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संचार साथी ऐप का मुख्य फीचर ‘चक्षु’ नए सवाल खड़े कर रहा है!

दूरसंचार मंत्रालय के संचार साथी ऐप को लेकर विवाद के बीच अब इसकी वेबसाइट पर मौजूद आधिकारिक जानकारी कई नए सवाल खड़े कर रही है। ऐप का मुख्य फीचर ‘चक्षु’, जिसे बड़े प्रचार के साथ “फ्रॉड पहचानने का टूल” कहा जा रहा था, असल में अपनी सीमाओं को खुद ही जाहिर करता दिख रहा है।

वेबसाइट साफ़ कहती है कि यह प्लेटफॉर्म वित्तीय ठगी या साइबर अपराध की शिकायत दर्ज करने के लिए बना ही नहीं है। यानी, अगर किसी नागरिक का पैसा धोखे से चला गया है या वह किसी बड़े साइबर क्राइम का शिकार हुआ है, तो संचार साथी उसके लिए कोई मददगार नहीं—उसे अलग से 1930 हेल्पलाइन या साइबरक्राइम पोर्टल पर जाना ही पड़ेगा।

ऐसे में बड़ा सवाल यह उठता है कि फिर संचार साथी आखिर किस काम का है?

वेबसाइट के अनुसार, ‘चक्षु’ केवल संदिग्ध कॉल, एसएमएस या व्हाट्सऐप संदेशों की रिपोर्टिंग के लिए है—और वह भी सिर्फ संभावित ठगी के मामलों में। यानी असली अपराध हो जाने पर इस ऐप की भूमिका लगभग शून्य है।

स्पैम और अनचाहे विज्ञापन (UCC) की शिकायतों के मामले में भी यही ढिलाई दिखती है। TRAI नियमों के मुताबिक 7 दिन के भीतर की गई शिकायतों पर कार्रवाई संभव है, लेकिन 7 दिन बाद की शिकायतें केवल “डेटा” बनकर रह जाती हैं—किसी ठोस कार्रवाई की गारंटी नहीं।

मैलिशियस लिंक और फिशिंग रिपोर्टिंग वाला सेक्शन कागज़ी तौर पर उपयोगी दिखता है, लेकिन ऐप की बढ़ती अनिवार्यता और इसकी रिपोर्टिंग सीमाओं ने कई लोगों में संदेह पैदा कर दिया है कि यह टूल वास्तविक सुरक्षा से ज्यादा निगरानी का हथियार बन सकता है।

सरकार इसे डिजिटल सुरक्षा की दिशा में बड़ी पहल बता रही है, लेकिन अब विरोधियों का तर्क है कि भूमिका अस्पष्ट, असर सीमित और इरादा संदिग्ध—तीनों मिलकर ऐप की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं।


इस प्रकरण पर प्रतिक्रिया देते हुए पत्रकार सौमित्र राय लिखते हैं-

संचार साथी ऐप में चक्षु की सुविधा लोगों को साइबर फ्रॉड से नहीं बचाएगी। आपको थाने ही जाना होगा। ऐसे में साइबर सुरक्षा के नाम पर संचार साथी को 100 करोड़ मोबाइल में डलवाने का मकसद जासूसी के सिवा कुछ हो नहीं सकता।

इस ऐप में अभी ही इतने ज्यादा परमिशन है तो सोचिए, जब इसके प्री–इंस्टॉल्ड वर्जन में अपडेट्स होंगे तो क्या ही बच पाएगा।

किसी के साथ, कभी भी भीमा कोरेगांव हो सकता है। बिना आपके जाने।


1 सितंबर 2025. यही वह तारीख है, जब रूस में सभी मोबाइल फोन में सरकार नियंत्रित मैसेजिंग मैनेजमेंट ऐप, यानी MAX को प्री–इंस्टॉल करना अनिवार्य कर दिया गया।

रूस में पुतिन की निरंकुश सत्ता है। इसलिए कोई कुछ नहीं बोला। रूसी चुप रहने के आदी हो चले हैं। MAX से रूसी सुरक्षा एजेंसी FSB लोगों के कॉल, लोकेशन, टेक्स्ट मैसेज और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स का डेटा हासिल कर सकती है।

ये जासूसी है। पुतिन को जासूसी इसलिए करनी पड़ती है, ताकि वहां लोकतंत्र समर्थक बगावत न कर दें। भारत में भी निरंकुश सत्ता है। वोट चोरी से इंच–दर–इंच लोकतंत्र को निगलती सत्ता।

यह सत्ता नेपाल, बांग्लादेश, श्रीलंका जैसे हालात से डरती है। रूस के बाद भारत ने इसी साल सितंबर में संचार साथी ऐप का रिव्यू करवाया था।

तब किसी को भी सत्ता की मंशा समझ नहीं आई। लेकिन मोदी सत्ता तो पर्दे के पीछे सितंबर 2019 में ही खेला कर चुकी थी। तब अमित शाह ने NATGRID की समीक्षा की थी।

यह भारत का वह डेटाबेस है, जिसमें सोशल मीडिया अकाउंट से लेकर आपके होटल में रुकने तक का डेटा है। अब जल्दी ही यह डेटा अदानी के डाटा सेंटर के हवाले होगा। फिर आप अदानी का A नहीं बोल पाएंगे।

दो हफ्ते पहले मोदी सत्ता ने DPDP एक्ट को संशोधित किया। इसके नियम 23 में राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर किसी भी सेवा प्रदाता से सत्ता आपके सारे डाटा मांग सकती है। इसी एक्ट में सत्ता और उसकी दोस्त प्राइवेट कंपनियों को पारदर्शिता से बचाया भी गया है।

2023 में 81.5 करोड़ आधार के डेटा डार्क वेब को करोड़ों में बेचे गए। आरोग्य सेतु ऐप आपका हर डेटा चुराकर प्राइवेट कंपनी को बेच चुका है। आपका कुछ भी अपना नहीं है।

अब ये फाइनल चोरी है, जो आपके मोबाइल में घुसकर आपको हमेशा के लिए खामोश कर देगी। भारत ऐसे ही निरंकुश देश नहीं बनेगा।


अजीत भारती-

कोई भी सरकार यदि कोई भी एप्प, जो व्यक्ति के फोन का लोकेशन, कीबोर्ड, कैमरा, माइक आदि एक्सेस कर सकता है, जबरन फोन में डालना चाहती है तो उसका विरोध होना चाहिए।

यह सरकार द्वारा हर नागरिक को ट्रैक करने का एक माध्यम है। फोन चोरी होने से बचाने के एप्प वैकल्पिक होने चाहिए, सरकार ऐसा कर कैसे सकती है?

‘संचार साथी’ के नाम पर @DoT_India फोन के माध्यम से नागरिकों की प्राइवेसी भेदना चाहती है। यह अनुचित है। ऐसा एप्प जो आपका कैमरा, आप किससे बात करते हैं, क्या बात करते हैं, कौन से एप्प चलाते हैं, आप कहाँ जाते हैं, कितनी बार जाते हैं आदि आधिकारिक तौर पर सुनने-देखने लगे तो सरकार केवल आपके खोए फोन को ढूँढना नहीं चाहती, वह आप पर नियंत्रण करना चाहती है।

सरकार पगला गई है।


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