ग्वालियर-चम्बल अंचल के देशबंधु के वरिष्ठ पत्रकार राजेंद्र श्रीवास्तव नहीं रहे

पलाश सुरजन-

ग्वालियर-चंबल अंचल में पिछले चार दशकों से देशबन्धु का प्रतिनिधित्व कर रहे श्री राजेन्द्र श्रीवास्तव कल रात अनंत यात्रा पर प्रस्थान कर गए। वे देशबन्धु परिवार के वरिष्ठतम सदस्यों में से एक थे।

1992 में जब मैंने भोपाल संस्करण का प्रभार संभाला, तब सारे प्रांतीय समाचार डाक से आते थे। अधिकांश समाचारों के संपादन में काफ़ी मेहनत लगती थी और समय खर्च होता था। लेकिन राजेन्द्र जी की हस्तलिपि और लेखन शैली ऐसी होती थी, कि उनकी ख़बरें आंख मूंदकर प्रकाशन के लिए जारी की जा सकती थीं।

अपने क्षेत्र के सभी राजनेताओं,अधिकारियों, पत्रकारों और लेखकों से उनके मधुर संबंध थे, जिन्हें वे आजीवन निभाते भी रहे।‌ उन संबंधों का प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष लाभ देशबन्धु को मिला। उनके पिता डॉ कृष्ण शरण श्रीवास्तव स्वयं एक प्रतिष्ठित पत्रकार थे और बाबूजी के समकालीन। इसीलिए वे देशबन्धु से जुड़े और आख़िरी वक़्त तक साथ रहे।

ग्वालियर की मेरी यात्राएं अब तक गिनी-चुनी ही रही हैं, लेकिन मैं जब भी वहां पहुंचा, वे अक्सर स्टेशन पर मुझे लेने आए और विदा के समय आधी रात तक भी मेरे साथ बने रहते। मेरे ठहरने और लोगों से मेल- मुलाक़ात का इंतज़ाम भी वही करते। राजेन्द्र जी भोपाल आते तो घर पर ज़रूर आते। ठंड के दिनों में ग्वालियर की सबसे उम्दा गजक साथ लाना नहीं भूलते।

कोई महीने भर पहले उन्होंने फ़ोन पर सूचित किया कि वे और उनकी जीवनसंगिनी संक्रमित हो गए हैं और उन्होंने घर पर ही अपने आपको आइसोलेट कर लिया है। उसके बाद दो-तीन बार उनसे संपर्क करने की कोशिश की लेकिन सफलता नहीं मिली। इस बीच रोज़ ही किसी न किसी परिचित या संबंधी के न रहने की ख़बर मिलती रही और अवसाद गहराता रहा। राजेन्द्र जी के रूप में एक पुराने और भरोसेमंद साथी के विछोह ने अवसाद को और गाढ़ा कर दिया है।

इस नुक़सान की भरपाई कभी नहीं हो सकेगी।


देव श्रीमाली-

स्मृति शेष : अलग शैली की पुराने पत्रकार थे राजेन्द्र श्रीवास्तव…. आखिरकार आज वह दुःखद खबर आ ही गई । वरिष्ठ पत्रकार राजेन्द्र श्रीवास्तव जी नही रहे। वे 71 वर्ष के युवा पत्रकार थे। बीते माह कोरोना संक्रमण का शिकार हुए थे तब से बीमार चल रहे थे ।

वे सहज सरल, किंतु ऊर्जा से भरे हुए पत्रकार थे। मेरा उनसे परिचय तब से है जब मैं ग्वालियर नही आया था बल्कि भिंड में रहकर ही काम करता था । लेकिन संभाग भर के पत्रकारों से उनकी मिलने मिलाने की आदत के चलते मैं भी उनके संपर्क का हिस्सा बन गया । ग्वालियर आया तो रिश्ते और प्रगाढ़ हुए । वे सबसे सतत संपर्क रखने वाले पत्रकार थे।

वे मप्र श्रमजीवी पत्रकार संघ के आधारस्तंभो में से एक थे । वे तब से जुड़े थे जब संघ पूरी तरह लोकतांत्रिक था और प्रदेश में सब उसी छतरी के नीचे थे । उसमे बाकायदा चुनाव होता था । नब्बे के दशक की बात है ।एक बार ग्वालियर में संभागीय इकाई का चुनाव हुआ । राम मंदिर स्थित वाचनालय में चुनाव प्रक्रिया हुई । मैँ कोषाध्यक्ष पद के लिए चुनाव लड़ा । उम्र में सभी प्रत्याशियों से छोटा । सामने थे दिग्गज राजेन्द्र श्रीवास्तव । मैँ विजयी हुआ ।

प्रक्रिया निपटते ही राजेन्द्र भाई साहब मेरे पास आये और मुझे और अचल जी को पास ही एक ठेले पर चाय पिलाने ले गए और फिर अपने दुपहिया वाहन से मुझे आचरण प्रेस तक छोड़कर भी गए।

वे अजातशत्रु थे । वे आजन्म देशबंधु अखबार से जुड़े रहे । इसका सर्कुलेशन अंचल में कितना भी हो राजेन्द्र जी उनके लिए पूरी शिद्दत से काम करते थे । हर प्रेस कॉन्फ्रेंस ,आयोजन में उनकी उपस्थिति रहती । वे हर खबर भेजते थे । उन्होंने शिक्षा दर्शन पत्रिका अपने पिता की अमानत के रूप में ताउम्र निकाली।

बीते माह अपने कोरोना संक्रमण होने की जानकारी उन्होंने खुद वाटशेप्प संदेश भेजकर दी थी । लेकिन न वे फोन उठा रहे थे न जबाव दे रहे रहे थे । मैंने तमाम प्रयासों के बाद जानकारी हासिल की कि वे ग्वालियर के सुपर हॉस्पीटल में भर्ती हैं । फिर मैंने किसी के जरिये उन तक संदेश भिजवाया कि सब चिंतित है तो उसी दिन उन्होंने सबको वाटशेप्प संदेश भेजकर बताया कि कैसे उनके बेटे और बहू ने आकर उन्हें भर्ती कराया गया । अब स्वास्थ्य स्थिर है ।

लेकिन आज बुरी खबर आ गई । सुबह डॉ राम विद्रोही भाई साहब का फोन आया । वे बोले- राजेन्द्र को क्या हो गया ? मैँ समझ गया । मैंने कहा वे बीमार थे । बोले- सोशल मीडिया पर कुछ बुरा- बुरा पड़ा है । पता करके बताओ। वाटशेप्प खोली तो डॉ केशव पांडे जी का मैसेज था और फेसबुक खोला था तो श्री राकेश अचल जी का भावपूर्ण आलेख । दोनो पढ़कर आंखे सजल हो गईं ।

राजेन्द्र भाई साहब अपने पीछे एक सुखी परिवार छोड़कर गए है। वे नवोदित पत्रकारों के लिए एक अनुकरणीय पाठशाला भी थे । उनसे सक्रियता,समर्पण और सहजता के जरिये सादगी की पूंजी जुटाकर कैसे पत्रकारिता की जा सकती हक़ी ये सीखा जा सकता है । अक्रमकता और चर्चित पत्रकारिता से इतर खामोश और साइलेन्स पत्रकारिता की उनकी शैली अनूठी थी और सबसे अनूठा था उनका संपर्क खज़ाना । लोगो से संपर्क रखने में उनका कोई सानी नही।

पत्रकार, अफसर, सामाजिक कार्यकर्ता हो या नेता सबसे वे सतत संपर्क रखते थे । खबरो पर सदैव उनकी पैनी निगाह रहती थी और निष्ठा के पक्के थे यही बजह रही कि वे अंतिम सांस तक देशबंधु से भी जुड़े रहे और श्रमजीवी पत्रकार संघ से भी । उनका जाना पत्रकारिता की एक बिरली शैली के आधारस्तम्भ का जाने जैसा है जिसकी क्षतिपूर्ति अब इस युग मे असम्भव है ।

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