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दक्षिण रेलवे के महाप्रबंधक, मुख्य जनसंपर्क अधिकारी और मुख्य राजभाषा अधिकारी को कितनी हिंदी आती है

Shambhu Nath Shukla : हिंदी जैसे दुजाहू नहीं, तिजाहू की बीवी है! यूपीए-2 की सरकार में जब ममता बनर्जी रेल मंत्री बनीं तो मुझे भी रेल मंत्रालय की हिंदी सलाहकार समिति में रखा गया। मैने पहली ही बैठक में रेल मंत्री के समक्ष यह मुद्दा उठाया कि मंत्रालय हिंदी भाषी क्षेत्रों में हिंदी की कार्यशालाएं बंद करवाए तथा हिंदी विभाग में कार्यरत कर्मचारियों और अफसरों की फौज भी घटाए और इसकी बजाय मंत्री महोदय उन राज्यों पर हिंदी को कामकाज में लाने के लिए अधिक सतर्कता बरतें, जो हिंदी भाषी नहीं हैं और जहां के लोगों में हिंदी बोलने या बरतने के प्रति कोई रुचि नहीं दिखती अथवा उन राज्यों में जो हिंदी भाषी राज्यों से घिरे हुए हैं पर वहां की मुख्य भाषा हिंदी नहीं है। यानी ‘ग’ और ‘ख’ श्रेणी के राज्य।।

Shambhu Nath Shukla : हिंदी जैसे दुजाहू नहीं, तिजाहू की बीवी है! यूपीए-2 की सरकार में जब ममता बनर्जी रेल मंत्री बनीं तो मुझे भी रेल मंत्रालय की हिंदी सलाहकार समिति में रखा गया। मैने पहली ही बैठक में रेल मंत्री के समक्ष यह मुद्दा उठाया कि मंत्रालय हिंदी भाषी क्षेत्रों में हिंदी की कार्यशालाएं बंद करवाए तथा हिंदी विभाग में कार्यरत कर्मचारियों और अफसरों की फौज भी घटाए और इसकी बजाय मंत्री महोदय उन राज्यों पर हिंदी को कामकाज में लाने के लिए अधिक सतर्कता बरतें, जो हिंदी भाषी नहीं हैं और जहां के लोगों में हिंदी बोलने या बरतने के प्रति कोई रुचि नहीं दिखती अथवा उन राज्यों में जो हिंदी भाषी राज्यों से घिरे हुए हैं पर वहां की मुख्य भाषा हिंदी नहीं है। यानी ‘ग’ और ‘ख’ श्रेणी के राज्य।।

मंत्री महोदय ने मेरी बात का संज्ञान लिया और मुझे चेन्नई स्थित दक्षिण रेलवे का जोन दिया गया ताकि वहां जाकर मैं हिंदी कार्यशालाएं देखूं और चेक करूं कि हिंदी में कामकाज कितना हो रहा है। पर वहां जाकर मैने पाया कि हिंदी के नाम पर सिर्फ खानापूरी ही है। दक्षिण रेलवे के महाप्रबंधक, मुख्य जनसंपर्क अधिकारी और मुख्य राजभाषा अधिकारी सिर्फ इतनी ही हिंदी जानते थे जितनी कि दस्तखत करते वक्त रिजर्ब बैंक का गवर्नर। मैने जब वहां दबाव बनाया तो पता चला कि स्टाफ ही नहीं है और जो स्टाफ है वह अपने समकक्ष कर्मचारियों की तुलना में कम वेतन पाता है और विरोध दर्ज करने पर कहा जाता है कि हिंदी सेवा करोगे तो क्या हमारी तरह ‘मेवा’ खाओगे! यानी हिंदी विभाग में काम करना है तो उसी मंत्रालय में अपने समकक्ष कर्मचारियों की तुलना में कम वेतन पाना और दूर दराज के स्टेशनों पर उपेक्षित पड़े रहना और कभी-कभार अन्य कर्मचारियों द्वारा पिट जाना भी।

मैंने जब रेलवे बोर्ड से यह शिकायत दर्ज कराई तो जल्द ही मुझसे वहां का प्रभार ले लिया गया और जैसे ही तीन साल का टर्म पूरा हुआ तो पीएमओ से मेरी अनुशंसा होने के बाद भी रेलवे बोर्ड ने मेरा नाम आगे नहीं बढऩे दिया और फिर रेल मंत्री पवन बंसल खुद निपट गए और मल्लिकार्जुन खडगे को नई सलाहकार समिति बनाने का मौका नहीं मिला। मुझे नहीं पता कि रेल मंत्रालय ने हिंदी में कामकाज में लाने के लिए आगे कुछ किया भी या नहीं। चेन्नई में हिंदी विभाग में तमिल फिल्मों के मशहूर लेखक शंकर की बहू भी काम करती थीं, उन्होंने मुझे बताया कि हमारे घर का माहौल एकदम तमिलमय है और वहां हिंदी का क ख ग बोलने वाला भी कोई नहीं है। मुझे विभाग में ही हिंदी में काम करने, बोलने और बरतने का मौका मिलता है पर वहां भी दक्षिण रेलवे का मुख्यालय मुझे हिंदी में काम करने के कारण हर तरह से हतोत्साहित करता है। ऐेसे माहौल को देखकर तो लगता ही है कि सरकार के लिए हिंदी दुजाहू नहीं किसी तिजाहू की बीवी है जिसका कोई धनीधोरी नहीं है।

अगर साउथ में हिंदी प्रचलित हुई तो श्रेय राजभाषा विभाग को नहीं बल्कि हिंदी फिल्मों और कपिल के कामेडी शो जैसे सीरियलों और हिंदी के न्यूज चैनलों को मिलना चाहिए। एक बार जब मैं चेन्नई से कांचीपुरम जा रहा था तो रास्ते में श्रीपेरंबुदूर रुककर प्रधानमंत्री स्वर्गीय राजीव गांधी की समाधि में भी गया। और वहां पर लंच लेने के लिए जिस रेस्त्रां में रुका वहां एनडीटीवी पर Ravish Kumar का प्राइम टाइम शो चल रहा था जो अगले रोज दोपहर दो बजे रिपीट होता है। यह है हिंदी की पहुंच।

वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ल के फेसबुक वॉल से.

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