हमलावर लोग कायर होते हैं, इसलिए हारना अंततः उन्हें ही होता है…

Anoop Gupta : पत्रकार यशवंत सिंह पर प्रेस क्लब ऑफ इंडिया के बाहर हमला किया गया और पुलिस की चुप्पी तो समझ आती है, प्रेस क्लब की चुप्पी के मायने क्या हैं। अगर यशवंत का विरोध करना ही है तो लिख कर कीजिये, बोल कर कीजिए, हमला करके क्या साबित किया जा रहा है। मेरा दोस्त है यशवंत, कई बार मेरे मत एक नहीं होते, ये जरूरी भी नहीं है लेकिन हम आज भी दोस्त हैं। चुनी हुई चुप्पियों और चुने हुए विरोध से बाहर निकलने की जरूरत है।

यशवंत अपने सीमित संसाधनों में भड़ास4 मीडिया चलाते रहे हैं और मीडिया की दुनिया के कई गलत कारनामे निर्भीकता के साथ सामने लाते रहे हैं। एक ऐसे समय में जबकि पूरा मीडिया कॉर्पोरेट घरानों के कब्ज़े में है, इस तरह के सूचना माध्यम काफी अहमियत रखते हैं। काबिलेतारीफ बात यह रही कि यशवंत ने हिम्मत के साथ इस हमले को बेनकाब किया और अभी भी अपनी उसी प्रतिबद्धता के साथ मीडिया मैदान में डटे हुए हैं।

ये हैं दोनों हमलावर…

हम सब आपके साथ हैं। हमलावर लोग कायर होते हैं, इसलिए हारना अंततः उन्हें ही होता है… देश के सभी बागी पत्रकारों से मेरी अपील है की यशवंत सिंह पर हुए हमले के विरोध में दिल्ली के प्रेस क्लब पर सब लोग एक साथ आये और हमलावरों के खिलाफ मोर्चा खोले जिससे कभी कोई और यशवंत सिंह पर हमला करने की जुर्रत ना कर सके. में अनूप गुप्ता संपादक दृष्टान्त लखनऊ हर तरह से यशवंत सिंह के साथ थे, है और रहेंगे.

लेखक अनूप गुप्ता लखनऊ से प्रकाशित चर्चित मैग्जीन दृष्टांत के प्रधान संपादक हैं.

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अनुदानित दरों पर भूखण्ड हथियाने के बावजूद सरकारी मकानों का सुख भोग रहे पत्रकारों की लिस्ट देखें

नैतिकता के चोले में रंगे सियार (पार्ट-तीन) : सैकड़ों पत्रकार ऐसे हैं जिन्हें तत्कालीन मुलायम सरकार ने रियायती दरों पर भूखण्ड और मकान उपलब्ध करवाए थे इसके बावजूद वे सरकारी आवासों का मोह नहीं त्याग पा रहे। इनमें से कई पत्रकार ऐसे हैं जिनके निजी आवास भी लखनऊ में हैं फिर भी सरकारी आवासों का लुत्फ उठा रहे हैं जबकि नियम यह है कि सरकारी आवास उन्हीं को दिए जा सकते हैं जिनका निजी आवास लखनऊ में न हो। कुछ पत्रकारों ने रियायती दरों पर मिले मकानों को किराए पर देकर सरकारी आवास की सुविधा ले रखी है तो कुछ सरकारी आवासों को ही किराए पर देकर दोहरा लाभ उठा रहे हैं।

बीबीसी में संवाददाता रहने के बाद सेवानिवृत्त हो चुके रामदत्त त्रिपाठी को तत्कालीन मुलायम सरकार ने अनुदानित दरों पर पत्रकारपुरम में प्लाट संख्या 2/91 आवंटित किया था। सरकार की ओर से अनुदानित दरों पर जो प्लाट दिया गया था, उस पर इन्होंने तीन मंजिला निर्माण करवाकर व्यवसायिक कार्य के लिए किराए पर दे रखा है। गौरतलब है कि तत्कालीन सरकार के कार्यकाल में अनुदानित दरों पर भूखण्ड आवंटन के समय स्पष्ट रूप से कहा था कि जो भूखण्ड उन्हें दिया जा रहा है उसे 30 वर्ष से पहले न तो बेचा जा सकता है और न ही व्यवसाय के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है इसके बावजूद श्री त्रिपाठी ने अपने भूखण्ड पर निर्माण करवाकर व्यवसायिक कार्यों के लिए दे रखा है। जानकार सूत्रों का दावा है कि उक्त भवन को आवासीय से व्यवसायिक में भी परिवर्तित नहीं कराया गया है।

जाहिर है नगर निगम को व्यवसायिक दरों पर टैक्स भी नहीं मिल रहा है। बताया जाता है कि उन्हीं के कुछ निकट साथियों ने गुपचुप तरीके से नगर निगम को वस्तुस्थिति से अवगत कराया था, लेकिन विभाग वरिष्ठ पत्रकार के सत्ताधारियों से करीबी रिश्तों के कारण कार्रवाई करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा। वर्तमान समय में श्री त्रिपाठी किस मीडिया संस्थान में अपनी सेवाएं दे रहे हैं? किसी को जानकारी नहीं, इसके बावजूद श्री त्रिपाठी न सिर्फ स्वतंत्र पत्रकार की हैसियत से राज्य मुख्यालय की मान्यता लेकर सरकारी सुख सुविधाओं का लाभ ले रहे हैं बल्कि सरकारी आवास में भी नियमविरुद्ध तरीके से अध्यासित हैं। पत्रकारों के मध्य वरिष्ठ पत्रकारों की श्रेणी में गिने जाने वाले श्री त्रिपाठी ने गुलिस्तां कालोनी में (भवन संख्या 55 नम्बर) सरकारी आवास पर अपना कब्जा जमा रखा है।

किसी समय जनसत्ता एक्सप्रेस में सम्पादक रहे पंकज वर्मा को भी सरकारी अनुदान पर गोमती नगर, विनय खण्ड में भूखण्ड संख्या 4/49 आवंटित किया गया है लेकिन वे राजधानी लखनऊ के अति विशिष्ट इलाके में मौजूद राजभवन कालोनी में भवन संख्या 1 पर अवैध रूप से काबिज हैं। इनके कब्जे को राज्य सम्पत्ति विभाग ने भी अवैध मानते हुए इनका आवास एक अन्य पत्रकार को आवंटित कर दिया था लेकिन सूबे की सत्ताधारी सरकारों से मधुर सम्बन्धों के चलते राज्य सम्पत्ति विभाग सरकारी आवास से कब्जा नहीं हटवा सका। जिस पत्रकार को पंकज वर्मा का सरकारी आवास आवंटित किया गया था उस पत्रकार ने श्री वर्मा के अवैध कब्जे को न्यायालय में भी चुनौती दी थी।

टाईम्स आफ इण्डिया के समाचार सम्पादक रहे रतनमणि लाल अब किसी मीडिया संस्थान में काम नहीं करते। इस वक्त वे एक एनजीओ के तहत निजी काम कर रहे हैं इसके बावजूद डालीबाग कालोनी के 7/13 के सरकारी आवास पर इनका कब्जा बना हुआ है। कुबेर टाईम्स समाचार पत्र को बन्द हुए कई वर्ष हो चुके हैं इस अखबार के नाम पर एक पत्रकार ने सरकारी आवास हथिया रखा है। 

एएनआई की संवाददाता कामिनी हजेला पूर्ववर्ती मुलायम सरकार के कार्यकाल में अनुदानित दरों पर विराज खण्ड, गोमती नगर में भूखण्ड संख्या 3/214 पा चुकी हैं फिर भी कामिनी हजेला ने सरकारी आवास संख्या ए-1006 से अपना मोह नहीं त्यागा। द पायनियर के संवाददाता विश्वदीप बनर्जी इन्दिरा नगर की सचिवालय कालोनी बी-26 पर वर्षों से कब्जा जमाए हुए हैं जबकि इन्हें भी सरकार की ओर से अनुदानित दरों पर विराज खण्ड में भूखण्ड संख्या 2/216 आवंटित किया गया था। दैनिक ग्रामीण सहारा के संवाददाता शरत पाण्डेय भी सरकार की ओर से अनुदानित दरों पर भूखण्ड हासिल करने के साथ ही सरकारी आवास (विधायक निवास-2) पर कब्जा जमाए बैठे हैं।

कमोवेश इसी तरह से अनुदानित दरों पर भूखण्ड हथियाने के बावजूद सरकारी मकानों का सुख भोग रहे पत्रकारों में अतुल चंद्रा ‘विराज खण्ड में भूखण्ड संख्या डी-2/119’, गोलेश स्वामी ‘विराज खण्ड में भूखण्ड संख्या डी-2/120’ अजय जायसवाल ‘विराज खण्ड में भूखण्ड संख्या डी- 2/45’, कमल दुबे ‘विराज खण्ड में भूखण्ड संख्या डी- 2/130’ मनोज श्रीवास्तव ‘विराज खण्ड में भूखण्ड संख्या डी- 2/121’, आशुतोष शुक्ल ‘विराज खण्ड में भूखण्ड संख्या डी- 2/122’, संदीप रस्तोगी ‘विराज खण्ड में भूखण्ड संख्या डी- 2/123’, स्वदेश कुमार ‘विराज खण्ड में भूखण्ड संख्या डी-2/63 सी’, विष्णु प्रकाश त्रिपाठी ‘विराज खण्ड में भूखण्ड संख्या डी-2/187’, नदीम ‘विराज खण्ड में भूखण्ड संख्या डी-2/136ए’, रूमा सिन्हा ‘विराज खण्ड में भूखण्ड संख्या डी-1/156ए’, विनोद कुमार कपूर ‘विराज खण्ड में भूखण्ड संख्या 2/124’, संजय मोहन जौहरी ‘विराज खण्ड में भूखण्ड संख्या 1/47’, संजय भटनागर ‘विराज खण्ड में भूखण्ड संख्या 1/29’, प्रज्ञान भट्टाचार्य ‘विराज खण्ड में भूखण्ड संख्या सी 3/7’, सुधीर मिश्रा ‘विराज खण्ड में भूखण्ड संख्या डी 2/118’, सुरेश यादव ‘विराज खण्ड में भूखण्ड संख्या डी 1/85’, अनिल के. अंकुर ‘सी 3/10 विराट खण्ड’, ज्ञानेन्द्र शर्मा ‘3/78 पत्रकार पुरम’, कामिनी प्रधान ‘सी 3/132 विराज खण्ड’, एम.पी. सिंह ‘1/353 विनम्र खण्ड’, अश्विनी श्रीवास्तव ‘2/64 विराट खण्ड’, प्रदीप विश्वकर्मा ‘सी 1/311 विकल्प खण्ड’, मोहम्मद तारिक खान ‘सी 1/312 विकल्प खण्ड’, बालकृष्ण ‘सी 1/313 विकल्प खण्ड’, प्रदुम्न तिवारी ‘1/157 विराज खण्ड’ और दिलीप कुमार अवस्थी पत्रकार पुरम 2/77 सहित सैकड़ों की संख्या में पत्रकार सरकारी की ओर से अनुदानित दरों पर भूखण्ड पाने के बावजूद दूसरे के हक पर डाका डाल रहे हैं।

नियमों की उड़ती रही धज्जियां
गोमती नगर, लखनऊ योजना में पत्रकारों के लिए भूखण्डों के लिए पंजीकरण-आवंटन पुस्तिका के कॉलम 13 में यह शर्त रखी गयी थी कि आवंटित भूखण्ड का उपयोग केवल आवासीय प्रयोजन के लिए ही किया जायेगा। यदि किसी समय यह पाया जाता है कि आवंटी ने अन्यथा उपयोग किया है तो उपाध्यक्ष (लविप्रा) को आवंटित भूखण्ड निरस्त करने का पूर्ण अधिकार होगा।

उक्त शर्त के बावजूद ज्यादातर पत्रकारों ने अपने भूखण्डों का उपयोग कामर्शियल के तौर पर कर रखा है। इतना ही नहीं कॉलम 12 में यह स्पष्ट वर्णित है कि यदि कोई आवंटी भूखण्ड के निबंधन तिथि से पांच वर्ष के अन्दर मानचित्र स्वीकृत कराकर मानचित्र के अनुसार निर्माण कार्य पूरा नहीं करवाता है उसे अतिरिक्त 5 वर्ष का समय सरचार्ज लेकर दिया जायेगा। अधिकतम 10 वर्ष तक यदि भूखण्ड पर निर्माण नहीं होता तो दस वर्ष लीज को समाप्त कर दिया जायेगा। कई पत्रकार ऐसे हैं जिन्होंने निर्धारित अवधि बीत जाने के बावजूद भूखण्ड पर कोई निर्माण नहीं करवाया है और उनके भूखण्ड मौजूदा समय में भी उन्हीं के कब्जे में हैं।

सरकारी आवास आवंटन नियमावली भी रद्दी की टोकरी में
नियमावली में स्पष्ट उल्लेख है कि पत्रकारों के आवास तभी आवंटन होगा जब वे लखनऊ में किसी मान्यता प्राप्त अखबार में कार्यरत होंगे। आवास का आवंटन कम से कम एक वर्ष और अधिकतम पांच वर्ष के लिए होगा। सेवानिवृत्त हो जाने के बाद अथवा तबादलदा हो जाने की स्थिति में उनका आवंटन स्वत: निरस्त कर दिया जायेगा। कुछ पत्रकार ऐसे हैं जिनका दूर-दूर तक पत्रकारिता से कोई सम्बन्ध नहीं रह गया है इसके बावजूद वे दशकों से सरकारी आवासों का लाभ उठा रहे हैं।

तो क्या दबाव में है राज्य सम्पत्ति विभाग!
तमाम शिकायतों के बावजूद राज्य सम्पत्ति विभाग द्वारा पत्रकारों से आवास खाली न करवाया जाना कहीं न कहीं यह संकेत दे रहा है कि विभाग उन पत्रकारों से आवास खाली करवाने में अक्षम है जिनके सम्बन्ध राज्य की सत्ता और नौकरशाहों से बने हुए हैं। राज्य सम्पत्ति विभाग के अधिकारी भी यही मानते हैं कि  वे अपनी जिम्मेदारी का निर्वहन उपरी दबाव के कारण नहीं कर पा रहे हैं। नाम प्रकाशित न करने की शर्त पर एक अधिकारी का कहना है कि पत्रकारों के मकान आवंटन से जुडे अधिकतर मामलों में सरकार के किसी न किसी मंत्री अथवा उच्चाधिकारी का सिफारिशी पत्र लगा होता है। ज्यादातर मामलों में तो फाईल पहुंचने से पहले ही अधिकारी अथवा मंत्री-नेता का सिफारिशी फोन आ जाता है। इन परिस्थितियों में नियमों के तहत जानकारी जुटाने का अर्थ ही नहीं रह जाता। इस अधिकारी की मानें तो पत्रकारों की फाइलों पर अक्सर सही सूचना देने पर डांट तक खानी पड़ती है। अब तो हालात यह है कि पत्रकारों के प्रार्थना-पत्रों में सच्चाई नहीं बल्कि सिफारिशी पत्रों को तलाशा जाता है। जिसके प्रार्थना-पत्र में किसी अधिकारी अथवा नेता का सिफारिशी पत्र अथवा फोन से निर्देश मिलते हैं उसी को प्राथमिकता के आधार पर सरकारी मकानों पर कब्जा दिला दिया जाता है।

लाभ के लिए अनैतिक रास्ते
पत्रकारों को घर और जमीन देने की नींव मुलायम सिंह यादव के कार्यकाल में रखी गयी। राजधानी लखनऊ के पॉश इलाके गोमतीनगर में पत्रकारपुरम नाम से पूरी एक कालोनी ही बसा दी गयी थी। पत्रकारों को जमीन भी रियायती दरों पर दी गयी। उस वक्त कुछ पत्रकार ऐसे भी थे जो रियायती दरों पर भी जमीन लेने की हालत में नहीं थे। मुलायम ने अपनी सहृदयता का परिचय देते हुए ऐसे पत्रकारों की आर्थिक मदद भी की। मुलायम ने जिन पत्रकारों को दयाभाव से देखा, असल में वे बेहद शातिर किस्म के थे। अनैतिक तरीकों से लाभ लेने के लिए फर्जी हलफनामों से लेकर फर्जी दस्तावेज तक लगाए गए। हालांकि राज्य सम्पत्ति विभाग इस बात को भलीभांति जानता था लेकिन ऊपर से आदेश मिलने के कारण किसी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं किया गया। कुछ तो ऐसे थे जिन्होंने दो-दो भूखण्ड हथिया लिए।

रियायती दरों पर भूखण्ड लेने के बाद भी सरकारी आवासों में अध्यासित हैं पत्रकार
गोमती नगर योजना में पत्रकारों के लिए अनुदानित भूखण्ड    राज्य सम्पत्ति विभाग के आवासों में अध्यासित
01.    रवीन्द्र सिंह      3/33, पत्रकार पुरम   17, राजभवन कालोनी
02.    रामदत्त त्रिपाठी  3/81, पत्रकारपुरम    55, गुलिस्तां कालोनी
03.    दीपक गिडवानी 1/12 विराज खण्ड     65, गुलिस्तां कालोनी
04.    पंकज वर्मा      4/49, विनय खण्ड     1,  राजभवन कालोनी
05.    विश्वदीप बनर्जी  2/216, विराज खण्ड   बी-26, इन्दिरा नगर
06.    रचना सरन     1/28, विराज खण्ड     बी-78, इन्दिरा नगर
07.    संगीता बकाया  1/33 विराज खण्ड      सी-16 बटलर पैलेस
08.    हेमंत तिवारी    1/19, विराज खण्ड     बी-7, बटलर पैलेस
09.    वीर विक्रम बहादुर 3/82 पत्रकार पुरम   3/8, कैसरबाग
10.    सुरेन्द्र दुबे      1/15, विराज खण्ड      1/2, डालीबाग
11.    राजेन्द्र कुमार  1/27, विराज खण्ड       9/1, डालीबाग
12.    राजेन्द्र द्विवेदी  1/115, विराज खण्ड     51, अलीगंज
13.    शोभित मिश्रा  1/155, विराज खण्ड      23, अलीगंज
14.    ज्ञानेन्द्र शर्मा   3/78, पत्रकारपुरम        23, गुलिस्ता कालोनी
15.    कमाल खान  1/97 विराज खण्ड        बटलर पैलेस 1/315 विकल्प खण्ड
16.    नदीम        1/136-ए, विराज खण्ड   5/16, डालीबाग
17.    अनूप श्रीवास्तव    सीपी-5, सी अलीगंज    09, गुलिस्ता कालोनी
18.    के. विक्रम राव,    सेक्टर सी, अलीगंज       गुलिस्तां कालोनी
19.    मुकेश अलख       1/73, विराज खण्ड       66, गुलिस्ता कालोनी
20.    के.डी बनजी       1/151, विराज खण्ड      7/8, डालीबाग
21.    जोखू प्रसाद तिवारी   1/204 विराज खण्ड    3/43, टिकैतराय कालोनी

आदेश किसी के लिए, लाभ किसी ने उठाया
विगत वर्ष सुप्रीम कोर्ट ने जब राज्य के छह पूर्व मुख्यमंत्रियों को सरकारी आवास खाली करने का निर्देश दिया तो तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को भी 4, विक्रमादित्य वाले मकान की सुधि जागी। उन्हें लगा कि यदि सुप्रीम कोर्ट के आदेश का पालन करवाया गया तो निश्चित तौर पर भविष्य में उनके इस मकान पर भी गाज गिर सकती है। साथ ही बगल में स्थित उनके पिता और पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव का 5, विक्रमादित्य वाला मकान भी हाथ से चला जायेगा। सुप्रीम कोर्ट के आदेश को ठेंगा दिखाने के लिए जरूरी था कि स्थानीय मीडिया को दबाव में लिया जाए। हुआ भी कुछ ऐसा ही। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में पत्रकारों के सरकारी आवास को लेकर कोई आदेश नहीं दिया था, लेकिन राज्य सम्पत्ति विभाग ने उसी आदेश को पत्रकारों पर लागू कर दबाव की रणनीति अपनायी। जैसी उम्मीद थी, ठीक वैसा ही हुआ।

नोटिस मिलते ही पत्रकारों को सुख-सुविधा वाला सरकारी आवास हाथ से जाता नजर आया तो शुरू हो गयी अधिकारियों के समक्ष गिड़गिड़ाने की प्रथा। पत्रकारों और फोटोग्राफरों के संगठनों में सरकार के समक्ष नतमस्तक होने की होड़ सी मच गई। एक दूसरे से 36 का आंकड़ा रखने वाले, मोटी कमाई करने वाले और नैतिकता का पाठा पढ़ाने वाले सारे पत्रकार इस मुद्दे पर एकजुट हो गए। ऐसा लग रहा था जैसे पत्रकारों ने ठान रखा हो कि चाहे कुछ भी हो जाए मगर सरकार की कृपा से मिले मकान खाली न करने पड़ें। अखिलेश सरकार को अपना मकसद उस वक्त सफल होता नजर आया जब पत्रकार ‘जनता दर्शन’ में मुख्यमंत्री की तारीफ करते नजर आए। वैसे तो तत्कालीन मुख्यमंत्री पहले ही विधानसभा बैठक के दौरान पत्रकारों को आश्वस्त कर चुके थे कि किसी के भी घर खाली नही कराए जाएंगे, फिर भी पत्रकार पूरी तरह से मुतमईन होना चाहते थे लिहाजा पूर्व मुख्यमंत्री ने जनता दर्शन में एक बार फिर पत्रकारों को आश्वस्त किया। परिणामस्वरूप पत्रकार सुप्रीम कोर्ट के आदेश को भूलकर तत्कालीन मुख्यमंत्री का यशगान करने में जुट गए। बीच-बीच में दबाव बनाए रखने की गरज से राज्य सम्पत्ति विभाग की तरफ से पत्रकारों को नोटिसें दी जाती रहीं।

राज्य मुख्यालय से मान्यता प्राप्त एक पत्रकार का दावा है कि तत्कालीन सरकार की यह चाल विधानसभा में संशोधन विधेयक पेश किये जाने तक चलती रही। इसी दौरान पूर्व मुख्यमंत्रियों के अलावा ट्रस्टों, राजनीतिक दलों, अधिकारियों, मंत्रियों, कर्मचारी संघों आदि को सरकारी भवनों के आवंटन के लिए एक अन्य बिल ‘राज्य सम्पत्ति विभाग नियंत्रणाधीन भवन आवंटन विधेयक 2016’ पेश किया गया। पत्रकारों के लिए भवनों का आवंटन भी इसी दायरे में लाया गया।

इस विधेयक के बाद की स्थिति यह है कि पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव भी खुश हैं कि उनका और उनके पिता का बंगला खाली नहीं कराया जा सकेगा और पत्रकार भी खुश हैं कि सभी के घर बच गए। रही बात सुप्रीम कोर्ट के आदेश की तो जैसा पहले होता आया है वैसा ही आगे भी होता रहेगा। कानून की किताबों में एक अध्याय और जुड़ जायेगा, भले ही वह किसी काम का न हो।  कहने का तात्पर्य यह है कि किसी राज्य का मुख्यमंत्री यदि चाह ले तो हमारे की देश की न्यायपालिका को भी नतमस्तक हो जाना पड़ता है।

अधिकारियों के आदेश भी कोई मायने नहीं रखते
नौकरशाहों और सत्ताधारियों के चरण चापन करने वाले पत्रकारों के खिलाफ कार्रवाई सम्बन्धी सरकारी आदेश भी कोई मायने नहीं रखते। 9 नवम्बर 2012 को पत्रकारों के आवास आवंटन और नवीनकरण के लिए तत्कालीन प्रमुख सचिव (मुख्यमंत्री) राकेश गर्ग और सचिव मुख्यमंत्री अनीता सिंह की अध्यक्षता में एक बैठक आयोजित की गयी। बैठक में चिन्हित किए गए उन पत्रकारों के आवास आवंटन को लेकर चर्चा हुई जिन्होंने फर्जी ढंग से सरकारी आवासों पर कब्जा जमा रखा था। बैठक में सम्बन्धित अधिकारी को आदेश दिया गया था कि जिन मान्यता प्राप्त पत्रकारों के आवास आवंटन का नवीनीकरण नहीं हुआ है उनसे तत्काल दोबारा प्रार्थना पत्र मांगा जाए, साथ ही गैर मान्यता प्राप्त पत्रकारों को नोटिस देकर उनके आवास खाली कराए जाएं। मुख्यालय से बाहर स्थानांतरित पत्रकारों के आवासों का निरस्तीकरण किया जाए। जिन पत्रकारों का निधन हो गया है, उनके आश्रितों में यदि कोई मान्यता प्राप्त पत्रकार है, तो उनको छोड़कर सभी के आवास निरस्त करने के साथ ही सख्ती से मकानों से कब्जे हटवाए जाएं। उस वक्त प्रमुख सचिव स्तर के अधिकारियों की कार्रवाई से ऐसा लगने लगा था कि बहुत जल्द फर्जी ढंग से सरकारी आवासों पर कब्जा जमाए तथाकथित पत्रकारों से उनके मकान खाली करवा लिए जायेंगे। उस वक्त सूबे मे अखिलेश यादव की सरकार सत्ता में थी। पांच साल का कार्यकाल पूरा करने के बाद सरकार तो चली गयी लेकिन सम्बन्धित विभाग कार्रवाई नहीं कर पाया। इसके विपरीत अखिलेश सरकार के कार्यकाल में पत्रकारों को और अधिक सुविधाएं दे दी गयीं।

…समाप्त…

लखनऊ से प्रकाशित चर्चित खोजी पत्रिका ‘दृष्टांत’ में यह स्टोरी मैग्जीन के प्रधान संपादक अनूप गुप्ता के नाम से छपी है. वहीं से साभार लेकर इसे भड़ास पर प्रकाशित किया गया है.

इसके पहले वाले दोनों पार्ट पढ़ने के लिए नीचे क्लिक करें…

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कम्पनी में कमाल खान, रुचि कुमार और शरत चन्द्र प्रधान का कितना शेयर है?

नैतिकता के चोले में रंगे सियार (पार्ट-दो) : हुआ यूं कि तत्कालीन मुलायम सरकार के कार्यकाल में राजधानी लखनऊ के अति विशिष्ट इलाके गोमती नगर में पत्रकारों के लिए रियायती दरों पर भूखण्डों की व्यवस्था की गयी थी। भूखण्ड पंजीकरण आवंटन पुस्तिका के 3.7 कालम में स्पष्ट लिखा हुआ है कि भूखण्ड उन्हीं पत्रकारों को दिया जायेगा जो वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट 1955 के अधीन आते हैं। गौरतलब है कि इलेक्ट्राॅनिक चैनलों को इस एक्ट में शामिल नहीं किया गया है। तत्कालीन अखिलेश सरकार के कार्यकाल में इस एक्ट में संशोधन किए जाने के लिए आवाज उठायी गयी थी, लेकिन मौजूदा समय तक इस एक्ट में कोई संशोधन नहीं किया गया है। लिहाजा खबरिया चैनल में काम करने वाले पत्रकारों को पत्रकार माना ही नहीं गया है।

इन परिस्थितियों में खबरिया चैनल से जुडे़ उन सैकड़ों पत्रकारों को सरकार की तरफ से रियायती दरों पर भूखण्ड दिया जाना पूरी तरह से गैरकानूनी है। दूसरी ओर सरकारी आवास का लोभ नहीं छोड़ने के पीछे कई कारण हैं। सरकारी आवास में रहने के दौरान न तो रखरखाव का खर्चा आता है और न ही भारी-भरकम बिजली बिल आने का डर सताता है। किराया नाम मात्र का। अब प्रश्न यह उठता है कि खबरिया चैनलों में काम करने वालों ने रियायती दरों पर मिले भूखण्डों का क्या किया? इस बारे में न तो पूर्ववर्ती सरकारों ने ऐसे पत्रकारों से पूछा और न ही वर्तमान सरकार ही मीडिया की आड़ में फर्जी तरीके से लाभ लेने वाले पत्रकारों से पूछने की जहमत उठा रही है। ऐसा लगता है जैसे वर्तमान योगी सरकार भी अपने पहलू में ऐसे पत्रकारों को शरण दिए रहना चाहती है जो सरकार की कमियों को खूबियों में परिवर्तित कर आम जनता के समक्ष परोस सकेें।

राजधानी लखनऊ में कुछ पत्रकार ऐसे भी हैं जिन्होंने मीडिया के बैनर का जमकर दुरुपयोग किया। जहां जैसे मिला, खूब बटोरा। चल-अचल सम्पत्ति बटोरने में साम-दाम-दण्ड-भेद के साथ ही राजनीतिज्ञों का भी सहारा लिया। ऐसे ही पत्रकारों में एक नाम है कमाल खान का। आय से अधिक सम्पत्ति के बारे में सरकार और विधायक-मंत्रियों सहित सांसदों से सवाल-जवाब करने वाले पत्रकार कमाल खान का असली चेहरा देखना है तो विधानसभा से मात्र कुछ किलोमीटर की दूरी तय करनी होगी। यह इलाका है राजधानी लखनऊ की तहसील मोहनलालगंज।

मोहनलालगंज से मात्र दो किलोमीटर की दूरी पर हाईवे से सटा एक गांव है ‘गौरा गांव’। इस गांव में गाटा संख्या 1458 कमाल खान और उनकी पत्नी रुचि कुमार के नाम से खाते में दर्ज है। इस जमीन का क्षेत्रफल 0.9820 हेक्टेयर है। यानी लगभग तीन बीघा। इसी से सटी जमीन (गाटा संख्या 1459) भी कमाल खान और उनकी पत्नी रुचि कुमार के नाम से राजस्व के अभिलेखों में दर्ज है। इस जमीन का क्षेत्रफल 0.6960 हेक्टेयर है। दस्तावेजों के आधार पर तो यह जमीन करीब छह बीघे के आसपास है लेकिन स्थलीय पड़ताल के दौरान यह जमीन 10 बीघे से भी ज्यादा नजर आयी। यहां तक कि कमाल खान के फार्म हाउस की देखरेख करने वालों ने भी यही जानकारी दी।

कमाल खान के फार्म हाउस पर मौजूद एक व्यक्ति ने ‘दृष्टान्त’ को बताया कि 8 बीघे में तो सिर्फ केले की फसल लगी है। शेष खाली जमीन को मिलाकर कमाल खान के कब्जे में दस बीघा के आसपास जमीन मानी जा रही है। यदि दस्तावेजों को आधार मानकर चलें तो सिर्फ गौरा गांव में ही कमाल खान के हिस्से वाली जमीन की मौजूदा कीमत लगभग 10 से 12 करोड़ के आसपास है। कृषि भूमि के रूप में दर्ज इस जमीन पर कमाल खान का विशाल फार्म हाउस बना हुआ है जिस पर केले की खेती होती है।

कमाल खान के इस फार्म हाउस पर पूर्व कैबिनेट मंत्री शिवपाल यादव की विशेष कृपा रही है। कहा तो यहां तक जाता है कि इस जमीन को भी दिलाने में शिवपाल यादव की भूमिका प्रमुख थी। बेशकीमती जमीन का सौदा कौड़ियों के दाम पर करवाने के लिए पूर्व मंत्री ने अपने पद का भरपूर दुरुपयोग किया और कमाल खान को स्थानीय किसानों के भारी विरोध के बावजूद जमीन मुहैया करवा दी।

पूर्व कैबिनेट मंत्री शिवपाल यादव की कृपादृष्टि का अहसास गौरा गांव में घुसते ही हो जाता है। ऊबड़-खाबड़ रास्तों से गुजरते हुए अचानक चमचमाती इंटरलाकिंग टाइल्स लगी समतल सड़क नजर आ जाती है। स्थानीय ग्रामीणों से पूछते ही इशारा करके बता दिया जाता है कि चमचमाती बाउण्ड्रीवाल में जो हरे रंग के लोहे के दरवाजे लगे हैं, वही कमाल खान का फार्म हाउस है। फार्म हाउस पर केले की खेती लहलहा रही है। फार्म हाउस की देखभाल करने वाले एक व्यक्ति से मुलाकात होती है। वह बताता है कि आठ बीघे में तो सिर्फ केले की खेती होती है। शेष खाली जमीन यूं ही पड़ी है। अब प्रश्न यह उठता है कि जब राजस्व अभिलेखों में कमाल खान और उनकी पत्नी रुचि कुमार के नाम से लगभग छह बीघा जमीन है तो शेष चार बीघा जमीन किसकी है जिस पर कमाल खान केले की खेती कर रहे हैं।

इसके अतिरिक्त मोहनलालगंज तहसील के पुरसेनी गांव में भी कमाल खान और रुचि कुमार के नाम से जमीनें मौजूद हैं। दोनों पत्रकार पति-पत्नी ने अपनी जमीनों को के.ए.पी.एस. ट्रेडिंग कम्पनी प्राइवेट लिमिटेड को दे रखी है। इस कम्पनी में कमाल खान और रुचि कुमार के साथ ही एक अन्य वरिष्ठ पत्रकार शरत चन्द्र प्रधान बोर्ड आफ डायरेक्टर में शामिल हैं। कम्पनी अम्बरीश अग्रवाल के नाम से है। कमाल खान, रुचि कुमार और शरत चन्द्र प्रधान का कम्पनी में कितना शेयर है? यह तो जांच का विषय हो सकता है लेकिन पत्रकारिता से रोजी-रोटी चलाने वाले कमाल खान और उनकी पत्नी रुचि कुमार के पास इतना पैसा कहां से आया जिन्होंने चंद वर्षों में ही करोड़ों की अचल सम्पत्ति खरीद ली। दूसरों की सम्पत्ति की खोज-खबर रखने वाले कमाल खान की सम्पत्ति की जांच भी जरूरी है। राजधानी लखनऊ के कुछ वरिष्ठ पत्रकारों का दावा है कि कमाल खान की यह सम्पत्ति तो महज हाथी के दांत समान है जबकि इनके नाम से कई अन्य स्थानों में भी जमीन-जायदाद हैं।

कमाल खान के अलावा सैकड़ों अन्य पत्रकारों की जमात भी प्रदेश की सरकारों की चरण वन्दना तक करती रही है। इनमें से अधिकतर पत्रकार ऐसे हैं जिन्होंने सिर्फ सरकारी लाभ लेने और अधिकारियों के बीच धौंस जमाने से लेकर ट्रांसफर-पोस्टिंग के लिए ही इस पेशे को चुना है। खबरिया चैनलों पर बड़ी-बड़ी बहस करने वाले पत्रकार भी सरकार की चरण वन्दना करते आसानी से देखे जा सकते हैं। किसी को करोड़ों का विज्ञापन लेना है तो कोई अपने चैनल-अखबार के लिए विज्ञापन की दलाली कर रहा है। सरकारी सम्पत्ति पर कब्जा जमाने की गरज से ऐसे पत्रकार अधिकारियों के समक्ष ठीक वैसे ही गिड़गिड़ाते हैं कोई जरूरतमंद इंसान साहूकारों से कर्ज लेने के लिए गिड़गिड़ाता है। यह सारा खेल मुफ्त में नहीं खेला जाता। पत्रकार को मकान-जमीन-सरकारी आवास और मुख्यालय की प्रेस मान्यता मिल जाती है तो दूसरी ओर प्रदेश सरकार को मुफ्त का प्रचार।

जब कोर्ट ने चाबुक चलाया तो अगस्त 2016 में तत्कालीन अखिलेश सरकार के निर्देश पर राज्य सम्पत्ति विभाग ने 586 पत्रकारों, ट्रस्ट, संस्थाओं और निजी व्यक्तियों को आवंटित आवास खाली करने का नोटिस भेज दिया गया। यह नोटिस सुप्रीम कोर्ट के एक अगस्त के आदेश के मद्देनजर भेजा गया था। हालांकि कोर्ट ने अपना निर्णय एक पीआईएल के आधार पर पूर्व मुख्यमंत्रियों को आवंटित बंगलों को खाली करवाने के लिये दिया था, लेकिन राज्य सम्पत्ति विभाग ने इसी आदेश को आधार बनाकर पत्रकारों को भी नोटिस भेज दिया। इस पर राज्य सम्पत्ति विभाग कहता है कि आदेश में निजी व्यक्तियों के भी आवंटन स्वतः निरस्त करने के लिए लिखा गया है, इस वजह से पत्रकारों के मकान भी खाली कराए जाएंगे। लगभग एक वर्ष का समय बीत जाने के बावजूद किसी पत्रकार से सरकारी आवास खाली नहीं करवाया जा सका।

राजधानी लखनऊ के बहुतायत कथित पत्रकारों ने रियायती दरों पर मकान-भूखण्ड की सुविधा लेने के साथ ही सरकारी मकानों पर भी फर्जी दस्तावेजों के सहारे कब्जा जमा रखा है। इस बात की जानकारी राज्य सम्पत्ति विभाग को भी है लेकिन शीर्ष स्तर से आदेश न मिलने की वजह से उसके हाथ बंधे हुए हैं। राज्य सम्पत्ति विभाग के एक कर्मचारी की मानें तो ऐसे पत्रकार सत्ताधारी दल से सम्बन्ध बनाते ही इसीलिए हैं कि उन्हें सरकारी आवासों से बेदखल न किया जाए। जानकर आश्चर्य होगा कि ये सरकारी आवास भी एक वर्ष से लेकर सिर्फ तीन वर्ष के लिए ही आवंटित किए जाते हैं लेकिन इन सरकारी आवासों में दशकों से पत्रकारों का कब्जा बना हुआ है। जिन्हें राज्य सम्पत्ति विभाग समय पूरा होने के बाद भी खाली नहीं करवा पा रहा है।

विभाग के एक कर्मचारी का कहना है कि इसकी जानकारी पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव से लेकर पूर्व मुख्यमंत्री मायावती, अखिलेश यादव सहित वर्तमान मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को भी दी जा चुकी है। हालांकि शुरुआती दौर में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने घोषणा की थी कि सरकारी आवासों का लुत्फ उठा रहे पत्रकारों से मकान खाली करवाया जायेगा, लेकिन चरण चापन करने वाले पत्रकारों ने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के प्रयासों पर पानी फेर दिया। कोई उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्या और दिनेश शर्मा से सिफारिश करता नजर आया तो किसी ने प्रदेश भाजपा के दूसरे दिग्गज नेताओं का दामन थामकर अपने मकान बचा लिए। अब पत्रकारों से सरकारी आवास खाली करवाने सम्बन्धी गर्जना भी मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की तरफ से सुनायी नहीं देती।

गौरतलब है कि फर्जी तरीके से सरकारी अवासों पर दशकों से अध्यासित पत्रकारों का खुलासा समस्त दस्तावेजों सहित मुख्यमंत्री सहित सम्बन्धित विभाग को पहुंचाया जा चुका है। पत्रकारों के फर्जीवाडे़ की पुष्टि सूचना विभाग भी कर चुका है, इसके बावजूद फर्जी दस्तावेजों के आधार पर सरकारी भवनों पर कुण्डली मारकर बैठे कथित पत्रकारों के खिलाफ न तो विधिसम्मत कार्रवाई की जा रही है और न ही सरकारी भवनों से कब्जा वापस लिया जा रहा है।

कानूनी पक्ष तो यही कहता है कि फर्जी हलफनामे और फर्जी दस्तावेजों के सहारे किसी सरकारी अथवा निजी सम्पत्ति को हथियाना जुर्म की श्रेणी में आता है। ऐसे लोगों के खिलाफ आईपीसी की धारा 420 के तहत कार्रवाई होनी चाहिए। इस धारा के अन्तर्गत अधिकतम सजा (जुर्माना या जुर्माने के बिना) 7 साल है।

उत्तर-प्रदेश राज्य सम्पत्ति विभाग अनुभाग-2 ने अपने सरकारी आदेश (संख्या-आर-1408/32-2-85-211/ 77टीसी) में स्पष्ट उल्लेख किया है कि यदि कोई भी आवंटी शर्तों और प्रतिबंधों को भंग करता है तो राज्य सम्पत्ति विभाग उस आवंटी का आवंटन बिना कारण बताए निरस्त कर उसे सरकारी आवास से बेदखल कर सकता है। इसके बावजूद सैकड़ों की तादाद में सरकारी बंगलों में कुण्डली मारकर बैठे पत्रकार खुलेआम नियमों की धज्जियां उड़ा रहे हैं। कई कथित पत्रकार ऐसे हैं जिनका कई महीनों से किराया बकाया होने के साथ ही भारी-भरकम बिजली का बिल भी बाकी है। चूंकि सत्ता के गलियारों से लेकर नौकरशाही तक में ऐसे पत्रकारों का बोलबाला है लिहाजा सरकार चाहकर भी नियमों के तहत इनके खिलाफ कार्रवाई करने की हिम्मत नहीं जुटा पा रही।

राज्य सम्पत्ति विभाग के एक अधिकारी की मानें तो ऐसे पत्रकारों के खिलाफ कार्रवाई तभी हो सकती है जब मुख्यमंत्री चाहेंगे। राज्य सम्पत्ति विभाग के अनुसार सरकारी बंगलों पर सैकड़ों की संख्या में ऐसे पत्रकार काबिज हैं जो विभाग की नियमावली में फिट नहीं बैठते। इतना ही नहीं कुछ तो ऐसे कथित पत्रकारों को सरकारी बंगला आवंटन किया गया है जिनका पत्रकारिता से दूर-दूर का नाता नहीं है। कुछ तो ऐसे हैं जिन्होंने पत्रकारिता का पेशा त्याग दिया है फिर भी सरकारी मकानों पर कब्जा जमाए हुए हैं।

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लखनऊ से प्रकाशित चर्चित खोजी पत्रिका ‘दृष्टांत’ में यह स्टोरी मैग्जीन के प्रधान संपादक अनूप गुप्ता के नाम से छपी है. वहीं से साभार लेकर इसे भड़ास पर प्रकाशित किया गया है.

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कमाल खान रियायती दरों पर दो-दो प्लाट का लाभ लेने के बाद भी बटलर पैलेस के सरकारी आवास पर कब्जा जमाए हुए हैं!

नैतिकता के चोले में रंगे सियार (पार्ट-एक) : नैतिकता का पाठ पढ़ाने वाले तथाकथित वरिष्ठ पत्रकार स्वयं कितने अनैतिक हैं इसका खुलासा ‘दृष्टान्त’ की पड़ताल में नजर आया। मीडिया के क्षेत्र से जुड़े मठाधीश अपने जूनियर पत्रकारों को तो इमानदारी से पत्रकारिता करने की सीख देते हैं, लेकिन वे स्वयं कितने बेईमान हैं, इसकी बानगी कुछ चुनिन्दा पत्रकारों के पन्ने खुलते ही नजर आ जाती है। खबरिया चैनल से लेकर अखबारों और मैगजीन से जुड़े पत्रकारों ने सरकार की चरण वन्दना कर जमकर अनैतिक लाभ उठाया। जानकर हैरत होगी कि कोई करोड़ों की लागत से आलीशान कार्यालय और बेशकीमती कारों का मालिक है तो किसी के पास अथाह जमीन-जायदाद। कोई फार्म हाउस का मालिक बना बैठा है तो किसी के पास कई-कई मकान हैं।

ये सारा कुछ पत्रकार की हैसियत से कमाया गया है। बड़ा सवाल यह है कि ऐसे पत्रकारों को मीडिया घराने के मालिकान कितना वेतन देते हैं जिससे उनके पास चन्द वर्षों में ही करोड़ों की सम्पत्ति इकट्ठा हो जाती है? आय से अधिक सम्पत्ति मामले में दूसरों की बखिया उधेड़ने वाले ऐसे पत्रकारों पर न तो ईडी की नजर जाती है और न ही आयकर विभाग वाले ही उनकी बेतहाशा आय का स्रोत जानने की कोशिश करते हैं।

किसी दौर में पत्रकार शब्द सुनते ही अमूमन लोगों के जेहन में पैंट, कुर्ता, कंधे पर टंगा झोला और पैरों में चपप्ल पहले शख्स की छवि उभर आती थी। जिस गणेश शंकर विद्यार्थी और बाबू विष्णु राव पराडकर का नाम सुनकर पत्रकारिता गौरवांवित हो उठती थी, उन्हीं पत्रकारों की अगली पीढियों की छवि बदल गई है। अब पत्रकार शब्द सुनते ही लोगों के मन में भौकाली, दलाल, फरेबी, धंधेबाज जैसे शब्द गूंजने लगते हैं। अब ना वह इज्जत बची ना ही इज्जतदार पत्रकार बचे, धंधेबाज मीडिया संस्थान और व्यापारी पत्रकारों के बीच कुछेक जो पत्रकारिता को बचाने की कोशिश में जुटे हुए हैं, खुद उनके ही बचने पर अब संदेह के बादल अक्सर उमड़ते-घुमड़ते नजर आते हैं।

कई दिग्गज पत्रकार देने वाले राजधानी लखनऊ में ही अब पत्रकार की खाल में छिपे धंधेबाजों को पहचाना बहुत मुश्किल नहीं लगता। मीडिया में आए नए छोरों को नैतिकता और ईमानदारी की चासनी में लपेटकर पत्रकारिता का पाठ पढ़ाने-समझाने वाले वरिष्ठ यानी पुरनिया पत्रकार खुद कितने अनैतिक एवं बेईमान हैं, इसका खुलासा दृष्टांत की खोजी पड़ताल में दिखी। पत्रकारों के नए पौध को सीख देने वाले मठाधीश कितने बेईमान हैं, इसकी बानगी तब दिखने लगती है, जब कुछ चुनिंदा पत्रकारों के क्रियाकलापों के पन्ने खुलने शुरू होते हैं। हर पन्ना मठाधीशों के स्याह पत्रकारिता और उनके अनैतिक कर्मों को चीख-चीख कर बताता है। खबरिया चैनल से लेकर अखबारों-मैगजीनों, चौपतिया अखबारों से जुड़े पत्रकारों ने पत्रकारिता की कीमत पर जमकर माल बनाया। सरकार की चरण वन्दना कर जमकर अनैतिक लाभ उठाया।

जानकर हैरत होगी कि कोई करोड़ों की लागत से बने आलीशान मकान-कार्यालय का मालिक है तो कोई बेशकीमती कारों और अथाह जमीन-जायदाद का। कोई फार्म हाउस का मालिक बना बैठा है तो किसी के पास कईएक मकान हैं। ये सारा कुछ पत्रकार की हैसियत से कमाया गया है। बड़ा सवाल यह है कि ऐसे पत्रकारों को मीडिया घराने के मालिकान कितना वेतन देते हैं, जिससे उनके पास चन्द वर्षों में ही करोड़ों की सम्पत्ति इकट्ठा हो जाती है, आय से अधिक सम्पत्ति मामले में दूसरों की बखिया उधेड़ने वाले ऐसे पत्रकारों पर न तो ईडी की नजर जाती है और न ही आयकर विभाग वालों की। ना ही कोई संस्था नैतिकता के नाम पर अनैतिकता के घोड़े दौड़ा रहे इन कथित पत्रकारों के बेतहाशा आय का स्रोत जानने की कोशिश करती है।

पूर्ववर्ती सरकारों ने मीडिया को पालतू बनाने के उद्देश्य से एक योजना की शुरुआत की। इस योजना के तहत तत्कालीन मुख्यमंत्री ने अपने विशेषाधिकार का प्रयोग करते हुए बिना किसी नियम के पत्रकारों को रियायती दरों पर मकान और जमीनें दिए जाने की घोषणा कर दी। जमीनों पर निर्माण के लिए रियायती दरों पर लोन सुविधा की भी व्यवस्था की गयी थी। योजना की घोषणा होते ही ऐसे कई तथाकथित वरिष्ठ पत्रकार सुविधा का लाभ लेने के लिए ऐसे टूट पडे़, मानो भिखारियों की भीड़ मन्दिरों के आस-पास मुफ्त में भोजन पाने के लिए टूट पड़ी हो। पूर्व मुख्यमंत्री की ‘दया दान’ का लाभ लेने के लिए वरिष्ठों की भीड़ में कई ऐसे चेहरे भी शामिल थे जो अपने जूनियर को पत्रकार और पत्रकारिता की गरिमा से समझौता न करने की सलाह देते रहते थे। कहने में कतई गुरेज नहीं कि पूंछ उठते ही हकीकत खुद-ब-खुद सामने आ गयी।

उस वक्त तथाकथित वरिष्ठों में एक भी चेहरा ऐसा नहीं निकला जिसने पत्रकारों के स्वाभिमान को बचाने की गरज से विरोध की पहल की हो। हर कोई अपने-अपने स्तर से अधिक से अधिक लाभ अर्जित करने के तरीके खोजता नजर आया। ये अलग बात है कि जिन्हें ‘दया दान’ का लाभ नहीं मिल सका वे तत्कालीन मुख्यमंत्री को पानी पी-पीकर कोसते रहे, जिन्हें भिक्षावृत्ति मिल गयी उनके चेहरों पर एक कुटिल मुस्कान साफ देखी जा सकती थी। पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के फेंके गए टुकड़ों का असर यह हुआ कि लगभग एक दशक बाद भी मीडिया के क्षेत्र से जुडे़ वरिष्ठ कहलाए जाने वाले तथाकथित पत्रकार (जिन्होंने लाभ लिया) समाजवादी पार्टी के लिए स्वामिभक्त बने हुए हैं। मौजूदा समय में भी जब-जब मुलायम सिंह यादव की प्रेस कांफ्रेंस होती है ‘दान की बछिया’ की पूंछ पकड़ने वाले कथित पत्रकार पार्टी और सरकार के खिलाफ उनसे सवाल पूछने की हिम्मत नहीं करते। यदि कोई दूसरा पत्रकार ऐसा करता भी है तो वरिष्ठों के नाम पर कलंक बने पत्रकारों का एक गुट ऐसे पत्रकारों के बोलने पर ही रोक लगा देता है।

पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने भी अपने पिता के पदचिन्हों का पूरी तरह से पालन किया। जिस वक्त न्यायपालिका ने पूर्व मुख्यमंत्रियों से सरकारी आवास खाली करवाने का आदेश जारी किया, उस वक्त अखिलेश यादव ने न सिर्फ पूर्व मुख्यमंत्रियों के बंगले बचाने के लिए नया एक्ट बनाकर कोर्ट को चुनोती देने की कोशिश की बल्कि पत्रकारों को भी आश्वस्त कर दिया गया कि उनसे उनके सरकारी आवास नहीं छीने जायेंगे। इतना ही नहीं अखिलेश यादव ने भी पत्रकारों को अपना पालतू बनाने के उद्देश्य से कई पत्रकारों के कटोरे में दक्षिणा स्वरूप रियायती दरों पर मकान-जमीनें दिए जाने की घोषणा की। मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की तरफ उम्मीद भरी नजरों से देख रहे पत्रकार घोषणा होते ही खुशी से दुम हिलाने लगे।

यह दीगर बात है कि वायदा पूरा करने से पहले ही अखिलेश सरकार सत्ता से बाहर हो गयी। गौरतलब है कि (अगस्त 2016) जन्माष्टमी वाले दिन पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने राजधानी लखनऊ के चुनिन्दा पत्रकारों को भोज पर बुलाया था, लेकिन जोड़-जुगाड़ लगाकर पत्रकारों की संख्या 600 का भी आंकड़ा पार कर गयी थी, इसके बावजूद पूर्व मुख्यमंत्री ने किसी पत्रकार को निराश नहीं किया गया। सभी को सुविधा का लाभ दिए जाने की बात कही गयी।

वर्तमान योगी आदित्यनाथ की सरकार में भी स्थिति कुछ ऐसी ही है। हालांकि शुरुआती दौर में स्पष्ट रूप से कहा गया था कि जिन पत्रकारों ने योग्यता न होने के बावजूद सरकारी भवनों पर कब्जा जमा रखा है, उनसे मकान खाली करवा लिए जायेंगे लेकिन हाल ही में योगी सरकार की तरफ से आश्वासन मिला है कि पत्रकारों से सरकारी आवास खाली नहीं करवाए जायेंगे। इतना ही नहीं योगी सरकार भी कुछ पत्रकारों को लेकर एक बार फिर से पुरानी सरकार की परम्परा दोहरा रही है। योगी सरकार ने भी हाल ही में राजधानी लखनऊ के हजारों पत्रकारों में से लगभग चार दर्जन पत्रकारों को सरकार का पालतू बनाने के लिए चारा फेंका है। इस बात के संकेत 13 जुलाई 2017 को ही मिल गए थे जब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भोज में चुनिन्दा पत्रकारों को न्यौता दिया। हालांकि योगी सरकार के इस सौतेलेपन को लेकर सैकड़ों पत्रकारों के बीच निराशा के साथ ही विरोध के स्वर भी उठ रहे हैं, लेकिन पानी में रहकर मगरमच्छ से बैर कोई नहीं लेना चाहता। हर किसी को अखबार की आड़ में अपना धंधा चलाने के लिए सरकारी विज्ञापन की उम्मीद रहती है लिहाजा योगी सरकार में भी पाबन्दी के बावजूद चार पन्नों का अखबार चलाने वाले सरकार के विरोध की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं।

वैसे तो मुलायम सिंह यादव के कार्यकाल में अनैतिक रूप से लाभ पाने वाले सरकार के स्वामीभक्त पत्रकारों की सूची काफी लम्बी है, लेकिन कुछ पत्रकार ऐसे हैं जिन्होंने बड़े मीडिया संस्थान के नाम पर कई-कई बार लाभ लिया। कुछ तो ऐसे भी हैं जिन्होंने रियायती दरों पर एक से अधिक जमीन-मकान तो लिया ही साथ ही राजधानी लखनऊ के विभिन्न क्षेत्रों में बेशकीमती जमीनें भी कौड़ियों के भाव बटोर लीं। वरिष्ठ पत्रकारों की शक्ल में ऐसे कथित लुटेरों का साथ तत्कालीन सरकार ने भी दिया। कुछ पत्रकारों ने तो पूर्व सरकार के कुछ मंत्रियों का सहारा लेकर किसानों की बेशकीमती जमीन कौड़ियों के भाव खरीदने में स्थानीय प्रशासन से लेकर गुण्डों तक की मदद ली। आय से अधिक सम्पत्ति जुटाने वाले ऐसे ही पत्रकारों की फेहरिस्त में खबरिया चैनल के एक वरिष्ठ पत्रकार कमाल खान का नाम प्रमुखता से लिया जाता है।

कमाल खान ने तत्कालीन मुलायम सिंह यादव की सरकार के कार्यकाल में रियायती दरों पर विराज खण्ड, गोमती नगर और विकल्प खण्ड, गोमती नगर में (भवन संख्या 1/97 विराज खण्ड और 1/315 विकल्प खण्ड) दो भूखण्ड हथियाये जबकि तत्कालीन सरकार ने राज्य मुख्यालय से मान्यता प्राप्त एक पत्रकार को मात्र एक ही भूखण्ड आवंटित किए जाने की व्यवस्था की थी। तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने यह व्यवस्था इसलिए की थी कि ताकि सरकारी आवासों में रह रहे पत्रकार सरकारी आवास खाली करके रियायती दरों पर मिले प्लाट में मकान बनवाकर अध्यासित हो जाएं और लाइन में लगे जरूरतमंद सरकारी कर्मचारियों को सरकारी मकान आवंटित किये जा सकें, लेकिन समाजवादी टुकड़ों का स्वाद लेने वाले पत्रकार दगाबाज निकले। सरकार से रियायती दरों पर तो भूखण्ड लिए ही साथ ही सरकारी भवनों का लोभ भी नहीं छोड़ा। ऐसे पत्रकारों में से कमाल खान भी एक हैं। कमाल खान रियायती दरों पर दो-दो प्लाट का लाभ लेने के बाद भी बटलर पैलेस के सरकारी आवास पर कब्जा जमाए हुए हैं।

नियमानुसार देखा जाए तो सरकारी टुकड़ों पर भी खबरिया चैनलों में काम करने वाले कमाल खान जैसे पत्रकारों का हक नहीं है। इस बात का खुलासा विगत वर्ष प्रधानमंत्री को भेजे गए पत्र में हो चुका है। प्रकरण कुछ इस तरह से है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को दूरदर्शन में काम करने वाले पत्रकारों को लेकर एक पत्र लिखा गया था। उस पत्र को प्रधानमंत्री कार्यालय से संबंधित विभाग को उचित कार्रवाई के लिये भेजा गया। केन्द्रीय सरकार के प्रसार भारती से एक पत्र फेडरेशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष राधावल्लभ शारदा को प्राप्त हुआ। उस पत्र से स्पष्ट हो गया था कि दूरदर्शन में काम करने वाले पत्रकारों को द वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट 1955 के अनुसार पत्रकार नहीं माना गया इसलिये उनके वेतन आदि के बारे में विचार नहीं किया जा सकता।

वर्किंग जर्नलिस्ट एक्ट 1955 में स्पष्ट लिखा गया है कि न्यूज पेपर का मतलब मुद्रित समाचार पत्र। न्यूज पेपर एम्पलाई का अर्थ वर्किंग जर्नलिस्ट। वर्किंग जर्नलिस्ट का अर्थ, जो न्यूज पेपर में कार्यरत हो। उसमें संपादक, न्यूज एडीटर, सब एडीटर, फीचर राईटर, रिर्पोटर, कार्टूनिस्ट, न्यूज फोटोग्राफर और प्रूफ रीडर शामिल हैं। एक्ट में यह भी स्पष्ट है कि मैनेजमेंट अथवा एडमिनिस्ट्रेशन जैसे कार्य करने वाले वर्किंग जर्नलिस्ट की श्रेणी में नहीं आते। अब आइए इस बात का खुलासा भी हो जाए कि आखिरकार कमाल खान समेत उन तमाम खबरिया चैनलों के कथित पत्रकारों ने नियमों का उल्लंघन करते हुए सरकारी सुविधाएं कैसे ले लीं?

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लखनऊ से प्रकाशित चर्चित खोजी पत्रिका ‘दृष्टांत’ में यह स्टोरी मैग्जीन के प्रधान संपादक अनूप गुप्ता के नाम से छपी है. वहीं से साभार लेकर इसे भड़ास पर प्रकाशित किया गया है.

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अखिलेश यादव जी, कहां हैं हत्यारे?

मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का कार्यकाल लगभग समाप्ति के दौर में है। अगली सरकार के लिए जद्दोजहद अंतिम चरण मे है। अखिलेश यादव पूरे पांच वर्ष तक सूबे की सत्ता पर निष्कंटक राज करते रहे लेकिन इस दौरान उन्होंने एक बार भी डॉ. योगेन्द्र सिंह सचान हत्याकाण्ड को लेकर किए गए वायदों को याद करने की कोशिश नहीं की। बताना जरूरी है कि अखिलेश यादव ने (डॉ. सचान हत्याकाण्ड के दो दिन बाद 24 जून 2011) पत्रकारों के समक्ष डॉ. सचान की मौत को हत्या मानते हुए सीबीआई जांच की मांग की थी। डॉ. सचान के परिवार से भी वायदा किया था कि, उन्हें न्याय दिलाने के लिए किसी भी हद तक जाना पड़े, वे और उनकी समाजवादी पार्टी पीछे नहीं हटेगी। लगभग छह साल बाद की तस्वीर यह बताने के लिए काफी है कि अखिलेश यादव ने अपना वायदा पूरा नहीं किया। डॉ. सचान का परिवार पूरे पांच वर्ष तक मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से न्याय की आस लगाए बैठा रहा। शायद डॉ. सचान की आत्मा भी मुख्यमंत्री  से यही पूछ रही होगी कि, कहां हैं हत्यारे!!

भ्रष्ट अधिकारियों और अपराधियों से पटी यूपी में लगभग छह वर्ष पूर्व एक चर्चित हत्याकांड (डॉक्टर योगेन्द्र सिंह सचान) को अंजाम दिया गया। इस हत्याकांड को जिस सुनियोजित तरीके से अंजाम दिया गया, वह तो काबिले गौर है ही साथ ही जिस तरह से यूपी की सरकारों ने तमाम सुबूतों और जांच रिपोर्ट को नजरअंदाज करते हुए चंद दिनों में ही पूरे मामले को दफन कर दिया, वह किसी चमत्कार से कम नहीं। यहां तक कि निष्पक्ष जांच एजेंसी का दावा करने वाली सीबीआई की भूमिका कथित हत्यारों और कथित भ्रष्टों के तलवे चाटते नजर आयी। इस हत्याकांड को जिस तरह से अंजाम दिया गया और जिस तरह से दफन कर दिया गया, उससे इतना जरूर साबित हो जाता है कि यूपी के अपराधियों में यदि दम है तो बड़े से बड़ा मामला चंद दिनों में ही दफन किया जा सकता है।

गौरतलब है कि परिवार कल्याण विभाग के तत्कालीन मुख्य चिकित्साधिकारी बी.पी.सिंह की हत्या की साजिश रचने के आरोप में गिरफ्तार कर जेल भेजे गए तत्कालीन उप मुख्य चिकित्साधिकारी डॉ. योगेन्द्र सिंह सचान की जिला जेल अस्पताल में संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हो गयी थी। इस हत्याकांड में आरोपियों की फेहरिस्त तैयार होती उससे पहले ही हत्याकांड का पटाक्षेप कर दिया गया। इस हत्याकांड से जुड़े कई महत्वपूर्ण पहलू ऐसे थे जिन्हें कतई नजरअंदाज नहीं किया जा सकता था, फिर भी जिंदा मक्खी निगली गयी। आखिर वह कौन सी वजह थी, जिसने न्यायिक जांच रिपोर्ट तक को मानने से इनकार कर दिया? यदि न्यायिक जांच झूठी थी तो सरकार ने न्यायिक जांच अधिकारी राजेश उपाध्याय के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं की? गौरतलब है कि दंड प्रक्रिया संहिता में इस बात का प्राविधान है कि हिरासत में होने वाली मौत की जाँच अनिवार्य रूप से न्यायिक मजिस्ट्रेट द्वारा की जाएगी। दूसरी ओर यदि सीबीआई की रिपोर्ट में संदेह था तो दोबारा अधिकारी बदलकर जांच क्यों नहीं करवायी गयी? शरीर पर मौजूद गहरे घाव किस धारदार हथियार से बनाए गए थे? इसकी जांच को भी नजरअंदाज कर दिया गया। साफ जाहिर है कि अरबों के घोटाले में संलिप्त बड़ी मछलियों को बचाने के फेर में छोटी मछलियों को शिकार बनाया गया।

देश के सर्वाधिक चर्चित घोटालों में से एक एनआरएचएम घोटाले से जुडे़ डॉ योगेन्द्र सिंह सचान (उप मुख्य चिकित्साधिकारी) की लाश जिला कारागार (लखनऊ) के प्रथम तल पर स्थित निर्माणाधीन ऑपरेशन थिएटर के शौचालय में पायी जाती है। डॉ. सचान का शव कमोड सीट पर सिस्टन की ओर मुंह किए हुए था। सिर कमोड के सिस्टन पर टिका हुआ था। शरीर पर गहरे घाव थे, जिस वजह से उनका पूरा शरीर खून से लथपथ था। गले में बेल्ट का फंदा लगा हुआ था। दोनों पैर जमीन पर टिके हुए थे। मौका-ए-वारदात की पूरी तस्वीर यह साबित करने के लिए काफी थी कि डॉ. सचान ने आत्महत्या नहीं की बल्कि उनकी हत्या की गयी थी। जेल कर्मी भी दबी जुबान से हत्या के बाबत कानाफूसी करते रहे। पूरे जेल का माहौल ऐसा था, जैसे सभी को मालूम हो कि डॉ. सचान की हत्या किसने करवायी और किसने की?

डॉ. सचान की निर्मम हत्या किए जाने सम्बन्धी सारे सुबूत पुलिस और जांच एजेंसियों के पास थे, इसके बावजूद तत्कालीन बसपा सरकार के कार्यकाल में सरकार ने दावा किया कि डॉ. सचान ने जेल में आत्महत्या कर ली। उस वक्त भी यही सम्भावनाएं व्यक्त की जा रही थीं कि एनआरएचएम घोटाले से जुडे़ पुख्ता दस्तावेज डॉ. सचान के पास थे। यदि वे जीवित रहते और उन्हें जेल होती तो निश्चित तौर पर कई बडे़ नेताओं को जेल हो जाती। यहां तक कि पूर्व मुख्यमंत्री मायावती पर भी शिकंजा कसा जा सकता था। दूसरी ओर डॉ. सचान के परिजन सरकार के दावों से संतुष्ट नहीं थे, परिणामस्वरूप न्यायिक जांच शुरु की गयी। जांच का दायित्व (न्यायिक जांच अधिकारी, मुख्य न्यायिक मजिस्टेªट, लखनऊ) राजेश उपाध्याय को सौंपा गया। महज एक पखवारे में ही तमाम दस्तावेजों के साथ जांच रिपोर्ट शासन के पास भेज दी गयी। निष्पक्ष तरीके से अंजाम दी गयी जांच रिपोर्ट ने तत्कालीन सरकार के दावों की कलई खोल दी। जांच रिपोर्ट (11 जुलाई 2011) में डॉ. सचान की मौत को आत्महत्या नहीं बल्कि हत्या करार दिया गया। जांच रिपोर्ट पटल पर आते ही सत्ता के गलियारों में हड़कंप मच गया। लगने लगा था कि डॉ. सचान की मौत का रहस्य तो उजागर होगा ही साथ ही एनआरएचएम घोटाले से जुडे़ तमाम मगरमच्छ कानून के जाल में आ जायेंगे। तथाकथित दोषी लोगों के खिलाफ कार्रवाई होती इससे पहले ही सूबे में चुनाव का बिगुल बज गया। चुनाव नतीजों ने सूबे की सत्ता बदल दी। एनआरएचएम घोटाले की पृष्ठभूमि तैयार करने और डॉ. सचान हत्याकाण्ड पर लीपा-पोती करने वाली बसपा सरकार का पतन हो गया। बसपा की धुर-विरोधी  अखिलेश यादव की सरकार ने सूबे में कदम रखा तो विभागीय कर्मचारियों से लेकर सूबे के चिकित्सकों में घोटाले पर से पर्दा उठने की उम्मीद जागृत हुई। परिजनों की फरियाद पर मामले को सीबीआई के सुपुर्द किया गया।

डॉ. सचान हत्याकाण्ड से जुडे़ कथित हत्यारों और हत्या की साजिश में शामिल शातिरों के हाई-प्रोफाइल सम्पर्कों का इससे बड़ा उदाहरण और क्या हो सकता है कि तमाम सुबूतों और न्यायिक जांच को दर-किनार करते हुए सीबीआई ने निर्मम हत्याकांड केा आत्महत्या बताकर पूरे प्रकरण को ही दफन कर दिया। डॉ. सचान का परिवार चिल्लाता रहा कि डॉ. सचान दिमागी रूप से काफी मजबूत थे, वे आत्महत्या नहीं कर सकते, लेकिन सरकार ने एक नहीं सुनी। अन्ततः हैरतअंगेज तरीके से डॉ. सचान हत्याकांड से जुड़ी फाइल बंद कर दी गयी।

न्यायिक जांच के दौरान कई पहलू ऐसे नजर आए जो यह साबित करने के लिए काफी थे कि डॉ. सचान ने आत्महत्या नहीं बल्कि उनकी हत्या की गयी थी। इस चर्चित हत्याकांड में तत्कालीन मंत्री बाबू सिंह कुशवाहा और अनंत कुमार मिश्रा उर्फ अंटू मिश्रा का नाम विपक्ष ने जमकर उछाला। सड़क से लेकर संसद तक कथित आरोपी मंत्रियों के नाम उछाले गए। तत्कालीन बसपा सरकार और तत्पश्चात अखिलेश सरकार की बेशर्मी का इससे बड़ा उदाहरण और क्या हो सकता है कि उसने तमाम दस्तावेजों को नजरअंदाज करते हुए इस केस में रुचि दिखानी ही बंद कर दी। ऐसा प्रतीत हुआ, जैसे दोनों ही सरकारों ने कथित हत्यारों और लुटेरों को बचाने की ठान रखी हो।

उस वक्त विपक्षी पार्टियों ने आरोप लगाया था कि डॉ. सचान की मौत सरकार में गहरे तक जड़ें जमा चुके भ्रष्ट नेताओं और नौकरशाहों की साजिश का एक हिस्सा है। विपक्ष के आरोप पर सरकार की तरफ से तत्कालीन कैबिनेट सचिव शंशाक शेखर (अब स्वर्गीय) ने बचाव करते हुए कहा था कि विरोधी दल प्रदेश की जनता को गुमराह कर रहे हैं। सरकार पूरे मामले की गहनता से जांच करवा रही है। सही तथ्य जल्द ही आम जनता के समक्ष होंगे।

11 जुलाई 2011 को सौंपी गयी न्यायिक जांच रिपोर्ट और डॉ.सचान की पोस्टमार्टम रिपोर्ट में साफ लिखा था कि उनकी मौत गले में बेल्ट बंधने की वजह से नहीं बल्कि ज्यादा खून बहने से हुई थी। इतना ही नहीं लखनऊ जेल में वारदात के वक्त जेल में निरुद्ध एक कैदी के बयान ने सरकार की नीयत पर उंगली उठायी। कैदी का कहना था कि (सचान की हत्या के दिन) लखनऊ जेल में घटना वाले दिन जो हुआ, वह शायद इससे पहले कभी नहीं हुआ होगा। अमूमन जेल में शाम का खाना साढ़े छह बजे मिलता है घटना वाले दिन चार बजे ही खाना बांट दिया गया था। खाना समाप्त होते ही सारे कैदियों को वापस बैरकों में भेज दिया गया था। एक खबरिया चैनल में एक कैदी के बयान (जेल से रिहा होने के बाद) को आधार मानें तो, सबसे कहा गया था वे एक-दूसरे से बात नही करेंगे। इसके तुरन्त बाद ही पूरी जेल में शोर-शराबा शुरू हो गया। जोर-जोर से आवाजें आने लगी थीं कि मार दिया गया, मार दिया गया। हैरत की बात है कि सरकार की साजिश को उजागर करती इस रिपोर्ट की न तो सच्चाई जानने की कोशिश हुई और न ही उस कैदी से बयान लिए गए जिसने खबरिया चैनल में घटना का जिक्र किया था।

प्रारम्भिक जांच में डॉ. सचान के शरीर पर आठ स्थानों पर गंभीर चोट के निशान पाए गए थे। हाथ की नसें कटी हुई पायी गयी थीं। जांघ, गर्दन, छाती, कंधे और पेट पर जख्म के निशान पाए गए थे। डिप्टी जेलर सुनील कुमार सिंह और प्रधान बंदी रक्षक बाबू राम दुबे के बयान को भी संजीदगी से लेने के बजाए उनके बयान को झूठा करार दिया गया। इस सम्बन्ध में न्यायिक जांच रिपोर्ट कुछ और ही कहती है। न्यायिक जांच रिपोर्ट में जिला कारागार, लखनऊ के वरिष्ठ अधीक्षक से पूछताछ के आधार पर कहा गया है कि जिस डॉ. सचान की हत्या हुई थी, उस दिन तत्कालीन मजिस्टेªट जेल के अन्दर ही नहीं आए थे। जेल के अन्दर उनके पी.ए. आए थे। इस बात की पुष्टि जेल के फार्मासिस्ट संजय कुमार सिंह ने भी की थी। इन परिस्थितियों में डिप्टी जेलर और प्रधान बंदी रक्षक के झूठ बोलने का प्रश्न ही नहीं उठता। न्यायिक जांच के दौरान आत्महत्या से सम्बन्धित कोई नोट नहीं पाया गया। सामान्यतः यह देखने में आया है कि, शिक्षित व्यक्ति जब कभी आत्महत्या करता है तो कोई न कोई सुसाइड नोट अवश्य लिखता है लेकिन डॉ. सचान के मामले में ऐसा कुछ भी नहीं पाया गया। फोरेंसिंक मेडिसिन एवं टॉक्सीकोलॉजी विभाग (छत्रपति शाहूजी महाराज, चिकित्सा विश्वविद्यालय, लखनऊ में लेक्चरर) के डॉ. मौसमी ने भी अपने बयान में कहा था कि मृतक के शरीर में जितनी गहरी चोटें 8 स्थानों पर आयी हैं, इतनी गहरी चोटें आत्महत्या करने वाला कोई सामान्य व्यक्ति नहीं लगा सकता। मृतक स्वयं एक डॉक्टर था, एक डॉक्टर से आत्महत्या से पूर्व इतनी सारी गहरी चोटें लगाने की अपेक्षा नहीं की जा सकती। हैरत की बात है कि फोरेंसिक मेडिसन के चिकित्सक की रिपोर्ट को भी नजरअंदाज कर दिया गया। डॉ. मौसमी तो यहां तक कहते हैं कि दोनों हाथों की ब्लीडिंग प्वाइंट पर एक ही तरह की चोटें आयी हैं। इस तरह की चोटें अर्धविक्षिप्त व्यक्ति से भी करने की अपेक्षा नहीं की जा सकती।

इस सम्बन्ध में पोस्टमार्टम करने वाली टीम में शामिल डॉ. दुबे के बयान को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। डॉ. दुबे ने बयान दिया था कि मैंने इससे पहले लगभग 100 से ज्यादा पोस्टमार्टम किए होंगे लेकिन आज तक कोई भी केस ऐसा नहीं मिला जिसमें किसी आत्महत्या करने वाले ने अपने शरीर की इतनी सारी नसें काटी हों। डॉ. सचान की गर्दन पर लिंगेचर मार्क हत्या की पुष्टि के लिए काफी है। गर्दन पर ‘लिंगेचर मार्क’ मौत के बाद की चोट है। रिपोर्ट में कहा गया है कि चूंकि लिंगेचर मार्क मृत्यु के बाद का है, लिहाजा यह साबित हो जाता है कि डॉ. सचान की हत्या करने के बाद उसे आत्महत्या दिखाने की गरज से किसी अन्य व्यक्ति ने ही उनके गले में फंदा लगाया होगा।

इस आशंका को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है कि इस पूरे हत्याकांड को अंजाम देने में जेल प्रशासन ने महत्वपूर्ण भूमिका निभायी। पोस्टमार्टम के अनुसार डॉ. सचान की मौत 22 जून 2011 को सुबह 10 बजे के आस-पास हुई थी। जिला कारागार में नियमतः सुबह 6 बजे पहली गिनती होती है। उसके बाद रात 8 बजे तक चार बार बंदी रक्षकों की ड्यूटी बदलती है और हर बार कैदियों की गिनती की जाती है। घटना वाले दिन जेल प्रशासन यह तो कहता है कि गिनती के वक्त एक बंदी हर बार कम नजर आया लेकिन वह कौन था, इसके बारे में जानने की किसी ने कोशिश नहीं की, या फिर जान-बूझकर डॉ. सचान की अनुपस्थिति को नजरअंदाज किया जाता रहा। जांच के दौरान यह बात सामने आयी कि घटना वाले दिन सुबह साढे़ सात बजे एक सिपाही डॉ. सचान को रिमाण्ड के नाम पर अपने साथ ले गया था। आमतौर पर सिपाही जेल अस्पताल के भीतर आकर कैदियों को रिमाण्ड पर ले जाने के लिए पुकार लगाता है लेकिन डॉ. सचान को रिमाण्ड पर ले जाने के लिए जिस सिपाही ने पुकार लगायी थी, वह सिपाही अस्पताल गेट के बाहर ऐसे खड़ा था, जिसका चेहरा जेल अस्पताल में भर्ती किसी कैदी ने नहीं देखा।

गौरतलब है कि रिमाण्ड पर ले जाने से पूर्व बाकायदा लिखा-पढ़ी होती है। इस सम्बन्ध में जब न्यायिक जांच अधिकारी ने पर्ची के सम्बन्ध में पूछा तो कहा गया कि पर्ची प्रधान बंदी रक्षक बाबू राम दुबे के पास है। इस सम्बन्ध में प्रधान बंदी रक्षक बाबू राम दुबे (इनकी जिम्मेदारी कैदियों की प्रत्येक गणना के समक्ष अपनी उपस्थिति में ही करायी जाती है) ने न्यायिक जांच अधिकारी को जो बयान दिया वह बेहद चौंकाने वाला था। बकौल बाबू राम दुबे, ‘किसी ने अफवाह फैला दी है कि डॉ. सचान को अदालत रिमाण्ड पर भेजा गया है। जब मैं शाम 5 बजे आया, उस वक्त अफवाह फैल गयी थी कि डॉ. सचान अदालत गए हैं। बाबू राम दुबे के अनुसार घटना वाले दिन दोपहर करीब 11 बजे कैदियों की गिनती की गयी थी, उस वक्त सभी बंदी मौजूद थे। 11.30 बजे तक डॉ. सचान को तो उसने स्वयं जेल के अन्दर ही देखा था।

न्यायिक जांच अधिकारी का दावा है कि बाबू राम दुबे का यह बयान पूरी तरह झूठ पर आधारित था। बाबू राम दुबे ने बयान दिया था कि डॉ. सचान उसने जेल परिसर में ही देखा था जबकि पोस्टमार्टम रिपोर्ट के मुताबिक डॉ. सचान की मौत 10 बजे ही हो गयी थी। रही बात ड्यूटी की तो घटना वाले दिन सुबह 8 बजे से 12 बजे तक की ड्यूटी पर बंदी रक्षक पहीन्द्र सिंह तैनात था। साफ जाहिर है कि प्रधान बंदी रक्षक का बयान पूरी तरह से झूठ पर आधारित था।

डॉ. सचान को डायरी लिखने की आदत शुरू से ही थी। लखनऊ जेल में भी वे डायरी लिखते थे। मौत के बाद जब उनकी वस्तुओं को खंगाला गया तो उनकी डायरी मिली। डायरी का पहला पेज फटा हुआ था। इसी आधार पर पुलिस ने सचान का सुसाइड नोट मिलने का दावा किया था सुसाइड नोट डॉ. सचान के शव के पास से बरामद नहीं हुआ। पुलिस ने सुसाइड नोट के सन्दर्भ में बताया था कि इस नोट में सिर्फ इतना लिखा है कि मैं निर्दोष हूं और मेरी मौत के लिए किसी को जिम्मेदार न माना जाए। सुसाइड नोट पर सचान के दस्तखत न होने के कारण इसकी पुष्टि नहीं की जा सकी।

दूसरी ओर पत्नी का दावा है कि उनके पति की हत्या की गयी थी। गौरतलब है कि डॉ. सचान की पत्नी स्वयं एक चिकित्सक हैं। पोस्टमार्टम रिपोर्ट देखने के बाद उन्होंने दावे के साथ कहा था कि रिपोर्ट में अंकित चोटों और रिपोर्ट के आधार पर मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचती हूं कि यह हत्या का मामला है। मेरे और मेरे परिवार के किसी भी सदस्य को घटनास्थल नहंी दिखाया गया, जिससे हम लोग उनकी मृत्यु के सम्बन्ध में कोई निष्कर्ष निकाल सकते। डॉ. सचान की पत्नी ने न्यायिक जांच अधिकारी के समक्ष बयान दिया था कि उन्हें पूरा विश्वास है कि उनके पति ने आत्महत्या नहीं की बल्कि उनकी साजिशन हत्या की गयी है। घटना के अगले दिन उन्हें कोर्ट आना था, शायद कुछ लोगांे को आशंका हो गयी होगी कि कहीं उनका नाम न उजागर हो जाए, लिहाजा उनकी कोर्ट में पेशी से एक दिन पहले ही जेल में हत्या कर दी गयी। डॉ. योगेन्द्र सिंह सचान के बडे़ भाई डॉ. आर.के. सचान डॉ. राम मनोहर लोहिया अस्पताल में प्रमुख अधीक्षक के पद पर रह चुके हैं। न्यायिक जांच अधिकारी को दिए गए बयान में उन्होंने दावे के साथ कहा है कि मेरे भाई डॉ. योगेन्द्र सिंह सचान की हत्या की गयी है, उसने आत्महत्या नहीं की। मैं किसी व्यक्ति विशेष का नाम नहीं ले सकता, परन्तु विभाग में बैठे उच्च लोगों का हाथ हो सकता है। इन लोगों में उच्च अधिकारी से लेकर सम्बन्धित विभाग के मंत्री भी हो सकते हैं। डॉ. योगेन्द्र की किसी से व्यक्तिगत दुश्मनी नहीं थी, उनकी हत्या का कारण विभाग का पैसा हो सकता है। डॉ. योगेन्द्र के बड़े भाई का यह बयान तत्कालीन सरकार के जिम्मेदार लोगों की तरफ इशारा करता रहा लेकिन बसपा की धुर-विरोधी सपा सरकार ने भी पूरे पांच वर्ष तक मामले के वास्तविक दोषी लोगों के खिलाफ कार्रवाई करने की हिम्मत नहीं जुटायी।

हत्या को आत्महत्या का अमली जामा पहनाने में गोसाईंगज (लखनऊ) पुलिस ने भी पूरी कोशिश की। कारागार में रात्रि आठ बजे डॉ. सचान की लाश मिलती है। तत्काल घटना की सूचना शीर्ष अधिकारियों को दे दी जाती है। वायरलेस पर मैसेज भेजने में डेढ़ घंटे का समय लगाया जाता है। वायरलेस पर सूचना मिलते ही गोसाईंगज पुलिस रात्रि लगभग दस बजे जेल परिसर में पहुंचती है। चूंकि रात काफी हो गयी थी और जेल के टॉयलेट में पर्याप्त रोशनी की व्यवस्था नहीं थी लिहाजा टार्च की रोशनी और ड्रैगेन लाइट से लाश का मुआयना किया जाता है। रोशनी पर्याप्त न होने का हवाला देते हुए फ्रिंगर प्रिंट भी नहीं लिया जाता। फोटोग्राफी जरूर की जाती है। गोसाईगंज पुलिस घटना वाले स्थान को सील कर अगले दिन आने की बात करती है, इसी बीच डिप्टी जेलर सुनील कुमार सिंह के कहने पर पुलिस टॉयलेट में दोबारा सर्च करती है। हैरत की बात है तो चन्द मिनट पहले तक पर्याप्त रोशनी न होने का बहाना कर पुलिस अगले दिन आने की बात करती है, वहीं डिप्टी जेलर के कहने पर सर्च के दौरान उसे डेªनेज के अन्दर से शेविंग करने वाला आधा ब्लेड उसे मिल जाता है। उस ब्लेड के एक तरफ खून लगा था जबकि दूसरी तरफ खून नहीं था। इसके अलावा मौके से कोई अन्य वस्तु नहीं मिली जो यह साबित कर सके कि उसी हथियार से डॉ. सचान ने आत्महत्या की होगी। गौरतलब है कि छत्रपति शाहू जी महाराज चिकित्सा विश्वविद्यालय, लखनऊ की ओर से फोरेेंसिक विशेषज्ञों ने शपथ पत्र में लिखा है, ‘‘डॉ. सचान के शरीर पर 8 चोटें किसी शार्प वेपैन से आयी हैं और एक लिंगेचर मार्क हैं। लिंगेचर मार्क को मरने के बाद की चोट बतायी गयी। यह भी दावा किया गया कि जिस धारदार हथियार से डॉ. सचान को चोटें आयी हैं, वह धारदार हथियार भारी होगा, क्योंकि घाव पर इकीमॉसिस मौजूद थे। इसका मतलब है कि चोट किसी भारी धारदार हथियार से पहुंचायी गयी थीं, दाढ़ी बनाने वाले ब्लेड से चोटें नहीं पहुंचायी जा सकती थीं’’। फोरेंसिक विशेषज्ञों की रिपोर्ट के बाद पुलिस को मिले ब्लेड (दाढ़ी बनाने वाला) का कोई महत्व नहीं रह जाता। तहसीलदार (मोहनलालगंज) जितेन्द्र कुमार श्रीवास्तव ने भी अपने शपथ पत्र में कहा है कि उनकी उपस्थिति में घटना स्थल से कोई भी धारदार हथियार नहीं मिला।

इस हाई-प्रोफाइल हत्याकांड में न्यायिक जांच रिपोर्ट के बाद जेलर बी.एस.मुकुन्द, डिप्टी जेलर सुनील कुमार सिंह, प्रधान बंदी रक्षक बाबू राम दुबे और बंदी रक्षक पहीन्द्र सिंह की भूमिका संदिग्ध बतायी गयी थी। हैरत की बात है कि न्यायिक जांच रिपोर्ट के बाद भी नामजद कथित दोषियों को पर्याप्त सजा नहीं दी गयी। कहा तो यहां तक जा रहा है कि यदि किसी एक को सजा मिलती तो निश्चित तौर पर पूरा मामला स्वेटर के धागे की तरह खुलता चला जाता। यहां तक कि तत्कालीन मुख्यमंत्री और तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री अनंत कुमार मिश्रा उर्फ अंटू मिश्रा समेत कई मंत्री-विधायक सलाखों के पीछे नजर आते। यहां तक कि कई सफेदपोश नौकरशाह भी गिरफ्त में होते।

यूपी की राजधानी लखनऊ की अति सुरक्षित मानी जाने वाली जिला जेल में एक हाई-प्रोफाइल हत्याकांड को अंजाम दिया जाता है। हत्यारे हत्या करने के बाद पटल से गायब हो जाते हैं। चूंकि मामला हाई-प्रोफाइल एनआरएचएम के घोटालेबाजों से जुड़ा हुआ था लिहाजा तत्कालीन बसपा सरकार ने चन्द दिनों में ही हाई-प्रोफाइल हत्याकांड को आत्महत्या में तब्दील करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। बिना जांच किए सरकार की तरफ से आधिकारिक जानकारी भी दे दी गयी कि डिप्टी सीएमओ ने आत्महत्या कर ली। चिकित्सक का परिवार आत्महत्या की बात मानने को कतई तैयार नहीं था। चूंकि अभिरक्षा में कैदी की मौत होने पर न्यायिक जांच की प्रक्रिया है, लिहाजा जांच हुई। रिपोर्ट शासन के पास आयी तो सभी का चौंकना स्वाभाविक था। न्यायिक जांच में डिप्टी सीएमओ की मौत को तमाम सुबूतों के साथ हत्या करार दिया गया। इसके बाद मामले की जांच सीबीआई से करवायी गयी। कथित हत्यारों की पहुंच का अंदाजा यहीं से लगाया जा सकता कि तमाम सुबूतों और न्यायिक जांच रिपोर्ट के बावजूद सीबीआई ने डिप्टी सीएमओ की मौत को आत्महत्या में तब्दील कर दिया। स्थिति यह है कि जिन्हें जेल में होना चाहिए था, वे आराम फरमा रहे हैं, जिनके नाम शक के आधार पर दर्ज किए गए थे वे आज भी कोर्ट-कचहरी के चक्कर लगा रहे हैं।

आगे है…

अदालत ने भी माना हत्या

क्या कहती है सीबीआई की क्लोजर रिपोर्ट?

क्या है एनआरएचएम घोटाला…?

हत्याकांड पर अखिलेश सरकार की रहस्यमयी चुप्पी

डॉ. योगेन्द्र सचान के बेटे का दावा

बलि का बकरा बने डॉ. शुक्ला-सचान!

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‘दृष्टांत’ मैग्जीन में प्रकाशित हुई मुलायम खानदान की अकूत संपत्ति पर कवर स्टोरी

लखनऊ से अनूप गुप्ता के संपादकत्व में निकलने वाली चर्चित मैग्जीन दृष्टांत में जो कवर स्टोरी है, वह पठनीय तो है ही, आंख खोल देने वाली भी है. जिस अखिलेश यादव के ढेर सारे लोग प्रशंसक हैं और उनमें जाने कौन कौन से गुण देखते हैं, उसी के शासनकाल में जो लूटराज अबाध निर्बाध गति से चला है, वह हैरतअंगेज है. अब जबकि चुनाव में चार दिन शेष रह गए हैं तो सब के सब पवित्र और पुण्यात्मा बन सत्ता व संगठन के लिए मार कर रहे हैं ताकि जनता मूल मुद्दों से भटक कर इनमें उनमें नायकत्व तलाशे. नीचे पूरी कवर स्टोरी है ताकि आप सबकी समझदानी में लगा झाला खत्म हो सके.

-यशवंत, एडिटर, भड़ास4मीडिया

उत्तर प्रदेश का लूटकाल

अनूप गुप्ता

लगभग ढाई दशकों से तथाकथित अंगूठा छाप नेता परियोजनाओं की आड़ में यूपी का खजाना लूटते रहे। जिन नौकरशाहों के हाथ में लूट को रोकने की जिम्मेदारी थी, वे भी लूट की बहती गंगा में हाथ धोते रहे। परिणामस्वरूप जनता की गाढ़ी कमाई से भरा सरकारी खजाना खाली होता चला गया और नौकरशाहों से लेकर खादीधारियों के निजी खजाने लबालब होते चले गए। सूबे का विकास केन्द्रीय सरकारों की भीख पर निर्भर होने लगा तो दूसरी ओर नेताओं के पास अकूत धन-सम्पदा इकट्ठी होती चली गयी।

जिनकी हैसियत चार पहिया वाहन खरीदने तक की नहीं थी, अब उन्हीं के बेटे, नाती-पोते, बहू-बेटियों और पत्नी के पास लग्जरी कारों का काफिला है और वह भी चन्द वर्षों में। जो लखपति थे वे अरबपति हो गए और जो करोड़पति थे उनके पास इतनी दौलत इकट्ठा हो गयी कि उन्हें खुद ही नहीं मालूम कि वे कितनी दौलत के मालिक हैं। हैरत तो इस बात की है कि एक चुनाव से दूसरे चुनाव (अधिकतम पांच वर्ष) में चुनाव आयोग को सौंपे गए हलफनामे में उनकी सम्पत्ति आश्चर्यजनक तरीके से कई गुना बढ़ती रही और वह भी बिना किसी उद्योग धंधे के। जनता की गाढ़ी कमाई से भरे सरकारी खजाने लूटने वाले सफेदपोशों की लम्बी फेहरिस्त है। कुछ ऐसे हैं जिन्होंने अल्प समय में आश्चर्यजनक तरीके से दौलत इकट्ठा कर ली कि उनका कथित भ्रष्ट चेहरा आम जनता के सामने आ गया।

सरकार खजाने पर हाथ साफ कर अपना घर भरने वालों में एक चर्चित नाम मुलायम सिंह यादव और उनके परिवार का है। व्यवसाय के रूप में सिर्फ खेती दर्शाने वाला मुलायम परिवार मौजूदा समय में अरबों की धन-सम्पदा के मालिक हैं। आय से अधिक सम्पत्ति को लेकर उनके खिलाफ जनहित याचिका भी दायर की जा चुकी है। मामला सुप्रीम कोर्ट और सीबीआई तक भी पहुंचा। जांच के बाद सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित करने का दावा किया तो दूसरी ओर सीबीआई ने भी जांच के उपरांत रिपोर्ट तैयार कर लेने का दावा किया। रिपोर्ट तैयार हुए वर्षों बीत गए लेकिन न तो सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में कोई रुचि दिखायी और न ही सीबीआई ने। हाल ही में दैनिक समाचार पत्रों में एक खबर प्रकाशित हुई कि, ’सुप्रीम कोर्ट ने मुलायम और उनके परिवार के खिलाफ आय से अधिक सम्पत्ति के मामले में सीबीआई जांच की अर्जी खारिज कर दी‘। हैरत इस बात की है कि सीबीआई तो काफी पहले ही अपनी जांच पूरी कर चार्जशीट तैयार करके बैठा है। उसे इंतजार है तो सिफ केन्द्र सरकार की तरफ से इशारे का। जिस दिन केन्द्र सरकार ने सीबीआई को इजाजत दे दी उसी दिन मुलायम एवं उनके परिवार का भविष्य तय हो जायेगा।

पिछले दिनों प्रिंट मीडिया और इलेक्ट्रानिक मीडिया में एक खबर प्रसारित-प्रकाशित हुई। अखबारों और खबरिया चैनलों ने दावा किया कि सुप्रीम कोर्ट ने मुलायम सिंह यादव एवं उनके परिवार के खिलाफ आय से अधिक सम्पत्ति के मामले में सीबीआई जांच की अर्जी खारिज कर दी। बाकायदा मुलायम की फोटो के साथ खबर को प्राथमिकता दी गयी। इस बात की जानकारी जब वर्ष 2005 से लेकर अब तक न्याय की लड़ाई लड़ रहे पीआईएल दाखिल करने वाले अधिवक्ता विश्वनाथ चतुर्वेदी को हुई तो उन्होंने आनन-फानन में सोशल साइट्स पर मीडिया के झूठ का खुलासा किया। बकायदा कोर्ट के नवीनतम आदेश की काॅपी भी सोशल साइट्स पर डाली ताकि तथाकथित समाजवादियों की छवि को फर्जी ढंग से सुधारने में लगे लोगों के चेहरों पर से नकाब उतारी जा सके। अधिवक्ता विश्वनाथ चतुर्वेदी ने सोशल साइट्स पर जो लिखा, कुछ इस तरह से है- ‘‘कुछ भांड़-भड़ुए, दलाल मीडिया वालों द्वारा झूठी अफवाह फैलायी जा रही है कि सीबीआई जाँच की अर्जी खारिज कर दी गयी। कोर्ट आर्डर सहित प्रेषित कर रहा हूँ! मुलायम, अखिलेश, प्रतीक के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर चल रही जाँच जारी है। साथ ही कोर्ट ने दसूरी याचिका फाइल करने की अनुमति दी है। जल्द ही दूसरी याचिका फाइल करूंगा।’’

सोशल साइट् पर दस्तावेजों के साथ डाली गयी पोस्ट भी सभी मीडिया कर्मियों ने पढ़ी और देखी होगी। चर्चा भी हुई होगी। हैरत इस बात की है कि पीआईएल दाखिल करने वाले ने दस्तावेजों के साथ अफवाहों का खण्डन किया लेकिन किसी मीडियाकर्मी ने मुलायम और उनके परिवार के खिलाफ सच्चाई लिखने की हिम्मत नहीं जुटायी। आखिर ऐसा क्या हुआ कि मीडिया की तीसरी आंख मुलायम की खिलाफत से सम्बन्धित दस्तावेजों को अनदेखा कर गयी? जानते सभी हैं लेकिन लिखने और दिखाने की हिम्मत शायद किसी में नहीं है। सभी चुनाव के दौरान लाखों-करोड़ों के विज्ञापन बटोरने की आस लगाकर बैठे हैं।

पिछले दिनों आय से अधिक सम्पत्ति के मामले में जनहित याचिका दायर करने वाले अधिवक्ता विश्वनाथ चतुर्वेदी से ‘दृष्टांत’ की दूरभाष पर वार्ता हुई। श्री चतुर्वेदी की मानें तो वे कोर्ट के उस फैसले को भी चुनौती देंगे जिसमें वर्ष 2012 में वर्तमान मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की पत्नी डिम्पल यादव को सीबीआई जांच से यह कहकर बाहर कर दिया था कि डिम्पल यादव किसी लाभ के पद पर नहीं हैं लिहाजा वे जांच के दायरे में नहीं आतीं। विश्वनाथ चतुर्वेदी कहते हैं कि यह असंवैधानिक फैसला न्यायालय द्वारा दिया गया था। आय से अधिक सम्पत्ति मामले में यदि परिवार के सदस्यों (बहू) को बाहर कर दिया जाएगा तो शायद देश में आय से अधिक सम्पत्ति का मामला किसी पर बनेगा ही नही। जब श्री चतुर्वेदी के वकील ने कोर्ट से यह जानकारी हासिल की कि सीबीआइ की जाँच अब तक कहाँ पहुँची? इस सवाल पर न्यायालय ने दूसरी याचिका फाइल करने को कहा है। यदि देखा जाए तो कानूनी रूप से किसी मुकदमे को कोर्ट ही बंद कर सकती है।

गौरतलब है कि लगभग एक दशक बाद तक सीबीआई ने कोर्ट को कोई रिपोर्ट नहीं सौंपी है। जब रिपोर्ट की काॅपी ही कोर्ट को नहीं सौंपी गयी है तो कोर्ट इस अधूरे मामले को अपने स्तर से कैसे बंद कर सकती है? यहां तक कि सीबीआई ने जांच रिपोर्ट की काॅपी याचिकाकर्ता को भी उलपब्ध नहीं करवायी है। अभी हाल ही में 19 सितम्बर 2016 को इस मामले की सुनवाई हुई है। हैरत की बात यह है कि सारी सच्चाई और दस्तावेजों के बावजूद मीडिया कर्मियों को यह खबर कहां से मिल गयी कि सुप्रीम कोर्ट ने मुलायम एवं उनके परिवार के खिलाफ सीबीआई जांच की अर्जी खारिज कर दी। साफ जाहिर है कि पिछले ढाई दशकों से यूपी को बुरी तरह से लूट रहे सफेदपोशों को बचाने में मीडिया दलालों की भूमिका निभा रहा है। सर्वोच्च न्यायालय के सख्त आदेशों के बावजूद पेड न्यूज का धंधा अपने चरम पर है। उसका जीता-जागता उदाहरण सबके सामने है।

लगभग एक दशक पूर्व वर्ष 2005 में विश्वनाथ चतुर्वेदी ने तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव और उनके कुटुम्ब के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की थी। याचिका में मुलायम की लूट का कच्चा चिट्ठा खोला गया था। दस्तावेजों के साथ याचिका में स्पष्ट लिखा गया था कि 1977 में जब मुलायम सिंह यादव उत्तर प्रदेश में पहली बार मंत्री बने थे, तब से लेकर वर्ष 2005 तक तकरीबन 28 वर्षों में उनकी सम्पत्ति में 100 गुना वृद्धि हुई है। मुलायम और उनके परिजनों ने यह सम्पत्ति कहां से और कैसे इकट्ठा की है? इसकी जांच होनी चाहिए। उस वक्त समाजवादी पार्टी की तरफ से यह प्रचारित किया गया कि विश्वनाथ चतुर्वेदी कांग्रेस पार्टी के सदस्य हैं। राजनैतिक द्वेष के कारण ही ऐसा किया जा रहा है। इस पर विश्वनाथ चतुर्वेदी ने कोर्ट में अर्जी देकर स्पष्ट किया था कि वह किसी राजनीतिक दल से सम्बन्ध नहीं रखते बल्कि वह पेशे से पत्रकार हैं। समाज के प्रति उसकी जिम्मेदारी बनती है कि आम जनता के धन को लूटे जाने का वह हर तरह से विरोध करें। मुलायम एवं परिवार के समक्ष कोई विकल्प निकलता न देखकर वर्ष 2005 में डाली गयी याचिका के जवाब में मुलायम सिंह यादव और उनके परिवार की तरफ से सुप्रीम कोर्ट में 1 मार्च 2007 को आए सीबीआई जांच के फैसले के खिलाफ पुनर्विचार याचिका डाली गयी थी। लगभग पांच वर्ष तक सुनवाई के बाद वर्ष 2012 में सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई जांच पर रोक लगाने से तो इनकार कर दिया था लेकिन मुलायम सिंह यादव की बहू डिंपल यादव को जांच के दायरे से यह कहकर बाहर कर दिया था, ‘जिस वक्त का यह मामला है उस वक्त वे सार्वजनिक पद पर नहीं थीं लिहाजा उनके खिलाफ सीबीआई जांच नहीं की जा सकती।’

महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि जब डिंपल यादव किसी पद पर नहीं थीं तो उनके पास आय से अधिक धन कैसे जमा हो गया? आयकर विभाग ने इस मामले को संज्ञान में क्यों नहीं लिया? क्या इसकी जांच नहीं होनी चाहिए कि जब डिंपल के पास आय का कोई स्रोत नहीं था फिर उनके पास करोड़ों की सम्पत्ति कैसे इकट्ठा हो गयी? इस सम्बन्ध में पीआईएल दायर करने वाले विश्वनाथ चतुर्वेदी का कहना है कि यदि न्यायपालिका इसी तरह से तथाकथित भ्रष्ट लोगों की पत्नी को राहत देती रही तो ऐसे में किसी भी भ्रष्टाचारी को सजा नहीं मिल पायेगी। भविष्य में भी लोग अनाधिकृत रूप से कमाए गए धन को अपनी पत्नी के नाम ट्रांसफर कर चैन की सांस लेंगे।

गौरतलब है कि भारत के मुख्य न्यायाधीश रहे अल्तमश कबीर ने मुलायम और उनके कुनबे के खिलाफ आय से अधिक सम्पत्ति के मामले को वर्ष 2006 से 2012 तक सुना। विश्वनाथ चतुर्वेदी की याचिका पर सवा साल में ही सुनवाई पूरी कर सीबीआई जांच के आदेश भी दे दिए गए थे। लगने लगा था कि जल्द ही मुलायम और उनका कुनबा सलाखों के पीछे नजर आयेगा लेकिन मुलायम कुनबे ने बचने की गरज से पुनर्विचार याचिका दाखिल कर दी। उस याचिका की ओपन कोर्ट में जो सुनवाई शुरू हुई वह 5 वर्षों तक अनवरत चलती रही। लगभग पांच वर्ष पूर्व ही 17 फरवरी 2011 को पुनर्विचार याचिका पर फैसला भी रिजर्व हो गया था। बस फैसला सुनाना भर शेष था। सपा विरोधी दलों में बेचैनी से फैसले का इंतजार हो रहा था। सभी को उम्मीद थी कि याचिका के साथ जो पुख्ता दस्तावेज लगाए हैं वे मुलायम और उनके कुनबे को सलाखों के पीछे ले जाने के लिए काफी हैं। सूबे की आम जनता से लेकर सपा विरोधी दल इंतजार करते रह गए इसी दौरान मुलायम सिंह यादव के वकील व समाजवादी पार्टी के राज्यसभा सांसद रहे वीरेन्द्र स्वरूप भाटिया की बरसी में भारत के मुख्य न्यायाधीश रहे अल्तमश कबीर सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव और अखिलेश यादव के साथ मंच पर एक साथ विराजमान नजर आये। किसी को उम्मीद नहीं थी लेकिन घटना अप्रत्याशित थी।

वैसे तो न्यायाधीश अल्तमश कबीर को नैतिकता के आधार पर इस केस से अलग हो जाना चाहिये था लेकिन रिटायर होने से पहले ही उन्होंने 13 दिसम्बर 2012 को एक विरोधाभाषी व असंवैधानिक फैसला सुनाया। इस फैसले में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की सांसद पत्नी डिम्पल यादव को यह कहकर बाहर कर दिया कि वह किसी लाभ के पद पर नही थी इसलिए इनकी जांच नहीं होगी। उस वक्त सूबे में अखिलेश यादव की सरकार ने सांस लेनी शुरू ही की थी। इस विरोधाभाषी फैसले के बाद चर्चाएं तो बहुत हुईं लेकिन न्यायपालिका के खिलाफ खुलकर बोलने के लिए कोई तैयार नहीं हुआ। गौरतलब है कि उस दौरान अल्तमश कबीर ने अपने फैसले में मुलायम सिंह यादव, अखिलेश यादव और प्रतीक यादव के खिलाफ जांच जारी रखने का निर्देश दिया था, जबकि उस वक्त प्रतीक यादव भी किसी लाभ के पद पर नहीं थे। यदि पूर्व न्यायाधीश ने लाभ के पद पर न होने का हवाला देकर डिंपल यादव को सीबीआई जांच से बरी कर दिया था तो उस स्थिति में प्रतीक यादव को भी सीबीआई जांच से बरी हो जाना चाहिए था। शायद सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में इस तरह का अदभुत फैसला आज तक नहीं हुआ होगा और वह भी एक जाने-माने न्यायाधीश की कलम से। सही मायने में कहा जाए तो सुप्रीम कोर्ट ने भ्रष्टाचार विरोधी कानून की धज्जियां उड़ाकर रख दी थीं। इस सम्बन्ध में अधिवक्ता विश्वनाथ चतुर्वेदी का कहना है कि वे इस असंवैधानिक फैसले को चुनौती देंगे। वह निर्णय पूरी तरह से गैरकानूनी था।

अब यह भी जान लीजिए कि आखिरकार तमाम असंभावनाओं के बावजूद मीडिया में सुप्रीम कोर्ट द्वारा क्लीनचिट दिए जाने की खबर कैसे प्रकाशित-प्रसारित हो गयी? इस दुर्लभ काम को अंजाम देने की भूमिका निभायी है अमर सिंह ने। सभी जानते हैं कि अमर सिंह में न्यायपालिका से लेकर औद्योगिक घरानों, सीबीआई और मीडिया तक को मैनेज करने की क्षमता कूट-कूट कर भरी है। पेड न्यूज के इस खेल ने अपना काम कर दिखाया। अखबारों में झूठी खबर छपते ही अमर सिंह समाजवादी पार्टी में नायक की भूमिका में नजर आने लगे। मुलायम ने भी इन्हें उपकृत करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। अमर सिंह को एक बार फिर से सपा में महासचिव पद का दर्जा दे दिया गया।

गौरतलब है कि ये वही अमर सिंह हैं जो एक बार फिर से समाजवादी पार्टी में वापसी से पहले करीब छह साल तक सक्रिय राजनीति में हाशिए पर रहे। इस दौरान वे गंभीर बीमारी से भी जूझते रहे। इस दौरान उन्होंने अपने लिए दूसरे राजनैतिक दरवाजे भी देखे। जब कहीं से उन्हें सम्मान मिलता नजर नहीं आया तो उन्होंने खुद की राष्ट्रीय लोकमंच के नाम से राजनीतिक पार्टी भी बनाई। वर्ष 2012 विधानसभा चुनाव में उन्हांेने चुनाव प्रचार के दौरान मुलायम के खिलाफ अमर्यादित भाषा तक का प्रयोग किया। खुले मंच से मुलामय की सत्ता को यूपी में जड़ से मिटाने की सौगंध तक खायी। अमर सिंह को अपनी राजनैतिक हैसियत का अंदाजा उस वक्त हुआ जब वर्ष 2012 के विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी के प्रत्याशियों की जमानतें तक जब्त हो गईं।

अमर सिंह वर्ष 2014 में राष्ट्रीय लोक दल से लोकसभा का चुनाव लड़े। उम्मीद थी कि उन्हें सम्मानजनक वोट मिलेंगे लेकिन हुआ वही जिसकी उम्मीद थी। अमर सिंह को लोकसभा चुनाव में करारी शिकस्त मिली। जब कहीं दाल नहीं गली तो दोबारा उसी पार्टी में आने के रास्ते तलाशने लगे जहां उनके विरोधियों की संख्या अनगिनत थी। इसके बावजूद अमर सिंह ने अपनी कला का परिचय दिया और सपा में शामिल हो गए। पार्टी में तमाम विरोध के बावजूद उसी सम्मानजनक स्थिति को पाने के लिए अमर सिंह ने आय से अधिक सम्पत्ति के मामले में मुलायम और कुनबे को राहत दिलवाने का वायदा किया। कोर्ट ने भले ही मुलायम को ठीक तरह से राहत न दी हो लेकिन अमर सिंह ने मीडिया को सेट करके राहत देने सम्बन्धित ऐसी फर्जी खबर प्रकाशित-प्रसारित करवा दी जिससे प्रभावित मुलायम कुनबा अमर सिंह का मुरीद हो गया। मुलायम ने भी अहसान का बदला चुकाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। अमर सिंह को एक बार फिर से पार्टी में महासचिव का पद दे दिया गया।

अब यह भी जान लेना जरूरी है कि आखिरकार कोर्ट ने क्या कहा था और मीडिया को क्या बताया गया? मुलायम सिंह यादव और उनके परिवार के खिलाफ आय से अधिक संपत्ति मामले में लंबित विश्वनाथ चतुर्वेदी की कुछ अर्जियों पर आदेश देने से सुप्रीम कोर्ट ने यह कहकर मना कर दिया है कि इन अर्जियों में उठे सवालों का जवाब 2013 में मुलायम परिवार की पुनर्विचार याचिका खारिज करते हुए सीबीआई जाँच के आदेश के समय ही दे दिया गया था। इस पर श्री चतुर्वेदी के सीनियर अधिवक्ता के टी एस तुलसी ने कहा, ‘आपके आदेश पर सीबीआई ने आज तक क्या जाँच की है? इसकी जानकारी याचिकाकर्ता को  प्राप्त नहीं हुई है।’ जाँच रिपोर्ट मँगाये जाने के सवाल पर कोर्ट ने कहा, ‘यह माँग आपकी इस याचिका में नही है।’ परिणामस्वरूप कोर्ट ने उक्त माँग के लिए अलग से याचिका दाखिल करने की अनुमति देते हुए कहा कि इसके लिए दूसरी याचिका दाखिल कर सकते हैं। श्री चतुर्वेदी के सीनियर वकील केटीएस तुलसी ने कहा, ‘सीबीआई ने प्राथमिक जांच में मुकदमा दर्ज करने की इच्छा जताई थी लेकिन बाद में एफआईआर रजिस्टर की गयी अथवा नहीं, इसकी कोई जानकारी याचिकाकर्ता को नहीं दी गयी लिहाजा सीबीआई से स्टेटस रिपोर्ट मांगी जाए।’ इस पर कोर्ट ने कहा, ‘ये मांग मौजूदा अर्जी का हिस्सा नहीं है।’ इस पर कोर्ट याचिकाकर्ता के वकील को अनुमति दी है कि इस मांग के साथ अलग से याचिका दाखिल की जाए। याचिकाकर्ता विश्वनाथ चतुर्वेदी ने मीडिया कर्मियों से साफ कहा है कि कोर्ट के इस आदेश में कहीं पर यह नहीं कहा गया है कि मुलायम एवं उनके परिवार के खिलाफ सीबीआई जांच की अर्जी खारिज की जाती है। साफ जाहिर है कि यह सारा खेल मुलायम के अमर-प्रेम का जीता-जागता उदाहरण है और अमर सिंह का मीडिया को हैण्डिल करने का नायाब तरीका।

आय से अधिक सम्पत्ति के मामले में सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव एण्ड फैमिली को क्लीनचिट देने का गैरकानूनी तरीका पिछले लगभग चार वर्षों से जारी है। वर्ष 2012 में भी कुछ इसी तरह से मुलायम एण्ड फैमिली को क्लीनचिट देने की कोशिश हुई। उस वक्त केन्द्र में कांग्रेस के मनमोहन सिंह की सरकार थी। तत्कालीन केन्द्र सरकार को जब अपनी प्रतिष्ठा से जुडे़ ‘खाद्यान्न सुरक्षा विधेयक’ को पास करवाने के लिए सांसदों की जरूरत हुई तो उस वक्त मुलायम सिंह यादव के साथ एक समझौता हुआ। समझौता यह था कि केन्द्र सरकार सुप्रीम कोर्ट और सीबीआई से उनके आय से अधिक मामले पर क्लीनचिट दिलवा दे। कोशिश भी कुछ ऐसी ही हुई। गौरतलब है कि आय से अधिक सम्पत्ति के मामले में पूर्व मुख्यमंत्री मायावती को भी तत्कालीन मनमोहन सिंह की सरकार के कार्यकाल में सीधे सुप्रीम कोर्ट से राहत दिलवा दी गयी थी। जब तक केन्द्र में मनमोहन सिंह की सरकार (वर्ष 2009 से 2014 तक) रही, मुलायम सिंह यादव लगातार कांग्रेस की हर मुसीबत में उसका साथ देते रहे। मुलायम यह बात अच्छी तरह से जानते थे कि उनकी नकेल केन्द्र सरकार के ही हाथों में है। यदि जरा सी आनाकानी की तो केन्द्र के इशारे सीबीआई अपना खेल दिखा देगी। हालांकि इस तरह के दबाव को सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव शुरू से नकारते आए हैं लेकिन कांग्रेस को हर मुसीबत के दौर में आंख बंद करके समर्थन देना इस बात का प्रमाण है कि मुलायम किसी तरह से आय से अधिक सम्पत्ति के मामले से बाहर निकलने के लिए कुछ भी करने को तैयार हैं। जब केन्द्र की तरफ से अहसान के बदले ज्यादा दबाव पड़ा तो दिसंबर 2012 में सुप्रीम कोर्ट ने उस केस से यह कहते हुए अपना पीछा छुड़ा लिया कि जो करना है सीबीआई करे और जो दिखाना सुनाना है सरकार को दिखाए सुनाए। ये वही सुप्रीम कोर्ट था जिसने बाद में इस बात को लेकर बखेड़ा खड़ा कर दिया था कि सीबीआई ने अपनी जांच रिपोर्ट तत्कालीन कानून मंत्री को क्यों सौंपी। तरीका तो यही कहता है कि जब सुप्रीम कोर्ट ने उस केस से अपना पीछा छुड़ा लिया था तो उसे सीबीआई की कार्यप्रणाली पर उंगली नहीं उठानी चाहिए थी।

खैर दिसम्बर 2012 में विश्वनाथ चतुर्वेदी बनाम यूनियन आफ इंडिया जनहित याचिका (क्रमांक 633, 2005) के मामले में दो साल से सुरक्षित रखे फैसले का पिटारा खोला गया। उम्मीद थी कि पिटारा खुलते ही मुलायम सलाखों के पीछे नजर आयेंगे लेकिन ऐसा नहीं हो सका। उस दौरान भी अफवाह फैली थी कि मुलायम को आय से अधिक सम्पत्ति के मामले में जल्द ही सीबीआई क्लीनचिट दे देगी। कहा तो यही जा रहा है कि सीबीआई की तरफ से क्लीनचिट का चिट्ठा चार वर्ष पूर्व ही बनकर तैयार हो गया था। इसी दौरान लोकसभा चुनाव की तैयारियां शुरू हो गयीं। कांग्रेस की तरफ से आश्वासन दिया गया कि दोबारा सत्ता में आते ही उन्हें सीबीआई की तरफ से क्लीनचिट का चिट्ठा थमा दिया जायेगा। दुर्भाग्यवश केन्द्र से कांग्रेस का सफाया हो गया और मोदी सरकार सत्ता में आ गयी। मुलायम सिंह यादव, विश्वनाथ चतुर्वेदी और कांग्रेस के बीच चली त्रिकोणीय जंग में शामिल एक मध्यस्थ ने उस वक्त अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल करते हुए विश्वास के साथ कहा था, ‘सरकार सबसे बड़ी चीज होती है। वह जो चाहे कर सकती है। चतुर्वेदी जैसे लोगों को यह बात समझ नहीं आती है तो यह उनका प्राब्लम है।’ इस शख्स के दावों में दम था क्योंकि मैनेज करने का काम इसी शख्स ने किया था। यहां बात हो रही है अमर सिंह की। उस वक्त अमर सिंह का सपा में सिक्का बोलता था।

मुलायम को आय से अधिक सम्पत्ति में राहत देने की सभी तैयारियां हो चुकी थीं, अंततः हुआ वही जिसकी उम्मीद एक वर्ग विशेष को थी। सीबीआई का शिकंजा कानूनी पेंच में फंस गया। जब कहीं से बात नहीं बन सकी तो याचिकाकर्ता विश्वनाथ चतुर्वेदी पर चारों तरफ से दबाव बनाया गया। साम, दाम, दण्ड, भेद की तर्ज पर पूरी समाजवादी पार्टी विश्वनाथ चतुर्वेदी के पीछे पड़ गयी थी। तत्कालीन केन्द्र की कांग्रेस सरकार ने श्री चतुर्वेदी की सुरक्षा का पुख्ता इंतजाम कर रखा था। उस वक्त श्री चतुर्वेदी राजेन्द्र नगर, लखनऊ में रहते थे। उनके घर की तंग सीढ़ियों पर इतने पुलिसवाले भरे रहते थे कि एकबारगी लगता था कि इतना सुरक्षित आदमी इतनी असुरक्षित सी जगह पर आखिर क्यों रहता है? यहां पर विश्वनाथ चतुर्वेदी की मुश्किलों का जिक्र सिर्फ इसलिए किया गया ताकि इस मामले की गंभीरता को समझा जा सके। इतना सब कुछ होने के बावजूद मुलायम सिंह यादव और उनके परिजनों को आय से अधिक सम्पत्ति के मामले में राहत नहीं मिल सकी। अमर सिंह ने भी अपनी पूरी ताकत झोंक दी लेकिन मुलायम को क्लीनचिट नहीं मिल पायी। लगभग एक दशक बाद एक बार फिर से मुलायम को क्लीनचिट दिलवाने के लिए ऐड़ी-चोटी का जोर लगाया जा रहा है। अमर का तंत्र पूरी शिद्दत के साथ उन रास्तों को तलाश रहा है जिन रास्तों से मुलायम को क्लीनचिट मिलने की संभावना है। हाल ही में मीडिया के सहारे मुलायम को क्लीनचिट दिए जाने की झूठी खबर प्रकाशित करवाकर खेल को और रोचक बना दिया गया है। इस खबर को याचिकाकर्ता विश्वनाथ चतुर्वेदी ने चैलेंज किया है। साथ ही कोर्ट आर्डर की कुछ काॅपियां सुबूत के तौर पर सोशल मीडिया पर डाली हैं ताकि भ्रामक खबर का और दलाल की भूमिका निभाने वाले कुछ मीडिया घरानों के चेहरों से नकाब उतारा जा सके।

वर्तमान सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव को 1977 में जब पहली बार मंत्रीपद नसीब हुआ उस वक्त उन्होंने अपनी सम्पत्ति मात्र 77 हजार रुपए बतायी थी। 28 वर्षों के बाद 2005 में जब विश्वनाथ चतुर्वेदी ने कोर्ट में आय से अधिक सम्पत्ति से सम्बन्धित मुलायम के खिलाफ याचिका दायर की थी उस वक्त उनकी सम्पत्ति करोड़ों में पहुंच गयी थी। वर्ष 2004 में मुलायम सिंह यादव ने जब मैनपुरी से चुनाव लड़ा तो उस वक्त उन्होंने अपनी सम्पत्ति 1 करोड़ 15 लाख 41 हजार 224 बतायी थी। पांच वर्ष बाद 2009 में लोकसभा चुनाव के दौरान मुलायम ने जो हलफनामा दिया था उसमें उन्होंने अपनी सम्पत्ति 2 करोड़ 23 लाख 99 हजार 310 रुपए बतायी थी। वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में मुलायम ने अपनी सम्पत्ति 15 करोड़ 96 लाख 71 हजार 544 दर्ज करवायी। बिना किसी उद्योग धंधे के 77 हजार से लगभग 16 करोड़ की सम्पत्ति मुलायम ने कैसे जमा कर ली? यह प्रश्न हैरान कर देने वाला है।

गौरतलब है कि यह सम्पत्ति तो मुलायम सिंह यादव ने स्वयं अपने हलफनामें में दिखायी है जबकि हकीकत यह है कि मौजूदा समय में मुलायम और उनके परिजनों के पास अरबों की अकूत सम्पत्ति मौजूद है। यदि सीबीआई इस अकूत सम्पत्ति के बाबत आय का स्रोत मुलायम से पूछे तो निश्चित तौर पर यूपी के सरकारी खजाने को लूटे जाने का खुलासा हो सकता है। यह भी जान लीजिए, ये वही मुलायम सिंह यादव हैं जो आज भी जब चुनाव प्रचार के लिए गांव-देहातों में जाते हैं तो स्वयं को किसान का बेटा बताते हैं। हैरत की बात है कि यूपी के एक किसान का बेटा इतनी जल्द 77 हजार की सम्पत्ति से करो़ड़ांे की सम्पत्ति का मालिक कैसे बन बैठा? यूपी का आम किसान कर्ज और भुखमरी से आत्महत्या कर रहा है। सूबे के आम किसानों का परिवार दो जून की रोटी के लिए शहरों में मजदूरी करने पर विवश है और मुलायम सिंह यादव एक ऐसे किसान हैं जिन्होंने कृषि से न सिर्फ अपने भरे-पूरे परिवार को ऐश की जिन्दगी दी बल्कि परिजनों के नाम इतनी सम्पत्ति जुटा ली जिससे उनकी आगे आने वाली कई पीढ़ियां घर बैठे-बैठे ऐश का जीवन जी सकती हैं। सूबे का किसान जानना चाहता है कि उनके हाथों में ऐसा कौन सा अलादीन का चिराग हाथ लग गया जिससे उन्होंने उस यूपी में अरबों की सम्पत्ति सिर्फ खेती-किसानी से जुटा ली जिस यूपी का शेष किसान आजादी के लगभग 70 वर्षों बाद भी अपने परिवार को दो जून की रोटी नहीं दे पाया।

सिर्फ मुलायम के नाम से सैफई सहित अन्य गावों में 7 करोड़ 88 लाख 88 हजार रुपए की कृषि योग्य भूमि उनके हलफनामे में दर्ज है। इलाकाई लोगों का दावा है कि हकीकत में उपरोक्त जमीनों की कीमत अरबों में है। इटावा की फ्रेण्ड्स कालोनी में एक 5000 वर्ग फीट का आवासीय प्लाॅट है। हलफनामे में इस प्लाॅट की कीमत एक करोड़ 44 लाख 60 हजार दर्शायी गयी है जबकि इस प्लाॅट की वास्तविक कीमत पांच करोड़ के आस-पास है। इटावा के सिविल लाइन में आवासीय भवन संख्या 218 का क्षेत्रफल 16 हजार 10 वर्ग फीट है। इसकी कीमत हलफनामे में 3 करोड़ 16 लाख 28 हजार 339 दर्शायी गयी है। सच तो यह है कि इस आलीशान कोठी की कीमत लगभग 15 करोड़ के आस-पास है। ये वह अधूरी सम्पत्तियां हैं जो मुलायम ने खेती के धंधे से कमायी हैं। ये वह सम्पत्तियां हैं जो आजमगढ़ से सांसद मुलायम सिंह यादव ने अपने हलफनामे मे कुबूल की हैं। वास्तविकता में उनके नाम पर कितनी सम्पत्तियां हैं? शायद उम्र के इस पड़ाव में उन्हंे भी ठीक तरह से याद नहीं होंगी। इसके अतिरिक्त बेटे, बहू के नाम से अरबों की सम्पत्ति का मालिक है मुलायम परिवार और यह सारी सम्पत्ति बिना किसी उद्योग धंधे के खेती करके कमायी गयी है। आम जनता का हैरत होना स्वाभाविक है। यही वजह है कि विश्वनाथ चतुर्वेदी ने मुलायम और उनके परिवार के खिलाफ आय से अधिक सम्पत्ति को लेकर एक जनहित याचिका दायर की थी।

क्या कहते हैं विश्वनाथ चतुर्वेदी

दिसम्बर 2012 में वर्तमान सांसद डिंपल यादव को केस से बाहर किए जाने के सम्बन्ध में याचिकाकर्ता विश्वनाथ चतुर्वेदी का कहना है कि उक्त फैसला मुख्य न्यायाधीश रहे अल्तमश कबीर ने भले ही दिया हो लेकिन यह फैसला मैं उनका व्यक्तिगत फैसला मानता हूं। ऐसा विरोधाभाषी फैसला सुप्रीम कोर्ट का कतई नहीं हो सकता। एक तरफ तो डिंपल यादव को यह कहकर केस से बाहर कर दिया जाता है कि जिस वक्त केस दर्ज किया गया उस वक्त डिंपल यादव किसी लाभ के पद पर नहीं थीं। गौरतलब है कि उस वक्त प्रतीक यादव भी किसी लाभ के पद पर नहीं थे। इन परिस्थितियों में प्रतीक यादव के खिलाफ भी केस खारिज हो जाना चाहिए था, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। सिर्फ डिंपल यादव को ही इस केस से बाहर किया गया क्योंकि डिंपल यादव वर्तमान मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की पत्नी हैं। मुलायम ने इसे अपने परिवार के सम्मान से जोड़ लिया था। डिंपल यादव को अनैतिक तरीके से केस से बाहर निकालने के लिए सपा प्रमुख ने कौन सा तरीका अख्तियार किया? इस पर भी जांच होनी चाहिए। बात खुलकर सामने आनी चाहिए ताकि आम लोगों का न्यायपालिका पर से भरोसा न उठे। ज्ञात हो आय से अधिक सम्पत्ति मामले की सुनवाई माननीय जज अल्तमश कबीर ही सुन रहे थे।

अल्तमश कबीर को वर्ष 2011 में राजधानी लखनऊ में मुलायम के वकील व समाजवादी पार्टी सांसद रहे स्व0 वीरेन्द्र भाटिया की बरसी में मुलायम और अखिलेश के साथ मंच पर एक साथ देखा गया था। यदि मुलायम परिवार के साथ उनके इतने नजदीकी सम्बंध थे तो उन्हें इस मुकदमे से अपने आप को नैतिकता के आधार पर अलग कर लेना चाहिए था। उन्होंने ऐसा नहीं किया। परिणामस्वरूप अखिलेश यादव की पत्नी सांसद डिम्पल यादव उन्होंने यह कहकर जांच के दायरे से बाहर कर किया दिया कि वे कोई पब्लिक पोस्ट होल्ड नहीं कर रही थीं जबकि उस वक्त पब्लिक पोस्ट होल्ड न करने वाले प्रतीक यादव भी थे।

संदेह के घेरे में ‘थिंक टैंक’

हालांकि मुलायम एवं उनके परिवार के खिलाफ आय से अधिक सम्पत्ति के मामले में समाजवादी पार्टी के थिंक टैंक माने जाने वाले रामगोपाल यादव की कोई भूमिका नहीं है, लेकिन उन्होंने जिस तरीके से पिछले 28 वर्षों के राजनैतिक कैरियर में धन सम्पदा इकट्ठा की है वह चर्चा करने लायक अवश्य है। राज्यसभा में निर्वाचन के लिए प्रो0 रामगोपाल यादव ने 3 नवम्बर 2014 को रिटर्निंग आफिसर के समक्ष शपथ पत्र प्रस्तुत किया था। शपथ पत्र के मुताबिक प्रो0 रामगोपाल ने चल-अचल सम्पत्ति की कुल कीमत लगभग 10 करोड़ के आस-पास बतायी थी। हालांकि शपथ-पत्र में सम्पत्ति जुटाने के साधन का उल्लेख नहीं किया जाता है अन्यथा उनकी अकूत सम्पत्ति का खुलासा शपथ पत्र दाखिल करते ही हो जाता। यह काम विशेष तौर पर आयकर विभाग का होता है या फिर प्रवर्तन विभाग का। हैरत की बात है कि दोनों ही जिम्मेदार विभागों में से किसी ने भी प्रो0 रामगोपाल यादव से उनकी आय से अधिक सम्पत्ति के बाबत पूछताछ तक नहीं की।

गौरतलब है कि प्रो. रामगोपाल यादव समाजवादी पार्टी अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव के चचेरे छोटे भाई हैं। पेशे से अध्यापक रहे श्री यादव वर्तमान में उत्तर प्रदेश से राज्यसभा के सांसद हैं। वह मुलायम सिंह यादव के थिंक टैंक भी कहे जाते हैं। प्रो. रामगोपाल यादव समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव भी हैं। पार्टी में हैसियत मुलायम के बाद दूसरे नम्बर की मानी जाती है। यह दीगर बात है कि उन्हें राजनीति में लाने का श्रेय मुलायम सिंह यादव को जाता है। रामगोपाल यादव ने अपने भाई शिवपाल यादव के साथ 1988 में राजनीति में कदम रखा। वह इटावा के बसरेहर से ब्लॉक प्रमुख भी रह चुके हैं। जीत के इसी स्वाद ने उन्हें अपना राजनैतिक सफर जारी रखने पर विवश कर दिया। कहा जाता है कि इसके बाद उन्होंने पीछे मुड़कर कभी नहीं देखा। मुलायम का पूरा परिवार भले ही कई बार मुसीबतों में रहा हो लेकिन रामगोपाल यादव को मुसीबत छू तक नहीं सकी।

प्रो. रामगोपाल वर्ष 1989 में जिला परिषद का चुनाव जीतकर अध्यक्ष बने। वर्ष 1992 में पहली बार राज्यसभा के सदस्ये बने। इसके बाद से प्रो0 रामगोपाल लगातार राज्यसभा पहुंचते रहे। वर्तमान समय में भी वे राज्यसभा के सदस्य हैं। ये मुलायम सिंह यादव के राजनैतिक सलाहकार भी रह चुके हैं। ये उस वक्त सुर्खियों में आए जब उन्होंने आईएएस अफसर दुर्गाशक्ति नागपाल के मामले में केंद्र सरकार द्वारा रिपोर्ट मांगने पर यहां तक कह दिया था कि यूपी को आईएएस अफसरों की जरूरत ही नहीं है। उनके बयान से साफ जाहिर था कि वे यूपी में आईएएस अफसरों को ही भ्रष्टाचार की जननी मानते हैं। इन्होंने डा0. लोहिया का सामाजिक और राजनीतिक दर्शन विषय पर शोध किया और पीएचडी उपाधि ली। समाजवादियों को लोहिया के विचारों से अवगत कराने का श्रेय भी इन्हीं को जाता है। बेहद गरीबी में पले-बढ़े प्रो. रामगोपाल यादव आज करोड़ों की हैसियत रखते हैं। शपथ पत्र में इन्होंने अपनी आर्थिक हैसियत 10 करोड़ से भी ऊपर बतायी है। ये वह सम्पत्ति है जिसका उन्होंने शपथ पत्र में खुलासा किया है। यानि ये तो सफेद धन है जबकि जानकारों का कहना है कि वर्तमान समय में प्रो0 रामगोपाल के पास अकूत संपत्ति है।

हैरत की बात है कि बेहद गरीबी से निकलकर आए प्रो0 रामगोपाल यादव वर्तमान में करोड़ों की हैसियत रखते हैं, वह भी बिना किसी उद्योग धंधे के! इसके बावजूद आयकर विभाग ओर प्रवर्तन विभाग इनकी जांच तक नहीं करता। हाल ही में इनका नाम महाभ्रष्ट यादव सिंह के साथ भी जोड़ा जाता रहा है। हालांकि प्रो0 रामगोपाल यादव ने यादव सिंह ने अपने सम्बन्धों को सिरे नकारा है लेकिन पार्टी के ही सदस्य यह बात दावे के साथ कहते हैं महाभ्रष्ट यादव सिंह को प्रो0 रामगोपाल यादव का संरक्षण था। चर्चा तो यहां तक है कि यादव सिंह की काली कमाई का एक बड़ा हिस्सा इन्हें भी मिलता था। इन आरोपों में कितनी सच्चाई है? यह जांच का विषय हो सकता है। दावा करने वाले यहां तक कहते हैं कि जिस दिन प्रो0 रामगोपाल यादव पर शिकंजा कसा गया उस दिन यूपी के गर्भ में दबे हजारों करोड़ के घोटालों पर से पर्दा उठ जायेगा। पार्टी के लोग तो यहां तक कहते हैं कि कोई बड़ा फैसला लेते समय मुलायम सिंह यादव प्रो. रामगोपाल यादव से सलाह लेना नहीं भूलते हैं।

मुलायम परिवार की पृष्ठभूमि

मुलायम सिंह यादव के किसान पिता सुधर सिंह मूल रूप से फिरोजाबाद की तहसील शिकोहाबाद के रहने वाले थे। बाद में वे इटावा के सैफई में जाकर बस गए। मुलायम पांच भाइयों में दूसरे नम्बर पर हैं। शिवपाल यादव को छोड़कर उनके सभी भाई खेतीबाड़ी करते रहे हैं। मुलायम के सबसे छोटे भाई राजपाल यादव लगभग एक दशक पूर्व यूपी वेयरहाउसिंग कापोर्रेशन में बाबू हुआ करते थे। मुलायम का राजनीति में कद बढ़ तो राजपाल यादव ने वर्ष 2006 में नौकरी से त्याग पत्र दे दिया। मुलायम सिंह यादव के पुत्र अखिलेश यादव वाया सांसद यूपी के मुख्यमंत्री पद पर विराजमान हैं। अखिलेश यादव का जन्म मुलायम की पहली पत्नी मालती देवी से हुआ था जिनकी 23 मई 2003 में मृत्यु हो गयी थी। उसके बाद मुलायम ने साधना गुप्ता से विवाह कर लिया। बताया जाता है कि साधना ने मुलायम के राजनैतिक कद का खूब फायदा उठाया। आज वह भी अरबों की सम्पत्ति की मालकिन बतायी जाती हैं। ये पैसा उनके पास कहां से आया? इस पर भी सवाल उठने शुरू हो गए हैं।

बताया जाता है कि अखिलेश सरकार में कैबिनेट मंत्री का दर्जा प्राप्त एक मंत्री उन्हें प्रत्येक माह करोड़ों की वसूली का धन पहुंचाता है। इसके कितनी सच्चाई है? यह जांच का विषय हो सकता है लेकिन इस सच्चाई से इनकार नहीं किया जा सकता कि साधना वर्तमान समय में करोड़ों की मालकिन हैं। मुलायम सिंह यादव पूर्व मुख्यमंत्री राम नरेश यादव और पूर्व मुख्यमंत्री बनारसी दास के कार्यकाल 1977 से लेकर 17 फरवरी 1980 तक मंत्री रहे। इसके बाद मुलायम सिंह यादव 1982 से 8 नवम्बर 1984 तक विधान परिषद में विपक्ष के नेता रहे। 17 मार्च 1985 से 10 फरवरी 1987 तक मुलायम सिंह यादव नेता विपक्ष विधानसभा रहे। 4 जुलाई 1995 में वे दोबारा नेता विपक्षी दल चुने गए लेकिन उन्होंने पद लेने से इंकार कर दिया। मुलायम सिंह यादव 5 दिसम्बर 1989 से 24 जून 1991, 4 दिसम्बर 1993 से 3 जून 1995 और 29 अगस्त 2003 से 13 मई 2007 तक यूपी में मुख्यमंत्री के पद पर रहे। वर्ष 2005 में ही मुलायम सिंह के खिलाफ आय से अधिक सम्पत्ति बटोरने से सम्बन्धित पीआईएल दायर की गयी थी। मुलायम सिंह यादव अब तक तीन बार सांसद बन चुके हैं। वर्तमान समय में वे आजमगढ़ से सांसद हैं।

क्या कहा था सुप्रीम कोर्ट ने

विगत माह 19 सितम्बर 2016 को सुप्रीम कोर्ट में आय से अधिक सम्पत्ति के मामले में सुनवायी के दौरान माननीय न्यायाधीश ने जो कहा और मीडिया को जो सुनाया गया वह कुछ इस तरह से है। मामला कोर्ट नम्बर 6 में केस नम्बर 7 पर सूचीबद्ध था। कोर्ट ने कहा, ’इस मामले में हम सीबीआई से स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करने को नहीं कह सकते। इस केस में कोर्ट 13 दिसम्बर 2012 को ही आदेश जारी कर चुका है। अब सीबीआई स्वयं इस मामले की जांच करे।‘ इस पर सुप्रीम कोर्ट में याचिकाकर्ता ने कहा, ’वर्ष 2007 में उनके आरोपों के आधार पर सीबीआई ने प्राथमिक जांच में मामला बनने की बात कही थी, फिर भी अभी तक नियमित केस दर्ज नहीं किया गया। चार अलग-अलग अर्जियों पर 10 फरवरी 2009 को सुप्रीम कोर्ट में फैसला सुरक्षित रख लिया गया था लेकिन फैसला अब तक नहीं सुनाया गया है।‘

गौरतलब है कि याचिकाकर्ता विश्वनाथ चतुवेर्दी ने सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव, वर्तमान यूपी के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव, कन्नौज से लोकसभा सांसद डिंपल यादव और मुलायम के दूसरे बेटे प्रतीक यादव के खिलाफ आय से अधिक सम्पत्ति का आरोप लगाया था, साथ ही एक जनहित याचिका भी दायर की थी। सुप्रीम कोर्ट ने बाद में डिंपल यादव को यह कहकर केस से अलग कर दिया था कि जिस वक्त जनहित याचिका दायर की गयी थी उस वक्त डिंपल यादव किसी लाभ के पद पर नहीं थीं लिहाजा उन पर केस नहीं बनता। इस पर याचिकाकर्ता ने अपना विरोध दर्ज करते हुए कहा है कि यदि इसी तरह से अन्य भ्रष्ट लोगों की पत्नियों की सम्पत्तियों पर भी यदि मामला ठुकराया जाता रहा तो भविष्य में किसी भ्रष्ट नेता अथवा अधिकारी पर शिकंजा कसा ही नहीं जा सकता। कोर्ट के इस आदेश पर मीडिया को क्या सुनाया गया? मीडिया ने क्या सुना और उसने क्या लिखा? मीडिया ने विधि संवाददाता अथवा विधि सलाहकार से सलाह-मशविरा किए बगैर अपने अखबार में सुर्खियां बना दी कि, मुलायम और उनके परिवार को आय से अधिक सम्पत्ति के मामले में राहत। साफ जाहिर है कि दागी मुलायम और उनके परिवार वालों की छवि सुधारने की गरज से ही पेड न्यूज का सहारा लिया गया और मीडिया को मैनेज करने की भूमिका निभायी सपा में दूसरी पारी खेलने वाले मैनेजमेंट गुरु अमर सिंह ने। मुलायम ने भी उन्हें तोहफे के रूप में दोबारा महासचिव का पद दे दिया।

याचिकाकर्ता विश्वनाथ चतुर्वेद ने याचिका दाखिल कर मामले में नियमित एफआईआर दर्ज करने की मांग की थी। कोर्ट में याचिकाकर्ता ने कहा कि 2007 में उनके आरोपों पर सीबीआई ने प्राथमिक जांच में मामला बनने की बात भी कही थी, फिर भी अभी तक नियमित केस दर्ज नहीं किया गया। चतुर्वेद ने कहा कि चार अलग-अलग अर्जियों पर 10 फरवरी 2009 को सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रख लिया था, जो आज तक सुरक्षित है।

मुलायम और उनके परिवार को क्लीनचिट देने सम्बन्धी खबर ने मुलायम के खिलाफ आय से अधिक सम्पत्ति मामले को एक बार फिर से ताजा कर दिया। सत्ता विरोधी दल एक बार फिर से इस मुद्दे को लेकर चर्चा कर रहे हैं जबकि आय से अधिक सम्पत्ति मामले का खुलासा करने वाला व्यक्ति मीडिया की भूमिका को लेकर खासा खफा है। उनकी नाराजगी का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि उन्होंने सोशल साइट पर मीडिया को आपत्तिजनक शब्दों से भी नवाजा है। साथ ही कहा है, ‘विधानसभा चुनाव में सपा की छवि सुधारने की गरज से पार्टी के तथाकथित मैनेजर अमर सिंह ने ही मीडिया के सहारे दुष्प्रचार किया है जबकि मामला जस का तस है।’

साभार- ‘दृष्टांत’ मैग्जीन

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मैं यादव सिंह से ना तो कभी मिला और ना ही देखा : नवनीत सहगल

भड़ास4मीडिया के पास लखनऊ से प्रकाशित होने वाली पत्रिका दृष्टांत के संपादक अनूप गुप्ता का एक मेल आया है जिसमें दावा किया गया है कि सीबीआई के समक्ष यादव सिंह की गवाही से यूपी के सीनियर ब्यूरोक्रेट नवनीत सहगल के भ्रष्टाचार पर से पूरी तरह से पर्दा उठ जाएगा. श्री गुप्ता का कहना है कि इस काम में राष्ट्रीय हिन्दी समाचार पत्रिका दृष्‍टांत की तरफ से शीघ्र ही समस्त दस्तावेजों के साथ नवनीत सहगल के खिलाफ एक चौंकाने वाला खुलासा किया जाएगा.

अनूप गुप्ता ने अपने लंबे आलेख में दावा किया है कि समाजवादी पार्टी के शीर्ष स्तम्भों से सीधा ताल्लुक रखने वाले इंजीनियर इन चीफ यादव सिंह की गिरफ्तारी के बाद आईएएस नवनीत सहगल और सलाखों के बीच की दूरी लगातार कम होती जा रही है. आगे अनूप गुप्ता ने लिखा है- ”मैं विश्वास दिलाता हूं कि इस नौकरशाह पर शिकंजा कसते ही अरबों नहीं बल्कि खरबों के भ्रष्‍टाचार और काले धन का खुलासा सबके सामने होगा. जल्द ही नवनीत सहगल और बसपा सुप्रीमो मायावती के भाई आनन्द के बीच गुप्त तालमेल का भी खुलासा ‘दृष्टांत’ में किया जायेगा. इस खुलासे से न सिर्फ सूबे की जनता की आंखें खुली की खुली रह जायेंगी बल्कि सूबे की सत्ता भी हिलने पर विवश हो जायेगी”

इन आरोपों पर आईएएस नवनीत सहगल ने भड़ास4मीडिया को भेजे अपने लिखित जवाब में कहा है कि वे यादव सिंह से कभी नहीं मिले और न ही उन्हें देखा है. वे पिछले चार सालों से और पिछली सरकार के कार्यकाल के दौरान कभी यादव सिंह से नहीं मिले. उन्होंने सभी आरोपों को मूर्खतापूर्ण और मानहानि कारक करार दिया. साथ ही अनूप गुप्ता के चाल चलन पर सवाल उठाते हुए उनके द्वारा सैकड़ों बार फोन किए जाने और कई किस्म की धोखाधड़ी किए जाने के बारे में उल्लेख किया. नवनीत सहगल का पूरा जवाब इस तरह है:

”This is nonsense and defamatory. Sh Anoop gupta has a sick mind and is a fraud. He did a fraud with the information department of UP, for which a Criminal case has been filed against him and which is under investigation in Police Station at Hazratgunl Lucknow. I have personally filed a criminal defamation case against him, in which a non bailable warrants were issued against him, he has now filed a false medical certificate in the court that he is seriously ill, while he has been travelling and roaming around, this fact has been brought to the notice of the hon,ble Court. A senior journalist Sh. Sharad Pradhan (9415016288) has also filed a defamation case against him which is pending in the court. Around 75 prominent journalists of Lucknow had complained against him for his blackmailing activities and non journalist activities/ which is being investigated by the STF. He had filed a PIL in the mentioned case, which was dismissed by the Hon”ble High Court at Lucknow and thereafter he had also filed a appeal in the hon”ble Supreme Court, which when was being dismissed, then he himself withdrew the case. He had made more than 300 calls on my phone asking for favours, details of which have been filed in the court. For the above mail also, I will file a defamation CASE IN THE COURT OF LAW AS I have nothing to do with Mr Yadav singh, I have never seen him or met him in the past Four years and during the last government also, I had nothing to do with him. mr. anoop gupta’s ideas are flight of his fancy, imagination and baseless and totally false and defamatory.”

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‘दृष्टांत’ मैग्जीन के संपादक अनूप गुप्ता के खिलाफ लखनऊ में नया मुकदमा

(आईएएस नवनीत सहगल और पत्रकार अनूप गुप्ता)


खबर है कि लखनऊ से प्रकाशित क्रांतिकारी मैग्जीन ‘दृष्टांत’ के संपादक अनूप गुप्ता के खिलाफ पुलिस में एफआईआर दर्ज करा दिया गया है. यह एफआईआर मैग्जीन के पंजीकरण हेतु फर्जी दस्तावेजों के लगाने से संबंधित है. वहीं अनूप गुप्ता का कहनाा है कि भ्रष्ट नौकरशाहों से लेकर भ्रष्ट नेताओं और भ्रष्ट मंत्रियों की पोल लगातार खोलने के कारण उन्हें सत्ता प्रतिष्ठान द्वारा निशाना बनाया जा रहा है और दमनात्मक कार्रवाई की जा रही है.

पहले भी फर्जी मुकदमें कराए जा चुके हैं और उन मुकदमों के सिलसिले में कोर्ट जाने पर कोर्ट रूम में हमला कराया जा चुका है. सरकारी मकान का एलाटमेंट निरस्त किया गया. मैग्जीन का टाइटल निरस्त करने हेतु कार्रवाई की गई. अब फिर एक फर्जी मुकदमा किया गया है. अनूप गुप्ता के मुताबिक वे गिरफ्तारी से नहीं डरते लेकिन जिस तरह उनको टारगेट करके परेशान किया जा रहा है और उस पर लखनऊ के पत्रकार व पत्रकार संगठन चुप्पी साधे हैं, यह दुर्भाग्यपूर्ण है.

अनूप गुप्ता ने बताया कि सत्ता का दमन जारी रखते हुए उन पर फर्जी मुकदमा लादते हुए जो एक और हमला किया गया है, यह सब सत्ता के अहंकार में डूबे मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के एक नौकरशाह के इशारे पर हो रहा है. ऐसा उक्त नौकरशाह के काले कारनामों का लगातार खुलासा करने के कारण हो रहा है. अनूप के मुताबिक उक्त नौकरशाह के लूट के लगातार खुलासे जारी रहेंगे और किसी भी दमन के आगे कलम नहीं रुकेगी.

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अदम्य साहस के लिए प्रतिमा भार्गव और साहसी पत्रकारिता के लिए अनूप गुप्ता को दिया गया भड़ास सम्मान (देखें वीडियो)

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‘दृष्टांत’ मैग्जीन ने यूपी सरकार के माननीय महबूब अली को क्यों बताया भ्रष्ट, पढ़ें पूरा विवरण

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पढ़िए ‘दृष्टांत’ मैग्जीन की कवर स्टोरी : काशी का कलंक

लखनऊ से निकलने वाली चर्चित मैग्जीन ‘दृष्टांत’ की कवर स्टोरी इस बार भी यूपी के बदनाम आईएएस नवनीत सहगल पर केंद्रित है. यह नौकरशाह मायावती का भी प्रिय रहा है और इन दिनों अखिलेश यादव का भी प्रिय अफसर है. ‘दृष्टांत’ मैग्जीन के संपादक अनूप गुप्ता ने अबकी कवर स्टोरी में बनारस के विश्वनाथ मंदिर को लेकर बताया है कि किस तरह सौ करोड़ हिंदुओं की आस्था के इस प्रतीक का सौदा नवनीत सहगल ने मुंबई की एक कंपनी के साथ कर लिया था. पूरी कवर स्टोरी नीचे प्रकाशित है>>

यदि विश्व प्रसिद्ध काशी विश्वनाथ मंदिर के पुजारी और महंत विरोध न करते तो देश के लगभग 100 करोड़ हिन्दुओं की आस्था का सौदा हो जाता। यदि मंदिर में आने वाले भक्त और देश की जनता जागरूक न होती तो बाबा (काशी विश्वनाथ मंदिर) का मंदिर आज उन लोगों की कमाई का साधन बन चुका होता जो रूपहले पर्दे पर नारी की नग्नता को परोसते आए हैं। यदि महामहिम राज्यपाल राम नाईक ने सूबे के मुख्यमंत्री को सीधे धमार्थ कार्य विभाग के प्रमुख सचिव नवनीत सहगल को दोषी मानते हुए कड़ा पत्र न लिखा होता तो निश्चित तौर पर काशी की पावन नगरी कब का दूषित हो चुकी होती। जो नगरी सूर्योदय और सूर्यास्त पर घण्टे और घड़ियाल के मधुर स्वर से गूंजती आयी है वह नगरी मात्र एक नौकरशाह की बदनियती के चलते 100 करोड़ हिन्दुओं की आस्था को चूर-चूर कर चुकी होती।

ज्ञात हो जिस नगरी में बाबा भोलेनाथ का पवित्र धाम है उस नगरी से देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने रिकॉर्ड मतों से जीत दर्ज की थी। मंदिर के साधू-संतों और पुजारी-महंतों में पीएम नरेन्द्र मोदी पर तो अटूट विश्वास है लेकिन यूपी की अखिलेश सरकार पर उन्हें तनिक भी भरोसा नहीं रह गया है। मंदिर की देख-रेख करने वालों का दावा है कि सरकार और उसके कारिंदे अवैध तरीके से धन कमाने की लालसा में किसी भी हद तक जा सकते हैं। चर्चा यह भी है कि मंदिर के ट्रस्ट में 60 करोड़ से भी ज्यादा की रकम ऐसे अधिकारियों को फूटी आंख नहीं सुहा रही है जिन्होंने अवैध तरीके से धन कमाने की होड़ में सरकार की जनता से जुड़ी तमाम लाभकारी योजनाओं से अरबों रूपया कमाया है। इस पूरे खेल में धर्मार्थ कार्य विभाग के प्रमुख सचिव नवनीत सहगल को सरगना बताया जा रहा है। ज्ञात हो श्री सहगल वर्तमान में प्रमुख सचिव, सूचना के पद पर भी विराजमान हैं। अखिलेश सरकार ने इनके भ्रष्टाचार से खुश होकर इन्हें दो-दो विभागों का दायित्व सौंप रखा है।

गौरतलब है कि सपा सरकार के कद्दावर कैबिनेट मंत्री शिवपाल यादव कई अवसरों पर इशारे-इशारे में श्री सहगल को भ्रष्ट बता चुके हैं। श्री सहगल पर आरोप लगाने वालों का दावा है कि देश की लगभग 100 करोड़ हिन्दुओं की आस्था को 5 वर्ष के लिए गिरवी रखने की साजिश रचने वाले इस कथित भ्रष्टाचार की जांच की जाए तो निश्चित तौर पर श्री सहगल के साथ-साथ कई सफेदपोशों के चेहरों से नकाब उतर जायेगी। कुछ का तो यहां तक दावा है कि फिल्मों में नग्नता परोसने वाले डिनो मोरिया से श्री सहगल के गहरे ताल्लुकात हैं। गौरतलब है कि ये वही डिनो मोरिया हैं जिनकी ऑनलाइन कम्पनी डिवोटी ई-सॉल्यूशंस प्रा. लि. ;क्मअवजममए म्.ैवसनजपवदे च्अजण् स्जकण्द्ध से श्री सहगल के हस्ताक्षर से 24 दिसम्बर 2014 को अनुबंध करने के प्रस्ताव पर स्वीकृति प्रदान की गयी थी।

आइए, इस भ्रष्टाचार के खुलासे से पहले 100 करोड़ हिन्दुओं की आस्था के प्रतीक काशी विश्वनाथ मंदिर के बारे में जान लिया जाए, जिसे यूपी सरकार के एक नौकरशाह ने मुम्बई के एक कलाकार के हाथों गिरवी रखने की साजिश को अंजाम दिया था। यह मंदिर सिर्फ हिन्दुस्तान की हिन्दू आबादी के लिए ही आस्था का केन्द्र नहीं है बल्कि विदेशों में रह रहे लाखों उन हिन्दुओं की आस्था का भी केन्द्र बिन्दु है जो किसी समय हिन्दुस्तान में रहा करते थे। इतना ही नहीं इस मंदिर में माथा टेकने वालों में विदेशियों की भारी तादाद यह बताने के लिए काफी है कि बाबा भोलेनाथ का यह पावन धाम कितना पवित्र है।

काशी विश्वनाथ मंदिर बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है। यह मंदिर पिछले कई हजारों वर्षों से वाराणसी में स्थित है। काशी विश्वनाथ मंदिर का हिंदू धर्म में एक विशिष्ट स्थान है। ऐसा माना जाता है कि एक बार इस मंदिर के दर्शन करने और पवित्र गंगा में स्नान कर लेने से मोक्ष की प्राप्ति होती है। इस मंदिर में दर्शन करने के लिए आदि शंकराचार्य, सन्त एकनाथ रामकृष्ण परमहंस, स्वामी विवेकानंद, महर्षि दयानंद, गोस्वामी तुलसीदास सभी का आगमन हुआ हैं। यहीं पर सन्त एकनाथजी ने वारकरी सम्प्रदायका महान ग्रन्थ श्रीएकनाथी भागवत लिखकर पूरा किया था। हिन्दू धर्म में कहा जाता है कि प्रलयकाल में भी इस मंदिर का लोप नहीं हो पाया था। उस समय भगवान शंकर इसे अपने त्रिशूल पर धारण कर लिया था और सृष्टि काल आने पर इसे नीचे उतार दिया था। यही नहीं, आदि सृष्टि स्थली भी यही भूमि बतलायी जाती है। इसी स्थान पर भगवान विष्णु ने सृष्टि उत्पन्न करने की कामना से तपस्या करके आशुतोष को प्रसन्न किया था और फिर उनके शयन करने पर उनके नाभि-कमल से ब्रह्मा उत्पन्न हुए, जिन्होंने सृष्टि की रचना की। अगस्त्य मुनि ने भी विश्वेश्वर की बड़ी आराधना की थी और इन्हीं की अर्चना से श्रीवशिष्ठजी तीनों लोकों में पूजित हुए तथा राजर्षि विश्वामित्र ब्रह्मर्षि कहलाये। हैरत की बात है कि इतने पौराणिक धार्मिक स्थल की सौदेबाजी करने में जिम्मेदार अधिकारियों को तनिक संकोच नहीं हुआ। इस सम्बन्ध में धर्मार्थ कल्याण राज्य मंत्री विजय मिश्रा ने अपने हाथ खडे़ कर लिए। उन्होंने साफ कहा कि उन्हें इसके बारे में कोई जानकारी तक नहीं थी।

धार्मिक आस्था से जुडे़ इस भ्रष्टाचार का खुलासा उस वक्त सार्वजनिक हुआ जब भक्तों ने ऑनलाइन प्रसाद वितरण को लेकर सवाल उठाने शुरू किए। ऑनलाइन प्रसाद वितरण के शुरूआती दौर में ही कई भक्तों ने आरोप लगाया कि बाबा काशी विश्वनाथ के भक्तों को ऑनलाइन प्रसाद देने के नाम पर वेबसाइट ‘आईभक्ति’ फर्जीवाड़ा कर रही है। गौरतलब है कि 14 मार्च 2014 को मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के हाथों इस साइट की लांचिंग कराई गई थी। हैरत की बात है कि मन्दिर न्यास परिषद तक को यह नहीं मालूम था कि ऑनलाइन वितरित किया जाने वाला प्रसाद कहां बनवाया जा रहा था और किस मंदिर में चढ़ाकर उसे प्रसाद कहकर श्रद्धालुओं को ठगा जा रहा था। खास बात यह कि ये गोलमाल फिल्म अभिनेता डिनो मोरिया और उनके साथी की कंपनी डीओटी ई-सॉल्यूशन प्रा. लि. संस्था के जरिये साइट बनाकर किया जा रहा था। ये वही अभिनेता हैं जिन्होंने कई हिन्दी फिल्मों में नारी की नग्नता का दृश्य फिल्माया है। स्विटजरलैंड की अण्डर गारमेंटस बनाने वाली एक कम्पनी का विज्ञापन सूट करने पर इन्हें नोटिस तक दी जा चुकी है। इस विज्ञापन में डिनो मोरिया फिल्म अभिनेत्री बिपाशा बसु के साथ लगभग नग्न अवस्था में आपत्तिजनक स्थिति में फिल्माए गए थे। बाद में विवाद के चलते विज्ञापन बंद करना पड़ गया था।

विवाद बढ़ने और करार रद् होने के सवाल पर डिनो मोरिया का दावा है कि इस सम्बन्ध में मंदिर प्रशासन से बाकायदा करार किया गया था। जबकि मंदिर प्रशासन ऐसे किसी करार से इंकार करता रहा। ताज्जुब की बात है कि इतने विवाद के बावजूद प्रमुख सचिव धर्मार्थ कार्य नवनीत सहगल भी डिनो मोरिया की बातों का समर्थन करते रहे। दूसरी ओर मंदिर न्यास परिषद अध्यक्ष इसे सिरे से खारिज करते रहे। न्यास परिषद के अध्यक्ष का कहना है कि ऐसा प्रस्ताव मंजूर करना तो दूर की बात, न्यास परिषद में इसे कभी चर्चा के लिए भी पेश नहीं किया गया। इसके बावजूद ऑनलाइन प्रसाद की बिक्री धड़ल्ले से शुरू कर दी गई थी। सूबे के धर्मार्थ कार्य राज्य मंत्री विजय मिश्र ने भी ऐसी जानकारी से इंकार किया था। परिणामस्वरूप हिन्दुओं की आस्था की सौदेबाजी से जुडे़ इस मामले को लेकर न्यास परिषद में तो हलचल हुई ही थी साथ ही राजधानी लखनऊ में भी धार्मिक संगठनों ने विरोध जताना शुरू कर दिया था।

ऑनलाइन प्रसाद के रूप में लाल पेड़ा 550 रुपए में बेचा जा रहा था, जिसकी बाजार में कीमत 150 रूपयों के आस-पास थी। इस लाल पेड़े को प्रसाद बताकर श्रद्धालुओं के पते पर भेजने वाला यह प्रसंग हैरत में डालने वाला है। न्यास परिषद भी उस वक्त हैरत में पड़ गया था जब उसे यह पता चला कि ऑनलाइन प्रसाद भोले बाबा का प्रसाद बताकर डाक के माध्यम से भक्तों के घरों पर भेजा जा रहा था। मंदिर की देख-रेख करने वालों से लेकर न्यास परिषद ने भी हैरत जताते हुए कहा था कि जब काशी विश्वनाथ मंदिर का कोई प्रसाद मुम्बई की ऑनलाइन कम्पनी को भेजा ही नहीं गया तो फिर इसे प्रसाद बताकर कैसे बेचा जा रहा है। खीरा इंडस्ट्रियल इस्टेट, एसटी रोड सांताक्रूज मुंबई के पते से संचालित ‘आईभक्ति’ वेबसाइट के जरिये भक्तों को यह प्रसाद बेचा जाता था। व्यापार को बढ़ाने की गरज से वेब पेज पर धुआंधार प्रचार भी किया जाता रहा।

आईभक्ति वेबसाइट इसी कीमत पर प्रसाद के रूप में ड्राई फ्रूट भी दे रही थी। इस वेबसाइट पर भविष्य में बाबा की ऑनलाइन आरती और पूजा कराने की भी घोषणा हो चुकी थी। इतना ही नहीं वेबसाइट पर एक वीडियो भी अपलोड किया गया था। इस वीडियो में मंदिर के एक अर्चक को यह कहते दिखाया गया है कि ‘आईभक्ति की’ यह योजना न्यास परिषद की सहमति से तैयार की गई है और इसका लाभ भक्तों को मिल सकेगा। जब पत्रकारों ने न्यास परिषद के मुख्य कार्यपालक अधिकारी एके अवस्थी से इस सम्बन्ध में जानकारी हासिल की तो उन्होंने बताया कि ‘आईभक्ति’ की लखनऊ में लांचिंग के बारे में उन्होंने भी सुना है।

मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से इसका उद्घाटन भी कराया जा चुका है लेकिन अभी तक उनके पास इसके बारे में आधिकारिक निर्देश नहीं आया। जाहिर है पर्दे के पीछे का सारा खेल न्यास परिषद को अंधेरे में रखकर खेला गया था। इस सम्बन्ध में डिनो मोरिया से पूछे जाने पर उन्होंने बताया कि, ‘मैं अपर कार्यपालक पीएन द्विवेदी से इस योजना को लेकर मिला था। उनसे चर्चा के बाद ही इस वेबसाइट की लांचिंग कराई गयी थी। इसमें मेरी ओर से कोई फर्जीवाड़ा नहीं किया गया है। हम लोग तो ऐसे भक्तों की सेवा कर रहे हैं जो बाबा के दरबार तक पहुंच नहीं पाते’। डिनो के इस बयान पर मंदिर के संत-महंतों ने चुटकी लेते हुए यहां तक कहा था कि, ‘अब बाबा भोलेनाथ की सेवा वे लोग करेंगे जो नीचे से लेकर ऊपर तक व्यभिचार में डूबे हुए हैं’। कई संतों ने तो यूपी सरकार को घेरे में लेते हुए यहां तक सवाल उठाया था कि, ‘आखिर ये कौन से प्रसाद का वितरण किया जा रहा है जिसकी जानकारी न तो न्यास को है और न ही मंदिर के मुख्य पुजारी को। आखिर वह प्रसाद किस मंदिर में चढ़ाकर श्रद्धालुओं की आस्था से खिलवाड़ किया जा रहा है ? जहां तक श्री काशी विश्वनाथ मंदिर के प्रसाद की बात है तो वह हमेशा की तरह भक्तों में लगातार बंट रहा है। यह वह प्रसाद है जो भक्तगण स्वयं मंदिर में आकर चढ़ावे के रूप में चढ़ाते हैं’।

भ्रष्टाचार से जुडे़ इस तमाम मामले को उच्च स्तर पर दफन कर दिया गया लेकिन पांच महीनों के दौरान जिन हजारों भक्तों को ऑनलाइन मूर्ख बनाकर प्रसाद का वितरण किया गया, उसके लिए किसी की जवाबदेही तय नहीं की गयी। जाहिर है इस भ्रष्टाचार में उच्च स्तर से लेकर निचले स्तर तक के अधिकारी शामिल थे। फिलहाल अगस्त 2015 में  श्रीकाशी विश्वनाथ मंदिर में ऑनलाइन पूजन-अनुष्ठान और देश-विदेश में कहीं भी प्रसाद प्राप्त करने की व्यवस्था पर विराम लग चुका है। ज्ञात हो काशी विश्वनाथ मंदिर में इस तरह की आनलाइन व्यवस्था का शुभारंभ पांच माह पहले खुद मुख्यमंत्री ने लखनऊ से किया था। इसी के साथ शासन ने इस निमित्त अनुबंधित मे. साल्यूशन डिवोटी ई साल्यूशन प्राइवेट लिमिटेड का करार खत्म करने की मंदिर प्रशासन को अनुमति दे दी। अनुबंध निरस्तीकरण के साथ ही तत्काल क्रियान्वयन की सूचना भी मांग ली गई थी ताकि विवाद आगे न बढ़ सके। कहा जा रहा है कि साधू-संतों और न्यास से जुडे़ लोगों के प्रयास ने फिल्म अभिनेता की कंपनी को लाखों की चपत तो लगाई ही साथ ही श्रीकाशी विश्वनाथ मंदिर की सुविधा विस्तार में जुटी प्रदेश सरकार के लिए भी यह झटके से कम नहीं था।

ज्ञात हो कंपनी की आई-भक्ति पोर्टल से संचालन शुरू होने से पहले ही सनातनी परंपराओं का हवाला देते हुए फिल्म अभिनेता डिनो मारियो की कंपनी को जिम्मेदारी देने का विरोध शुरू हो गया था। इस बीच किसी तरह ऑनलाइन पूजन व प्रसाद व्यवस्था तो शुरू हुई, लेकिन यह अव्यवस्था ज्यादा दिनों तक नहीं चल पायी। इससे संबंधित बयानों के कारण ही मंदिर न्यास अध्यक्ष को भी निलंबन झेलना पड़ा और मामला कोर्ट तक पहुंचा। अधिवक्ता अशोक पांडेय ने भी लखनऊ हाईकोर्ट में जनहित याचिका दाखिल कर जिम्मेदार अधिकारियों को चुनौती दी थी। बताया जाता है कि कम्पनी महज 15 दिन ही अपनी योजना को संचालित कर पायी थी जबकि जानकार सूत्रों का दावा है कि जब तक विवाद पटल पर आता और कम्पनी का अनुबंध समाप्त किया जाता उस दौरान पांच माह का समय व्यतीत हो चुका था और इस बीच हजारों श्रद्धालुओं से ऑनलाइन ठगी की जा चुकी थी।

इस पूरे मामले में श्री काशी विश्वनाथ न्यास परिषद के अध्यक्ष आचार्य पंडित अशोक द्विवेदी ने विगत 8 अप्रैल 2015 को एक पत्र मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के नाम लिखा था। इस पत्र में नवनीत सहगल (प्रमुख सचिव, धर्मार्थ कार्य) को इस पूरे खेल का मुखिया बताते हुए कार्यवाही की मांग की गयी थी। पंडित अशोक द्विवेदी ने मुख्यमंत्री को भेजे अपने पत्र में लिखा है, ‘श्री काशी विश्वनाथ मंदिर के प्रबंधन, पर्यवेक्षण और नीतिगत निर्णय उप्र. श्री काशी विश्वनाथ मन्दिर अधिनियम-1983 के प्राविधानों के अनुरूप संचालित किए जाते है। श्री सहगल को इस अधिनियम की न तो कोई जानकारी है और न ही इनके द्वारा इसका अनुपालन कराए जाने का प्रयास कराया जाता है। समस्त कार्य श्री सहगल के मनमाने तरीके कराए जाने के प्रयास होते रहे हैं। श्री काशी विश्वनाथ मन्दिर के अधिनियम की धारा-5 में मन्दिर और उसके विन्यास श्री काशी विश्वनाथ मन्दिर न्यास परिषद में निहत हैं। न्यास में एक अध्यक्ष का पद जगद्गुरू शंकराचार्य, कुलपति (सम्पूर्णानन्द संस्कृत विद्यालय), दो स्थानीय प्रतिष्ठित व्यक्ति व तीन धर्मशास्त्री होते हैं।

साथ ही शासन की तरफ से प्रमुख सचिव (वित्त), प्रमुख सचिव (धर्मार्थ कार्य), सचिव (न्याय), निदेशक/प्रमुख सचिव (सांस्कृतिक कार्य) और वाराणसी के आयुक्त और जिलाधिकारी सदस्य होते हैं। न्यास के अध्यक्ष और 5 सदस्यों को शासन द्वारा चयनित करते हुए नामित किए जाते हैं। लिहाजा ऐसी स्थिति में नवनीत सहगल (प्रमुख सचिव, धर्मार्थ कार्य) न्यास परिषद के पदेन सदस्य हैं। सदस्य होने के नाते इन्हें अधिनियमों की समस्त जानकारी होनी चाहिए। न्यास परिषद की शक्तियों के अनुरूप ही इन्हें अपना आचरण और कार्य सम्पादित करना चाहिए लेकिन श्री सहगल नियमों के विपरीत कार्य कर करते रहे हैं’’। श्री द्विवेदी का आरोप है कि श्री चूंकि श्री सहगल सिख धर्म के अनुयायी हैं लिहाजा भगवान शंकर के प्रति उनका रवैया शर्मनाक है। नियमों के अनुसार न्यास परिषद के सदस्य के रूप में किसी हिन्दू का ही चयन किया जाता रहा है लेकिन इस बार अखिलेश सरकार में एक गैर हिन्दू को न्यास का सदस्य बनाकर थोप दिया गया। ऐसी दशा में श्री सहगल न तो न्यास परिषद के अध्यक्ष पद का अधिकार रखते हैं और न ही धर्मार्थ कार्य विभाग की कमान ही इन्हें सौंपी जानी चाहिए थी। यदि यह कहा जाए कि इनकी नियुक्ति अवैधानिक है तो कोई गलत नहीं है। श्री सहगल को दोषी ठहराने सम्बन्धी एक पत्र महामहिम राज्यपाल राम नाईक को भी लिखा गया था। महामहिम राज्यपाल कार्यालय की तरह से मुख्यमंत्री को भेजे गए पत्र में सम्पूर्ण प्रकरण की जांच के आदेश दिए गए थे।

श्री सहगल पर आरोप है कि ये श्री काशी विश्वनाथ मन्दिर के सम्बन्ध में जनविरोधी और मन्दिर के विकास में अवरोधक का कार्य कर रहे हैं। माननीय सर्वोच्च न्यायालय के दिशा-निर्देशों पर मन्दिर की सुरक्षा केन्द्रीय सुरक्षा बल के सिपुर्द किया गया है लेकिन श्री सहगल सर्वोच्च न्यायालय के दिशा-निर्देशों की अनदेखी करते हुए मन्दिर की आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था को भूतपूर्व सैनिकों के हवाले करने का निर्देश दिया था जिसे पुलिस उप महानिरीक्षक (प्रशा0) ने अपने पत्र संख्या डी-111/2015 सीएस-ओपीए /11-02-2015 के द्वारा अस्वीकार कर दिया था। इसके बावजूद श्री सहगल अपनी जिद पर अडे़ हुए हैं। कहा जा रहा है कि यदि ऐसा हुआ तो वेतन के रूप में मन्दिर निधि की वित्तीय व्यवस्था पर अतिरिक्त भार पडे़गा। प्रत्येक माह 30 लाख रूपयों की व्यवस्था करनी होगी जबकि मन्दिर में इतना चढ़ावा भी नहीं आता है। इस व्यवस्था को जबरन लागू करवाए जाने के पीछे आरोप है कि श्री सहगल अपने कुछ खास लोगों को नौकरी में समायोजित करने के इरादे से सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों की धज्जियां उड़ा रहे हैं। चर्चा यहां तक है कि भूतपूर्व सैनिकों को नौकरी दिलाने के नाम पर श्री सहगल ने उनसे मोटी रकम वसूल की है।

श्री सहगल ने श्री काशी विश्वनाथ मन्दिर की व्यवस्था को चाक-चौबन्द करने का हवाला देते हुए 187 नए पदों का सृजन कर मुख्य कार्यपालक अधिकारी पर दबाव बनाकर शासन के पास स्वीकृति के लिए भेजा है। चूंकि स्वीकृति भी इन्हें ही करनी है लिहाजा आने वाले दिनों यदि मन्दिर के कोष पर अतिरिक्त भार पड़ता है तो कोई आश्चर्य नहीं होना चााहिए। मौजूदा समय में मन्दिर की व्यवस्थाओं को संचालित करने के लिए एक मुख्य कार्यपालक अधिकारी, एक अपर मुख्य कार्यपालक अधिकारी, एक लेखाधिकारी, 6 लिपिक, 20 सेवादार और 22 पुजारी के पद सृजित हैं। श्री द्विवेदी की मानें तो यह संख्या मन्दिर की व्यवस्था को सुचारू रूप से बनाए रखने के लिए पर्याप्त है। यदि इसके बावजूद इन पदों को सृजित कर नियुक्ति की गयी तो मन्दिर के कोष पर 35 लाख का अतिरिक्त भार पडे़गा। यह राशि मन्दिर की मासिक आय से काफी कम है। श्री द्विवेदी ने मुख्यमंत्री को लिखे अपने पत्र में साफ कहा था कि इस कार्य के लिए श्री सहगल लगातार दबाव बना रहे हैं, इस कारण से वे मानसिक रूप से हतोत्साहित व परेशान हैं। इसके विपरीत मन्दिर न्यास परिषद के 15 सदस्यों में से 5 गैर सरकारी न्यास परिषद का पद लगभग एक वर्ष से खाली है। जिसके चयन के लिए आवेदन पत्र भी शासन को भेजे जा चुके हैं लेकिन श्री सहगल ने इन पदों को भरने में कोई रूचि नहीं दिखायी। चौंकाने वाली बात यह है कि वर्तमान में न्यास परिषद में हिन्दू धर्मावलम्बी और कर्मकाण्डी विद्वान सदस्यों की संख्या शून्य है जो मन्दिर अधिनियमों के बिलकुल विपरीत है। इस अनियमितता के लिए नवनीत सहगल पूरी तरह से जिम्मेदार हैं। ये हिन्दुओं की आस्था से खिलवाड़ कर रहे हैं।

न्यास परिषद के अध्यक्ष श्री द्विवेदी के शिकायती पत्र के अनुसार श्री काशी विश्वनाथ मन्दिर के कोष में 60 करोड़ से भी ज्यादा की रकम है। इस धनराशि का इस्तेमाल मन्दिर के विकास, परिवर्द्धन एवं श्रद्धालुओं व भक्तों की सुविधा और स्वास्थ्य के लिए व्यय किए जाने की व्यवस्था है लेकिन श्री सहगल मन्दिर परिसर में बिना आवश्यकता के नए-नए भवनों की परियोजना स्वीकृत कराने के लिए हमेशा दबाव बनाते रहे हैं। श्री द्विवेदी के अनुसार मन्दिर परिसर में स्थान का अभाव है। यहां तक कि श्रद्धालुओं की भीड़ भी यहां पर व्यवस्थित ढंग से खड़ी नहीं हो पाती। इसके बावजूद श्री सहगल लगातार अनावश्यक निर्माण के लिए दबाव बनाते रहे हैं। श्री द्विवेदी ने मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को जो पत्र लिखा था उसमें आशंका जतायी गयी थी कि श्री सहगल इस तरह का दबाव महज इसलिए बना रहे हैं क्योंकि वे अपनी पत्नी से निर्माण कार्य का डिजाईन बनवाकर लाखों रूपए काम के बदले में देना चाहते हैं। ज्ञात हो श्री सहगल की पत्नी आर्किटेक्ट हैं। साथ ही अपने स्थानीय मित्र आर.सी.जैन को भी वे लाभ पहुंचाना चाहते हैं जो बिल्डिंग निर्माण का कार्य करते हैं। इसकी सत्यता उनकी पत्नी की मन्दिर परिसर में गतिविधियों से सहज लगायी जा सकती है। जब इस मामले ने जोर नहीं पकड़ा था उस वक्त उनकी पत्नी प्रत्येक माह मन्दिर परिसर में आकर बिना किसी की इजाजत के रिक्त स्थानों पर प्रोजेक्ट बनाने का कार्य करती थीं। चूंकि वे श्री सहगल की पत्नी थीं लिहाजा न्यास परिषद के लोग भी हस्तक्षेप करने सक कतराते थे।

श्री काशी विश्वनाथ मन्दिर के बगल में मस्जिद के सामने थोड़ी खाली जमीन पड़ी है। उस पर श्री सहगल ने लगभग 20 शौचालय बनाने का प्रस्ताव बनाया है। यह इस्लाम धर्म के मानने वालों को शायद कतई मंजूर नहीं होगा। यदि श्री सहगल अपनी जिद पर अड़े रहते हैं तो निश्चित तौर पर इनकी हरकतों से काशी की धरती पर साम्प्रदायिक ताकतों को अपने मंसूबे पूरे करने का अवसर मिल जायेगा। श्री द्विवेदी ने अपने पत्र में लिखा है कि यदि इनकी जिद के चलते भविष्य में साम्प्रदायिक सद्भाव की स्थिति खराब होती है तो इसके लिए नवनीत सहगल पूरी तरह से जिम्मेदार होंगे। इनकी अनैतिक जिद ने न तो मन्दिर-मस्जिद की सुचिता का ध्यान रखा और न ही इस बिन्दु पर विचार किया गया कि वह स्थान रेड जोन के अन्तर्गत है। यहां पर किसी भी श्रद्धालुओं और दर्शनार्थियों का पहुंचना मुश्किल है। ऐसी दशा में इसका निर्माण करना मन्दिर की निधि का दुरूपयोग करने की श्रेणी में आता है।

आरोप है कि श्री सहगल ने विश्व प्रसिद्ध धार्मिक स्थल के न्यास परिषद में दो फाड़ करवा दिए हैं। श्री सहगल के करीबी मन्दिर के पुजारी और कुछ सेवादार अनैतिकता की हदें लांघते जा रहे हैं। यदि भविष्य में न्यास परिषद में ही सिर आपसी फुटौवल हो जाए तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए। श्री सहगल के द्वारा अंजाम दिया गया सर्वाधिक अनैतिक कार्य एक ईसाई समुदाय से सम्बन्ध रखने वाले फिल्मी कलाकार की ऑनलाईन कम्पनी को ऑनलाइन प्रसाद वितरण का टेण्डर आवंटित करना है। डीनो मोरिया अश्लील दृश्य प्रदर्शन को लेकर अक्सर चर्चा में रहते हैं। इसके बावजूद डिनो की कम्पनी को ठेका दिए जाने पर इस कदर विरोध हुआ कि आखिरकार श्री सहगल को टेण्डर निरस्त करना पड़ गया।

ऑनलाईन प्रसाद वितरण के लिए टेण्डर आवंटित करने में घोटालेबाजी का इससे बड़ा प्रमाण और क्या हो सकता है कि मार्च 2014 में ऑनालाईन प्रसाद वितरण की योजना बनती है और उसी दौरान मार्च 2014 में डिनो मोरिया अपनी कम्पनी को रजिस्टर करवाते हैं। आनन-फानन में मुख्यमंत्री को धोखे में रखकर उनसे उद्घाटन भी करवा दिया जाता है। बताया जाता है कि अब जबकि टेण्डर निरस्त हो चुका है और डिनो मोरिया को लाखों का नुकसान हो चुका है, इसकी भरपायी के लिए श्री सहगल ने यूपी में फिल्म निर्माण करने पर सरकार की योजना के तहत मोटी रकम दिलवाने का वायदा किया है। गौरतलब है कि श्री सहगल वर्तमान में धर्मार्थ कार्य विभाग के मुखिया होने के साथ ही प्रमुख सचिव सूचना के पद पर भी विराजमान हैं।

फिलहाल डिनो मोरिया के टेण्डर को तो निरस्त कर दिया गया लेकिन श्री काशी विश्वनाथ मन्दिर में श्री सहगल का अनैतिक हस्तक्षेप बरकरार है। न्यास परिषद के पूर्व अध्यक्ष ने मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से न सिर्फ श्री सहगल के हस्तक्षेप को रोकने की गुजारिश की है बल्कि उन्हें प्रमुख सचिव धर्मार्थ कार्य विभाग के पद से भी हटाने की गुजारिश की है। पूर्व अध्यक्ष की इस गुजारिश में दम भी है क्योंकि न्यास परिषद में सदस्य के रूप में गैर हिन्दू शामिल नहीं हो सकता। यह दीगर बात है कि सत्ता के दम पर कुछ भी कर लिया जाए। जानकार सूत्रों की मानें तो यदि कुछ समय और इसी तरह से श्री सहगल का हस्तक्षेप बरकरार रहा तो श्री काशी विश्वनाथ मन्दिर न्यास परिषद के पदाधिकारी ही श्री सहगल के विरोध में उतर आयेंगे। इन परिस्थितियों में अखिलेश सरकार पर राजनीतिक संकट से इंकार नहीं किया जा सकता।

अनैतिक दबाव
श्री काशी विश्वनाथ मन्दिर न्यास परिषद के अध्यक्ष आचार्य पण्डित अशोक द्विवेदी कहते हैं कि डिवोटी ई सॉल्यूशन प्रा0 लि0 को गलत ढंग से आवंटित किए गए कार्य को पूर्व की तिथि में अनुमोदित कराने के लिए लगातार दबाव बनाया जाता रहा। श्री द्विवेदी के मुताबिक उनकी ई-मेल आई डी पर 4 अप्रैल 2015 को दो पत्र आए। एक पत्र मुख्य कार्यपालक अधिकारी के हस्ताक्षर वाला था तो दूसरा पत्र श्री सहगल के हस्ताक्षर से उन्हें प्राप्त हुआ। इस पत्र में श्री द्विवेदी के पद को अंकित नहीं किया गया था। पत्र में उन्हें लखनऊ स्थित श्री सहगल के कार्यालय में बुलाया गया था। श्री द्विवेदी 7 अप्रैल 2015 को श्री सहगल के कार्यालय में उपस्थित हो गए। लगभग दो घण्टे तक वार्ता चलती रही। इन दो घण्टों के दौरान श्री सहगल इस बात के लिए दबाव बनाते रहे कि पूर्व की तिथि में कार्य को अनुमोदित कर दिया जाए। श्री द्विवेदी के मना करने पर श्री सहगल ने कहा कि ‘‘माननीय मुख्यमंत्री जी की इच्छा है कि इसे अनुमोदित कर दें, कोई देखने वाला नहीं है, इसे मैं स्वयं देख लूंगा’’। श्री सहगल ने वार्ता के दौरान अशोक द्विवेदी से साफ कहा कि, ‘मैं माननीय मुख्यमंत्री के सम्पर्क में हूं। जो भी कार्य कर रहा हूं, उनके दिशा-निर्देश में हो रहा है’। श्री द्विवेदी के इंकार करने पर सहगल ने उन्हें उनके पद से हटवा दिया था लेकिन श्री द्विवेदी ने न्यायालय की शरण में जाकर अपना अधिकार वापस हासिल कर लिया है।

फर्जी दावों की खुली पोल
जिस वक्त यह विवाद अपने उठान पर था उस वक्त हर एक ने अपनी जान बचाने की गरज से तमाम तरह के दावे किए। डिनो मोरिया स्वयं को निर्दोष बताते हुए कहते हैं कि सब कुछ नियमानुसार और ट्रस्ट को संज्ञान में लाते हुए हुआ था। दूसरी ओर धर्मार्थ कार्य विभाग के प्रमुख सचिव नवनीत सहगल ने कहा था कि ट्रस्ट की बैठक में इसका निर्णय हुआ था और सरकार के अनुमोदन के बाद ही वेबसाइट लांच हुई है। इसमें किसी तरह की कोई अनियमितता नहीं है। इस सम्बन्ध में अपर मुख्य कार्यपालक अधिकारी पीएन द्विवेदी ने उस वक्त जो कहा था वह भी चौंकाने वाला था। श्री द्विवेदी के अनुसार डिनो मोरिया से उनकी एक बार मुलाकात हुई थी। आईभक्ति वेबसाइट के बारे में उस वक्त तक उन्हें कुछ पता नहीं था। लखनऊ में मुख्यमंत्री ने जब उद्घाटन किया तब अखबारों के जरिये उन्हें पता चला। न्यास परिषद या मुख्य कार्यपालक समिति में इस योजना से संबंधित प्रस्ताव कभी नहीं लाया गया था। यहां तक कि मंदिर प्रशासन के पास तब तक इसका कोई रिकॉर्ड तक नहीं था। जाहिर है इस पूरे खेल में मन्दिर प्रशासन के हर जिम्मेदार व्यक्ति को अंधेरे में रखा गया था।

नियुक्ति विभाग ने मांगे थे साक्ष्य
श्री काशी विश्वनाथ मन्दिर न्यास परिषद (वाराणसी) के अध्यक्ष ने जुलाई 2015 में नियुक्ति अनुभाग-5 को धर्मार्थ कार्य विभाग के प्रमुख सचिव नवनीत सहगल को उनके पद से हटाने का अनुरोध किया था। इस पत्र के जवाब में नियुक्ति अनुभाग-5 (उप्र. शासन) से एक पत्र आचार्य पण्डित अशोक द्विवेदी को 22 जुलाई 2015 को प्रेषित किया गया था। पत्र में संयुक्त सचिव अनिल कुमार सिंह ने शिकायतों के समर्थन और पुष्टि के लिए समुचित साक्ष्य भी मांगे थे ताकि श्री सहगल के विरूद्ध विभागीय कार्यवाही की जा सके।

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लुटेरा अभियंता : आरोपी होने के बावजूद अरुण मिश्र बना सरकार का चहेता

तकरीबन तीन वर्ष पूर्व 2012 में जब युवा मुख्यमंत्री के रूप में अखिलेश यादव ने पद की शपथ ली तो उम्मीद जगी थी कि आधुनिक सोच और जोश के आगे भ्रष्टाचार फीका पड़ जायेगा। चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने दावा भी यही किया था कि सूबे की जनता को भ्रष्टाचारमुक्त प्रशासन मिलेगा। छत्तीस महीने गुजर जाने के बाद जब पिछले दिनों अखिलेश सरकार ने कागजी उपलब्धियों को गिनाना शुरू किया तो सत्ता विरोधी दलों ने सरकार की खामियों का पिटारा खोल दिया। यह बात स्वयं मुख्यमंत्री भी अच्छी तरह से जानते हैं कि तीन वर्ष की उपलब्धियों का बखान करने के लायक उनके पास कुछ नहीं था। इसके बावजूद सरकारी चमचों ने लाखों के विज्ञापनों के सहारे सरकार की उपलब्धि की बढ-चढ़कर चर्चा की। 

जहां तक अखिलेश सरकार के कार्यकाल में उपलब्धियों की बात है तो सूबे में भले ही विकास के कार्य नजर न आ रहे हों अलबत्ता इन तीन वर्षों में कुछ शीर्ष अधिकारियों ने भ्रष्टाचार के दम पर अपना विकास जरूर कर लिया है। कुछ तो ऐसे हैं जिनके भ्रष्टाचार से सम्बन्धित समस्त दस्तावेज सरकार के पास हैं, इसके बावजूद उनके खिलाफ कार्रवाई न करके सरकार जिंदा मक्खी निगल रही है। ऐसे ही एक अधिकारी हैं यूपीएसआईडीसी के मुख्य अभियंता अरुण मिश्र। कुछ समय पूर्व भ्रष्टाचार के तमाम आरोपों में घिरे होने के कारण श्री मिश्र के अधिकार छीन लिए गए थे लेकिन हाल ही में ये अधिकार उन्हें पुनः वापस दे दिए गए और वह भी तब जब जांच एजेंसियों ने अपनी रिपोर्ट में श्री मिश्र की भ्रष्टाचार में सलिप्तता के साथ-साथ उनकी शैक्षिक योग्यता को भी फर्जी ठहरा दिया था। इतना ही नहीं शैक्षिक योग्यता के फर्जी प्रमाण-पत्र का खुलासा होने के बाद हाई कोर्ट ने तो श्री मिश्र की नियुक्ति को ही अवैध ठहरा दिया था। 

इसके बावजूद अखिलेश सरकार अपने कुनबे में ऐसे वायरस को क्यों पाल रही है जिससे आने वाले समय में सपा का पूरा सिस्टम ही करप्ट हो सकता है। अरूण मिश्रा से सम्बन्धित भ्रष्टाचार के मामले में दोषी ठहराए जाने के बावजूद उनके खिलाफ विधिसम्मत कार्रवाई न किए जाने के पीछे क्या कारण हो सकते हैं ? यह जांच का विषय तो है ही साथ ही भ्रष्टाचार का यह कथित वायरस सरकार की छवि को लगातार धूमिल करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा है। आश्चर्य इस बात का है जिसे तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने निलम्बित कर दिया था उसे अखिलेश सरकार के कार्यकाल में पाल-पोस कर बड़ा किया जा रहा है। पेश है पूरी रिपोर्ट …….



भ्रष्‍टाचार और फर्जी डिग्रियों के संगीन आरोपों में चल रही है जांच 

लखनऊ। जब अखिलेश सरकार ने पिछले दिनों छत्तीस महीनों के कार्यकाल का बखान किया जो जेहन में एक सवाल जरूर पैदा हुआ कि आखिर ‘ये कैसी उपलब्धि जहां अधिकारी जनता के पैसों से खुद का घर भर रहा हो और जरूरतमंद के सिर पर छत तक नहीं। ये कैसी उपलब्धि जहां भ्रष्ट अधिकारी सम्मान-दर-सम्मान पाते जा रहे हों और कर्मठ हाशिए पर खड़े हों। ये कैसी उपलब्धि जहां विधायक से लेकर मंत्री तक तमाम आरोपों में घिरे हों और सरकार ‘‘फील गुड’’ का दावा कर रही हो’। ये उदाहरण तो महज बानगी भर हैं जबकि हकीकत यह है कि अखिलेश सरकार ने अपने तीन वर्षीय कार्यकाल में उपलब्धि के नाम पर ऐसे भस्मासुरों को संजीवनी प्रदान की है जिन पर सरकारी खजाना लूटने का आरोप लगता आया है। खास बात यह है कि ये आरोप महज हवाई नहीं बल्कि पुख्ता दस्तावेजों के साथ उसी विभाग के अन्य अधिकारी और कर्मचारी लगाते चले आ रहे हैं जिस विभाग का शीर्ष अधिकारी भ्रष्टाचार के मामले में दोषी है। बकायदा जांच एजेंसियां भी कई मामलों में अंतिम जांच रिपोर्ट लगाकर शासन के पास भेज चुकी हैं। चौंकाने वाला पहलू यह है कि तमाम दस्तावेजी सुबूतों और अपराधिक मुकदमों के बावजूद अखिलेश सरकार ऐसे दर्जनों कथित भ्रष्ट अधिकारियों की पोषक बनी हुई है। अरबों के भ्रष्टाचार से जुड़ा एक ऐसा ही मामला यूपीएसआईडीसी के मुख्य अभियंता अरुण मिश्रा के साथ जुड़ा हुआ है। 

शैक्षिक योग्यता के फर्जी प्रमाण-पत्र के खुलासे के बावजूद इस अधिकारी को तरक्की-दर-तरक्की मिलती चली गयी। अरबों रूपयों का घोटाला करने के बावजूद अखिलेश सरकार ने इस अधिकारी के खिलाफ पुख्ता कदम नहीं उठाए। सरकार की नीयत पर तो उसी वक्त संदेह हो चला था जब इस अधिकारी के खिलाफ दायर याचिका की सुनवाई करते समय हाई कोर्ट ने अरूण मिश्र की नियुक्ति को ही अवैध ठहरा दिया था। नियमतः न्यायपालिका के आदेश के बाद श्री मिश्र की सेवाएं समाप्त कर देनी चाहिए थीं लेकिन अखिलेश सरकार ने ऐसा कुछ भी नहीं किया। प्रदेश सरकार में व्याप्त भ्रष्टाचार का इससे बड़ा सुबूत और क्या होगा कि न्यायपालिका के आदेश के विपरीत राज्य सरकार लगातार इस अधिकारी को प्रमोशन देती रही। 

ज्ञात हो वर्ष 2004 में तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव ने इस अधिकारी को ‘‘पत्रावली संख्या सी 73/04’’ निलम्बित भी कर दिया था। निलम्बन की कार्रवाई को अंतिम रूप दिया जाता इससे पहले ही अरूण मिश्र ने अपने राजनैतिक आकाओं के सहारे निलम्बन के आदेश रद्द करवा दिए थे। तब से लेकर अब तक अरूण मिश्र तमाम आरोपों में घिरे होने के बावजूद सरकारी सेवा में बने हुए हैं। पार्टी से जुडे़ एक कार्यकर्ता की मानें तो अरूण मिश्र को यदि सलाखों के पीछे भेजा गया तो निश्चित रूप से अरबों की लूट मामले में पार्टी के कई दिग्गज नेताओं की संलिप्तता का खुलासा हो सकता है। दावा किया जा रहा है कि अरूण मिश्र के पास ऐसे कई पुख्ता दस्तावेज हैं जो सपा के दिग्गजों को मुसीबत में डाल सकते हैं। इन परिस्थितियों में यदि यह कहा जाए कि अभियंता अरूण मिश्रा सरकार को ब्लैकमेल कर अपने पद पर बने हुए हैं तो कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए। हालांकि यह जांच का विषय हो सकता है लेकिन जिस तरह से अखिलेश सरकार तथाकथित भ्रष्ट अभियंता को शरण दिए हुए है उससे इस आशंका से इंकार नहीं किया जा सकता।

अरूण मिश्र के भ्रष्टाचार का खुलासा सर्वप्रथम मुलायम सरकार के कार्यकाल वर्ष 2004 में किया गया था। यूपीएसआईडीसी इम्पलाइज यूनियन ने तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के पास भ्रष्टाचार से सम्बन्धित एक पत्र भेजा था। जिसमें श्री मिश्र से जुड़ी तमाम अनियमितताओं का साक्ष्यों सहित खुलासा करते हुए जांच की मांग की गयी थी। तत्कालीन मुख्यमंत्री ने भी इस मामले को गंभीरता से लेते हुए जांच के आदेश दे दिए थे। उस वक्त अरूण मिश्र यूपीएसआईडीसी में ‘मुख्य परियोजना अभियंता’ के पद पर तैनात थे। जांच पूरी करने के बाद निगम की तत्कालीन संयुक्त प्रबंध निदेशक के. धनलक्ष्मी ने आख्या शासन को भेज दी थी। उस पर तत्कालीन मुख्यमंत्री ने त्वरित कार्रवाई करते हुए ‘‘पत्रावली संख्या सी-73/04’’ निलम्बन का आदेश भी दे दिया था। निलम्बन के आदेश पर कार्रवाई होती इससे पहले ही श्री मिश्र ने अपने राजनैतिक आकाओं के सहारे निलम्बन का आदेश रूकवा लिया। कर्मचारी यूनियन ने दबाव बनाया तो दोबारा 5 अगस्त 2004 को पत्र संख्या ‘‘सी.एम.-242/77-4-04सी-73/04’’ के माध्यम से एक माह के भीतर जांच पूरी करने के आदेश दिए। मुख्यमंत्री के आदेश के बावजूद यह जांच चार महीनों तक पूरी नहीं की जा सकी थी।

तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के पास दस्तावेजों समेज जो शिकायती पत्र भेजा गया था उसके मुताबिक अरूण मिश्र ने मुख्य परियोजना अभियंता के पद पर रहते हुए नियम विरूद्ध तरीके से अकेले 30 करोड़ का भुगतान फर्मों को कर दिया था। यह भुगतान नवम्बर 2003 से जून 2004 के मध्य महज आठ महीनों में ही कर दिया गया था। जबकि शेष 26 करोड़ रूपया 11 निर्माण खण्डों द्वारा मिलकर किया गया था। एक अकेले अभियंता द्वारा इतनी बड़ी रकम का भुगतान किया जाना अपने आप में ही जांच का विषय बन सकता था लेकिन तत्कालीन सरकार ने कोई खास रूचि नहीं दिखायी। खास बात यह है कि 30 करोड़ के भुगतान में से एक ही समय में 22 करोड़ का भुगतान निगम की चेकों पर अधिशासी अभियंता की मुहर लगाकर और शेष 8 करोड़ रूपयों का भुगतान मुख्य परियोजना अभियंता की मुहर लगाकर किया गया था। यह कृत्य वित्तीय नियमों के खुले उल्लंघन की तरफ संकेत देता है।

आरोप है कि श्री मिश्र ने भारत सरकार और उत्तर-प्रदेश सरकार की संयुक्त महत्वाकांक्षी परियोजना एस.ई.जेड., मुरादाबाद में लेआउट के बगैर और बिना कब्जा लिए विवादित जमीन पर घटिया गुणवत्ता का कार्य करवाकर फर्जी तरीके से भुगतान भी करवा दिया। विभागीय कर्मचारियों का कहना है कि इस काम में श्री मिश्र ने करोड़ों रूपए का अनियमित मुनाफा कमाया। आरोप है कि श्री मिश्र ने भारत सरकार के कृषि विभाग ‘‘डेयरी’’ से सम्बन्धित बागपत में चल रहे डिपाजिट वर्क में कार्य करवाने के लिए फर्मों से सुविधा शुल्क में रूप में एक करोड़ रूपए वसूले। इस सम्बन्ध में समस्त दस्तावेज तत्कालीन मुख्यमंत्री को उपलब्ध करवा दिए गए थे। ‘ट्रोनिका सिटी’ योजना के अन्तर्गत 12 करोड़ की लागत से बनने वाली सड़कों में घटिया सामग्री के साथ ही मानक के विपरीत काम करवाया। बताया जाता है कि घटिया कार्य के एवज में उन्हें करोड़ों का मुनाफा हुआ। बताया जाता है कि ट्रोनिका सिटी में सी.सी. रोड निर्माण के लिए 9 करोड़ के टेण्डर में भी जमकर कमाई की गयी। इस भ्रष्टाचार से सम्बन्धित तमाम दस्तावेज शासन के पास उपलब्ध हैं।

अरूण मिश्रा पर आरोप है कि सरकारी अधिकारी होते हुए वे एफ.डी.आर.ए. नाम से एक एन.जी.ओ. भी चलाते रहे। यह कृत्य निगम की आचरण अनुशासन नियमावली के प्रस्तर-16 के मुताबिक कदाचार की श्रेणी में आता है। इस सम्बन्ध में तमाम शिकायतें भी की गयी थीं लेकिन सरकार ने कोई हस्तक्षेप नहीं किया। बताया जाता है कि इस एन.जी.ओ. के माध्यम से श्री मिश्र ने कई सरकारी प्रोजेक्ट हासिल कर करोड़ों कमाए।

सत्ता से इनके मधुर सम्बन्धों का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि ये बिना बताए 10-12 दिन ऑफिस से गायब रहते हैं। शीर्ष अधिकारी टोकते हैं तो उन्हें धमकियां सुननी पड़ती हैं। प्रत्येक माह लम्बे समय तक गायब रहने के बावजूद इन्हें वेतन पूरे माह का दिया जाता है। वैसे तो इनके खिलाफ आरोपों की लम्बी फेहरिस्त है लेकिन वर्तमान सरकार के कार्यकाल में ऐसे अभियंता को संजीवनी प्रदान की जा रही है जिसके खिलाफ सैकड़ों की संख्या में भ्रष्टाचार के आरोप हैं। और वह भी बकायदा पुख्ता दस्तावेजों के साथ। इसके बावजूद अखिलेश सरकार के कार्यकाल में सितम्बर 2013 में इस भ्रष्ट अधिकारी को प्रोन्नति दे दी गयी। विभागीय कर्मचारियों का भी आरोप है कि यूपीएसआईडीसी में भ्रष्टाचार के आरोपी अधिकारी के विरुद्ध कार्रवाई के बजाय उनके अधिकारों में बढ़ोत्तरी की जा रही है। प्रबंधन ने भ्रष्टाचार के मामलों में जांच का सामना कर रहे मुख्य अभियंता अरुण मिश्रा के अधिकारों में बढ़ोत्तरी करते हुए उन्हें आर्किटेक्चर एंड टाउन प्लानर (एटीपी) का प्रभारी बना दिया था। 

गौरतलब है कि अरुण मिश्र पर ट्रोनिका सिटी घोटाले में एसआईटी दो मुकदमे भी दर्ज कर चुकी है। इतना ही नहीं फर्जी तरीके से बैंक खातों का संचालन करने पर सीबीआई उन्हें गिरफ्तार कर चुकी है। इन इस बातों को नजरअंदाज करते हुए अखिलेश सरकार ने अरुण मिश्रा को उप्र राज्य औद्योगिक विकास प्राधिकरण का भी प्रभारी बना दिया था। विभागीय कर्मचारियों ने आंदोलन की धमकी दी तो बाद में यह प्रभार उनसे छीन लिया गया। सरकार का इस भ्रष्ट अभियंता के प्रति स्नेह का इससे बड़ा उदाहरण और क्या हो सकता है कि तमाम आरोपों और विरोध प्रदर्शन के बावजूद उसे किसी न किसी तरह से लाभान्वित किया जाता रहा। अखिलेश सरकार ने ही इस अभियंता को औद्योगिक क्षेत्रों में भूखंडों का नक्शा पास करने के लिए एटीपी का प्रभारी बना दिया। बताया जाता है कि यह कार्य सर्वाधिक उपरी कमाई वाला है। इतना ही नहीं कथित भ्रष्ट अधिकारी के प्रति अखिलेश सरकार के समर्पण का इससे बड़ा उदाहरण और क्या हो सकता है कि हाल ही में मार्च 2015 में अरूण मिश्र के वित्तीय अधिकार एक बार फिर से बहाल कर दिए गए। ज्ञात हो शासन के आदेश पर प्रबंध निदेशक ने उनके वित्तीय और प्रशासनिक अधिकार पुनः बहाल कर दिए हैं। 

गौरतलब है कि विरोध प्रदर्शन के बाद 13 फरवरी को अरुण मिश्र के अधिकार छीन लिए गए थे। बताते चलें कि अरुण मिश्रा के विरुद्ध दो दर्जन से अधिक बैंक खातों का गलत ढंग से संचालन, आय से अधिक संपत्ति समेत कई मामलों में सीबीआई जांच चल रही है। इसके साथ ही प्रवर्तन निदेशालय भी उनकी कई जगहों की संपत्तियों को जब्त कर चुकी है। महत्वपूर्ण पहलू यह है कि श्री मिश्र के हाईस्कूल का अंकपत्र भी फर्जी पाया गया था।  इस सम्बन्ध में वरिष्ठ प्रबंधक हाउसिंग अनिल वर्मा ने अरुण के विरुद्ध हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। आरोप सही पाने पर हाईकोर्ट ने अरुण को बर्खास्त कर दिया। इस पर अरुण ने सुप्रीम कोर्ट का सहारा लिया तो वहां से हाईकोर्ट के फैसले पर रोक लगा दी गयी। 

अभी हाल ही में लखनऊ में आईएएस वीक के दौरान एक आईएएस अफसर ने मुख्यमंत्री व मुख्य सचिव से अरुण की शिकायत की थी। उक्त आईएएस अफसर यूपीएसआईडीसी में एमडी भी रहे और अरुण के विरुद्ध उन्होंने एक घोटाले के मामले में कार्रवाई भी की थी। उनकी शिकायत पर ही अरुण के अधिकार 13 फरवरी को छीन लिए गए थे। इसी के साथ ही अरुण के कराये गए विकास कार्यो की जांच का आदेश दिया गया था। जांच तो शुरू नहीं हो सकी थी अलबत्ता उनके छीने गए अधिकार उन्हें वापस जरूर दे दिए गए। अब सवाल यह उठता है कि अरूण के खिलाफ मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से शिकायत करने वाले उक्त आई.ए.एस. अधिकारी के आरोपों को नजरअंदाज क्यों किया गया। हालांकि मुख्यमंत्री के इस कदम से आई.ए.एस. संवर्ग में रोष जरूर है लेकिन अरूण मिश्र के प्रति सरकार जिस तरह से नतमस्तक नजर आ रही है उससे उक्त आई.ए.एस. अधिकारी ने अपने कदम वापस खींच लिए हैं। बताया जाता है कि अब अभियंता अरूण मिश्रा उसी आई.ए.एस. अधिकारी के पर कतरने के लिए मुख्यमंत्री पर दबाव बना रहे हैं

गौरतलब है कि उत्तर प्रदेश के चर्चित यूपीएसआइडीसी के चीफ इंजीनियर अरुण कुमार मिश्र के खिलाफ इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाते हुए  अरुण कुमार मिश्र की सभी शैक्षिक डिग्रियों को अवैध करार दे दिया था। अहम बात ये है कि फर्जी दस्तावेजों के सहारे नौकरी हासिल करने वाला ये इंजीनियर अपनी 28 साल की नौकरी में हजारों करोड़ का मालिक बन बैठा। इतना ही नहीं वह विभिन्न सरकारों के आला नेताओं से करीब का रिश्ता कायम करके मनमानी करता रहा। हद तो तब हो गयी थी जब सी.बी.आई. में वांटेड होने के बावजूद प्रदेश की एक सरकार ने इसे इसी पद पर ज्वाइन करवा दिया था। आरोप है कि ये अभियंता पिछले काफी समय से यू.पी.एस.आई.डी.सी. को जोंक की तरह चूसता रहा। 

कहा जाता है कि श्री मिश्रा अपनी राजनितिक पहुँच के दम पर मनचाहे तबादले व पोस्टिंग तक यूपीएसआइडीसी में करवाता रहे। यहाँ तक कि विभागीय एम डी तक अरुण मिश्रा से खौफ खाते थे। फर्जी शिक्षा दस्तावेजों का मामला सामने आने पर हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को इस इंजीनियर की सभी पदों पर नियुक्तियां रद्द करने के आदेश दिया था इसके बावजूद श्री मिश्रा की नियुक्ति तो रद्द नहीं हुई बल्कि उसे प्रोन्नत जरूर कर दिया गया। इस तरह से यदि देखा जाए तो सरकार ने खुलेआम न्यायपालिका के आदेशों की अवमानना की है। बताया जाता है कि अवमानना मामले को लेकर भी एक अधिकारी ने याचिका दाखिल करने का मन बनाया है।

फर्जी डिग्री का मामला वर्ष 2014 में ही साफ हो गया था कि अरूण मिश्रा ने फर्जी डिग्रियों के सहारे न सिर्फ सरकारी सेवा हासिल की बल्कि अपने राजनैतिक आकाओं के सहारे वे अति महत्वपूर्ण पद पर भी विराजमान होते चले गए। यूपीएसआईडीसी के चीफ इंजीनियर अरुण कुमार मिश्र पर कई घोटालों में शामिल होने का आरोप लग चुका है। जांच के दौरान उनकी 10वीं की मार्कशीट और बाकी डिग्री भी फर्जी निकली। दिलचस्‍प बात यह है कि आरोपी इंजीनियर ने जब 28 साल की नौकरी कर ली, उसके बाद यह तथ्‍य सामने आया। हाईकोर्ट ने इस इंजीनियर के सभी पदों पर नियुक्तियां रद्द करने के आदेश दिए थे। अरुण कुमार मिश्र के दस्‍तावेजों के मुताबिक, उन्‍होंने 1976 में घाटमपुर के श्री गांधी विद्यापीठ इंटर कॉलेज से हाईस्कूल की परीक्षा पास की। हाईस्‍कूल मार्कशीट में उनका रोल नंबर 511719 है, लेकिन बोर्ड और कॉलेज के दस्‍तावेजों में यह रोल नंबर किसी अरुग्य कुमार मिश्र के नाम दर्ज है। 

ज्ञात हो इस सन्दर्भ में उनके खिलाफ उन्हीं के महकमे के वरिष्ठ प्रबंधक हाउसिंग अनिल कुमार वर्मा ने हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की थी। उनकी याचिका पर सुनवाई करते हुए इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस अरुण टंडन और एके मिश्र की खंडपीठ ने यह फैसला सुनाया था। याचिकाकर्ता ने चीफ इंजीनियर की बीटेक की डिग्री पर भी सवाल उठाए थे। कोर्ट ने मिश्र की उस मांग को अस्वीकार कर दिया जिसमें कहा गया था कि इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल करने के लिए 15 दिन तक इस फैसले के अमल पर रोक लगाई जाए।

पूर्व मुख्यमंत्री मायावती सरकार के कार्यकाल में भी अरूण मिश्रा का नाम बेहद चर्चा में रहा। उस वक्त भी यह बात साफ हो गयी थी कि अरुण मिश्रा नाम के एक अभियंता ने यूपीएसआईडीसी में करोड़ों का गोलमाल किया है। उस वक्त यह कहा जाता था कि अरूण मिश्रा सपा के पूर्व महासचिव अमर सिंह के सबसे चहेते लोगों में से एक थे। मुलायम सरकार के पतन के बाद जब यूपी में बसपा ने सत्ता संभाली तो यह कहा जाने लगा था कि अब अरूण मिश्रा सलाखों के पीछे नजर आयेंगे लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। यह दीगर बात है कि माया सरकार गठित होते ही अरुण मिश्रा के खिलाफ एसआईटी की जांच बैठा दी गयी थी। अरूण मिश्रा से छत्तीस का आंकड़ा रखने वाले कई अफसरों ने जांच का कार्य तेजी से शुरू किया ताकि अरूण मिश्रा को मौका न मिल सके। लेकिन शातिर दिमाग के माहिर अरूण मिश्रा ने बसपा के ही एक बड़े नेता के घर पहुंचकर उन्हें उनकी मुंहमांगी रकम भेंट कर दी। 

जानकार सूत्रों की मानें तो अरूण मिश्रा ने यह रकम बसपा के कद्दावर नेता नसीमुद्दीन सिद्दीकी और स्वामी प्रसाद मौर्य को भेंट की थी। चढ़ावा चढ़ते ही पैसों ने अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया। कुछ समय पहले तक जिन पुलिस अफसरों से यह कहा जा रहा था कि अरुण मिश्रा के खिलाफ जल्द जांच पूरी कर रिपोर्ट शासन को भेजी जाए, बाद में उन्हीं अफसरों को जांच का कार्य रोक देने का निर्देश दिया। यह खुलासा अरूण मिश्रा के खिलाफ जांच कर रहे कुछ तत्कालीन पुलिस अफसरों ने किया था। हालांकि इस खुलासे के बाद बसपा विरोधी दलों ने जमकर विरोध प्रदर्शन किया था लेकिन पूर्ण बहुमत के आधार पर सत्ता पर काबिज बसपा अपनी ही जिद पर अड़ी रही। इतना ही नहीं अरुण मिश्रा के भ्रष्टाचार से जुड़ी कई फाइलों को ही गायब कर दिया गया था। इस बात का खुलासा जांच टीम ने भी किया था।

अरुण मिश्रा की राजनैतिक हैसियत का इससे बड़ा उदाहरण और क्या हो सकता है कि निलम्बन काल में भी वह अपने चहेते अधिकारियों की पोस्टिंग करवाता रहा। कहा जाता है कि अरुण मिश्रा को पूर्व मुख्यमंत्री मायावती के अति विश्वसनीय और कई घोटालों में संलिप्त रहे पूर्व मंत्री बाबू सिंह कुशवाहा की सरपरस्ती मिलती रही। आलम यह रहा कि ट्रोनिका सिटी घोटाले में तत्कालीन प्रबंध निदेशक बलबिंदर कुमार ने उसे निलंबित कराया तो बाद में उन्हें भी निलंबित होना पड़ा था। आरोप है कि तत्कालीन मुलायम सरकार के कार्यकाल 2006-07 में इस इंजीनियर ने सबसे पहले गाजियाबाद और सूरजपुर के ट्रोनिका सिटी में भूखंडों के आवंटन और विकास कार्यो में चार सौ करोड़ रुपये से भी अधिक के घोटाले को अंजाम दिया था। जब सत्ता विरोधी दलों ने कींचड़ उछालना शुरू किया तो तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम ने अरूण मिश्रा को निलंबित कर दिया गया था। अपना निलम्बन निरस्त करवाने के लिए उसने सपा के पूर्व महासचिव उसकी अमर सिंह से नजदीकियां बढ़ायीं। 

अमर सिंह के सम्पर्क में आते ही उसकी ताकत और बढ़ती गयी। हालांकि तमाम प्रयासों के बावजूद मुलायम शासन में उसे बहाल नहीं किया जा सका था लेकिन विभाग में उसका प्रभाव बदस्तूर जारी रहा। जहां तक यूपीएसआईडीसी की बात है तो मंत्री से ज्यादा अरूण मिश्रा का प्रभाव विभाग में काम आता है। जब यूपी में बसपा की सरकार बनी तो बाबू सिंह कुशवाहा की सरपरस्ती और बसपा के कद्दावर नेताओं को मोटी भेंट चढ़ाने के बाद उसे पुनः बहाल कर दिया गया था। जानकार सूत्रों का कहना है कि अक्टूबर 2008 को तत्कालीन एमडी एसके वर्मा ने चेयरमैन को पत्र लिखकर अरुण कुमार मिश्रा को तत्काल उनके पद से हटाने के लिए भी कहा था लेकिन उन्हें नहीं हटाया गया। 

गौरतलब है कि उस वक्त बाबू सिंह कुशवाहा निगम के चेयरमैन थे। एसके वर्मा पर दोबारा दबाव पड़ा तो उन्होंने अरुण को ट्रोनिका सिटी मामले में दोषी तो माना, लेकिन सिर्फ दो वेतन वृद्धि रोकने की संस्तुति कर फाइल बंद कर दी। बसपा शासनकाल में सीबीआई ने 2011 में अरुण को गिरफ्तार भी किया था। गिरफ्तारी के बाद अरूण निलंबित भी किया गया था लेकिन सत्ता परिवर्तन के बाद अखिलेश सरकार के कार्यकाल में उसे फिर से बहाल कर दिया गया। छह सितंबर 2013 को उसने  खुद को आर्किटेक्चरल एंड टाउन प्लानिंग डिपार्टमेंट का मुखिया घोषित कर दिया। अरुण का नाम दिल्ली के पाश इलाके में एक हजारों गज में फैली कोठी खरीदने को लेकर भी खूब उछला लेकिन ऊँचे रसूख के चलते मामला ज्यादा दिन तक सुर्खियां नहीं बन सका। मामला फिलहाल सुप्रीम कोर्ट में है।

कहा जाता है कि वर्ष 1986 में अनियमित सहायक अभियंता के पद पर नियुक्ति पाने के बाद अरूण मिश्रा ने अपने राजनैतिक आकाओं के सहारे जल्द ही मुख्य परियोजना अधिकारी के पद पर अधिकार स्थापित कर लिया जबकि उस वक्त वे उक्त पद के योग्य भी नहीं थे। इतना ही नहीं उक्त पद के लिए कई सीनियर अभियंता भी लाईन में थे। तत्कालीन सरकार ने सभी को नजरअंदाज कर श्री मिश्रा को मुख्य परियोजना अभियंता के पद पर आसीन कर विरोधियों को अरूण के खिलाफ हल्ला बोलने के लिए खड़ा कर दिया। उस वक्त कहा जा रहा था कि तत्कालीन सरकार ने ही अरूण मिश्रा के पर कतरने की गरज से उनके विरोधियों की संख्या बढ़ाने के लिए ही प्रमोशन दिया था। इसका असर भी जल्द नजर आने लगा। विभाग के तमाम अधिकारियों ने अरूण मिश्रा के भ्रष्टाचार से जुडे़ तमाम दस्तावेज विभागाध्यक्ष से लेकर मुख्यमंत्री तक उपलब्ध करवाना शुरू कर दिया था। उसके बाद से जो सिलसिला चला वह अनवरत आज भी जारी है।

विभागीय अधिकारियों का कहना है कि अरूण मिश्रा निगम को अब तक अरबों रूपयों की क्षति पहुंचा चुके हैं। इन्होंने योजनाओं में सेंध लगाकर इतना रूपया संकलित कर रखा है कि वे किसी की भी सरकार हो, पैसों के बल पर वे अपना रूतबा कायम रखने में कामयाब हो जाते हैं। यही वजह है कि तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव द्वारा निलम्बित किए जाने के बाद भी अरूण मिश्रा न सिर्फ बसपा सरकार के कार्यकाल में बहाल हो गए बल्कि वर्तमान अखिलेश सरकार में भी उनका रूतबा कायम है। बताया जाता है कि अरूण मिश्रा की पैरवी करने वालों में विधायक, मंत्री से लेकर कुछ नौकरशाह भी शामिल हैं जिन पर अरूण मिश्रा के धन की कृपादृष्टि बनी रहती है।

लगभग एक दशक पूर्व ग्राम मॉजा शेखपुरा, कनखल, हरिद्वार में स्थित बेशकीमती जमीन निगम ने अर्जित की थी। उस भूमि को अरूण मिश्रा ने कथित भू-माफिया नरेश धीमान से लाखों रूपए सुविधा शुल्क के रूप में लेकर कब्जा करवा दिया। बकायदा नियम विपरीत तरीके से अनापत्ति प्रमाण-पत्र भी स्वयं जारी कर दिया जबकि उस वक्त अनापत्ति प्रमाण-पत्र जारी करने का अधिकार उनके पास नहीं था। बताया जाता है कि उस वक्त उस जमीन की कीमत तकरीबन एक करोड़ रूपए के आस-पास थी। वर्तमान में उस जमीन की कीमत अरबों की बतायी जा रही है।

इस अनियमितता को लेकर निगम के अन्य अधिकारियों ने न्यायालय में वाद भी दाखिल किया था। चूंकि अरूण मिश्रा ने ही अनापत्ति प्रमाण-पत्र जारी किया गया था लिहाजा भू-माफिया के अधिवक्ता ने इसका फायदा उठाते हुए निगम को ही चुनौती दे दी। परिणामस्वरूप निगम वह मुकदमा हार गया। इस प्रकरण की शिकायत टिहरी गढ़वाल के तत्कालीन विधायक मातबर सिंह कण्डारी एवं पूर्व मुख्यमंत्री राम नरेश यादव से भी की गयी थी। चूंकि पैसों के बल पर अरूण मिश्रा ने सियासी दलों में अपनी गहरी पैठ बना रखी थी लिहाजा श्री मिश्रा के खिलाफ कार्रवाई संभव नहीं हो सकी।

आरोप है कि निगम के औद्योगिक क्षेत्र मसूरी गुलावटी रोड, जिला गाजियाबाद में हजारों की संख्या में दशकों पुराने हरे-भरे पेड़ों को अरूण मिश्रा के निर्देश पर कटवा दिया गया। इस काम के लिए श्री मिश्रा ने बेहद चालाकी से समस्त कार्यविधि को अंजाम दिया। बताया जाता है कि क्षेत्र में महज 2950 पेड़ दर्शाए गए जबकि उस वक्त इस क्षेत्र में पेड़ों की संख्या अभिलेखों में 31 हजार 766 के आस-पास थी। श्री मिश्रा ने फर्जी नीलामी के सहारे समस्त पेड़ महज 4 लाख 60 हजार में बेच दिया जबकि अभिलेखों के अनुसार उस वक्त इन पेड़ों की अनुमानित कीमत 8 करोड़ से भी ज्यादा थी। विभागीय कर्मचारियों का आरोप है कि जंगल माफिया ने इस कार्य के लिए श्री मिश्रा को करोड़ों की भेंट चढ़ायी थी। इस अनियमितता की शिकायत भी तत्कालीन मुख्यमंत्री और प्रमुख सचिवों से की गयी थी लेकिन सत्ता में मजबूत पैठ और धन के बल पर श्री मिश्रा के विरूद्ध कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो सकी।

ट्रोनिका सिटी क्षेत्र के सेक्टर 8 व 9 में मौजूद 12 हजार 500 हरे-भरे पेड़ों को श्री मिश्रा ने कटवा दिया। गौरतलब है कि उक्त पेड़ सघन वृक्षारोपण अभियान के तहत लगवाए गए थे। जानकारी के मुताबिक समस्त पेड़ों की आयु लगभग 2 वर्ष थी। यह वृक्षारोपण वन विभाग के तहत करवाया गया था। जब पेड़ों की कटान शुरू हुई तो वन विभाग ने हस्तक्षेप भी किया लेकिन श्री मिश्रा की राजनैतिक पहुंच ने वन विभाग को बैकफुट पर धकेल दिया। नियमानुसार यदि विकास के नाम पर वन विभाग के अधीन पेड़ों को कटवाया भी जाना था तो इसके लिए सर्वप्रथम वन विभाग की स्वीकृति भी जरूरी थी लेकिन श्री मिश्रा ने ऐसा कुछ भी नहीं किया। इस विषय पर वन विभाग के कर्मचारियों का कहना है कि यदि इसी तरह से मनमानी की जानी है तो वन विभाग के अस्तित्व की आवश्यकता ही नहीं है। 

इस सन्दर्भ में यूपीआईडीसी इम्प्लाइज यूनियन ने श्री मिश्रा के भ्रष्टाचार से सन्दर्भित कई पत्र शासन-प्रशासन के जिम्मेदार अधिकारियों के पास भेजे लेकिन एक दशक का समय गुजर जाने के बाद भी उक्त मामले में श्री मिश्रा के खिलाफ सजा तय नहीं की जा सकी। इसी तरह से गाजियाबाद स्थित हर्षा ट्रैक्टर की निगम द्वारा खरीदी गयी भूमि पर लगे 500 से भी अधिक वृक्षों को विकास के नाम पर कटवा दिया गया। इन पेड़ों में अधिकतम पेड़ कीमती शीशम के थे। उस वक्त उन पेड़ों की कीमत लाखों में आंकी गयी थी।

नियमानुसार विकास के नाम पर कटवाए गए पेड़ों को बेचकर जो रकम प्राप्त की जाती है उसे सरकारी खजाने में जमा होना चाहिए, लेकिन श्री मिश्रा ने समस्त पेड़ों की कटाई से प्राप्त रकम स्वयं हजम कर ली। जब इस मामले की जानकारी शासन को दी गयी तो सम्बन्धित विभाग के विभागाध्यक्ष ने इस मामले की जांच तत्कालीन संयुक्त प्रबंध निदेशक आलोक कुमार से करवाने के निर्देश जारी किए गए। जांच शुरू होती इससे पहले ही श्री मिश्रा ने अपने राजनैतिक आकाओं और नौकरशाहों के बीच मौजूद अपने हमदर्दों की मदद से जांच रूकवा दी। हालांकि इसके बाद कई बार यूनियन ने जांच के लिए सरकार के पास पत्र भेजे लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई।

उत्तर-प्रदेश पुलिस आवास निगम लिमिटेड में अल्पकालीन प्रतिनियुक्ति के दौरान भी श्री मिश्रा अपनी हरकतों से बाज नहीं आए। आरोप है कि तमाम योजनाओं में श्री मिश्रा ने घालमेल किया। महत्वपूर्ण यह है कि इस मामले की शिकायत स्वयं पूर्व मुख्यमंत्री रामनरेश यादव ने की थी। जांच के बाद दोषी पाए जाने पर इनसे वसूली तक के आदेश जारी किए गए थे लेकिन कुछ दिनों तक मामला गर्म रहने के बाद ठण्डे बस्ते में चला गया।

यूपीआईडीसी की महत्वाकांक्षी परियोजना ‘‘गाजियाबाद स्थित ट्रोनिका सिटी’’ भी इनके भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ गयी। आरोप है कि श्री मिश्रा ने अवैध कमाई के फेर में गाजियाबाद के औद्योेगिक और आवासीय क्षेत्रों में आवश्यकता से अधिक पानी की टंकियों और सीवरेज के कार्य करवा डाले और वह भी अत्यंत निम्न स्तर के। समस्त कार्यों का बिना परीक्षण के ही भुगतान भी कर दिया गया था। आरोप है कि श्री मिश्रा ने इस कार्य के लिए ठेकेदारों से करोड़ों रूपए सुविधा शुल्क के रूप में वसूल किए।

श्री मिश्रा के द्वारा करवाए गए कार्यों की गुणवत्ता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि एस.ई.जेड. मुरादाबाद और ट्रोनिका सिटी में बनवाई गयी दीवारें महज तेज हवा में ही धाराशायी हो गयी थीं। यूनियन का आरोप है कि श्री मिश्रा के इर्द-गिर्द उनके पसंदीदा और विश्वसनीय कर्मचारियों का काकस बना रहता है। यही काकस सरकारी योजनाओं से प्राप्त होने वाले धन की लूट में लगा रहता है। टेण्डर पूल करवाने के लिए विज्ञापन दिए जाने की व्यवस्था है। इस कार्य में भी श्री मिश्रा ने अनियमितता बरती। नियमानुसार सर्वाधिक प्रसार संख्या वाले समाचार-पत्रों में विज्ञापन प्रकाशित करने का नियम है ताकि ज्यादा से ज्यादा ठेकेदार टेण्डर में शामिल हो सकें। श्री मिश्रा ने ऐसा न करके कार्यस्थल से सैकड़ों किलोमीटर दूर प्रकाशित होने वाले समाचार-पत्रों में टेण्डर छपवाया ताकि टेण्डर की प्रक्रिया में वही लोग शामिल हो सकें जो उन्हें कमीशन के रूप में मोटी रकम दे सके।

मुख्य अभियंता अरूण मिश्रा के खिलाफ गुण्डागर्दी और चरित्रहीनता से सम्बन्धित कई शिकायतें विभागाध्यक्ष और मुख्यमंत्रियों के पास भेजी जा चुकी हैं। यहां तक कि सम्बन्धित थाने में उनके खिलाफ मुकदमा अपराध संख्या 32 के तहत आई.पी.सी. की धारा 506 के तहत दर्ज है। यह मुकदमा उन्हीं के विभाग में कार्यरत रहे तत्कालीन सहायक अभियंता प्रदीप शर्मा ने दर्ज करवाया था। इतना ही नहीं गाजियाबाद स्थित निगम की कालोनी की महिलाओं ने भी इनके खिलाफ चरित्रहीनता और गुण्डागर्दी से सम्बन्धित शिकायतें दर्ज करवाई थीं।

यू.पी.एस.आई.डी.सी. इम्प्लाइज यूनियन का दावा है कि ताज कॉरीडोर की तर्ज पर भारत सरकार की महत्वाकांक्षी परियोजना ‘‘एस.ई.जेड., मुरादाबाद’’ में करोड़ों के कार्य अत्यंत निम्न स्तर के करवाकर अरूण मिश्रा ने जमकर अवैध कमाई की। जांच में भी सब कुछ साबित हो चुका है इसके बावजूद श्री मिश्रा के खिलाफ कानूनी कार्रवाई के विपरीत उन्हें पदोन्नति किया जाना सरकार की नीयत पर संदेह पैदा करता है। अरूण के खिलाफ बिगुल फूंकने वाले अधिकारियों को अब न्यायपालिका पर ही भरोसा रह गया है।

चिंता इस बात की है कि यदि सरकार की ओर से ठोस पैरवी नहीं की गयी तो अरूण मिश्रा एक बार फिर से बच निकलेगा। कहा तो यहां तक जा रहा है कि अरूण मिश्रा के बचाव के लिए सरकार में बैठे कुछ वरिष्ठों ने भ्रष्टाचार से सम्बन्धित दस्तावेजों को ही गायब करवा दिया है। अरूण मिश्रा के पक्ष में कार्य करने वाले ये वे अधिकारी हैं जिन्हें श्री मिश्रा नियमित रूप से सुविधा शुल्क मुहैया कराते आ रहे हैं। हाल ही में जब अरूण मिश्रा को उन्हें काम पर वापस बुलाया गया और उन्हें कई अन्य महत्वपूर्ण कार्यों की जिम्मेदारी सौंपी गयी, तभी इस आशंका पर मुहर लग चुकी थी कि भ्रष्टाचारमुक्त प्रशासन का दावा करने वाली अखिलेश सरकार कितनी पाक साफ है।

सबसे बड़ा औद्योगिक घोटाला !

अरूण मिश्रा द्वारा यूपीएसआईडीसी में किए गए घोटाले को उत्‍तर प्रदेश के औद्योगिक घोटाले का सबसे बड़ा घोटाला माना जा रहा है। हालांकि इस घोटाले की कड़ी टूटने के दावे लगभग चार वर्ष पूर्व वर्ष 2011 में ही किए जाने लगे थे लेकिन तब से लेकर अब तक अरूण मिश्रा के खिलाफ कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गयी। इतना ही नहीं इस तथाकथित भ्रष्टाचारी को समय-समय पर प्रोन्नति भी दी जाती रही। बताया जाता है कि यह घोटाला करीब 500 करोड़ रुपए का था। इस घोटाले के बाद उत्तर प्रदेश राज्य औद्योगिक विकास निगम (यूपीएसआईडीसी) के चीफ इंजीनियर अरूण कुमार मिश्रा केंद्रीय जांच ब्‍यूरो की गिरफ्त में भी आ चुके हैं। 

सीबीआई की टीमों ने अरुण कुमार के आवास और कार्यालय में कई बार छापेमारी की कार्रवाई भी की। तमाम दस्तावेज भी जब्त किए गए थे। दस्तावेजों के आधार पर ही सीबीआई ने दावा किया था कि अरूण मिश्रा द्वारा किया गया घोटाला तकरीबन 500 करोड़ से भी ऊपर का है। ज्ञात हो इसके बाद सीबीआई की टीम ने एक साथ देश में स्थित उनके करीब 17 ठिकानों में छापेमारी की थी। उस दौरान चर्चा हुई थी कि सीबीआई ने अरूण मिश्रा को राजधानी लखनऊ में गिरफ्तार कर लिया गया है लेकिन बाद में पता चला कि श्री मिश्रा के राजनैतिक आकाओं ने उसे बचा लिया। इस सन्दर्भ में यूपीएसआईजीसी इम्प्लाइज यूनियन के महामंत्री वीके मिश्रा ने बयान दिया था कि यूपीएसआईडीसी के चीफ इंजीनियर अरुण कुमार मिश्रा सपा सरकार की सरपस्ती के सबसे बड़े घोटालेबाज है। इन्होंने निगम की व्यवसायिक भूमि को बेचने में की गयी हेराफेरी और फर्जी भुगतानों के माध्यम से कई सौ करोड़ रुपए का वित्तीय घोटाला कर अकूत दौलत कमाई है। 

वर्ष 2007 में मुलायम राज के बाद मायावती प्रदेश की मुख्यमंत्री बनी तो उन्होंने चीफ इंजीनियर को बर्खास्त कर उनके ऊपर आर्थिक घोटालों की जांच के आदेश दे दिए थे। जिसके तहत सिंतबर 2007 में स्पेशल इंवेस्टीगेशन टीम (एसआईटी) का गठन किया गया। टीम ने जांच के दौरान अरुण मिश्रा के खिलाफ दो एफआईआर भी दर्ज करायी थी। जांच के दौरान ही एसआईटी को उनके फर्जी बैंक एकाउण्टों की भी जानकारी मिली थी। जिसके तार उत्तराखण्ड की पंजाब नेशनल बैंक की एक शाखा के प्रबंधक से जुड़े होने का पता चला था। टीम ने अरुण मिश्रा समेत 16 लोगों को आरोपी बनाकर हाईकोर्ट में उनके खिलाफ रिटें भी दायर की थी। इन आरोपियों में दो आईएस अधिकारियों के भी नाम शामिल किए गए थे। फिर एकाएक एसआईटी की जांच अचानक सुस्त हो गयी और टीम उल्टे इन्हीं का सहयोग करने लगी। यहां तक कि आरोप लगानें वालों ने कई रिटों को वापस भी कर लिया था। बताया जाता है कि अरूण मिश्रा के देश भर में लगभग चार दर्जन बैंक खाते हैं। जिनमें करोड़ों रूपए जमा हैं।

आकाओं का वरदहस्त

यूपीएसआईडीसी के बहु चर्चित व महाभ्रष्ट मुख्य अभियंता अरुण कुमार मिश्रा अरबों का घोटाला करने के बाद यूं ही आजाद नहीं घूम रहे। बताया जाता हैं कि उनके उपर सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव सहित सपा-बसपा के उन नेताओं और आईएएस अधिकारियों का हाथ हैं जिन्होंने अरूण मिश्रा की काली कमाई में हिस्सेदारी निभायी। बताया जाता है कि अरूण मिश्रा ने चुनाव के दौरान कई मौकों पर सपा नेताओं का चुनावी खर्च भी वहन किया है। यहां तक कि पार्टी फण्ड में भी उन्होंने अपनी काली कमाई का एक बड़ा हिस्सा जमा किया। ज्ञात हो अरूण मिश्रा का नाम ट्रॉनिका सिटी समेत कई दर्जन घोटालों में शामिल हैं। राजनैतिक आकाओं के वरदहस्त का ही कमाल है कि वह तमाम पुख्ता सुबूतों के बावजूद राज्य और केंद्र सरकार कि कई बड़ी जाँच एजेंसियों की  छानबीन के पश्चात भी वह हर बार साफ बच निकलता रहा लेकिन लेकिन अरुण मिश्रा पर उसी के विभाग के वरिष्ठ प्रबंधक हाउसिंग अनिल कुमार वर्मा द्वारा दायर याचिका भारी पड़ गयी।

डिग्रियां भी फर्जी!

मुख्य परियोजना अभियंता से चीफ इंजीनियर सहित अनेक महत्वपूर्ण पदों पर पहुंचने के लिए अरूण मिश्रा ने फर्जी डिग्रियों का भी सहारा लिया। यहां तक नौकरी पाने के लिए भी उन्होंने शैक्षिक योग्यताओं की फर्जी मार्कशीटों का इस्तेमाल किया। दस्‍तावेजों के मुताबिक अरूण मिश्रा ने 1976 में घाटमपुर के श्री गांधी विद्यापीठ इंटर कॉलेज से हाईस्कूल की परीक्षा पास की। हाईस्‍कूल मार्कशीट में उसका रोल नंबर 511719 है, लेकिन बोर्ड और कॉलेज के दस्‍तावेजों में यह रोल नंबर किसी अरुग्य कुमार मिश्र के नाम पर दर्ज है। श्री मिश्रा ने केएनआइटी सुल्तानपुर से बीटेक की डिग्री प्राप्त की, लेकिन यहां के दस्तावेजों में उनका रिकार्ड नहीं मिला। 

जांच एजेंसियों द्वारा पूछताछ के दौरान अवध विश्वविद्यालय फैजाबाद ने भी कहा कि यूपीटीयू बनने के बाद सभी रिकार्ड वहां स्थानांतरित कर दिए गए हैं। विश्वविद्यालय में इनका पंजीकरण कैसे हुआ, इसकी जानकारी कोर्ट को आज तक नहीं मिल पाई है। श्री मिश्रा को बचाने के लिए राज्य सरकार की तरफ से कोर्ट को गोलमाल जवाब दिया गया। अरुण कुमार मिश्र को सहायक अभियंता पद पर नियुक्त करने की कार्रवाई सहित पदोन्नति दिए जाने के दस्तावेज कोर्ट में नहीं दिए जा सके। कोर्ट ने अरुण कुमार मिश्र को भी नोटिस जारी कर जवाब मांगा, लेकिन वे भी अपनी डिग्रियों एवं नियुक्ति से सम्बन्धित संतोषजनक दस्तावेज नहीं पेश कर पाए हैं।

यह आर्टकिल लखनऊ से प्रकाशित दृष्टांत मैग्जीन से साभार लेकर भड़ास पर प्रकाशित किया गया है. इसके लेखक तेजतर्रार पत्रकार अनूप गुप्ता हैं जो मीडिया एवं नौकरशाही के भ्रष्‍टाचार से जुड़े मसलों पर बेबाक लेखन करते रहते हैं. वे लखनऊ में रहकर पिछले काफी समय से पत्रकारिता एवं नौकरशाही के भीतर मौजूद भ्रष्‍टाचार की पोल खोलते आ रहे हैं.

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340 करोड़ की योजना में घोटाला : दम तोड़ता तंत्र

जे.एन.एन.यू.आर.एम योजना के तहत कानपुर शहर के इनर ओल्ड एरिया में पेयजल व्यवस्था दुरूस्त करने की गरज से तत्कालीन मायावती सरकार के कार्यकाल में 340 करोड़ की योजना को मंजूरी दी गयी थी। इसे सम्बन्धित अधिकारियों की लापरवाही कहें अथवा रिश्वतखोरी के लिए उपयुक्त ठेकेदार का चयन, काम देर से शुरू होने के कारण इस योजना की धनराशि भी बढ़कर 363 करोड़ हो गयी। विडम्बना यह कि इसके बावजूद उक्त योजना का कार्य वर्तमान समय तक पूरा नहीं हो सका। 

अपने पिछले अंक में ‘दृष्टांत’ समाचार पत्रिका ने योजना में लूट का खुलासा किया तो आनन-फानन में मौखिक आदेश देकर शेष काम को पूरा करवाए जाने की कवायद शुरू हो चुकी है। मुश्किल इस बात की है कि आनन-फानन में काम करवाए जाने से पूरा कानपुर शहर अस्त-व्यस्त है। जहां तक गुणवत्ता परक कार्य की बात है तो इसका प्रमाण इसी कुछ स्थानों पर खुली पाइप लाइनों को देखकर सहज ही लगाया जा सकता है। मानक के विपरीत पाइप लाइन डालने के कारण पानी का प्रवाह शुरू होने से पहले ही जगह-जगह पाइप लाइने क्षत-विक्षत नजर आ रही हैं। इलाकाई निवासियों के साथ ही इलाके के प्रतिष्ठि व्यक्तियों में शुमार पार्षद और वार्ड अध्यक्ष गुणवत्ताविहीन कार्य को लेकर अपनी शिकायतें सम्बन्धित विभाग को दर्ज करा चुके हैं। 

पेयजल योजना के कार्य को आनन-फानन में पूरा करने के कारण कानपुर शहर की हालत इतनी दयनीय हो चुकी है कि पेयजल की बात तो दूर राह पर चलना दुश्वार हो गया है। मुख्य मार्गों पर खुदे गड्ढे आए-दिन दुर्घटनाओं का सबब बन रहे हैं। इलाकाई निवासियों में सम्बन्धित अधिकारियों को लेकर व्यापक आक्रोश बना हुआ है। पिछले दिनों कानपुर शहर के कई इलाकों से लोगों ने इस समाचार-पत्रिका के पास ढेरों खत भेजे। खत का मजमून पेयजल व्यवस्था को दुरूस्त करने को लेकर है। 

इधर, अरबों की योजना में करोड़ों डकार जाने वाले कथित जिम्मेदार अधिकारियों ने योजना का काम गुणवत्ता युक्त पूरा करने के बजाए समाचार-पत्रिका को ही खुलासा करने के एवज में धमकाने का प्रयास शुरू कर दिया है। इतना ही नहीं समाचार-पत्रिका का प्रकाशन रोकने के लिए बकायदा विभिन्न हथकण्डे अपनाए जा रहे हैं। हाल ही में इस समाचार-पत्रिका को लीगल नोटिस भेजकर भी दबाव बनाने का प्रयास किया गया। वर्तमान स्थिति यह है कि जहां एक ओर कानपुर शहर की जनता में तथाकथित लुटेरे अधिकारियों के खिलाफ आक्रोश है, वहीं दूसरी ओर अरबों की योजना में करोड़ों डकारने वाले सम्बन्धित अधिकारी मस्त हैं और लूट का पर्दाफाश किए जाने वाले पत्रकार के खिलाफ षडयंत्र का ताना-बाना बुन रहे हैं। 


शहरवासियों के लिए सफेद हाथी बना पेयजल योजना 

लखनऊ। उत्तर-प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव जहां एक ओर कानपुर शहर और उसके आस-पास के इलाकों को समग्र विकास की योजना के तहत अमली जामा पहनाकर हाईटेक सिटी के रूप में देखना चाह रहे हैं वहीं दूसरी ओर देश के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी  देश में प्रस्तावित 100 स्मार्ट सिटी में कानपुर महानगर को भी शामिल करने के इच्छुक हैं। इधर सम्बन्धित विभाग के अधिकारियों की खाऊ-कमाऊ नीति के चलते हकीकत बिलकुल इसके उलट है। स्थानीय लोगों की मानें तो जब तक तथाकथित भ्रष्ट अधिकारियों पर शिकंजा नहीं कसा जाता तब तक मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री के सपनों को साकार नहीं किया जा सकता। 

देश के प्रधानमंत्री और सूबे के मुख्यमंत्री ने कानपुर जनपद में जो विकास का सपना संजो रखा है उसे कुछ तथाकथित भ्रष्ट नौकरशाहों, बिगडै़ल अधिकारी और बेलगाम ठेकेदारों के काकस की वजह से थम सा गया है। विगत कई वर्षों से अपने बेहतरी के सपनों के बीच नारकीय जीवन भोगने को मजबूर शहरवासियों को अनेकों मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। इसकी एक बानगी कानपुर नगर का जल-निगम विभाग है, जिसकके नकारा अधिकारियों ने कानपुर के नागरिकों के सामान्य जन-जीवन को अस्त-व्यस्त कर रखा है। कानपुर के ‘इनर ओल्ड एरिया’ में जे.एन.एन.यू.आर.एम. के अन्तर्गत शुद्ध पेयजल पहुंचाने का जिम्मा नगर विकास मंत्रालय के अधीन जल-निगम को दिया गया है। इसी योजना को अमली जामा पहनाने के लिए जल-निगम द्वारा पिछले कई वर्षों से जगह-जगह पाइप लाइन डालने का काम विभिन्न अंतरालों में कराया जा रहा है। 

शहरवासी इसे जल-निगम की लापरवाही बता रहे हैं जबकि सच्चाई यह है कि अरबों की योजना को कागजों में काफी पहले पूर्ण दिखाया जा चुका है। बकायदा सभी के भुगतान भी किए जा चुके हैं। विडम्बना यह है कि सम्पूर्ण भुगतान के बावजूद काम पूरा नहीं हो सका। जब इस समाचार-पत्रिका ने योजना में घोटाले का पर्दाफाश किया तो आनन-फानन में मौखिक आदेशों पर किसी तरह से काम पूरा करवाया जा रहा है। बताया जाता है कि जब कभी पैसा आ जाता है तो काम शुरू हो जाता है। पैसा समाप्त होते ही काम भी रूक जाता है। ये पैसा किसकी जेब से जा रहा है या किसके कमीशन से निकाला जा रहा है ? यह तो जांच का विषय हो सकता है लेकिन कानपुर शहर में रूक-रूक कर काम किए जाने से स्थानीय जनता बेहाल है। 

अपनी लापरवाह कार्यशैली के लिए प्रसिद्ध जल-निगम ने शहर की प्रमुख सड़कों और कई अन्य मार्गों को पाईप लाईन बिछाने के नाम पर बेहद अव्यवस्था के साथ जगह-जगह खोद दिया है। जिसके कारण शहर की तस्वीर बद से बदरंग होती चली जा रही है। जल-निगम के अधिकारियों/अभियंताओं और दबंग ठेकेदारों के गठजोड़ के कारण शहर की धूल-धूसरित सड़काकें पर राहगीर गिरते-पड़ते किसी तरह अपने गंतव्य को पहुंच रहे हैं। किसी बाहरी व्यक्ति के कानपुर आगमन पर उसको हर तरफ खुदाई के कारण सिर्फ धूल ही धूल उड़ती नजर आती है। जगह-जगह खुदाई के कारण हर तरफ जाम की स्थिति बनी रहती है। हालात इस कदर खराब हो चुके हैं कि बाहरी व्यक्ति एकबारगी कानपुर को शहर कहने पर भी आश्चर्य व्यक्त करने लगा है। 

शहर की प्रमुख सड़क मॉल रोड पर तीन जगहों पर एक साथ खुदाई के कारण आवा-गमन कई स्थानों पर बाधित है। रास्ता रूका होने के कारण राहगीरों को मार्ग बदलकर जाना पड़ता है। खुदाई के कारण खतरनाक सड़कें ठण्ड के मौसम में कोहरे के कारण जानलेवा साबित हो रही हैं। उंगलियों पर गिनी जाने वाली कुछ ही सड़कें ऐसी होंगी जहां खुदाई नहीं हो रही है। जिन स्थानों पर सड़कें खुदी हुई हैं, या फिर काम चल रहा है, वहां के ठेकेदारों की दबंगई भी स्थानीय जनता को भुगतनी पड़ रही है। उस पर तुर्रा यह कि ठेकेदार सरकारी काम कर रहे हैं। यदि उनके कार्य में बाधा पहुंचायी गयी तो विभिन्न मामलों में मुकदमा दर्ज कर जेल भेजा जा सकता हैं। शहर को स्मार्ट सिटी बनाने की रूपरेखा बनाने में जुट अफसरों से आम जनता सैकड़ों बार गुहार लगा चुकी है। 

जनता का कहना है कि ठण्ड के मौसम में कोहरे के प्रकोप को देखते हुए खुदाई का कार्य शीघ्र पूरा कर लिया जाना चाहिए ताकि दुर्घटना में लोग अपनी जानें न गवाएं। माल रोड पर आर.बी.आई. के सामने बड़ा चौराहा और परेड के अलावा साकेत नगर, किदवई नगर, रावतपुर क्रॉसिंग से लेकर काकादेव, विजय नगर और श्याम नगर क्षेत्रों में भी जल-निगम ठेकेदारों द्वारा शहर की प्रमुख सड़कों को अव्यवस्थित खुदाई के कारण बाधित कर दिया गया है। जिसके कारण  शहर में यातायात समस्या अपने चरम पर है। इसी तरह से लेनिन पार्क पी रोड से भदौरिया चौराहा, जवाहर नगर तक खोदी गयी सड़क को मोटेरेबुल करने के नाम पर जल-निगम ने पिछले पांच महीनों से सिर्फ पत्थर की गिट्टियां डालकर छोड़ दिया है। अत्यधिक कोहरे के कारण रात में गिट्टी न दिखने के कारण वाहन चालक गिरकर चोटिल हो रहे हैं। पिछले दिनों क्षेत्रीय पार्षद अतुल त्रिपाठी ने नगर-निगम की सदन बैठक में इस समस्या से अवगत कराया था। कुछ पार्षदों ने बकायदा धरना-प्रदर्शन तक किया लेकिन जल-निगम अभियंताओं पर कोई असर नहीं पड़ा। 

फूलबाग स्थित बाल-भवन मार्ग रोड, जो कि शुक्लागंज उन्नाव जाने वाले पुराने गंगा पुल को जोड़ता है, जल निगम के अफसरों की ढिलाई के कारण अपनी बदहाली पर रो रहा है। फूलबाग बाल-भवन के सामने वाली प्रमुख सड़क पर आज से चार वर्षों पूर्व पेयजल की पाईप लाइन डालने का कार्य जल-निगत द्वारा शुरू करवाया गया था। शहर की अन्य सड़कों की भांति बाल-भवन रोड की पाईप लाइन डालने के समय से लेकर आज तक क्षेत्रीय लोगों के साथ-साथ राहगीरों को भी बदहाली व अव्यवस्था का सामना करना पड़ रहा है। अचरज का विषय है कि कम्पनी के कारिंदों ने मुख्य रोड पर तो पाइप लाइन डाल दी लेकिन दोनों चौराहों पर पाइप लाइन को जोड़ने की जहमत तक नहीं उठायी। साथ ही कम्पनी के लोगों ने उल्टे-सीधे तरीकों को अपनाते हुए खुदी सड़क को जैसे तैसे पाटकर इतिश्री कर ली थी। बाद में पता चला कि कम्पनी काम छोड़कर ही भाग गयी है। परिणामस्वरूप स्थिति जस की तस बनी हुई है। उक्त कार्य को छोड़कर भाग जाने वाली दोशियान कम्पनी के बाद जल-निगम ने जिस कम्पनी को दोनों ओर की पाइप लाइन जोड़ने का काम आवंटित किया है वह भी कार्य नहीं कर रही है। 

ध्यान रहे इस रोड पर पिछले चार वर्षों से राहगीरों को गड्ढों और सड़क पर फैली बजरी के बीच से होकर गुजरना पड़ रहा है। ‘दृष्टांत’ समाचार-पत्रिका ने पाइप लाइन की इस कार्य योजना में हुए घोटाले तथा जनता को हो रही परेशानी के बाबत विस्तृत उल्लेख अपने पिछले अंक में प्रमुखता से किया था। सड़कों की इस दुर्दशा का संज्ञान लेते हुए बाल भवन रोड पर कार्य करने वाली कम्पनी के विरूद्ध मुकदमा दर्ज करवाए जाने की चेतावनी कानपुर की जिलाधिकारी डॉ. रोशन जैकब ने दी थी। जिलाधिकारी की चेतावनी के बाबत जब इस संवाददाता और दृष्टांत की कानपुर की टीम ने मौके का जायजा लिया तो स्थिति जस की तस मिली। चौराहे पर किसी गांव की बदहाल-बदसूरत सड़क का नजारा देखने को मिला। रोड पर हिचकोले खाते वाहन और परेशानी के साथ निकलते मोटर साइकिल सवार नजर आए। मौके पर न तो कोई ठेकेदार था और न ही पाइप लाइन डालने वाला कोई मजदूर। इन परिस्थितियों में सम्बन्धित विभाग के अधिकारियों और कर्मचारियों की मौजूदगी की कल्पना करना भी व्यर्थ है। नजारा देखकर ऐसा लगा जैसे भविष्य में कोई काम भी नहीं किया जाना है। 

गौरतलब है कि जिलाधिकारी द्वारा कम्पनी संचालक को दी गयी चेतावनी की अवधि पूरी हो जाने के बाद कम्पनी के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज किए जाने के आदेश जारी किए थे। विडम्बना यह है कि जिलाधिकारी के आदेश के बावजूद न तो काम शुरू हो सका और न ही कम्पनी के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर वैधानिक कार्यवाई ही की गयी। साफ जाहिर है कि अरबों की योजना में करोड़ों की लूट को अंजाम देने वाले अधिकारियों को पल-पल की जानकारी मुहैया करवायी जा रही है। कयास लगाए जा रहे हैं कि इन्हीं अधिकारियों के दबाव के चलते जिलाधिकारी की चेतावनी और आदेश भी रद्दी की टोकरी के हवाले किए जा रहे हैं। 

इस सम्बन्ध में नगर-निगम के पर्यावरण अधिशासी अभियंता पंकज भूषण ने जिलाधिकारी के पत्र का उत्तर भेजे जाने की जानकारी देते हुए बताया कि कम्पनी और जल-निगम अधिकारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई की जा रही है। जब इस संवाददाता ने जल-निगम कानपुर में मौजूद अपने सूत्रों से जानकारी हासिल की तो ज्ञात हुआ कि उक्त अधिकारी का न तो ऐसा कोई आदेश आया है और न ही वह आदेश देने में सक्षम हैं। जाहिर है कि इस मामले को दबाने के लिए निचले स्तर से लेकर उच्च स्तर तक के अधिकारी जी-जान से जुटे हुए हैं। इधर कानपुर नगर को देश में प्रस्तावित सौ स्मार्ट सिटी में शामिल करने की संभावनाएं तलाशने और केन्द्रीय योजनाओं की दुर्गति न हो, इसके लिए केन्द्रीय शहरी विकास मंत्रालय के जिम्मेदार अधिकारी फिक्रमंद हैं। इतना ही नहीं कानपुर को स्मार्ट सिटी बनाने के लिए केन्द्र ने सीधी निगरानी के साथ ही उत्तर-प्रदेश के सम्बन्धित अधिकारियों व जन-प्रतिनिधियों के साथ मिलकर विकास की योजनाओं और नागरिकों की मूलभूत सुविधाओं को उन तक पहुंचाने के लिए मंथन भी कर रहा है। 

कानपुर शहर को स्मार्ट सिटी बनाने के लिए पिछले वर्ष 27 दिसम्बर 2014 को सर्किट हाउस में सांसद डॉ. मुरली मनोहर जोशी की पहल पर स्थानीय व केन्द्रीय अधिकारियों ने जनप्रतिनिधियों, उद्यमी, व्यापारी और सामाजिक संगठनों के लोगों के साथ मिलकर एक बैठक आयोजित की। बैठक में बकायदा कानपुर शहर को स्मार्ट सिटी बनाने का खाका खींचा गया था। केन्द्र सरकार की ओर से आए शहरी विकास मंत्रालय के अपर सचिव दुर्गा शंकर मिश्रा ने यह माना कि कानपुर महानगर में संसाधनों की कमी नहीं है लेकिन आपसी विभागीय सामंजस्य व समन्वय के अभाव में विकास का पहिया व नागरिकों तक पहुंचने वाली सरकारी सुविधाएं ठीक ढंग से और गतिशील नहीं हैं। 

बताते चलें कि इस बैठक में भी कुछ सामाजिक संगठन के लोगों ने शहर में पेयजल योजना के बाबत पाइप लाइन डालने की आड़ में हो रही अव्यवस्था और नागरिकों की परेशानी के मुद्दे को उठाया था लेकिन जल-निगम के अधिकारियों ने कागजों पर काम-काज दिखाते हुए शीघ्र घरों तक पानी पहुंचाने का आश्वासन देकर मुद्दे को ठण्डे बस्ते के हवाले कर दिया। इस सम्बन्ध में मुद्दा उठाने वाले सामाजिक संगठन के लोगों का कहना है कि जल-निगम की गतिशीलता, सड़कों की बेहतरी और आम लोगों के घरों तक पानी पहुंचाने के लिए उत्तर-प्रदेश सरकार के मुख्यमंत्री को स्वयं कार्यों की सतत निगरानी रखनी होगी। साथ ही दोषी अधिकारियों से लेकर जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मचारियों को कार्य के प्रति लापरवाही बरतने के मामले में दण्डित करना होगा तभी उनके सपनों को पंख लग पायेंगे। 

यहां यह बताना भी बहुत जरूरी है कि कानपुर की प्रमुख सड़कों पर पेयजल लाइन बिछाने के लिए नियम व कायदों को दर-किनार रखा गया है। खास बात यह है कि एक ही काम के लिए उसी जगह को कई-कई बार खोदा गया। इस कारण सरकारी धन का तो दुरूपयोग हुआ ही साथ ही समय से कार्य पूरा न होने के कारण कार्य की लागत भी सुरसा के मुंह की तरह बढ़ती जा रही है। जे.एन.एन.आर.यू.एम योजना के तहत शहर में कई वर्षों से चल रही अव्यवस्थित खुदाई में गुणवत्ता व मानकों का अनुपालन न करने के साथ ही खुदाई के दौरान सुरक्षा मानकों के साथ भी खिलवाड़ किया गया। प्राप्त जानकारी के मुताबिक खुदाई के दौरान कई मजदूर घायल हो चुके हैं। चूंकि दबंग ठेकेदार को उच्च पदस्थ अधिकारियों का वरदहस्त प्राप्त रहा है लिहाजा कोई भी मामला अब थाने नहीं पहुंच सका।  फिलहाल 340 करोड़ की योजना में करोड़ों कमाने वाले अधिकारी मौज में हैं जबकि कानपुर शहर की वह जनता पस्त है जो अपने ही पैसों से मूलभूत सुविधाओं की हकदार है। 

‘मुझे इस बात की जानकारी है कि जिलाधिकारी महोदया ने जल-निगम के सम्बन्धित अधिकारी व लापरवाह ठेकेदारों के विरूद्ध समयबद्ध तरीके से कार्यों को न निपटाए जाने के कारण उनके खिलाफ मुकदमा दर्ज किए जाने का आदेश नगर आयुक्त को दिया है। अब तक जिम्मेदार लोगों के खिलाफ क्या कार्रवाई की गयी इसकी जानकारी नगर आयुक्त ही दे सकते हैं’। – अविनाश सिंह, ए.डी.एम. सिटी, कानपुर

‘‘जिलाधिकारी महोदया ने जल-निगम के अफसरों व लापरवाह ठेकेदारों के विरूद्ध समय से कार्य न पूरा करने के कारण नगर आयुक्त महोदय को आदेश दिया था कि वे उन लोगों के खिलाफ मुकदमा पंजीकृत करवाएं। इस सम्बन्ध ने नगर आयुक्त ने जिलाधिकारी महोदया को उनके पत्र का उत्तर भेज दिया है। साथ ही सम्बन्धित लोगों के खिलाफ निगम द्वारा आवश्यक विभागीय कार्रवाई की जा रही हैं।  पंकज भूषण, अधिशाषी अभियंता, पर्यावरण, नगर-निगम, कानपुर

‘आपकी बात सही, खुदाई के कारण आम जनता को काफी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। बचा हुआ कार्य हम लोग तेजी के साथ निपटा रहे हैं। मैं आपको उम्मीद दिलाता हूं कि बहुत जल्द कानपुर महानगर मे पेयजल पाइप लाइन डालने का कार्य पूरा कर लिया जायेगा। तत्पश्चात समस्त समस्याओं का निदान भी हो जायेगा। एस.के. गुप्ता परियोजना प्रबंधक, जल-निगम, कानपुर

सुरक्षा के मानक

अगर बीच सड़क पर खुदाई की जा रही है तो टीन शेड लगाकर रास्ते को चारो ओर से बंद कर दिया जाए। खुदाई स्थल पर बेरीकेटिंग लगाइ जानी चाहिए। सर्दी के दिनों में कोहरे को देखते हुए खुदाई स्थल से 10 मीटर की दूरी पर लाल रंग की रेडियम पट्टी से चेतावनी लिखी होनी चाहिए। अव्यवस्थित ढंग से फैली मिट्टी और बालू के पास झंडी भी लगायी जानी चाहिए। खुदाई के दौरान उपयोग में लायी जाने वाली सरिया और गॉटर आदि पर भी लाल रंग का रेडियम चिपका होना चाहिए ताकि वाहनों के हेडलाइट की रोशनी से वह साफ नजर आए। खुदाई के दौरान सभी मजदूरों के सिर पर हेलमेट होना चाहिए। इसके अतिरिक्त खुदाई स्थल पर अन्य समुचित व्यवस्थाए होना जरूरी हैं। सच्चाई यह है कि सम्बन्धित ठेकेदार कभी भी इन नियमों का अक्षरशः पालन नहीं करता। 

विश्वासपात्रों ने भी चाटी मलाई

प्राप्त दस्तावेजों के अनुसार बसपा सरकार के कार्यकाल में उक्त योजना के तहत हुई तथाकथित लूट में उन लोगों ने भी जमकर मलाई चाटी जो पूर्व मुख्यमंत्री मायावती के करीबी लोगों में शुमार थे। यहां तक कि सुरक्षा में तैनात अधिकारियों के पुत्रों ने भी जे.एन.एन.यू. आर.एम. योजना में फर्जी तरीके से नियुक्ति हासिल कर अपनी हैसियत सुधार ली। बसपा शासनकाल में अरबों की इस योजना में करोड़ों की लूट मामले में अधिकारी से लेकर नेता तक और संतरी से लेकर मंत्री तक ने जमकर बहती गंगा में हाथ धोए। सरकारी धन की लूट में शामिल एक ऐसे शख्स अमित सिंह का नाम हाल ही में सामने आया है जिसने उक्त योजना में प्रथम तो नियम विरूद्ध तरीके से नियुक्ति पाई, इसके बाद जमकर अपने अधिकारों का दुरूपयोग भी किया। 

आरोप है कि अमित सिंह की उक्त योजना में बिचौलिए की भूमिका रही थी। आरोप तो यहां तक लगाए जा रहे हैं कि अमित सिंह की जेएनएनयूआरएम योजना में तैनाती ही इसी मकसद से करवाई गयी थी, जबकि अमित सिंह उक्त पद के लिए अर्हता ही नहीं रखते थे। इसके बाद उनकी नियुक्ति के लिए तत्कालीन बसपा सरकार ने बकायदा एक नया पद सृजित करके अमित को लोक सेवा आयोग के पद पर बतौर सहायक नगर आयुक्त तैनात कर दिया था। बताया जाता है कि बसपा सरकार के कार्यकाल से ही उनकी नियुक्ति को चुनौती दी जाने लगी थी। बसपा सरकार में तो शिकायत दर्ज करवायी ही गयी थी साथ ही वर्तमान अखिलेश सरकार के कार्यकाल में भी उनकी नियुक्ति को चैलेंज किया गया था। अंततः शासन ने लगभग ढाई वर्ष का कार्यकाल बीत जाने के बाद 29 दिसम्बर 2014 को अमित सिंह की नियुक्ति को अवैध ठहराते हुए सहायक नगर आयुक्त के पद से बर्खास्त कर दिया। 

बताया जाता है कि अमित सिंह पूर्व मुख्यमंत्री मायावती के बेहद करीबी माने जाते थे। वे मायावती के विशेष सुरक्षा अधिकारी पदम सिंह के पुत्र हैं। अमित सिंह पर आरोप है कि तैनाती के समय से ही विभाग में उनकी तूती बोलती थी, साथ ही ट्रांसफर-पोस्टिंग मामले में भी उनकी गहरी दखल थी। उनकी हनक का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि जब तक सूबे में बसपा की सरकार रही अमित सिंह अपने वरिष्ठ अधिकारियों पर हावी रहे। 

कानपुर जल-निगम के एक कर्मचारी ने नाम प्रकाशित न करने की शर्त पर बताया कि जेएनएनयूआरएम योजना में अमित सिंह की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। अमित ने न सिर्फ इस योजना में अथाह कमाई की बल्कि सम्बन्धित विभाग के तत्कालीन मंत्री और जिम्मेदार अधिकारियों संग ठेकेदारों के मेल-मिलाप में भी अहम भूमिका निभायी। हालांकि अमित सिंह ज्यादा समय तक उक्त योजना में शामिल नहीं रहे लेकिन अल्प समय में ही वे अरबों की योजना में करोड़ों के घोटाले की पृष्ठभूमि जरूर तैयार कर गए। इनके करीबी लोगों का दावा है कि सपा सरकार के कार्यकाल में उन्हें परेशान किए जाने की गरज से इस तरह के हथकण्डे अपनाए जा रहे हैं। बसपा के दोबारा सत्ता में आते ही अमित सिंह एक बार फिर से पॉवरफुल अधिकारियों में शुमार होंगे। 

फिलहाल जानकार सूत्रों के मुताबिक अमित सिंह को लेकर सत्ता में बैठे कुछ दिग्गजों ने जांच की मांग भी उठायी है, ताकि भ्रष्ट तरीके से कमाई गयी रकम का पूरा खुलासा हो सके। कुछ अधिकारियों का तो यहां तक मानना है कि यदि अमित सिंह के मामले में सरकार ने सख्त कदम उठाए तो निश्चित तौर पर ऐसे कई बडे़ अधिकारियों के भ्रष्टाचार का खुलासा होगा जिन्होंने जेएनएनयूआरएम योजना के तहत करोड़ों रूपए डकार लिए। 

यह आर्टकिल लखनऊ से प्रकाशित दृष्टांत मैग्जीन से साभार लेकर भड़ास पर प्रकाशित किया गया है. इसके लेखक तेजतर्रार पत्रकार अनूप गुप्ता हैं जो मीडिया और इससे जुड़े मसलों पर बेबाक लेखन करते रहते हैं. वे लखनऊ में रहकर पिछले काफी समय से पत्रकारिता एवं ब्‍यूरोक्रेसी के भीतर मौजूद भ्रष्‍टाचार की पोल खोलते आ रहे हैं.

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सपा का भस्मासुर (तीन) : क्या कहती है जांच समिति की रिपोर्ट!

पूर्व में फर्म की कार्यवाही की जानकारी होते हुए पुनः विलम्ब के लिए जुर्माना निर्धारित न किया जाना दुरभिसंधि को इंगित करता है। यह जुर्माना 9 फरवरी 2012 को, अनुबंध समाप्त होने के पश्‍चात आरोपित किया गया। यहॉं पर यह भी इंगित किया जाता है कि मैसर्स टी0पी0एल0 को पाईपों की जॉंच हेतु रखा गया था। परन्तु यह विचारणीय है कि 52 दिनों ( 20-9-11 से 12-11-11 तक ) के भीतर लगभग 8-9 किमी0 पाईप ( लगभग 160 मी0 प्रतिदिन) की इतनी बड़ी टेस्टिंग न तो फर्म स्तर पर ही संभव थी एवं न ही मैसर्स टीपीएल स्तर पर। 

अतः यह भी आभास होता है कि फर्म द्वारा समयवृद्धि मात्र इसी कारण ली गयी कि वे अपने खराब पाईप की आपूर्ति कर सकें एवं पाईपों का समस्त भुगतान प्राप्त कर सकें ताकि फर्म को नुकसान कम से कम हो। क्योंकि उन्हें पाईप सप्लाई के एवज में लगभग 17 करोड़ रूपये का भुगतान किया जा चुका था। पाईप आपूर्ति लगभग 21 करोड़ रूपये एवं अन्य कार्य मात्र लगभग 6.50 करोड़ के थे। अतः अधिकतम पाईप आपूर्ति कर पूर्ण भुगतान लेने में ही फर्म को ज्यादा फायदा था जो उसने कथित भ्रष्ट अधिकारियों के सहयोग से कर लिया। पाईप मात्र 6 किमी0 की ही बिछायी जा सकी थी जबकि भुगतान पूरा किया जा चुका था। 

स्पष्ट है कि भुगतान की स्वीकृति फर्म को लाभ पहुंचाने के उद्देष्य से ही दी गयी थी। यह भी विचारणीय है कि इतनी त्वरित गति से आपूर्तित पाईप की गुणवत्ता पर भी संषय होना स्वाभाविक है, क्योंकि फर्म की कभी भी हाइड्रॉलिक टेस्टिंग नहीं की गयी है। इन परिस्थितियों में सिर्फ 80 प्रतिशत भुगतान किया जाना चाहिए था लेकिन अधिकारियों ने 90 प्रतिषत तक भुगतान का आदेश जारी कर दिया था। जांच के दौरान अधिकारियों से वार्ता से यह भी आभास हुआ कि फर्म की मंषा अपने इन्हंी सम्पर्कों का लाभ लेकर सुरक्षा धनराशि की वापसी और भुगतान कराने की थी जिसके कारण उसने पुनः समय वृद्धि की मांग नहीं की। अपितु वर्ष 2013 प्रारंभ में उसके द्वारा अपने अनुबंध को पुनर्जीवित कराने का प्रयास किया गया जो अधिकारियों के स्थानान्तरण के कारण संभव नहीं हो सका। गौरतलब है कि इस बीच अध्यक्ष का स्थानान्तरण दिनांक 15 मार्च 2012 को एवं प्रबंध निदेषक का स्थानान्तरण वर्ष 2012 को ही हो गया था।

आंखों देखी : जल-निगम में अरबों की लूट 

जिस कानपुर शहर के ‘इनर ओल्ड एरिया’ में पेयजल उपलब्ध कराने की गरज से बसपा शासनकाल में लगभग साढे़ तीन अरब रूपए सरकारी खजाने से व्यय कर दिए गए वह इलाके आज भी शुद्ध पेयजल के लिए तरह रहे हैं। बिछाए गए पीवीसी पाइप लाइन की गुणवत्ता इतनी खराब है कि थोडे़ से दबाव भर से टूट जाते हैं। मानक के अनुसार पाइप लाइन बिछाते समय पाइप के नीचे और ऊपर बालू की मोटी परत बिछायी जाती है ताकि भारी वाहन गुजरते वक्त लाइन न टूटे, लेकिन लूट-खसोट वाली इस योजना में इन मानकों का कहीं पर भी पालन नहीं किया गया है। पूरी पाईप लाइन ही मिट्टी से दबा दी गयी है।

इधर जांच रिपोर्ट कहती है कि ठेकेदारों को सम्पूर्ण भुगतान किया जा चुका है जबकि कानपुर जल-निगम के जिम्मेदार अधिकारी घोटाले पर पर्दा डालने की नीयत से ठेकेदारों के भुगतान को रोके जाने की बात कहते हैं। गुणवत्ता के विपरीत पाइप लाइन बिछाने वाली दोशियान कम्पनी को जल-निगम, कानपुर के अधिकारी फरार बता रहे हैं जबकि दोशियान पहले ही अपना पूरा भुगतान प्राप्त कर चुका है। कानपुर शहर के इनर ओल्ड एरिया की हालत यह है कि शुद्ध जल पेयजल की आपूर्ति तो दूर की बात बिछायी गयी लाइनों में पानी की सप्लाई भी अभी तक शुरू नहीं की जा सकी है। सरकार के पास जो रिकॉर्ड है उसके मुताबिक कार्य शत-प्रतिशत पूरा हो चुका है जबकि कानपुर जल-निगम के अधिकारी बताते हैं कि अभी 25 प्रतिशत काम अधूरा है। इसे पूरा करने के लिए मार्च 2015 तक का समय मौखिक रूप से दिया गया है। 

लिखित आदेश मिलते ही काम शुरू हो जायेगा। अधिकारियों का कहना है कि शेष 25 प्रतिशत कार्य पूरा करने के लिए लगभग 45 करोड़ रूपया और व्यय हो सकता है। दूसरी ओर लोगों में गुस्सा इस कदर है कि इलाकाई लोग सम्बन्धित विभाग के अधिकारियों को इलाके में देखते ही उनसे अभद्रता पर उतारू हो जाते हैं। अधिकारियों के प्रति उनका अभद्र व्यवहार उनके ठगे जाने की प्रतिक्रिया स्वरूप है। लिहाजा अधिकारी इलाकों में जाने का साहस तक नहीं जुटा पा रहे हैं। इलाकाई लोगों ने अपने पास पाइप के उन टुकड़ों को भी प्रमाण के तौर पर सहेज कर रखा है ताकि किसी विश्वसनीय जिम्मेदार अधिकारी अथवा मंत्री के आगमन पर दिखाया जा सके।

कानपुर शहर के ‘इनर ओल्ड एरिया’ में शुद्ध पेयजल पहंुचाने के लिए फूलबाग में एक पम्प हाउस का निर्माण भी करवाया गया है। करोड़ों की लागत से पम्प हाउस में मशीनें व अन्य उपकरण भी लगे हुए हैं लेकिन सभी खामोश अवस्था में हैं। यहां तक कि पानी स्टोर करने के लिए जमीन में दो-दो स्टोरेज टैंक भी बने हुए हैं। एक पानी विशालकाय पानी की टंकी भी खड़ी है। अचम्भे की बात है कि रोजाना इस टंकी में लाखों लीटर पानी भरकर चेक करने का कार्य पिछले कई महीनों से चल रहा है। रखरखाव के अभाव में हालत यह हो गयी है कि पानी की टंकी सप्लाई से पहले ही चूने लगी है। पम्प हाउस परिसर में देखरेख करने के लिए कर्मचारियों के केबिन भी कई वर्षों से बने हुए हैं लेकिन देखरेख के नाम पर यहां सिर्फ ठेकेदार की तरफ से राधेश्याम पाण्डेय नाम का चौकीदार ही नजर आता है। 

यह चौकीदार पिछले तकरीबनर चार वर्षों से यहीं पर तैनात है। इसी अकेले चौकीदार के जिम्मे करोड़ों की लागत वाली मशीने वर्षों से धूल खा रही हैं। बकौल चौकीदार राधेश्याम पाण्डेय, ‘यह पम्प हाउस पिछले चार वर्षों से बना पड़ा है। मशीने लग चुकी हैं, यहां जो भी अधिकारी आता है वह पिछले कई वर्षों से यही कहता आ रहा है कि बस ऊपर से आदेश आने बाकी हैं। आदेश आते हुए पम्प चालू कर दिया जायेगा। पिछले कई महीनों से तो काम भी बन्द है। पम्प चालू भी नहीं हो सकता क्योंकि गंगा नदी से लेकर इस पम्प हाउस तक पाईप लाईन का काम अभी-भी अधूरा है। जब तक लाइन पूरी नहीं पड़ जाती तब-तक पानी की सप्लाई कैसे चालू की जा सकती है’। काम कब पूरा होगा ? कब यह पम्प हाउस काम करने लगेगा ? यह पूछे जाने पर चौकीदार ने सपाट सा उत्तर दिया, ‘मैं तो ठेकेदार की तरफ से तैनात किया गया व्यक्ति हूं, नहीं बता सकता, काम कब शुरू होगा !

फूलबाग के पम्प हाउस को लेकर इस संशय से भी इंकार नहीं किया जा सकता कि काम पूरा होने के बाद वर्षों से धूल खा रहीं कीमती मशीनें काम करेंगी भी अथवा नहीं ? क्योंकि पिछले कई वर्षों से इन्हें देखा तक नहीं गया। यहां तक कि कोई अभियंता भी इन मशीनों को चेक करने नहीं आया।

क्षेत्रीय सभासदों की मानें तो पम्प हाउस को चालू करने से पहले दोबारा उन्हीं इलाकों की खुदाई करके जांच करनी पड़ेगी, जहां पाइप लाइनें डाली जा चुकी हैं। इलाकाई लोगों का मानना है कि पाइप लाइनों को बिना आपस में जोड़े ही लाइनें बिछाकर ढक दी गयी हैं। बीच-बीच में तो लाइन ही नहीं है। इन परिस्थितियों में यदि पम्प हाउस से पानी छोड़ा गया तो पानी घरों में तो नहीं अलबत्ता घनी बस्ती वाले वे इलाके जलमग्न हो जायेंगे जहां लाइनों को आपस में जोडे़ बिना ही लाइनें बिछा दी गयी हैं। यहां कि निवासियों ने यह भी बताया कि ठेकेदार के लोगों ने लाइन डालते समय प्रत्येक घरों से कनेक्शन के नाम पर 100 से लेकर 200 रूपए तक वसूले हैं।

ये चौंकाने वाली तस्वीर उस वक्त सामने आयी जब हमारे कानपुर संवाददाता ने शहर के इनर ओल्ड इलाकों का दौरा कर वस्तुस्थिति की जानकारी हासिल की। प्रस्तुत है आंखों देखी एक रिपोर्ट:-

क्या कहते हैं अधिकारी

एस.के.गुप्ता (परियोजना प्रबंधक, जल-निगम, कानपुर)

जे.एन.एन.यू.आर.एम के तहत कानपुर के इनर ओल्ड एरिया में पेयजल योजना का कार्य लगभग 75 प्रतिशत पूरा हो चुका है। पूर्व में काम करने वाली दोशियान कम्पनी का 50 प्रतिशत भुगतान रोका गया है। साथ ही उसकी सुरक्षा धनराशि भी जब्त कर ली गयी है। शेष 25 प्रतिशत कार्य के लिए दूसरी नयी कम्पनियों को ठेके आवंटित किए गए हैं। निगम के उच्चाधिकारियों ने योजना की लागत को 340 करोड़ से बढ़ाकर 393.93 करोड़ स्वीकार कर लिया है। साथ ही समय सीमा भी 31 मार्च 2015 तक बढ़ा दी है। श्री गुप्ता के अनुसार यह सारी प्रक्रिया अभी तक मौखिक रूप चल रही है। अभी तक लिखित रूप में कोई आदेश नहीं मिले हैं। जाहिर है 340 करोड़ की योजना में लूटमार करने वालों के खिलाफ जांच के बाद यह मामला अत्यधिक संवेदनशील हो चुका है। कोई भी अधिकारी आग में हाथ डालने को तैयार नहीं। दूसरी ओर कानपुर शहर के इनर ओल्ड एरिया निवासियों के बीच शुद्ध पेयजल संकट बरकरार है। अब जबकि कानपुर जल-निगम के अधिकारी यह कह रहे हैं के पाइप लाइन डालने के लिए समय सीमा बढ़ा दी गयी है तो निश्चित रूप से इस इलाके के निवासियों को अगले वर्ष भी शुद्ध पेयजल मिलना मुश्किल हो जायेगा।

भारत सिंह (अधीक्षण अभियंता, जल-निगम, कानपुर)

आपकी बात सही है कि पानी की सप्लाई का काम पूरा नहीं हो पाया है और न ही हम आम लोगों के घरों तक पानी पहुंचा पाए हैं। परन्तु मुझे पूरा विश्वास है कि 31 मार्च 2015 तक कार्य पूरा कर लिया जायेगा। इस से पूर्व इस योजना में क्या हुआ ? मुझे इसकी जानकारी नहीं है।

गौहर हमीद (पूर्व वार्ड अध्यक्ष, वार्ड संख्या. 107, करनैल गंज, कानपुर)

पूर्व वार्ड अध्यक्ष गौहर हमीद से जब इस संवाददाता ने योजना में भ्रष्टाचार के बाबत जानकारी हासिल की तो वे लगभग आवेश में आते हुए बोले, ‘पेयजल योजना को जल-निगम के अधिकारियों द्वारा मजाक बनाकर रख दिया गया है। पानी की सप्लाई के लिए जिन प्लाष्टिक के पाईप (पाईप का टुकड़ा दिखाते हुए) को बिछाया जा रहा है, वे बेहद घटिया किस्म के हैं। यहां तक कि वे हाथ से दबाने भर से टूट जाते हैं। क्षेत्रीय लोगों के विरोध के बावजूद भी ठेकेदारों और भ्रष्ट अधिकारियों की मिली-भगत के कारण कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है।

राधेश्याम पाण्डेय, चौकीदार (फूलबाग, पम्प हाउस)

चार साल तो मुझे हो गए हैं यह सुनते-सुनते कि जल्द ही पम्प हाउस काम करने लगेगा। कर्मचारियों के लिए बने कमरों में कर्मचारी भी नियमित बैठने लगेंगे। पिछले कई वर्षों से बंद पड़े कमरों की हालत भी निरंतर खराब होती जा रही है। गंगा नदी से पम्प हाउस तक पूरी लाइन ही नहीं पड़ सकी है तो पम्प चालू कैसे हो सकता है। कभी-कभार अधिकारी आते हैं, बस बाहर से ही देखकर चले जाते हैं। करोड़ों की मशीनों की जांच के लिए भी कोई नहीं आता। मैं तो ठेकेदार की ओर से नियुक्त किया गया हूं इसलिए यह नहीं बता सकता कि अधिकारी स्तर पर काम की क्या योजना तैयार हो रही है। पम्प हाउस पर मेसर्स इनविराद प्रोजेक्ट प्राइवेट लिमिटेड का बोर्ड़ लगा हुआ है। बोर्ड पर कार्य की अवधि अक्टूबर 2008 से सितम्बर 2014 तक लिखी हुई है। बोर्ड पर 2014 की अवधि मिटाकर दोबारा लिखी गयी है ताकि बिना आधिकारिक जांच के फौरी तौर पर जांच के दौरान यह साबित न हो सके कि कार्य की अवधि को समाप्त हुए वर्षों बीत चुके हैं। दोबारा अवधि बढ़ाए जाने की लिखित जानकारी भी किसी के पास नहीं है।

पटकापुर के स्थानीय निवासी – सुनील वर्मा, अशोक गुप्ता, अशोक प्रजापति एवं अन्य

कानपुर शहर के इनर ओल्ड एरिया में शरीक पटकापुर मोहल्ला निवासी सुनील वर्मा कहते हैं कि पिछले कई दशकों से इस इलाके में शुद्ध पेयजल का संकट बना हुआ है। इस इलाके में सरकारी लाइन आज तक नहीं डाली गयी इसके बावजूद वाटर टैक्स और सीवर टैक्स निरंतर लिया जा रहा है। लगभग 6 माह पूर्व पाइप लाइन बिछायी गयी थी। कहा गया था कि जल्द ही पानी की सप्लाई भी शुरू कर दी जायेगी। कनेक्शन के नाम पर 100 से 200 रूपए तक प्रत्येक घर से वसूले गए। पानी के लिए एक विधायक ने बोरिंग करवाकर 500 लीटर क्षमता की टंकी लगवा दी है। सुबह-शाम घर की महिलाओं से लेकर बच्चे और बूढ़ तक पानी के लिए लाइन लगाकर घण्टों खड़े रहते हैं। सरकार की ओर से इण्डिया मार्क-2 जो हैण्डपम्प लगाए भी गए थे वे वर्षों से खराब हैं। इस मोहल्ले की आबादी लगभग 25 हजार है। सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है कि पानी के लिए यहां के लोगों को कितनी मशक्कत करनी होती है। कमोबेश यही बात अशोक गुप्ता, अशोक प्रतापति सहित मोहल्ले के अन्य लोग भी कहते हैं।

इंतजार अहमद, दियानतउल्लाह, अजहर अहमद, मोहम्मद सनवर एवं सईद सहित दूसरे मोहल्ले के लोगों का भी यही कहना है कि लाइन डाले हुए काफी समय बीत चुका है लेकिन पानी अभी तक चालू नहीं हो पाया है। मोहल्ले वालों से कनेक्शन के नाम पर उगाही भी की गयी। यह लोग भी एक पार्षद के सहयोग से बोरिंग कर लगायी गयी टंकियों से पानी भरने को विवश हैं। कुछ तो पड़ोस की मस्जिद से पीने का पानी भरकर लाते हैं। पाइप लाइन को निश्चित गहराई तक खोदकर डालने के बजाए तीन-चार फिट खोद कर ही डाल दिया गया है। अभी हाल ही में जब इंटरलॉकिंग की गयी तो कई लाईने क्षतिग्रस्त हो चुकी हैं। पाइप इतने कमजोर हैं कि हाथ से दबाने भर से टूट जाते हैं। ऐसी दशा में यदि दोबारा लाइन डालने से पहले पानी चालू भी किया गया तो निश्चित तौर पर घरों में तो पानी नहीं आयेगा, अलबत्ता गलियां जरूर जलमग्न हो सकती हैं।

अमोद त्रिपाठी, सभासद (पटकापुर), कानपुर

लाइन बिछाने में जमकर अनियमितता की गयी है। जिस दिन पानी चालू हुआ गलियों में पानी ही पानी नजर आयेगा। पीवीसी पाइप की गुणवत्ता इतनी खराब है कि जरा से दबाव से ही टूट जाते हैं। जगह-जगह लाइनें ब्लास्ट हो जायेंगी। श्री त्रिपाठी का कहना है कि लाइनों को सिर्फ जमीन में दबा दिया गया है। न तो कहीं पर ज्वाइंट लगाए गए हैं और न ही पूरी लाइन ही बिछायी गयी है। ऐसा लगता है कि शायद योजना के धन में लूटमार और खानापूर्ति के लिए ही लाइने बिछायी गयी हैं। सरकार की मंशा पेयजल उपलब्ध कराने की नहीं थी। दिखाने के लिए थोड़ी-थोड़ी दूरी पर लाइने डाली गयी हैं। कोई भी लाइन एक दूसरे से कनेक्ट नहीं है। श्री त्रिपाठी कहते हैं, ‘मेरी सरकार से मांग है कि इन लाइनों को खुदवाकर जांच करनी चाहिए। असलियत खुद-ब-खुद सामने आ जायेगी।

जफर अहमद, (सिविल डिफेंस पोस्ट वार्डन, घम्मू खां का हाता, कानपुर)

इस योजना के तहत कानपुर में जल-निगम के द्वारा बिछायी जा रही पाइप लाइन के लिए जो खुदाई की जा रही है वह मानकों के अनुरूप नहीं है। इसमें नियमानुसार बालू का प्रयोग भी नहीं किया जा रहा है। पाईप बेहद घटिया किस्म के हैं। घनी बस्तियों के लोग पानी आने के इंतजार में हैं लेकिन अधिकारियों और ठेकेदारों की लापरवाही के चलते ऐसा लगता है कि हमें अभी कई वर्ष और इंतजार करना पडे़गा।

यह आर्टकिल लखनऊ से प्रकाशित दृष्टांत मैग्जीन से साभार लेकर भड़ास पर प्रकाशित किया गया है. इसके लेखक तेजतर्रार पत्रकार अनूप गुप्ता हैं जो मीडिया और इससे जुड़े मसलों पर बेबाक लेखन करते रहते हैं. वे लखनऊ में रहकर पिछले काफी समय से पत्रकारिता के भीतर मौजूद भ्रष्‍टाचार की पोल खोलते आ रहे हैं.

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फर्जी सर्कुलेशन से यूपी में अरबों की लूट

भ्रष्टाचार की खबरों को नमक-मिर्च लगाकर परोसने वाला कथित ‘चतुर्थ स्तम्भ’ स्वयं कितना भ्रष्ट है, इसका अंदाजा उसकी फर्जी प्रसार संख्या केा देखकर सहज ही लगाया जा सकता है। यूपी की जनसंख्या (वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार लगभग 20 करोड़) से कहीं अधिक दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक और मासिक पत्र-पत्रिकाओं की प्रसार संख्या है। यह चौंकाने वाला आंकड़ा सूचना एवं जनसम्पर्क निदेशालय की कम्प्यूटर शाखा में दर्ज है। एक हजार से भी ज्यादा अखबार सरकारी विज्ञापन की लालसा में सूचीबद्ध हैं जबकि बाजारों और घरों में गिने-चुने अखबार ही नजर आते हैं। 

1 अप्रैल 2013 से 30 सितम्बर 2014 के बीच इन अखबार कर्मियों में से ज्यादातर ने फर्जी प्रसार संख्या के आधार पर सूबे के सरकारी खजाने से विज्ञापन की शक्ल में लगभग सवा अरब से भी ज्यादा की रकम लूटी है। यदि हम बात करें यूपी की राजधानी लखनऊ की, तो और भी अधिक चौंकाने वाले आंकड़े नजर आते हैं। सूचना विभाग की निरीक्षा शाखा से गुजरकर कम्प्यूटर शाखा में दर्ज आंकड़ों के अनुसार 293 अखबारों ने अपना प्रकाशन स्थल लखनऊ दर्शा कर विज्ञापन के लिए सूचीबद्ध करा रखा है। महत्वपूर्ण पहलू यह है कि वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार राजधानी लखनऊ की आबादी लगभग 45 लाख है जबकि राजधानी लखनऊ में अखबारों की प्रसार संख्या 90 लाख से भी अधिक है। यह आंकड़ा सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग में दर्ज है। मीडिया के इस फर्जीवाडे़ पर विभाग के अधिकारी और कर्मचारी भी खामोश हैं। उनकी खामोशी का रहस्य क्या है ? यह जांच का विषय हो सकता है लेकिन मीडिया के फर्जीवाड़े के फेर में सरकारी खजाने में सेंधमारी की जा रही है। अधिकतर वे अखबार सेंधमारी कर रहे हैं जो अस्तित्व में ही नहीं हैं। जो हैं भी वे महज फाइल कॉपी तक ही सीमित हैं।

खेल में अधिकारियों की भी सहभागिता 

इन्हीं फर्जी आंकड़ों और सूचना विभाग की संस्तुति पर अखिलेश सरकार ने अपनी सरकार की छवि सुधारने की लालसा में महज 18 माह में ही 125 करोड़ से भी ज्यादा की राजकीय धनराशि फर्जी प्रसार संख्या वाले अखबारों पर लुटा दी। एक अनुमान के मुताबिक इतनी बड़ी धनराशि से सूबे के कई उद्योगों को पुनर्जीवित किया जा सकता था। इतनी बड़ी धनराशि चिकित्सा और शिक्षा के क्षेत्र में प्रगति ला सकती थी। इसके विपरीत अरबों का सरकारी खजाना उन अखबारों पर लुटा दिया गया जो नियमानुसार आर.एन.आई., डी.ए.वी.पी. और सूचना विभाग की गाइड लाईन को भी पूरा नहीं करते। ऐसा नहीं है कि इसकी जानकारी सम्बन्धित जिम्मेदार अधिकारियों को नहीं है। इसके बावजूद उनकी रहस्यमयी चुप्पी साफ बता रही है कि लूट के इस खेल में उनकी भी सहभागिता है। प्राप्त जानकारी के मुताबिक लूट के इस खेल में तथाकथित कुछ कमीशनखोर अधिकारी और कर्मचारी यूपी के सरकारी खजाने को पिछले कई दशकों से लूटने में सहभागिता निभा रहे हैं। प्रस्तुत है एक विस्तृत रिपोर्ट:-

एक तरफ तो सपा सरकार बजट की तंगी का रोना रोकर विकास कार्य प्रभावित होने की बात करती है वहीं दूसरी ओर सरकारी खजाने से करोड़ों रूपए उन मीडिया कर्मियों के बीच विज्ञापन की शक्ल में लुटाए जा रहे हैं जिनका नियमानुसार वजूद ही नहीं होना चाहिए था। सैकड़ों की संख्या में दो से चार पन्ने वाले अखबार महज फाईल कॉपी के लिए ही ट्रेडिल मशीन अथवा सीट ऑफसेट मशीनों पर अपनी प्रतियां छपवाते हैं। गौरतलब है कि उपरोक्त मशीनों की क्षमता ही नहीं है कि कथित फर्जी अखबारों द्वारा दर्शाए गए प्रसार संख्या के आधार पर छपाई कर सकें। ऐसे अखबार पिछले कई वर्षों से महज फाईल कॉपी के लिए 20 से 25 प्रतियां छपवाकर सूचना विभाग में जमा करवाते आ रहे हैं। बदले में हजारों की प्रसार संख्या दिखाकर प्रतिवर्ष लाखों का विज्ञापन बटोर रहे हैं। 

सूचना विभाग के कर्मचारी भी शामिल हैं इस खेल में 

विडम्बना यह है कि विभाग के आला अधिकारी से लेकर चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी भी इस फर्जीवाड़े से भली-भांति परिचित हैं, इसके बावजूद वे खुली आंख से सरकारी खजाने को लुटता देख रहे हैं। अचम्भा तब होता है जब अधिकारी ऐसे अखबार वालों को अपशब्दों से तो नवाजते हैं लेकिन बात जब पहल करने की आती है तो पीछे हट जाते हैं। इनकी मजबूरी के पीछे की कहानी भी कम चौंकाने वाली नहीं है। सच तो यह है कि सूचना विभाग के ही कई कर्मचारियों-अधिकारियों ने अपने परिजनों के नाम से अखबार/पत्रिका का शीर्षक आवंटित करवा रखा है। इन्हीं अखबारों और पत्रिकाओं के सहारे वे भी सरकारी खजाने में जमकर सेंध लगा रहे हैं। जिन्हें अखबारों/पत्रिकाओं की चौकसी करने के लिए मोटे वेतनमान पर सरकार ने तैनात कर रखा है वे ही फर्जी अखबार वालों के साथ मिलकर ‘‘चोर-चोर, मौसेरे भाई’’ की तर्ज पर खुलेआम सरकारी खजाने को लूटने में व्यस्त हैं। इस अंक में उत्तर-प्रदेश सरकार के खजाने को लूटने वाले उन लोगों का खुलासा किया जा रहा है जिन्होंने फर्जी प्रसार संख्या के सहारे यूपी सरकार के खजाने से 75 करोड़ से भी ज्यादा रूपये विज्ञापन की शक्ल में महज 18 महीनों में ही लूट लिए।

सूबे की अखिलेश सरकार ने छवि सुधारने की गरज से (1 अप्रैल 2013 से 30 सितम्बर 2014) लगभग अट्ठारह महीनों के दौरान विज्ञापन के मद में 125 करोड़ से भी ज्यादा की धनराशि यूपी और दिल्ली के कुछ अखबारों पर लुटा दी। यूपी के सरकारी खजाने से इतनी बड़ी धनराशि लुटाने के बावजूद अखिलेश सरकार की छवि तो नहीं सुधरी अलबत्ता वे अखबार मालिक माला-माल हो गए जिनके अखबारों की प्रसार संख्या फाईल कॉपी (20 से 25 कॉपी) तक ही सीमित है। नियमतः 2000 से कम प्रसार संख्या वाले अखबारों को विज्ञापन दिए जाने की सुविधा नहीं है, इसलिए 90 प्रतिशत से भी ज्यादा अखबार वालों ने फर्जी हलफनामा और फर्जी प्रपत्रों के माध्यम से हजारों-लाखों की प्रसार संख्या सूचना एवं जनसम्पर्क निदेशालय के सम्बन्धित विभाग में दर्ज करा रखी है। हालांकि प्रसार संख्या के आधार पर अधिक दर पर विज्ञापन प्राप्त करने वालों की जांच के लिए बकायदा ‘‘निरीक्षा शाखा’’ भी अस्तित्व में है, इसके बावजूद फर्जी प्रसार संख्या दर्शाकर प्रति वर्ष लाखों का विज्ञापन बटोरने वाले अखबार स्वामी मालामाल हो रहे हैं।

नवनीत सहगल को भी है इसकी जानकारी 

ऐसा नहीं है कि इस फर्जीवाड़े की जानकारी सम्बन्धित विभाग के उच्चाधिकारियों को नहीं है, उन्हें इस फर्जीवाड़े की जानकारी पुख्ता प्रमाणों के साथ विभिन्न संगठनों और कुछ पत्रकारों द्वारा उपलब्ध करायी जा चुकी है। जानकार सूत्रों की मानें तो इस फर्जीवाडे़ की जानकारी सूचना विभाग के ही अधिकारियों ने वर्तमान प्रमुख सचिव (सूचना) नवनीत सहगल को भी दे रखी है। इसके बावजूद सूबे की सरकार और सम्बन्धित विभाग के आला अधिकारी जिस तरह से यूपी के खजाने को चुपचाप लुटता देख रहे हैं, उसे देखकर यही कहा जा सकता है कि वर्तमान सपा सरकार के कार्यकाल में सब कुछ जानते हुए भी जिंदा मक्खी निगलने का प्रयास किया जा रहा है। यदि यह कहा जाए कि सपा सरकार अपना हित साधने की गरज से ऐसे अखबारों की पोषक बनी हुई है तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होनी चाहिए। इसके पीछे सपा सरकार की वास्तविक मजबूरी क्या है? यह जांच का विषय हो सकता है लेकिन ‘दृष्टांत’ के पास र्प्याप्त मात्रा में उपलब्ध दस्तावेज साफ बता रहे हैं कि यूपी के खजाने को लूटने वाले कथित पत्रकार और दो से चार पन्नों वाले अखबार स्वामी किस तरह से सरकार की मजबूरी का फायदा उठा रहे हैं।

लखनऊ में ही 293 सूचीबद्ध अखबार

 कुछ चौंकाने वाली जानकारियां ऐसी हैं जो इस लूट कांड का पर्दाफाश करने के लिए काफी है। सूचना एवं जनसम्पर्क निदेशालय में सिर्फ लखनऊ से ही अपना प्रकाशन दर्शाने वाले सूचीबद्ध अखबारों की संख्या 293 है। इसमें उर्दू अखबारों की संख्या 94 है जबकि अंग्रेजी के 11 अखबारों ने लखनऊ से अपना प्रकाशन स्थल दर्शाकर विज्ञापन के लिए सूचीबद्ध करवा रखा है। हिन्दी के अखबारों की संख्या 188 है। इन्हीं 293 अखबारों की सूचना विभाग के रजिस्टर में प्रसार संख्या लगभग 90 लाख़ दर्ज है। चौंकाने वाला पहलू यह है कि लखनऊ की जनसंख्या 2011 की जनगणना के अनुसार 45 लाख 89 हजार 838 है। यूपी की राजधानी होने के नाते यहां का साक्षरता प्रतिशत 77.29 है। 31 लाख 27 हजार 260 लोग साक्षर की श्रेणी में चिन्हित किए गए हैं। लगभग 28 लाख की आबादी शहर में रहती है शेष ग्रामीण इलाकों में। जहां तक ग्रामीण इलाकों में समाचार-पत्रों के प्रसार संख्या की बात है तो एक जानकारी के अनुसार ग्रामीण इलाकों में सिर्फ 20 प्रतिशत घरों में ही समाचार-पत्र आते हैं। इन आंकड़ों को बताने का तात्पर्य यह है कि लगभग 46 लाख की आबादी में 90 लाख से भी ज्यादा अखबार कैसे बिक जाते हैं ? यह चौंकाने वाले आंकड़े तो महज लखनऊ से प्रकाशन स्थल दर्शाने वाले अखबारों के हैं जबकि हकीकत यह है कि सूचना एवं जनसम्पर्क निदेशालय में यूपी सरकार के खजाने को लूटने के लिए 1003 अखबारों ने सूचीबद्ध करवा रखा है।

फर्जी सर्कुलेशन का बड़ा खेल 

फर्जी प्रपत्रों के आधार पर प्रसार संख्या अधिक दिखाने के पीछे भी कई महत्वपूर्ण कारण मौजूद हैं। सर्वप्रथम डीएवीपी और यूपीआईडी से मिलने वाले विज्ञापन की दरों में इजाफा तो इन अखबार कर्मियों के लिए महत्वपूर्ण है ही साथ ही जिला, मण्डल और मुख्यालय से मान्यता हासिल करने और सरकारी आवास हासिल करने के लिए भी फर्जी सर्कुलेशन का खेल खेला जा रहा है। हालांकि पत्रकारों की मान्यता के लिए ऐसी कोई नियमावली नहीं बनी है जिसके तहत पत्रकारों को जिला और मुख्यालय स्तर पर मान्यता दी जा सके, अलबत्ता मार्गदर्शिका-2008 में गाइडलाईन जरूर बनी है। उपरोक्त गाइडलाईन तत्कालीन सूचना सचिव सुनील कुमार ने तैयार करवाई थी। तब से लेकर अब तब उसी गाइडलाईन पर पत्रकारों को मान्यता प्रदान की जा रही है। 

गौरतलब है कि मार्कण्डेय काटजू ने भी इस मामले में हस्तक्षेप किया था लेकिन तत्कालीन सरकार ने अपना हित साधने की गरज से काटजू के विरोध पर कोई ध्यान नहीं दिया। वर्ष 2012-2013 में सूचना विभाग ने भी प्रेस काउंसिल को सूचित किया था कि इस कार्य के लिए वह समिति गठित करे और वही नियमावली तैयार करे। समिति गठित होने से पहले ही विभागीय समिति ने अपनी मर्जी से जिसे चाहा उसे अपनी गाइडलाईन पर मान्यता प्रदान कर दी। सूचना विभाग में जो गाइडलाईन बनी हुई है उसके अनुसार  6 हजार व उससे अधिक के प्रसार संख्या वाले अखबार कर्मियों को जिले से मान्यता दिए जाने का नियम है। इसी तरह से 25 हजार तक की प्रसार संख्या वाले दैनिक अखबार से एक पत्रकार को मुख्यालय से मान्यता मिल सकती है। इसी तरह से 25 हजार से 50 हजार की प्रसार संख्या वाले अखबार से दो और उससे अधिक प्रसार संख्या वाले अखबार से तीन व उससे अधिक पत्रकारों को मान्यता दी जा सकती है। सच तो यह है कि जितनी संख्या में दैनिक अखबार से पत्रकारों को मान्यता दी गयी है उतनी प्रसार संख्या किसी भी अखबार की नहीं है। यह दीगर बात है कि फर्जी प्रपत्रों के आधार पर इन अखबारों ने अपनी प्रसार संख्या लाखों में दिखा रखी हो।

कमीशन के लिए में सूचना विभाग के कर्मी कराते हैं खेल 

अखबारों के इस फर्जीवाडे़ में सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग के कुछ कथित भ्रष्ट कर्मचारी से लेकर अधिकारी तक शामिल हैं। वे ही अखबार कर्मियों को मान्यता व अन्य लाभ के लिए फर्जी प्रसार संख्या बढ़वाने के लिए प्रेरित करते रहे हैं। तरीका बताने का काम भी विभाग के ही अधिकारी से लेकर कर्मचारी तक करते हैं। एवज में उन्हें मिलता है अखबार कर्मियों से कमीशन। यह जानकार आश्चर्य होगा कि ऐसे कर्मचारियों को कमीशन देने वाले अखबारों में दो से चार पन्ने वाले अखबारों के साथ ही कुछ ऐसे दैनिक अखबार भी शामिल हैं जो यूपी ही नहीं बल्कि देश भर में अपनी पहचान रखते हैं।

विभाग के ही एक अधिकारी की मानें तो फर्जी प्रसार संख्या दर्शाने का खेल बिना अधिकारियों और कर्मचारियों की मिली-भगत से संभव ही नहीं है। गौरतलब है कि सूचना विभाग में अखबारों की प्रतियां नियमित जमा किए जाने का प्राविधान है। तभी उस अखबार को नियमित मानते हुए विज्ञापन और अन्य सुविधाएं प्रदान की जाती हैं। सम्बन्धित विभाग के अधिकारी और कर्मचारी भी यह बात भली-भांति जानते हैं कि कौन से अखबार कितनी संख्या में छपता है। वे चुप इसलिए रहते हैं क्योंकि अखबार कर्मियों की ओर से उन्हें नियमित सुविधा शुल्क सहित त्योहारों पर उपहार मिला करते हैं। कुछ अखबार कर्मी तो सीधे उच्चाधिकारियों से सम्पर्क साधकर अपना उल्लू सीधा करते आ रहे हैं। 

विडम्बना यह है कि अखबार कर्मियों पर ‘हर्र लगे न फिटकरी रंग चोखा’ वाली कहावत चरितार्थ होते देख सूचना विभाग से जुडे़ कई अधिकारी और कर्मचारियों ने भी अपने परिजनों के नाम से अखबारों का पंजीकरण करा रखा है। वे भी दूसरे अखबार कर्मियों की तरह फर्जी प्रपत्रों के सहारे अपना हित साध रहे हैं। जो अखबार स्टॉल तक नहीं पहुंच पाते उनकी प्रसार संख्या 50 हजार से भी ज्यादा दिखायी जा रही है। जो कहीं नजर नहीं आते वे प्रतिवर्ष यूपीआईडी और डीएवीपी के खजाने से विज्ञापन की शक्ल में अधिकतम प्रसार संख्या के आधार पर लाखों की लूट को अंजाम दे रहे हैं। जहां तक इस फर्जीवाडे़ में सूचना विभाग के कुछ कथित भ्रष्ट अधिकारियों और कर्मचारियों के मिले होने का दावा है तो कुछ उदहारणों से इसकी पुष्टि भी स्वयं हो जाती है। 

13 जनवरी 2014 को पत्रांक संख्या 566/जि.सू.का./सूचीबद्धता/2013-2014 के माध्यम से जिला सूचना कार्यालय के सहायक निदेशक सूचना ने सूचना विभाग के निदेशक को एक दैनिक समाचार-पत्र ‘सूचना संसार’ के बाबत आख्या भेजी। उस पत्र में साफ लिखा हुआ था कि उक्त अखबार समस्त नियमावलियों को पूर्ण करता है। साथ ही लखनऊ जनपद में उक्त समाचार-पत्र की प्रसार संख्या 9000 पर संस्तुति भी जतायी। यही अखबार लखीमपुर-खीरी में अपनी प्रसार संख्या 6500 प्रतिदिन दर्शा रहा है। इतना ही नहंी उन्नाव में इसी अखबार की प्रसार संख्या 6000 प्रतिदिन दर्शायी जा रही है। रायबरेली में यही अखबार अपनी प्रसार संख्या 5200 दर्शा रहा है। 

जिलों से प्रकाशित होने वाले अखबार भी इसी राह पर 

महत्वपूर्ण यह है कि रायबरेली, उन्नाव, सीतापुर, लखीमपुर और लखनऊ के जिला सूचना अधिकारियों ने भी इस अखबार की प्रसार संख्या पर अपनी सहमति जता दी। जो अखबार कहीं नजर न आता हो उस अखबार की प्रसार संख्या को सूचना विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों ने कैसे प्रमाणित कर दिया ? यह जांच का विषय हो सकता है। भ्रष्टाचार की पराकाष्ठा का अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि जिस अखबार की प्रसार संख्या जिला सूचना अधिकारी लखनऊ में 9 हजार बता रहे हैं उसी अखबार की प्रसार संख्या विभाग की कम्प्यूटर शाखा में 68 हजार 800 दर्ज है। परिणामस्वरूप इसी आधार पर इस अखबार ने महज 18 महीनों के दौरान सूबे के खजाने से 19 लाख 17 हजार 827 रूपए विज्ञापन की शक्ल में लूट लिए। 

बताया जाता है कि विभाग के ही एक अधिकारी ने इस लूटकांड का पर्दाफाश किया था। साथ ही एक शिकायती पत्र प्रमुख सचिव सूचना को भी भेजा था। जानकारी के मुताबिक फर्जी प्रसार संख्या दर्शाने वाले अखबार कर्मी के खिलाफ तो कुछ नहीं हुआ अपितु उक्त अधिकारी को जरूर अपने अधिकारियों की फटकार से रूबरू होना पड़ा। ठीक इसी तरह से एक अन्य दैनिक अखबार ‘सांई लहर’ के मामले ने भी सूचना विभाग के अधिकारियों की मिली-भगत को उजागर किया है। यह अखबार भले ही कहीं नजर न आता हो लेकिन सूचना विभाग के रजिस्टर और कम्प्यूटर में यह अखबार लगभग आधा दर्जन जनपदों से प्रकाशित होता है। रायबरेली से इस अखबार ने अपनी प्रसार संख्या 5150 दर्शा रखी है जबकि लखीमपुर-खीरी में इसकी प्रसार संख्या 6500 दर्शायी जा रही है। सीतापुर में यह अखबार 6000 प्रतियां रोजाना बेचने का दावा कर रहा है जबकि उन्नाव में इसकी प्रसार संख्या 6000 दर्शायी गयी है।

हरदोई से भी यह अखबार प्रतिदिन 6000 प्रतियां प्रसारित करने का दावा करता है। सूचना एवं जनसम्पर्क निदेशालय के जिम्मेदार अधिकारियों ने भी उसके इस फर्जी दावे पर अपनी मुहर लगा रखी है। इस अखबार का मामला भी लगभग उसी अखबार के समान है। जिस अखबार की प्रसार संख्या विभिन्न जनपदों से अधिकतम 6 हजार 500 दिखायी जा रही है उसी अखबार की प्रसार संख्या विभाग के कम्प्यूटर में 65 हजार 800 दर्ज है। इस अखबार की प्रसार संख्या उर्दू भाषा अखबार के रूप में दर्शायी गयी है। इस अखबार के स्वामी, मुद्रक और प्रकाशक सुभाष चन्द्र यादव हैं। श्री यादव को भले ही उर्दू भाषा का ठीक तरह से ज्ञान न हो लेकिन राजधानी लखनऊ सहित आधा दर्जन जनपदों से प्रसारित करने का दावा करने वाले इस अखबार को विभागीय अधिकारियों ने विज्ञापन के लिए सूचीबद्ध कर रखा है। 

इसी प्रसार संख्या के आधार पर इस अखबार ने विगत 18 माह के दौरान 30 लाख 81 हजार से भी ज्यादा की धनराशि विज्ञापन की शक्ल में हासिल कर राजकीय कोष को नुकसान पहुंचाया है। ये दो अखबार तो महज उदाहरण मात्र हैं जबकि सूचना विभाग, उत्तर-प्रदेश, लखनऊ के कम्प्यूटर में हजारों की संख्या में ऐसे अखबार सूचीबद्ध हैं जिनकी प्रसार संख्या न के बराबर है। इधर सूचना विभाग के ‘कम्प्यूटर शाखा’ में तैनात कर्मचारी स्वयं को निर्दोष बताते हुए कहते हैं कि डी.ए.वी.पी. से जो लिस्ट उनके पास आती है उसी के आधार पर वे अखबारों की प्रसार संख्या अंकित कर देते हैं। यदि इस आधार पर देखा जाए तो कम्प्यूटर शाखा के कर्मचारियों की इसमें कोई गलती नहीं है लेकिन विभाग के दूसरे उच्चाधिकारियों ने मामले को संज्ञान में क्यों नहीं लिया ? इस पर संदेह जरूर किया जा सकता है।

जिलों के कई अखबारों का सर्कुलेशन बड़े अखबारों के समकक्ष 

जनपद अम्बेडकर नगर से अपना प्रकाशन स्थल दर्शाने वाले हिन्दी दैनिक समाचार-पत्र ‘मौर्य सम्राट’ ने अपनी प्रसार संख्या प्रतिष्ठित समाचार-पत्रों दैनिक जागरण, अमर उजाला जैसे अखबारों के समकक्ष 66 हजार से भी ज्यादा दर्शा रखी है। इसी आधार पर इस अखबार ने सूचना विभाग से लगभग दो लाख का विज्ञापन झटका है। ‘सप्तरत्न’ समाचार-पत्र का नाम भले ही किसी न सुना हो लेकिन सूचना विभाग की कम्प्यूटर शाखा मे इस अखबार ने अपनी प्रसार संख्या 65 हजार से भी ज्यादा दर्शा रखी है। अम्बेडकर नगर से प्रकाशन स्थल दर्शाने वाले इस अखबार ने इसी प्रसार संख्या के आधार पर सूचना एवं जन सम्पर्क निदेशालय से 10 लाख से भी ज्यादा का विज्ञापन महज 18 माह के दौरान ही झटक लिया। 

अलीगढ़ से प्रकाशित हिन्दी दैनिक ‘प्रकाश’ नामक समाचार-पत्र सूचना विभाग की विज्ञापन शाखा मे विज्ञापन के लिए सूचीबद्ध है। इस अखबार ने अपनी प्रसार संख्या लगभग 52 हजार के आधार पर दो लाख रूपए विज्ञापन की शक्ल में सरकारी खजाने से लूटे हैं। इसी जनपद से प्रकाशित हिन्दी समाचार-पत्र ‘प्रावदा’, उर्दू समाचार-पत्र ‘मशाल-ए-आजादी’, हिन्दी समाचार-पत्र ‘राजपथ’ ने अपनी प्रसार संख्या 50 हजार से लेकर 65 हजार तक दर्शा रखी है। इसी प्रसार संख्या के आधार पर इन अखबारों ने विज्ञापन की शक्ल में लगभग 18 लाख रूपयों का चूना सरकार को लगाया है।

करीब 14 चौदह लाख की आबादी वाले शहर में 15 लाख से भी ज्यादा अखबार की प्रसार संख्या है। यहां बात हो रही है आगरा जनपद की। इस शहर में सर्वाधिक प्रसार संख्या दर्शाने वाले अखबारों की पंक्ति में हिन्दी दैनिक समाचार-पत्र हिन्दुस्तान, अमर उजाला, आज, दैनिक जागरण, डी.एल.ए., सच का उजाला और सवेरा आदि अखबार हैं। इन्हीं चुनिन्दा अखबारों की आगरा जनपद में प्रसार संख्या 6 लाख 57 हजार से ज्यादा है। यदि आगरा जनपद की पूरी आबादी को एक परिवार में पांच सदस्यों से विभाजित कर दिया जाए तो लगभग चार लाख परिवार हैं। यदि कुछ अति विशिष्ट लोगों को छोड़ दिया जा जाए तो अमूमन एक परिवार में एक ही अखबार आता है। साथ ही यह भी मान मान लिया जाए कि सभी परिवारों में अखबार आते हैं तो इस लिहाज से इस जनपद में मात्र पांच लाख से ज्यादा अखबारों की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए। ये आवश्यकता कुछ चुनिन्दा अखबार ही पूरा करने मे सक्षम हैं। इन परिस्थितियों में दस लाख से भी ज्यादा अखबार कहां खप रहे हैं? यह जांच का विषय हो सकता है। 

बंद हो चुके अखबार भी पा रहे विज्ञापन 

चौंकाने वाला पहलू यह है कि हिन्दी दैनिक समाचार-पत्र (डी.एल.ए.) का प्रकाशन बंद हुए काफी समय बीत चुका है इसके बावजूद सूचना विभाग की कम्प्यूटर शाखा में इस अखबार की प्रसार संख्या 1 लाख 51 हजार 790 दर्शायी जा रही है। इसी फर्जी प्रसार संख्या के आधार पर इस अखबार ने यूपी के सरकारी खजाने से 1 अप्रैल 2013 से 30 सितम्बर 2014 के बीच 30 लाख से भी ज्यादा की धनराशि विज्ञापन की शक्ल में लूट ली है। इसके अतिरिक्त हिन्दी समाचार-पत्र ‘अकिंचन भारत’ का नाम भले ही कोई न जानता हो लेकिन सूचना विभाग के कम्प्यूटर शाखा में इस अखबार की प्रसार संख्या 65 हजार 535 दर्ज है। इसी प्रसार संख्या के आधार पर इस अखबार ने 2 लाख 74 हजार से भी ज्यादा का विज्ञापन यूपी सरकार से लूटा है। हिन्दी समाचार-पत्र ‘अग्र भारत’ ने अपनी प्रसार संख्या 58 हजार 481 के आधार पर 2 लाख से ज्यादा का विज्ञापन यूपी सरकार से लिया है। 

हिन्दी दैनिक समाचार-पत्र ‘अमर उजाला’ आगरा जनपद में अपनी प्रसार संख्या 1 लाख 51 हजार से भी ज्यादा दर्शा कर सूबे के खजाने से महज 18 माह के दौरान लगभग 80 लाख रूपए विज्ञापन की शक्ल में लूट चुका है। दैनिक जागरण ने इस दौरान 1 लाख 19 हजार 595 की प्रसार संख्या पर लगभग 30 लाख रूपयों का विज्ञापन हासिल किया है। आगरा से ही प्रकाशित एक अन्य हिन्दी समाचार-पत्र ‘दाता संदेश’ ने लगभग 83 हजार के फर्जी प्रसार संख्या के आधार पर यूपी के सरकारी खजाने से 18 लाख से भी ज्यादा की धनराशि लूट ली है। आगरा से ही प्रकाशन का दावा करने वाले हिन्दी दैनिक नवलोक टाइम्स और नवलोक टाइम्स को भले ही आगरा की जनता नहीं जानती है लेकिन सूचना विभाग में इन दोनों अखबार की प्रसार संख्या तकरीबन 50 हजार है। इसी आधार पर इस अखबार ने भी यूपी सरकार से लाखों के विज्ञापन बटोरे हैं। 

हिन्दी समाचार-पत्र ‘सच का उजाला’ की प्रसार संख्या 56 हजार 940 है। इसी आधार पर इस अखबार ने लगभग 3 लाख का विज्ञापन लेकर यूपी सरकार के खजाने को चोट पहुंचायी है। यह बात सूचना विभाग का जिला कार्यालय भी भली-भांति जानता है। इसके बावजूद उसकी खामोशी रहस्यमयी बनी हुई है। इस लिहाज से देखा जाए तो प्रतिष्ठित अखबार भी अपनी प्रसार संख्या गलत दर्शा कर सरकारी खजाने को लूटने में व्यस्त हैं। इन अखबारों के अतिरिक्त हिन्दी समाचार पत्र ‘अकिंचन भारत’ ने आगरा में अपनी प्रसार संख्या 65 हजार से भी ज्यादा दर्शा रखी है। इसी प्रसार संख्या के आधार पर इस अखबार ने विज्ञापन की शक्ल में 2 लाख 74 हजार से भी ज्यादा की रकम पर कथित डाका डाला है।

उर्दू के अखबार भी नहीं हैं पीछे 

आजमगढ़ जनपद के लगभग एक दर्जन अखबारों ने यूपी सरकार से विज्ञापन हासिल करने की गरज से सूचना विभाग के सूचीबद्ध रजिस्टर में अपने अखबारों के नाम दर्ज करा रखे हैं। इनमें से 4 अखबार उर्दू के हैं जबकि 7 अखबार हिन्दी के। सिर्फ उर्दू के अखबारों की प्रसार संख्या 1 लाख 20 हजार के करीब है जबकि हिन्दी के अखबारों की प्रसार संख्या लगभग 3 लाख के आस-पास है। इन अखबारों के नाम भले ही इलाकाई निवासियों ने कभी न सुने हों लेकिन 60 हजार से लेकर 75 हजार तक की प्रसार संख्या दर्शाने वाले इन अखबार कर्मियों ने सरकारी खजाने से लगभग 35 लाख के विज्ञापन हासिल कर लिए। गौरतलब है कि इस जनपद में राष्ट्रीय समाचार-पत्रों ‘दैनिक जागरण, अमर उजाला, राष्ट्रीय सहारा, नवभारत टाइम्स, और हिन्दुस्तान जैसे अखबारों की प्रसार संख्या अलग से है। यदि उक्त प्रतिष्ठित अखबार ही आजमगढ़ की आबादी के काफी हैं तो उन अखबारों को सूचना विभाग ने फर्जी प्रसार संख्या के आधार पर कैसे सूचीबद्ध कर रखा है। इतना ही नहीं इन अखबारों ने विज्ञापन की शक्ल में लाखों रूपयों की चोट भी सरकारी खजाने को पहुंचायी है।

समाजवादियों के गढ़ इटावा से भी 10 अखबार सूचना विभाग में सूचीबद्ध हैं। इन अखबारों में ‘आज का विचार राष्ट्रीय विचार, उदगार, जमीनी आवाज, दिग्गवार्ता, दिन-रात, देश धर्म, दैनिक आज का विचार राष्ट्रीय विचार, पैगामें अजीज, माधव संदेश का नाम भले ही इटावा की जनता ने कभी न सुने हों लेकिन इन अखबारों की प्रसार संख्या लाखों में है। इटावा से सर्वाधिक प्रसार संख्या दर्शाने वाला अखबार है हिन्दी दैनिक ‘सवेरा’ है। इस अखबार ने फर्जी प्रसार संख्या के आधार पर सरकार खजाने से विज्ञापन की शक्ल में 27 लाख से भी ज्यादा की लूट की है। इसके अतिरिक्त दूसरे अन्य अखबारों ने भी महज 18 महीनों के दौरान विज्ञापन की शक्ल में लाखों रूपए सरकारी खजाने से लूटे हैं।

यूपी की राजधानी लखनऊ से अपना प्रकाशन स्थल दर्शाने वाले सूचीबद्ध अखबारों की संख्या 293 है। इन अखबारों ने महज महज 18 महीनों के दौरान विज्ञापन की शक्ल में करोड़ों रूपयों की सेंध यूपी सरकार के खजाने में लगायी है। कुछ बड़े दैनिक अखबारों को छोड़ दिया जाए तो ज्यादातर मोटी रकम डकारने वाले वे अखबार हैं जिनकी प्रसार संख्या सूचना विभाग के कम्प्यूटर में तो 50 हजार से लेकर 75 हजार तक है लेकिन ऐसे अखबार नजर कहीं नहीं आते। एक स्कूल का संचालन करने वालों ने ‘अपना अखबार’ शीर्षक से अखबार की शुरूआत तो जोर-शोर से की थी लेकिन वर्तमान में उसकी स्थिति न के बराबर है। इसके बावजूद सूचना विभाग के रजिस्टर में इस अखबार की प्रसार संख्या 66 हजार 195 दर्ज है। फर्जी प्रसार संख्या के आधार पर सूचना विभाग से इस अखबार को मात्र डेढ़ वर्षों के दौरान विज्ञापन की शक्ल में लगभग 9 लाख 70 हजार रूपए दे दिए। 

हिन्दी दैनिक समाचार-पत्र ‘अवध द्वार समाचार’ का नाम भले ही किसी ने न सुना हो लेकिन इस अखबार की प्रसार संख्या सूचना विभाग के कम्प्यूटर में 55 हजार है। विज्ञापन के मद में इस अखबार को डेढ़ लाख से भी ज्यादा का विज्ञापन मिल चुका है। उर्दू दैनिक समाचार-पत्र ‘अवध की पुकार’ की प्रसार संख्या 55 हजार से भी ज्यादा है। यह अखबार लखनऊ के किस कोने से निकलता है ? इसकी जानकारी शायद ही किसी को होगी, लेकिन इसकी प्रसार संख्या के आधार पर यूपी के खजाने से विज्ञापन की शक्ल में 9 लाख 21 हजार से भी ज्यादा का रकम निकल गयी। उर्दू का ही एक अन्य अखबार ‘अवधनामा’ अपनी प्रसार संख्या 75 हजार दर्शा रहा है। इस अखबार को सूचना विभाग ने विज्ञापन की शक्ल में लगभग 35 लाख के विज्ञापन दे दिए। 

‘अवधनामा’ ने हिन्दी दैनिक के रूप में भी अपनी प्रसार संख्या 65 हजार सूचना विभाग के कम्प्यूटर में दर्ज करा रखी है। इसी आधार पर राज्य सरकार ने इस शीर्षक के नाम से लगभग 14 लाख रूपए विज्ञापन की शक्ल में लुटा दिए। उर्दू के एक अन्य अखबार अहवाल-ए-वतन की प्रसार संख्या सूचना विभाग के कम्प्यूटर में 51 हजार 850 दर्ज है और इस अखबार को विज्ञापन प्रकाशित करने की एवज में सरकारी खजाने से 24 लाख 50 हजार से भी ज्यादा की रकम महज डेढ़ वर्ष के दौरान दी जा चुकी है। राजधानी लखनऊ से प्रकाशित प्रतिष्ठित अखबार दैनिक जागरण का एक अन्य संस्करण ‘आई नेक्स्ट’ हिन्दी और अंग्रेजी का प्रकाशन काफी समय पहले बंद हो चुका है लेकिन सूचना विभाग की कम्प्यूटर शाखा में 1 अप्रैल 2013 से 30 सितम्बर 2014 के बीच इस अखबार की प्रसार संख्या 32032 दर्शा रखी है। इसी आधार पर इस अखबार को बिना प्रकाशन के ही लगभग 90 हजार रूपए विज्ञापन की शक्ल में सरकारी खजाने से दे दिए गए। 

उर्दू का एक अन्य अखबार ‘आग’ अपनी प्रसार संख्या 73 हजार से भी ज्यादा दर्शा रहा है। इसी प्रसार संख्या के आधार पर सूचना विभाग ने इसे 36 लाख से भी ज्यादा का विज्ञापन दे दिया है। जबकि जानकार सूत्रों का मानना है कि इस अखबार का उर्दू संस्करण मात्र 5 हजार प्रतियां ही छापता है। इसमें से भी हजारों की संख्या में प्रतियों की वापसी हो जाती है। सूचना विभाग में हिन्दी दैनिक समाचार-पत्र ‘आज’ की प्रसार संख्या 59325 दर्ज है जबकि पूरा मीडिया जगत यह बात अच्छी तरह से जानता है कि दैनिक ‘आज’ की आर्थिक हालत पिछले डेढ़ दशक से खस्ताहाल है। कर्मचारियों को समय से वेतन न मिलने की समस्या के साथ ही अल्प वेतन में किसी तरह से गुजारा करना पड़ रहा है। ज्यादातर अनुभवी पत्रकार इस संस्थान को छोड़कर जा चुके हैं। इसके बावजूद फर्जी प्रसार संख्या के आधार पर इस अखबार को विगत डेढ़ वर्षों के दौरान 36 लाख 35 हजार से ज्यादा के विज्ञापन सूचना एवं जनसम्पर्क निदेशालय की अकर्मण्यता के चलते सूबे की सरकार से दिलाए जा चुके हैं।

राजधानी लखनऊ से अपना प्रकाशन स्थल दर्शाने वाले उर्दू दैनिक अखबार ‘इन दिनों’ ने अपनी प्रसार संख्या 75 हजार प्रतिदिन दर्शा रखी है। इसी आधार पर सूचना विभाग ने इस अखबार को सरकारी खजाने से 38 लाख 63 हजार से भी ज्यादा का विज्ञापन दे रखा है और वह भी महज डेढ़ वर्षों के दौरान। हिन्दी दैनिक ‘इंकलाबी नजर’ 58 हजार से भी अधिक की प्रसार संख्या दिखाकर लगभग 12 लाख के विज्ञापन सूचना विभाग से झटक चुका है। सूचना विभाग के अधिकारी भी मानते हैं कि इस अखबार की प्रसार संख्या हजार भी नहीं होगी लेकिन कार्रवाई न किए जाने के बाबत पूछे जाने पर वे चुप्पी साध जाते हैं। 

हिन्दी समाचार-पत्र ‘उत्तर-प्रदेश सहकारी रोशनी’ ने भी 45 हजार की प्रसार संख्या दर्शाकर लगभग 20 लाख के विज्ञापन 18 माह के दौरान हासिल किए हैं। यह अखबार कहां-कहां बिकता है ? इसकी जानकारी सूचना विभाग के उस विभाग (निरीक्षा शाखा) के पास भी नहीं है जिसे अखबारों पर नजर रखने का दायित्व सौंपा गया था। मौखिक रूप से भले ही इस विभाग के अधिकारी सच्चाई बयां करते हों लेकिन लिखित रूप में इस विभाग ने उक्त अखबार के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की। सूचना विभाग की कम्प्यूटर शाखा में दर्ज उर्दू दैनिक समाचार-पत्र ‘उर्दू की तहरीर’ राजधानी लखनऊ में अपनी प्रसार संख्या 58 हजार 555 दर्शा रहा है वास्तविकता में इसकी प्रसार संख्या 500 का आंकड़ा भी पार नहीं करती। 

ऐसा कहा जाता है कि मुसलमानों की सर्वाधिक आबादी पुराने लखनऊ में बसती है। इस संवाददाता ने जब इन इलाकों के कुछ लोगों से अखबार के बारे में जानकारी ली तो किसी ने भी इस अखबार के बारे में नहीं सुना था। इन परिस्थितियों में इस अखबार ने हजार-दो हजार नहीं बल्कि 58 हजार से भी ज्यादा की प्रसार संख्या सूचना विभाग में दर्ज करवा रखी है। इसी आधार सूचना विभाग ने इस अखबार को लगभग 18 लाख रूपयों के विज्ञापन जारी कर दिए। एक अन्य उर्दू दैनिक ‘एक दाम’ ने तो कई प्रतिष्ठित दैनिक अखबारों को भी पीछे छोड़ते हुए अपनी प्रसार संख्या सूचना विभाग की कम्प्यूटर शाखा में 71 हजार 146 दर्ज करवा रखी है। इस अखबार का नाम आम जनता तो दूर की बात विभाग से जुडे़ अधिकारी तक नहीं जानते फिर भी इतनी अधिक प्रसार संख्या वाले अखबार को डेढ़ वर्षों के दौरान 20 लाख से भी ज्यादा की धनराशि विज्ञापन की शक्ल में सरकारी खजाने से लुटा दी गयी।

हिन्दी दैनिक समाचार-पत्र ‘कलपतरू एक्सप्रेस’ ने अपनी प्रसार संख्या 65 हजार 918 दर्शा रखी है। इसी आधार पर इस अखबार ने डेढ़ वर्षों के अंतराल में सरकारी खजाने से विज्ञापन की शक्ल में लगभग दस लाख रूपए लूट लिए। उर्दू दैनिक समाचार-पत्र ‘कौमी खबरें’ फर्जी प्रसार संख्या 65 हजार 522 के आधार पर 9 लाख से भी ज्यादा के विज्ञापन बटोर चुका है। राजधानी लखनऊ से प्रकाशन का दावा करने वाले उर्दू दैनिक समाचार-पत्र ‘कौम-ए-वतन, कौमी ऐलान, कौमी जबान, कौमी तंजीम, कौमी बयान, कौमी मुकाम, कौमी रफ्तार, कौमी समाचार, कौमी हमसफर और कौमी हालात के नाम भले ही लखनऊ और आस-पास के लोगों ने न सुने हों लेकिन इन अखबारों ने फर्जी प्रपत्रों के सहारे सूचना विभाग में अपनी प्रसार संख्या लाखों में दर्शा रखी है। 

इसी प्रसार संख्या के आधार पर इन अखबारों को डेढ़ वर्ष के दौरान लगभग 55 लाख के विज्ञापन जारी करने का रिकार्ड सूचना विभाग में दर्ज है। हिन्दी दैनिक समाचार-पत्र के रूप में पंजीकृत ‘क्रिएटिव दर्पण’ अपनी प्रसार संख्या 55 हजार 800 के आधार पर लगभग 30 लाख के विज्ञापन सूचना विभाग से झटक चुका है। हिन्दी समाचार-पत्र ‘खुशबू-ए-हिन्द’ की खुशबू से भले ही कोई परिचित न हो लेकिन सूचना विभाग के रजिस्टर में दर्ज इसकी प्रसार संख्या बताती है कि यह अखबार घर-घर में नजर आता होगा।

चौंकाने वाला पहलू यह है कि सूचना विभाग की निरीक्षा शाखा के अलावा विभाग का कोई अन्य अधिकारी अथवा कर्मचारी ऐसे अखबार का नाम तक नहीं जानता। इसके बावजूद सूचना विभाग की कम्प्यूटर शाखा में इसकी प्रसार संख्या 55 हजार 500 दर्ज है। इसी प्रसार संख्या के आधार पर इस अखबार ने विज्ञापन की शक्ल में सरकारी खजाने से लगभग 25 लाख के विज्ञापन महज 18 माह के दौरान ही झटक लिए। सूचना विभाग के कर्मचारी भी अब यह कहने लगे हैं कि यदि विभाग की नाकामी और आला अधिकारियों के दबाव के चलते इसी तरह से सरकारी खजाने को लुटाया जाता रहा तो वह दिन अब दूर नहीं जब पत्रकारिता की दुकाने चौक-चौराहों पर भी नजर आने लगेंगी।

हिन्दी दैनिक समाचार-पत्र ‘चेतना विचारधारा’ अपने कथित फर्जी सर्कुलेशन 69 हजार 185 के आधार पर 4 लाख 77 हजार से भी ज्यादा के विज्ञापन सूचना विभाग से झटक चुका है। जहां तक इस अखबार की वास्तविक प्रसार संख्या की बात है तो इस अखबार की प्रतियां दर्शायी गयी प्रतियों से काफी कम हैं। उर्दू दैनिक समाचार-पत्र जदीद, आवाज-ए-मरकज और जदीद हुजूम की प्रसार सूचना विभाग की कम्प्यूटर शाखा में क्रमशः 58150 और 25450 दर्ज है जबकि यह अखबार न तो स्टॉलों पर नजर आता है और न ही किसी के घरों में। यहां तक कि जिस स्थान से यह अखबार अपने प्रकाशन का दावा करता है वहीं के स्थानीय निवासी इस अखबार के बारे में नहीं जानते। इन परिस्थितियों में इस अखबार की प्रसार संख्या को सूचना विभाग कैसे स्वीकार कर रहा है ? यह जांच का विषय हो सकता है। अपने इसी कथित फर्जी प्रसार संख्या के आधार पर दोनों अखबारों ने क्रमशः 5 लाख 71 हजार 770 रूपए और 11 लाख 34 हजार 570 रूपए महज डेढ़ वर्षों के दौरान विज्ञापन के रूप हासिल कर लिए। 

उर्दू समाचार-पत्र ‘जायजा डेली’ का नाम भले ही किसी ने न सुना हो लेकिन इस अखबार की प्रसार संख्या सूचना विभाग के कम्प्यूटर में 65 हजार से भी ज्यादा है। इसी आधार पर इस अखबार ने सरकारी खजाने से विज्ञापन की शक्ल में 24 लाख से भी ज्यादा के विज्ञापन झटक लिए। हिन्दी दैनिक समाचार-पत्र ‘तरूण मित्र’ की प्रतियां भले ही कहीं नजर न आती हों लेकिन इसकी प्रसार संख्या 70 हजार 308 दर्शायी जा रही है। इसी आधार पर इस अखबार ने 15 लाख से भी ज्यादा के विज्ञापन लेकर सरकारी खजाने को लूटने मे कोई कसर नहीं छोड़ी है। हिन्दी दैनिक समाचार-पत्र ‘देश की आन’ अपनी प्रसार संख्या 66 हजार 175 बता रहा है जबकि इस अखबार की प्रतियां शायद ही किसी ने देखी होंगी। इसी आधार पर यह अखबार न सिर्फ सूचना विभाग की सूची में दर्ज है बल्कि अपनी कथित फर्जी प्रसार संख्या के आधार पर इस अखबार ने 18 महीनों के अंतराल में लगभग 5 पांच लाख के विज्ञापन हासिल कर न सिर्फ सरकारी खजाने को नुकसान पहुंचाया है बल्कि फर्जी हलफनामा लगाकर धोखाधड़ी भी की है। 

हिन्दी दैनिक समाचार-पत्र ‘निष्पक्ष समाचार ज्योति’ महज फाईल कॉपी तक ही सीमित है इसके बावजूद इस अखबार ने अपनी प्रसार संख्या 73 हजार 760 दर्शा रखी है। इसी आधार पर इस अखबार को 22 लाख से भी ज्यादा के विज्ञापन महज डेढ़ वर्ष के दौरान यूपी सरकार की ओर से मिले हैं। उर्दू समाचार-पत्र ‘माता-ए-अखिरत और ‘मदर’ नाम का समाचार-पत्र अपनी प्रसार संख्या क्रमशः 65 हजार 722 और 73 हजार 688 दर्शा रहा है। यह अखबार कहां से प्रकाशित होता है ? इसकी जानकारी तक स्थानीय निवासियों को नहीं है इसके बावजूद इस अखबार ने अपनी प्रसार संख्या कुछ प्रतिष्ठित अखबारों से भी ज्यादा दर्शा रखी है। इसी आधार पर इस अखबार ने महज 18 माह में 17 लाख 21 हजार 663 और 5 लाख 88 हजार 827 के विज्ञापन हासिल कर लिए हैं। उर्दू अखबार ‘महाज-ए-जंग’ ने अपनी प्रसार संख्या 45 हजार के आधार पर 12 लाख से भी ज्यादा के विज्ञापन हासिल किए हैं। 

हिन्दी दैनिक समाचार-पत्र ‘राष्ट्रीय स्वरूप’ भी सूचना विभाग की सूची में शामिल है। यह अखबार अब भले ही कहीं-कहीं नजर आता हो लेकिन इसकी प्रसार संख्या सूचना विभाग की कम्प्यूटर शाखा में 61 हजार से भी ज्यादा दर्ज है। इसी आधार पर इस अखबार ने महज डेढ़ वर्ष के दौरान 19 लाख से भी ज्यादा के विज्ञापन हासिल कर सूबे के सरकारी खजाने का लूटने में अहम भूमिका निभायी है। आलमबाग सुजानपुरा से अपना प्रकाशन स्थल दर्शाने वाले समाचार-पत्र ‘लोहिया क्रांति’ ने विज्ञापन दर अधिक हासिल करने की गरज से अपनी प्रसार सूचना विभाग की संख्या कम्प्यूटर शाखा में 64 हजार से भी ज्यादा दर्शा रखी है। इसी आधार पर इस अखबार ने यूपी सरकार के खजाने से 29 लाख से भी ज्यादा के विज्ञापन हासिल कर लिए हैं। सूचना विभाग में यह अखबार अपना प्रकाशन स्थल लखनऊ के साथ-साथ उन्नाव, आजमगढ़, सुल्तानपुर और रायबरेली में भी दर्शाता है जबकि उपरोक्त स्थानों में कहीं भी इस अखबार की प्रसार संख्या अपने निर्धारित संख्या के आधार पर नजर नहीं आती। यह अखबार उर्दू में भी अपना संस्करण निकालने का दावा करता है। 

हिन्दी समाचार-पत्र ‘सत्य समाचार बुलेटिन’ की प्रसार संख्या 52 हजार से भी ज्यादा अंकित है। इसी आधार पर इस अखबार के नाम से 19 लाख से भी ज्यादा के विज्ञापन महज डेढ़ वर्ष के अंतराल में जारी हो चुके हैं। हिन्दी दैनिक समाचार-पत्र ‘समाज सूचना’ का हाल भी कमोबेश कुछ ऐसा ही है। सूचना विभाग के कम्प्यूटर में इस अखबार की प्रसार संख्या 55 हजार से भी ज्यादा है। इसी आधार पर सूचना विभाग का रिकार्ड यह बता रहा है कि इस अखबार को पिछले डेढ़ वर्षों के दौरान 9 लाख से भी ज्यादा के विज्ञापन जारी किए जा चुके हैं। ‘सरदार टाइम्स’ नामक समाचार-पत्र उर्दू और मराठी भाषा में अपने चार संस्करण निकालने का दावा करता है। यह समाचार-पत्र लखनउ के साथ-साथ आजमगढ़ और महाराष्ट्र से भी अपने प्रकाशन का दावा करता है। इस अखबार का नाम भले ही लखनउ की जनता ने न सुना हो लेकिन इसकी प्रसार संख्या सूचना विभाग में 68 हजार से भी ज्यादा है। इसी आधार पर इस अखबार को विगत 18 माह के दौरान 4 लाख से भी ज्यादा के विज्ञापन दिए जा चुके हैं। 

‘सांध्य हलचल’ समाचार-पत्र भले ही कभी-कभार छपता हो लेकिन सूचना विभाग में इसकी प्रसार संख्या 56 हजार से भी ज्यादा दर्ज है। इसी आधार पर सूचना विभाग ने इस समाचार पत्र को डेढ़ वर्षों के दौरान 20 लाख से भी ज्यादा के विज्ञापन जारी किए हैं। ‘हुसैनी टाइम्स’ ने सूचना विभाग की सूची में अपने अखबार को उर्दू में दर्ज करवा रखा है जबकि यह अखबार लखनऊ से हिन्दी में भी प्रकाशन का दावा करता है। यह अखबार लखनऊ के साथ-साथ शाहजहांपुर से भी अपना प्रकाशन स्थल दर्शा रहा है। सूचना विभाग में इस अखबार ने अपनी प्रसार संख्या 50934 दर्शा रखी है। इसी आधार पर इस अखबार ने महज 18 माह के दौरान पौने दो लाख के विज्ञापन हासिल किए हैं।

उपरोक्त अखबार तो महज बानगी भर हैं जबकि सूचना विभाग से प्राप्त पुख्ता जानकारी के आधार पर 1 हजार 03 अखबार सूचना एवं जनसम्पर्क निदेशालय, लखनऊ, उत्तर-प्रदेश में सूचीबद्ध हैं। इन अखबारों में से अधिकतर अखबारों ने फर्जी दस्तावेजों के सहारे महज डेढ़ वर्षों के अंतराल में 125 करोड़ से भी ज्यादा के विज्ञापन हासिल कर सूबे के सरकारी खजाने को नुकसान पहुंचाया है। जानकार सूत्रों की मानें तो कई अखबार तो ऐसे हैं जो काफी समय पहले ही बंद हो चुके हैं इसके बावजूद उन्हें विज्ञापन दिया जा रहा है। प्रश्न यह उठता है कि यदि बंद हो चुके अखबारों को विज्ञापन जारी किया जा रहा है तो उसका पैसा किसके खाते में जा रहा है ? विभाग के ही एक अधिकारी का दावा है कि बंद हो चुके अखबारों की जानकारी विभाग के जिम्मेदार कर्मचारियों को भी है। इसके बावजूद ऐसे अखबारों को कमीशन की खातिर विज्ञापन लगातार जारी किए जा रहे हैं।

फिलहाल हाल ही में हाई कोर्ट ने ऐसे अखबारों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की नीयत से एक याचिका पर सुनवाई करते हुए जिम्मेदार विभागों से समस्त जानकारी मांगी है। कहा जा रहा है कि यदि हाई कोर्ट ने इस मामले को गंभीरता से लिया तो निश्चित तौर पर फर्जी हलफनामों के सहारे विज्ञापन की शक्ल में सूबे के सरकारी खजाने को लूटने वाले तो गिरफ्त में आयेंगे ही साथ ही जिम्मेदार अधिकारियों को भी जेल जाने से नहीं रोका जा सकता। यहां तक कि 80 प्रतिशत से ज्यादा उन अखबार मालिकों को अपनी दुकानेें बंद कर दूसरा धंधा करना पड़ सकता है जिन्होंने लोकतंत्र के कथित चतुर्थ स्तम्भ को अवैध कमाई का साधन बना रखा है।

विभागाध्यक्ष भी हैं जिम्मेदार!

इस पूरे फर्जीवाडे़ के लिए प्रमुख सचिव सूचना को भी उनकी जिम्मेदारी से अलग नहीं किया जा सकता। विभागाध्यक्ष होने के नाते प्रमुख सचिव की नैतिक जिम्मेदारी बनती है कि वह अपने विभाग की गलती से सरकारी खजाने को लुटने से बचाए। फिर क्यों प्रमुख सचिव ने इस मामले में चुप्पी साध रखी है? यह जांच का विषय हो सकता है। विभागीय अधिकारियों की मानें तो इस मामले की यदि सीबीआई जांच करवा ली जाए तो यूपी सरकार के खजाने से अरबों की लूट के मामले का पर्दाफाश हो सकता है। गौरतलब है कि अभी हाल ही में हाई कोर्ट ने भी फर्जी प्रसार संख्या के आधार पर सरकारी खजाना लूटने वालों के बाबत सम्बन्धित विभाग से जानकारी मांगी है लेकिन विभाग अभी तक पूरी जानकारी न्यायपालिका को उपलब्ध नहीं करा सका है। आखिर क्यों सरकारी खजाने को लूटने वाले अखबार कर्मियों को बचाया जा रहा है ? इसका जवाब सम्बन्धित विभाग के किसी भी अधिकारी के पास नहीं है।   

सरकार की चमचागिरी बनी संजीवनी!

प्रदेश सरकार की चमचागिरी करने वाले अखबार वाले फर्जी प्रसार संख्या के सहारे राजकीय कोष को लूटने वाले अखबार कर्मियों ने सरकार के कोप से बचने का अनोखा रास्ता भी ढूंढ निकाला है। सूबे में जिस किसी की सरकार हो, ये अखबार कर्मी कभी-कभार प्रकाशित होने वाले अपने अखबार में निःशुल्क सरकार की स्तुति वाला विज्ञापन छापकर सम्बन्धित विभाग के अधिकारियों के सहारे मुख्यमंत्री और पार्टी कार्यालय तक पहुंचाने में कोताही नहीं करते। चुनाव के दौरान इस तरह के विज्ञापन ऐसे अखबारों में आसानी से देखने में मिल जाते हैं। इसी आधार पर वे भविष्य में सरकार से विज्ञापन के लिए गुहार भी लगाते रहते हैं। अभी हाल ही में एक संगठन के अगुवाकार को सोशल साइट पर सपा प्रमुख के समक्ष अखबार दिखाकर मदद की गुहार लगाते हुए देखा गया। जिस पर कुछ पत्रकारों ने चुटकी लेेते हुए कहा है कि इन्हीं अखबार कर्मियों की बदौलत पूरा मीडिया जगत बदनाम है। राजनैतिक दल के लोग अब मीडिया को महज बिकाउ समझने लगे हैं। यही वजह है कि अब गंभीर से गंभीर खबरों पर कोई खास ध्यान नहीं दिया जाता। इन पत्रकारों का कहना है कि ऐसे अखबार मालिकों का बहिष्कार तो होना ही चाहिए साथ ही ऐसे संगठनों का भी विरोध होना चाहिए जो महज स्वयंहित के लिए संगठन बनाते हों।

चिराग तले अंधेरा!

युवा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने यूपी की सत्ता संभालते वक्त दावा किया था कि उनका प्रदेश भ्रष्टाचार मुक्त प्रदेश होगा। शुरूआती दौर में जिस तरह से प्रयास किए गए थे उससे यह लगने लगा था कि कम से कम राजधानी लखनऊ के सरकारी विभागों में व्याप्त भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाया जा सकता है लेकिन विभागों में व्याप्त भ्रष्टाचार ‘रक्तबीज’ की भांति बढ़ता ही गया है। यहां तक कि वह विभाग भी भ्रष्टाचार से अछूता नहीं रह सका है जो स्वयं मुख्यमंत्री के पोर्टफोलियो में है। यहां बात हो रही है सरकार के अति विशिष्ट विभाग सूचना एवं जनसम्पर्क निदेशालय की। गौरतलब है कि यह विभाग सरकार की योजनाओं से लेकर उसके विकास कार्यों के प्रचार-प्रसार का जिम्मा संभालता है। इस विभाग में हजारों की संख्या में तथाकथित फर्जी प्रसार संख्या वाले अखबारों की भरमार है। फर्जी प्रसार संख्या के आधार पर ही अखबारों ने यूपी के सरकारी खजाने से महज डेढ़ वर्ष के दौरान 75 करोड़ 25 लाख से भी ज्यादा के विज्ञापन हासिल कर लिए। कहा तो यही जा रहा है कि विभाग की मिली-भगत के बगैर यह संभव नहीं है। इतनी बड़ी लूट की जानकारी विभाग के आला अधिकारियों से लेकर विभागाध्यक्ष को भी है। इसके बावजूद किसी अधिकारी/कर्मचारी अथवा फर्जी प्रसार संख्या वाले अखबारों के खिलाफ कार्रवाई न करना इस बात की पुष्टि करता है कि सरकारी खजाने पर तथाकथित डाका डालने वालों के साथ विभाग के कर्मचारी और अधिकारी भी शामिल हैं।

यह आर्टकिल लखनऊ से प्रकाशित दृष्टांत मैग्जीन से साभार लेकर भड़ास पर प्रकाशित किया गया है. इसके लेखक तेजतर्रार पत्रकार अनूप गुप्ता हैं जो मीडिया और इससे जुड़े मसलों पर बेबाक लेखन करते रहते हैं. वे लखनऊ में रहकर पिछले काफी समय से पत्रकारिता के भीतर मौजूद भ्रष्‍टाचार की पोल खोलते आ रहे हैं.

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यूपी की पत्रकारिता का सफेद-स्‍याह 

 

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मिशन से दलाली के धंधे में बदला अखबारों का प्रकाशन!

: पत्रकार संगठन भी दोषी : अखबारों के फर्जीवाड़े के लिए पत्रकार संगठन भी दोषी हैं। नाम और दाम कमाने के फेर दुकानदारों से लेकर ठेकेदार तक इन्हीं पत्रकार संगठनों के सहारे अखबारों का संचालन कर रहे हैं। इनके प्रकाशक खुलेआम नियम-कानूनों का उल्लंघन कर विज्ञापन के सहारे भारी मुनाफा कमा रहे हैं। यही नहीं ऐसी संस्थाएं नौसिखिए कथित पत्रकारों और नए प्रकाशकों के लिए संजीवनी भी बनी हुई हैं। ये संस्थाएं अखबार, मैगजीन का रजिस्टे्शन से लेकर डीएवीपी और यूपीआईडी भी करवाने का ठेका लेती हैं। आश्चर्य इस बात का है कि सही सर्कुलेशन दिखाने वालों को महीनों सूचना विभाग के चक्कर लगाने पड़ते हैं जबकि इन संस्थाओं के कथित दलाल आसानी से सारे काम करवा देते हैं। 

एक वरिष्ठ पत्रकार का दावा है कि यदि डीएवीपी और राज्य सूचना विभाग ईमानदारी से इन अखबारों के सर्कुलेशन की जांच करवा ले तो निश्चित तौर पर 80 प्रतिशत से भी ज्यादा अखबारों का अस्तित्व समाप्त हो जायेगा। इससे न सिर्फ सरकार खजाने पर पड़ने वाला बोझ हल्का होगा बल्कि पत्रकारिता में वही लोग प्रवेश कर सकेंगे जो ईमानदारी से मीडिया के मिशन के लिए काम करेंगे। एनेक्सी मीडिया सेंटर से भीड़ भी कम होगी साथ ही अधिकारियों के कमरों में चक्कर लगाने वाले पत्रकारों की संख्या भी घट जायेगी। इन परिस्थितियों में अधिकारियों के कमरों में वही पत्रकार नजर आयेंगे तो समाचारों से सम्बन्धित जानकारी चाहते होंगे।

विज्ञापनों का राजनीतिकरण!

मौजूदा समय में अखबारों और उनके मालिकानों ने जिस तरह से अखबार को एक व्यापार बना रखा है उसे देखकर तो यही कहा जा सकता है कि प्रदेश की सरकारों ने अखबारों और उसमें प्रकाशित होने वाले सरकारी विज्ञापनों का भी राजनीतिकरण कर दिया। विज्ञापन की लालसा में ऐसे लोगों ने भी अखबारों का प्रकाशन शुरू कर दिया है जिनका पत्रकारिता से न तो पूर्व में कोई सम्बन्ध रहा है और न ही वर्तमान में। सर्कुलेशन के खेल से कमाई करने वालों की फेहरिस्त में सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग के कई कर्मचारी भी शामिल हैं। जिनका समाचारों से दूर-दूर का रिश्ता नहीं रहा है वे अखबारों की चंद प्रतियां छपवाकर हजारों-लाखों का सर्कुलेशन कागजों पर दिखा रहे हैं। सर्कुलेशन के इसी खेल से डीएवीपी और यूपीआईडी में विज्ञापन दरें भी निर्धारित करवायी जा रही हैं। 

फर्जी सर्कुलेशन के इस खेल में सिर्फ स्थानीय छोटे अखबार ही शामिल नहीं हैं बल्कि वे अखबार भी शामिल हैं जो बडे़ अखबारों की श्रेणी गिने जाते हैं। प्राप्त जानकारी के मुताबिक लगभग 80 प्रतिशत से अधिक फर्जी अखबार सरकारी सूची में शामिल हैं। प्रदेश की जनता ने उनके नाम भी नहीं सुने होंगे लेकिन उनकी प्रसार संख्या लखनऊ जैसे बडे़ शहर की जनसंख्या से भी ज्यादा है। गौरतलब है कि प्रसार संख्या के आधार पर ही विज्ञापन दरें तय की जाती हैं लिहाजा उनको लाखों रूपए के विज्ञापन हर साल बिना मेहनत और लागत के ही मिल जाते हैं। न तो प्रदेश सरकारें ऐसे तथाकथित समाचार-पत्रों के खिलाफ कार्रवाई करती हैं और न ही केन्द्र सरकार के अधीन सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय। परिणामस्वरूप अखबार मालिक, सूचना और जनसम्पर्क निदेशालय सहित केन्द्र सरकार में बैठे डीएवीपी कर्मचारी भी मोटी कमाई कर रहे हैं। इनके पत्रकारों को अन्य सुविधाएं अलग से मिल रही हैं। ज्यादातर ऐसे अखबारों के पत्रकार सरकारी मेहमान एवं रौब मारने वाले जनप्रतिनिधि की तरह व्यवहार करते हैं।

कागजी खानापूर्ति

कागजी खानापूर्ति करने वाले केवल प्रसार संख्या में बढ़ोतरी दिखलाने की कोशिश में ही साल भर लगे रहते हैं। फर्जी सर्कुलेशन दिखाने वाले कथित अखबार माफियाओं को संजीवनी देने वालों में वे प्रिंटिंग प्रेस वाले भी शामिल हैं जो अखबार कर्मियों को फर्जी सर्कुलेशन का प्रमाण-पत्र भी उपलब्ध कराते हैं। यह दीगर बात है कि जिस  प्रिंटिग प्रेस में अखबार छपता है उसमें छापने की क्षमता हो अथवा न हो तब भी प्रिंटिंग प्रेस का मालिक फर्जी रूप में हजारों, लाखों  प्रतियां छापने का बिल आसानी से दे देता है। प्रमाण के तौर पर उसका बिजली का बिल भी गवाह होता है कि उसने दिन भर में सिर्फ तीन चार सौ प्रतियां छापी हैं। यदि सम्बन्धित विभाग उन प्रिंटिंग प्रेस वालों की तकनीकी जांच करे जिसमें फर्जी अखबार छपते हैं तो असलियत खुद-ब-खुद सामने आ जायेगी। 

जिन प्रिंटिंग प्रेस की क्षमता दिन भर में हजार कापियां छापने की नहीं होती है वे लाखों प्रतियां छापने का बिल कैसे दे देते हैं ? यह रहस्य तब तक बना रहेगा जब तक ऐसे प्रेस वालों के खिलाफ राज्य सरकार और सम्बन्धित विभाग सख्त कार्रवाई नहीं करता। प्राप्त जानकारी के अनुसार प्रतिदिन बिजली यूनिट की खपत के आधार पर जांच करवाई जाए तो सच्चाई सामने आ सकती है। उस प्रेस में कितनी बिजली खपत हुई और प्रतिदिन तीस चालीस हजार प्रतियां छपे तब कितनी बिजली खपत होती है ? इसका आंकड़ा निकाला जाए तो ऐसे प्रेस मालिकों पर भी लगाम लगायी जा सकती है। गौरतलब है कि पूर्ववर्ती मुलायम सरकार के कार्यकाल में छोटे अखबार वालों को प्रिंटिंग मशीने लगाने के लिए लाखों रूपए की सहायता दी गयी थी। 

हास्यासपद यह है कि अब ज्यादातर यही अखबार मालिक दूसरे अखबारों के लिए प्रिंटिंग करके फर्जी सर्कुलेशन का बिल भी थमा कर विज्ञापन के रूप में सरकारी खजाने को लूटने में सहभागिता दिखा रहे हैं। गौरतलब है कि फर्जी सर्कुलेशन का फर्जी बिल थमाने वाले प्रिंटिंग प्रेस में सिर्फ एक ही अखबार नहीं छपता है बल्कि सैकड़ों अन्य अखबार भी छपते हैं। इन परिस्थितियों में आधुनिक सीट ऑफसेट मशीने भी इतनी प्रतियां प्रतिदिन प्रकाशित नहीं कर सकतीं। जब उस प्रेस में एक अखबार ठीक तरह से छापने की क्षमता नहीं है फिर वह अन्य अखबार कैसे छाप लेता है ? यदि इसकी जांच करायी जाए तो यह अपने आप में सबसे बड़ा खुलासा हो सकता है। अखबारों के सर्कुलेशन की जांच का दूसरा तरीका है उसकी ढुलाई में आने वाली लागत और वाहन। अखबार की प्रतियां की ढ़ुलाई किस वाहन से हुई और उनका वितरण कहां-कहां हुआ? इसकी जांच आसानी से की जा सकती है।

सीए की संदिग्ध भूमिका!

फर्जी सर्कुलेशन के खेल में हर कागज फर्जी और चार्टेड एकाउन्टेन्ट का सर्टिफिकेट भी फर्जी रहता है। यह काम केवल विज्ञापन की दरें अधिक लेने और हर साल उसमें बढ़ोतरी कराने के लिए ही किया जाता है। गौरतलब है कि फर्जी हलफनामा देना भी धोखाधड़ी की श्रेणी में आता है। इस तरह का कृत्य करने वालों के खिलाफ आईपीसी की धारा-420 में सजा के कड़े प्राविधान निहित हैं। आश्चर्य यह है कि बुद्धिजीवी वर्ग से जुड़े इस पेशे के पत्रकार कानून की बाध्यता से भी भलीभांति परिचित हैं इसके बावजूद कानून से बेखौफ फर्जीवाड़े को अंजाम दिया जा रहा है। उप्र सूचना एवं जनसम्पर्क निदेशालय के अधिकारी भी यह बात अच्छी तरह से जानते हैं कि चार-छह पन्ने के अखबार वाले सिर्फ फाईलों के लिए ही 15 से 20 कॉपी छपवाकर कार्यालय में जमा करते हैं इसके बावजूद सूचना विभाग के किसी भी अधिकारी ने आज तक किसी ऐसे अखबार कर्मी के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने की हिम्मत नहीं दिखायी जो खुलेआम शासन-प्रशासन की आंखों में धूल झोंककर सरकारी खजाने को लूटने में जुटा है।

विज्ञापन नीति तो बनी लेकिन स्क्रीनिंग नहीं होती

विज्ञापन नीति 2007 के अनुसार डीएवीपी दो हजार से कम प्रसार संख्या वाले अखबारों को विज्ञापन लायक नहीं समझता, यही वजह है कि गली-मोहल्लों में कुकुरमुत्ते की तरह उग आए अखबार मालिक कागजों पर सर्कुलेशन बढ़ाने के लिए फर्जी प्रमाण-पत्रों से लेकर सम्बन्धित विभाग के अधिकारियों और कर्मचारियों को सुविधा शुल्क देते रहते हैं। अर्थगणित पर नजर दौड़ायें तो पता चल जायेगा कि प्रदेश भर में शायद पांच सौ अखबार छापने की हैसियत इन छोटे अखबारों की नहीं है। पत्रकार संगठनों को चला रहे प्रकाशक भी इतना अखबार नहीं निकाल पा रहे हैं। विज्ञापन नीति के तहत समाचार पत्र का न्यूनतम आकार चार पृष्ठ फुल साइज होने चाहिए। कम संख्या में अखबार छपने से उसकी लागत में बढ़ोत्तरी भी हो जाती है। 

ज्यादातर फर्जी सर्कुलेशन दर्शाने वाले अखबार वेब ऑफसेट पर नहीं बल्कि सीट आफसेट पर अपना अखबार छपवाते हैं। एक अनुमान के मुताबिक इसकी कीमत 1 से पांच रुपये के बीच बैठती है। यदि एक प्रकाशक डी.ए.वी.पी. के नियमानुसार चार पेज का दैनिक अखबार 2000 प्रतियों में प्रकाशित करता है तो 30 दिन में उसका औसत खर्चा 50 से 60 हजार रुपये के बीच आयेगा। इसके बाद आता है प्लेट बनवाई का खर्चा। यदि चार पेज का फुल साईज अखबार छपता है तो उसके लिए कम से कम 2 प्लेट बनानी पड़ती हैं। बाजार में जो दर चल रहा है उसके अनुसार 100 से 125 प्रति प्लेट मेकिंग एवं 100 से 125 प्रिंटिग पर प्लेट का खर्चा आता है। प्रिंटिग का खर्चा न्यूनतम 6000 रुपये महीना तक आता है। यानी 2000 प्रसार संख्या बाले अखबार का सालाना खर्चा 70 से 80 हजार के बीच बैठता है। चूंकि ऐसे फर्जी अखबार वाले स्टाफ में किसी रिपोर्टर इत्यादि को शामिल नहीं करते है लिहाजा स्टाफ के खर्चे का प्रश्न ही नहीं उठता। 

गौरतलब है कि ऐसे अखबार ठेके पर छपने के लिए दिए जाते हैं। ठेके पर अखबार छापने वाले वेबसाईट से खबर डाउनलोड कर एक फाईल में इकट्ठा कर लेते हैं। फिर उन्हीं खबरों में हेडलाईन का हेर-फेर कर सभी अखबारों में लगा दिया जाता है। यहां तक कि सम्पादकीय तक कॉपी करके लगायी जाती है। इस सबके बावजूद कुल मिलाकर चार पेज के एक दैनिक अखबार का साल भर के प्रकाशन का खर्च तकबरीन एक लाख रुपये के बीच आता है।

संतुष्टि इस बात की है कि फर्जी सर्कुलेशन के आधार पर इस लागत का कई गुना वे विज्ञापन के जरिए कमा लेते हैं। यह कमाई सुविधा शुल्क देने के बाद की है। सरकारी मशीनरी भी यह बात अच्छी तरह से जानती है लिहाजा इन परिस्थितियों में यदि सरकारी मशीनरी को भी अखबार कर्मियों की अवैध कमाई में बराबर का दोषी माना जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होनी चाहिए। महत्वपूर्ण पहलू यह है कि डीएवीपी में लगभग डेढ़ वर्ष के अंतराल में जो अखबार पहुंचते भी हैं उनके पास प्राइवेट विज्ञापन न के बराबर होता है। इस लिहाज से भी उनके फर्जी सर्कुलेशन वाले हलफनामे के खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है।

यह आर्टकिल लखनऊ से प्रकाशित दृष्टांत मैग्जीन से साभार लेकर भड़ास पर प्रकाशित किया गया है. इसके लेखक तेजतर्रार पत्रकार अनूप गुप्ता हैं जो मीडिया और इससे जुड़े मसलों पर बेबाक लेखन करते रहते हैं. वे लखनऊ में रहकर पिछले काफी समय से पत्रकारिता के भीतर मौजूद भ्रष्‍टाचार की पोल खोलते आ रहे हैं.

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दृष्‍टांत ने खोली फर्जी सर्कुलेशन से सरकारी खजाना लूटने वालों की पोल

लखनऊ की आबादी से भी कई गुना अखबारों की प्रसार संख्या है। जबकि इस आबादी के आधार पर पांच सदस्यों वाले परिवार से डिवाइड कर परिवारों की संख्या की बात की जाए तो लखनऊ में 25 लाख से ज्यादा परिवार नहीं हो सकते। यह भी सत्य है कि औसतन एक घर में एक ही अखबार पढ़ा जाता है। कुछ घरों में चार से पांच-पांच अखबार भी आते हैं तो दूसरी ओर गरीब परिवार के लोग चाय की दुकानों पर जाकर ही समाचार-पत्र पढ़ लेते हैं। एक जानकारी के अनुसार 10 प्रतिशत लोग दूसरों से मांगकर अखबार पढ़ते हैं। यदि इस तरह से देखा जाए तो लखनऊ के लिए 8 से 10 लाख का सर्कुलेशन भी काफी ज्यादा होगा। 

जानकार आश्चर्य होगा कि सिर्फ राजधानी लखनऊ में ही इस आंकड़ें से कई गुना अखबारों की प्रसार संख्या दर्शायी जा रही है। सूचना एवं जनसम्पर्क निदेशालय के अधिकारी भी इस बात से पूरी तरह से सहमत हैं इसके बावजूद विभागीय अधिकारियों की खामोशी साफ बताती है कि ‘दाल में काला’ नहीं बल्कि पूरी दाल ही काली है। निरीक्षा शाखा के एक कर्मचारी की मानें तो इस बात की जानकारी विभागीय स्तर से शासन के उच्च पदस्थ अधिकारियों तक भी पहुंचायी जा चुकी है। गौरतलब है कि सूचना विभाग मुख्यमंत्री के अधिकार क्षेत्र में है। इस लिहाज से कम से कम इस विभाग में तो पारदर्शिता होनी ही चाहिए थी।

‘हर्र लगे न फिटकरी, रंग चोखा’ की तर्ज पर अखबार का प्रकाशन भी अब मिशन के बजाए चोखा धंधा बन चुका है। डीएवीपी, सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग के कुछ अधिकारियों/कर्मचारियों, प्रिंटिंग प्रेस और अखबार मालिकों की मिलीभगत से राजधानी लखनउ में ही हजारों की संख्या में ऐसे समाचार-पत्र/पत्रिकाएं कुकुरमुत्ते की भांति उग आयी हैं जिनका वास्तविकता में पत्रकारिता से कोई सम्बन्ध नहीं रहा है। ऐसे समाचार-पत्र/पत्रिकाएं सम्बन्धित विभागों के कुछ लालची किस्म के अधिकारियों/कर्मचारियों की मदद से राजकीय कोष को जमकर लूट रहे हैं। 20-25 से 100-200 प्रतिदिन प्रतियां प्रकाशित करने वाले अखबार मालिकों ने शपथ-पत्रों में फर्जी तरीके से हजारों-लाखों की प्रसार संख्या दर्शा रखी है ताकि अधिकाधिक प्रसार संख्या के आधार पर उन्हें विज्ञापन के अच्छे दाम और पत्रकारों को दी जाने वाली अन्य सरकारी सुविधाओं का लाभ मिल सके। 

25 प्रतियां प्रकाशित करने वाले बने मान्‍यता प्राप्‍त पत्रकार 

20-25 प्रतियां प्रकाशित करने वाले मुख्यालय से मान्यता प्राप्त पत्रकार तक बन चुके हैं। जिन्हें एक कॉलम समाचार लिखने का तरीका नहीं आता वे वरिष्ठ पत्रकारों की सूची में नामजद हैं। ऐसे तथाकथित पत्रकार न सिर्फ हजारों लाखों की प्रसार संख्या दर्शाकर प्रतिवर्ष लाखों का विज्ञापन जुटा रहे हैं बल्कि नौकरशाही और सियासी गलियारों में श्रेष्ठ पत्रकारों की श्रेणी में गिने जाते हैं। ऐसे पत्रकारों के अखबारों की कितनी प्रतियां प्रतिदिन प्रकाशित होती हैं ? इसकी जानकारी नौकरशाही को भी है लेकिन पत्रकारों के बीच श्रेष्ठ समझे जाने वाले ऐसे पत्रकारों को कभी-कभी नौकरशाही भी सलाम बजाती नजर आती है। कई कार्यक्रमों में नौकरशाही को ऐसे तथाकथित पत्रकारों के समक्ष नतमस्तक होते सोशल साईटों पर अक्सर देखा जाता है। 

महत्वपूर्ण यह है कि फर्जी सर्कुलेशन के सहारे अपनी दुकानें चलाने वाले कुछ तथाकथित पत्रकारों ने बकायदा संगठन बनाकर सरकार और विभागों पर दबाव बना रखा है। किसी एक फर्जी पत्रकार के खिलाफ कार्रवाई होते देख इनका संगठन अधिकारियों के घेराव के लिए हमेशा तत्पर रहता है। इन संगठनों ने बकायदा परिचय पत्र भी जारी कर रखे हैं। चौंकाने वाला पहलू यह है कि संगठनों के यह परिचय-पत्र सदस्य के रूप में पान की गुमटी लगाने वालों से लेकर सब्जी विक्रेता और अन्य दुकानदारों तक को दिए गए हैं।

फर्जी प्रसार संख्या दर्शाकर सरकारी खजाने पर डाका डालने वालों के खिलाफ जांच बेहद आसान है। यहां तक कि अनुभवी अधिकारी समाचार-पत्र की प्रिंटिंग  को देखकर ही उसकी प्रसार संख्या बता सकते हैं। सम्बन्धित विभाग के अधिकारी भी यही कहते हैं कि तकनीकी आधार पर सब कुछ स्पष्ट है इसके बावजूद वे नौकरशाही के निर्देश पर चुप्पी साधने के लिए विवश हैं। सैकड़ों की संख्या में ऐसे दैनिक अखबार निकलते हैं जो अपनी प्रसार संख्या तो पचास हजार से भी अधिक दिखाते हैं लेकिन प्रिंटिंग वे सीट ऑफसेट अथवा टे्डिल मशीन पर करवाते हैं। तकनीकी आधार पर सीट ऑफसेट और टे्डिल मशीनें प्रतिदिन लाखों की संख्या में अखबार नहीं छाप सकतीं जबकि उनके पास दूसरे अन्य जॉब वर्क भी होते हैं। 

तकनीकी आधार पर पूछे गए इस सवाल पर सूचना विभाग के अधिकारी भी सहमत हैं लेकिन तथाकथित दिग्गज पत्रकारों के विरोध में वे मुंह खोलने के लिए तैयार नहीं। इन अधिकारियों की मानें तो तकनीकी आधार पर ऐसे अखबारों की प्रसार संख्या को लेकर विभागीय अधिकारियों ने अपने उच्चाधिकारियों को भी सूचित कर रखा है। चौंकाने वाला पहलू यह है कि विभागीय स्तर से उच्चाधिकारियों तक यह जानकारी लगभग एक दशक पहले ही दी जा चुकी थी, लेकिन किसी भी सरकार के कार्यकाल में फर्जी प्रसार संख्या दर्शाने वाले अखबार मालिकों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गयी, अलबत्ता ऐसे पत्रकारों का कद जरूर बढ़ता गया। जिन्हें जिले से मान्यता प्राप्त थी वे  मुख्यालय से मान्यता पा गए तो दूसरी ओर सरकारी सुविधाओं में बढ़ोत्तरी भी ऐसे पत्रकारों को मिलती चली गयी जिनका पत्रकारिता से कोई सरोकार नहीं रहा है। कुछ अखबार और समाचार-पत्रिकाएं ऐसी हैं जिनका नाम तक लोग नहीं जानते और दस्तावेजों में उनकी प्रसार संख्या पचास हजार से लेकर लाखों तक हैं। 

कोर्ट ने मांगी फर्जी प्रसार दिखाने वालों की जानकारी 

अभी हाल ही में इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खण्डपीठ में दायर एक याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस इम्तियाज मुर्तजा और जस्टिस श्रीनारायण शुक्ल ने आश्चर्य व्यक्त करते हुए अखबारों के प्रसार संख्या पर उंगली उठायी है। इन जजों ने सम्बन्धित विभागों को भी निर्देश दिये हैं कि तत्काल ऐसे समाचार-पत्रों की जांच करवाकर सख्त कार्रवाई की जाए। सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग के कर्मचारी यूनियन की मानें तो समाचार-पत्र प्रकाशित करने के लिए आरएनआई को एक गाइडलाईन भी बनानी चाहिए। बुद्धिजीवी वर्ग से जुडे़ इस प्रोफेशन के लिए कम से कम स्नातक पास लोगों को ही समाचार-पत्र प्रकाशित करने की अनुमति मिलनी चाहिए। साथ ही ऐसे अखबार मालिकों की एक लिखित परीक्षा भी होनी चाहिए ताकि उनकी योग्यता पर भविष्य में कोई उंगली न उठा सके। जहां तक फर्जी सर्कुलेशन दर्शाने की बात है तो आरएनआई को ऐसे अखबार मालिकों के खिलाफ सख्त विभागीय और कानूनी कार्रवाई करनी चाहिए ताकि फर्जी अखबार मालिकों के बीच भय बना रहे और वे पत्रकारिता की गरिमा से खिलवाड़ न हो सके।  

सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के अधीन विज्ञापन एवं दृश्य प्रचार निदेशालय की विज्ञापन नीति-2007 में अखबार एवं समाचार-पत्र/पत्रिकाओं के प्रसार को लेकर सख्त हिदायतें दी गयी हैं। अनुच्छेद 18 में ‘निलंबन और वसूलियां’ कॉलम के खण्ड ‘‘क’’ में प्रसार सम्बन्धी झूठी सूचना देने पर डीएवीपी उक्त अखबार एवं पत्र/पत्रिकाओं को अपनी सूची से निलम्बित कर सकता है। इतना ही नहीं डीएवीपी की संस्तुति पर शीर्षक निलंबित करने की भी कार्रवाई की जा सकती है। आश्चर्य है कि तकनीकी आधार पर स्पष्ट प्रमाण के बावजूद डीएवीपी ने आज तक किसी भी अखबार के खिलाफ प्रसार संख्या को लेकर उंगली नहीं उठायी है। जाहिर है कि डीएवीपी में भी कुछ अधिकारी और कर्मचारी ऐसे बैठे हैं जो अखबारों का फर्जी सर्कुलेशन दर्शाने वालों से मोटी रकम ऐंठकर फर्जी दस्तावेजों पर अपनी संस्तुति जताते चले आ रहे हैं। 

फर्जी शपथ पत्र दाखिल कर होता है खेल 

गौरतलब है कि फर्जी शपथ-पत्र दाखिल करना भी धोखाधड़ी की श्रेणी में आता है। ऐसा कृत्य करने वालों के खिलाफ आईपीसी की धारा 420 के तहत कार्रवाई कर दोषी लोगों को सलाखों के पीछे और जुर्माने के तौर पर रकम वसूले जाने का भी प्राविधान है। प्राप्त जानकारी के अनुसार कुछ अखबार मालिक ऐसे भी हैं जिनके खिलाफ हत्या, हत्या के प्रयास, धोखाधड़ी सहित अनेक मामले पंजीकृत हैं इसके बावजूद एलआईयू ने उन्हें क्लीनचिट देकर अखबार के प्रकाशन की राह आसान कर रखी है। सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग के एक सेवा निवृत्त कर्मचारी का दावा है, ‘यदि सूचना विभाग के अधिकारियों को बिना दबाव के निष्पक्ष तरीके से जांच का अधिकार दे दिया जाए तो अस्सी प्रतिशत से भी ज्यादा फर्जी अखबारों का प्रकाशन तत्काल प्रभावित हो सकता है। इतना ही नहीं फर्जी शपथ-पत्र भरकर जमा करने वाले अखबार मालिक तो दण्डित होंगे ही साथ ही उनका शीर्षक भी विभाग की संस्तुति पर निरस्त किया जा सकता है।

हालांकि यूपीआईडी और डीएवीपी ने विज्ञापन दरें तय करने की गरज से अपनी विज्ञापन नीति में प्रसार संख्या को लेकर सख्त हिदायतें शामिल कर रखी हैं। इसकी जानकारी अखबार मालिकों को भी है लेकिन सुविधा शुल्क के सहारे अपना हित साधने वालों का तथाकथित गिरोह इतना प्रभावशाली है कि दोनों ही विभाग खुली आखों से भ्रष्टाचार को फलता-फूलता निहार रहे हैं। सम्बन्धित विभाग की विज्ञापन नीति में प्रसार संख्या को लेकर स्पष्ट कहा गया है कि जिनका प्रकाशन कम से कम 36 महीनों तक ‘‘कम से कम 2000 प्रतियां प्रतिदिन/सप्ताह/मासिक’’ बिना रूके नियमित रूप से हो रहा होगा उन्हें ही सुविधा का लाभ दिया जायेगा। दैनिक अखबारों की सूची में सैकड़ों की संख्या में ऐसे अखबार हैं जो महीने में दस-पन्द्रह दिन ही प्रकाशित होते हैं। जब डीएवीपी अथवा यूपीआईडी की सूची में नाम सम्मिलित करने का अवसर आता है तब ‘बैक डेट’ में अखबारों की मण्डी चलाने वाले तथाकथित अखबार के थोक व्यापारी उस कोरम को पूरा कर देते हैं। 

थोक के भाव में छापी जाती हैं बैक डेट में अखबार की फाइलें 

अखबारों की मंडी चलाने वाले एक ही समाचार को सैकड़ों फर्जी समाचार-पत्रों में हेडलाईन बदल-बदल कर लगाते रहते हैं। यहां तक कि सम्पादकीय भी किसी न किसी अखबार की कॉपी की गयी होती है। खामियां डीएवीपी की नियमावली में भी हैं। नियमावली में यह सुविधा दी गयी है कि समाचार-पत्र, पत्रिकाएं वर्ष में सिर्फ दो बार ही पैनल में शामिल होने के लिए आवेदन कर सकती हैं। पहली बार फरवरी के अंत में और दूसरी बार अगस्त के अंत में। फर्जी सर्कुलेशन दर्शाने वाले अखबार कर्मी इस कमजोरी का भरपूर फायदा उठाते हैं। उनके अखबार भले ही महीनों प्रकाशित न होते हों लेकिन जब डीएवीपी में फाईल जमा करनी होती है तब आनन-फानन में अखबार की मंडी के थोक व्यापारी पूरी फाईल तैयार कर देते हैं। 

डीएवीपी भी इस मामले में लापरवाह है। यदि वह ध्यान से प्रत्येक अखबार की स्क्रीनिंग करे तो अपने आप पूरा फर्जीवाड़ा सामने आ जायेगा। एक ही खबर को सैकड़ों समाचार पत्र में हू-बहू देखा जा सकता है। यूपी के सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग के एक कर्मचारी ने लगभग हंसते हुए बताया कि इस बात की जानकारी उनके माध्यम से विभागाध्यक्षों को भी दी जाती रही है। जब बात कार्रवाई करने पर आती है तो वे अधिकारी भी हंस कर टाल देते हैं। इन परिस्थितियों में यदि विभागाध्यक्षों को उनका पोषक माना जाए तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होनी चाहिए।

डीएवीपी की विज्ञापन नीति-2007 के अनुच्छेद-16 में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि आवेदन करने वाली पत्र-पत्रिकाओं को प्रसार संख्या के बारे में ए.बी.सी., लागत, लेखाकार/सांविधिक लेखा परीक्षक/चार्टर्ड एकाउंटेंट से प्रमाणित आंकडे़ मानदंड के अनुसार प्रस्तुत करने होंगे। 25 हजार प्रतियों तक प्रकाशित करने वालों को लेखाकार/चार्टर्ड एकाउंटेंट/सांविधिक लेखा परीक्षक का प्रमाण-पत्र और ए.बी.सी. का प्रमाण-पत्र जमा करना होता है। 25 हजार से लेकर 75 हजार तक प्रतियां प्रकाशित करने वाले अखबार मालिकों के निर्धारित प्रपत्र में सांविधिक लेखा परीक्षक का प्रमाण-पत्र और ए.बी.सी. का प्रमाण-पत्र जमा करना आवश्यक होता है। 75 हजार से अधिक प्रतियां प्रकाशित करने वालों के लिए ए.बी.सी. और आर.एन.आई के प्रमाण-पत्र की आवश्यकता होती है। 

फर्जी तरीके से प्रसार संख्या दर्शाने के लिए तय है फीस 

खास बात यह है कि इन नियमों की पूर्ति करने वाले गिने-चुने अखबार ही हैं जबकि सर्कुलेशन के आधार पर पैनल में हजारों की संख्या में अखबार पंजीकृत हैं। इन अखबारों के पास न तो ए.बी.सी. का प्रमाण-पत्र है और न ही अन्य सम्बन्धित दस्तावेज। जानकर हैरत होगी कि इस व्यवस्था के लिए भी ऐसे लोग हरदम तैयार रहते हैं। फर्जी तरीके से प्रसार संख्या दर्शाने के लिए बकायदा फीस तय है। वकील और सी.ए. निर्धारित फीस लेकर घर बैठे ही सारा काम कर देते हैं। अखबार मालिक का काम सिर्फ इतना रहता है कि वह दिल्ली जाकर डी.ए.वी.पी. में सम्बन्धित अधिकारी/कर्मचारी को चढ़ावा चढ़ाकर रिपोर्ट अपने पक्ष में लिखवा ले ताकि उसे वर्ष भर फर्जी तरीके से दर्शाए गए भारी-भरकम सर्कुलेशन के आधार पर विज्ञापन मिल सके। यदि कोई अखबार मालिक दिल्ली जाकर यह काम करने में अक्षम है तो इस काम के लिए भी राजधानी लखनऊ में मीडिया के बाजारों में थोक व्यापारी उपलब्ध हैं। 

वे आप से दिल्ली आने-जाने का किराया लेने के साथ ही डी.ए.वी.पी. में सुविधा शुल्क की रकम लेकर आपका काम पूरा कर देंगे। राजधानी लखनऊ में ऐसे दलालों को भरमार है। ये दलाल अपनी मंडी में तो चर्चित हैं ही साथ ही एनेक्सी के मीडिया सेंटर से लेकर विधानसभा के मीडिया सेंटर और जीपीओ स्थित मीडिया सेंटर में भी लगभग रोजाना अपना शिकार तलाशते नजर आ जायेंगे। सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग परिसर से लेकर जिला सूचना कार्यालय में भी ये दलाल नजर आते हैं। कुछ तो रोजाना सूचना विभाग के साईकिल/स्कूटर स्टैण्ड पर नजर आते हैं। ये खुद तो शिकार तलाशते ही हैं साथ ही सूचना विभाग के कुछ कर्मचारी भी फर्जी सर्कुलेशन दिखाने वाले अखबार कर्मियों के लिए इन्हें ही चिन्हित करते हैं। यहां तक कि सूचना विभाग के जिन कर्मचारियों के अपने अखबार प्रकाशित होते हैं वे भी इन्हीं दलालों की मदद से अखबार और पत्र/पत्रिकाओं के फर्जी सर्कुलेशन के  लिए इन्हीं दलालों का दामन थामते हैं।

जिंदा मक्‍खी निगल रहा है डीएवीपी 

अनुच्छेद-18 में डी.ए.वी.पी. को यह अधिकार दिया गया है कि यदि कोई समाचार-पत्र/पत्रिका का मालिक अपने दस्तावेजों में झूठा शपथ-पत्र जमा करता है या झूठी सूचना देता है तो उसके समाचार-पत्र/पत्रिका को तत्काल प्रभाव से न सिर्फ सूची से हटा सकता है बल्कि शीर्षक भी निरस्त करने की संस्तुति कर सकता है। इसके बावजूद डी.ए.वी.पी. तो जिन्दा मक्खी निगल ही रहा है साथ ही उत्तर-प्रदेश का सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग निदेशालय भी सब कुछ जानते हुए भी मौन है और ऐसे लोगों के लिए संजीवनी बना हुआ है जो पत्रकारिता की गरिमा और उसके उद्देश्य को छिन्न-भिन्न करने में तुले हैं।

लखनऊ के इन अखबारों ने फर्जी सर्कुलेशन दिखाकर हड़पे लाखों 

सिर्फ लखनऊ मंडल में ही हजारों की संख्या में हिन्दी-उर्दू समाचार-पत्र ऐसे हैं जो फाईलों और कागजों तक ही सीमित हैं लेकिन डीएवीपी और यूपीआईडी से विज्ञापन लेने के लिए ऐसे लोगों ने प्रसार संख्या 25 हजार से लेकर डेढ़ लाख-दो लाख तक दर्शा रखी है। ऐसे अखबारों की सूची में कुछ ऐसे प्रतिष्ठित अखबार भी हैं जो समय की मार के चलते अपना अस्तित्व खो चुके हैं। वर्तमान में इन अखबारों की स्थिति अत्यंत दयनीय बनी हुई है। कर्मचारियों को वेतन के वेतन के लाले हैं लेकिन सर्कुलेशन लाखों में दिखा रहे हैं। राजधानी लखनउ से प्रकाशित हिन्दी दैनिक समाचार-पत्र ‘स्वतंत्र भारत’ आज बंदी की कगार पर है लेकिन कागजों में इसका सर्कुलेशन 70 हजार से भी अधिक दिखाया जा रहा है। स्वतंत्र भारत की गिनी-चुनी प्रतियां ही राजधानी लखनऊ मे नजर आती हैं। कर्मचारी वेतन न मिलने की दशा में दूसरे अखबारों की शरण में जा रहे हैं। 

कमोबेश यही हाल दैनिक समाचार-पत्र ‘आज’ का भी है। इस अखबार ने सिर्फ लखनउ में ही अपना सर्कुलेशन लगभग 60 हजार दर्शा रखा है। इस अखबार ने वाराणसी से अपनी प्रसार संख्या दो लाख से ज्यादा दर्शा रखी है। डीएवीपी से इस अखबार की विज्ञापन दर सर्वाधिक 61 रूपए प्रति वर्ग सेंटीमीटर से भी ज्यादा है। इसी तरह से अन्य दूसरे मंडलों से भी इस अखबार ने अपना सर्कुलेशन लाखों में दर्शा रखा है। हकीकत यह है कि राजधानी लखनऊ में ‘दैनिक आज’ की प्रतियां दो हजार का आंकड़ा भी पार नहीं कर पा रही हैं।

जिस अखबार ‘दैनिक आज’ में नौकरी पाने के लिए दिग्गज पत्रकार लाईन लगाए खड़े रहते थे वही अखबार कार्यालय आज सन्नाटे में हैं। कर्मचारियों से लेकर पत्रकारों तक को वेतन नहीं मिल पा रहा है। लिहाजा वरिष्ठ पत्रकारों ने तो इस अखबार से किनारा कर ही लिया है साथ ही नए पत्रकार भी इस अखबार के कार्यालयों में जाना पसन्द नहीं करते। इसके बावजूद कागजों में इस अखबार ने अपनी प्रसार संख्या लाखों में दर्शाकर सरकारी धन की लूट मचा रखी है। ऐसा नहीं है कि डीएवीपी कभी प्रतिष्ठित रहे इन अखबारों की माली हालत से परिचित नहीं है, इसके बावजूद विभाग की कृपादृष्टि कहीं न कहीं भ्रष्टाचार को अवश्य उजागर करती है।

किसी समय राजधानी लखनऊ और रायबरेली में प्रतिष्ठित रहे ‘लखनउ मेल’ की हालत और भी दयनीय है। स्टाफ के नाम पर लखनउ में सिर्फ एक ही कर्मचारी है, जो खबर लिखने से लेकर संशोधन करने और पू्रफ रीडिंग से लेकर पेज का ले-आउट तैयार करने तक का काम करता है। इस दैनिक समाचार-पत्र के लिए वह समाचारों का संकलन कैसे करता होगा ? इसका सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। जाहिर है अखबार के लिए इंटरनेट के माध्यम से दूसरे अखबारों की खबरे कॉपी की जाती हैं। इस अखबार के मालिकानों ने रायबरेली में अपनी प्रसार संख्या 26 हजार से भी ज्यादा दर्शा रखी है।

लखनऊ में इसकी प्रसार संख्या 21 हजार से भी अधिक है। रायबरेली से पंजीकृत इस अखबार का डीएवीपी दर 14 रूपए 39 पैसा प्रति वर्ग सेंटीमीटर है जबकि लखनउ मे यूपीआईडी इसकी दर 11 रूपए 34 पैसे निर्धारित है। सच्चाई यह है कि इस अखबार की कुछ सौ प्रतियां रायबरेली जाती हैं जबकि लखनउ में इसकी प्रतियां सिर्फ फाईलों तक ही सिमटी हुई हैं। ये अखबार न तो स्टॉलों पर नजर आता है और न ही घरों में जाता है। इस अखबार का प्रकाशक परिवार लगभग दर्जन भर अन्य दैनिक अखबार भी प्रकाशित करता है। जिसमें समाचार ज्योति, आज की रिपोर्ट भी शामिल है। 

अमृत विचार का सर्कुलेशन 26 हजार 6 सौ 43 दर्शाया जाता है। हकीकत यह है कि प्रथम तो यह अखबार सीट ऑफसेट और लीथो मशीन पर छपता है। इस लिहाज से इसका सर्कुलेशन तकनीकी आधार पर ही पूरी तरह से फर्जी है। द्वितीय इस अखबार को सिर्फ सूचना विभाग की फाईलों में ही देखा जा सकता है। इस अखबार की प्रतियां भी न तो स्टॉलों पर नजर आती हैं और न ही राजधानी लखनउ और जनपद रायबरेली की आम जनता के घरों में नजर आती हैं। फर्जी सर्कुलेशन के आधार पर अमृत विचार की विज्ञापन दरें 14 रूपए 39 पैसे निर्धारित की गयी हैं।

इसी तरह से इन्हीं गुप्ता बंधुओं का एक अन्य प्रकाशन ‘आज की रिपोर्ट’ भी है। यह अखबार सांध्य दैनिक के रूप में पंजीकृत हैं। इस अखबार की प्रतियां अपने पंजीकरण के समय से लेकर आज तक भले ही किसी को नजर न आयीं हो लेकिन कागजो में इसकी प्रसार संख्या 20 हजार से भी उपर है। यूपीआईडी से इस अखबार की विज्ञापन दरें 11 रूपए 34 पैसे तय है। सूचना विभाग के अधिकारी भी इस अखबार को सिर्फ फाईलों तक ही मानते हैं लेकिन उच्चाधिकारियों के निर्देश पर इसके सर्कुलेशन के आधार पर रेट तय करना उनकी मजबूरी है। यह अखबार आज तक कभी भी बाजारों अथवा घरों में नजर नहीं आया। 

गौरतलब है कि ज्यादातर सांध्य दैनिक समाचार पत्र हॉकरों के जरिए बाजारों और चौराहों पर हेडलाईन चिल्ला-चिल्लाकर बेजे जाते हैं। 20 हजार से भी ज्यादा का सर्कुलेशन दिखाने वाले इस अखबार को उन्हीं के साथियों ने आज तक नहीं देखा है। जानकार सूत्रों की मानें तो इन अखबारों की ब्रदर्स एण्ड कम्पनी ने दर्जनों की संख्या में अखबारों का पंजीकरण करा रखा है। सूचना विभाग से लेकर उच्च पदस्थ अधिकारियों के बीच इनकी गहरी पैठ से इन्हें काफी लाभ मिलता रहा है। आज की रिपोर्ट और समाचार ज्योति सहित दर्जन भर अखबार के मालिक अरविन्द गुप्ता को भले ही अपने अखबार में समाचार लिखने की आवश्यकता न हो लेकिन इन्हें रोजाना मुख्यमंत्री कार्यालय एनेक्सी भवन के मीडिया सेंटर में जरूर देखा जा सकता है। आरोप है कि श्री गुप्ता सिर्फ विज्ञापन संकलन के लिए ही अधिकारियों की चौखटों पर दस्तक देने के लिए एनेक्सी और विधानसभा में मंडराते रहते हैं।

लखनऊ मंडल के उन्नाव जनपद से प्रकाशित एक दैनिक समाचार-पत्र ‘उन्नाव टाईम्स’ के मालिक ने अखबार की प्रसार संख्या 22 हजार से भी ज्यादा दिखा रखी है। जबकि यह अखबार न तो उन्नाव में कहीं नजर आता है और न ही राजधानी लखनउ के स्टॉलों पर। सूचना विभाग की फाईलों में जरूर इसे देखा जा सकता है और वह भी दो-तीन महीनों में एक बार। बताया जाता है कि अखबार मालिक दो-तीन महीनों में बैक डेट से अखबार की फाईल बनवाकर विभाग में जमा करवा देता है। इसी आधार पर इस अखबार का डीएवीपी दर भी तय किया जा चुका है। यह सच्चाई सूचना विभाग से लेकर डीएवीपी में बैठे कर्मचारी भी भलीभांति जानते हैं फिर भी इन सबकी चुप्पी भ्रष्टाचार मे संलिप्त होने की ओर साफ इशारा कर रही है। 

उन्नाव जनपद से ही प्रकाशित हिन्दी दैनिक समाचार-पत्र ‘वृतांत’ ने तो अपनी प्रसार संख्या 48 हजार से भी ज्यादा दिखा रखी है। इस डीएवीपी दर प्रतिष्ठित दैनिक समाचार-पत्रों के समतुल्य है। डीएवीपी ने प्रसार संख्या के आधार पर इस अखबार का विज्ञापन दर 20 रूपए 19 पैसे दे रखा है। लखनऊ से प्रकाशित हिन्दी दैनिक समाचार-पत्र उर्जा टाईम्स का कागजों पर सर्कुलेशन 30 हजार से भी ज्यादा है। यह अखबार कभी-कभार ही छपता है इसके बावजूद सूचना एवं जनसम्पर्क निदेशालय के रजिस्टर में इसे नियमित दर्शाया जा रहा है। फर्जी सर्कुलेशन के आधार पर ही डीएवीपी ने इस अखबार की विज्ञापन दर 14 रूपए से भी ज्यादा दे रखी है। 

दैनिक समाचार-पत्रों की सूची में शामिल स्वतंत्र चेतना का सर्कुलेशन कागजों पर 71 हजार से भी ज्यादा है। साथ ही इसके सांध्य संस्करण का सर्कुलेशन 67 हजार 500 प्रतियां प्रतिदिन है। इस अखबार की माली हालत भी ठीक नहीं है। संवाददाताओं को अल्प वेतन में गुजारा करना पड़ता है। इस समाचार-पत्र के ही एक संवाददाता की मानें तो बमुश्किल दो हजार प्रतियां ही रोजाना छपती हैं। वैसे भी यदि एक अखबार के प्रकाशन की न्यूनतम कीमत का आंकलन किया जाए तो ‘स्वतंत्र चेतना और चेतना विचारधारा’ जैसा अखबार छापने में प्रति अखबार सात से आठ रूपए के बीच खर्चा आता है। इस हिसाब से यदि एक लाख प्रतियां प्रतिदिन सर्कुलेशन की भी मान ली जाएं तो इस अखबार का रोजाना का खर्चा सात से आठ लाख रूपए प्रतिदिन है। जबकि स्टॉफ का खर्चा इसमें सम्मिलित नहीं है। इस तरह से सिर्फ छपाई का खर्चा ही प्रतिमाह तकरीबन ढाई करोड़ आता है। पूरे वर्ष का खर्च लगभग तीस करोड़ का है। 

यदि स्टॉफ का खर्चा भी इसमें जोड़ लिया जाए तो कम से कम एक दैनिक अखबार के लिए चार संवाददाता, दस से बारह संवाद-सूत्र, कम से कम दो कैमरामैन, आधा दर्जन उप संपादक, कम्प्यूटर ऑपरेटर सहित अन्य स्टॉफ की भी जरूरत पड़ती है। यदि स्टॉफ का न्यूनतम खर्चा एक लाख रूपए प्रतिमाह मान लिया जाए तो वर्ष भर में बारह लाख रूपया तो यह अखबार अपने स्टॉफ पर ही खर्च कर देता है। इस तरह से वह अखबार जो गिनी-चुनी संख्या में ही बाजारों में नजर आता है उसका सालाना बजट 30 से 32 करोड़ के बीच है। प्राईवेट विज्ञापनों की संख्या लगभग न के बराबर होती है। इन परिस्थितियों में मसालों का बिजनेस करने वाला बिना किसी लाभ के 30 से 32 करोड़ रूपया कैसे व्यय कर सकता है ? इसका सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। जाहिर है यह अखबार भी फर्जी सर्कुलेशन दिखाकर अपना हित साध रहा है।

स्वरूप केमिकल्स बनाने वालों ने भी सत्ताधारियों के बीच सम्पर्क साधने की गरज से एक दैनिक समाचार-पत्र ‘राष्ट्ीय स्वरूप’ का प्रकाशन शुरू किया था। शुरूआती दौर में जोर-शोर से चलने वाला यह समाचार-पत्र वर्तमान समय में बंदी की कगार पर है। जानकार सूत्रों की मानें तो वर्तमान समय में इस अखबार की प्रतियांे का सकुलेशन हजार का आंकड़ा भी पार नहीं कर पा रहा है इसके बावजूद कागजों में इस अखबार का सर्कुलेशन 68 हजार प्रतिदिन से भी ज्यादा है। यूपीआईडी ने इसके विज्ञापन की दर 23 रूपए 90 पैसे कर रखी है। स्टॉफ के नाम पर इस अखबार में गिने-चुने लोग ही नजर आते हैं। 

एक समय प्रतिष्ठित समाचार-पत्रों में शुमार रहे ‘दि पायनियर’ की माली हालत भी अत्यंत दयनीय है। इसके बावजूद कागजों में इसका सर्कुलेशन 75 हजार प्रतिदिन दर्शाया जाता है। यूपीआईडी ने इसकी विज्ञापन दरें 23 रूपए से भी ज्यादा कर रखी है। हालांकि ‘दि पायनियर’ की खस्ता हालत के बारे में सूचना एवं जनसम्पर्क निदेशालय के कर्मचारियों से लेकर अधिकारी तक सभी वाकिफ हैं फिर भी आंख मूंद कर उसके फर्जी सर्कुलेशन पर वे मुहर लगाते चले आ रहे हैं। विभाग ने एक बार भी फर्जी सर्कुलेशन के बारे में समाचार-पत्र से जवाब-तलब नहीं किया। इस सम्बन्ध में सूचना विभाग के ही कर्मचारियों का कहना है कि जब दो पन्ने के अखबार 50 से 70 हजार का सर्कुलेशन दिखा-दिखा कर मलाई चाट रहे हैं तो कम से कम इस समाचार-पत्र पर तो उंगली नहीं उठनी चाहिए। आखिर फर्जी सर्कुलेशन दिखाने वाले ‘दि पायनियर’ पर उंगली क्यों नहीं उठानी चाहिए ? इस सवाल का जवाब सूचना निदेशालय के अधिकारियों के पास भी नहीं है।

उर्दू दैनिक समाचार-पत्र तो हिन्दी दैनिक समाचार-पत्रों के सर्कुलेशन को भी पीछे छोड़ चुके हैं। हिन्दी दैनिक समाचार-पत्र के मुकाबले अधिक विज्ञापन दर मिलने के कारण इन अखबारों ने अपने शुरूआती दौर में ही अखबार का सर्कुलेशन इतना अधिक दर्शा रखा है कि उस पर यकीन करना असम्भव सा प्रतीत होने लगता है। जहां एक ओर उर्दू दैनिक ‘सहाफत’ ने अपना सर्कुलेशन लगभग 67 हजार प्रतिदिन दर्शा रखा है वहीं दूसरी ओर इन दिनों का सर्कुलेशन 72 हजार से भी ज्यादा दिखाया गया है। ‘अवध की पुकार’ भी फर्जी सर्कुलेशन की दौड़ में शामिल होकर अपना सर्कुलेशन 56 हजार से भी ज्यादा दिखा रहा है। ‘सहाफत’ का डीएवीपी दर 23 रूपए प्रति वर्ग सेंटीमीटर प्रति कॉलम है तो दूसरी ओर ‘अवध की पुकार’ और ‘इन दिनों’ को यूपीआईडी ने 20 से 23 रूपए की दरें घोषित कर रखी है। 

लखनऊ से प्रकाशित उर्दू दैनिक समाचार-पत्र ‘एक दाम’ लखनऊ में ही कहीं नजर नहीं आता लेकिन इसका सर्कुलेशन 71 हजार प्रतिदिन से भी ज्यादा है। यूपीआईडी ने भी इसके सर्कुलेशन पर अपनी सहमति की मुहर लगाते हुए इसकी विज्ञापन दर 23 रूपए से भी ज्यादा तय कर रखी है। फर्जी सर्कुलेशन के मामले में राष्‍ट्रीय सहारा का उर्दू संस्करण भी पीछे नहीं है। भले ही इसकी प्रतियां लखनऊ में 3 से 5 हजार ही छपती हों लेकिन इसने अपना सर्कुलेशन 33 हजार से भी ज्यादा का दिखा रखा है। यूपीआईडी ने प्रसार संख्या के आधार पर इसकी विज्ञापन दरें भी तय कर रखी हैं। एक अन्य उर्दू दैनिक समाचार-पत्र वारिस-ए-अवध ने अपनी प्रसार संख्या 55 हजार से भी ज्यादा दिखा रखी है, जबकि यह अखबार लखनऊ में ही कहीं नजर नहीं आता। 

सूचना एवं जनसम्पर्क निदेशालय के सम्बन्धित अधिकारियों ने इसके फर्जी सर्कुलेशन पर अपनी सहमति की मुहर लगा रखी है। डीएवीपी में इसकी विज्ञापन दर 20 रूपए प्रति वर्ग सेंटीमीटर से भी ज्यादा है। एक वरिष्ठ पत्रकार प्रभात त्रिपाठी के समाचार-पत्र ‘समाजवाद का उदय’ सिर्फ फाईल कॉपी तक ही सिमटा है इसके बावजूद सूचना विभाग में इसका सर्कुलेशन 62 हजार से भी ज्यादा है। श्री त्रिपाठी जिस मशीन में अपना अखबार छापते हैं उसकी क्षमता ही 5 हजार कॉपियां प्रतिदिन से ज्यादा की नहीं है इसके बावजूद सूचना विभाग के अधिकारी श्री त्रिपाठी के इस फर्जीवाडे़ पर सहमत है। जानकारी के अनुसार श्री त्रिपाठी का एक और दैनिक समाचार-पत्र ‘प्रभात केसरी’ भी लखनऊ से प्रकाशित दर्शाया जा रहा है।

एक स्कूल के संचालक अपना दैनिक अखबार ‘अपना अखबार’ के नाम से प्रकाशित करते हैं। इस अखबार की चंद प्रतियां ही उनके करीबी और जान-पहचान वालों के पास निःशुल्क भेजी जाती हैं लेकिन कागजों में इस अखबार का सर्कुलेशन 66 हजार से भी ज्यादा है। सूचना एवं जनसम्पर्क निदेशालय के सम्बन्धित अधिकारियों ने भी इसके फर्जी सर्कुलेशन को सही मानते हुए अपनी सहमति की मुहर लगा रखी है। यूपीआईडी में इस अखबार की विज्ञापन दरें 23 रूपए प्रति वर्ग सेंटीमीटर/कॉलम निर्धारित है।

जनपद रायबरेली से अपना प्रकाशन स्थल दर्शाने वाले हिन्दी दैनिक समाचार-पत्र ‘आनन्द टाइम्स’ ने अपनी प्रसार संख्या 35 हजार से भी ज्यादा दर्शा रखी है। विज्ञापन के लिए इसका विभागीय दर 17 रूपए से भी ज्यादा निर्धारित है। रायबरेली से ही प्रकाशित ‘लोहिया क्रांति’ की प्रसार संख्या 28 हजार से भी जयादा है। डी.ए.वी.पी. ने इसकी विज्ञापन दर 14 रूपए प्रति वर्ग सेंटीमीटर से भी ज्यादा कर रखी है। इस अखबार को रायबरेली में भले ही किसी ने न देखा हो लेकिन सूचना विभाग की फाईलों में इसे जरूर देखा जा सकता है। इसी तरह से रायबरेली से अपना प्रकाशन स्थल दर्शाने वाले रॉयल न्यूज ऑफ राजधानी, रोशन लहरी, सूचना संसार, विचार सूचक जैसे समाचार-पत्रों ने अपनी प्रसार संख्या 18 से 28 हजार तक दर्शा रखी है। सच तो यह है कि इनमें से कई अखबार तो सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग में भी नियमित जमा नहीं होते इसके बावजूद इन अखबारों के मुद्रक, प्रकाशक जमकर सरकारी विज्ञापन की आड़ में सरकारी खजाने को सेंध लगा रहे हैं। विडम्बना यह है कि प्रदेश सरकारें भी सब कुछ जानते हुए चुप्पी साधे बैठी हैं।

राजधानी लखनऊ को अपना प्रकाशन स्थल दर्शाने वाले हिन्दी दैनिक समाचार-पत्र ‘ग्रामीण सहारा’ ने अपनी प्रसार संख्या 55 हजार से भी ज्यादा दर्शा रखी है। ग्रामीण सहारा की नौकरी छोड़ चुके एक संवाददाता की मानें तो यह अखबार दो हजार की संख्या में भी अखबार नहीं छपवाता है। इस अखबार के मालिकानों से डी.ए.वी.पी. से अपने अखबार की विज्ञापन दरें 20 रूपए प्रति वर्ग सेंटीमीटर से भी ज्यादा कैसे करवा रखी है ? इसका जवाब सूचना विभाग की निरीक्षा शाखा के पास भी नहीं है। उर्दू दैनिक समाचार-पत्र सहाफत की प्रसार संख्या अद्भुत तरीके से 66 हजार से भी ज्यादा दिखायी जाती है। जानकार सूत्रों के मुताबिक यह अखबार रोजाना दो से चार हजार प्रतियां ही छपवाता है। प्रसार संख्या के आधार पर इस अखबार के विज्ञापन की विभागीय दर 23 रूपए प्रति वर्ग सेंटीमीटर से भी ज्यादा है। 

एक अन्य उर्दू दैनिक समाचार-पत्र ‘इन दिनों’ ने तो सहाफत जैसे चर्चित अखबार को भी पीछे छोड़ते हुए अपनी प्रसार संख्या 72 हजार 200 दर्शा रखी है। यह अखबार कभी-कभार स्टॉलों पर तो दिखता है लेकिन घरों में इसकी प्रसार संख्या में न के बराबर है। जानकार पत्रकारों का कहना है कि इस अखबार की प्रतियां बमुश्किल दो हजार से ज्यादा नहीं छपती हैं। इन दोनों अखबारों ने राष्ट्रीय सहारा के उर्दू संस्करण जैसे अखबार को भी काफी पीछे छोड़ दिया है। गौरतलब है कि राष्ट्रीय सहारा ने अपने उर्दू संस्करण की प्रसार संख्या लगभग 33 हजार दर्शा रखी है।

‘वारिस-ए-अवध नाम का उर्दू दैनिक समाचार-पत्र कागजों में 55 हजार से भी ज्यादा की प्रसार संख्या दर्शाता चला आ रहा है जबकि यह अखबार न तो स्टॉलों पर कहीं नजर आता है और न ही घरों में। न चाय की गुमटियों में यह दिखता है और न ही पान की दुकानों में। फिर भी इस अखबार की प्रसार संख्या 55 हजार से भी ज्यादा है। इस अखबार की विभागीय दर 20 रूपए प्रति वर्ग सेंटीमीटर से भी ज्यादा है। हिन्दी दैनिक समाचार-पत्र ‘वकर्स हेराल्ड’ अब कहीं नजर नहीं आता इसके बावजूद सूचना विभाग की सूची में इसकी प्रसार संख्या 57 हजार से भी ज्यादा है।

राजधानी लखनऊ में अपना प्रकाशन स्थल दर्शाने वाले ‘निष्पक्ष प्रतिदिन’ ने अपनी प्रसार संख्या ‘राष्ट्रीय सहारा’ जैसे अखबार से भी ज्यादा दर्शा रखी है। कागजों में इस अखबार ने अपनी प्रसार संख्या 74 हजार प्रतिदिन से भी ज्यादा दर्शायी है, जबकि हकीकत यह है कि यह अखबार पांच हजार का आंकड़ा भी पार नहीं करता। गौरतलब है कि इस अखबार का पंजीयन तक वर्ष 2005 में निरस्त कर दिया गया था। जानकारी के मुताबिक तत्कालीन सूचना निदेशक बादल चटर्जी ने इस अखबार के फर्जीवाडे़ का खुलासा करते हुए 30 लाख 50 हजार का विज्ञापन गलत तथ्य देकर हासिल करने सम्बन्धी आरोप में स्थानीय हजरतगंज थाने में प्राथमिकी तक दर्ज करायी थी। गलत दस्तावेजों के आधार पर ही 6 फरवरी 2012 में इस अखबार का घोषणा-पत्र भी निरस्त कर दिया गया था। इसी वजह से निष्पक्ष प्रतिदिन का प्रकाशन 6 फरवरी 2012 से 20 जून 2012 तक बंद रहा। 

चौंकाने वाला पहलू यह है कि प्रकाशन बंदी के दौरान भी निष्पक्ष प्रतिदिन के मालिक जगदीश नारायण शुक्ल ने भारत सरकार के डी.ए.वी.पी. विभाग से 12 लाख रूपए के विज्ञापन झटक लिए। उक्त विज्ञापनों का भुगतान भी हो चुका है। प्राप्त जानकारी के मुताबिक सूचना एवं जनसम्पर्क निदेशालय से यह जानकारी डी.ए.वी.पी. को भी भेज दी गयी थी। इसके बावजूद डी.ए.वी.पी. ने न सिर्फ विज्ञापन जारी किए बल्कि भारी-भरकम भुगतान भी कर दिया। जाहिर है कि अखबार का प्रकाशन बंद होने के बावजूद फर्जी तरीके से विज्ञापन ऐंठने और भुगतान पाने के लिए ‘निष्पक्ष प्रतिदिन’ के मालिक ने कमीशन के रूप में मोटी रकम चुकायी होगी।

उक्त उदाहरण तो महज बानगी मात्र हैं जबकि हकीकत यह है कि राजधानी लखनऊ से प्रकाशित होने वाले हजारों अखबार ऐसे हैं जो फर्जी प्रसार संख्या दर्शाकर राज्य सरकार और केन्द्र सरकार के खजाने को लूट रहे हैं। फर्जी सर्कुलेशन को लेकर एक जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट ने भी मामले की गंभीरता को परखते हुए सम्बन्धित विभाग को जांच के साथ ही कार्रवाई के सख्त निर्देश दिए हैं। फिलहाल तो यह मामला कोर्ट में है लेकिन इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता यदि कोर्ट ने फर्जी सर्कुलेशन दर्शाने वाले अखबार कर्मियों के खिलाफ शिकंजा कसा तो निश्चित तौर पर हजारों की संख्या में अखबारों का पंजीकरण निरस्त हो सकता है।

यह आर्टकिल लखनऊ से प्रकाशित दृष्टांत मैग्जीन से साभार लेकर भड़ास पर प्रकाशित किया गया है. इसके लेखक तेजतर्रार पत्रकार अनूप गुप्ता हैं जो मीडिया और इससे जुड़े मसलों पर बेबाक लेखन करते रहते हैं. वे लखनऊ में रहकर पिछले काफी समय से पत्रकारिता के भीतर मौजूद भ्रष्‍टाचार की पोल खोलते आ रहे हैं.

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अरबपति संपादक संजय गुप्‍ता के पास नहीं हैं किराए के 77 हजार रुपए!

: दर्जनों पत्रकारों पर सरकारी आवास का बकाया : लखनऊ। सरकार और आम जनता के बीच सेतु सरीखा दायित्व निभाने वाला मीडिया आज खलनायक की भूमिका में है। यदि कुछ गिने-चुने पत्रकारों को अपवाद स्वरूप मानकर छोड़ दिया जाए तो ये हालत पूरे देश की मीडिया से जुडे़ पत्रकारों की है। खासतौर से यूपी की राजधानी लखनऊ के तथाकथित पत्रकारों की भूमिका सर्वाधिक संदेह के दायरे में है। जो ‘सिंगल कॉलम’ खबर लिखने का तरीका नहीं जानते वह यूपी सरकार के अधीन सूचना विभाग की सूची में श्रेष्ठ पत्रकारों की श्रेणी में आते हैं।

सरकारी विज्ञप्तियां छाप-छापकर अखबार की दुकान चलाने वाले राज्य सम्पत्ति विभाग की देखरेख वाली सरकारी कॉलोनियों में कुण्डली जमाकर बैठे हैं। इनमें से अधिकतर पत्रकार ऐसे हैं जिन्होंने वर्षों से सरकारी भवनों का किराया जमा नहीं किया है। हालांकि पत्रकारों के हितार्थ 21 मई 1985 को जारी अधिसूचना के पृष्ठ संख्या 3 के 9 नम्बर कॉलम में स्पष्ट अंकित है कि आवंटन की शर्तों एवं प्रतिबंधों के भंग होने पर राज्य सम्पत्ति विभाग के सम्बन्धित अधिकारी द्वारा बिना कोई कारण बताए आवास का आवंटन निरस्त कर दिया जायेगा। 10 नम्बर कॉलम में समस्त शर्तों व प्रतिबंधों का जिक्र करते हुए प्राविधानों को आवंटन की शर्तों एवं प्रतिबंधों को समाविष्ट करते हुए लागू करने की बात कही गयी है।

प्रतिबंधों एवं शर्तों में इस बात का खास उल्लेख किया गया है कि जो आवंटी समय से किराए का भुबतान नहीं करेगा उसका आवंटन बिना पूर्व सूचना के निरस्त कर दिया जायेगा। चौंकाने वाला पहलू यह है कि शासनादेश में सख्त निर्देशों के बावजूद राज्य सम्पत्ति विभाग लाखों रूपये बकायदार पत्रकारों के खिलाफ सख्त कदम नहीं उठा पा रहा है। सरकारी दायित्वों की पूर्ति दिखाने के नाम पर नोटिस तो भेजी जाती है, लेकिन दबाव बनाकर वसूली के नाम पर अधिकारी अपने हाथ पीछे खींच लेते हैं। इन्हीं में से एक तथाकथित पत्रकार ऐसे भी हैं जिन्होंने शासन-प्रशासन में गहरी पैठ का भरपूर फायदा उठाते हुए लगभग पांच लाख रूपए का चूना सरकारी खजाने को लगा दिया।

इन पर आरोप है कि इन्होंने अधिकारियों संग अपने सम्बन्धों के प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए किराए के रूप में लगभग पांच लाख का किराया माफ करवा लिया जबकि नियमानुसार सरकारी धनराशि वसूली में छूट देने का अधिकार न तो किसी मंत्री को है और न ही किसी नौकरशाह को। इतना ही नहीं जब उक्त मकान के किराए को लेकर विवाद उत्पन्न हुआ तो उन्होंने अपने प्रभुत्व का इस्तेमाल करते हुए किराया अदा किए बगैर दूसरा अपग्रेडेड सरकारी आवास आवंटित करवा लिया।

सरकारी मकानों में अध्यासित बकायेदारों की सूची में फाईल कॉपी छापकर अपना धंधा चमकाने वालों से लेकर वे पत्रकार भी शामिल हैं जो लखनऊ के मीडिया ग्रुप में बडे़ पत्रकारों के रूप में पहचाने जाते हैं। इनमें से कुछ पत्रकारों ने संगठन बनाकर सरकार पर दबाव बना रखा है ताकि बकायेदारी मामले को लेकर दबाव से बचा जा सके। इन्हीं संगठनों से जुडे़ पत्रकारों का खबरों से सरोकार भले ही न हो अपितु सत्ता के गलियारों में मंत्री-मुख्यमंत्री सहित राज्यपाल से हाथ मिलाते जरूर दिख जाते हैं। इन संगठनों से जुडे़ तथाकथित पत्रकार किसी न किसी कार्यक्रम के बहाने नौकरशाहों और मंत्रिमण्डल के सदस्यों को अपने कार्यक्रमों में बुलाकर अक्सर अपने सम्बन्धों को उजागर करने की कोशिशों में लगे रहते हैं। सरकारी मकानों में बकायेदारों की सूची में इन संगठनों से जुडे़ पत्रकार भी शामिल हैं।

राजधानी लखनऊ से प्रकाशित एक दैनिक अखबार के संवाददाता मनमोहन को जून 2011 में गुलिस्तां कॉलोनी में सरकारी आवास संख्या 25 आवंटित किया गया था। राज्य सम्पत्ति निदेशालय, लखनऊ के रजिस्टर में बकायेदारों की सूची में इनका नाम भी शामिल है। इन पर छह हजार से अधिक किराया बकाया है जबकि इन्हें वेतन के रूप में अच्छी खासी धनराशि प्राप्त होती है। जब सम्बन्धित विभाग इनसे किराए की मांग करता है तो दूसरी ओर से किसी न किसी उच्चाधिकारी का फोन आ जाता है। इसी तरह से अनिरूद्ध सिंह भी बकायेदारों की सूची में शामिल हैं। अनिरूद्ध सिंह को जुलाई 2012 में गुलिस्तां कॉलोनी में मकान संख्या 64 आवंटित किया गया था। इन पर लगभग 18 हजार रूपया किराए के रूप में बकाया है।

राज्य सम्पत्ति निदेशालय की देख-रेख वाले मकान संख्या 71, गुलिस्तां कॉलोनी में राजीव त्रिपाठी रहते हैं। यह मकान उन्हें अक्टूबर 2005 में एक निर्धारित समय के लिए आवंटित किया गया था। इन पर 60 हजार से भी ज्यादा का किराया बकाया है। निर्धारित समय के लिए आवंटित मकान की समयावधि निकल जाने के कारण राज्य सम्पत्ति निदेशालय इनका निवास दिसम्बर 2012 से अनाधिकृत घोषित कर चुका है। निदेशालय की ओर से इन्हें कई नोटिसें भी पूर्व में जारी हो चुकी हैं लेकिन नौकरशाहों के बीच मधुर संबन्धों का लाभ इन्हें पिछले दो वर्षों से लगातार मिलता चला आ रहा है। यह दीगर बात है कि इससे सम्बन्धित विभाग को न सिर्फ आर्थिक नुकसान उठाना पड़ रहा है बल्कि जरूरतमंद लोगों का हक भी मारा जा रहा है।

विभाग के एक कर्मचारी की मानें तो एक उच्च पदस्थ अधिकारी के हस्तक्षेप के बाद विभाग चुप्पी साध कर बैठ गया है। पत्रकार अवनीश विद्यार्थी का मामला भी कुछ ऐसा ही है। प्राप्त जानकारी के मुताबिक श्री अवनीश को सरकारी आवास संख्या 78, गुलिस्तां कॉलोनी एक वर्ष के लिए अगस्त 2012 में आवंटित किया गया था। समयावधि बीत जाने के बाद विभाग ने इन्हें भी अधिकृत घोषित कर रखा है। इतना ही नहीं इन पर लगभग 27 हजार रूपया किराए के रूप में भी बकाया है। इन दबंग पत्रकार के खिलाफ विभाग कई नोटिसें जारी कर चुका है। इसके बावजूद न तो सरकारी आवास पर से इन्होंने कब्जा छोड़ा है और न ही बकाया किराया ही चुकाया है।

राजधानी लखनऊ ही नहीं बल्कि कई अन्य प्रदेशों और जनपदों से प्रकाशित एक प्रतिष्ठित समाचार पत्र के मालिक व कथित पत्रकार संजय गुप्ता भी राज्य सम्पत्ति निदेशालय के बकायेदारों की सूची शामिल हैं। अरबों की सम्पत्ति के मालिक श्री गुप्ता की नीयत भी मामूली सरकारी रकम को डकार जाने की है। इन्हें नवम्बर 2002 में बी-2, दिलकुशा की सरकारी कॉलोनी में एक पत्रकार की हैसियत से भवन आवंटित किया गया था। ये अखबार के लिए अपनी कलम से भले ही कोई खबर न लिखते हों लेकिन वरिष्ठ पत्रकारों की सूची में इनका नाम भी दर्ज है। उक्त मकान श्री गुप्ता को आवास के तौर पर एक निर्धारित समय के आवंटित किया गया था। राज्य सम्पत्ति विभाग ने इनका अध्यासन वर्ष 2013 से अनाधिकृत घोषित कर रखा है।

कई बार इन्हें मकान खाली करने की नोटिसें जारी की जा चुकी हैं लेकिन अपने प्रभाव के बलबूते वे सरकारी भवन खाली करने को तैयार नहीं। चूंकि इनके अखबार के स्टाफ में वरिष्ठ पत्रकारों की लम्बी-चौड़ी फौज है, लिहाजा विभाग पर दबाव बनाने के लिए वे अक्सर इन्हीं पत्रकारों का सहारा लिया करते हैं। प्राप्त दस्तावेजों के आधार पर इन पर किराए के रूप में 77 हजार रूपए से भी ज्यादा बकाया है। अरबों के मालिक संजय गुप्ता के लखनऊ सहित कई अन्य शहरों में भी विशालकाय कोठियां हैं, इसके बावजूद संजय गुप्ता का कब्जा दिलकुशा के सरकारी आवास संख्या बी-2 पर बना हुआ है। जानकार सूत्रों की मानें तो श्री गुप्ता ने इस सरकारी आवास को गेस्ट हाउस बना रखा है। बाहर से आने वाले मेहमानों को इसी सरकारी आवास पर ठहराया जाता है।

जहां तक श्री गुप्ता के निवास की बात है तो वे इस आवास में कभी-कभार ही देखे जाते हैं। आस-पास के मकानों में रहने वाले लोगों का भी यही कहना है कि श्री गुप्ता कभी-कभार ही यहां पर नजर आते हैं आमतौर पर इस आवास में उनके मेहमानों को ही आता-जाता देखा गया है। इसी लाईन में लगभग दस मकान छोड़कर सी-13 तथाकथित पत्रकार दयानन्द सिंह का सरकारी आवास है। इन्हें यह मकान लगभग एक दशक पूर्व मार्च 2004 में आवंटित किया गया था। इन पर लगभग पचास हजार रूपया किराए के रूप में बकाया है। दिलकुशा कॉलोनी के सी-23 नम्बर बंगले में कुलसुम तलहा का सरकारी आवास है। कुलसुम तलहा को वरिष्ठ पत्रकारों की सूची में गिना जाता है। लखनऊ प्रेस क्लब के मठाधीश पत्रकारों से लेकर दैनिक, साप्ताहिक समाचार पत्रों के संवाददाता कुलसुम तलहा से भली-भांति वाकिफ हैं लेकिन सरकारी आवास पर कुण्डली मारकर बैठने के साथ ही किराए के रूप में पन्द्रह हजार से भी ज्यादा का बकाया उनकी प्रतिष्ठा को चोट पहुंचा रहा है।

लखनऊ मीडिया फोटोग्राफर क्लब के स्वयंभू अध्यक्ष एस.एम. पारी राजनैतिक दल से जुडे़ एक नेता के हिन्दी दैनिक समाचार पत्र में प्रमुख छायाकार के रूप में कार्यरत हैं। श्री पारी को हुसैनगंज चौराहे के निकट सरकारी कॉलोनी ओसीआर में ए-404 नम्बर का आवास पूर्व मुख्यमंत्री मायावती के कार्यकाल में निर्धारित समय के लिए नवम्बर 2011 में आवंटित किया गया था। समयावधि बीत जाने के बाद इनका आवंटन रद कर दिया गया था। साथ ही अतिशीघ्र आवास खाली करने का नोटिस भी विभाग की ओर से जारी किया जा चुका है। राज्य सम्पत्ति निदेशालय के अनुसार श्री पारी वर्तमान में अनाधिकृत रूप से सरकारी आवास में डटे हुए हैं। इतना ही नहीं इन्होंने पिछले एक वर्ष से भी ज्यादा समय से सरकारी आवास का मामूली किराया तक जमा नहीं किया है। राज्य सम्पत्ति विभाग अपने लगभग 22 हजार रूपए किराए की वसूली के लिए कई बार नोटिस भेज चुका है लेकिन न तो किराया ही जमा किया गया और न ही सरकारी आवास से कब्जा ही छोड़ा गया।

राज्य सम्पत्ति निदेशालय की देख-रेख वाले ओसीआर कॉलोनी के मकान संख्या ए-905 पर बसंत श्रीवास्तव नाम के एक पत्रकार का वर्षों से कब्जा बना हुआ है। यह मकान उन्हें सितम्बर 1996 में आवंटित किया गया था। विभागीय सूत्रों के मुताबिक कुछ समय तो इन्होंने नियमित तौर पर किराया जमा किया लेकिन पिछले कई वर्षों से इन्होंने किराया जमा करना बन्द कर दिया। इन पर एक लाख, बीस हजार, आठ सौ छांछठ रूपया किराए के रूप में बकाया है। विभाग इन्हे कई बार नोटिस जारी कर चुका है लेकिन न तो किराया आया और न ही मकान से कब्जा ही छोड़ा गया। इसी कॉलोनी में बी-207 में वरिष्ठ पत्रकार ताविसी श्रीवास्तव का सरकारी आवास है। इन्होंने भी वर्षों से किराया जमा नहीं किया है। इन पर लगभग 12 हजार रूपया किराए के रूप में बकाया है।

बी-505,ओ.सी.आर. कॉलोनी में अशोक मिश्रा का निवास है। यह मकान इन्हें जनवरी 2006 में आवंटित किया गया था। इन पर सर्वाधिक लगभग एक लाख इकहत्तर हजार रूपया बकाया है। बताया जाता है कि इस सम्बन्ध में अशोक मिश्रा ने एक पत्र विभाग को लिखा है। उसमे कहा गया है कि जो किराया उन पर दर्शाया जा रहा है वह उससे पहले रहने वाले किसी व्यक्ति का है। जानकार सूत्रों के मुताबिक लिहाजा पिछला किराया काटकर उनकी समयावधि का बकाया किराया वसूली का पत्र भी उन्हें भेजा गया, लेकिन श्री मिश्र ने वह किराया भी जमा नहीं किया। इसी बिल्डिंग के बी-804 में कैसर जहां को मकान आवंटित किया गया है। सुश्री कैसर पर भी लगभग 14 हजार रूपया किराए के रूप में बकाया है। यह मकान उन्हें पिछले मुलायम सरकार के कार्यकाल में कद्दावर मंत्री आजम खां की कृपा दृष्टि से प्राप्त हुआ था। सुश्री कैसर जहां के आजम खां से मधुर सम्बन्ध हैं। आजम खां कई-एक अवसरों पर इनके घर भी जा चुके हैं। आरोप है कि आजम खां से मधुर सम्बन्धों की बदौलत इन्होंने भी सरकारी आवास का किराया जमा नहीं किया। विभाग किराया जमा करवाने के लिए कई नोटिसें भेज चुका है लेकिन कैसर ने न तो किराया जमा किया और न ही सरकारी आवास से अपना मोह त्यागा।

डायमंड डेरी कॉलोनी, लखनऊ के सरकारी आवास संख्या ई.डी.-31 में तथाकथित पत्रकार अशोक राजपूत का निवास है। यह मकान इन्हें दिसम्बर 2004 में आवंटित किया गया था। तब से लेकर अब तक इन पर लगभग 35 हजार रूपया किराए के रूप में बकाया है। लॉप्लास की सरकारी कॉलोनी के आवास संख्या 105 में पत्रकार आलोक अवस्थी का अनाधिकृत कब्जा बना हुआ है। विभाग इन्हें दिसम्बर 2012 से अनाधिकृत रूप से कब्जेदार मान चुका है। यह मकान उन्हें दिसम्बर 1994 में आवंटित किया गया था। तब से लेकर अब तक इनके ऊपर 1 लाख 40 हजार रूपया किराए के रूप में बकाया है। किराया वसूली के लिए विभाग इन्हें कई नोटिसें भेज चुका है लेकिन श्री अवस्थी ने अभी तक किराया जमा नहीं किया है।

आवास संख्या 404 के निवासी विपिन कुमार चौबे अगस्त 2012 से इस मकान में रह रहे हैं। इन पर किराए के रूप में 66 हजार से भी ज्यादा का बकाया दर्शाया गया है। 405 में अखिलेश सिंह का निवास है। इन पर लगभग 23 हजार रूपया किराए के रूप में बकाया है। यह मकान इन्हें अप्रैल 2004 में आवंटित किया गया था। मकान संख्या 504 किशोर निगम को सितम्बर 1992 में आवंटित किया गया था। इन पर लगभग साढे़ चार हजार रूपया किराए के रूप में बकाया है। 506 में प्रीतम श्रीवास्तव को सरकारी आवास मुहैया कराया गया है। यह मकान उन्हें अप्रैल 2013 में आवंटित किया गया था। तब से लेकर अब उन्होंने किराया ही जमा नहीं किया। इन पर लगभग पांच हजार रूपया किराए के रूप में बकाया है।

कई अखबारों में संपादन कार्य कर चुके पंकज ओहरी ने मकान संख्या 702 आवंटित करवा रखा है। यह मकान उन्हें मई 2005 में आवंटित किया गया था। श्री ओहरी फिलवक्त किसी अखबार में हैं ? क्या कर रहे हैं ? कोई नहीं जानता। इसके बावजूद मकान पर उनका कब्जा बना हुआ है। श्री ओहरी पर किराए के रूप में लगभग छह हजार रूपया बकाया है। मकान संख्या 704 संजय श्रीवास्तव को अक्टूबर 2005 में आवंटित किया गया था। इन पर लगभग छह हजार रूपया किराए के रूप में बकाया है। विभाग इन्हें भी कई नोटिसें भेज चुका है लेकिन समाचार लिखे जाने तक इन्होंने किराया जमा नहीं किया था। मकान संख्या 803 में कथित पत्रकार अशोक पाण्डेय रहते हैं। यह मकान इन्हें जनवरी 2005 में बतौर मान्यता प्राप्त पत्रकार के रूप में आवंटित किया गया था। वर्तमान में अशोक पाण्डेय किस समाचार-पत्र अथवा चैनल से जुडे़ हैं? विभाग के पास जानकारी नहीं है इसके बावजूद सरकारी आवास पर इनका कब्जा बना हुआ है। इन पर भी किराए के रूप में 20 हजार से भी ज्यादा का बकाया है। विभागीय अधिकारियों और कर्मचारियों व्यक्तिगत तौर पर सम्पर्क कर इन्हें नोटिस जारी कर रखा है। इसके बावजूद श्री पाण्डेय ने न तो किराया जमा किया है और न ही सरकारी आवास से कब्जा ही छोड़ा है।

मकान संख्या 901 लॉप्लास कॉलोनी में निवास दर्शाने वाले मोहसिन हैदर रिजवी को यह मकान लगभग दो वर्ष पूर्व जुलाई 2012 में आवंटित किया गया था। इन पर 15 हजार से भी ज्यादा का किराया बकाया है। मकान संख्या 1004 में निवास दर्शाने वाले अभिषेक बाजपेयी को दिसम्बर 2012 में लॉप्लास का सरकारी आवास आवंटित किया गया था। समाचार लिखे जाने के समय तक अभिषेक पर 68 हजार 333 रूपया किराए के रूप में बकाया था। बडे़ बकायेदारों के रूप में चिन्हित श्री बाजपेयी को विभाग कई बार नोटिस भेज चुका है। मकान संख्या 1106 लॉप्लास कॉलोनी में विजय सिंह रहते हैं। यह मकान उन्हें 9 वर्ष पूर्व दिसम्बर 2005 में आवंटित किया गया था। इन पर भी किराए के रूप में दस हजार से भी ज्यादा का बकाया है। इसी कॉलोनी में 1201 नम्बर का मकान कथित पत्रकार एरिक सिरिल थामसन के नाम से जून 2006 में आवंटित किया गया था। इन पर किराए के रूप में लगभग छह हजार रूपया बकाया है।

वरिष्ठ पत्रकारों की श्रेणी में गिने जाने वाले राजबहादुर सिंह भी इसी सरकारी कॉलोनी के मकान संख्या 1202 में रहते हैं। मीडिया घराने से वेतन के रूप में मोटी रकम हासिल करने के बावजूद राज्य सम्पत्ति विभाग की देख-रेख वाले सरकारी मकान का मामूली किराया चुकाने में आनाकानी करते हैं। प्राप्त दस्तावेज के आधार पर इन पर लगभग सात हजार रूपया किराए के रूप में बकाया है। 1203 निवासी दीपचन्द्र सर्वश्रेष्ठ बकायेदारों की सूची में शामिल हैं। इन पर 1 लाख 12 हजार से भी ज्यादा का बकाया है। दीप चन्द्र को लॉप्लास कॉलोनी का मकान जनवरी 2006 में आवंटित किया गया था। बडे़ बकायेदारों की सूची में शामिल दीप चन्द्र को विभाग की ओर से कई बार नोटिस जारी की जा चुकी है। राज्य सम्पत्ति विभाग के एक अधिकारी का कहना है कि दीप चन्द्र पर बकाया धनराशि उनके निवासकाल से पहले का भी है। विशेष यह है कि पुराना बकाया क्लियर न होने के कारण दीप चन्द्र अपने निवासकाल का किराया भी नहीं चुका रहे हैं।

डायमण्ड डेरी कॉलोनी के मकान संख्या ई.डी.-33 का सरकारी मकान कथित पत्रकार रामकल्प उपाध्याय को जून 1987 में एक निर्धारित समय के लिए आवंटित किया गया था। रामकल्प उपाध्याय किसी अखबार अथवा समाचार चैनल से सम्बन्ध रखते हैं ? इस बात की जानकारी न तो मकान का आवंटन करने वाले राज्य सम्पत्ति निदेशालय को है और न ही यूपी के पत्रकारों का लेखा-जोखा रखने वाले सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग को। इसके बावजूद इनके नाम पर मकान पर कब्जा बना हुआ है। सम्बन्धित विभाग इन्हें अनाधिकृत रूप से कब्जेदार भी घोषित कर चुका है। इतना ही नहीं इन पर लगभग डेढ़ लाख रूपया किराये के रूप मे बकाया है। विभागीय नोटिसें इनके लिए कोई मायने नहीं रखतीं।

डालीबाग कॉलोनी के मकान संख्या 1/5 में वरिष्ठ ज्ञानेन्द्र शुक्ला का निवास है। ये अपने जूनियर पत्रकारों को नैतिकता का पाठ तो पढ़ाते हैं लेकिन खुद राज्य सम्पत्ति विभाग की काली सूची में दर्ज हैं। राज्य सम्पत्ति निदेशालय के अनुसार ये उक्त मकान में अनाधिकृत रूप से कब्जा जमाए हुए हैं। यह मकान उन्हें पिछले वर्ष अगस्त में आवंटित किया गया था। इन पर किराए के रूप में 14 हजार से भी ज्यादा का बकाया है। इसी कॉलोनी के 1/7 में एक हिन्दी दैनिक समाचार पत्र के करोड़पति कथित पत्रकार के.के. श्रीवास्तव रहते हैं। यह मकान उन्हें राज्य सम्पत्ति विभाग ने मार्च 2006 में आवंटित किया था। विभाग इन्हें भी अपनी सूची में अनाधिकृत निवास घोषित कर चुका है इसके बावजूद ये अपनी मान-मर्यादा को ताक पर रखकर सरकारी आवास पर कब्जा जमाए हुए हैं। इन पर भी किराए के रूप में 13 हजार से भी ज्यादा का बकाया है।

गौरतलब है कि नियमानुसार निर्धारित वेतन से उपर वेतन पाने वालों को विभाग सरकारी आवास आवंटन नहीं करता है। के.के. श्रीवास्तव स्वयं अपने स्टॉफ को लाखों रूपया वेतन के रूप में प्रतिमाह वितरित करते हैं। इसके बावजूद विभाग ने इन्हें पहले तो सरकारी आवास आवंटन कर दिया, उसके बाद इन्हें अपनी सूची में अनाधिकृत रूप से कब्जेदार भी घोषित कर रखा है। विभागीय अधिकारियों की मानें तो इन्हें कई बार विभाग की ओर से नोटिस जारी की जा चुकी है इसके बावजूद वे सरकारी आवास से कब्जा छोड़ने को तैयार नहीं। एनेक्सी मीडिया सेन्टर मे हरफनमौला पत्रकार के रूप मे पहचान रखने वाले अनिल त्रिपाठी को भी इसी कॉलोनी में मकान संख्या 2/7 आवंटित किया गया है। यह मकान उन्हें वर्तमान अखिलेश सरकार के कार्यकाल दिसम्बर 2012 में आवंटित किया गया था। विभागीय कर्मचारियों का कहना है कि एक-दो महीने तो उन्होंने समय पर किराया जमा किया लेकिन बाद में किराया जमा करना बंद कर दिया। लगभग 11 हजार रूपया किराए के रूप मे इन पर बकाया है। इन्हें भी विभाग नोटिस जारी कर चुका है लेकिन इन्होंने सरकारी आवास का मामूली किराया जमा करने की कोशिश नहीं की।

4/14 निवासी जोरैर अहमद आजमी को यह सरकारी आवास दिसम्बर 2006 में मुलायम सरकार के कार्यकाल में मोहम्मद आजम खां की कृपा दृष्टि से आवंटित किया गया था। इन पर किराए के रूप 41 हजार से भी ज्यादा का बकाया है। विभाग बार-बार नोटिस भेजता है तो ये आजम खां के स्टॉफ से सिफारिश करवा देते हैं। परिणामस्वरूप न तो मकान खाली हो रहा है और न ही विभाग इनसे किराया ही वसूल कर पा रहा है। 5/2 निवासी राजेन्द्र प्रताप सिंह अनाधिकृत रूप से सरकारी आवास पर कब्जा जमाए हुए हैं। यह मकान उन्हें मार्च 2002 में आवंटित किया गया था। इन पर किराए के रूप लगभग 50 हजार रूपया बकाया है। श्री सिंह फिलवक्त किसी मीडिया घराने के साथ जुडे़ हुए हैं? यह जानकारी भी सम्बन्धित विभाग के पास नहीं है।

6/8, डालीबाग कॉलोनी निवासी दिनेश शर्मा पर किराए के रूप 19 हजार से भी ज्यादा का बकाया है। ये मकान उन्हें नवम्बर 1989 मे राज्य सम्पत्ति विभाग की ओर आवंटित किया गया था। वरिष्ठ पत्रकारों की श्रेणी में गिने जाने वाले रतनमणि लाल को मार्च 1999 में 7/3, डालीबाग कॉलोनी में सरकारी आवास आवंटित किया गया था। इनका पत्रकारिता के क्षेत्र से कोई जुड़ाव नहीं रह गया है। ये एनजीओ संचालित करते हैं। चूंकि इन्हें न्यूनतम दर और समस्त सुख-सुविधाओं वाला सरकारी आवास अपने पास बनाए रखना है लिहाजा ये कभी-कभार किसी अखबार अथवा पत्रिका में लेख लिखकर अपना हित साधते आ रहे हैं। राज्य सम्पत्ति निदेशालय को भी इस बात की जानकारी है। इसी वजह से विभाग ने इन्हें अनाधिकृत रूप से निवासित घोषित कर इन्हे नोटिस जारी कर रखा है। इन पर 3 हजार से ज्यादा का किराया भी बकाया है। नियमानुसार समयावधि समाप्त हो जाने अथवा अनाधिकृत रूप से निवास के दौरान इनसे डीएम सर्किल रेट पर किराया वसूल किया जाना चाहिए लेकिन विभाग इनसे नियमित वास्तविक किराया तक वसूल नहीं कर पा रहा है।

15 हजार से भी ज्यादा किराए के बकाएदार राजीव श्रीवास्तव भी इसी कॉलोनी के मकान संख्या 7/13 में निवास दर्शाते हैं। यह मकान उन्हें मई 2013 में आवंटित किया गया था। विभाग ने किराए की वसूली के लिए इन्हें नोटिस भी जारी कर रखा है इसके बावजूद इन्होंने किराया जमा नहीं किया। विभागीय अधिकारियों की मानें तो इनका सम्बन्ध अब पत्रकारिता क्षेत्र से नहीं रह गया है। इसी वजह से विभाग ने इन्हें अनाधिकृत घोषित कर रखा है। 8/15 के सरकारी आवास में मनीष चन्द्र पाण्डेय का कब्जा है। यह मकान उन्हें जुलाई 2006 में आवंटित किया गया था। वर्तमान में इन पर किराए के रूप में 10 हजार से भी ज्यादा का बकाया है। 9/5 निवासी के.सी. बिश्नोई के उपर लगभग 8 हजार रूपया किराए के रूप में बकाया है। यह मकान उन्हें अप्रैल 1999 में आवंटित किया गया था। फिलवक्त श्री बिश्नोई किस मीडिया संस्था से जुडे़ हैं ? इसकी जानकारी विभाग को नहीं है।

सर्वाधिक बकाएदारों की सूची में सुधा साक्षी का नाम सबसे उपर है। इन पर 2 लाख 78 हजार रूपए से भी ज्यादा का बकाया है। विभाग इन्हें अनाधिकृत निवासी भी मान चुका है इसके बावजूद सरकारी आवास पर इनका कब्जा बना हुआ है। सुधा साक्षी के नाम से यह मकान जुलाई 2006 में आवंटित किया गया था। सम्बन्धित विभाग की काली सूची में ये टॉप पर जरूर हैं लेकिन विभाग इनसे न तो मकान खाली करवा पा रहा है और न ही किराए की भारी-भरकम रकम ही वसूल कर पा रहा है। बताया जाता है कि सुधा साक्षी भारत छोड़कर भी जा चुकी हैं इसके बावजूद विभाग कब्जा वापस लेने की कार्रवाई संचालित नहीं कर पा रहा है। 10/7 निवासी अनिल यादव को भी विभाग ने अनाधिकृत घोषित कर रखा है। इसके बावजूद विभाग इनसे सरकारी आवास खाली नहीं करवा पा रहा है। इन पर किराए के रूप में 22 हजार से भी ज्यादा का बकाया है। यह मकान उन्हें जुलाई 2006 में आवंटित किया गया था।

11/6 का सरकारी आवास रीता प्रभु के नाम से आवंटित है। यह मकान उन्हें मार्च 1989 में आवंटित किया गया था। बताया जाता है कि श्री प्रभु यहां रहते ही नहीं है इसके बावजूद सरकारी आवास पर इनका कब्जा बना हुआ है। हालांकि विभाग इन्हें अनाधिकृत घोषित कर चुका है इसके बावजूद मकान खाली करवाने की कानूनी प्रक्रिया नहीं अपनायी जा रही है। इन पर किराए के रूप  में 20 हजार से भी ज्यादा का बकाया है। 12/2 निवासी चन्द्र किशोर शर्मा भी अनाधिकृत रूप कब्जा जमाए हुए हैं। बताया जाता है कि श्री शर्मा भी लखनऊ से बाहर रहते हैं। यह मकान उन्हें अक्टूबर 2011 में आवंटित किया गया था। इन पर भी किराए के रूप में 20 हजार से भी ज्यादा का बकाया है।

 जे-1/4 का सरकारी आवास कथित पत्रकार अब्बास हैदर के नाम से आवंटित है। यह मकान पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव के कार्यकाल में आजम खां की कृपा से अक्टूबर 2006 में आवंटित हुआ था। इन पर 1 लाख 53 हजार से भी ज्यादा का बकाया है लेकिन सत्ताधारियों से सम्बन्धों के चलते विभाग इनसे किराए की रकम वसूल नहीं कर पा रहा है। यह दीगर बात है कि विभाग ने इन्हें अनाधिकृत रूप से निवासित घोषित कर रखा है लेकिन सरकारी मकान खाली नहीं करवा पा रहा है। पार्क रोड की सरकारी कॉलोनी का मकान संख्या ए-3 सुश्री नागला किदवई को सितम्बर 2008 में आवंटित किया गया था। बताया जाता है कि सुश्री किदवई अब इस मकान में रहती भी नहीं हैं इसके बावजूद मकान पर उनका कब्जा बना हुआ है। हालांकि विभाग ने इन्हें भी अनाधिकृत घोषित कर अपना पल्ला झाड़ लिया है लेकिन सरकारी आवास खाली करवाने में वह कोई रूचि नहीं दिखा रहा। इन पर भी किराए के तौर पर 31 हजार से भी ज्यादा का बकाया है।

पार्क रोड कॉलोनी के ए-12 जय प्रकाश त्यागी के कब्जे में है। यह सरकारी आवास उन्हें सितम्बर 2008 में आवंटित किया गया था। राज्य सम्पत्ति निदेशालय ने इन्हें अब अनाधिकृत रूप से निवासित करार दे रखा है, लेकिन मकान खाली करवाने की हिम्मत वह नहीं जुटा पा रहा। इन पर किराए के रूप में 19 हजार से भी ज्यादा बकाया है। एक हिन्दी दैनिक समाचार पत्र के वरिष्ठ पत्रकार उमाशंकर त्रिपाठी को मार्च 2005 में पार्क रोड कॉलोनी का आवास संख्या बी-4 आवंटित किया गया था। इन पर 8 हजार से ज्यादा का किराया बकाया है। वरिष्ठ पत्रकारों की श्रेणी में गिने जाने वाले श्री त्रिपाठी को उनके संस्थान से वेतन के रूप में मोटी रकम मिलती है, इसके बावजूद वे सरकारी आवास का मामूली किराया चुकाने में ईमानदारी नहीं बरत रहे।

श्री त्रिपाठी को वरिष्ठ होने के नाते पत्रकारिता से जुडे़ लोग ‘दद्दू’ नाम से भी जानते हैं। दद्दू को अपने जूनियर पत्रकारों को नैतिकता का पाठ पढ़ाते हुए अक्सर देखा जाता है लेकिन स्वयं नैतिकता से इनका दूर-दूर का रिश्ता नहीं। बताया जाता है कि किराया वसूली के लिए विभाग ने इन्हें नोटिस भेजा है लेकिन पत्रकारों को नैतिक शिक्षा का पाठ पढ़ाने वाले श्री त्रिपाठी ने समस्त नियमों को धता बताते हुए समाचार लिखे जाने तक उपरोक्त किराया जमा नहीं किया था।

पार्क रोड स्थित सरकारी आवास संख्या सी-3 में कुमुदेश चन्द्र का कब्जा है। कुमुदेश को यह मकान मई 2007 में आवंटित किया गया था। इन पर किराए के रूप में 32 हजार से भी ज्यादा का बकाया है। इतना ही नहीं सम्बन्धित विभाग ने इन्हें अनाधिकृत तौर पर निवासित भी घोषित कर रखा है। इसके बावजूद विभाग न तो इनसे किराया वसूल कर पा रहा है और न ही सरकारी आवास ही खाली करवा पा रहा है। फिलवक्त कुमुदेश कहां काम करते हैं ? इसकी जानकारी भी विभाग के पास नहीं है। सी-6 पार्क रोड कॉलोनी के सरकारी आवास में कथित पत्रकार अविनाश चन्द्र मिश्रा का अनाधिकृत कब्जा बना हुआ है। राज्य सम्पत्ति निदेशालय ने इन्हें आवास खाली करने का नोटिस भी भेज रखा है, इसके बावजूद श्री मिश्रा ने सरकारी आवास से मोह नहीं त्यागा है। श्री मिश्रा पर किराए के रूप में 27 हजार से भी ज्यादा का बकाया है।

मई 1999 में कथित पत्रकार मनोज कुमार श्रीवास्तव को इन्दिरा नगर स्थित सरकारी कॉलोनी का मकान संख्या बी-62 आवंटित किया गया था। मनोज कुमार श्रीवास्तव फिलवक्त किस मीडिया के साथ जुडे़ हुए हैं? इसकी जानकारी राज्य सम्पत्ति विभाग को भी नहीं है। बताया जाता है कि श्री मनोज का तबादला हो चुका है इसके बावजूद लखनऊ स्थित सरकारी आवास उन्होंने नहीं छोड़ा है। इन पर 8 हजार से भी ज्यादा का किराया बकाया है। बी-123 इन्दिरा नगर का सरकारी आवास नागेन्द्र प्रताप को सितम्बर 2002 में आवंटित किया गया था। राज्य सम्पत्ति विभाग ने इनका अध्यासन अनाधिकृत घोषित कर रखा है, इसके बावजूद इन्होंने न तो सरकारी आवास का मोह त्यागा है और न ही बकाये किराए की रकम लगभग 37 हजार जमा की है। विभाग कई नोटिसें भेजने का दावा कर रहा है जबकि सूत्रों का कहना है कि विभागीय अधिकारियों पर उच्चाधिकारियों के दबाव के चलते अनाधिकृत होने के बावजूद इनसे सरकारी आवास खाली नहीं कराया जा रहा है।

इन्दिरा नगर की सरकारी कॉलोनी का आवास संख्या बी-141 एक हिन्दी दैनिक समाचार-पत्र के वरिष्ठ पत्रकार दिनेश पाठक को दिसम्बर 2000 में आवंटित किया गया था। श्री पाठक का तबादला काफी पहले हो चुका था। विभाग ने इसी आधार पर इनके कब्जे को अनाधिकृत घोषित कर रखा है, इसके बावजूद श्री पाठक ने कब्जा नहीं छोड़ा है। बताया जाता है कि श्री पाठक के भाई आईपीएस अधिकारी हैं। इन्हीं सम्बन्धों के चलते इन्होंने उच्च स्तर तक दबाव बना रखा है। विभागीय अधिकारी भी मानते हैं कि उच्च स्तरीय दबाव के चलते इनसे मकान खाली नहीं कराया जा सका है। हालांकि अनाधिकृत कब्जा घोषित किए जाने के बाद भी ये प्रत्येक माह नियमित रूप से सरकारी आवास का मामूली किराया जमा करते आ रहे हैं, जबकि नियमानुसार समयावधि समाप्त होने अथवा अनाधिकृत रूप से निवास करने के दौरान डीएम सर्किल रेट से सरकारी आवास का किराया वसूले जाने का प्राविधान है। बताया जाता है कि ये कभी-कभार ही लखनऊ आते हैं। बी-173 में रहने वाले वीरेन्द्र प्रताप सिंह को मार्च 1999 में सरकारी आवास आवंटित किया गया था। इन पर किराए के रूप में 6 हजार से भी ज्यादा का बकाया है। न तो ये किराया जमा कर रहे हैं और न ही सरकारी आवास से मोह त्याग कर पा रहे हैं। सम्बन्धित विभाग भी मूक दर्शक बना हुआ है।

सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 के तहत मिली सूचना के आधार पर बटलर पैलेस के भवन संख्या बी-7 में कथित पत्रकार हेमन्त तिवारी रहते हैं। इनका लेखन से भले ही ज्यादा लगाव न हो लेकिन पत्रकारों के बीच श्रेष्ठ बनने की चाहत इनमें बनी रहती है। ये राज्य मुख्यालय से मान्यता प्राप्त संवाददाता समिति के अध्यक्ष भी हैं। बताया जाता है कि प्रदेश के कई नौकरशाहों से इनके मधुर सम्बन्ध हैं। उसी का फायदा इन्हें यदा-कदा मिला करता है। अधिकारियों से सम्बन्धों के कारण ही लखनऊ के ज्यादातर पत्रकार इन्हें वरिष्ठ पत्रकार की श्रेणी में रखते हैं। यह दीगर बात है कि समाचार लेखन में इनकी कोई खास रूचि नहीं है। इसके बावजूद ये राज्य मुख्यालय से स्वतंत्र पत्रकार के रूप में मान्यता प्राप्त पत्रकार हैं। इन्हें राज्य सूचना विभाग ने किस आधार पर मुख्यालय की मान्यता दे रखी है ? यह जांच का विषय हो सकता है।

श्री तिवारी के विरोधी पत्रकारों का कहना है कि यदि नौकरशाहों का वरदहस्त इन पर से हट जाए और निष्पक्ष जांच करायी जाए तो इनकी मान्यता संकट में आ सकती है। श्री तिवारी को बटलर पैलेस का सरकारी भवन अगस्त 2008 में आवंटित किया गया था। श्री तिवारी पर किराए के रूप में 23 हजार से भी ज्यादा का बकाया है। उच्चाधिकारियों से मधुर सम्बन्धों के चलते विभागीय अधिकारी इन्हें नोटिस भेजने तक से कतराते हैं। बताया जाता है कि श्री तिवारी एनेक्सी मीडिया सेंटर में अक्सर पत्रकारों के बीच शान से कहते हैं, ‘‘किसी…..की हिम्मत नहीं है जो हमें नोटिस भेजे’’।

बटलर पैलेस के सी-16 में अध्यासित संगीता बकाया पर 14 हजार से भी ज्यादा का किराया बकाया है। विभाग इन्हें नोटिस भेजे जाने की बात करता है। जानकारी के मुताबिक सुश्री संगीता बकाया ने न तो किराया जमा किया है और न ही मकान से कब्जा छोड़ा है। सुश्री बकाया को यह सरकारी आवास मार्च 2000 में आवंटित किया गया था। इसी कॉलोनी के सी-22 में सुरेश कृष्ण यादव को अध्यासित दिखाया गया है। श्री यादव को उक्त सरकारी आवास मई 2004 में आवंटित किया गया था। इन पर 37 हजार से ज्यादा किराया बकाया है। विभाग इन्हें भी नोटिस जारी करने की बात कर रहा है लेकिन आवास खाली करवाए जाने के बाबत वह चुप्पी साधने में ही भलाई समझता है। जाहिर है विभाग के उच्चाधिकारियों का दबाव जो कर्मचारियों पर बना हुआ है।

वीआईपी कॉलोनी समझी जाने वाली बटलर पैलेस का आवास संख्या सी-30 श्रीमती प्रतिभा सिंह को सितम्बर 2006 में दो वर्षों के लिए आवंटित किया गया था। सितम्बर 2008 में इन्हें अनाधिकृत भी घोषित किया जा चुका है, इसके बावजूद विभाग इनसे सरकारी आवास खाली नहीं करवा पा रहा है। संयुक्त निदेशक और जनसूचनाधिकारी सुधा वर्मा की ओर से जो सूचना उपलब्ध करायी गयी है उसके अनुसान इन पर 3 लाख 55 हजार से भी ज्यादा का बकाया किराया दर्शाया गया है। जानकार सूत्रों की मानें तो विभाग इन्हें भी किराया वसूली के साथ ही आवास खाली करने की नोटिसें कई बार भेज चुका है, लेकिन श्रीमती सिंह ने न तो सरकारी आवास से मोह त्यागा है और न ही लाखों का किराया ही जमा किया है।

बटलर पैलेसे कॉलोनी आवास संख्या 3/7, अंशुमान शुक्ला के नाम से आवंटित है। श्री शुक्ला को यह मकान अक्टूबर 2004 में मान्यता प्राप्त पत्रकार की हैसियत से आवंटित किया गया था। इन पर 18 हजार से भी ज्यादा का किराया बकाया है। विभाग नोटिस भेजने का दावा जरूर करता है लेकिन वसूली के नाम पर चुप्पी साध जाता है। अति विशिष्ट कालोनी में गिनी जाने वाली राजभवन कॉलोनी में शशांक शेखर त्रिपाठी जनवरी 2012 से अनाधिकृत तौर पर कब्जा जमाए हुए हैं। 12 ए-टाईप-4 संख्या का यह मकान उन्हें अक्टूबर 2007 में निर्धारित अवधि तीन वर्षों के लिए आवंटित किया गया था। प्राप्त जानकारी के मुताबिक इन पर 1 लाख 18 हजार से भी ज्यादा का किराया बकाया है।

इसी तरह से अलीगंज के सरकारी आवास (एम.जी. एम.आई.जी.) में दर्जनों की संख्या में अध्यासित कथित पत्रकारों के ऊपर किराए के रूप में लाखों रूपया बकाया है। इन्हें विभाग की ओर से कई बार नोटिसें भेजी जा चुकी हैं लेकिन न तो किराया वसूला जा सका और न ही अनाधिकृत रूप से अध्यासित पत्रकारों से आवास ही खाली करवाया जा सका। अलीगंज की सरकारी कालोनी के आवास संख्या एमजी-97 में राजधानी से प्रकाशित एक दैनिक समाचार-पत्र के पत्रकार एन. यादव का निवास है। यह मकान उन्हें जून 1989 में आवंटित किया गया था। हालांकि यह मकान उन्हें एक निर्धारित समय के लिए आवंटित किया गया था लेकिन पिछले ढाई दशक से अधिकारियों पर दबाव बनाकर ये अपना कब्जा नियमित करवाते चले आ रहे हैं। इन पर किराए के रूप में 7 हजार से भी ज्यादा का बकाया है।

एमआईजी-3 निवासी कुमार सौवीर पर किराए के रूप में 35 हजार से भी ज्यादा का बकाया है। उक्त मकान उन्हें पूर्व मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी के कार्यकाल जनवरी 1985 में आवंटित किया गया था। गौरतलब है कि इसी वर्ष पत्रकारों के हितार्थ सरकारी आवास आवंटन नियमावली बनायी गयी थी। कुमार सौवीर का लेखन से अब कोई खास रिश्ता नहीं रहा है इसके बावजूद वे सरकारी आवास का सुख भोग रहे हैं। दैनिक समाचार-पत्र से सम्बन्ध रखने वाले शोभित मिश्रा को राज्य सम्पत्ति विभाग ने अनाधिकृत घोषित कर रखा है, इसके बावजूद इनका कब्जा सरकारी आवास संख्या एम.आई.जी.-23, अलीगंज में बना हुआ है। शोभित मिश्रा फिलवक्त लखनऊ से बाहर कार्यरत हैं। इसी आधार पर विभाग ने अपने दस्तावेजों में इनका आध्यासन अवैध दिखा रखा है। यह मकान उन्हें मार्च 2009 में आवंटित किया गया था। इन पर किराए के रूप में 22 हजार से भी ज्यादा बकाया है।

इसी कॉलोनी के एमआईजी-27 में शिवशरण का अध्यासन है। ये मकान उन्हें नवम्बर 2006 में आवंटित किया गया था। इन पर 7 हजार से ज्यादा का किराया बकाया है। विभाग ने इनका अध्यासन भी अवैध घोषित कर रखा है। विभागीय अधिकारियों की मानें तो शिवशरण सिंह अब पत्रकारिता के क्षेत्र से सम्बन्ध नहीं रखते है इसी वजह से इनका आवास अनाधिकृत किया गया था। विभाग पिछले कई वर्षों से सरकारी आवास खाली करने का दबाव बना रहा है लेकिन उसे कामयाबी नहीं मिल पा रही है। वरिष्ठ पत्रकार देवकी नन्दन मिश्रा को अलीगंज की सरकारी कालोनी में एमआईजी-49 अक्टूबर 2007 में निर्धारित समय के लिए आवंटित किया गया था। समयावधि पूर्ण हो जाने के बाद इनके अध्यासन को विभाग ने अनाधिकृत घोषित कर रखा है। इन पर किराए के रूप में 7 हजार से भी ज्यादा का बकाया है।

भवन संख्या एमआईजी-59 अतुल कुमार के नाम से फरवरी 1998 मे आवंटित किया गया था। समयावधि पूर्ण हो जाने के पश्चात विभाग ने इनका अध्यासन अनाधिकृत घोषित कर रखा है लेकिन सरकारी आवास खाली करवाने के लिए कोई दबाव नहीं बनाया जा रहा है। खानापूर्ति के नाम पर विभाग की ओर से कई नोटिसें जरूर भेजी जा चुकी हैं। इन पर भी 7 हजार से ज्यादा का बकाया है। भवन संख्या एमआईजी-96 फरवरी 1991 में राजीव बाजपेयी को आवंटित किया गया था। श्री बाजपेयी अब अपना ज्यादा समय अपने निजी व्यवसाय को देते हैं। राज्य सम्पत्ति विभाग भी यह बात अच्छी तरह से जानता है कि श्री बाजपेयी का पत्रकारिता के क्षेत्र से कोई खास जुड़ाव नहीं रह गया है, फिर भी विभाग इनसे सरकारी आवास खाली करवाने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा है। श्री बाजपेयी ने किराए के रूप में लगभग 24 हजार रूपया विभाग के खाते में जमा नहीं किया है। विभाग की ओर से इन्हें नोटिस भी जारी की जा चुकी है।

एक मकान छोड़कर 98 में राम सागर रहते हैं। यह मकान उन्हें बतौर मान्यता प्राप्त पत्रकार दिसम्बर 1988 को आवंटित किया गया था। इन पर 11 हजार से भी ज्यादा का किराया बकाया है। डीएम कम्पाउण्ड कालोनी में भवन संख्या 7 देवराज को अक्टूबर 1991 में आवंटित किया गया था। इन्होंने भी लगभग 7 हजार रूपए किराए के रूप में अभी तक जमा नहीं किया है जबकि विभाग की ओर से इन्हें भी नोटिस सर्व करायी जा चुकी है। कैसरबाग स्थित सरकारी कालोनी निवासी पवन मिश्रा पर किराए के रूप में 23 हजार से भी ज्यादा बकाया है। भवन संख्या 1/1 का आवंटन इन्हें जुलाई 1990 में किया गया था। इसी तरह से इसी कालोनी में अध्यासित अशोक कुमार पर 1 लाख 55 हजार से भी ज्यादा किराया बकाया है। अशोक कुमार को यह मकान (1/16) अप्रैल 1998 में आवंटित किया गया था।

इसी कालोनी में भवन संख्या 2/7 अमान अब्बास के नाम से आवंटित है। यह मकान उन्हें अगस्त 2006 में आवंटित किया गया था। इन पर भी किराए के रूप में 1 लाख 52 हजार से ज्यादा का बकाया राज्य सम्पत्ति निदेशालय के रिकार्ड में दर्शाया गया है। उपरोक्त नाम तो उन बडे़ बकायेदारों के हैं जिन्हें विभाग ने अनेकों बार किराया वसूली और अनाधिकृत रूप से अध्यासित भवनों को खाली करने की नोटिस जारी कर रखी है, जबकि इससे कहीं ज्यादा संख्या में ऐसे पत्रकारों की लम्बी फेहरिस्त है जो नियमानुसार मकान का किराया जमा नहीं कर रहे हैं। इसके बावजूद राज्य सम्पत्ति विभाग की चुप्पी रहस्यमयी बनी हुई है। विभाग के ही एक अधिकारी ने नाम प्रकाशित न करने की शर्त पर बताया कि ज्यादातर कथित दागी पत्रकार या तो पत्रकारिता का पेशा छोड़कर दूसरे व्यवसायों में लग गए हैं या फिर उनका लखनऊ से तबादला हो चुका है। इसके बावजूद वे सरकारी मकानों से कब्जा नहीं छोड़ रहे हैं।

इन अधिकारी का कहना है कि ऐसे पत्रकारों को बकायदा विभाग की ओर से दर्जनों बार नोटिसें भी भेजी जा चुकी हैं लेकिन किसी के खिलाफ सख्त कदम नहीं उठाया जा सका है। इन अधिकारी की मानें तो राज्य सरकारें भी पत्रकारों से बैर लेने को इच्छुक नहीं हैं। यही वजह है कि जब कभी विभाग दबाव बनाता है तो उच्च स्तर से फोन घनघनाने लगते हैं। विभाग के ही एक कर्मचारी का तो यहां तक कहना है कि कुछ पत्रकार सरकारी आवासों को गेस्ट हाउस के तौर पर इस्तेमाल करते आ रहे हैं, जबकि उनका निजी आवास राजधानी लखनऊ में पहले से ही बना हुआ है। कुछ आवासों में तो गैरकानूनी कार्यों की सूचना भी मिला करती है, लेकिन अधिकारियों से नजदीकी का सम्बन्ध रखने वाले पत्रकारों के खिलाफ विभाग कार्रवाई करने की हिम्मत नहीं जुटा पाता।

इस कर्मचारी का दावा है कि यदि औचक छापेमारी की जाए तो निश्चित तौर पर ऐसे मामले सामने आयेंगे जो सरकार ही नहीं बल्कि प्रदेश की खुफिया एजेंसियों के लिए भी चौंकाने वाले होंगे। कर्मचारी के मुताबिक पत्रकारों को आवंटित सरकारी आवासों में अपराधी से लेकर दलालों तक ने अपना ठिकाना बना रखा है। यदि यह कहा जाए कि पत्रकारिता की आड़ में कुछ पत्रकार सरकारी आवासों का नाजायज इस्तेमाल कर रहे हैं तो कुछ गलत नहीं होगा। हालांकि इस सम्बन्ध में राज्य सम्पत्ति विभाग ने एक जांच रिपोर्ट उच्चाधिकारियों के पास पहले से भेज रखी है लेकिन दूर-दरू तक किसी के खिलाफ सख्त कार्रवाई के आसार नजर नहीं आते। न तो लाखों के बकायेदरों पर शिकंजा कसा जा रहा है और न ही अनाधिकृत रूप से कब्जेदारों के खिलाफ ही कार्रवाई की जा रही है। अधिकारियों का तो यहां तक कहना है कि यदि ऐसा ही चलता रहा तो एक समय ऐसा आयेगा कि फर्जी पत्रकारों का सरकारी आवासों पर पूरी तरह से कब्जा हो जायेगा और वास्तविक हकदारों को सुविधा नहीं मिल पायेगी। 

राज्य सम्पत्ति निदेशालय की देख-रेख वाली सरकारी कॉलोनियों में तथाकथित पत्रकारों का मकड़जाल इतना सशक्त है कि सम्बन्धित विभाग चाहते हुए भी ऐसे पत्रकारों के खिलाफ कार्रवाई नहीं कर पा रहा है। ऐसे पत्रकारों की संख्या अनगिनत है जिन्होंने न तो वर्षों से किराया जमा किया है और न ही वे मकान खाली करने को तैयार है। सरकारी मकान आवंटन के समय जिस ‘पत्रकार आवास आवंटन नियमावली-1985’ के तहत पत्रकारों से हस्ताक्षर करवा कर सरकारी मकानों की चाबी उन्हें सौंपी जाती है उस नियमावली का पालन कुछ अपवाद स्वरूप पत्रकारों को छोड़कर कोई नहीं करता। शासनादेश में राज्य सम्पत्ति अधिकारी को ऐसे पत्रकारों से मकान खाली करवाने के लिए अधिकार दिए गए हैं, लेकिन अधिकारी पत्रकारों से बैर नहीं लेना चाहते। अधिकारी ऐसे पत्रकारों को बेईमान बताकर अपनी भड़ास निकाल लेते हैं तो दूसरी ओर बकाएदार पत्रकार ‘चोरी और ऊपर से सीनाजोरी’ की तर्ज पर पूरे राज्य सम्पत्ति विभाग को ही भ्रष्ट बताकर पल्ला झाड़ रहे हैं।

जनवरी माह में इलाहाबाद उच्च न्यायालय की खण्डपीठ ने पत्रकारों को सरकारी आवास उपलब्ध कराए जाने के मामले में राज्य सरकार से जवाब-तलब किया था। अधिवक्ता हरिशंकर जैन की ओर से दायर जनहित याचिका पर न्यायमूर्ति इम्तियाज मुर्तजा और न्यायमूर्ति देवेन्द्र कुमार उपाध्याय की खण्डपीठ ने राज्य सरकार से पूछा था, ‘बताएं किस नियम के तहत पत्रकारों को सरकारी भवन अथवा आवास आवंटित किए जाते हैं’। पीठ ने राज्य सम्पत्ति विभाग सहित अन्य पक्षकारों से भी जवाब-तलब किया था। उत्तर-प्रदेश सरकारी कर्मचारी नियमावली 1980 में कहीं भी पत्रकारों को सरकारी आवास मुहैया कराए जाने का प्राविधान अंकित नहीं है। इस याचिका के खिलाफ सरकार की ओर से पक्ष रखते हुए कहा गया था कि पत्रकारों के हितार्थ पूर्व मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी के कार्यकाल में 1985 में पत्रकार आवास आवंटन नियमावली बनायी गयी थी। उसी के आधार पर पत्रकारों को सरकारी आवासों की सुविधा प्रदान की जाती है। राज्य सरकार ने याचिका के खिलाफ राहत तो पा ली लेकिन नियमावली का उल्लंघन करने वाले पत्रकारों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की।

यह आर्टकिल लखनऊ से प्रकाशित दृष्टांत मैग्जीन से साभार लेकर भड़ास पर प्रकाशित किया गया है. इसके लेखक तेजतर्रार पत्रकार अनूप गुप्ता हैं जो मीडिया और इससे जुड़े मसलों पर बेबाक लेखन करते रहते हैं. वे लखनऊ में रहकर पिछले काफी समय से पत्रकारिता के भीतर मौजूद भ्रष्‍टाचार की पोल खोलते आ रहे हैं.

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सत्ता और जनता के बीच सेतु का काम करने वाली मीडिया राज्य सरकारों के समक्ष नायक और निर्णायक की भूमिका में रही है, लेकिन पिछले दो दशकों के दौरान मीडिया से जुड़े ज्यादातर पत्रकारों के बीच उपजी लालसा ने उसकी गरिमा को खासी चोट पहुंचायी है। सरकारी लाभ लेने से लेकर अवैध उगाही में लिप्त कथित धंधेबाज पत्रकारों ने मीडिया के दायित्वों और उसके मिशन को अर्श से फर्श पर ला पटका है।

यूपी की राजधानी लखनऊ में हालात अत्यधिक खराब हैं। यहां सरकार से लाभ लेने के साथ ही सैकड़ों की संख्या में ऐसे पत्रकार भी हैं जो किसी न किसी रूप में सरकार के अहसान तले दबे हैं। ऐसा ही एक मामला सरकारी मकानों में अध्यासित बकाएदार कथित पत्रकारों के रूप में सामने आया। सैकड़ों की संख्या में पत्रकार ऐसे हैं जिन्होंने वर्षों से किराया जमा नहीं किया है, इसके बावजूद वे न सिर्फ सरकारी मकानों में जमे बैठे हैं बल्कि सरकारी खर्च से रखरखाव के लिए अक्सर दबाव बनाते भी देखे जाते हैं। कुछ पत्रकारों ने तो बकायदा अपने मकानों में एक या दो कमरे किराए पर दे रखे हैं, इसके बावजूद किराए की मामूली रकम चुकाने में असमर्थता जताते हैं।

इस बात की जानकारी राज्य सम्पत्ति विभाग के अधिकारियों को भी है। इन अधिकारियों की मानें तो ऐसे पत्रकार मामूली किराया देने में समर्थ तो हैं लेकिन वे देना नहीं चाहते। दबाव बनाने पर कुछ पत्रकार तो उलटा उन्हीं पर आरोप लगाने लगते हैं। यहां तक कि सरकार को भ्रष्ट बताते हुए कहते हैं कि जब सरकार अरबों का घोटाला कर रही है तो कुछ पत्रकारों ने यदि सरकारी खजाने को हजारों की चोट पहुंचा भी दी तो क्या अनर्थ हो गया। यह मामला कोई नया नहीं है। वर्षों पुराना यह मामला इसलिए मीडिया की सुर्खियां नहीं बन सका क्योंकि हमाम में सभी नंगे हैं। ज्यादातर कथित वरिष्ठ पत्रकार राज्य सरकार के अहसानों तले दबे हैं इसलिए ऐसे समाचारों को वे महत्व नहीं देते। गौरतलब है कि कुछ मामलों में तो न्यायालय ने भी हस्तक्षेप कर राज्य सरकार से उचित कार्रवाई की अपेक्षा की थी लेकिन पत्रकारों को सरकारी सुविधा की गुलामी में जकड़कर अपना हित साधने वाली राज्य सरकारों ने तथाकथित भ्रष्ट पत्रकारों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की।

राजधानी लखनऊ में अब ऐसे तथाकथित पत्रकारों की संख्या में लगातार इजाफा होता जा रहा है जिनका सम्बन्ध भले ही लेखन क्षेत्र से न जुड़ा हो लेकिन अपना हित साधने की गरज से सत्ता और नौकरशाही के साथ उनके सम्बन्ध चर्चा का विषय जरूर बने हुए हैं। चर्चा इस बात की भी है कि आखिर नौकरशाही और नेताओं की मंडली किस लाभ के लिए ऐसे तथाकथित पत्रकारों को अपना संरक्षण दे रही है जिनका सम्बन्ध न तो उनके कथित प्रोफेशन से है और न ही सामाजिक सरोकारों से।

नौकरशाही के बीच मधुर सम्बन्धों का दावा करने वाले पत्रकारों की हैसियत का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि उनके खिलाफ तमाम शिकायतों के बावजूद उच्चाधिकारी जिंदा मक्खी निगलने को विवश हैं। चाहें सरकारी बंगलों का सुख देने की गरज से राज्य सरकार के नियम-कानूनों की धज्जियां उड़ाने का मामला हो या फिर देश की सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों को ठेंगा दिखाने का मामला। शासन-प्रशासन ऐसे तथाकथित पत्रकारों को संरक्षण देने की गरज से हर सीमा को पार करता जा रहा है। ऐसा ही एक मामला पिछले दिनों संज्ञान में आया।

हालांकि तथाकथित पत्रकार हेमंत तिवारी से जुड़ा यह मामला लगभग 7 वर्ष पूर्व अक्टूबर 2007 का है लेकिन उच्चाधिकारियों के मौखिक आदेश पर यह मामला लगातार दबाया जाता रहा। उस पर तुर्रा यह है कि जब अधिकारी ही नहीं चाहते कि उक्त कथित पत्रकार के खिलाफ कार्रवाई हो तो न्यायपालिका के निर्देश क्या कर लेंगे। चूंकि यह मामला न्यायपालिका के आदेशों की अवहेलना से जुड़ा हुआ है लिहाजा यह प्रकरण गंभीर प्रवृत्ति की श्रेणी में आता है। यह बात राज्य सरकार के जिम्मेदार अधिकारी भी भलीभांति जानते हैं कि जब सुब्रत राय सरीखे लोगों को न्यायपालिका के उल्लंघन मामले में जेल जाना पड़ सकता है तो उच्चाधिकारियों की क्या बिसात।

प्राप्त जानकारी के अनुसार तथाकथित पत्रकार व राज्य मुख्यालय मान्यता समिति के अध्यक्ष हेमंत तिवारी बटलर पैलैस बी-7 में अध्यासित होने से पूर्व इसी वीआईपी कॉलोनी के भवन संख्या सी-76 में अध्यासित थे। हेमंत तिवारी को आवंटित यह मकान काफी समय तक विभाग की ओर से अनाधिकृत कब्जे के रूप में घोषित था। विभाग का कहना था कि चूंकि श्री तिवारी 1 नवम्बर 2001 से लखनऊ से बाहर थे लिहाजा उनका आवंटन रद्द कर दिया गया था लेकिन उन्होंने मकान पर से अपना कब्जा नहीं छोड़ा था। इसी कारण से राज्य सम्पत्ति विभाग ने उनका अध्यासन अनाधिकृत घोषित कर दिया था। प्राप्त जानकारी के मुताबिक विभाग ने कई बार इन्हें नोटिस भी भेजा लेकिन न तो इनकी तरफ से कोई जवाब आया और न ही मकान से कब्जा छोड़ा।

तथाकथित पत्रकार हेमंत तिवारी की हठधर्मिता से क्षुब्ध सम्बन्धित विभाग के अधिकारियों के निर्देश पर विहित प्राधिकारी द्वारा उक्त अवधि का बकाया किराया चार लाख, पांच हजार, आठ सौ बाईस (04,05,882.00) रूपया दण्डात्मक किराए के रूप में अंकित करते हुए वर्ष 2003 में उनके विरूद्ध बेदखली के आदेश भी पारित कर दिए थे। जानकारी के मुताबिक इससे पूर्व वे पूर्णकालिक पत्रकार के रूप में भी कार्यरत नहीं थे। 16 अगस्त 2004 को सूचना एवं जनसम्पर्क विभाग, लखनऊ ने इन्हें पूर्णकालिक पत्रकार के रूप में मान्यता प्रदान की। सूचना विभाग के एक कर्मचारी का कहना है कि श्री तिवारी ने रिकार्ड के मुताबिक 2003 में लखनउ में वापस आना सूचित किया था। साथ ही श्री तिवारी ने राज्य सम्पत्ति विभाग में दूसरा मकान आवंटित करने का प्रार्थना पत्र दिया जबकि सम्बन्धित विभाग बिना वसूली के दूसरा मकान आवंटित करने के पक्ष में नहीं था।

इधर किराए की वसूली और दूसरे मकान के आवंटन को रोकने के लिए दाखिल सिविल अपील संख्या-4064/04 एसडी वादी बनाम डिवीजनल टै्फिक आफीसर के.एस.आर.टी.सी. दाखिल की गयी थी। 31 जुलाई 2007 को उक्त अपील में माननयी सर्वोच्च न्यायालय ने इस आशय का निर्णय दिया था कि श्री तिवारी के प्रश्नगत आवास के पुर्नआवंटन के प्रार्थना-पत्र पर तब तक आदेश पारित न किए जाएं जब तक वे विहित प्राधिकारी द्वारा निर्धारित दण्डात्मक किराए की धनराशि रूपये चार लाख, पांच हजार, आठ सौ बाईस रूपए जमा न कर दें। गौरतलब है कि श्री तिवारी को पूर्व में आवंटित आवास संख्या सी-7 बटलर पैलेस के नवीनीकरण/ पुर्नआवंटन के सम्बन्ध में दो बिन्दुओं पर विचार किया जाना प्रस्तावित था।

प्रथम हेमंत तिवारी ने सम्बन्धित विभाग को जो सूचना दी थी उसके कथनानुसार उनके अमृत प्रभात समाचार पत्र के ब्यूरों में दिनांक 5 जनवरी 2003 से 15 जुलाई 2004 तक प्रमुख संवाददाता लखनऊ के पद पर रहने की अवधि को विनियमित करते हुए उक्त अवधि में सामान्य दर से किराया निर्धारित किया जाना। द्वितीय 16 अगस्त 2004 से वाद दाखिल किए जाने के समय तक अनाधिकृत अवधि में श्री तिवारी राज्य मुख्यालय पर स्वतंत्र पत्रकार के रूप में मान्यता प्राप्त भी रहे हैं। लिहाजा उक्त अवधि को विनियमित मानते हुए सामान्य दर पर किराया निर्धारित किया जाना चाहिए था। इन प्रश्नों को आधार मानते हुए विभाग ने भी सख्त कदम उठाते हुए कहा था कि जब तक श्री तिवारी उक्त रकम अदा नहीं कर देते तब तक उन्हें न तो कोई नया सरकारी मकान आवंटन किया जायेगा और न ही उसी आवंटन का नवीनीकरण ही किया जायेगा।

चौंकाने वाला पहलू यह है कि सर्वोच्च न्यायालय के सख्त आदेश और विभागीय अधिकारियों की सख्ती के बावजूद हेमंत तिवारी से किराया तो नहीं वसूला जा सका अपितु उन्हें उसी वीआईपी कॉलोनी में नियमों को ताक पर रखते हुए दूसरा मकान जरूर आवंटित कर दिया गया। चूंकि यह मामला सीधा उच्चाधिकारियों के हस्तक्षेप से जुड़ा हुआ था लिहाजा विभागीय अधिकारी चाहकर भी हेमंत तिवारी से दंडात्मक किराया वसूल नहीं कर सके।

बकौल विभागीय अधिकारी/कर्मचारी, ‘‘यदि उच्च स्तर पर दबाव न पडे़ तो हेमंत तिवारी जैसे तथाकथित पत्रकार से बकाए की वसूली हो सकती है। इतना ही नहीं बी-7 बटलर पैलेस के सरकारी आवास से भी उन्हें बलपूर्वक बेदखल किया जा सकता है’’। अधिकारियों की मानें तो फिलवक्त श्री तिवारी पर एक विवादित उच्चाधिकारी का संरक्षण है। हाल ही में हेमंत तिवारी की ‘मैरिज एनीवर्सरी’ पर जिस तरह से उच्च पदस्थ नौकरशाही का हुजूम एकत्र था उसे देखकर तो ऐसा ही लगता है कि नौकरशाही के बीच इस तथाकथित पत्रकार की अच्छी पैठ है। चर्चाओं को आधार मानें तो प्रदेश सरकार ने लखनऊ के पत्रकारों को साधने की गरज से हेमंत तिवारी के रूप अपने मोहरे को पत्रकारों के बीच स्थापित कर रखा है ताकि सरकार के खिलाफ समाचारों पर अंकुश लग सके। उनकी मैरिज एनीवर्सरी में अधिकारियों के हुजूम को देखते हुए सम्बन्धित विभाग का कोई भी अधिकारी श्री तिवारी के खिलाफ आवाज उठाने की हिम्मत नहीं कर पा रहा है।

यह आर्टकिल लखनऊ से प्रकाशित दृष्टांत मैग्जीन से साभार लेकर भड़ास पर प्रकाशित किया गया है. इसके लेखक तेजतर्रार पत्रकार अनूप गुप्ता हैं जो मीडिया और इससे जुड़े मसलों पर बेबाक लेखन करते रहते हैं. वे लखनऊ में रहकर पिछले काफी समय से पत्रकारिता के भीतर मौजूद भ्रष्‍टाचार की पोल खोलते आ रहे हैं.

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