हरेंद्र मोरल-
आज सुबह अखबार में ये खबर पढ़ी तो दिमाग सन्न रह गया। राजेश अवस्थी जी ने अवसाद से घिरकर आत्महत्या कर ली। उसी अखबार में आज उनकी खबर छपी जिसमें उन्होंने कई साल काम किया।
मैं जब पहली बार अमर उजाला छोड़कर डीएलए अखबार में नौकरी करने गया था तब अवस्थी जी वहां डेस्क संभालते थे। मैं नया था और वो काफी सीनियर तो उनसे काफी कुछ सीखने को मिला। भले आदमी थे, प्यार से बात करते, प्यार से समझाते। उनसे एक लगाव सा हो गया।
उसके बाद कई बार बीच-बीच में फोन आता तो बड़े टूटे दिल से कहते यार कहीं काम-धाम का जुगाड़ करवाओ, बड़ी दिक्कत चल रही है। लेकिन मीडिया की नौकरी ऐसी है कि एक बार आप मेन स्ट्रीम से उतरे और ज्यादा तिकड़मबाजी और दलाली नहीं जानते हो तो फिर परिवार पालने के भी लाले पड़ सकते हैं। उसमें भी अगर उम्र 45-50 पार है तो समझिए आपके लिए कोई बहुत ज्यादा विकल्प भी नहीं हैं। क्योंकि इस उम्र में कोई नया काम करना वैसे ही जोखिम भरा होता है दूसरा घर परिवार के खर्चे और जिम्मेदारियां तब तक पीक पर आ चुके होते हैं।
मैं शुरू से ही इस पेशे को लेकर सतर्क रहा और ये समझता रहा कि ईमानदार आदमी के लिए यहां बहुत ज्यादा स्कोप नहीं है उसमें भी अगर आपकी जिम्मेदारियां और खर्चें ज्यादा हों। इसलिए समय से ही अलविदा कहकर दूसरे काम धंधों में लग गया।
मैंने अपने दौर के ही पत्रकारिता के कई दिग्गजों को एक झटके में पैदल होते देखा है, तमाम योग्यताओं और मेहनतकश होने के बाद भी वो इस सिस्टम में फिट ना होने के चलते घर बैठने को मजबूर हो गए।
अमर उजाला छोड़ने के बाद कुछ दिन के लिए मैंने एक न्यूज स्टार्टअप में काम किया, वहां हिंदी पट्टी के हर शहर में पत्रकारों का एक बड़ा नेटवर्क तैयार करने की जिम्मेदारी मिली। इसलिए हमने पत्रकारिता से जुड़ी प्रमुख वेबसाइट भडास फॉर मीडिया में एक विज्ञापन नुमा खबर चलवा दी। इस पर आने वाले फोन कॉल को मुझे खुद ही मैनेज करना था।
यकीन मानिए उस दौर में ऐसे-ऐसे पत्रकारों के फोन नौकरी के लिए आए जिनके नाम मैं कभी पत्रकारिता में दिग्गज के तौर पर सुना करता था। ज्यादातर किसी न किसी कारणवश मेन स्ट्रीम मीडिया छोड़ने को मजबूर हुए तो फिर चाहकर भी वापसी नहीं कर सके।
आज भी कई पत्रकार साथियों के फोन कोई दूसरा काम शुरू करने की सलाह के लिए आते हैं, लेकिन वो चाहकर भी इसे छोड़ने का जोखिम मोल नहीं ले पाते। हकीकत ये भी है कि पत्रकारिता ऐसा रोग है जो एक बार लगा तो फिर जाता ही नहीं। और इसी रोग की भेंट चढ़ते हैं राजेश अवस्थी जी जैसे सज्जन लोग, जिन्होंने जीवनभर पत्रकारिता के सिवाय दूसरा कुछ किया नहीं और ये छूटी तो कुछ और करने लायक बचे नहीं।

राजेश जी ने अपनी मृत्यु के साथ ये सुसाइड नोट भी छोड़ा कि वो परिवार के लिए कुछ ज्यादा नहीं कर सके। सोचिए कितनी कसक रही होगी उस व्यक्ति के दिल में जो अपने जीते जी कुछ करके खुद को साबित करना चाहता था लेकिन परिस्थितियां कभी उसके अनुकूल हो ही नहीं पाई। मुझे ताउम्र अफसोस रहेगा कि मैं चाहकर भी अवस्थी जी के लिए कुछ कर नहीं पाया।
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