसे पढे़ और अपनी राय दें।

इसके अलावा आपसे गुजारिश है कि महत्वपूर्ण और प्रासंगिक लिंक भी आप विभिन्न प्लेटफार्म पर शेयर करते रहें ताकि अपडेट न होने की हालत में भी हस्तक्षेप की निरंतरता बनी रहेगी। इसके लिए आपके सहयोग की आवश्यकता है। उम्मीद हैं कि जो लोग हमारे साथ हैं, उन्हें इस दौरान हस्तक्षेप अपडेट न होने का मतलब भी समझ में आयेगा और वे जो भी जरूरी होगा, हमारी अपील और गुहार के बिना अवश्य करेंगे, जो वे अभी तक करना जरूरी नहीं मान सके हैं।

मैं बहुत जल्द सड़क पर आ रहा हूं लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि मेरी कोई महत्वाकांक्षा देश, आंदोलन या संगठन का नेतृत्व करने की है। हमने बेहतरीन कारपोरेट पेशेवर पत्रिकारिता में 36 साल गुजार दिये, तो इस अनुभव के आधार पर सत्तर के दशक से लगातार लघु पत्रिका आंदोलन और फिर वैकल्पिक मीडिया मुहिम से जुड़े रहने के कारण हमारी पुरजोर कोशिश रहेगी कि हर कीमत पर यह सिलसिला न केवल बना रहे बल्कि हम अपनी ताकत और संसाधन लगाकर आनंद स्वरुप वर्मा और पंकज बिष्ट जैसे लोगों की अगुवाई में कारपोरेट मडिया के मुकाबले जनता का वैकल्पिक मीडिया का निर्माण हर भारतीय भाषा में जरूर करें।

हम चाहेंगे कि जन प्रतिबद्ध युवा पत्रकारों और सामाजिक कार्यकर्ताओं और जनआंदोलन के साथियों को भी हम इस मीडिया के लिए बाकायदा प्रशिक्षित करें और जिन साथियों के लिए कारपोरेट मीडिया में कोई जगह नहीं है,उनकी प्रतिबद्धता के मद्देनजर उनकी प्रतिभा का समुचित प्रयोग के लिए,उनकी अभिव्यक्ति के मौके के लिए वैकल्पिर अवसर और रोजगार दोनों पैदा करें। इसकी योजना भी हमारे पास है।

बहरहाल मेरे पास अब हासिल करने या खोने के लिए कुछ नहीं है। नये सिरे से बेरोजगार होने की वजह से निजी समस्याओं से भी जूझकर जिंदा रहने की चुनौती मुँह बांए खड़ी है। फिर भी वैकल्पिक मीडिया हमारे लिए सर्वोच्च प्राथमिकता है। आप साथ हों या न हों, आप मदद करें या न करें-यह हमारा मिशन है। इस मिशन में शामिल होने के लिए हम सभी का खुल्ला आवाहन करते हैं। हम बार बार कह रहे हैं कि पूंजी के अबाध वर्चस्व और रंगभेदी मनुस्मृति ग्लोबल अश्वमेध में तमाम माध्यम और विधायें और मातृभाषा तक बेदखल हैं।

ऐसे हालात में हमें नये माध्यम,नई विधाएं और भाषाएं गढ़नी होगी अगर हम इस जनसंहारी समय के मुकाबले खड़ा होने की हिम्मत करते हैं। सत्ता निरंकुश है और पूंजी भी निरंकुश है। ऐसे अभूतपूर्व संकट में पूरे देश को साथ लिये बिना हम खडे़ तक नहीं हो सकते। इस जनसंहारी समय पर हम किसी एक संगठन या एक विचारधारा के दम पर कोई प्रतिरोध खड़ा ही नहीं कर सकते।इकलौते किसी संगठन से भी काम नहीं चलने वाला है बल्कि जनता के हक में, समता और न्याय के लिए, अमन चैन, बहुलता, विविधता, मनुष्यता, सभ्यता और नागरिक मनवाधिकारों के लिए मुकम्मल संघीय साझा मोर्चा जरूरी है।

बिना मोर्चाबंदी के हम जी भी नहीं सकते हैं। सारी राजनीति जनता के खिलाफ है तो मीडिया भी जनता के खिलाफ है। राजनीति लड़ाई, सामाजिक आंदोलन औरमुक्तबाजारी अर्थ व्यवस्था में बेदखल होती बहुसंख्य जनगण की जल जंगल जमीन आजीविका और नागरिक, मानवाधिकार की लड़ाई वैकल्पिक मीडिया के बिना सिरे से असंभव है। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए हम हर उस व्यक्ति या समूह के साथ साझा मोर्चा बाने चाहेंगे जो फासीवाद के राजकाज के खिलाफ कहीं न कहीं जनता के मोर्चे पर हैं। हम आपको यकीन दिलाना चाहते हैं कि हम आखिरकार कामयाब होंगे क्योंकि हमारा मिशन अपरिहार्य है और उसमें निर्णायक जीत के बिना हम न मनुष्यता, न सभ्यता और न इस पृथ्वी की रक्षा कर सकते हैं।

संकट अभूतपूर्व है तो यह मित्रों और शत्रुओं की पहचान करके आगे बढ़ते जाने की चुनौती है।जिनका हाथ हमारे हाथ में न हो,उनसे बहुत देर तक अब मित्रता भी जैसे संभव नहीं है वैसे ही नये जनप्रतिबद्ध मित्रों के बढ़ते हुए हाथ का हमें बेसब्र इंतजार है। “हस्तक्षेप” पाठकों-मित्रों के सहयोग से संचालित होता है। छोटी सी राशि सेहस्तक्षेप के संचालन में योगदान दें।

लेखक पलाश विश्वास वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं. उन्हें लेख भेजने, हस्तक्षेप के संचालन हेतु मदद देने और अन्य किसी मकसद से संपर्क palashbiswaskl@gmail.com के जरिए किया जा सकता.

मूल खबर….

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हस्तक्षेप डाट काम के संपादक अमलेंदु उपाध्याय सड़क दुर्घटना में घायल

कल शाम दिल्ली में हस्तक्षेप के संपादक अमलेंदु उपाध्याय एक भयंकर दुर्घटना में बाल बल बच गये हैं। वे जिस आटो से घर लौट रहे थे, वह एक बस से टकरा गया। आटो उलट जाने से अमलेंदु और दो साथियों को चोटें आयीं। अमलेंदु के दाएं हाथ में काफी चोटे आयी हैं। उनके दुर्घटनाग्रस्त होने से हस्तक्षेप डाट काम के संचालन पर असर पड़ रहा है और साइट अपडेट नहीं हो पा रही है क्योंकि हस्तक्षेप अपडेट करने के लिए कोई दूसरा नहीं है। ऐसे समय में यह हमारे लिए भारी झटका है। उम्मीद है कि जल्द से जल्द वे काम पर लौटने की हालत में होंगे।

हम कितने अकेले और बेबस हैं, यह इसका नमूना है। ‘समयांतर’ पंकज बिष्ट जी की जिद पर अभी नियमित है तो समकालीन तीसरी दुनिया के लिए भी हम साधन जुटा नहीं पा रहे हैं। एक के बाद एक मोर्चा हमारा टूट रहा है और हम अपने किले बचाने की कोशिश में लगे नहीं है। सत्तर के दशक से पंकज बिष्ट और आनंद स्वरुप वर्मा की अगुवाई में हम लगातार जो वैकल्पिक मीडिया बनाने की मुहिम में लगे हैं, अपने ही लोगों का साथ न मिलने से उसका डेरा डंडा उखड़ने लगा है। एक एक करके पोर्टल बंद होते जा रहे हैं।

भड़ास को यशवंत अकेले दम चला रहे हैं और वह मीडिया की समस्याओं से अब भी जूझ रहा है। पिछले पांच साल से कुछ दोस्तों की मदद से हस्तक्षेप नियमित निकल रहा है और हम उसे राष्ट्रव्यापी जनसुनवाई मंच में बदलने की कोशिश में लगे हैं। अमलेंदु हमारे युवा सिपाहसालार हैं और विपरीत परिस्थितियों में उसने मोर्चा जमाये रखा है। मित्रों से निवेदन है कि हालात को समझें और जरुरी कदम उठायें ताकि हमारी आवाज बंद न हों।

हस्तक्षेप.कॉम कुछ संजीदा पत्रकारों का प्रयास है। काफी लम्बे समय से महसूस किया जा रहा था कि तथाकथित मुख्य धारा का मीडिया अपनी प्रासंगिकता खोता जा रहा है और मीडिया, जिसे लोकतंत्र का चौथा खंभा कहा जाता है, उसकी प्रासंगिकता अगर समाप्त नहीं भी हो रही है तो कम तो होती ही जा रही है। तथाकथित मुख्य धारा का मीडिया या तो पूंजीपतियों का माउथपीस बन कर रह गया है या फिर सरकार का।

आज हाशिए पर धकेल दिए गए आम आदमी की आवाज इस मीडिया की चिन्ता नहीं हैं, बल्कि इसकी चिन्ता में राखी का स्वयंवर, राहुल महाजन की शादी, राजू श्रीवास्तव की फूहड़ कॉमेडी और सचिन तेन्दुलकर के चौके छक्के शामिल हैं। कर्ज में डूबे किसानों की आत्महत्याएं अब मीडिया की सुर्खी नहीं नहीं रहीं, हां ‘पीपली लाइव’ का मज़ा जरूर मीडिया ले रहा है। और तो और अब तो विपक्ष के बड़े नेता लालकृष्ण अडवाणी के बयान भी अखबारों के आखरी पन्ने पर स्थान पा रहे हैं।

ऐसे में जरूरत है एक वैकल्पिक मीडिया की। लेकिन महसूस किया जा रहा है कि जो वैकल्पिक मीडिया आ रहा है उनमें से कुछ की बात छोड़ दी जाए तो बहुत स्वस्थ बहस वह भी नहीं दे पा रहे हैं। अधिकांश या तो किसी राजनैतिक दल की छत्र छाया में पनप रहे हैं या फिर अपने विरोधियों को निपटाने के लिए एक मंच तैयार कर रहे हैं। इसलिए हमने महसूस किया कि क्यों न एक नया मंच बनाया जाए जहां स्वस्थ बहस की परंपरा बने और ऐसी खबरें पाठकों तक पहुचाई जा सकें जिन्हें या तो राष्ट्रीय मीडिया अपने पूंजीगत स्वार्थ या फिर वैचारिक आग्रह या फिर सरकार के डर से नहीं पहुचाता है।

ऐसा नहीं है कि हमें कोई भ्रम हो कि हम कोई नई क्रांति करने जा रहे हैं और पत्रकारिता की दशा और दिशा बदल डालेंगे। लेकिन एक प्रयास तो किया ही जा सकता है कि उनकी खबरें भी स्पेस पाएं जो मीडिया के लिए खबर नहीं बनते। ऐसा भी नहीं है कि हमारे वैचारिक आग्रह और दुराग्रह नहीं हैं, लेकिन हम एक वादा जरूर करते हैं कि खबरों के साथ अन्याय नहीं करेंगे। मुक्तिबोध ने कहा था ‘तय करो कि किस ओर हो तुम’। हमें अपना लक्ष्य मालूम है और हम यह भी जानते हैं कि वैश्वीकृत होती और तथाकथित आर्थिक उदारीकरण की इस दुनिया में हमारा रास्ता क्या है? इसलिए अगर कुछ लोगों को लगे कि हम निष्पक्ष नहीं हैं तो हमें आपत्ति नहीं है।

हम यह भी बखूबी जानते हैं कि पोर्टल चलाना कोई हंसी मजाक नहीं है और जब तक कि पीछे कोई काली पूंजी न हो अथवा जिंदा रहने के लिए आपके आर्थिक रिश्ते मजबूत न हों, या फिर आजीविका के आपके साधनों से अतिरिक्त बचत न हो, तो टिकना आसान नहीं है। लेकिन मित्रों के सहयोग से रास्ता पार होगा ही! आशा है आपका सहयोग मिलेगा। हमारा प्रयास होगा कि हम ऐसे पत्रकारों को स्थान दें जो अच्छा काम तो कर रहे हैं लेकिन किसी गॉडफादर के अभाव में अच्छा स्पेस नहीं पा रहे हैं। हम जनोपयोगी और सरोकारों से जुड़े लोगों और संगठनों की विज्ञप्तियों को भी स्थान देंगे. यदि आप हस्तक्षेप.कॉम की आर्थिक सहायता करना चाहते हैं तो amalendu.upadhyay@gmail.com पर संपर्क कर सकते हैं.

लेखक पलाश विश्वास जनसत्ता, कोलकाता में लंबे समय से वरिष्ठ पद पर कार्यरत जनसरोकारी पत्रकार हैं.

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जब मीडिया मालिकों ने यशवंत को जेल भिजवाया था, तभी मैंने आगाह कर दिया था….

Palash Biswas : शाहजहांपुर में सोशल मीडिया के पत्रकार को मंत्री के गुर्गों और पुलिसे के द्वारा उसके घर में जिन्दा जला कर मार देने की घटना रौंगटे खड़ा कर देने वाली हैl साथ ही यह उत्तर प्रदेश कि सरकार के साथ साथ प्रदेश के पत्रकारों के चरित्र को भी उजागर करती हैl साथियों, याद करें जब मजीठिया की लड़ाई में पत्रकारों की अगुवाई करने वाले भड़ास के यशवंत को मालिकों की रंजिश की वजह से जेलयात्रा करनी पड़ी, तो हमने सभी साथियों से आग्रह किया था कि हमें एकजुट होकर अपने साथियों पर होने वाले हमले के खिलाफ मजबूती से खड़ा होना चाहिए। हम शुरू से पत्रकारिता के मूल्यों की रक्षा के लिए निरंतर वैकल्पिक मीडिया के हक में लामबंदी की अपील करते रहे हैं। हम लामबंद होते तो हमारे साथी रोज-रोज मारे नहीं जाते।

एक फीसद से भी प्रभु वर्ग के सारस्वत पत्रकारों के लिए कारपोरेट पत्रकारिता का मायामहल भले ही पांचसितारा मौजमस्ती का मामला है, हकीकत की जमीन पर निनानब्वे फीसद पत्रकारों की हालत कुकुरदुर्गति है, ऐसा हम बार बार लिख कह रहे हैं। जाति व्यवस्था का भयंकर चेहरा मीडिया का सच है तो नस्ली वर्ण वर्चस्व यहां दिनचर्या है। वैसे भी पिछले वेज बोर्ड के बाद तेरह साल के इंतजार के बाद जो मजीठिया आधा अधूरा मिला, उससे पहले तमाम अखबारों में स्थाई कर्मचारी ठिकाने पर लगा दिये गये। बाकी भाड़े पर बंधुआ फौज है। इलेक्ट्रानिक मीडिया के पांच सितारा लाइव चकाचौंध में परदे पर उजले जगमगाते चेहरों के कार्निवाल के पीछे हमारे भाइयों साथियों का दमन उत्पीड़न शोषण का अटूट सिलिसिला है। सितारा अखबारों और समूहों में तो नस्ली भेदभाव ही पत्रकारिता का जोश है और तमाम मीडिया महाजन मसीहा वृंद आंदोलन के नाम पर चूजे सप्लाई करते रहने वाले या चूजों के शौकीन महामहिम हैं। जिलों और देहात में उमेश डोभाल हत्याकांड का सिलसिला जारी है।

पत्रम् पुष्पम् के बदले दिन रात सिर्फ नाम छपने की लालच में जो पत्रकारिता के शिकंजे में फंसकर मुर्गियों की तरह हलाल कर दिये जाते हैं, भड़ास और मीडिया से जुड़े तमाम सोशल साइटों के कारण उनका किस्सा भी अब सभी जानते हैं। राजनीति के साथ महाजनों, मठाधीशों और आंदोलन चलानेवालों के अविराम हानीमून का नतीजा यह है कि पकत्रकारिता मिशन या जनमत या जन सरोकार से कोसों दूर हैं। हमारी मीडिया बिरादरी आकाओं की अय्याशी का समान जुटाने के लिए ही खून पसीना एक किये जा रहे हैं। महाजनों के सत्ता संबंधों की वजह से ही आम पत्रकारों और कासकर जिलों, गांवों और कस्बों में जनता की आवाज उठाकर सत्ता से टकराने वाले पत्रकारों की हत्या का यह उत्सव है। कानून का राज कैसा है और झूठ के पंख कितने इंद्रधनुषी हैं, मोदियापा समय के जनादेश बनाने वाले केसरिया कारपोरेट प्रभुओं की कृपा से हम सारे लोग इस जन्नत का हकीकत जानते हैं, जो सिरे से हाशिये पर हैं।

हमें अपनी ताकत का अंदेशा नहीं है और गुलामी की जंजीरों को पहनकर हम मटक मटककर सत्ता गलियारे की जूठन की आस में हैं जो थोक भाव से प्रभू वर्ग का वर्चस्व है। निनानब्वे फीसद को तो वेतन, भत्ता, प्रमोशन सब कुछ जाति और पहचान और सत्ता संबंधों के आधार पर मुटियाये चर्बीदार पांच सितारा लुटियन तबके के मुकाबले कुछ भी नहीं मिलता। पत्रकारों के संगठन अब तक मालिकों के साथ ट्रेड यूनियन आचरण के तहत सौदेबाजी करते रहने के लिए मशहूर है और मीडिया में सामंतवादी साम्राज्यवादी तंत्र मंत्र के किलाफ बगावत अभी शुरु ही नहीं हो सकी है। एक मजीठिया मंच से ही मालिकान के खेमे में नानियां खूब याद आ रही है। बहुसंख्य बहुजन उत्पीड़ित पत्रकार अगर एकजुट हो जायें और जंग लगी कलम और उंगलियों को ही हरकत में लाकर महामहिमों के सत्ता संबंधों के खिलाफ उठ खड़े हों तो हत्याओं का यह सिलसिला रुक सकता है, वरना नहीं। समझ लीजिये कि केंद्र और सूबों में जो बाहुबलि धनपशुओं का वर्गीय वर्णीय जाति वर्चस्व लोकतंत्र के नाम पर जनसंहार राजकाज अबाध पूंजी में लोटपोट चला रहे हैं, भ्रष्ट राजनेताओं के साथ साथ भ्रष्ट पत्रकारों की हिस्सेदारी उसमें प्रबल है। अरबपति बन गये भूतपूर्व पत्रकारों की एक अच्छी खासी जमात भी अब तैयार है। मंत्री से संत्री तक की असली ताकत इन्ही विभीषणों की कारगुजारी है।

जिलों, कस्बों और गांवों के पत्रकार साथियों के हक हकूक की लड़ाई में राजधानियों और महानगरों के मीडिया बिरादर जब तक शामिल न होंगे,हत्याकांड होते रहेंगे और निंदा की रस्म अदायगी के साथ हम फिर हत्यारों का साथ देते रहेंगे और याद रखियें रोज रोज मौत की यह जिंदगी हम ही चुन रहे हैं। साथियों, अपनी ख्वाहिशों और ख्वाबों की तमाम तितलियों को पकड़ने के लिए अपने साथियों के साथ खड़े होने के कला कौशल भी तकनीक की तरह सीख लीजिये वरना खामोश मजा लीजिये कार्निवाल का। भाई अरुण खोटे की अपील पर भड़ास जुबान से उंगलियों तक संक्रमित हो गयी है, किन्हीं साथी को चोट पहुंचाना हमारा मकसद नहीं है। क्या करें कि हकीकत बयां करते हुए दागी चेहरे बेनकाब हो ही जाते हैं।


Arun Khote : शाहजहांपुर में सोशल मीडिया के पत्रकार को मंत्री के गुर्गों और पुलिसे के द्वारा उसके घर में जिन्दा जला कर मार देने की घटना रौंगटे खड़ा कर देने वाली हैl साथ ही यह उत्तर प्रदेश कि सरकार के साथ साथ प्रदेश के पत्रकारों के चरित्र को भी उजागर करती हैl सत्ता के मद में दुबे समाजवादी दल के नेता और मंत्री अपनी गुंडा गर्दी के कारन लगातार चर्चाओं में हैंl इस घटना का हम सब विरोध करते हैंl हम मांग करते हैं कि दोषी मंत्री और पुलिस वालों को तुरंत बर्खास्त करके उनकी गिरफ़्तारी की जायेl घटना कि तय सीमा में सी.बी.आई. जाँच कराई जायेl मृतक पत्रकार के परिवार को एक करोड़ का मुवयाज़ा और उसके परिवार की जिम्मेदारी उठाने वाले व्यक्ति को सरकारी नौकरी तुरंत दी जायेl  दोस्तों! सोशल मीडिया के माध्यम से अन्याय के खिलाफ आवाज़ उठाने वाले साथियों के प्रति हम सभी की जिम्मेदारी बनती हैl कोशिश करें कि यह मांग हर हाल में अखिलेश यादव मुख्यमंत्री के कानों तक पहुंचेl

पत्रकार द्वय पलाश विश्वास और अरुण खोटे के फेसबुक वॉल से.

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