रतन भूषण-
जागरण, तेरी हार तय है… कल दिल्ली के पूसा कोर्ट में मेरी दो लोगों की तारीख थी। दैनिक जागरण के जेपीएल समूह से मेरे वहां रहने तक कोई नहीं आया था। फिर कार्यवाही हुई और अगली तारीख मिल गई।
सवाल यह है कि जागरण से कोई क्यों नहीं आया? कारण तो बहुत से हो सकते हैं। झूठ भी और सच भी और कोर्ट में तो गलती करने वाला झूठ का सहारा ज्यादा लेता है। यह कोर्ट और माननीय सब जानते हैं। वजह साफ है कि मालिक की केस को लंबा खींचने की मंशा होती है। इसमें वकील या मैनेजर की भूमिका अहम होती है।
दरअसल मालिक या ख्यात समूह की हो रही बदनामी से उसका कोई मतलब नहीं होता। उसे मतलब होता है अपनी कमाई से, जो वह कोर्ट के नाम पर करते हैं। तमाम झूठे बिल बनाने का अच्छा जरिया है कोर्ट केस। फिर वह क्यों चाहेगा कि मालिक और वर्कर के बीच का विवाद खत्म हो! वकील और केस में शामिल मैनेजर आदि का तो यही रोजगार है। भला वह मालिक को सच बता कर अपनी कमाई क्यों बंद करना चाहेगा!
अभी कुछ ही दिन पहले माननीय सुप्रीम कोर्ट ने न्यूनतम मजदूरी को लेकर केस की सुनवाई की है। दैनिक जागरण या देश के तमाम अखबार समूह और वर्कर के बीच न्यूनतम मजदूरी या वेतन मालिकों द्वारा न देने को लेकर ही तो माननीय सुप्रीम कोर्ट में मजीठिया वेज बोर्ड का केस लंबे समय से लंबित है। यह भी अजीब बात है कि सरकार ही वर्कर की मजदूरी तय करती है, वेज बोर्ड लाती है, लेकिन वह लागू नहीं करवा सकती! अखबार समूह के मालिक चूंकि सरकार की पिछलग्गू बनी हैं, तो यह निर्णय आने में विलम्ब हो रहा है।
इन दिनों यह बात भी हो रही है कि अगर यह वेज बोर्ड का मामला अखबार समूह का न होकर किसी और कंपनी का होता तो कब का लागू हो गया होता! मजीठिया वेज बोर्ड के केस में धरती के भगवान की भूमिका भी संदिग्ध होती दिख रही है।
बात चाहे जो हो, लेकिन एक सच यह भी है कि अगर वर्कर का पक्ष मज़बूत नहीं होता, तो तमाम केस की तरह मजीठिया मामले को कब का खत्म करवा दिया गया होता! चूंकि इस केस में सरकार और माननीय दोनों की साख दांव पर लगी हुई है। इसलिए मामला थम थम कर आगे बढ़ रहा है और ऐसा होने से मालिक को फिलहाल राहत मिल रही है। ज़ाहिर है यदि माननीय सुप्रीम कोर्ट से फैसला आ गया तो वही पूरे देश में प्रभावी होगा।
मजीठिया वेज बोर्ड को लेकर देश के तमाम कोर्ट में लंबित हजारों वाद एक झटके में खत्म हो जाएंगे। उन केसों को रास्ता मिल जाएगा। वर्कर को उम्मीद मिल जाएगी। हजारों परिवार खुश हो जाएंगे। वर्करों का खुश तो होना तो तय है, लेकिन कब, यह माननीय की सोच पर निर्भर है। वैसे तो उन्हें किसी भी गलत बात पर स्वतःसंज्ञान लेने का अधिकार प्राप्त है, लेकिन वर्कर का यह केस तो माननीय के पास लंबित है। फिर इस काम में देरी क्यों, जबकि तमाम ऐसे मुद्दे एक दिन में लिस्ट होकर सुन भी लिये जा रहे हैं! क्या वे माननीय किसी दूसरी दुनिया के हैं?
वैसे देर जो भी हो, जीत वर्कर की ही होगी। सरकार द्वारा लागू वेज बोर्ड किसी भी अखबार समूह ने सही सही लागू नहीं किया है, यही सच है। तमाम आदेश इस बाबत निचली अदालतों से आ चुके हैं। इसलिए माननीय के यहां भी अखबार समूह के अगुआ दैनिक जागरण को हार नसीब होना तय है। जय संविधान, जय हिंदुस्तान…
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