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2013 में गिरते रुपये पर छाती पीटने वाले सुधीर, अंजना, स्मिता को अब साँप सूँघ गया क्या?

डॉलर के मुकाबले रुपये की ऐतिहासिक गिरावट ने बाजार से लेकर आम जनता तक की चिंता बढ़ा दी है। भारतीय करेंसी 90 के पार पहुंच चुकी है, लेकिन हैरानी की बात यह है कि वही चेहरे, जो कभी तत्कालीन सरकारों पर इसी मुद्दे पर तंज कसते थे, आज पूरी तरह चुप हैं।

ध्यान देने वाली बात यह है कि सुधीर चौधरी ने रुपये–डॉलर एक्सचेंज रेट पर आख़िरी ट्वीट 2013 में किया था। तब यह उनका पसंदीदा मुद्दा था—गिरता रुपया, कमजोर अर्थव्यवस्था, सरकार की नीतियों पर तीखा प्रहार। लेकिन आज, जब रुपया रिकॉर्ड स्तर पर फिसल गया है, सुधीर की टाइमलाइन शांत है।

कारण साफ है—अब वे सरकार-फंडेड चैनल का हिस्सा हैं। ऐसे में अपने ही मालिकों पर उंगली उठाना उनके लिए संभव नहीं। यही स्थिति सिर्फ सुधीर की नहीं है। स्मिता प्रकाश और अंजना ओम कश्यप जैसे नाम, जो पहले आर्थिक मुद्दों पर मुखर रहती थीं, अब रुपये के गिरने पर एक शब्द नहीं बोल रहीं।

सोशल मीडिया पर सवाल उठ रहे हैं—

  • क्या रुपये की गिरावट पर सवाल सिर्फ विपक्षी सरकारों के खिलाफ राजनीतिक हथियार था?
  • क्या पत्रकारिता का पेशा सत्ता के हितों का प्रवक्ता बनकर रह गया है?

जब अर्थव्यवस्था की सेहत पर गंभीर चर्चाओं की जरूरत है, तब देश के सबसे ज़्यादा दिखने वाले टीवी चेहरे चुप्पी साधे बैठे हैं। यह चुप्पी सिर्फ सवाल ही नहीं, एक प्रवृत्ति भी उजागर करती है—जो सत्ता के साथ खड़ा है, वह सच के साथ खड़ा नहीं रह पाता।

रुपया गिर रहा है, लेकिन सवाल उठाने की हिम्मत उससे भी ज्यादा तेज़ी से गिर चुकी है।


मोहम्मद जुबेर-

2013 में आख़िरी बार सुधीर चौधरी ने रुपये–डॉलर के भाव पर ट्वीट किया था। लेकिन अब हालात बदल चुके हैं।

सरकारी फंडिंग वाले न्यूज़ चैनलों में काम करते हुए वे अपने मालिकों के ख़िलाफ़ एक शब्द भी नहीं बोल सकते—अब रुपये की गिरावट पर सवाल उठाना उनके लिए ‘लग्ज़री’ नहीं, ‘रिस्क’ बन गया है।


गोदी मीडिया की एंकराईन पापा की परी पहले डॉलर पर खूब बोलती थी। अब डॉलर के मुकाबले रुपया 90 के पार पहुँच गया है फिर भी इनका मुँह बंद है! क्यों? – निगार परवीन

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