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साहित्य

पटना छेड़छाड़ कांड : कहीं ‘कल्पित’ तो नहीं!

शालिनी श्रीनेत-

क्या हो रहा हमारे समाज में। कल मैंने एक पोस्ट लिखा अब एक और पोस्ट निवेदिता दी ने लिखा…

पटना के साहित्यिक समाज के लिए इससे ज्यादा शर्मनाक बात क्या होगी कि अपने को बड़ा लेखक मानने वाले लेखक महोदय ने एक युवा लेखिका के साथ अभद्र और अश्लील हरकत की। हमारी युवा साथी ने इसका पुरजोर विरोध किया और लिखत माफी नामा मांगा। लेखक के इस अश्लील हरकत और यौन हिंसा के खिलाफ पूरे लेखक समुदाय को आगे आना चाहिए। मैं नाम नहीं लिख रही हूं।

जब ये नाम उजागर करने की इजाज़त होगी तो किया जाएगा। जो पुरुष इस नीचता की हद तक जाते हैं उसपर पूरे समाज को बोलना होगा। लेखक महोदय अभी बाहर रहते हैं इन दिनों पटना एक साहित्यक आयोजन में आए हुए थे। उनपर लानत भेजती हूं।


सुधा भारद्वाज-

यह भय अब उन सभी सेक्सिस्ट पुरषों, शोषकों में होना चाहिए कि कुछ भी करके वे आराम से बचकर नहीं निकल सकते हैं। हर बार विक्टिम को ही कठघरे में खड़ा कर उसके व्यवहार की समीक्षा होती है, कथाएँ, उपकथाएँ गढ़ी जाती हैं और उन सबके बीच से दोषी बरी होकर निकल जाता है।

यह ज़रूरी है कि अब उन दोषियों के मन में भी यह भय आए कि उनकी सामाजिक प्रतिष्ठा भी ख़तरे में है। जिस किसी का भी प्रत्यक्ष, अप्रत्यक्ष शोषण होता, उसके मानसिक आघात की कल्पना की जा सकती है।

ज़रूरी है कि शोषित को अपने ट्रॉमा से लड़ने के लिए संबल दिया जाए, हिम्मत दी जाए। जो शोषक है, अब उसे ट्रॉमा दिए जाने की आवश्यकता है। यह तय होना चाहिए कि कुछ बातें, कुछ कृत्य non negotiable हैं। कुछ कृत्य किसी भी कला, रचना या प्रतिभा के चमत्कार की ओट में छिप नहीं सकते।

क्या साहित्यिक बिरादरी इस तरह के कुकृत्यों के विरोध में कभी एकजुट भी होगी! क्या लोग अपने लाभ या समीकरण के अलावा न्याय की बात, सच बात कहने का हौसला कभी रख पाएंगे!

रचने गुनने वाली स्त्री भी कब इतनी मुक्त होगी कि यह सोच सके कि उसके साथ ग़लत व्यवहार करने वाला उत्तरदायी है, प्रतिष्ठा का हनन उसका हुआ है, उस स्त्री का नहीं।

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