धार्मिक जनगणना के डाटा पर टीओआई और द हिंदू के इन शीर्षकों को गौर से पढ़िए

See how two of India’s leading newspapers have today reported the same data (of the latest Census)

Nadim S. Akhter : इसे देखिए, पढ़िए और समझिए. देश के दो प्रतिष्ठित अखबारों निष्ठा. किसकी निष्ठा पत्रकारिता के साथ है और किसकी चमचई में घुली जा रही है, खबर की हेडिंग पढ़ के समझा जा सकता है. मैंने कल ही फेसबुक की अपनी पोस्ट में लिखा था कि अलग-अलग चम्पादक, माफ कीजिए सम्पादक धार्मिक जनगणना के इस डाटा का अपने अपने हिसाब से इंटरप्रिटेशन करेंगे. आज फेसबुक पर एक ही खबर के दो एंगल, बिलकुल जुदा एंगल तैरता हुआ देखा तो आपसे साझा कर रहा हूं.

एक The Times of India नामक का देश का सबसे बड़ा अखबार है तो एक The Hindu नाम का प्रतिष्ठित अखबार. चूंकि टाइम्स ग्रुप में 6 साल नौकरी की है. Times Building में ही तो पता है कि वहां हेडिंग लगाने में कितनी मेहनत होती है. कितना इस पे विचारा और सोचा जाता है. नीचे से लेकर ऊपर तक के सभी पत्रकार इसमें involve होते हैं. और अंत में हेडिंग सम्पादक-मुख्य सम्पादक को भी बताई जाती है. सो benefit of doubt के आधार पर Times of India को ये छूट नहीं दी जा सकती कि news editor या page one incharge यानी night editor टाइप की कोई चीज ने ये किया हो और ऊपर के लोगों को इसके बारे में पता ही ना हो. वो भी तब, जब अंग्रेजी वाले अखबार यानी Times of India पर विनीत जैन और समीर जैन की सीधी नजर होती है. मैं ये नहीं कह रहा कि टाइम्स ऑफ इंडिया की हेडिंग गलत है. बस अखबार ने सरकारी डाटा का इंटरप्रिटेशन अपने हिसाब से कर दिया है.

The Hindu अखबार ने उसी डाटा का इंटरप्रिटेशन अपने हिसाब से किया है लेकिन हेडिंग पढ़कर पाठकों को लगेगा कि दोनों अखबार परस्पर विरोधाभासी हैं. कोई एक अखबार गलत सूचना दे रहा है. लेकिन ऐसा है नहीं. यही तो डाटा इंटरप्रिटेशन का कमाल है. चुनाव के वक्त ऐसे ही थोड़े सेफोलॉजिस्ट बैठकर मनमाफिक पार्टी को टीवी पर जितवा देते हैं. सब डाटा का ही तो कमाल होता है. अपने हिसाब से रिजल्ट निकाल लो. बहरहाल. पत्रकारिता के छात्रों के लिए ये खबर और दोनों अखबारों की हेडिंग एक केस स्टडी है. और भारतीय लोकतंत्र तथा चौथे खंभे के लिए आईना. अब ये आप है कि आप इन दोनों में से कौन सा अखबार रोज पढ़ना चाहेंगे. क्योंकि -दैनिक जागरण- पढ़ने वालों को -हिन्दुस्तान- अखबार रास नहीं आएगा. मेरी खुशकिस्मती कि मैंने इन दोनों अखबारी ग्रुप में भी काम किया है. घोषित तौर पर कुछ नहीं होता, बहुत कुछ अघोषित होता है.

Nietzsche ने सच ही कहा है- “There are no facts, only interpretations!”

कुछ समझे !!! लोकतंत्र का चौथा खंभा डोल रहा है. मन डोले-तन डोले. और धन तो सबकुछ डोलावे रे. पैसा खुदा तो नहीं पर उससे कम भी नहीं. जूदेव बाबू यूं ही नहीं कहे थे ये बात. अखबारों और टीवी चैनलों का अर्थशास्त्र समझे बिना पत्रकारिता के चौथे स्तम्भ की हकीकत कहां समझ पाएंगे आप !!! मैं ये नहीं कह रहा कि सबकुछ गंदा है, पर जो कुछ बचा है, उतना ही बचा रह जाए आगे तो ये इस लोकतंत्र के लिए शुभ होगा. जय हो!

पत्रकार नदीम एस. अख्तर के फेसबुक वॉल से.


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नकली मुसलमान

हरियाणा के भगाना नामक गांव में एक अजीबो-गरीब घटना घटी। इस गांव के लगभग डेढ़ सौ दलितों ने अपना धर्म-परिवर्तन कर लिया। वे हिंदू से मुसलमान बन गए। उन्होंने ऐसा इसलिए किया कि पिछले तीन साल से वे बहुत दुखी थे। उनके गांव की ऊंची जातियों के लोगों ने उनकी ज़मीनों पर कब्ज कर लिया था। उनकी बहू-बेटियों के साथ बलात्कार करते थे। उन्हें कुएं से पानी नहीं भरने देते थे और लगभग ढाई-सौ दलितों को गांव-निकाला दे दिया था। 

ये दलित लोग चार बार हरियाणा के मुख्यमंत्री से मिल चुके थे। इन्होंने पुलिस में शिकायत भी दर्ज करवाई लेकिन इनको न्याय मिलने की बजाय गिरफ्तारी और पिटाई मिली। जबब ये जंतर-मंतर पर धरना दे रहे थे, केंद्र सरकार और अन्य राजनेताओं ने भी इनकी उपेक्षा की तो इन्होंने मजबूर होकर इस्लाम कबूल कर लिया। एक मौलाना ने इन्हें कलमा पढ़ा दिया।

यह कहानी सिर्फ एक गांव की नहीं है और सिर्फ आज की नहीं है। यह पूरे हिंदुस्तान की है और सदियों से चली आ रही है। हिंदुत्व की ध्वजा फहरानेवाले लोगों के पास इस रोग का कोई इलाज नहीं है। वे हिंदुओं को संगठित करने पर जोर देते हैं, जो ठीक है लेकिन उनके पास कोई तरकीब नहीं है कि वे हिंदुओं को सुधारें। उनमें समता और बंधुता पैदा करें। छुआछूत खत्म करें। जातिवाद के विरुद्ध युद्ध छेड़ें। रोटी और बेटी का रिश्ता सब लोगों के बीच खुला हो। जब तक इस तरह की सामाजिक और सांस्कृतिक क्रांति का कोई तेजस्वी आंदोलन शुरु नहीं होगा, धर्म-परिवर्तन होता रहेगा। उसे कोई भी रोक नहीं पाएगा। 

लेकिन जिन्होंने अपना धर्म-परिवर्तन किया है और जिन्होंने वह करवाया है, उनसे भी मुझे कुछ कहना है। गुस्से में आकर आपने अचानक धर्म-परिवर्तन कर लिया तो उससे क्या फर्क पड़ गया? क्या अब आपको भगाना गांव की ऊंची जातियां वहां वापस रहने देंगी? अब आप दुगुने अछूत हो जाएंगे। क्या भारत के मुसलमान आपके साथ रोटी और बेटी का व्यवहार खुलकर करेंगे? बिल्कुल नहीं करेंगे! जातिवाद के जहर ने भारत के इस्लाम को भी डस रखा है। जिस मौलवी ने इन दलितों को कलमा पढ़ाया है, उसने क्या नकली मुसलमानों की संख्या नहीं बढ़ाई है? यह इस्लाम का सम्मान हुआ है या अपमान? अच्छा तो यह होता कि राज्य और केंद्र की सरकारें भगाना के इन दलितों को तुरंत न्याय दिलाती और ये दलित लोग इस्लाम की ओट में छिपने की बजाय अपने अधिकार और सम्मान के लिए जी-जान से लड़ते।

वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक डॉ. वेदप्रताप वैदिक से संपर्क : dr.vaidik@gmail.com

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संस्थागत धर्म आधुनिक इंसान को बार्बेरियन युग में खींच ले जाने का प्रमुख स्रोत

धर्म ने इंसान को इंसानियत के कितने निचले पायदान पर पहुँचा दिया है, इसका अंदाज़ा सांप्रदायिक दंगों में बरती जाने वाली हिंसा के तरीकों को देखकर लगाया जा सकता है. प्रतिपक्ष धर्म के लोगों, खासकर महिलाओं और बच्चों के प्रति प्रयुक्त हिंसा का यह तथ्य स्थापित करता है कि एक दूसरे के प्रति उगले/निगले प्रचारित सांप्रदायिक ज़हर का रुप कितना भयंकर होगा? महिलाओं का सामूहिक बलात्कार, उनके कौमार्य भंग, जला देना, गला रेत देना, बच्चों को जला देना, काट देना यकायक यूँ ही नहीं हो जाता. यह कोई एकदम से घटने वाली परिघटना नहीं होती. इसके मनोवैज्ञानिक पहलुओं का अगर अध्ययन करें तो निश्चय ही पता लगेगा कि एक बड़े दंगे को अंज़ाम देने के लिये जिस खास विकृत मनोदशा की जरुरत होती है, जिसके नशे में इंसान हैवान बन कर दूसरे इंसान को अपना शिकार बनाता चला जाता है, उसके पीछे वर्षों की तैयारी काम कर रही होती है.

इंसान एक झटके में ही शैतान नहीं बन सकता. उसे शैतान बनने के लिये जिस वैचारिक आधार की जरुरत होती है, यह तेज़ गति से उड़ने वाला विमान उसे उसका धर्म ही प्रदान करता है. हर धर्म में अपने को सर्वश्रेष्ठ साबित करने की दलीलें मौजूद हैं. कोई भी धर्म अपने विचार को किसी दूसरे धर्म की तुलना में कमतर मानता ही नहीं है. उनमें अपने-अपने अनुयाइयों में एक खास तरह का नशा देने की प्रवृत्ति समान रुप से देखने को मिलती है जिसके चलते हर धर्म का अनुयायी स्वयं को दूसरे खासकर प्रतिस्पर्द्धी धर्म के अनुयायी से बेहतर मानता है. यही सांप्रदायिक हिंसा के मूल का सबसे सूक्ष्म बिंदु है, इसी न्यूनतम बिंदु का विस्तार दंगा है, जब कोई एक इंसान किसी दूसरे धर्म को मानने वालों का घर जला रहा होता है, तब उस हिंसा के मूल में प्रतिपक्षी धर्म को मूल रुप से स्माप्त कर देने की इच्छा ही काम कर रही होती है. सिर्फ़ खत्म करना भी मकसद नहीं होता, बल्कि इसके पीछे निर्दयतापूर्वक, बलपूर्वक, लज्जित और लांछित करके दुश्मन को परास्त करने की आदिम मानसिकता काम कर रही होती है.

कहना न होगा, कि सभी संस्थागत धर्म आज के आधुनिक युग के इंसान को जबरन मध्य युग अथवा उससे भी निम्न स्तर यानि बार्बेरियन युग में खींच ले जाने का प्रमुख स्रोत हैं. क्या आधुनिक युग के इंसान को किसी धर्म की जरुरत है? और अगर है भी तो क्या उसकी समस्याओं का समाधान मध्यकालीन सभ्यताओं में जन्में और उन्हीं मूल्यों के वाहक तथाकथित धर्मों के पास है? क्या आधुनिक युग की विषमताओं के संदर्भ में मध्यकालीन धर्मों से कोई दिशा ली जा सकती है? मेरा स्पष्ट मत है कि किसी भी संस्थागत धर्म के पास आज के आधुनिक युग के समाज की कोई खबर है ही नहीं. जब इसका ज्ञान ही उन्हें नहीं तब समकालीन स्मस्याओं के समाधान के संदर्भ में उनकी दलीलें किसी दोयम दर्जे के ओझा के टोने टोटके से अधिक महत्व नहीं रखती. कोई मूर्ख ही इसे माने कि मूसा, ईसा, मौहम्मद, कृष्ण, बुद्ध आदि को शंघाई, लंदन, न्यूयार्क, बर्लिन, मुंबई के समाजों का ज्ञान था? उसने जुड़ी विषमताओं का कोई आभास था या किसी औद्योगिक समाज की बुनावट के बारे में उन्हें कोई समझ थी? क्या भेड बकरियां चराने वाले समाज के नायकों द्वारा आज के आधुनिक युग की समस्याओं को हल किया जा सकता है? कदापि नहीं, न ऐसा पिछले २०० साल में हुआ है न आगे होगा. ध्यातव्य है कि मौजूदा समय में इंसान का दैनिक जीवन बेहतर बनाने की किसी भी वस्तु, विचार अथवा तकनीक का आविष्कार किसी भी तथाकथित धर्म के जरिये आज तक नहीं हुआ है. इसका स्मस्त श्रेय आधुनिक विज्ञान को ही जाता है. आज की पीढी निश्चय ही सबसे गौरांवित पीढी है जिसने इस पृथ्वी के  तीव्रतम विकास को साक्षात अपने सामने घटते देखा है. डोट फ़ोन से सैटेलाईट फ़ोन का सफ़र पलक झपकते ही पिछले ३० सालों में संपन्न हुआ और यह स्पष्ट करना जरुरी है कि इस प्रक्रिया में किसी धार्मिक किताब की कोई भूमिका नहीं थी.  

यह भी सच है कि हम निरंतर बढ़ रहे अंतर्विरोधों की दुनिया में जी रहे हैं, एक ओर विज्ञान और उसके चमत्कारों ने जीवन को इतना सरल बनाया है तो दूसरी तरफ़ आर्थिक विषमताओं की गहरी खायी भी तैयार हुई है. सिर्फ़ धनपतियों के जीवन को विज्ञान के चमत्कार ने अलंकृत किया है. समाज के अभावग्रस्त तबके में उसका प्रचलन अभी व्यापक नहीं है. आमतौर पर अभी राज्य भी अपनी यह भूमिका तय नहीं कर पाया है कि वंचित तबके को तकनीकी सुख कब, कैसे और कितना दे? जैसे जैसे वैज्ञानिक तकनीकों का प्रचलन बढ़ा है उसी गति में संस्थागत धर्मों के प्रचार-प्रसार में भी तेज़ी आयी है. निर्ल्लज धार्मिक ठग समाज अपनी धन शक्ति के आधार पर विज्ञान की नवीनतम उपल्बधियों  का प्रयोग करके  टोने टोटके बेचने के अपने आपराधिक क्रियाओं में संलिप्त है.  आमतौर पर भारत में बढ रहे बाबा-बाबी, मंदिर, दरगाहों, चैनलों पर बैठे धार्मिक ठगों के प्रचार प्रसार को, विभिन्न धर्मों के ज़ाकिर नायक जैसे कथावाचकों के कार्यक्रमों आदि को धर्म अथवा धार्मिक क्रिया का रुप मान लेना एक भंयकर भूल होगा. इन प्रचार उद्यमों के जरिये जो ठगी की जा रही है उसका धर्म से कोई लेना देना है ही नहीं. दर असल उपरोक्त उपक्रमों के माध्यम से ये तमाम लोग किसी बडे दंगें की, किसी बडी मानवीय  विडंबना की भूमिका लिख रहे होते हैं. ये तमाम धार्मिक अपराधी अपने अपने धर्म के अनुयाईयों को वही सूक्ष्म सर्वश्रेष्ठवादी विचार की घुट्टी पिला रहे होते हैं जिसके वक्त पडते ही वह किसी नारे का बस एक तडका भर मारेगा और भीड बेकाबू हो जायेगी, फ़िर टूट पडेगी अपने कथित धार्मिक दुश्मन पर..महिलाओं की छातियां काटने फ़रसे निकल पडेंगे,बलात्कार सड़क पर लिटा कर सरेआम किया जायेगा, भागते हुए इंसान पर पैट्रोल डाल कर आग लगा दी जायेगी. कलमा पढ कर तलवारें किसी के सिर को घड़ से एक झटके में अलग कर देगी तो कहीं जय श्री राम करते हुए जलते हुये टायरों के बीच बच्चों को पटक दिया जायेगा.

भारत में धर्म गुरुओं का प्रचलन जिस तेज़ी से बढा है उसकी सबसे महत्वपूर्ण रीढ तेज़ी से उभरता हुआ मध्यवर्ग है. प्रचलित धर्म मध्यवर्गीय आपराधिक प्रवृति ही है जिसकी चादर ओढ़ कर वह समाज में अपने खोटे सिक्के की स्वीकृति धडल्ले से करा लेता है. झटके से पैसा कमाने वाले के पास तालीम सिरे से गायब है और अगर कोई शिक्षित है भी तब उसका कोई वैज्ञानिक चिंतन हुआ हो यह भी जरुरी नहीं, करोड़ों के मकान बना लेने के बाद इनके घरों पर काले रंग की हांडी, इनकी कारों के नीचे लटकी चुटिया, शराब के नशे में चलने वाले जागरण,मुसलमानों की बहशी हज यात्रायें इनकी सोच के लंपट तत्व को जगजाहिर करती हैं. मध्य वर्ग की इस मनोविकृतियों को धर्म के तथाकथित ठेकेदारों ने भलि भांति समझा है इसी कारण इन दोनों सामाजिक कोढ़ियों का अभ्युदय तीव्र गति से हुआ है और एक दूसरे की खाज मिटा कर पैसा बनाना दोनों का व्यवहारिक पेशा बन गया है. भारत के जितने भी तथाकथित धर्म गुरु हैं उनके विकास के पीछे कोई न कोई व्यापारी अथवा व्यवसायिक घराने का होना इस तथ्य की निर्णायक पुष्टि करता है. इन समाजिक अपराधियों का पर्दाफ़ाश करना आज एक अति महत्वपूर्ण दायित्व बन गया है. ये तत्व जनता के उस मध्यवर्ग की सोच को अपने-अपने धर्मों की चुस्की देकर मोथरा कर देते हैं जिन्हें सामाजिक, राजनैतिक, आर्थिक बदलाव की किसी मैलिक लडाई में एक निर्णायक भूमिका अदा करनी थी. समाज के मौलिक, मूलभूत प्रश्नों पर पर इन तथाकथित धार्मिक गुरुओं का समुहिक चुप्पी से इस परजीवी वर्ग की एकजुटता स्पष्ट नज़र आती है. इसके प्रमाण में मैं यही कहना चाहुंगा कि आज तक कोई भी गुरु-घंटाल, कथावाचक अथवा माता देश में चल रहे किसी भी मौलिक आंदोलन के पक्ष में नहीं बोलता दिखाई देता और न ही इनमें यह साहस कि वह दांतेवाडा, बस्तर अथवा उडीसा, आंध्र प्रदेश के बीहडों में अपना कोई जागरण आयोजित करें. कोई माता आजतक इरोम शर्मील से नहीं मिली, कोई नायक कश्मीर में जाकर नहीं बोला, किसी शंकर का घंटा किसी आत्महत्या करने वाले किसान के घर एक टोकरी रोटी के साथ नहीं बजा. यदि इस वर्ग का कोई  झुकाव देखने को मिला तो अपने हितों और स्वार्थों के अनुरुप अन्ना जैसे पौंगा पंडित आंदोलन में इनकी उपस्थिती मिली क्योंकि इन दोनों वर्गों का समाज में समर्थक समुह एक ही है, लुटेरा मध्यवर्ग, झटके से पैसा कमाने वाला तेज़ छाप करोडपति जिसकी तलछन वक्त पडने पर सडकों पर अपने-अपने धर्मों की रक्षा करने इंसानी लहू से होली खेलने से नहीं कतराती. इसी लंपट तत्व का राजनैतिक हीरो कभी ठाकरे तो कभी बुखारी तो कभी मोदी होता है.

समाज की मूलगामी बदलाव की शक्तियों को धर्म के परंपरागत इतिहास और उसके आडंबरी चेहरे को बेनकाब करना आज जनवादी ताकतों के  ऐजेण्डे से सिरे से गायब है. धर्म के नाम पर कद्दावर नेताओं को चुप होते देखना आज से पचास साल पहले की मजबूरी हो सकती है परंतु आज इस खामोशी को तोड़ना जरुरी है. जनवादी शक्तियों के पास भले ही इतने संसाधन न हों कि वह धार्मिक ठगों के प्रचार-प्रसार का मुकाबला कर सकें, लेकिन जहां भी हैं उन्हें उनकी खामोशी के लिये कल जवाब देना होगा. आने वाली पीढ़ी निश्चय ही उनसे प्रश्न जरुर करेंगी कि धार्मिक मूढ़ओं के इस कदर प्रचलन में उनकी चुप्पी का कितना बडा योगदान रहा? यह सही है कि इस संदर्भ में राज्य अपने उत्तरदायित्वों की पूर्ति भलिभांति न कर सका परन्तु समाज में एक सामाजिक और राजनैतिक इकाई के बतौर जनवादी शकियों ने क्या पहलकदमी ली? क्या वह काफ़ी थी? क्या वे किसी बर्फ़ को तोड़ने में सक्षम हुई? इन सब प्रश्नों का उत्तर आने वाले समय को देगा.

धर्म के नाम पर भारत के सांप्रदायिक दंगों का इतिहास लगभग सौ साल पुराना है अब इसका विस्तार पूरे उपमहाद्वीप में हो चुका है. पश्चिमी बर्मा कदो ज़िलों में इन दिनों बुद्ध और मुसलमान जनजातियों के सांप्रदायिक दंगे चल रहे हैं. ३ जून को एक बुद्धिस्त नवयुवती का बलात्कार करने के बाद उसका गला रेत कर हत्या कर दी गयी, उसके गुप्तांगों, छातियों में छुरे घोपे गये उसके फ़लस्वरुप पुलिस ने तीन अपराधियों को पकड़ लिया. जुमे का दिन आया, लोग नमाज़ पढ़ने गये, नमाज़ के बाद इन्हीं नमाज़ियों ने शहर में हिंसा का तांडव किया. अभी तक २९ लोगों के मारे जाने, हजारों घरों को जलाने की खबर है. स्थिती अभी भी तनाव पूर्ण है. बुद्ध धर्म शांति का प्रर्याय माना जाता है, इस्लाम के पास शांति के समस्त कापीराईट्स का एकाधिकार है. हिंदुओं के बिना शांति का ज्ञान उपलब्ध ही नहीं होगा, ईसा-मूसा वाले हथियारों से अफ़गानिस्तान, इराक में शांति स्थापित कर ही रहे हैं.ज़मीनी हकीकत यही है जो आज बर्मा में हो रहा है, जो आज बोको हराम नाईजीरिया में कर रहा है, जो कल गुजरात में हुआ, कानपुर, दिल्ली, मेरठ में हुआ. क्या हम कभी मूल प्रश्न पर विचार करेंगे कि यह कौन सी शिक्षा है जो हमें हैवान बना रही है? क्या इन अपराधियों का सामाजिक-राजनैतिक औचित्य है? क्या धर्म को समाज में विषवमन करने की इज़ाज़त है? क्या इस तथाकथित धर्म के चेहरे को बेनकाब करने, उसके प्रति जनता के हक में हमलावर रुख अख्तियार करने का यह सही समय नहीं है?

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It is hard to be loved by Idiots… मूर्खों से प्यार पाना मुश्किल है…

Arun Maheshwari : ग्यारह जनवरी को दस श्रेष्ठ कार्टूनिस्टों के हत्याकांड के बाद आज सारी दुनिया में चर्चा का विषय बन चुकी फ्रांसीसी व्यंग्य पत्रिका ‘शार्ली एब्दो’ पर सन् 2007 एक मुकदमा चला था। तब इस पत्रिका में डैनिस अखबार ‘जिलैट पोस्तन’ में छपे इस्लामी उग्रपंथियों पर व्यंग्य करने वाले कार्टूनों को पुनर्प्रकाशित किया गया था। इसपर पूरे पश्चिम एशिया में भारी बवाल मचा था। फ्रांस के कई मुस्लिम संगठनों ने, जिनमें पेरिस की जामा मस्जिद भी शामिल थी, शार्ली एब्दो पर यह कह कर मुकदमा किया कि इसमें इस्लाम का सरेआम अपमान किया गया है। लेकिन, न्यायाधीशों ने इस मुकदमे को खारिज करते हुए साफ राय दी कि इसमें मुसलमानों के खिलाफ नहीं, इस्लामी उग्रपंथियों के खिलाफ व्यंग्य किया गया है।

उसी समय, सन् 2008 में फिल्मकार डैनियला लिकोंत ने इस मुकदमे पर एक डाक्यूमेंट्री बनाई – It is hard to be loved by Idiots ( मूर्खों से प्यार पाना मुश्किल है)। फ्रांस के वर्तमान राष़्ट्रपति फ्रांस्वा ओलेंद ने उसी डाक्यूमेंट्री में यह बात कही थी – ‘कुछ स्वतंत्रताएं ऐसी है जिन पर कोई बात नहीं हो सकती है। अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर किसी प्रकार की सौदेबाजी नहीं की जा सकती है।’’

डैनियला लिकोंत की इस डाक्यूमेंट्री पर तब लोगों का विशेष ध्यान नहीं गया था। लेकिन आज यही डाक्यूमेंट्री फ्रांस के लोगों के प्रतिवाद और ‘शार्ली एब्दो’ के प्रति एकजुटता का प्रतीक बन गयी है। वहां के फिल्म समाज ने यह निर्णय लिया है कि देश भर के सौ से भी ज्यादा सिनेमागृहों में इस डाक्यूमेंट्री का पूरे एक हफ्ते तक प्रदर्शन किया जायेगा। इसमें पेरिस, मार्सै, स्ट्रासबेरी, ले हाफ्रे की तरह के बड़े शहरों से लेकर वहां के ब्रिटेनी की प्लुएस्केत जैसे छोटे शहरों के सिनेमागृह भी शामिल है। इससे होने वाली आमदनी को ‘शार्ली एब्दो’ को सौंप दिया जायेगा।

अरुण माहेश्वरी के फेसबुक वॉल से.

Mukesh Kumar : ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कैमरून ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की वकालत करते हुए पोप के तर्क को खुले आम खारिज़ कर दिया है। पोप ने आस्था के अपमान का सवाल उठाकर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का विरोध किया था। कैमरून का कहना है कि किसी स्वतंत्र समाज में किसी धार्मिक आस्था को आहत करने का अधिकार होना चाहिए। फ्रांस के राष्ट्रपति ने शार्ली एब्दो पर हुए हमले के बाद भी यही रुख़ अख़्तियार किया ता। विडंबना देखिए कि ऐसा साहस छप्पन इंच की छाती वाले नहीं दिखाते। साधु-संतों के ऊल-जलूल बयानों पर मनमोहन सिंह और नरसिम्हा राव टाइप चुप्पी साध जाते हैं।

मुकेश कुमार के फेसबुक वॉल से.

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नमाज शुरू होने से पहले रस्मी दुआ “मुसलमानों की काफिरों की कौम पर जीत हो” का मतलब क्या है?

Chandan Srivastava : तारेक फतह का एक लेख पढ़ा जिसमें वे लिखते हैं कि… 

”वे टोरंटो (कैनाडा) जहाँ वे रहते हैं, जुम्मे के नमाज को मस्जिद में जाना पसंद नहीं करते. उसमें से एक कारण ये है कि नमाज शुरू हो उसके पहले जो भी रस्मी दुआएं अता की जाती है उसमें एक दुआ “मुसलमानों की काफिरों की कौम पर जीत हो” इस अर्थ की भी होती है. बतौर तारेक फतह, यह दुआ सिर्फ टोरंटो ही नहीं लेकिन दुनियाभर में की जाती है. अब आप को पता ही है काफ़िर में तो सभी गौर मुस्लिम आते हैं – यहूदी, इसाई, हिन्दू, बौद्ध, सिख और निरीश्वरवादी भी. यह दुआ अपरिहार्य नहीं है. इसके बिना भी जुम्मे की नमाज की पवित्रता में कोई कमी नहीं होगी.”

आगे तारेक फतह के शब्दों में:

”मैंने अपने रुढीचुस्त मुसलमान मित्रों से चर्चा – विवाद किया कि चूँकि हम सब गैर मुस्लिम देशों में रहते हैं, तो यह दुआ नहीं करनी चाहिए. वे सभी सहमत होते तो हैं, लेकिन बिल्ली के गले में घंटा बांधे कौन? गत शुक्रवार, जब दुनिया जब शार्ली एब्दो के हादसे से उबरी भी नहीं थी तब और एक हमले की खबर आई कि एक जिहादी आतंकवादी ने एक यहूदी मार्किट में एक यहूदी को गोली मार दी है. मैंने सोचा, बस बहुत हो चुका अब. सो मैंने अपने मित्रों से कहा कि ये चुनौती अब हम ही उठाते हैं, चलिए “I am Charlie Hebdo” लिखे बोर्ड ले कर खड़े हो जाते है अपने लोकल मस्जिद के बाहर. गिनती के चार लोग आये. बाकी सभी मेरे इस्लामी जूनून से जिंदगीभर लड़ते साथी भी अखरी मिनट को डर कर भाग गए. और आतंक की निंदा करने के बजाय इमाम साहब दहाड़े कि इस्लाम इस मुल्क मैं सभी धर्मों के ऊपर स्थापित होगा. और मस्जिद के भीतर, मुझे उम्मीद थी कि अभी अभी ये हादसा ताजा है तो मुल्ला जी अक्ल से काम लेंगे और इस वक़्त गैर मुस्लिमों को दुश्मन करार नहीं देंगे, लेकिन मेरी उम्मीदों को टूटना ही नसीब था. आतंकियों की निंदा करना तो दूर की बात. इमाम साहब इंग्लिश में दहाड़े कि इस्लाम “will become established in the land, over all other religions, although the ‘Disbelievers’ (Jews, Christians, Hindus and Atheists) hate that.” मुझे मेरे कानों पर यकीन नहीं हो रहा था. उसी सुबह एक फ्रेच जिहादी ने यहूदियों को बंधक बनाने की खबर आई थी, उस पर भी कोई नाराजगी नहीं जताई उन्होंने. इमाम साहब ने हम सभी को कह कि अपमान पर प्रतिक्रिया के समय हम सभी मुसलमान रसूल के नक्शेकदम पर चलें. अब ये सुझाव के साथ दिक्कत ये है कि ऐसे कुछ मौकों पर रसूल ने उनका उपहास करनेवालों को माफ़ किया था, लेकिन कई ऐसे भी मौके हैं जहाँ उन्होंने ऐसे लोगों को मार डालने के भी निर्देश दिए थे. खुतबे के आखिर में इमाम साहब ने वो दुआ फिर से दोहराई जिसमें अल्लाह से दुआ की जाती है कि वे मुसलमानों को काफिरों की कौम पर फतह दिला दे. फिर हम सभी साफ़ सुथरी कतारों खड़े हुए, और मक्का की तरफ मुंह कर के सब ने इमाम साहब के निर्देश में जुम्मे की नमाज अता की. मस्जिद से जब निकला तब मैंने ठान ली थी कि मैं तो वहां वापस नहीं जानेवाला.”

नोट- पोस्ट कॉपी किया हुआ है जो कि इंग्लिश आर्टिकल का हिन्दी अनुवाद है. मूल आर्टिकल का लिंक ये है: 

http://www.meforum.org/4974/muslims-shouldnt-pray-to-defeat-non-muslims

आपको खतरे का अहसास अब से हो जाय इसलिए मेहनत की जा रही है.

लखनऊ के पत्रकार चंदन श्रीवास्तव के फेसबुक वॉल से.

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पेरूमल मुरगन प्रकरण : तुम्हारी आस्थाएं इतनी कमजोर और डरी हुई क्यों है धार्मिकों?

(भंवर मेघवंशी)


प्रसिद्ध तमिल लेखक पेरूमल मुरगन ने लेखन से सन्यास ले लिया है. वे अपनी किताब पर हुए अनावश्यक विवाद से इतने खफ़ा हो गए है कि उन्होंने ना केवल लेखनी छोड़ दी है बल्कि अपनी तमाम प्रकाशित पुस्तकों को वापस लेने की भी घोषणा कर दी है और उन्होंने प्रकाशकों से अनुरोध किया है कि भविष्य में उनकी कोई किताब प्रकाशित नहीं की जाये. पी मुरगन की विवादित पुस्तक ‘मधोरुबगन‘ वर्ष 2010 में कलाचुवंडू प्रकाशन से प्रकाशित हुई थी.

यह किताब तमिलनाडु के नमक्कल जिले के थिरुचेंगोड़े शहर के अर्धनारीश्वर मंदिर में होने वाले एक धार्मिक उत्सव ‘नियोग’ के बारे में बात करती है. दरअसल यह एक उपन्यास है, जिसमें एक निसंतान महिला अपने पति की मर्जी के बिना भी नियोग नामक धार्मिक प्रथा को अपना कर संतानोत्पति का फैसला करती है. यह पुस्तक स्त्री स्वातंत्र्य की एक सहज अभिव्यक्ति है. कोई सामाजिक अथवा ऐतिहासिक दस्तावेज़ नहीं है. यह बात अलहदा है कि वैदिक संस्कृति में नियोग एक स्वीकृत सामाजिक प्रथा के रूप में सदैव विद्यमान रहा है. ऋग्वेद में इसका उल्लेख कई बार आया है. मनु द्वारा निर्मित स्मृति भी इस बारे में स्पष्ट दिशा निर्देश देती है और महाभारत तो नियोग तथा इससे मिलते जुलते तौर तरीकों से पैदा हुए महापुरुषों की कहानी प्रतीत होती है.

प्राचीन भारतीय धार्मिक साहित्य के मुताबिक संतान नहीं होने पर या पति की अकाल मृत्यु हो जाने की स्थिति में नियोग एक ऐसा उपाय रहा है जिसके अनुसार स्त्री अपने देवर अथवा समगोत्री से गर्भाधान करा सकती थी. ग्रंथों के मुताबिक यह प्रथा सिर्फ संतान प्राप्ति के लिए ही मान्य की गयी, ना कि आनंद प्राप्ति हेतु. नियोग के लिए बाकायदा एक पुरुष नियुक्त किया जाता था. यह नियुक्त पुरुष अपनी जिंदगी में केवल तीन बार नियोग के ज़रिये संतान पैदा कर सकता था. हालाँकि नियोग से जन्मी संतान वैध मानी जाती थी, लेकिन नियुक्त पुरुष का अपने ही बच्चे पर कोई अधिकार नहीं होता था. नियोग कर्म को धर्म का पालन समझा जाता और इसे भगवान के नाम पर किया जाता था. इस विधि द्वारा महाभारत में धृतराष्ट्र, पांडु और विदुर पैदा हुए थे, जिसमें नियुक्त पुरुष ऋषि वेदव्यास थे. पांचों पांडव भी नियोग से ही पैदा हुए थे. दुनिया के लिहाज से ये सभी नाजायज थे किन्तु नियोग से जायज़ कहलाये. वैदिक साहित्य नियोग से भरा पड़ा है. वैदिक को छोड़िये. सम्पूर्ण विश्व के धार्मिक साहित्य में तमाम किस्म की कामुकता भरी हुई है. कई धर्मों के प्रवर्तक और लोक देवता नियोगी तरीके से ही जन्मे हैं. अधिकांश का जन्म सांसारिक दृष्टि से देखें तो अवैध ही लगता है, मगर ऐसा कहना उनके भक्तों को सुहाता नहीं है.

सारे धर्मों में एक बात तो समान है और वह है स्त्री की कामुकता पर नियंत्रण . पुरुष चाहे जो करे ,चाहे जितनी औरतें रखे ,चाहे जितने विवाह कर लें ,विवाह के भी दर्जनों प्रकार निर्मित किये गए ,ताकि मर्दों की फौज को मौज मस्ती में कोई कमी नहीं हो ,खुला खेल फर्रुखाबादी चलता रहे.बस औरतों पर काबू रखना जरुरी समझा गया ,किसी ने नारी को नरक का द्वार कह कर गरियाया तो किसी ने सारे पापों की जन्मदाता कह कर तसल्ली की .मर्द ईश्वरों द्वारा रचे गए मरदाना संसार के तमाम सारे मर्दों ने मिलकर मर्दों को समस्त प्रकार की छुटें प्रदान की और महिलाओं पर सभी किस्म की बंदिशें लादी गयी .यह वही हम मर्दों का महान संसार है जिसमें धर्मभीरु स्त्रियों को देवदासी बना कर मंदिरों में उनका शोषण किया गया है ,अल्लाह ,ईश्वर ,यहोवा और शास्ता के नाम पर कितना यौनाचार विश्व में हुआ है ,इसकी चर्चा ही आज के इस नरभक्षी दौर में संभव नहीं है . मैं समझ नहीं पाता हूँ कि नियोग प्रथा का उल्लेख करने वाली किताब से घबराये हुए कथित धार्मिकों की भावनाएं इतनी कमजोर और कच्ची क्यों है ,वह छोटी छोटी बातों से क्यों आहत हो जाती है ,सच्चाई क्यों नहीं स्वीकार पाती है ?

यह एक सर्वमान्य सच्चाई है कि देश के विभिन्न हिस्सों में काम कलाओं में निष्णात कई प्रकार के समुदाय रहे है ,जो भांति भांति के कामानुष्ठान करते है.इसमे उन्हें कुछ भी अनुचित या अपवित्र नहीं लगता है .कुछ समुदायों में काम पुरुष की नियुक्ति भी की जाती रही है ,जैसे कि राजस्थान में एक समुदाय रहा है ,जिसमे एक बलिष्ठ पुरुष को महिलाओं के गर्भाधान के लिए नियुक्त किया जाता था ,जिस घर के बाहर उसकी जूतियाँ नज़र आ जाती थी ,उस दिन पति अपने घर नहीं जाता था ,यह एक किस्म का नर-सांड होता था ,जो मादा नारियों को गर्भवती करने के काम में लगा रहता था और अंत में बुढा होने पर उस नर सांड को गोली मार दी जाती थी .आज अगर उसके बारे में कोई लिख दें तो उक्त समुदाय की भावनाएं तो निश्चित रूप से आहत हो ही जाएगी ,धरने प्रदर्शन होने लगेंगे ,लेखक पर कई मुकदमें दर्ज हो जायेंगे .राजस्थान में ही एक धार्मिक पंथ रहा है जो काम कलाओं के माध्यम से सम्भोग से समाधी और काम मिलाये राम में विश्वास करता है ,इसे ‘ कान्चलिया पंथ ‘ कहा जाता है ,इस पंथ के लोग रात के समय सत्संग करने के लिए मिलते है ,युगल एक साथ आते है ,रात में स्त्री पुरुष अपने अपने पार्टनर बदल कर काम साधना करते है और सुबह होने से पहले ही बिछुड़ जाते है ,यह पवित्र आध्यात्मिक क्रिया मानी जाती है .अब इसके ज़िक्र को भी शुद्धतावादी बुरा मानने लगे है ,मगर समाज में तो यह धारा आज भी मौजूद है .

हमारे मुल्क में तो कामशास्त्र की रचना से लेकर कामेच्छा देवी के मंदिर में लता साधना करने के प्रमाण धर्म के पवित्र ग्रंथों में भरे पड़े है ,नैतिक ,अनैतिक ,स्वेच्छिक ,स्वछंद ,प्राकृतिक ,अप्राकृतिक सब तरह के काम संबंधों का विवरण धार्मिक साहित्य में यत्र तत्र सर्वत्र उपलब्ध है ,फिर शर्म कैसी और अगर कोई इस दौर का लेखक उसका ज़िक्र अपने लेखन में कर दे तो उसका विरोध क्यों ? क्या सनातन धर्म चार पुरुषार्थों में काम को एक पुरुषार्थ निरुपित नहीं करता है ? क्या सनातन साहित्य इंद्र के द्वारा किये गए बलात्कारों और कुकर्मों की गवाही नहीं देता है ? अगर यह सब हमारी गौरवशाली सनातन संस्कृति का अभिन्न अंग है तो फिर समस्या क्या है ? क्या हमने नंग धडंग नागा बाबाओं को पूज्य नहीं मान रखा है ? क्या हमने कामदेव और रति के प्रणय प्रसंगों और कामयोगों के आख्यान नहीं रचे है ? क्या हम महादेव शिव के लिंग और माता पार्वती की योनी के मिलन पिंड के उपासक नहीं है ? अगर है तो फिर पेरूमल मुरगन ने ऐसा क्या लिख दिया जो हमारी संस्कृति का हिस्सा नहीं है ? वैसे भी सेक्स के बिना संस्कृति और सभ्यता की संकल्पना ही क्या है ? स्त्री पुरुष के मिलन को ना तो धर्म ग्रंथों की आज्ञा की जरुरत है और ना ही कथित सामाजिक संहिताओं की ,यह एक सहज कुदरती प्रक्रिया है जिसमे धर्म और धार्मिक संगठनों को इसमें दखल देने से बचना चाहिए .धर्म लोगों के बेडरूम के बजाय आत्माओं में झांक सके तो उसकी प्रासंगिकता बनी रह सकती है ,वैसे भी आजकल धर्मों का काम सिर्फ झगडा फसाद रह गया है , ऐसा लग रहा है कि ईश्वर अल्लाह अब लोगों को जीवन देने के काम नहीं आते है बल्कि मासूमों की जान लेने के काम आ रहे है ,मजहब का काम अब सिर्फ और सिर्फ बैर भाव पैदा करना रह गया प्रतीत होने लगा है , अब तो इन धर्मों से मुक्त हुए बगैर मानवता की मुक्ति संभव ही नहीं दिखती है .

कितने खोखले और कमजोर है ये धर्म और इनके भक्तों की मान्यताएं? इन कमजोर भावनाओं और डरी हुई आस्थाओं के लोग कभी एम एफ हुसैन की कूची से डर जाते हैं, कभी पीके जैसी फिल्मों से घबरा जाते है, कभी चार्ली हेब्दो के मजाक उनकी आस्थाओं की बुनियाद हिला देते हैं तो कभी पेरूमल मुरगन जैसे लेखकों के उपन्यास उन्हें ठेस पंहुचा देते हैं. ये कैसे पाखंडी और दोगले लोग हैं धर्मों के लबादे तले. जिनसे इनको लड़ना चाहिए उन्हीं लोगों के हाथों में इन्होने अपने धर्मों और आस्थाओं की बागडोर थमा दी है और जो इन्हें सुधार का सन्देश दे रहे हैं, उन्हीं को ये मार रहे हैं. कबीर ने सही ही कहा था– सांच कहूँ तो मारन धावे…. इन्हें लड़ना तो इस्लामिक स्टेट, तालिबान, भगवा आतंकियों, कट्टरता के पुजारियों और तरह तरह के धार्मिक आवरण धारण किये इंसानियत के दुश्मनों से था. पर ये ए के47 लिए हुए लोगों से लड़ने के बजाय कलमकारों, रंगकर्मियों, कलाकारों और चित्रकारों से लड़ रहे है.

इन्हें बलात्कारियों, कुकर्मियों से दो दो हाथ करने थे. समाज में गहरी जड़ें जमा चुके यौन अपराधियों, नित्यानान्दों और आसारामों, आतंकी बगदादियों, प्रग्याओं और असीमानंदों से लड़ना था. मगर मानव सभ्यता का यह सबसे बुरा वक़्त है. आज पाखंड के खिलाफ, सच्चाई के साथ खड़े लोगों को प्रताड़ित किया जा रहा है और झूठे, मक्कार और हत्यारों को नायक बनाया जा रहा है. लेकिन मैं कहना चाहता हूँ पेरूमल मुरगन से. पी के की टीम और चार्ली हेब्दो के प्रकाशकों से. अभिव्यक्ति की आज़ादी पर मंडराते ईश निंदा के इस खतरनाक समय में मैंने आपका पक्ष चुना है और मैं आपके साथ होने में अच्छा महसूस कर रहा है. निवेदन सिर्फ यह है -पेरूमल मुरगन कलम मत त्यागो, इस कुरुक्षेत्र से मत भागो, हम मिल कर लड़ेंगे, हम लड़ेंगे अपने अक्षरों की अजमत के लिए, अपने शब्दों के लिए, अपनी अभिव्यक्ति के लिए, अपने कहन के लिये. हम कलमकार हैं, जब तक कि कोई हमारा सर कलम ही ना कर दे, हमारी कलम खामोश कैसे हो सकती है? क्या हम जीते जी मरने की गति को प्राप्त हो सकते हैं. नहीं ,कदापि नहीं. इस लोकनिंदा की राख से फ़ीनिक्स पक्षी की भांति फिर से जी उठो पेरूमल, अभी मरो मत, अभी डरो मत, कलम उठाओ ….और ..और जोर जोर से लिखो.

लेखक भंवर मेघवंशी स्वतंत्र पत्रकार है. Bhanwar Meghwanshi से संपर्क bhanwarmeghwanshi@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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पूंजीपतियों की पक्षधरता के मामले में कांग्रेसी ममो के बाप निकले भाजपाई नमो!

: इसीलिए संघ और सरकार ने मिलजुल कर खेला है आक्रामक धर्म और कड़े आर्थिक सुधार का खेल : जनविरोधी और पूंजीपतियों की पक्षधर आर्थिक नीतियों को तेजी से लागू कराने के लिए धर्म पर बहस को केंद्रित कराने की रणनीति ताकि जनता इसी में उलझ कर रह जाए : सुधार की रफ्तार मनमोहन सरकार से कही ज्यादा तेज है। संघ के तेवर वाजपेयी सरकार के दौर से कहीं ज्यादा तीखे है । तो क्या मोदी सरकार के दौर में दोनों रास्ते एक दूसरे को साध रहे हैं या फिर पूर्ण सत्ता का सुख एक दूसरे को इसका एहसास करा रहा है कि पहले उसका विस्तार हो जाये फिर एक दूसरे को देख लेंगे।

यानी एक तरफ संघ परिवार ललचा रहा है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का विस्तार वह मोदी सरकार के दौर में खासी तेजी से कर सकता है तो उसे अभी विकास की जनविरोधी नीतियों की तरफ देखने की जरूरत नहीं है। तो दूसरी तरफ मोदी सरकार को भी इसका एहसास है कि संघ के बगैर मौजूदा वक्त में दूसरी कोई राजनीतिक ताकत नहीं है जो उसे विश्व बैंक और आईएमएफ की सोच को आर्थिक विकास तले लागू करने से रोक सके।

सरकार और संघ ने उस रास्ते को धुआंधार तरीके से पकड़ लिया है जो दोनों को विस्तार दे और टकराव के हालात आने तक दोनों ही मान कर चलें कि सत्ता हाथ में रहेगी तो रोक लेगें या सत्ता की डोर खींच लेंगे। आने वाले वक्त में होगा क्या, इसे ताड़ना तो दूर की गोटी होगी लेकिन इस दौर के दो संकेत साफ हैं। पहला, आरएसएस धर्म को धारण करने की सोच से कही आगे ले जाना चाहती है। दूसरा सरकार खेती और खनिज संपदा को राष्ट्रीय धरोहर से आगे बाजार की धरोहर बनाने-मानने को तैयार है। इस रास्ते में धर्म आक्रामक होगा, इससे इंकार नहीं किया जा सकता है। इस रास्ते जनता संसदीय राजनीति करने वाले राजनेताओं के खिलाफ खड़ी हो सकती है, इंकार इससे भी नहीं किया जा सकता।

पहली बार कोयला खादान के मजदूरों ने हड़ताल इसलिये की है क्योकि उन्हे निजी हाथो में बेचा जा रहा है। बैंक के कर्मचारी हडताल इसलिये करना चाह रहे हैं क्योंकि वेतन में इजाफा किये बगैर सरकार के सारे घतकर्म को बैंक के जरीये ही पूरा करने की नीति अपनायी जा रही है। बड़े बड़े हाथों से एनपीए की वसूली कैसे हो कोई नहीं जानता। जनधन के हर खाते को कोई बैंक कैसे कोई संभाले इसकी कोई नीति नहीं है। महंगाई को साधने का कोई उपाय सरकार के पास नहीं है। विपन्न तबके की तादाद लगातार बढ़ रही है क्योंकि विकास का मॉडल रोजगार देते हुये चकाचौंध लाने के खिलाफ है। वहीं विपन्न तबके में धर्म और आस्था के जरीये ही अपने होने का एहसास तेजी से जाग रहा है।

राजनीतिक तौर पर सत्ता के लिये सियासी ककहरा भी इस दौर में विपन्न तबके की ताकत बनी है। देश में विपन्न तबके की ताकत सत्ता से इसलिये टकराने से कतराती रही है क्योंकि सत्ता की नीतियो से इतर खेती एक सामानांतर अर्थव्यवस्था के तहत पेट भरती रही है और धर्म की आस्था का पाठ संयम से जुडा रहा है। लेकिन यह दोनों हालात सत्ता की निगाहों में चढ़ जाये या सत्ता ही दोनो को प्रबावित करने लगे तो रास्ता क्या निकलेगा। इसकी संवेदनशीलता कौन कितना समढ रही है यह अपने आप में सवाल है। मौजूदा वक्त में धर्म राष्ट्रवाद से जुड़ रहा है, जो आक्रमक हो चला है। दूसरी तरफ विकास की थ्योरी भी आक्रामक है। राष्ट्र विकास की थ्योरी तले पूंजी को ज्यादा महत्व दे रहा है। जिस खेती पर टिका देश का साठ फिसदी दुनिया की मंदी से प्रभावित हुये बगैर भी बाकी चालीस फिसदी को भी संकट से उबार लेता है और मनमोहन सिंह सरीखे सुधारवादी अर्थशास्त्री भी यह कहने से नहीं चुकते कि भारत की इकनॉमी दुनिया की मंदी से प्रभावित नहीं हुई। उसी खेती की जमीन को अगर विकास की चकाचौंध तले मुआवजे के नाम पर हथियारे का जमीन सुधार शुरू होगा तो फिर रास्ता जाता किधर है।

ना तो बहुफसली जमीन मायने रखती है और ना ही छत्तीसगढ या बंगाल सरीखे राज्यो की खेती अर्थव्यवस्था। औघोगिक गलियारों के नाम पर रक्षा के लिये हथियारो के उद्योग लगाने के नाम पर या फिर ग्रामिण क्षेत्रो में बिजली पहुंचाने के नाम पर सरकार कोई भी जमीन ले सकती है। सिर्फ मुआवजा पहले की तुलना में ज्यादा मिल जायेगा। लेकिन इसकी एवज में सरकार के पास ऐसी कोई योजना भी नहीं है कि रोजगार बढे या विपन्न लोगों को रोजगार मिले। ध्यान दें तो मनमोहन सिंह के दौर में भी कई तरीकों से उदारीकरण के नाम पर उपजाऊ भूसंपदा कारपोरेट घरानो को सौपी गयी। जो रियल इस्टेट में खपा। अकूत मुनाफाखोरी हुई। आवारा पूंजी का खुला खेल नजर आया। कालाधन की उपज भी तो इसी खुली व्यापार योजना के दायरे में होती रही। तो यह खेल अब अलग कैसे होगा।
योजना आयोग की घिसी पिटी लकीरों को मिटाकर नयी लकीर खिंचने के लिये बने नीति आयोग की नयी भर्ती से भी समझा जा सकता है। याद कीजिये तो मनमोहन सिंह के दौर में योजना आयोग के उपाध्यक्ष की कुर्सी पर मोंटेक सिंह अहलूवालिया बैठा करते थे और अब नीति आयोग के उपाध्यक्ष की कुर्सी पर अरविन्द पानागढिया बैठेंगे। दोनों विश्व बैंक की नीतियों तले बने अर्थशास्त्री हैं। दोनों के लिये खुला बाजार खासा मायने रखता है। वर्ल्ड बैंक और आईएमएफ में काम करते हुये दोनों ने ही आर्थिक सुधार को ना सिर्फ खासा महत्वपूर्ण माना बल्कि भारत सरीखे तीसरी दुनिया के देशों के लिये दोनो के लिये विकास की रेखा कंजूमर की बढती तादाद से तय होती है। दोनों ही डब्ल्यूटीओ की उन नीतियों का विरोध कभी ना कर सके जो भारत के किसान और मजदूरों के खिलाफ रही। दोनों ही खनिज संपदा को मुक्त बाजार या कहे मुक्त व्यापार से जोड़ने में खासे आगे रहे। फिर योजना आयोग से बदले नीति आयोग में अंतर होगा क्या। महत्वपूर्ण यह भी है कि भारत में जितनी असमानता है और बिहार, यूपी, झारखंड सरीखे बीमारु राज्य की तुलना में महाराष्ट्र, कर्नाटक जैसे विकसित राज्य के बीच कभी मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने भी विकास को हर तबके तक पहुंचाने के लिये री-डिस्ट्रीब्यूशन आफ डेवलपमेंट की थ्योरी रखी। जिस वक्त नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री पद के लिये लोकसभा के चुनावी प्रचार में जुटे थे उस वक्त अरविन्द पनगारिया ने भी बकायदा भारत में विकास की असमानता को लकेर कई लेखों में कई सवाल उठाये।

फिर विश्व बैंक और आईएमएफ का नजरिया भारत को लेकर इन दोनो अर्थशास्त्रियों के काम करने के दौरान ही कितना जन विरोधी रहा है, यह मनमोहन सिंह के दौर में बीजेपी ने ही कई मौको पर उठाये। और तो और, संघ परिवार का मजदूर संघटन बीएमएस हो या स्वदेशी जागरण मंच दोनो ने ही हमेशा विश्व बैंक और आईएमएफ की नीतियों को लेकर वाजपेयी सरकार से लेकर मनमोहन सरकार तक पर सीधी चोट की है । अब यहा नया सवाल है कि एक तरफ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के हिन्दू राष्ट्र की परिकल्पना और दूसरी तरफ भारत को विकसित देश बनाने के लिये सरकार की नीतियां। एक तरफ संघ के तीन दर्जन संगठन जो आदिवासी से लेकर किसान और मजदूर से लेकर देशी उत्पादन पर टिके स्वावलंबन के लिये बीते चालीस बरस से काम कर रहे हैं और उन्हें बीच से निकले राजनीतिक कार्यकर्ता जो संघ परिवार की राष्ट्रीय सोच को ही धर्म की चादर में ही लपेटा हुआ दिखा रहे है। तो यह आपसी सहमति से है या आपसी अंतर्विरोध। या फिर सहमति और अंतर्विरोध के बीच की लकीर ही मौजूदा दौर में एक हो चली है। क्योंकि कल तक संघ परिवार के बीच काम करने वाले मुरलीधरराव हों या संघ के पांच सौ से ज्यादा प्रचारक। जो वाजपेयी सरकार से लेकर मनमोहन सरकर के दौर में उसी विदेसी निवेश और पूंजी पर टिके उसी विकास के खिलाफ थे जो रोजगार दे नहीं पा रही थी और पूंजीवालों को हर सुविधाओं से लैस कर रही थी।

मनमोहन सिंह के दौर में पूंजी पर टिके विकास ने 40 फिसदी मजदूरों के रोजगार छीने और 70 फीसदी स्वरोजगार में सेंध लगायी। २००५-२०१० के दौर में देश में कुल २७० लाख रोजगार हुये। लेकिन इसी दौर में करीब ढाई लाख स्वरोजगार बेरोजगार हो गये। इसी दौर में उद्योगों को टैक्स सब्सिडी हर बरस पांच लाख करोड़ तक दी गयी। और इस सब की हिमायत विश्व बैक और आईएसएफ से लेकर डब्लूटीओ तक ने की, जहां से निकले अर्थशास्त्री अब नीति आयोग को संभाल रहे हैं बल्कि मनमोहन सरकार के दौर में आर्थिक सलाह देने वाले डा विवेक देवराय भी नीति आयोग के स्थायी सदस्य नियुक्त हो चुके हैं। यानी सिर्फ अरविन्द पानागढ़िया का ही नहीं बल्कि मुक्त व्यापार के समर्थक रहे अर्थशास्त्री डॉक्टर बिबेक देवराय का भी सवाल है जो आर्थिक मुद्दों पर मनमोहन सिंह के दौर में सुझाव देते आये है और इन अहम सुझावों को कभी बीजेपी ने सही नहीं माना। या कहें कई मौकों पर खुलेआम विरोध किया। डा देवराय इससे पहले की सरकार में विदेशी व्यापार, आर्थिक मसले और कानून सुधार के मुद्दों पर सलाहकार रह चुके हैं। यानी मनमोहन सरकार के दौर की नीतियों का चलन यहां भी जारी रहेगा। तो सवाल है बदलेगा क्या। वैसे भी जमीन अधिग्रहण से लेकर मजदूरों के लिये केन्द्र सरकार की नीतियों से संघ परिवार में भी कुलबुलाहट है। जिस तरह मुआवजे के दायरे में जमीन अधिग्रहण को महत्व दिया जा रहा है और मजदूरों को मालिकों के हवाले कर हक के सवाल को हाशिये पर ढकेला जा रहा है उससे संघ का ही भारतीय मजदूर संघ सवाल उठा रहा है।

सवाल यह भी है कि खुद नरेन्द्र मोदी ने पीएम बनने के बाद संसद के सेंट्रल हाल में अपने पहले भाषण में ही जिन सवालों को उठाया और उसके बाद जिस तरह हाशिये पर पड़े तबको का जिक्र बार बार यह कहकर किया कि वह तो छोटे छोटे लोगों के लिये बड़े बड़े काम करेंगे तो क्या नयी आर्थिक नीतियां वाकई बड़े बड़े काम छोटे छोटे लोगों के लिये कर रही है या फिर बड़े बड़े लोगों के लिये। क्योंकि देश की एक तिहाई आबादी गरीबी रेखा के नीचे है, जो कम होगी कैसे, इसकी कोई योजना नीतिगत तौर पर किसी के पास नहीं है। बड़़े पैमाने पर रोजगार के साधनों को उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी राज्य पर है, लेकिन रोजगार कारपोरेट और कारोबारियों के हाथ में सिमट रहा है और पहले ना मनमोहन सिंह कुछ बोले और ना ही अब कोई बोल रहा है। गरीबों के लिए समाज कल्याण की योजनाएं सरकार को बनानी हैं। लेकिन मनमोहन सिंह के दौर में सारी योजना तो अब सारी नीतियां कल्याणकारी पैकेज में सिमट रही है। ऐसे में नीति आयोग क्या अपने उद्देश्यों पर खरा उतरेगा-ये किसके लिये कितना बड़ा, यह तो वक्त बतायेगा लेकिन असल मुश्किल है कि एक तरफ धर्म के नाम पर घर वापसी का सवाल आक्रामक हो चला है और देश को इसमें उलझाया जा रहा है मीडिया से लेकर सोशल मीडिया तक में धर्म के नाम पर कही औवेसी तो कही आरएसएस का नाम लेकर राष्ट्रवाद को परिभाषित करने का खुला खेल चल रहा है तो दूसरी तरफ आर्थिक सुधार की नीतियो की रफ्तार मनमोहन सिंह के दौर से कई गुणा तेज है और यह लगने लगा है कि निजी सेक्टर चुनी हुई सरकार से भी ताकतवर हो चले हैं।

लेखक पुण्य प्रसून बाजपेयी वरिष्ठ पत्रकार हैं और आजतक न्यूज चैनल में वरिष्ठ पद पर कार्यरत हैं. उनका यह लिखा उनके ब्लाग से साभार लेकर भड़ास पर प्रकाशित किया गया है.

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The biggest general manager of Hindu religion has raised objection against pK

Jagdish Singh : Saw pK. Great movie. One of the greatest in history of Indian cinema. Here in San Jose, California too, it is running house full. Great imagination. Great story. Great acting. Hilarious. Must watch.

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The biggest general manager of Hindu religion has raised objection against pK. His earnings got effected first by Sai worship. Now, it seems, he has to close his shop altogether. He is scared. The ever flourishing businesses of these managers will get in red very soon. Asha Ram, Ram Pal and others have also contributed to demise of this enterprise. In US and Europe, most of the literature young men have already stopped going to church. Now church is surviving only because of attendance of illiterates from Latin America and other places. Islam, off course is not yet affected, since most of the Muslim countries are poorly literate.

भारतीय प्रशासनिक सेवा से रिटायर जगदीश सिंह के फेसबुक वॉल से.


 

UTKARSH SINHA : फिल्म पीके पर बहुत बवाल कटा जा रहा है।  हम भी देख के आये, बवाल जैसा कुछ लगा नहीं सो कई सवाल मन में खड़े हो रहे हैं।

1-कुछ अरसा पहले आई थी ओ माई गॉड (ओएमजी) बहुत सफल रही और उसमें भी अंध विश्वास और ईश्वर के दुकानदारों को कटघरे में खड़ा किया था तब स्वरूपानंद और हल्ला बिग्रेड को कोई आपत्ति नहीं हुयी। और उसके मुख्य कलाकार परेश रावल भाजपा के सांसद बन जाते हैं।

2-पीके में दिखाए गए तपस्वी बाबा से मिलते-जुलते कई करेक्टर हमें रोज दीखते हैं मसलन निर्मल बाबा, नागिन डांस करने वाला बाबा और भी तमाम जिनमे से कई जेल की रोटी खा रहे हैं। क्या इन्हें कटघरे में लाने का विरोध कर हम उन्हें समर्थन नहीं दे रहे?

3- शंकर जी के भूमिका वाले कलाकार को टॉयलेट में जाते दिखने में क्या गड़बड़ है स्वामी? क्या रामलीला के कलाकार ये काम नहीं करते? और फिर क्या कभी रामलीला के बीच में होने वाले लौंडा डांस को रोकने की कोशिश की है इस हल्ला ब्रिगेड ने।

4- फिल्म का एक ही सन्देश है और वह ये की ईश्वर से हमारा तार जोड़ने से रोकने वाले ये धर्मगुरु ही बदमाश लाईन मैंन की भूमिका निभाते हैं और ये सच भी है।

5- फिल्म की हिन्दू नायिका एक पाकिस्तानी से प्रेम करती है, यह समस्या है मगर जब एक था टाइगर का नायक पाकिस्तानी नायिका को भगा ले जाता है तब हम प्रसन्न हो जाते हैं।

6- आमिर खान को लेकर हम गुस्स्सा करते हैं क्यूंकि वो एक मुस्लिम है मगर फिल्म के निर्माता विधु विनोद चोपड़ा, निर्देशक राज कुमार हिरानी और लेखक अभिजीत जोशी सहित अन्य कलाकारों को बख्श देते हैं।

लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार उत्कर्ष सिन्हा के फेसबुक वॉल से.

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प्यार नहीं, आपकी पॉलिटिक्स कुछ और है बॉस… प्यार है तो धर्मांतरण की जरूरत क्यों?

हाल ही में आया इलाहाबाद उच्च न्यायालय का फैसला न्याय व तर्क के हर पहलू पर फिट बैठता है. कितनी बेहतरीन बात कही न्यायालय ने… अगर धर्म में आस्था ही नहीं, तो धर्म परिवर्तन क्यों? सही बात है, इसे तो धर्मगुरु भी मानेंगे कि धर्म को एक दांव की तरह तो नहीं इस्तमाल किया जा सकता न कि शादी करनी हो या तालाक लेना हो तो धर्म का दांव खेल दिया. इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने जिन मामलों की सुनवाई करते हुए फैसला दिया, आईये उन पर गौर करते हैं. दरअसल एक ही विषय पर पांच अलग-अलग याचिकाएं न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत की गईं. इन सभी में हिन्दू लड़कियों ने मुसलमान लड़कों से शादी करने के खातिर इस्लाम कुबूल किया फिर निकाह किया व न्यायालय के समक्ष अपनी शादी को वैधता देने और सुरक्षा की मांग की. सभी याचिकाकर्ताओं ने मजिस्ट्रेट के समक्ष जो बयान दिए थे उनकी विषय वस्तु कमोबेश एक ही थी.

“मेरा नाम XYZ है, मेरे पिता जी का नाम ABC है. मैं जंगलीपुर जिला सिद्धार्थनगर की रहने वाली हूं. मैं इंटरमीडिएट तक पढी हूं. मेरा निकाह अब्दुल रहीम ने बब्लू उर्फ इरफान के साथ करा दिया. यह निकाह अकबरपुर जिला इलाहाबाद में कराया गया था. मेरा धर्म परिवर्तन अब्दुल रहीम ने कराया था. यह धर्म परिवर्तन उन्होंने शादी करने के लिए कराया था. धर्म परिवर्तन बब्लू उर्फ इरफान के कहने पर कराया गया था. मैं इस्लाम के विषय में कुछ नहीं जानती.”

न्यायालय ने इन्हीं शपथ पत्रों के आधार पर कहा कि मात्र शादी के लिए धर्म परिवर्तन कैसे जायज ठहराया जा सकता है. जबकि धर्म परिवर्तन की तो आवश्यक शर्त है आस्था में बदलाव. ऐसा नहीं है कि यह पहली बार है जब न्यायालयों ने किसी खास मकसद के लिए किए गए धर्म परिवर्तन को अवैध ठहराया हो. ऐसे ही एक मामले लिलि थॉमस बनाम यूनियन ऑफ इंडिया में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया था कि अगर कोई गैर मुस्लिम व्यक्ति मात्र दूसरी शादी करने के लिए मुस्लिम धर्म अपना लेता है, जबकि उसके धार्मिक आस्था में वास्तविक तौर पर कोई बदलाव नहीं हुआ है तो ऐसा धर्मांतरण शून्य होगा. ऐसे मामले जब बहुतायत में आने लगते हैं तो न्यायालयों को अपेक्षाकृत अधिक स्पष्ट रुख अपनाना ही पड़ता है.

लव जिहाद की बहस गरम होने के बाद न्यायालय परिसरों में भी इस बहस ने जोर पकड़ा कि क्या वाकई हिन्दू लड़कियों को प्रेम जाल में फंसा कर मुसलमान बनाया जा रहा है. ज्यादातर वकीलों का तो यही मानना है कि जिस मात्रा में मुस्लिम लड़का व हिन्दू लड़की की शादी के मामले आते हैं उसकी आधी मात्रा में भी हिन्दू लड़का व मुस्लिम लड़की के मामले नहीं ही आते हैं. न्यायालयों के रुख से भी लगता है कि इन मामलों पर स्पष्ट व्यवस्था अब वे देना चाहती हैं. अभी पिछले दिनों इलाहाबाद उच्च न्यायालय की ही लखनऊ खंडपीठ ने निकाह के मामलों में काजी को पार्टी बनाए जाने व निकाह की पूरी प्रक्रिया को आगे से स्पष्ट करने को कहा है. हैबियस कार्पस (बंदी प्रत्यक्षीकरण) का एक मामला चावली बनाम राज्य सरकार पर भी लखनऊ खंडपीठ में बहस पूरी हो चुकी है, फैसला सुरक्षित कर लिया गया है, उम्मीद है जल्दी ही एक और बड़ा बड़ा फैसला सुनाया जाएगा. इस मामले के साथ भी दर्जनों प्रेम विवाह के मामले कनेक्ट किए गए हैं. उधर एटा के शहर काजी बदूद अहमद ने न्यायालय के फैसले को मानने से इंकार कर दिया है. उन्होंने कहा कि धर्म परिवर्तन शरीयत का हिस्सा है. तो क्या काजी साहब ये कहना चाहते हैं कि कोई भी व्यक्ति कलमा पढ ले भले वो इस्लाम के नियमों को न माने वह मुसलमान हो सकता है? बल्कि मैं समझता हूं कि न्यायालय ने तो धर्मों का मजाक बनने से ही बचाया है.

बात लम्बी होती जा रही है. दरअसल मेरी समझ में एक महत्वपूर्ण मुद्दा आता है. अगर लड़का-लड़की में प्रेम है तो धर्म कैसे बीच में आ जाता है? नहीं, धर्म को बीच में कोई और नहीं खुद लड़का लेकर आता है. आखिर क्यों लड़की का धर्म परिवर्तन करा के ही विवाह या निकाह कराया जाता है? जबकि कानून ने स्पेशल मैरिज एक्ट की सुविधा दे रखी है. जिसमें दो अलग-अलग मजहब को मानने वाले भी शादी कर सकते हैं. फिर लड़कों के लिए क्यों जरूरी होता है अपने वाले मजहब में ही शादी करना. माफ कीजिएगा, समाज धर्मान्ध है लेकिन ऐसे लड़के क्या कुछ कम धर्मान्ध हैं? आपको पता है लखनऊ में इस साल मात्र 13 जोड़ों की स्पेशल मैरिज एक्ट में शादियां हुईं जिसमें अलग-अलग मजहब को मानने वाले लड़के और लड़्की थे. प्यार करते समय स्थिति चाहे जो होती हो लेकिन शादी के वक्त तो आपके प्यार पर आपका मजहब भारी ही पड़ जाता है, मिस्टर. इन तथ्यों से तो यही लगता है कि प्यार नहीं आपकी पॉलिटिक्स कुछ और ही है बॉस.

लेखक चन्दन श्रीवास्तव लखनऊ से प्रकाशित हिंदी दैनिक कैनविज टाइम्स में बतौर वरिष्ठ संवाददाता कार्यरत हैं और लीगल बीट कवर करते हैं. चंदन से संपर्क chandan2k527@yahoo.co.in के जरिए किया जा सकता है.

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संत रामपाल : ….यूं ही कोई इतना लोकप्रिय नहीं हो सकता!

मैं संत रामपाल को नहीं जानता न ही उनके दर्शन और अध्यात्म की उनकी व्याख्या से। पर वे खुद कहते हैं कि वे हिंदू नहीं हैं और खुद को ही परमेश्वर मानते हैं। हिंदुओं के लगभग सभी सेक्ट उनके खिलाफ हैं खासकर आर्य समाज से तो उनकी प्रतिद्वंदिता जग जाहिर है। वे कबीर साहब के आराधक हैं और मानते हैं कि वे इस दुनिया में आने वाले पहले गुरु थे। इसमें कोई शक नहीं कि संत रामपाल अपार लोकप्रिय हैं। उनके भक्त उनके लिए अपनी जान तक दे सकते हैं। संत परंपरा वैदिक अथवा ब्राह्मण परंपरा नहीं है। संत परंपरा श्रावक व श्रमण परंपरा तथा पश्चिम के सेमेटिक दर्शनों का घालमेल है। पर जो व्यक्ति संत की पदवी पा जाता है उसके भक्त उसको ईश्वर अथवा ईश्वर का दूत मानने लगते हैं।

वैदिक परंपरा ईश्वर को नकारती है। पर संत रामपाल के भक्त कोई चतुर, सुजान अथवा अपराधी प्रवृत्ति के नहीं हैं। वे सामान्य मानव हैं और अपने को सताए जाने से दुखी हैं। वे किसी आध्यात्मिक शक्ति की खोज में हैं जो उनके कष्ट समाप्त कर सके। संत रामपाल ने उन्हें कोई राह तो दिखाई होगी वर्ना यूं ही कोई इतना लोकप्रिय नहीं हो सकता। पर यहां यह बात मैं जरूर कहूंगा कि भले संत रामपाल ईश्वर हों लेकिन चूंकि वे इस मानवी दुनिया में और वह भी ईश्वर की भूमि कहे जाने वाले भारत में प्रकट हुए हैं इसलिए उन्हें यहां के सारे गुण-दोष मानने पड़ेंगे। मसलन संत जी को भारतीय संविधान, कानून और नियम सब मानने पड़ेंगे। वे संविधानेतर नहीं हैं इसलिए उन्हें कोर्ट के समक्ष प्रकट होना चाहिए। उन्हें भारत की न्यायपालिका पर भरोसा होना चाहिए। तब ही वे अपने को परमेश्वर के रूप में और स्थापित कर पाएंगे।

वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ल के फेसबुक वॉल से.

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कबीर साहेब क्यों हैं आज भी स्वीकृत और गौतम बुद्ध हो गए खारिज?

Sumant Bhattacharya : इस धरती पर “कबीर साहेब” एकमात्र ऐसे संत हुए जिन्होंने लाठी लेकर “हिंदू और मुसलमानों” के आडंबर पर बरसाया। जितना उन्होंने गरिआया, और वो भी देसी भाषा में, उतना तो किसी और ने नहीं। बावजूद आज भी भारत में कबीर साहेब के 21 करोड़ से ज्यादा अनुयायी है। वहीं “गौतम बुद्ध” हुए। जिन्होंने एक संगठित धर्म की स्थापना की. “ब्राह्मण आडंबरों” की पुरजोर मुखालफत की, समृद्ध दर्शन भी दिया। फिर क्यों गौतम बुद्ध अपनी ही जमीन से खारिज हो गए और कबीर साहेब आज भी पूजे जाते हैं?

गौर करता हूं तो पाता हूं, कबीर साहेब ने इस जमीन के उच्च नैतिक आदर्शों पर जीवन को जिया। ना तो उन्होंने गौतम की तरह रात को सोती अपनी पत्नी और पुत्र को छोड़ पलायन किया और ना ही ब्राह्मण संस्कारों को कोसने के बाद हाथ में भिक्षा पात्र लेकर जीवन को जिया। कबीर साहेब ने परिवार के उत्तरदायित्वों का पूरी तरह निर्वहन किया और टिकटी पर कपड़ा बिन एक मानव के आत्मसम्मान को बनाए रखते हुए उच्च नैतिक जीवन को जीकर दिखाया। ऐसा कोई उदाहरण नहीं मिलता कि संगठित धर्म खड़ा करने के नाम पर कबीर साहेब ने किसी से कोई अनुदान या फिर भक्तों से कोई चढ़ावा लिया हो। लेकिन गौतम तो इससे भी ना बचे। साफ है, ताकत संगठन में नहीं, नैतिक मानकों में हैं। शायद इसे कोई कूढ़मगज कभी समझें? कुछ चिंतक कहते हैं कि कबीर साहेब ने विकल्प नहीं दिया। तो मैं पूछता हूं कि क्या खारिज करने से बड़ा कोई विकल्प है? नहीं ना? लेकिन खारिज करने का मतलब “नया गिरोह” बनाना नहीं होता भाई?

शायद यही एक ऐसी धरती है, जहां रहने वाले, कोई किसी भी धर्म का क्यों ना हो., किसी भी विचार से क्यों ना जीवन जीता हो, लेकिन यदि उसने उच्च नैतिक मानकों को स्थापित किया तो इस देश के निवासी उसे स्वीकार कर पूजागृह में स्थान देने में तनिक कोताही ना करेंगे। मिसाल हैं, शिरडी के साई बाबा, जो मुसलमान फकीर थे, और इस जमीन के लोगों ने उन्हें अपने तमाम देवी-देवताओं के साथ पूजाघर में विराज दिया। शंकराचार्य की आवाज भी अनसुनी कर दी। है क्या दुनिया के किसी और धर्म या संप्रदाय है यह जिगर….? अफसोस, विनम्रता और स्वीकार करने के मानकों को कहीं बड़ी बेशर्मी के साथ कमजोरी करार दी जाती है। अपन कोई हिंदूवादी नहीं है, गाली भी देते हैं, कोसते भी हैं, लेकिन खूबियों को अंध बुद्धि से नकारने के भी पक्षधर नहीं हैं मित्रों।

वरिष्ठ पत्रकार सुमंत भट्टाचार्या के फेसबुक वॉल से.

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क्या हिंदू ब्राह्मणों ने भी कर्बला की लड़ाई में हिस्सा लिया था ?

हिंदुस्तान के सभी धर्मों में हज़रत इमाम हुसैन से अकीदत और प्यार की परंपरा रही है. घटना कर्बला के महान त्रासदी ने उदारवादी मानव समाज हर दौर में प्रभावित किया है. यही कारण है कि भारतीय समाज में शहीद मानवता हज़रत इमाम हुसैन की याद न केवल मुस्लिम समाज में रही है बल्कि ग़ैर मुस्लिम समाज में मानवता के उस महान नेता की स्मृति बड़ी श्रद्धा के साथ मनाई जाती है. भारतीय सभ्यता जिसने हमेशा मज़लूमों का साथ दिया है घटना कर्बला के महान त्रासदी से प्रभावित हुए बगैर ना रह सकी. भारतीय इज़ादारी एक व्यक्तिगत स्थिति रखता है, जो सांस्कृतिक परंपरा न केवल मुसलमानों में स्थापित है बल्कि हिन्दो हज़रात भी इसमें भाग लेते हैं. भारतीय पूर्व राजवाड़ों में हिन्दो हज़रात यहाँ इमाम हुसैन से अकीदत की ऐतिहासिक परंपरा मिलती हैं जिसमें राजस्थान, ग्वालियर “मध्य प्रदेश”, बंगाल मुख्य है.

हिंदुओं में एक परिवार या समुदाय हुसैनी ब्राह्मण भी कहलाता है. प्रसिद्ध लेखक इंतजार हुसैन अपने अंग्रेजी स्तंभ Brahmans in Karbala में लिखते हैं कि वह पहले हुसैनी ब्राह्मण केवल हिंदू कहानी (Legend) ही समझते थे इसलिए उन्होंने अपने प्रवास दिल्ली में किसी महफ़िल में भाषण करते हुए इस बात को झुठला दिया. वहीं महफ़िल में एक महिला प्रोफेसर नूनीका दत्त उठी और उन्होंने कहा कि वह खुद हुसैनी ब्राह्मण और उनके परिवार से संबंध रखती है. इंतजार हुसैन ने नूनीका दत्त से पूछा कि मानो आप लोग मुसलमान हो गए हैं. उन्होंने कहा कि कभी नहीं. हम हिंदू ब्राह्मण ही हैं मगर हुसैनी होने के नाते हम मंदिरों आदि में नहीं जाते न दूसरी हिन्दवानह संस्कार खेलते हैं और यह कि वह मुहर्रम के दिनों में शहीदों की याद भी मनाते हैं.

प्रसिद्ध ज़माने फिल्म अभिनेता, हर दिल अज़ीज़ सामाजिक सेवक और लोकप्रिय राजनीतिक नेता स्वर्गीय सुनील दत्त अपने हुसैनी ब्राह्मण कहते थे. रसूल छोटे नवासे इमाम हुसैन इतिहास मानवता पहला और शायद आखिरी बच्चा है जो जन्म पर परिवार रोया. रसूल खुद रोए जब जिब्राईल अमीन इमाम हुसैन का जन्म पर बधाई के साथ यह बताया कि उस बच्चे को कर्बला के मैदान में तीन दिन का भूखा प्यासा अपने 71 साथियों के साथ शहीद हो जाएगा और इस परिवार की महिलाएं और बच्चे कैद कर दरबदर फिराए जाएंगे. जैसा कहा गया सुनील दत्त अपने हुसैनी ब्राह्मण कहते थे. उनका कहना था कि हमारे पूर्वजों की संतान नहीं थी. रसूल के समझजज़ों को सुनकर वह उनके पास पहुंचे तो इमाम हुसैन खेल रहे थे. रसूल ने कहा कि आप उनके लिए प्रार्थना करो. हुसैन ने अपने नन्हे हाथ ऊंचा किया और प्रार्थना की और उनके बच्चों हुई. तभी से लोग अपने हुसैनी ब्राह्मण कहने लगे.

हुसैनी ब्राह्मण दरदना भट्टाचार्य के वंशज थे. उनमें आत्माभिमान, बहादुरी, और रहमत कोट कोट कर भरी थी. कहा जाता है कि कर्बला में हुसैन की शहादत की खबर सुनी तो हुसैनी ब्राह्मण 700 ई. में इराक पहुंचे और इमाम हुसैन का बदला लेकर लौटे. याद रहे कि कर्बला की घटना 680 ई. में हुआ था. इस्लाम का संबंध बहुत पुराना है. रसूल बड़े नवासे इमाम हसन के समय से ही अरब व्यापारी समुद्र के रास्ते केरल की बनदगाह आते. ख्वाजा मोईनुद्दीन चिश्ती जो ख्वाजा अजमेर के नाम से प्रसिद्ध हैं अजमेर आए. यह इमाम हुसैन के परिवार से थे और हिंदुस्तान आने पर धार्मिक रवादाती लोगो कहलाए. आज भी उनके मजार पर हर धर्म के मानने वाले आते हैं. उनके मंदिर के अध्यक्ष दरवाजे पर फारसी भाषा में लिखे गए उनके चारों मसरावं में इमाम हुसैन की महानता और उनके उद्देश्य की ऊंचाई बड़े आम समझ शब्दों में इस प्रकार समझाया है

झांसी की रानी महारानी लक्ष्मी बाई को इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम से असाधारण आस्था थी. प्रोफेसर रफ़ेिह शबनम ने अपनी पुस्तक ‘भारत में शिया और ताजिया दारी ” मैं झांसी की रानी के संबंध में लिखा है कि” यौमे आशूरा और मुहर्रम के महीने में लक्ष्मी बाई बड़े आस्था के साथ मानती थी और इस महीने में वे कोई भी ख़ुशी वाले काम नहीं करती थी

मुंशी जवालह प्रसाद अख्तर लिखते हैं कि” राज्य अवध में इमाम हुसैन की सेना के सेनापति और वाहक हज़रत अब्बास के नाम का पहला झंडा अवध की धरती से से उठा जिस के उठाने का श्रेय मुगल सेना के एक राजपूत सरदार धरम सिंह को जाता है . .लखनऊ के प्रसिद्ध रौज़ा” काज़मैन” एक ऐसे हिंदू श्रद्धालु जगन्नाथ अग्रवाल ने बनवाया था. इसी तरह राजा झा लाल रौज़ा आज भी लखनऊ के ठाकुर गंज मुहल्ले में स्थित है

समकालीन प्रख्यात पत्रकार जमनादास अख्तर कहते हैं कि” मेरा संबंध मवहयालयों की दत्त जाति से है और हमें हुसैनी ब्राह्मण कहा जाता है. ाशोरह को हम शोक मनाते हैं. कम से कम मेरे परिवार में उस दिन खाना नहीं खाया है. श्रीनगर के इमामबाड़े में हज़रत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम का मुंए मुबारक मौजूद है जो काबुल से लाया गया है. एक हुसैनी ब्राह्मण उसे सौ साल पहले काबुल से लाया था.”

प्रेमचंद का प्रसिद्ध नाटक ‘कर्बला’ सही और गलत से पर्दा उठाता है. इसी तरह उर्दू साहित्य में ऐसे हिंदू कवियों की संख्या कुछ कम नहीं जो अपनी रचनाओ में कर्बला के बारे में जिक्र न किया हो ऐसे सक्षम ज़करशिरा बीजापुर के रामारा?, बी दास मुंशी चखनो लाल दलगीर, राजा बलवान सिंह, लाला राम परशादबशर, दिया किशन री्षान, राजा उल्फत राय, कंवर धनपत राय, खनोलाल जार, दलोराम कौसर, नानक लखनवी, मिनी लाल जवान, रूप कुमारी, ीोगीनदरपाल साबरजूश मलेशानी, मुंशी गोपीनाथ शांति, चकबसत, बावा कृष्ण मगमोम, कंवर महेंद्र सिंह बेदी सहर, कृष्ण बिहारी, डॉ. धर्मेंद्र नाथ, माथरलिखनवी, महीनदरसनघ अश्क, बाँगेश तिवारी, गुलज़ार देहलवी, भवन मरवहवी आदि ने इमाम हुसैन की अक़ीदत में बहुत से कविताये लिखी है जिस में उन का अक़ीदा झलकता है.

. सरदार धरम सिंह संबंध सिख धर्म था और वे सख्ती से गुरू नानक की शिक्षाओं का पालन करते थे, उन्होंने कई बार हज़रत इमाम हुसैन के हवाले से बात करते हुए गुरू नानक का अपने मुरीद के साथ होने विला संवाद दोहराया जो बाबा गुरु नानक ने मुरीद कहा कि हजरत इमाम हुसैन का गम मनाया करो, जब मुरीद ने अनिच्छा का प्रदर्शन किया तो गुरू नानक ने कहा कि हुसैन मुसलमानों के ही नहीं विवेक वालों के गुरु हैं, इसलिए उनका शोक मनाना हर इंसान पर लाज़िम है. अवध राज्य में लखनऊ की ताजियादारी विशेष महत्व मिली है. मुहर्रम के मजलसों और जलूसों में में हिंदुओं की भागीदारी भारतीय साझा संस्कृति का एक नमूना है और हिन्दू – मुस्लिम एकता को बढ़ावा देने में अहम रोल अदा करता है.

लेखक अफ़ज़ल ख़ान शारजाह (यूएई) में कार्यरत हैं. कसौटी टीवी से जुड़े हुए हैं. उनसे संपर्क kasautitv@gmail.com के जरिए किया जा सकता है.

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