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साहित्य

छत्तीसगढ़ के दो पत्रकारों संतोष और सोमारू को रिहा कराने के लिए 21 को जगदलपुर में जेल भरेंगे पत्रकार

नमस्‍कार. 

आप जानते होंगे कि छत्‍तीसगढ़ में दो पत्रकार संतोष यादव और सोमारू नाग पिछले कुछ महीनों से फर्जी मामले में बस्‍तर की जेल में बंद हैं और उन्‍हें लगातार प्रताडि़त किया जा रहा है। अब तक कोई राष्‍ट्रीय आंदोलन इस मसले पर खड़ा नहीं हो सका है। पहली बार देश भर के पत्रकार 21 दिसंबर, 2015 को जगदलपुर में पत्रकार महाआंदोलन और जेल भरो आंदोलन करने जा रहे हैं। इस आंदोलन में आप सभी के निजी और सांगठनिक समर्थन की दरकार है।

 

दिल्‍ली से कुछ पत्रकार 21 तारीख को बस्‍तर जा रहे हैं। जो नहीं जा पा रहे हैं, उनकी ओर से मैं प्रतिनिधि के तौर पर यह मेल आप सभी को भेज रहा हूं। कृपया अटैच फाइल में लिखा समर्थन का वक्‍तव्‍य पढ़कर अपना या अपने संगठन का नाम समर्थन में रिप्‍लाइ में लिखकर भेजें। यदि आपको लगता है कि इस बयान में कुछ और जोड़ा जा सकता है तो सुझावों का स्‍वागत है। इस मेल के जवाब में कृपया अपने संगठन / प्रकाशन / वेबसाइट / पत्र / पत्रिका / पोर्टल का नाम लिखकर  सहमति अवश्‍य दें।

सादर,
अभिषेक श्रीवास्‍तव
Abhishek Srivastava 
स्‍वतंत्र पत्रकार, दिल्‍ली
मॉडरेटर, जनपथ डॉट कॉम
[email protected]


 

छत्तीसगढ़ के पत्रकार महाआंदोलन के समर्थन में बयान

संतोष-सोमारू को रिहा करो!
पत्रकार सुरक्षा कानून बनाओ!
जन सुरक्षा अधिनियम खत्‍म करो! 

छत्‍तीसगढ़ के बस्‍तर में इस साल जुलाई और सितंबर में जन सुरक्षा अधिनियम के तहत फर्जी मामलों में गिरफ्तार किए गए हिंदी के दो पत्रकारों सोमारू नाग और संतोष यादव की रिहाई व पत्रकार सुरक्षा कानून बनाने की मांग को लेकर 21 दिसंबर, 2015 को जगदलपुर में होने जा रहे पत्रकार महाआंदोलन को हम बेशर्त समर्थन ज़ाहिर करते हैं। देश में पिछले कुछ समय से अभिव्‍यक्ति की आज़ादी पर जिस तरह से हमले बढ़े हैं और पत्रकारों को लगातार डराया, धमकाया व मारा गया है, उसने लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई सरकारों की वैधता पर सवाल खड़ा कर दिया है और लोकतंत्र के बुनियादी उसूलों को ही खतरे में डाल दिया है। 

छत्‍तीसगढ़ की स्थिति इस मामले में इसलिए विशिष्‍ट है क्‍योंकि वहां पत्रकारों को नक्‍सलियों और राज्‍यसत्‍ता के दो खेमों में बांट दिया गया है। हालत यह है कि दंतेवाड़ा के सुदूर अंचलों में सांस लेने के लिए पत्रकारों को पुलिस या नक्सलियों की अनुमति लेनी होती है और अगर किसी पत्रकार को पुलिस और नक्सलियों के संघर्ष में पिस रहे आदिवासियों की चीखें बेचैन करती हैं और वह तटस्थ रहने का अपराधबोध सहन नहीं कर सकता है, तो उसकी जगह जेल या मृत्युलोक ही तय है। बस्तर में आंचलिक पत्रकारों की भयावह स्थिति को नेमीचंद्र जैन और साईं रेड्डी के उदाहरणों से समझा जा सकता है जिनको पहले पुलिस ने नक्सलियों का मुखबिर होने के आरोप में जेल भेजा और बाद में रिहा होने पर नक्सलियों ने उन्हें पुलिस का एजेंट बता कर मार डाला। अब संतोष यादव और सोमारू नाग को लगातार जगदलपुर की जेलों में उत्‍पीड़न से गुज़रना पड़ रहा है लेकिन अब तक देश भर में कोई बड़ा आंदोलन इनके समर्थन में खड़ा नहीं हो सका है। 

बस्तर में पत्रकार पहले भी आन्दोलित हुए हैं। उन्होंने न केवल सरकार और पुलिस तंत्र के विरुद्ध अपना स्वर तीखा किया बल्कि नक्सलियों के विरोध में भी अपनी जान को हथेली पर रख कर उतरे हैं। जब पत्रकार नेमीचन्द्र जैन की हत्या नक्सलियों द्वारा की गई थी, तब एकजुट होकर सभी आंचलिक पत्रकारों ने यह निर्णय लिया था कि कोई भी नक्सल सम्बन्धी समाचार नहीं बनाया जाएगा। इसके बाद नक्सली प्रवक्ता गुडसा उसेंडी ने लिखित माफीनामा जारी किया था। एक अन्य आन्दोलन पत्रकार साईं रेड्डी की हत्या के साथ आरम्भ हुआ जिसमें सभी आंचलिक पत्रकार दोबारा एकजुट हुए और उन्होंने नक्सल इलाकों के भीतर घुस कर अपनी बात रखने और विरोध करने का फैसला किया। यह नक्‍सलियों को स्पष्ट संदेश था कि कलम की अभिव्यक्ति पर आतंक हरगिज़ बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। यही स्थिति पुलिस तंत्र और उसकी ज्यादतियों के विरुद्ध भी है और होनी भी चाहिए। ये घटनाएं और आन्दोलन स्पष्ट करते हैं कि बस्तर के पत्रकार व्यक्ति के लिए नहीं बल्कि अभिव्यक्ति के मूलभूत अधिकार के लिए लड रहे हैं।

लोकतंत्र के कारगर तरीके से काम करने के लिए ज़रूरी है कि इस देश का पत्रकार निष्‍पक्ष और निर्भीक होकर बिना किसी दबाव के अपना काम कर सके ताकि लोगों तक सही खबरें पहुंचायी जा सकें। संतोष यादव और सोमारू नाग का उदाहरण इस लिहाज से राज्यसत्‍ता के आतंक व तानाशाही के खिलाफ एक प्रतीक है और देश में अभिव्‍यक्ति की आज़ादी की लड़ाई को इसी के इर्द-गिर्द खड़ा किया जाना ज़रूरी है। देर से ही सही, लेकिन देश भर के पत्रकारों के बीच इस मसले पर हो रही हलचल स्‍वागत योग्‍य है। 

हमारी मांग है कि संतोष और सोमारू को तत्‍काल बिना शर्त रिहा किया जाए। इसके अलावा छत्‍तीसगढ़ जन सुरक्षा अधिनियम नाम का काला कानून तुरंत खत्‍म किया जाए और पत्रकारों की सुरक्षा के लिए एक कानून बनाया जाए, जिसकी मांग 21 दिसंबर को पत्रकार सुरक्षा कानून संयुक्त संघर्ष समिति के तहत उठायी जा रही है। इसके अलावा हम राज्‍य सरकार से यह भी मांग करते हैं कि बीते पांच वर्षों में पत्रकारों पर हुए हमलों और उत्‍पीड़नों पर वह एक श्‍वेत पत्र जारी करे और इस मसले पर एक सार्वजनिक परामर्श की प्रक्रिया चलाए जिससे एक समग्र पत्रकार सुरक्षा कानून बनाने में मदद मिलेगी। 

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