राही मासूम रजा द्वारा लिखित जासूसी उपन्यास आज तक किताब की शक्ल में सामने नहीं आये!

प्रभात रंजन-

राही साहब की पुण्यतिथि आने वाली है-

कल राही मासूम रजा की किताब ‘सीन 75’ के बारे में ट्विट देखा तो उनका ध्यान आया. हिंदी में इस लिक्खाड़ का ठीक से मूल्यांकन नहीं हुआ. ‘जासूसी दुनिया’ के लिए इन्होने बड़ी संख्या में जासूसी उपन्यास लिखे जो आज तक किताब की शक्ल में सामने नहीं आये.

पहले ही साहित्यिक उपन्यास ‘आधा गाँव’ पर इनको साहित्य अकादेमी पुरस्कार मिलते मिलते रह गया क्योंकि उस साल ‘राग दरबारी’ भी उस लिस्ट में थी और ज्यूरी के सदस्यों हजारी प्रसाद द्विवेदी, भगवती चरण वर्मा जैसे कद्दावर लेखकों के सामने नौजवान लेखक और ज्यूरी के तीसरे सदस्य मनोहर श्याम जोशी कुछ बोल नहीं पाए. बाद में फिल्मों में गए और अपने दौर के सबसे सफल संवाद लेखक थे.

हर तरह की फिल्मों के संवाद लिखे, ‘गोलमाल’ से लेकर ‘तवायफ’ तक फ़िल्मी लेखन में भी उनका व्यापक रेंज दिखाई देता है. उनके बारे में कमलेश्वर जी और असगर वजाहत साहब खूब किस्से सुनाते थे. कमलेश्वर जी पेट के नीचे तकिया लगाकर लेटकर लिखते थे और वह बताते कि यह आदत उन्होंने राही साहब से सीखी थी. राही साहब और कमलेश्वर दोनों में एक आदत और समान थी. दोनों को घर के चहल पहल के बीच लिखना सहज लगता था. एकांत में कमलेश्वर जी ने केवल अपना अंतिम उपन्यास ‘कितने पाकिस्तान’ लिखा था जो उन्होंने देहरादून में एक संस्थान के गेस्ट हाउस में रहकर लिखा था.

बात राही साहब की हो रही थी तो फ़िल्मी लेखक के रूप में उनकी क्या ठसक थी इससे जुड़ा एक प्रसंग यह है कि 1980 के दशक में जब मद्रास इंडस्ट्री से बड़ी तादाद में हिंदी फ़िल्में बन रही थीं तो उस इंडस्ट्री के भी स्टार राइटर राही साहब थे. कहते हैं कि वे मद्रास में रह नहीं पाते थे क्योंकि वहां की आबोहवा उनको रास नहीं आती थी इसलिए वे सुबह की फ्लाईट से मद्रास जाते और शूटिंग ख़त्म होने के बाद रात की फ्लाईट से मुम्बई लौट आते थे.

एक समय ऐसा था कि उन्होंने 44 फ़िल्में एक साथ साइन कर रखी थी. बाद में टीवी का दौर शुरू हुआ तो उसके आरंभिक महा-धारावाहिकों में एक ‘महाभारत’ के लेखक राही साहब ही थे. और हाँ, यह भूल ही गया कि राही साहब अगर कुछ न होते तो एक बेहतरीन शायर के रूप में उनका अपना मुकाम होता. उनके कई शेर मुझे बहुत पसंद हैं. फिलहाल एक शेर के साथ उनकी स्मृति को प्रणाम करता हूँ-

रातें परदेस की डरता था कटेंगी कैसे
मगर आँगन में सितारे थे वही घर वाले।

धीरेंद्र अस्थाना –

ठीक से नहीं, इस कद्दावर लेखक का मूल्यांकन हुआ ही नहीं। आधा गांव तक सीमित रखा उन्हें। सीन पिचहत्तर, टोपी शुक्ला, ओस की बूंद,दिल एक सादा कागज– एक से एक शानदार उपन्यास हैं उनके खाते में। मुझे गर्व है कि यह महान लेखक मेरे कहानी संग्रह जो मारे जाएंगे का विमोचन करने बांद्रा से नरीमन प्वाइंट आया था।उनकी शर्त थी कि अगर मुझे कहानियां पसंद आयीं तो ही विमोचन करूंगा। और कहानियां पढ़कर न सिर्फ विमोचन किया बल्कि पचास मिनट किताब पर बोले।



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