संत रामपाल का आरोप- जेल सुपरिंटेंडेंट 50 लाख रुपये मांग रहा है

सतलोक आश्रम के संचालक रामपाल ने मीडिया के सामने सीधे जेल सुपरिंटेंडेंट पर 50 लाख रुपये की फिरौती मांगने का आरोप लगाया है। रामपाल ने कहा कि उसे तकलीफ है कि जिस अधीक्षक ने उससे फिरौती मांगी थी, उसे ही उस जेल का अधीक्षक बना दिया गया है। उसने कहा कि पुलिस ने जो चालान पेश किया है, वह बनावटी और झूठा है। चालान में जो लिखा गया है, सब पुलिस का मनघड़ंत है।

रामपाल को सतलोक आश्रम के प्रवक्ता राजकुमार, पुरुषोत्तम सहित 9 लोगों को चार मुकदमों में मंगलवार को जेएमआईसी की कोर्ट में पेश किया गया। जेएमआईसी प्रतीक जैन ने मुकदमा नंबर 427 में रामपाल को अब 9 मार्च तक पेश होने के निर्देश दिए हैं। मुकदमा नंबर 429, 430 और 443 में रामपाल और उसके अनुयायियों की 10 मार्च को पेशी होगी। 429 नंबर मुकदमे में 9 मार्च को रामपाल को कोर्ट के समक्ष पेश होना पड़ेगा, जबकि अन्य मुकदमों में रामपाल और उसके अनुयायियों की वीसी से पेशी होगी।

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शिवम भट्ट से मेरी वो पहली और आखिरी मुलाकात

मैं शिवम भट्ट को नहीं जानता था, पहली और आखिरी मुलाकात हिसार के बरवाला में हुई थी, जब रामपाल दास के सतलोक आश्रम का विवाद चल रहा था। सभी पत्रकारों को आश्रम से तकरीबन एक किलोमीटर दूर बैरिकेट्स लगाकर रोक दिया गया था। जिस कारण सभी न्यूज चैनल के पत्रकार उसी बैरिकेट्स से अपना लाइव दे रहे थे। उनमें से मैं भी एक था।

जैसे ही मेरा लाईव खत्म हुआ, मेरे पास आकर उसने कहा- भैया आप रामपाल के बारे में शायद काफी जानते हैं. मैने कहा-हां, मैं रोहतक का रहने वाला हूं और रामपाल का आश्रम विवाद वहीं से शुरू हुआ था, इसको मैंने कई बार कवर किया है, इसलिए इसके अतीत के बारे में कुछ जानकारी है।

फिर क्या था, उसने तकरीबन आधे घंटे तक रामपाल की सारी कहानी मेरे से पूछ ली और कहा कि थैंक्यू भैया, अब मुझे कोई दिक्कत नहीं होगी, क्योंकि विवाद के असली कारण का पता चल गया और रामपाल के इतिहास का भी।

ये सामान्य-सी बात है, जो मेरे और शिवम के बीच हुई थी, लेकिन इसका जिक्र इसलिए कर रहा हूं कि शिवम ने सबसे पहले बरवाला पहुंचते ही रामपाल दास के बारे में अपनी नालेज को अपडेट किया। वरना वहां पर दिल्ली के बहुत-से ऐसे स्वयंभू पत्रकार भी पहुंचे थे, जिन्हें ये तक नहीं पता था कि रामपाल दास कौन है और उसका आखिर विवाद क्या है। पहुंचते ही पीपली लाईव की तरह लग गए पूरी दुनिया के सामने अपना ज्ञान झाड़ने।

आज शिवम हमारे बीच में नहीं है..भगवान उनके परिवार को दुख सहने का सामथ्र्य दे। हम तो सिर्फ अफसोस ही जता सकते हैं।

धीरेन्द्र कुमार
रोहतक।
09813172122
dhiru.haryana@gmail.com

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हिसार लाठीचार्ज में घायल पत्रकार मुआवजे के लिए सुप्रीम कोर्ट पहुंचे

नई दिल्ली: हिसार के बरवाला में सतलोक आश्रम से रामपाल की गिरफ्तारी से जुड़ी पुलिसिया कार्रवाई में घायल हुए पत्रकार विकास चंद्रा की हालत इतनी खराब हो गई है कि उन्हें आईसीयू में भर्ती कराया गया है। इस घटना में घायल अन्य चार पत्रकार ने घटना के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की है। पत्रकारों ने मामले की जांच कराने और मुआवजे देने के लिए यह अपील की है।

अपनी अपील में पत्रकारों ने कहा कि लोकतंत्र के चौथे स्तंत्र मीडिया पर पुलिस द्वारा हमला किया गया है। उन्होंने कहा कि मुजफ्फरनगर दंगों के दौरान एक टीवी पत्रकार को गोली मार दी गई। हिसार में बिना किसी वजह के पुलिस ने मीडियावालों पर लाठी चार्ज किया जिसमें कई पत्रकार घायल हो गए और कई कैमरे और कीमती सामान टूट गए। अपील में कोर्ट से अपेक्षा की गई है कि मीडिया गाइड लाइंस तैयार हों जिससे मीडिया ऐसी घटनाओं में निशाना न बनें।

इसी मामले पर Ayush Kumar कुमार अपने फेसबुक वॉल पर लिखते हैं: ” …अब मुद्दे की बात, हल्ला बोल जरूरी है। तस्वीर में दिख रहे व्यक्ति विकाश चन्द्रा सर हैं। ये लाइव इंडिया से जुड़े हैं। बेवजह नपुंसकों द्वारा पिटाई किये जाने की वजह से अस्पताल मे हैं। क्या अब यह मुद्दा उठाना सही नहीं होगा कि कौन से लोकतंत्र में उसके चौथे स्तम्भ के पहरेदार को 20-20 पुलिस वाले डंडों की बरसात करते हैं? कुछ तो करना होगा हमें… यदि चुप रहे तो कायरता होगी… क्या सोशल मीडिया में हल्ला बोल किया जाये या कुछ और? इन सबके बीच सही मीडिया के पक्ष में हमेशा खड़े होने वाले Yashwant Singh सर से मीडिया जगत को बहुत उम्मीद है… उम्मीद है भड़ास4मीडिया के द्वारा हम-सब के गुस्से को सबके सामने रखेंगे…

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पगड़िया बाबा… खपड़िया बाबा… ऐसे हजारों बाबा अपना खेल रच रहे, खबर आपको केवल रामपाल की है!

Shailesh Bharatwasi : लगभग 15 साल पुरानी बात है। मेरे गाँव, डोमा में एक बाबा आए। पगड़िया बाबा। सर पर पगड़ी बाँधते थे, इसलिए अपनी ख्याति इसी नाम से चाहते थे। बाबा हमारे गाँव में अखंड रामायण पाठ और जग (यानी यज्ञ) करवाने आए थे। उन्हें गाँव के लोगों ने कभी आमंत्रित नहीं किया था, वे ख़ुद ही अपना डेरा जमा लिए थे। हमारे तरफ़ के गाँवों के अधिकाधिक सार्वजनिक आयोजन गाँव के एकमात्र सरकारी प्राथमिक विद्यालय में ही होते हैं।

बाबा ने भी वहीं शरण ली थी। बाबा केवल फल, सेंधा नमक, सिंघाड़े का हलवा खाते थे और दूध पीते थे। दूध केवल सफेद गाय का पीते थे। भैंस या गैरसफेद गाय का दूध वे नहीं पीते थे। बाबा ने ही तय किया था कि उनके भोजन की ज़िम्मेदारी गाँव के प्रत्येक परिवार की होगी। बारी-बारी से एक-एक दिन के भोजन की व्यवस्था अलग-अलग परिवार करेगा। बाबा साष्टांग प्रणाम करवाना पसंद करते थे। जो साष्टांग प्रणाम नहीं करता था, उसे वे डाँट देते थे और भगवान का डर दिखाते थे। ब्राह्मण जाति के लोगों के अलावा अन्य किसी भी जाति को उनका चरण छूकर प्रणाम करने की अनुमति नहीं थी। ग़ैरब्राह्मण लोगों को वे छूत मानते थे। उन्होंने गाँव में लगभग 4 महीने का समय बिताया था और गाँव वालों को अखंड रामायण पाठ और जग करवाने पर मज़बूर कर दिया था। हमारे गाँव के अलावा आसपास के गाँवों के लोगों के ऊपर भी चंदे का भार आया था। बाबा के पास हर कोई अपना कष्ट लेकर आने लगा था। बाबा सबका कष्ट सुनते थे और उम्मीद बँधाते थे कि वे सब ठीक कर देंगे।

मैं उस समय रेणुकूट में रहकर इंटरमीडिएट की पढ़ाई कर रहा था। मेरी तरह और भी बहुत से ऐसे लोग थे जो गाँव से बाहर रहकर अपनी-अपनी पढ़ाई कर रहे थे। Pradeep Verma और Kaushal Kumar उस समय इलाहाबाद में रह रहे थे। बाबा की एक ख़ास बात यह भी थी कि उन्होंने अपने कुछ विश्वसनीय भक्त बना लिए थे, जिनके माध्यम से वो गाँव के हर आदमी, हर परिवार की पूरी टोह ले लेते थे। उन्हें पता था कि किसकी औलाद गाँव से बाहर रहकर पढ़ाई कर रही है, कौन नौकरी कर रहा है। मेरी माँ से उन्होंने कहा था कि पढ़ने-लिखने से कुछ नहीं होता, अपने बेटे से कहो कि वो हमारा आशीर्वाद ले। उनके ये कहने के 15 दिनों तक भी मैं गाँव नहीं पहुँचा तो उन्होंने माँ से कई बार कहा कि आपका बेटा घमंडी है। मेरे घमंड की पुष्टि तब हो गई थी, जब मैं गाँव गया था, उनसे मिला था, उन्हें हाथ जोड़कर प्रणाम किया था, लेकिन साष्टांग नहीं हुआ था।

Anjani चूँकि ब्राह्मण हैं तो वे उनके क़रीब जा सकते थे। एक बार अंजनी ने उनसे पूछा था कि बाबा आपने शादी की है या नहीं? उन्होंने कहा था- बच्चा, हम इन झमेलों में नहीं फँसे। अपने प्रवचन में भी उन्होंने खुद को गैरशादीशुदा और मोह-माया से दूर बताया। लेकिन इनके प्रवास के आख़िरी दिनों में यह भेद खुला था कि बाबा शादीशुदा हैं। राजपूत जाति के हैं और कई लड़कियों के बाप हैं। उस बाबा से जुड़े तमाम ग्रामीणों के संस्मरण को जमा करें तो पगड़िया बाबा-पुराण बाबा रामपाल के कारनामों से कम न होगा। थोड़े समय बाद ही हमारे पड़ोस के गाँव, मिश्री में खपड़िया बाबा आ धमके थे और जग कराकर ही दम लिया था। खपड़िया बाबा के बारे में बस इतना बता देना काफ़ी होगा कि मिश्री में जग कराने के लिए बाबा ने जितना धन जुटाया था, जग कराने के बाद बचे पैसों से खपड़िया बाबा ने एक पिक-अप (छोटा भारवाहक वाहन) खरीदा, और उसे केतार से कोन के बीच चलाने लगे। खुद पिकअप के ड्राइवर भी हो गए और खलासी भी। अभी भी इस तरह के हज़ारों बाबा अपना खेल रच रहे हैं, ख़बर तो आपको केवल रामपाल की है।

हिंदयुग्म प्रकाशन के मुख्य कार्यकारी शैलेष भारतवासी के फेसबुक वॉल से.

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हाल-ए-हरियाणा लाइव-रिपोर्टिंग : लंका जिताने गये, ‘लंगूर’ बन कर लौटे, क्यों भाई?

मैं एडिटर क्राइम तो बनाया गया, मगर मोदी के साथ ‘सेल्फी-शौकीन-संपादक’ की श्रेणी में कभी नहीं आ सका। एक चिटफंडिया कंपनी के चैनल में करीब दो साल एडिटर (क्राइम) के पद पर रहा। मतलब संपादक बनने का आनंद मैंने भी लिया। सुबह से शाम तक चैनल रिपोर्टिंग सब ‘गाद’ (जिम्मेदारियां), चैनल हेड मेरे सिर पर लाद देते थे। लिहाजा ऐसे में मोदी या किसी और किसी ‘खास या शोहरतमंद’ शख्शियत के साथ ‘चमकती सेल्फी’ लेने का मौका ही बदनसीबी ने हासिल नहीं होने दिया। या यूं कहूं कि, चैनल के ‘न्यूज-रुम’ की राजनीति में ‘नौकरी बचाने’ की जोड़-तोड़ में ही ‘चैनल-हेड’ से लेकर चैनल के चपरासी तक ने इतना उलझाये रखा, कि अपनी गिनती ‘सेल्फी-संपादकों’ में हो ही नहीं पाई। हां, इसका फायदा यह हुआ कि, मेरे जेहन में हमेशा इसका अहसास जरुर मौजूद रहा कि, रिपोर्टिंग, रिपोर्टर, और फील्ड में रिपोर्टिंग के दौरान के दर्द, कठिनाईयां क्या होती हैं? शायद एक पत्रकार (वो चाहे कोई संपादक हो) के लिए सेल्फी से ज्यादा यही अहसास जरुरी भी है।

यह लेख लिखने और लेख की भूमिका बांधने की जरुरत है भी और जरुरत नहीं भी थी। जरुरत इसलिए कि, मैं खुद को ‘सेल्फी-संपादकों’ की कैटेगरी में न तो शामिल कराना चाहता हूं, न ही मुझे कोई ‘सेल्फी-शौकीन-संपादक’ अपने साथ मिलाकर अपनी पसंद और अपनी ‘सेल्फी-शौकीनन-संपादकीय’ जिंदगी को गुड़-गोबर कराना चाहेगा। धक्का दीजिए, सेल्फी-शौकीन-संपादकों को। उनके नसीब में ‘मलाई’ चाटना लिखी है, तो चाटेंगे, मेरे बदन को यूं ही ‘बर्रैयां’ (ततैयां) क्यों नोचे जा रही हैं? हो सकता है कि, मैं सेल्फी-शौकीन-संपादकों के कथित ‘सुख’ से ‘व्यथित’ हो रहा होऊं। अब इसमें तो दोष मेरा है, सेल्फी-शौकीन-संपादक बिचारे क्या करें? क्यों सोचें? क्यों अपना सिर मुझ जैसे ‘ठंडों’ से टकराकर फोडें? उन्हें देखकर जलना मेरा स्वभाव है, तो मैं जलूं, वो भला क्यों वक्त जाया करें!

खैर छोड़िये…मुद्दे की बात करते हैं। हरियाणा के बरवाला (हिसार) में बौराई हरियाणा पुलिस के ‘लट्ठों’ के शिकार जितने भी हमपेशा (पत्रकार) साथी हुए हैं, उनमें कहीं भी किसी भी ‘सेल्फी-शौकीन-संपादक’ के ‘कुटने’ की खबर, वीडियो फुटेज या फोटो नहीं है। जहां तक 24 साल की पत्रकारिता का मेरा अपना ‘अल्पानुभव’ है, उसके मुताबिक वर्तमान में मौजूद सेल्फी-शौकीन-संपादकों में, शायद ही कोई हो, जिसने इसी तरह रिपोर्टिंग के दौरान मार खाई होगी, जैसी कथित ढोंगी बाबा रामपाल के सतलोक आश्रम कवरेज करने गये पत्रकारों ने खाई, लेकिन बीते कल के यही पत्रकार अब चूंकि खुद को ‘सेल्फी-शौकीन-पत्रकार’ सिद्ध कर चुके हैं, ऐसे में भला मुंह खोलकर इनसे सवाल करने की जुर्रत कौन करे? मुंह खोलने के लिए मेरे जैसा ही चाहिए, जो संपादक तो रहा हो, लेकिन ‘सेल्फी-शौकीन-संपादक’ नहीं बन पाया हो।

सतलोक आश्रम की कवरेज के दौरान जिन पत्रकारों/ कैमरामैनों/ फोटोग्राफरों ने भी मार खाई, कम-से-कम मैं तो उन्हें ‘मीडिया-कमांडो’ की उपाधि से कतई नहीं नवाज सकता। वजह, काबिलियत, अनुभव और सूझ-बूझ की पत्रकारिता तो तब थी, जब ढोंगी बाबा रामपाल और हरियाणा पुलिस की मिली-भगत, और दोनो के बीच कई दिन से चली आ रही, जोड़-तोड़ की ‘अंदरखाने की कहानी’ को बाहर लाकर कोई साथी (पत्रकार) उन्हें ‘नंगा’ कर लेता। जिसके बाद हरियाणा सरकार का कोई ‘गुर्गा’ या फिर हरियाणा पुलिस का कोई नंबरदार आला-अफसर चैनल/ अखबार के दफ्तर में बैठा ‘मिमिया’ या ‘रिरिया-गिड़गिड़ा’ रहा होता।

इस पूरे प्रकरण में तो साफ जाहिर है कि, हरियाणा सरकार, राज्य पुलिस ने जितना चाहा, उतना मीडिया का ‘हिसाब से’ इस्तेमाल किया। जब बात आई ‘अपनी कमजोरियों को छिपाने की’ तो उसी पुलिस ने मीडिया को खुले खेतों में, मीडिया के ही खुले-कैमरों के सामने दौड़ा-दौड़ाकर ‘कूट लिया या ‘कुटवा’ दिया।

ऐसे में सवाल यह पैदा होता है, कि आखिर समझदार कौन साबित हुआ और न-समझ कौन? इस्तेमाल कौन हुआ? मीडिया या फिर पुलिस! जग-जाहिर है कि, इस पूरे एपीसोड में मीडिया का ही बेजा ‘इस्तेमाल’ हुआ और मीडिया की ही फिर ‘कुटाई’ की गयी। बात फिर वहीं आ जाती है…मीडिया ने हरियाणा पुलिस के हाथों पिटने का पुलिस को मौका ही क्यों दिया? अब तक मैंने जितने भी पिटे हुए पत्रकारों/ फोटोग्राफरों और कैमरामैनों के वीडियो देखे हैं, सब-के-सब इस बात के गवाह हैं, कि यह सब ‘जोश-में-होश’ खो बैठे। इन सबने (पिटने वाले मीडियाकर्मियों ने) सोचा, कि जो पुलिस कल तक उनके साथ थी, जो पुलिस वाले उनके साथ एक दिन पहले तक हंसी-ठोठोली कर रहे थे, वे 18 नवंबर 2014 को भी वैसे ही रहेंगे। बस यही सबसे बड़ी भूल मीडिया ने कर दी। जिसका खामियाजा कवरेज में जुटे हमारे युवा साथियों को भुगतना पड़ा।

दूसरे, दिल्ली में मोदी के साथ ‘सेल्फी-शौकीन-संपादकों’ में से भी कोई बाबा के अखाड़े में कवरेज करके पत्रकारिता की ‘अपना अनुभव और हुनरमंदी’ दिखाने नहीं पहुंचा। मुझे उम्मीद है, कि इन ‘काबिलों’ में से अगर कोई कवरेज के लिए वहां, मौजूद होता तो, तो संभव था कि, पत्रकारिता में आने वाली हमारी पीढ़ियों को इतिहास के पन्नों में शायद 18 नवबंर 2014 की तारीख ‘हरियाणा पुलिस के कुछ ओछे और मतलब परस्त पुलिस वालों के हाथों मीडिया के कुटने वाली तारीख के रुप में दर्ज होने से बच जाती।’

हां, इस पूरे घटनाक्रम में मेरी नजरों के सामने से एक ऐसा वीडियो भी गुजरा है, जिसमें हरियाणा पुलिस रामपाल के आश्रम को लाव-लश्कर के साथ घेरे है। रामपाल के समर्थक आश्रम की छतों से पथराव कर रहे हैं। पेड़ों के नीचे खेत की मेढ़ पर खड़े होकर पुलिस उन पर आंसू गैस के गोले छोड़ रही है। कभी-कभार रुक-रुककर आश्रम के अंदर से गोलियां चलने जैसी आवाजें आ रही हैं। आश्रम के भीतर कई स्थानों से धुंआ उठता हुआ दिखाई दे रहा है। यह धुंआं पुलिस द्वारा छोड़े गये आंसू गैसे के गोलों का है। अचानक पुलिस वालों की भीड़ एक खेत की तरफ भागने लगती है। इस पूरे वीडियो में और यह सब कुछ होते हुए को ‘आज तक’ के वरिष्ठ संपादक और मेरे सहयोगी अशोक सिंघल भी कवर कर रहे हैं। जैसे ही भगदड़ मचती है, अशोक सिंघल आश्रम, पुलिस-भगदड़ सब पर नज़र तो रखे हैं। खेत में खुद के बचाते हुए भागते अशोक सिंघल के एक हाथ में मोबाईल, जिस पर वो बात भी कर रहे हैं, दूसरे हाथ में चैनल माइक-आईडी है और उनकी नजर सामने हो रहे बबाल पर भी है, लेकिन वो पुलिस और भीड़ से अपना उतना ‘फासला’ जरुर बनाये हुए हैं, जितने में जरुरत पड़ने पर वो खुद को भीड़-पुलिस का शिकार बनाने से बचा सकें। खेत में इतनी दूर और ऐसे मौके से दौड़-भाग में जुटे हैं अशोक, कि सामने हो रहे को देख तो सकें, मगर उपद्रवियों और भीड़ या पुलिस का ‘कोपभाजन’ किसी हालत में कतई न बनने पायें। उनके कवरेज करने के स्टाइल से महसूस हुआ कि खुद को महफूज रखकर भी कैसे ऐसे फसादी मौकों पर या हालातों में पत्रकारिता कर सकते हैं? बिना मार खाये, कैसे अंदर की खबर को बाहर ला सकते हैं, या फिर कैसे भीड़ के बीच से निकाल के भीड़ की खबर ‘भीड़’ को ही दिखा सकते हैं?  शायद इसलिए आज भी रिपोर्टिंग में बे-वजह पिटने से अशोक सिंघल जैसे अनुभवी रिपोर्टर ही खुद को महफूज रख पाते हैं, क्योंकि उन्हें पता है कि, पत्रकारिता और उसके जोखिम क्या हैं?

यह सब ज्ञान शायद ‘सेल्फी-शौकीन-संपादकों’ के नसीब नहीं आ पाया होगा, वरना वो भी 18 नवबंर 2014 को ताल ठोंककर खड़े होते इस कवरेज के लिए..और अपने से छोटों/ नये साथियों को सुरक्षित पत्रकारिता के गुर देने के वास्ते, लेकिन यह भला कहां और कैसे संभव था! ‘सेल्फी-शौकीन-संपादकों’ के सौजन्य से…पत्रकारिता की आने वाली पीढ़ियों के हितार्थ! 

VIDEO LINK…

http://youtu.be/MXYBhdqJDVY

लेखक संजीव चौहान वरिष्ठ खोजी पत्रकार हैं. उनसे संपर्क 09811118895 के जरिए किया जा सकता है.

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जी न्यूज संवाददाता शिवम भट्ट की हरियाणा में सड़क हादसे में मौत

एक दुखद खबर हरियाणा से है. जी न्यूज संवाददाता शिवम भट्ट का सड़क हादसे में निधन हो गया है. वे हिसार में रामपाल प्रकरण कवर करने गए हुए थे. सड़क हादसे में जयवीर रावत और रोहित खन्ना घायल हुए हैं. हादसा कैथल के पास हुआ. हादस आज यानि 20 नवंबर की सुबह हुआ. शिवम की उम्र लगभग 24 साल थी. शिवम कई दिनों से हिसार के बबराला में रामपाल प्रकरण को कवर कर रहे थे. कल रात रामपाल की गिरफ्तारी के बाद जी न्यूज की टीम वापस चंडीगढ़ जाने के लिए निकली.

शिवम भट्ट के साथ रिपोर्टर रोहित खन्ना और कैमरापरसन जयवीर भी थे. रोहित व जयवीर को काफी चाटें आई हैं. शिवम भट्ट की मौके पर ही मौत हो गई. शिवम भट्ट जी मीडिया के साथ 3 फरवरी 2014 को जुड़े थे और पंजाब, हिमाचल, हरियाणा के लिए चंडीगढ़ में कार्यरत थे. शिवम भट्ट के निधन पर इंडियन मीडिया वेलफेयर एसोसिएशन (इम्वा) के पदाधिकारियों ने दुख व्यक्त किया है. इम्वा की तरफ से केन्द्र सरकार और राज्य सरकार से मांग की गई है कि शिवम भट्ट के परिवार को 50 लाख रुपये की आर्थिक सहायता दी जाए.

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पत्रकार अमित आर्य का मीडिया सलाहकार और पत्रकारिता छात्र शैलेश तिवारी का धर्मगुरु बनना….

अभिषेक श्रीवास्तव


Abhishek Srivastava : मुझे याद है कि एक गोरे-चिट्टे, सम्‍भ्रान्‍त से मृदुभाषी सज्‍जन थे जो आज से करीब 12 साल पहले बीएजी फिल्‍म्‍स के असाइनमेंट डेस्‍क पर काम करते थे। तब इसका दफ्तर मालवीय नगर में हुआ करता था और Naqvi जी उसके हेड थे। मैं तब प्रशिक्षु के बतौर असाइनमेंट पर रखा गया था। मैं तो ख़ैर 21वें दिन ही असाइनमेंट हेड इक़बाल रिज़वी से झगड़ कर निकल लिया था, लेकिन वे सम्‍भ्रान्‍त सज्‍जन इंडस्‍ट्री में बुलेट ट्रेन की तरह आगे बढ़ते गए। बाद में वे इंडिया टीवी गए, इंडिया न्‍यूज़ हरियाणा के हेड हुए और लाइव इंडिया हरियाणा के हेड बने।

आज पता चला कि वे अचानक हरियाणा के मुख्‍यमंत्री मनोहर लाल खट्टर के ”मीडिया सलाहकार” बन गए हैं। उनका नाम अमित आर्य है। जागरण की साइट पर आज इस आशय की एक ख़बर है जिसमें उन्‍होंने हिमाचल की छात्र राजनीति में एबीवीपी के अपने अतीत को इस फल का श्रेय दिया है और जेपी नड्डा को ससम्‍मान याद किया है। संयोग से आज ही हरियाणा पुलिस ने मीडिया को भर हिक पीटा है। सोच रहा हूं कि ”सिर मुंड़ाते ओले पड़ना” का उदाहरण क्‍या इससे बेहतर कुछ होगा?

अच्‍छे दिनों की ऐसी कहानियां चारों ओर बिखरी पड़ी हैं। मसलन, आज शाम एनडीटीवी इंडिया के पैनल पर जो लोग बाबा प्रकरण पर जिरह करने बैठे थे, उनमें एक के नाम के नीचे परिचय लिखा था ”धर्म गुरु”। इस शख्‍स का नाम है आचार्य शैलेश तिवारी, जो भारतीय जनसंचार संस्‍थान यानी IIMC का कुछ साल पुराना हिंदी पत्रकारिता का छात्र है। पत्रकारिता पढ़ कर पांच साल में धर्म गुरु बन जाना हमारे देश में ही संभव है। ज़ाहिर है, अच्‍छे दिनों का असर रवीश कुमार जैसे ठीकठाक आदमी पर भी पड़ ही जाता है, जिन्‍होंने प्राइम टाइम पर अपनी रनिंग कमेंट्री के दौरान आज मार खाने वाले पत्रकारों के नाम गिनवाते हुए ”एबीपी” चैनल को ‘एबीवीपी” कह डाला। बहरहाल, जितने पत्रकारों को आज मार पड़ी है, उनमें मुझे इंडिया टीवी, ज़ी न्‍यूज़ और इंडिया न्‍यूज़ का कोई व्‍यक्ति नहीं दिखा। किसी को पता हो तो नाम ज़रूर गिनवाएं।

Abhishek Srivastava : ‘पाखी’ पत्रिका के दफ्तर में साढ़े तीन घंटे तक चले अपने सामूहिक साक्षात्‍कार के दौरान कुमार विश्‍वास ने दिल्‍ली के खिड़की एक्‍सटेंशन और सोमनाथ भारती वाली कुख्‍यात घटना का जि़क्र करते हुए अफ्रीकी नागरिकों को ‘नीग्रो’ कहकर संबोधित किया। जब मैंने इस पर प्रतिवाद किया, तो उन्‍हें अव्‍वल यह बात ही समझ में नहीं आई कि आपत्ति क्‍यों की जा रही है। तब मैंने उन्‍हें एक और उदाहरण दिया कि कैसे कमरे में प्रवेश करते वक्‍त उन्‍होंने अपूर्व जोशी को ‘पंडीजी’ कह कर पुकारा था। इस पर वे कुछ बैकफुट पर तो आए, लेकिन अपने इन जातिसूचक और नस्‍लभेदी संबोधनों पर उन्‍होंने कोई खेद नहीं जताया। यह प्रकरण प्रकाशित साक्षात्‍कार में गायब है। ऐसे कई और सवाल हैं, प्रतिवाद हैं जिन्‍हें संपादित कर के हटा दिया गया। ज़ाहिर है, इतने लंबे संवाद से कुछ बातें हटनी ही थीं लेकिन कुछ ऐसी चीज़ें भी हटा दी गईं जिनसे कुमार विश्‍वास के एक रचनाकार, राजनेता और सार्वजनिक दायरे की शख्सियत होने के कारणों पर शक़ पैदा होता हो।

अपने देश-काल की औसत और स्‍वीकृत सभ्‍यता के पैमानों पर कोई व्‍यक्ति अगर खरा नहीं उतरता, तो यह बात सबको पता चलनी ही चाहिए। ऐसा इसलिए क्‍योंकि जो लोग लिखे में ‘पॉपुलर’ का समर्थन कुमार विश्‍वास की पूंछ के सहारे कर रहे हैं, उन्‍हें शायद समझ में आए कि दरअसल वे अंधेरे में अजगर को ही रस्‍सी समझ बैठे हैं। ‘पॉपुलर’ से परहेज़ क्‍यों हो, लेकिन कुमार विश्‍वास उसका पैमाना कतई नहीं हो सकते। मेरा ख़याल है कि अगर साढ़े तीन घंटे चले संवाद की रिकॉर्डिंग जस का तस सार्वजनिक की जाए, तो शायद कुछ धुंध छंटने में मदद मिले। जो प्रश्‍न औचक किए गए लग रहे हैं, जो बातें संदर्भहीन दिख रही हैं और कुमार को जो ”घेर कर मारने” वाला भाव संप्रेषित हो रहा है, वह सब कुछ पूरे साक्षात्‍कार के सामने आने के बाद परिप्रेक्ष्‍य में समझा जा सकेगा। उसके बाद पॉपुलर बनाम क्‍लासिकी पर कोई भी बहस विश्‍वास के समूचे व्‍यक्तित्‍व को ध्‍यान में रखकर और उन्‍हें इससे अनिवार्यत: बाहर रखकर की जा सकेगी।

युवा मीडिया विश्लेषक और सोशल एक्टिविस्ट अभिषेक श्रीवास्तव के फेसबुक वॉल से.

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मैनेज आपके मालिक होते हैं और आपको सैलरी उनके हिसाब से मैनेज होने के लिए मिलती है, जर्नलिज्म करने के लिए नहीं

Vineet Kumar : तमाम न्यूज चैनल और मीडिया संस्थान प्रधानसेवक के आगे बिछे हैं..उन्हें देश का प्रधानमंत्री कम, अवतारी पुरुष बताने में ज्यादा रमे हुए हैं लेकिन उनकी ही पार्टी की सरकार की शह पर मीडियाकर्मियों की जमकर पिटाई की जाती है. पुलिस उन पर डंडे बरसाती है..हमने तो जनतंत्र की उम्मीद कभी की ही नहीं लेकिन आपने जो चारण करके जनतंत्र के स्पेस को खत्म किया है, अब आपके लिए भी ऑक्सीजन नहीं बची है..

अफसोस कि आपके लाख घाव दिखाए जाने के बावजूद वो संवेदना पैदा नहीं हो पा रही, जो मानवीय स्तर पर पनपनी चाहिए..पता नहीं क्यों, लग रहा है इसके लिए आप ज्यादा जिम्मेदार हैं जिसका सबसे शर्मनाक पहलू है कि मैनेज आपके मालिक होते हैं और आपको सैलरी उनके हिसाब से मैनेज होने के लिए मिलती है, जर्नलिज्म करने के लिए नहीं.

हमारा मीडिया जबकि राजनीतिक पार्टियों, तथाकथित बाबाओं और कॉर्पोरेट से इतना अधिक मैनेज है तो भी मीडियाकर्मी पर सरकार की शह पर पुलिस लाठियां बरसाती है..मीडिया का चरित्र इन तीनों की की ही तरह है..जितना भ्रष्टाचार और लोकतंत्र की जड़ें राजनीतिक पार्टियां कर रही है, उतना ही मीडिया भी, जितना पाखंड़ और अंधविश्वास ये बाबा-महंत फैला रहे हैं, उतनी मीडिया भी और जितना कॉर्पोरेट इस देश को लूट रहा है, लोगों की जुबान बंद कर रहा है, उतना ही मीडिया भी..फिर भी मीडियाकर्मी इनके हाथों पिट जाता है…अब सोचिए कि जिस दिन मीडिया इन सबसे मुक्त अपने चरित्र के हिसाब से जीने की कोशिश करे तब क्या होगा ? मीडियाकर्मियों की देश में लाश बिछ जाएगी.

युवा मीडिया विश्लेषक विनीत कुमार के फेसबुक वॉल से.

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हरियाणा का एक भी जिला ऐसा नहीं जहां पत्रकारों के खिलाफ झूठे मुकदमे दर्ज न हुए हों

Kumar Sanjay Tyagi : हरियाणा में पुलिस बर्बरता की सही मायनों में शुरुआत ओपी चौटाला के शासन काल में हुई थी। जो भी पत्रकार चौटाला की निगाह में तिरछा चला, पुलिस के माध्‍यम से उसकी चाल सीधी करा दी गई। इससे पुलिस के भी समझ में पत्रकारों की औकात आ गई। सरकार और नेताओं के पुलिस के दुरूपयोग के सिलसिले के बाद हर‍ियाणा की पुलिस बेकाबू और बर्बर होती चली गई। हरियाणा का एक भी जिला ऐसा नहीं है जहां पत्रकारों के खिलाफ झूठे मुकदमे दर्ज न हुए हों।

इससे हुआ ये कि हरियाणा में पुलिस की करतूतों को लिखने या दिखाने की जुर्रत कोई बिरला पत्रकार ही करता है। इसका एक बड़ा कारण हरियाणा के पत्रकारों की खुद की कमियां भी हैं। अगर एक पत्रकार पुलिसिया जुल्‍म का शिकार होता है तो दूसरे साथी इसमें मजे लेते हैं। जो पत्रकार सरकार पर दबाव बना सकते हैं वह सरकार का मजा लेने में मशगूल रहते हैं। यही है हरियाणा। दिल्‍ली में बैठे महान पत्रकारों का हरियाणा की पुलिस की महानता का अहसास पहली बार हुआ है इसलिए उन्‍हें यह लोकतंत्र के चौथे स्‍तम्‍भ पर हमला दिखाई दे रहा है। हरियाणा के लिए यह रूटीन है और यही यहां के पत्रकारों की नियति है।

अमर उजाला, कानपुर से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार संजय त्यागी के फेसबुक वॉल से.

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बेचारे हिसार वाले ‘मीडिया मीठू’… वे अब भी सहला सेंक रहे हैं अपना-अपना अगवाड़ा-पिछवाड़ा…

Yashwant Singh : पहले वो पुलिस के पक्ष में बोलते दिखाते रहे क्योंकि पुलिस ने उन्हें पुचकारा था, अपने घेरे में रखते हुए आगे बढ़ाकर बबवा को बुरा बुरा कहलवाया दिखाया था… जब पुलिस को लगा कि भक्तों-समर्थकों को लतिया धकिया मार पीट तोड़ कर अंदर घुसने और बबवा को पकड़ कर आपरेशन अंजाम तक पहुंचाने का वक्त आ गया है तो सबसे पहले पुचकार के मारे तोते की तरह पुचुर पुचुर बोल दिखा रहे ‘मीडिया मीठूओं’ को लतियाना लठियाना भगाना शुरू किया ताकि उनके आगे के लतियाने लठियाने भगाने के सघन कार्यक्रम के दृश्य-सीन कैमरे में कैद न किए जा सकें… ये सब प्री-प्लान स्ट्रेटजी थी. सत्ताधारी राजनीतिज्ञों से एप्रूव्ड.

मोदी और भाजपा के बारे में दिखाते बताते जयगान करते कराते बेचारे इतने तल्लीन-लीन थे कि इन्हें तनिक अंदाजा भी न था कि मोदी-बीजेपी की कोई सरकार उन पर इस तरह जुलूम ढहवा सकती है… जब पिट पिटा कर बहुत दूर खदेड़ दिए गए तो एकाध घंटे अपने-अपने चैनलों पर अपना अपना जख्मी थोबड़ा टूटा-पिटा कैमरा आदि इत्यादि दिखाते गरियाते रहे और चौथा खंभा का नाम ले लेकर खंभे नोचने सा माहौल बनाते रहे लेकिन यह सब देर तक चल न सका… चुनावी मालपुआ से अभी तक घर उदर तर रखे हुए मालिकों ने कैमरों का मुंह ‘मीडिया मीठूओं’ के चीत्कार से हटवा कर आस्ट्रेलिया की तरफ करा दिया और इस प्रकार एक बार फिर से नमो-नमो जय-जय मोदी गान चालू हो गया… क्रिकेट, स्टेडियम और मोदी के मिक्सचर को मिलाकर सब फिर लाइव परोसने लगे… बेचारे हिसार वाले मीडिया मीठू.. वे अब भी सहला सेंक रहे हैं अपना-अपना अगवाड़ा-पिछवाड़ा… http://goo.gl/tzNxVl

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.

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हरियाणा में आर्यसमाजियों की सरकार है, इसलिए संत रामपाल के खिलाफ कार्रवाई तेज कर दी गयी है

Sanjay Tiwari : झगड़ा आर्यसमाज बनाम कबीरपंथ का है। 2006 के जिस मर्डर केस में संत रामपाल आरोपी बनाये गये हैं, सतलोक आश्रम के बाहर वह झड़प आर्यसमाज के समर्थकों के साथ ही हुई थी। बाबा निजी तौर पर मर्डर में शामिल थे या नहीं, यह अदालत जाने लेकिन जो दुनिया जानती है वह यह कि आर्यसमाजवाले किसी भी कीमत पर कबीरपंथी संत रामपाल और उनके सतलोक आश्रम को बर्दाश्त नहीं कर रहे थे।

अब तक तो यह न हो सका क्योंकि प्रदेश में कांग्रेस की सरकार थी। लेकिन अब इसलिए हो रहा है क्योंकि अब प्रदेश में आर्यसमाजियों की सरकार है। मुख्यमंत्री जी खुद आर्य हैं, और मुख्यमंत्री का प्रेस सलाहकार भी आर्य ही नियुक्त किया गया है। इसलिए कार्रवाई तेज कर दी गयी है। नहीं तो गैर जमानती वारंट तो दीपेन्द्र हुड्डा के नाम आज भी बनारस के कोर्ट में जारी किया रखा है। देश दुनिया की छोड़िये शायद दीपेन्द्र हुड्डा को भी इस बात का पता न हो।

वेब जर्नलिस्ट संजय तिवारी के फेसबुक वॉल से.

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संत रामपाल : ….यूं ही कोई इतना लोकप्रिय नहीं हो सकता!

मैं संत रामपाल को नहीं जानता न ही उनके दर्शन और अध्यात्म की उनकी व्याख्या से। पर वे खुद कहते हैं कि वे हिंदू नहीं हैं और खुद को ही परमेश्वर मानते हैं। हिंदुओं के लगभग सभी सेक्ट उनके खिलाफ हैं खासकर आर्य समाज से तो उनकी प्रतिद्वंदिता जग जाहिर है। वे कबीर साहब के आराधक हैं और मानते हैं कि वे इस दुनिया में आने वाले पहले गुरु थे। इसमें कोई शक नहीं कि संत रामपाल अपार लोकप्रिय हैं। उनके भक्त उनके लिए अपनी जान तक दे सकते हैं। संत परंपरा वैदिक अथवा ब्राह्मण परंपरा नहीं है। संत परंपरा श्रावक व श्रमण परंपरा तथा पश्चिम के सेमेटिक दर्शनों का घालमेल है। पर जो व्यक्ति संत की पदवी पा जाता है उसके भक्त उसको ईश्वर अथवा ईश्वर का दूत मानने लगते हैं।

वैदिक परंपरा ईश्वर को नकारती है। पर संत रामपाल के भक्त कोई चतुर, सुजान अथवा अपराधी प्रवृत्ति के नहीं हैं। वे सामान्य मानव हैं और अपने को सताए जाने से दुखी हैं। वे किसी आध्यात्मिक शक्ति की खोज में हैं जो उनके कष्ट समाप्त कर सके। संत रामपाल ने उन्हें कोई राह तो दिखाई होगी वर्ना यूं ही कोई इतना लोकप्रिय नहीं हो सकता। पर यहां यह बात मैं जरूर कहूंगा कि भले संत रामपाल ईश्वर हों लेकिन चूंकि वे इस मानवी दुनिया में और वह भी ईश्वर की भूमि कहे जाने वाले भारत में प्रकट हुए हैं इसलिए उन्हें यहां के सारे गुण-दोष मानने पड़ेंगे। मसलन संत जी को भारतीय संविधान, कानून और नियम सब मानने पड़ेंगे। वे संविधानेतर नहीं हैं इसलिए उन्हें कोर्ट के समक्ष प्रकट होना चाहिए। उन्हें भारत की न्यायपालिका पर भरोसा होना चाहिए। तब ही वे अपने को परमेश्वर के रूप में और स्थापित कर पाएंगे।

वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ल के फेसबुक वॉल से.

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हिसार में पुलिस ने दो दर्जन मीडियाकर्मियों को बर्बर तरीके से पीटा और कैमरा तोड़ा

संत रामपाल प्रकरण कवर करने हरियाणा के हिसार पहुंचे दर्जनों मीडियाकर्मियों को हरियाणा पुलिस ने बुरी तरह पीटा. कई चैनलों के रिपोर्टरों और कैमरामैनों को गंभीर चोटें आई हैं. पुलिस द्वारा आजतक के रिपोर्टर और कैमरामैन को पीटते हुए दृश्य न्यूज चैनलों पर दिखाए जा रहे हैं. ब्राडकास्ट एडिटर्स एसोसिएशन (बीईए) ने मीडिया पर जान-बूझकर किए गए अटैक की कड़ी निंदा की है और दोषियों तो दंडित करने की मांग की है. बीईए महासचिव और वरिष्ठ पत्रकार एनके सिंह ने कहा है कि पुलिस ने राजनीतिक आकाओं के इशारे के बाद मीडिया पर हमला किया है ताकि पुलिस कार्रवाई को मीडिया कवर न कर सके और मौकै से मीडिया के लोगों को भगाया जा सके. ओबी वैन से लेकर मोबाइल, कैमरा तक तोड़े क्षतिग्रस्त किए गए हैं. करीब दो दर्जन पत्रकारों और कैमरामैनों को चुन चुन कर पुलिस ने निशाना बनाया है.

हरियाणा के हिसार में पुलिस प्रशासन संत रामपाल की जिद के आगे बुरी तरह पस्त हुआ है. कोर्ट की फटकार के बाद आज दोपहर जब संत रामपाल को पकड़ने के लिए आश्रम में घुसने की पुलिस कार्रवाई  शुरू हुई तो पुलिस अफसरों ने पहले से तय शर्तों के मुताबिक चुनिंदा करीब 60 पत्रकारों व कैमरामैनों को कवरेज के लिए अंदर जाने दिया. इन सभी साठ मीडियाकर्मियों की इंट्री लिस्ट के आधार पर की गई जिसे पुलिस व मीडिया के लोगों ने एक रोज पहले तैयार किया था. लेकिन जब पुलिस कार्रवाई को मीडिया वाले कवर करने लगे तो पुलिस ने अचानक न जाने किसके इशारे पर संत रामपाल के समर्थकों को छोड़कर मीडिया के लोगों को ही निशाना बनाना शुरू कर दिया. इसके बाद मीडिया के लोगों में कोहराम मच गया. किसी के गर्दन पर लाठियां पड़ीं तो किसी के पैर पर. किसी के पेट में डंडे मारे गए तो किसी के हाथ पर. कई लोगों के कैमरे पूरी तरह तोड़ डाले गए. सारे मीडियावालों को आपरेशन स्थल से बहुत दूर पीटते हुए खदेड़ दिया गया.

इसके बाद सभी न्यूज चैनलों पर मीडिया की पिटाई सबसे बड़ी खबर हो गई. हरियाणा में भाजपा की सरकार बनी है. ये टीवी वाले मोदी और भाजपा के गुणगान करते थकते अघाते नहीं थे. अब जब उनके उपर भाजपा सरकार की तरफ से डंडे बरसाए गए हैं तो सभी जुल्म सितम न्याय की बातें करने लगे हैं. एकतरफा रिपोर्टिंग और पेड रिपोर्टिंग के जरिए किसी पार्टी व नेता को प्रमोट करने का हश्र संभवतः ऐसा ही होता है. दुखद ये है कि लाठी खाने वाले आम पत्रकार हैं. चैनलों के मालिकों की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ने वाला. चैनल के मालिक तो चुनावी माल मलाई खा खा कर फिलहाल मदहोश स्थिति में हैं. उन्हें कोई फरक नहीं पड़ने वाला कि उनका पत्रकार और कैमरामैन पीटा गया है या नहीं. चैनलों पर खबरें कुछ रोज चलेंगी और फिर सब भूलकर मोदी-भाजपा गुणगान में जुट जाएंगे क्योंकि इसके लिए कार्पोरेट की तरफ से बड़ा हिस्सा-पैसा बड़े मीडिया हाउसों को मिला हुआ है.

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