सपा का भस्मासुर (तीन) : क्या कहती है जांच समिति की रिपोर्ट!

पूर्व में फर्म की कार्यवाही की जानकारी होते हुए पुनः विलम्ब के लिए जुर्माना निर्धारित न किया जाना दुरभिसंधि को इंगित करता है। यह जुर्माना 9 फरवरी 2012 को, अनुबंध समाप्त होने के पश्‍चात आरोपित किया गया। यहॉं पर यह भी इंगित किया जाता है कि मैसर्स टी0पी0एल0 को पाईपों की जॉंच हेतु रखा गया था। परन्तु यह विचारणीय है कि 52 दिनों ( 20-9-11 से 12-11-11 तक ) के भीतर लगभग 8-9 किमी0 पाईप ( लगभग 160 मी0 प्रतिदिन) की इतनी बड़ी टेस्टिंग न तो फर्म स्तर पर ही संभव थी एवं न ही मैसर्स टीपीएल स्तर पर। 

अतः यह भी आभास होता है कि फर्म द्वारा समयवृद्धि मात्र इसी कारण ली गयी कि वे अपने खराब पाईप की आपूर्ति कर सकें एवं पाईपों का समस्त भुगतान प्राप्त कर सकें ताकि फर्म को नुकसान कम से कम हो। क्योंकि उन्हें पाईप सप्लाई के एवज में लगभग 17 करोड़ रूपये का भुगतान किया जा चुका था। पाईप आपूर्ति लगभग 21 करोड़ रूपये एवं अन्य कार्य मात्र लगभग 6.50 करोड़ के थे। अतः अधिकतम पाईप आपूर्ति कर पूर्ण भुगतान लेने में ही फर्म को ज्यादा फायदा था जो उसने कथित भ्रष्ट अधिकारियों के सहयोग से कर लिया। पाईप मात्र 6 किमी0 की ही बिछायी जा सकी थी जबकि भुगतान पूरा किया जा चुका था। 

स्पष्ट है कि भुगतान की स्वीकृति फर्म को लाभ पहुंचाने के उद्देष्य से ही दी गयी थी। यह भी विचारणीय है कि इतनी त्वरित गति से आपूर्तित पाईप की गुणवत्ता पर भी संषय होना स्वाभाविक है, क्योंकि फर्म की कभी भी हाइड्रॉलिक टेस्टिंग नहीं की गयी है। इन परिस्थितियों में सिर्फ 80 प्रतिशत भुगतान किया जाना चाहिए था लेकिन अधिकारियों ने 90 प्रतिषत तक भुगतान का आदेश जारी कर दिया था। जांच के दौरान अधिकारियों से वार्ता से यह भी आभास हुआ कि फर्म की मंषा अपने इन्हंी सम्पर्कों का लाभ लेकर सुरक्षा धनराशि की वापसी और भुगतान कराने की थी जिसके कारण उसने पुनः समय वृद्धि की मांग नहीं की। अपितु वर्ष 2013 प्रारंभ में उसके द्वारा अपने अनुबंध को पुनर्जीवित कराने का प्रयास किया गया जो अधिकारियों के स्थानान्तरण के कारण संभव नहीं हो सका। गौरतलब है कि इस बीच अध्यक्ष का स्थानान्तरण दिनांक 15 मार्च 2012 को एवं प्रबंध निदेषक का स्थानान्तरण वर्ष 2012 को ही हो गया था।

आंखों देखी : जल-निगम में अरबों की लूट 

जिस कानपुर शहर के ‘इनर ओल्ड एरिया’ में पेयजल उपलब्ध कराने की गरज से बसपा शासनकाल में लगभग साढे़ तीन अरब रूपए सरकारी खजाने से व्यय कर दिए गए वह इलाके आज भी शुद्ध पेयजल के लिए तरह रहे हैं। बिछाए गए पीवीसी पाइप लाइन की गुणवत्ता इतनी खराब है कि थोडे़ से दबाव भर से टूट जाते हैं। मानक के अनुसार पाइप लाइन बिछाते समय पाइप के नीचे और ऊपर बालू की मोटी परत बिछायी जाती है ताकि भारी वाहन गुजरते वक्त लाइन न टूटे, लेकिन लूट-खसोट वाली इस योजना में इन मानकों का कहीं पर भी पालन नहीं किया गया है। पूरी पाईप लाइन ही मिट्टी से दबा दी गयी है।

इधर जांच रिपोर्ट कहती है कि ठेकेदारों को सम्पूर्ण भुगतान किया जा चुका है जबकि कानपुर जल-निगम के जिम्मेदार अधिकारी घोटाले पर पर्दा डालने की नीयत से ठेकेदारों के भुगतान को रोके जाने की बात कहते हैं। गुणवत्ता के विपरीत पाइप लाइन बिछाने वाली दोशियान कम्पनी को जल-निगम, कानपुर के अधिकारी फरार बता रहे हैं जबकि दोशियान पहले ही अपना पूरा भुगतान प्राप्त कर चुका है। कानपुर शहर के इनर ओल्ड एरिया की हालत यह है कि शुद्ध जल पेयजल की आपूर्ति तो दूर की बात बिछायी गयी लाइनों में पानी की सप्लाई भी अभी तक शुरू नहीं की जा सकी है। सरकार के पास जो रिकॉर्ड है उसके मुताबिक कार्य शत-प्रतिशत पूरा हो चुका है जबकि कानपुर जल-निगम के अधिकारी बताते हैं कि अभी 25 प्रतिशत काम अधूरा है। इसे पूरा करने के लिए मार्च 2015 तक का समय मौखिक रूप से दिया गया है। 

लिखित आदेश मिलते ही काम शुरू हो जायेगा। अधिकारियों का कहना है कि शेष 25 प्रतिशत कार्य पूरा करने के लिए लगभग 45 करोड़ रूपया और व्यय हो सकता है। दूसरी ओर लोगों में गुस्सा इस कदर है कि इलाकाई लोग सम्बन्धित विभाग के अधिकारियों को इलाके में देखते ही उनसे अभद्रता पर उतारू हो जाते हैं। अधिकारियों के प्रति उनका अभद्र व्यवहार उनके ठगे जाने की प्रतिक्रिया स्वरूप है। लिहाजा अधिकारी इलाकों में जाने का साहस तक नहीं जुटा पा रहे हैं। इलाकाई लोगों ने अपने पास पाइप के उन टुकड़ों को भी प्रमाण के तौर पर सहेज कर रखा है ताकि किसी विश्वसनीय जिम्मेदार अधिकारी अथवा मंत्री के आगमन पर दिखाया जा सके।

कानपुर शहर के ‘इनर ओल्ड एरिया’ में शुद्ध पेयजल पहंुचाने के लिए फूलबाग में एक पम्प हाउस का निर्माण भी करवाया गया है। करोड़ों की लागत से पम्प हाउस में मशीनें व अन्य उपकरण भी लगे हुए हैं लेकिन सभी खामोश अवस्था में हैं। यहां तक कि पानी स्टोर करने के लिए जमीन में दो-दो स्टोरेज टैंक भी बने हुए हैं। एक पानी विशालकाय पानी की टंकी भी खड़ी है। अचम्भे की बात है कि रोजाना इस टंकी में लाखों लीटर पानी भरकर चेक करने का कार्य पिछले कई महीनों से चल रहा है। रखरखाव के अभाव में हालत यह हो गयी है कि पानी की टंकी सप्लाई से पहले ही चूने लगी है। पम्प हाउस परिसर में देखरेख करने के लिए कर्मचारियों के केबिन भी कई वर्षों से बने हुए हैं लेकिन देखरेख के नाम पर यहां सिर्फ ठेकेदार की तरफ से राधेश्याम पाण्डेय नाम का चौकीदार ही नजर आता है। 

यह चौकीदार पिछले तकरीबनर चार वर्षों से यहीं पर तैनात है। इसी अकेले चौकीदार के जिम्मे करोड़ों की लागत वाली मशीने वर्षों से धूल खा रही हैं। बकौल चौकीदार राधेश्याम पाण्डेय, ‘यह पम्प हाउस पिछले चार वर्षों से बना पड़ा है। मशीने लग चुकी हैं, यहां जो भी अधिकारी आता है वह पिछले कई वर्षों से यही कहता आ रहा है कि बस ऊपर से आदेश आने बाकी हैं। आदेश आते हुए पम्प चालू कर दिया जायेगा। पिछले कई महीनों से तो काम भी बन्द है। पम्प चालू भी नहीं हो सकता क्योंकि गंगा नदी से लेकर इस पम्प हाउस तक पाईप लाईन का काम अभी-भी अधूरा है। जब तक लाइन पूरी नहीं पड़ जाती तब-तक पानी की सप्लाई कैसे चालू की जा सकती है’। काम कब पूरा होगा ? कब यह पम्प हाउस काम करने लगेगा ? यह पूछे जाने पर चौकीदार ने सपाट सा उत्तर दिया, ‘मैं तो ठेकेदार की तरफ से तैनात किया गया व्यक्ति हूं, नहीं बता सकता, काम कब शुरू होगा !

फूलबाग के पम्प हाउस को लेकर इस संशय से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि काम पूरा होने के बाद वर्षों से धूल खा रहीं कीमती मशीनें काम करेंगी भी अथवा नहीं ? क्योंकि पिछले कई वर्षों से इन्हें देखा तक नहीं गया। यहां तक कि कोई अभियंता भी इन मशीनों को चेक करने नहीं आया।

क्षेत्रीय सभासदों की मानें तो पम्प हाउस को चालू करने से पहले दोबारा उन्हीं इलाकों की खुदाई करके जांच करनी पड़ेगी, जहां पाइप लाइनें डाली जा चुकी हैं। इलाकाई लोगों का मानना है कि पाइप लाइनों को बिना आपस में जोड़े ही लाइनें बिछाकर ढक दी गयी हैं। बीच-बीच में तो लाइन ही नहीं है। इन परिस्थितियों में यदि पम्प हाउस से पानी छोड़ा गया तो पानी घरों में तो नहीं अलबत्ता घनी बस्ती वाले वे इलाके जलमग्न हो जायेंगे जहां लाइनों को आपस में जोडे़ बिना ही लाइनें बिछा दी गयी हैं। यहां कि निवासियों ने यह भी बताया कि ठेकेदार के लोगों ने लाइन डालते समय प्रत्येक घरों से कनेक्शन के नाम पर 100 से लेकर 200 रूपए तक वसूले हैं।

ये चौंकाने वाली तस्वीर उस वक्त सामने आयी जब हमारे कानपुर संवाददाता ने शहर के इनर ओल्ड इलाकों का दौरा कर वस्तुस्थिति की जानकारी हासिल की। प्रस्तुत है आंखों देखी एक रिपोर्ट:-

क्या कहते हैं अधिकारी

एस.के.गुप्ता (परियोजना प्रबंधक, जल-निगम, कानपुर)

जे.एन.एन.यू.आर.एम के तहत कानपुर के इनर ओल्ड एरिया में पेयजल योजना का कार्य लगभग 75 प्रतिशत पूरा हो चुका है। पूर्व में काम करने वाली दोशियान कम्पनी का 50 प्रतिशत भुगतान रोका गया है। साथ ही उसकी सुरक्षा धनराशि भी जब्त कर ली गयी है। शेष 25 प्रतिशत कार्य के लिए दूसरी नयी कम्पनियों को ठेके आवंटित किए गए हैं। निगम के उच्चाधिकारियों ने योजना की लागत को 340 करोड़ से बढ़ाकर 393.93 करोड़ स्वीकार कर लिया है। साथ ही समय सीमा भी 31 मार्च 2015 तक बढ़ा दी है। श्री गुप्ता के अनुसार यह सारी प्रक्रिया अभी तक मौखिक रूप चल रही है। अभी तक लिखित रूप में कोई आदेश नहीं मिले हैं। जाहिर है 340 करोड़ की योजना में लूटमार करने वालों के खिलाफ जांच के बाद यह मामला अत्यधिक संवेदनशील हो चुका है। कोई भी अधिकारी आग में हाथ डालने को तैयार नहीं। दूसरी ओर कानपुर शहर के इनर ओल्ड एरिया निवासियों के बीच शुद्ध पेयजल संकट बरकरार है। अब जबकि कानपुर जल-निगम के अधिकारी यह कह रहे हैं के पाइप लाइन डालने के लिए समय सीमा बढ़ा दी गयी है तो निश्चित रूप से इस इलाके के निवासियों को अगले वर्ष भी शुद्ध पेयजल मिलना मुश्किल हो जायेगा।

भारत सिंह (अधीक्षण अभियंता, जल-निगम, कानपुर)

आपकी बात सही है कि पानी की सप्लाई का काम पूरा नहीं हो पाया है और न ही हम आम लोगों के घरों तक पानी पहुंचा पाए हैं। परन्तु मुझे पूरा विश्वास है कि 31 मार्च 2015 तक कार्य पूरा कर लिया जायेगा। इस से पूर्व इस योजना में क्या हुआ ? मुझे इसकी जानकारी नहीं है।

गौहर हमीद (पूर्व वार्ड अध्यक्ष, वार्ड संख्या. 107, करनैल गंज, कानपुर)

पूर्व वार्ड अध्यक्ष गौहर हमीद से जब इस संवाददाता ने योजना में भ्रष्टाचार के बाबत जानकारी हासिल की तो वे लगभग आवेश में आते हुए बोले, ‘पेयजल योजना को जल-निगम के अधिकारियों द्वारा मजाक बनाकर रख दिया गया है। पानी की सप्लाई के लिए जिन प्लाष्टिक के पाईप (पाईप का टुकड़ा दिखाते हुए) को बिछाया जा रहा है, वे बेहद घटिया किस्म के हैं। यहां तक कि वे हाथ से दबाने भर से टूट जाते हैं। क्षेत्रीय लोगों के विरोध के बावजूद भी ठेकेदारों और भ्रष्ट अधिकारियों की मिली-भगत के कारण कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है।

राधेश्याम पाण्डेय, चौकीदार (फूलबाग, पम्प हाउस)

चार साल तो मुझे हो गए हैं यह सुनते-सुनते कि जल्द ही पम्प हाउस काम करने लगेगा। कर्मचारियों के लिए बने कमरों में कर्मचारी भी नियमित बैठने लगेंगे। पिछले कई वर्षों से बंद पड़े कमरों की हालत भी निरंतर खराब होती जा रही है। गंगा नदी से पम्प हाउस तक पूरी लाइन ही नहीं पड़ सकी है तो पम्प चालू कैसे हो सकता है। कभी-कभार अधिकारी आते हैं, बस बाहर से ही देखकर चले जाते हैं। करोड़ों की मशीनों की जांच के लिए भी कोई नहीं आता। मैं तो ठेकेदार की ओर से नियुक्त किया गया हूं इसलिए यह नहीं बता सकता कि अधिकारी स्तर पर काम की क्या योजना तैयार हो रही है। पम्प हाउस पर मेसर्स इनविराद प्रोजेक्ट प्राइवेट लिमिटेड का बोर्ड़ लगा हुआ है। बोर्ड पर कार्य की अवधि अक्टूबर 2008 से सितम्बर 2014 तक लिखी हुई है। बोर्ड पर 2014 की अवधि मिटाकर दोबारा लिखी गयी है ताकि बिना आधिकारिक जांच के फौरी तौर पर जांच के दौरान यह साबित न हो सके कि कार्य की अवधि को समाप्त हुए वर्षों बीत चुके हैं। दोबारा अवधि बढ़ाए जाने की लिखित जानकारी भी किसी के पास नहीं है।

पटकापुर के स्थानीय निवासी – सुनील वर्मा, अशोक गुप्ता, अशोक प्रजापति एवं अन्य

कानपुर शहर के इनर ओल्ड एरिया में शरीक पटकापुर मोहल्ला निवासी सुनील वर्मा कहते हैं कि पिछले कई दशकों से इस इलाके में शुद्ध पेयजल का संकट बना हुआ है। इस इलाके में सरकारी लाइन आज तक नहीं डाली गयी इसके बावजूद वाटर टैक्स और सीवर टैक्स निरंतर लिया जा रहा है। लगभग 6 माह पूर्व पाइप लाइन बिछायी गयी थी। कहा गया था कि जल्द ही पानी की सप्लाई भी शुरू कर दी जायेगी। कनेक्शन के नाम पर 100 से 200 रूपए तक प्रत्येक घर से वसूले गए। पानी के लिए एक विधायक ने बोरिंग करवाकर 500 लीटर क्षमता की टंकी लगवा दी है। सुबह-शाम घर की महिलाओं से लेकर बच्चे और बूढ़ तक पानी के लिए लाइन लगाकर घण्टों खड़े रहते हैं। सरकार की ओर से इण्डिया मार्क-2 जो हैण्डपम्प लगाए भी गए थे वे वर्षों से खराब हैं। इस मोहल्ले की आबादी लगभग 25 हजार है। सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि पानी के लिए यहां के लोगों को कितनी मशक्कत करनी होती है। कमोबेश यही बात अशोक गुप्ता, अशोक प्रतापति सहित मोहल्ले के अन्य लोग भी कहते हैं।

इंतजार अहमद, दियानतउल्लाह, अजहर अहमद, मोहम्मद सनवर एवं सईद सहित दूसरे मोहल्ले के लोगों का भी यही कहना है कि लाइन डाले हुए काफी समय बीत चुका है लेकिन पानी अभी तक चालू नहीं हो पाया है। मोहल्ले वालों से कनेक्शन के नाम पर उगाही भी की गयी। यह लोग भी एक पार्षद के सहयोग से बोरिंग कर लगायी गयी टंकियों से पानी भरने को विवश हैं। कुछ तो पड़ोस की मस्जिद से पीने का पानी भरकर लाते हैं। पाइप लाइन को निश्चित गहराई तक खोदकर डालने के बजाए तीन-चार फिट खोद कर ही डाल दिया गया है। अभी हाल ही में जब इंटरलॉकिंग की गयी तो कई लाईने क्षतिग्रस्त हो चुकी हैं। पाइप इतने कमजोर हैं कि हाथ से दबाने भर से टूट जाते हैं। ऐसी दशा में यदि दोबारा लाइन डालने से पहले पानी चालू भी किया गया तो निश्चित तौर पर घरों में तो पानी नहीं आयेगा, अलबत्ता गलियां जरूर जलमग्न हो सकती हैं।

अमोद त्रिपाठी, सभासद (पटकापुर), कानपुर

लाइन बिछाने में जमकर अनियमितता की गयी है। जिस दिन पानी चालू हुआ गलियों में पानी ही पानी नजर आयेगा। पीवीसी पाइप की गुणवत्ता इतनी खराब है कि जरा से दबाव से ही टूट जाते हैं। जगह-जगह लाइनें ब्लास्ट हो जायेंगी। श्री त्रिपाठी का कहना है कि लाइनों को सिर्फ जमीन में दबा दिया गया है। न तो कहीं पर ज्वाइंट लगाए गए हैं और न ही पूरी लाइन ही बिछायी गयी है। ऐसा लगता है कि शायद योजना के धन में लूटमार और खानापूर्ति के लिए ही लाइने बिछायी गयी हैं। सरकार की मंशा पेयजल उपलब्ध कराने की नहीं थी। दिखाने के लिए थोड़ी-थोड़ी दूरी पर लाइने डाली गयी हैं। कोई भी लाइन एक दूसरे से कनेक्ट नहीं है। श्री त्रिपाठी कहते हैं, ‘मेरी सरकार से मांग है कि इन लाइनों को खुदवाकर जांच करनी चाहिए। असलियत खुद-ब-खुद सामने आ जायेगी।

जफर अहमद, (सिविल डिफेंस पोस्ट वार्डन, घम्मू खां का हाता, कानपुर)

इस योजना के तहत कानपुर में जल-निगम के द्वारा बिछायी जा रही पाइप लाइन के लिए जो खुदाई की जा रही है वह मानकों के अनुरूप नहीं है। इसमें नियमानुसार बालू का प्रयोग भी नहीं किया जा रहा है। पाईप बेहद घटिया किस्म के हैं। घनी बस्तियों के लोग पानी आने के इंतजार में हैं लेकिन अधिकारियों और ठेकेदारों की लापरवाही के चलते ऐसा लगता है कि हमें अभी कई वर्ष और इंतजार करना पडे़गा।

यह आर्टकिल लखनऊ से प्रकाशित दृष्टांत मैग्जीन से साभार लेकर भड़ास पर प्रकाशित किया गया है. इसके लेखक तेजतर्रार पत्रकार अनूप गुप्ता हैं जो मीडिया और इससे जुड़े मसलों पर बेबाक लेखन करते रहते हैं. वे लखनऊ में रहकर पिछले काफी समय से पत्रकारिता के भीतर मौजूद भ्रष्‍टाचार की पोल खोलते आ रहे हैं.

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