संत रामपाल : ….यूं ही कोई इतना लोकप्रिय नहीं हो सकता!

मैं संत रामपाल को नहीं जानता न ही उनके दर्शन और अध्यात्म की उनकी व्याख्या से। पर वे खुद कहते हैं कि वे हिंदू नहीं हैं और खुद को ही परमेश्वर मानते हैं। हिंदुओं के लगभग सभी सेक्ट उनके खिलाफ हैं खासकर आर्य समाज से तो उनकी प्रतिद्वंदिता जग जाहिर है। वे कबीर साहब के आराधक हैं और मानते हैं कि वे इस दुनिया में आने वाले पहले गुरु थे। इसमें कोई शक नहीं कि संत रामपाल अपार लोकप्रिय हैं। उनके भक्त उनके लिए अपनी जान तक दे सकते हैं। संत परंपरा वैदिक अथवा ब्राह्मण परंपरा नहीं है। संत परंपरा श्रावक व श्रमण परंपरा तथा पश्चिम के सेमेटिक दर्शनों का घालमेल है। पर जो व्यक्ति संत की पदवी पा जाता है उसके भक्त उसको ईश्वर अथवा ईश्वर का दूत मानने लगते हैं।

वैदिक परंपरा ईश्वर को नकारती है। पर संत रामपाल के भक्त कोई चतुर, सुजान अथवा अपराधी प्रवृत्ति के नहीं हैं। वे सामान्य मानव हैं और अपने को सताए जाने से दुखी हैं। वे किसी आध्यात्मिक शक्ति की खोज में हैं जो उनके कष्ट समाप्त कर सके। संत रामपाल ने उन्हें कोई राह तो दिखाई होगी वर्ना यूं ही कोई इतना लोकप्रिय नहीं हो सकता। पर यहां यह बात मैं जरूर कहूंगा कि भले संत रामपाल ईश्वर हों लेकिन चूंकि वे इस मानवी दुनिया में और वह भी ईश्वर की भूमि कहे जाने वाले भारत में प्रकट हुए हैं इसलिए उन्हें यहां के सारे गुण-दोष मानने पड़ेंगे। मसलन संत जी को भारतीय संविधान, कानून और नियम सब मानने पड़ेंगे। वे संविधानेतर नहीं हैं इसलिए उन्हें कोर्ट के समक्ष प्रकट होना चाहिए। उन्हें भारत की न्यायपालिका पर भरोसा होना चाहिए। तब ही वे अपने को परमेश्वर के रूप में और स्थापित कर पाएंगे।

वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ल के फेसबुक वॉल से.

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