रजनीश-वाणी…

सुशोभित-

1960 के दशक के अंत और 1970 के दशक के आरम्भ में रजनीश अपने प्रवचनों का अंत एक बहुत ही सुंदर बात से करते थे। वे कहते थे- “आपने मेरी बातों को इतने प्रेम और शांति से सुना, इसके लिए अनुग्रहीत हूं। और अंत में आप सबके भीतर बैठे परमात्मा को प्रणाम करता हूं, मेरे प्रणाम स्वीकार करें!”

उस समय वे आचार्य रजनीश कहलाते थे। उघड़ी छाती लिए घूमते और श्वेत वस्त्र धारण करते। उनका शीश मुण्डित रहता, बाद के वर्षों की तरह सिर पर टोप तब नहीं पहनते थे और उनके केश घने-काले होते थे। काया किंचित स्थूल थी। 1966 तक वे जबलपुर विश्वविद्यालय में प्राध्यापक रहे, फिर देशाटन करके प्रवचन करने लगे। वे मनाली, जूनागढ़, माथेरान, आबू आदि स्थानों पर साधना-शिविर लेते थे और उपनिषदों पर व्याख्यान करते। महावीर वाणी और पंच महाव्रतों के व्याख्यान भी उसी कालक्रम के हैं। जब वे शिविर नहीं ले रहे होते, तब बम्बई में होते थे और अमूमन ष्णमुखानंद सभागृह में प्रवचन करते थे। उस समय की उनकी रिकॉर्डिंग्स में अकसर माइक बजता सुनाई देता है, श्रोताओं की हलचलें सुनी जा सकती हैं। वे सार्वजनिक सभाएँ होती थीं, बाद के वर्षों में जब रजनीश अपने संन्यासियों के इनर-सर्किल में ही बोलने लगे थे, उससे वे भिन्न थीं।

“मेरे प्रणाम स्वीकार करें”- यह वाक्य रजनीश की चिंतन-प्रक्रिया में गुंथा हुआ था। वे प्रणाम की मुद्रा में ही श्रोताओं के सम्मुख आते थे। वे अपने हस्ताक्षर भी “रजनीश के प्रणाम” की तरह लिखते थे। बाद के वर्षों में उनके हस्ताक्षर किसी चित्रकृति की तरह शैलीकृत होते चले गए। वे पत्र लिखते तो उसके भी अंत में “रजनीश के प्रणाम” ही लिखते थे। प्रवचनों और पत्रों का आरम्भ “मेरे प्रिय आत्मन्” से करते। प्रवचनों के बीच में इस तरह की बातें कहते- “अब हम सूत्रों में प्रवेश करें” या “इसमें कुछ बातें जान लेनी ज़रूरी हैं।” यह सब बातें वे जिस मृदुल वाणी से कहते थे, वह मोहक हुआ करती थी। उनका स्वर अनुनासिक था। कुछ शब्दों का उच्चारण त्रुटिपूर्ण जैसे “श” को “स” कहना। किसी वाक्य में अंत में “र” वर्ण आने पर उसके साथ नि:श्वास नि:सृत करते थे, जो माइक्रोफोन पर एक तीखी सीटी की तरह गूँजता। उनके हाथों की सम्मोहक मुद्राएं श्रोताओं को मुग्ध करती थीं, किन्तु शरीर निश्चल ही रहता, एक पैर दूसरे पर स्थिरता से रखा रहता।

1974 में जब वे पुणे में स्थित हुए और लाओत्से सभागृह में प्रवचन करने लगे तो वे अपने व्याख्यान का अंत केवल तीन शब्दों के साथ करने लगे- “आज इतना ही।” अंग्रेज़ी में डिस्कोर्स हो तो “इनफ़ फ़ॉर टुडे।” किसी रहस्यदर्शी की वाणी पर प्रवचनों की माला चलाते, अमूमन दस प्रवचनों की। सूत्रों पर दो प्रवचनों के बीच प्रश्नोत्तर का एक सत्र रखते। एक प्रवचनमाला हिंदी में करते और एक अंग्रेज़ी में। बुद्ध की वाणी पर उन्होंने अंग्रेज़ी और हिंदी दोनों में प्रवचन किए। दोनों ही 12 खण्डों में संकलित हुईं। हिंदी प्रवचनमाला “एस धम्मो सनन्तनो” कहलाई, अंग्रेज़ी प्रवचनमाला “धम्मपद”। पतंजलि योगसूत्रों पर उन्होंने “अल्फ़ा एंड ओमेगा” शीर्षक से मूल अंग्रेज़ी में प्रवचन किए, गीता पर हिंदी में। “ताओ उपनिषद” छह खण्डों में हिंदी में हैं, किंतु लाओत्से और च्वांगत्सू पर अंग्रेज़ी में पृथक से उनकी प्रवचनमालाएँ हैं, जैसे “एम्प्टी बोट” और “व्हेन द शू फिट्स”। ज़ेन पर तो अंग्रेज़ी में कोई डेढ़ से दो दर्जन प्रवचनमालाएँ होंगी। हिंदी में “बिन बाती बिन तेल”, “सहज समाधि भली” आदि में ज़ेन गाथाओं पर उनके वचन हैं। कबीर वाणी पर हिंदी में चार जिल्दें हैं- “सुनो भई साधो”, “कहै कबीर मैं पूरा पाया”, “कहै कबीर दीवाना”, “ना कानों सुना ना आँखों देखा”। अंग्रेज़ी में कबीर पर “फ़िश इन सी इज़ नॉट थर्स्टी” है। महावीर के समण सुत्त (चार खण्डों में “जिन सूत्र”) और अष्टावक्र की महागीता पर हिंदी में प्रवचन हैं, जीज़ज़ और ज़रथुस्त्र पर अंग्रेज़ी में।

रजनीश के प्रवचनों का आरम्भ बड़ा श्रवणीय होता था। एक गम्भीर मौन से उठती हुई आवाज़, जिसमें परास्पर्श की झलक। अकसर कोई महिला-स्वर उनके बोलने से पूर्व सूत्रों का संगायन करता था। रजनीश एक चुप्पी तोड़ते हुए अपनी बात शुरू करते थे। प्रश्नोत्तर का सत्र हो तो “पहला प्रश्न” कहकर व्याख्यान शुरू करते। एक घंटे के प्रवचन में धीरे-धीरे उनकी वाणी मँज जाती थी, किन्तु आरम्भ में मौन तोड़ने वाली वह अनुगूँज सबसे विलक्षण होती। “जिन सूत्रों” की प्रस्तावना रखते हुए पहले प्रवचन में उन्होंने कहा था- “परमात्मा अकेला था, अकेलापन उसे खला तो उसने सोचा अनेक हो जाऊँ।” यह वाक्य इतनी सुंदरता से कहा गया है कि सुनते ही बनता है। “एस धम्मो सनन्तनो” पर प्रवचनों के पहले शब्द- “गौतम बुद्ध ऐसे हैं, जैसे हिमाच्छादित हिमालय। पर्वत तो बहुत हैं, हिमाच्छादित पर्वत भी कई, किन्तु हिमालय एक ही है” भी इसी श्रेणी में हैं। ज़ेन पर एक अंग्रेज़ी प्रवचन-शृंखला के दौरान किसी ने परलोक के बारे में पूछा तो रजनीश ने जिस अंदाज़ से “देयर इज़ नो हेवन एनीव्हेयर, इट इज़ हियर, इट ईज़ ऑलवेज़ हियर” कहा है, वह सुनने जैसा है। “एनीव्हेयर” और “हियर” जैसे शब्दों के अंत में “र” वर्ण का वही नि:सृत नि:श्वास, जो सम्मोहित करता है।

मेरा बचपन इसी जादुई वाणी के साथ बीता था। मेरे पिता रजनीश से प्रभावित थे। उन्होंने रीतिपूर्वक पुणे जाकर संन्यास तो नहीं लिया था, पर अपना नाम स्वामी कमल भारती लिखने लगे थे। उज्जैन में, हरसिद्धि पाल के समीप एक रामबाड़ा है, जहाँ प्रति रविवार एक ध्यान केंद्र पर रजनीश के प्रवचनों की टेप उस ज़माने में बजाई जाती। वे मुझे वहाँ ले जाते। कोई आठ-नौ वर्ष की अवस्था मेरी रही होगी, आँखें मूँदकर एक घंटे तक रजनीश के प्रवचन सुनता। उन प्रवचनों ने मेरे जीवन की दिशा तय करने में केंद्रीय भूमिका निभाई है और अनेक रूढ़ियों से छोटी उम्र से ही मुक्त कर दिया। रजनीश-प्रभाव के बिना मैं किशोरवय से ही अनीश्वरवादी नहीं हो सकता था और जाति-धर्म को नकार नहीं सकता था। वहीं मनुष्य-सम्बंधों के प्रति खुली दृष्टि भी विकसित नहीं कर सकता था।

कालान्तर में रजनीश के प्रवचनों को सुनने के लिए मैंने नाना जतन किए। मनसुखभाई वढेरा के यहाँ जूते बनाने का काम भी रजनीश के प्रवचन सुनने के लोभ से ही किया, तब मैं स्वयं को संत रैदास का अनुयायी समझा करता था। अनेक ध्यान-शिविरों में सम्मिलित हुआ। जब सामर्थ्य थी तो रजनीश की टैप-कैसेट भी ख़रीदीं। आज हज़ारों घंटों के रजनीश-प्रवचन इंटरनेट पर उपलब्ध हैं, किंतु तब यानी आज से बीस-पच्चीस साल पहले उनका एक-एक प्रवचन अनमोल लगता था। उनके उच्चारणों से एक निजी क़िस्म का नाता तब से ही बन गया था। लाओत्से शब्द को वे एक ख़ास तरह से लोच के साथ खींचते हुए कहते थे। मुल्ला नसरुद्दीन शब्द को एक मीठी और चुस्त विनोदप्रियता से।

रजनीश की छह सौ से अधिक पुस्तकों में लगभग सभी बोली गई हैं, सिवाय पत्रों के आधा दर्जन संकलनों के। किन्तु अगर उन्होंने उन्हें लिखा होता तब भी वह इतना ही सुंदर साहित्य कहलातीं, विशेषकर “क्रान्तिबीज” नामक पत्र-संकलन को पढ़ने पर तो यही लगता है। अकसर सोचता हूँ कि “क्रान्तिबीज” के पत्रों को रजनीश को अपनी आवाज़ में पृथक से पढ़ जाना था। उनकी कही हुई बातों को छपे में और छपी हुई बातों को कहे में परखने की आदत इतने वर्षों से जो बनी है। इधर अनेक वर्षों बाद रजनीश का वह सम्मोहन मुझमें फिर जाग रहा है, इसलिए नहीं कि वे श्रेष्ठ दार्शनिक हैं या उनके पास हमारे सभी प्रश्नों के समाधान हैं। बल्कि इसलिए कि इस छवि और उसकी वाणी से किशोरवय में ही जो मन जुड़ गया, उस प्रीति की संगति अब छूटती नहीं है।

और यों तो अनुसरण करना अच्छी बात नहीं, तब भी इस लेख का अंत रजनीश की ही शैली में यह कहकर करने का मन हो रहा है कि : “आपने मेरी बातों को इतने प्रेम और शांति से पढ़ा, इसके लिए अनुग्रहीत हूं। और अंत में आप सबके भीतर बैठे परमात्मा को प्रणाम करता हूं, मेरे प्रणाम स्वीकार करें!”



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One comment on “रजनीश-वाणी…”

  • Pulkit Shukla says:

    और अधिकतर शुरुआत “मैं अत्यंत आनंदित हूं की अपने अनुभव से चंद बाते आपसे कह सकूंगा” इस वाक्य से करते थे

    Reply

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