लाल क़िले पर किसानों का क़ब्ज़ा : जब टैंक मुक़ाबिल हों तो ट्रैक्टर दौड़ाओ!

कृष्ण कल्पित-

यह मिथ्या प्रचार है कि दिल्ली में किसानों ने हिंसा अथवा अराजकता की । सिर्फ़ बेरिकेट्स/अवरोधक हटाने के अतिरिक्त उन्होंने कुछ नहीं किया । दिल्ली के नागरिक किसानों पर फूल और दिल्ली/हरियाणा/उप्र-पुलिस उन पर आँसू-गैस और लाठी बरसा रहे थे।

लालक़िले पर किसानों का कब्ज़ा प्रतीकात्मक है । और वहाँ फहराया गया निशान साहेब का केसरिया झण्डा वही केसरिया बाना है जिससे भगत सिंह और तिरंगे का केसरिया निकला है । लालक़िले पर तिरंगा शान से फहरा रहा है यहाँ तक कि उनके हाथों में भी तिरंगे झण्डे थे । यह विवाद व्यर्थ है।

और लालक़िले का जहाँ तक सवाल है वह अभी डालमिया सेठ के पास लीज़ पर है । उनकी भी मौज़ हो गयी । बीमा कंपनियों के साथ डालमियों का रिश्ता बहुत पुराना है।

जो बोले सो निहाल!


सौमित्र रॉय-

दिल्ली के बॉर्डर को चारों तरफ से घेरे किसानों का 60 दिन से ज़्यादा वक़्त तक का आंदोलन।

140 से ज़्यादा किसानों की मौत। सरकार से 10 बार की बातचीत।

गैर राजनीतिक मंच, एक भाषा- काले कानून वापस हों। कड़ाके की ठंड में सड़क पर बारिश झेलते अडिग, अटल, जीत के विश्वास से लबरेज़ चेहरे।

देश को गणतंत्र हुए 72वां साल है। आज से पहले गण ने तंत्र को कभी इस तरह संगठित होकर चुनौती नहीं दी थी।

हां, यही आंदोलनों की खूबसूरती है। बीते 72 सालों में तीसरी पीढ़ी है, जिसकी अगुवाई पहली और दूसरी पीढ़ी कर रही है।

आज गणतंत्र दिवस पर गण को तंत्र के सामने ताक़त दिखाने का मौका था।

थोड़ा इतिहास के कोने में झांकते हैं। 12 मार्च 1930. गांधीजी ब्रिटिश हुकूमत का नमक कानून तोड़ने निकलते हैं और 24 दिन बाद तोड़ने में कामयाब भी होते हैं।

हां, वह सत्याग्रह था। ये सत्याग्रह क्या होता है? आज़ादी के बाद की तीसरी पीढ़ी से पूछें। कितने बता पाएंगे? कितनों में शांतिपूर्ण सिविल नाफरमानी की ताकत है?

ये ठीक है कि आज का भारत ब्रिटिश हुकूमत से भी कहीं ज़्यादा क्रूर है। बोरिस जॉनसन आज परेड के मुख्य अतिथि होते तो मोदी सरकार की क्रूरता से काफी सीखकर जाते।

बहरहाल, किसान मार्च का समय 9.30 से 10 बजे का था। ट्रैक्टर मार्च के रूट भी तय थे।

लेकिन 9 बजे तक सारे बैरियर टूट चुके थे। 60 दिन से खामोश बैठी ज़ुबानों की रतजगे के बाद बेताबी समझी जा सकती है।

मोर्चे के किसान नेता रूट पर चलने की अपील करते ही रह गए और हालात बेकाबू हो गए।

हालात तो कल रात को ही बिगड़ गए थे, जब तैयारियों को अंतिम रूप देते समय रुट पर विवाद हो गया और एक हिस्सा अपने रूट पर चलने की ज़िद करने लगा।

यह आंदोलन नहीं। यह आंदोलन का अनुशासन भी नहीं। किसान मोर्चे को इसकी जिम्मेदारी लेनी ही होगी।

अगर यह आंदोलन होता तो पुलिस की तैयारियों और उनसे निपटने की तरकीबों पर ज़रूर चर्चा हुई होती और हुई भी होगी।

यह भी कि पुलिस किसानों को रोकने, उनके धैर्य की परीक्षा लेने की कोशिश करेगी। क्या उपाय सोचे गए?

यही कि पुलिस पर ट्रैक्टर चढ़ा देंगे? निहंग तलवारें चमकाएंगे?

26 जनवरी पर टैंक का मुकाबला ट्रैक्टरों से था। एक उजाड़ता है, दूसरा सृजन करता है। कौन जीता? कौन हारा?

लाल किला किसान मार्च के रूट में तो नहीं था। फिर भी ट्रैक्टर वहां तक गए और ऐसे गए कि प्राचीर पर निशान साहिब का झंडा फहरा गया।

शायद कुछ लोगों के लिए यह एवरेस्ट फतह करने या चांद पर पहुंचने जैसी निशानी होगी, पर इसके लिए भी मंजूरी चाहिए। किसने दी?

अब अगर संयुक्त किसान मोर्चे के प्रवक्ता यह कह रहे हैं कि मार्च में उपद्रवी घुस आए थे तो उन्हें साफ करना पड़ेगा कि क्या वक़्त से पहले दिल्ली में घुसने की बेताबी इन्हीं उपद्रवियों की थी?

क्या किसान आंदोलन का एक हिस्सा बेलगाम उपद्रवियों का भी है? अगर है तो यह आंदोलन की नाकाम तैयारियों का नमूना है।

तो आज जो हुआ और कल से फिर जो होगा, उसे आंदोलन क्यों कहा जाए? जब एकजुटता ही नहीं तो आंदोलन काहे का?

वास्तविक अर्थों में यह विद्रोह है। 1857 की तरह। यह क्रांति भी नहीं, क्योंकि वैचारिक मतभेद हैं।

मुझे मालूम है कि बहुत से मित्र इस सच को पचा नहीं पाएंगे। कोई बात नहीं।

दिल्ली पुलिस ने आज बहुत संयम बरता। आंसू गैस और लाठियां चलीं, क्योंकि दोनों तरफ सुनियोजित तैयारी नहीं थी।

आज जिसने भी राजपथ पर रस्मी परेड देखी है, उन्होंने जवानों को एक सीध में कदमताल करते, टैंकों को एक लाइन से गुजरते देखा होगा।

यह अनुशासन महीनों की तैयारी से आता है। मेरे जैसे बहुतों ने टैंकों की तरह ट्रैक्टरों से भी उसी अनुशासन की उम्मीद की थी।

शांतिपूर्ण नाफरमानी में धरना एक कारगर हथियार है। अगर एक बार उसका इस्तेमाल हो जाता तो किसान दिल्ली में ही रहते, बॉर्डर पर नहीं।

ताक़त अगर अनुशासित और एकजुट हो तो पहाड़ भी हिल जाते हैं, सरकार क्या चीज़ है।

हमें अभी बहुत कुछ सीखना बाकी है।

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