मनदीप पुनिया-
नोएडा मज़दूर आंदोलन के लिए जेल में बंद पत्रकार सत्यम वर्मा और थिएटर आर्टिस्ट आकृति पर यूपी पुलिस ने राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) लगा दिया है.
सत्यम वर्मा एक पत्रकार, सार्वजनिक बुद्धिजीवी, संपादक और अनुवादक हैं. उन्होंने यूनिवर्ता में कई वर्ष काम किया. वे “भगत सिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण उपलब्ध दस्तावेज़” की ऐतिहासिक कृति के संपादक हैं. रोमिला थापर की पुस्तक सोमनाथ का हिंदी अनुवाद किया है.
वे जनपक्षधर बुद्धिजीवी रहे हैं, जिन्होंने हमेशा लोगों के न्यायसंगत संघर्ष के साथ एकजुटता दिखाई और अन्याय के खिलाफ असहमति की मजबूत आवाज बने.
नोएडा में कभी न जाने और प्रदर्शनकारियों से कोई संपर्क न होने के बावजूद उनकी गिरफ्तारी असहमति की आवाज को कुचलने और दूसरों के लिए चेतावनी देने का स्पष्ट प्रयास है.
मजदूर बिगुल की आकृति नोएडा श्रमिक मामले में एक महीने से अधिक समय से गिरफ्तार हैं. उन पर भी एनएसए लगाया जा रहा है.
आकृति दिल्ली विश्वविद्यालय से इतिहास में मास्टर्स और दौलत राम कॉलेज से ग्रेजुएट है. सत्यम वर्मा और आकृति पर एनएसए लगाना सभी लोकतांत्रिक आवाजों को कुचलने और डराने का प्रयास है.
बोलो साथी एफबी पेज का पोस्ट-

नोएडा मज़दूर आंदोलन से जुड़े मामले में गिरफ्तार पत्रकार सत्यम वर्मा और थिएटर आर्टिस्ट आकृति पर उत्तर प्रदेश पुलिस ने राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) लगा दिया है। इस कार्रवाई को लेकर लोकतांत्रिक और जनपक्षधर हलकों में गंभीर चिंता जताई जा रही है। सत्यम वर्मा एक वरिष्ठ पत्रकार, सार्वजनिक बुद्धिजीवी, संपादक और अनुवादक हैं। उन्होंने समाचार एजेंसी यूनिवर्ता में कई वर्षों तक कार्य किया है। वे “भगत सिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण दस्तावेज़” जैसी महत्वपूर्ण ऐतिहासिक कृति के संपादक रहे हैं।
इसके अलावा उन्होंने इतिहासकार रोमिला थापर की पुस्तक “सोमनाथ” का हिंदी अनुवाद भी किया है। सत्यम वर्मा लंबे समय से जनपक्षधर हस्तक्षेपों और लोकतांत्रिक अधिकारों के सवालों से जुड़े रहे हैं। उनके समर्थकों का कहना है कि उन्होंने हमेशा सामाजिक न्याय और जनसंघर्षों के पक्ष में आवाज उठाई है। आरोप लगाया जा रहा है कि नोएडा में कभी न जाने और प्रदर्शनकारियों से प्रत्यक्ष संपर्क न होने के बावजूद उनकी गिरफ्तारी असहमति की आवाजों को दबाने की कोशिश है।
वहीं दिशा छात्र संगठन से जुड़ी थिएटर आर्टिस्ट आकृति भी नोएडा श्रमिक मामले में एक महीने से अधिक समय से जेल में बंद हैं। अब उन पर भी NSA लगाए जाने की खबर है। आकृति ने दिल्ली यूनिवर्सिटी से इतिहास में मास्टर्स किया है और दौलत राम कॉलेज से स्नातक की पढ़ाई पूरी की है। सामाजिक और लोकतांत्रिक संगठनों का कहना है कि सत्यम वर्मा और आकृति पर NSA लगाना असहमति और लोकतांत्रिक अधिकारों को दबाने की व्यापक कोशिश का हिस्सा है। विभिन्न संगठनों ने इस कार्रवाई को वापस लेने और दोनों की रिहाई की मांग की है।
कविता कृष्णपल्लवी-
नोएडा विरोध प्रदर्शन मामले में गिरफ़्तार एक्टिविस्टों सत्यम वर्मा और आकृति चौधरी पर यूपी पुलिस ने दमनकारी रासुका लगाया!
नोएडा में मज़दूरों के विरोध प्रदर्शन से जुड़े एक्टिविस्टों की पहली ग़ैरक़ानूनी गिरफ़्तारियों के एक महीने से अधिक समय बाद और नोएडा के फ़ेज-2 में मज़दूरों के प्रदर्शन के दौरान हिंसा भड़कने के ठीक एक महीने बाद, आज यूपी पुलिस ने वरिष्ठ पत्रकार सत्यम वर्मा और छात्र एक्टिविस्ट आकृति चौधरी पर राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून (रासुका), 1980 लगाने जैसा अतिवादी क़दम उठाया है। ग़ौरतलब है कि कल सेशन कोर्ट में सत्यम और आकृति की जमानत याचिकाओं पर सुनवाई हुई थी। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद जज ने मामले को स्थगित कर दिया था।

बचाव पक्ष के वकीलों ने आरोपों के खोखलेपन और गिरफ़्तारियों की ग़ैरक़ानूनी प्रकृति को उजागर किया था, जबकि सरकारी वकील सत्यम या आकृति के ख़िलाफ़ कोई ठोस सबूत पेश नहीं कर सके थे। सत्यम को लखनऊ से गिरफ़्तार किये जाने के ग़ैरक़ानूनी कृत्य को लेकर इलाहाबाद उच्च न्यायालय में भी एक याचिका दायर की गई है, जिसपर इसी सप्ताह सुनवाई होनी है। यह भी ध्यान देने योग्य है कि आरोपी एक महीने या उससे अधिक समय से न्यायिक हिरासत में हैं, और अब जाकर यूपी पुलिस ने उन पर रासुका लगाया है!
स्पष्ट है कि उनका प्रयास यह सुनिश्चित करना है कि नोएडा हिंसा मामले में झूठे तौर पर फँसाए गए लोगों को किसी भी क़ीमत पर इस अन्यायपूर्ण क़ैद से रिहा न होने दिया जाए। यूपी पुलिस ने यह क़दम इसलिए उठाया है क्योंकि पूरा मामला निराधार है और एक महीने बाद भी उनके पास सत्यम, आकृति या अन्य लोगों की संलिप्तता का कोई वास्तविक सबूत नहीं है। हम सभी देश में पुलिस द्वारा रासुका के बारंबार दुरुपयोग से भली-भाँति परिचित हैं, जिसकी ओर उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालय ने कई बार ध्यान दिलाया है, साथ ही वरिष्ठ वकीलों, कानूनी विशेषज्ञों और मानवाधिकार संगठनों ने भी इसे रेखांकित किया है।
जिन मामलों में रासुका लगाया गया है, उनमें से 79% मामलों में अब तक कोई सज़ा नहीं हो पायी, लेकिन इस क़ानून के प्रावधान पुलिस को असीम शक्ति और सबूत पेश करने या चार्जशीट दाखिल करने के लिए 12 महीने तक का लम्बा समय देते हैं। कम सज़ा दर यह साबित करती है कि आज रासुका के अधिकांश मामलों में प्रक्रिया ही सज़ा बन जाती है। इस मामले में रासुका लगाए जाने से कुछ बेहद गम्भीर सवाल भी उठते हैं। एक ओर स्वतंत्र मीडिया रिपोर्टों और मजदूरों के साक्षात्कारों ने हिंसा भड़काने में यूपी पुलिस की भूमिका की सम्भावना की ओर संकेत किया है, वहीं दूसरी ओर इन गम्भीर तथ्यों की निष्पक्ष और उच्च-स्तरीय जाँच कराने के बजाय यूपी पुलिस सत्यम, आकृति और अन्य एक्टिविस्टों को और अधिक फँसाने में लगी हुई है, जिन्होंने मजदूरों की न्यायपूर्ण माँगों का समर्थन किया था।
सत्यम वर्मा एक वरिष्ठ पत्रकार हैं, जिन्होंने तीन दशकों तक यूनीवार्ता में काम किया है, और वे जनचेतना पुस्तक प्रतिष्ठान तथा जागरूक नागरिक मंच से जुड़े एक सार्वजनिक बुद्धिजीवी और एक्टिविस्ट हैं। वे एक प्रसिद्ध सम्पादक और अनुवादक हैं, जिन्होंने भगत सिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण लेखन का संकलन किया है, तथा बाल्ज़ाक, अप्टन सिंक्लेयर, मार्क ट्वेन, बर्टोल्ट ब्रेख्त, देनी दिदेरो, रोमिला थापर और अन्य लेखकों की कृतियों का अनुवाद किया है। वे नोएडा में मज़दूरों के विरोध प्रदर्शन में मौजूद भी नहीं थे, और 17 अप्रैल को लखनऊ से पुलिस ने उन्हें अगवा कर लिया था। वास्तव में, सत्यम नोएडा में आख़िरी बार 12 साल पहले गए थे!
फिर भी यूपी पुलिस उन्हें मुख्य साज़िशकर्ता के रूप में पेश कर रही है और दावा कर रही है कि वे वहाँ मौजूद थे तथा हिंसा भड़का रहे थे। सत्यम ने बस वही किया जो कोई भी सजग नागरिक करता — उन्होंने अपने सोशल मीडिया के माध्यम से मज़दूरों की न्यायपूर्ण माँगों और उनके शान्तिपूर्ण आन्दोलन के प्रति एकजुटता व्यक्त की। यह अपने आप में काफ़ी कुछ बताता है कि यूपी पुलिस इसे एक ऐसे “अपराध” के रूप में प्रस्तुत करना चाह रही है जिसके लिए रासुका लगाया जाना ज़रूरी है!
आकृति चौधरी एक छात्र एक्टिविस्ट और रंगकर्मी हैं। वे दिशा छात्र संगठन की सदस्य हैं जिसने लगातार सबके लिए शिक्षा और रोजगार की माँग उठाई है तथा आम छात्रों और युवाओं के अधिकारों के लिए संघर्ष किया है। दिल्ली विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग से स्नातकोत्तर करने के बाद वे पीएचडी की तैयारी कर रही हैं। 11 अप्रैल को बॉटनिकल गार्डन मेट्रो स्टेशन से सादे कपड़ों में आए पुरुष पुलिसकर्मियों द्वारा अगवा किए गए चार लोगों में आकृति भी शामिल थीं। एक न्यायप्रिय, प्रगतिशील छात्र एक्टिविस्ट और कलाकार के रूप में उन्होंने लगातार समाज के वंचित तबक़ों के मुद्दों का समर्थन किया है, और उन्होंने रंगमंच को भी जनता के संघर्षों को अभिव्यक्त करने का कलात्मक माध्यम बनाया है।
वे 11 अप्रैल को नोएडा में हुए प्रदर्शन में मजदूरों के आन्दोलन के प्रति एकजुटता जताने गयी थीं और मज़दूरों के बीच शान्तिपूर्ण हड़ताल की वकालत कर रही थीं। आकृति जिन्हें हिंसा भड़कने से दो दिन पहले ही गिरफ़्तार कर लिया गया था और जो अब एक महीने से अधिक समय से जेल में बन्द हैं, उनपर अब रासुका लगाया गया है, जिसके कारण यह सम्भावना है कि बिना किसी ठोस सबूत के उन्हें एक साल तक जेल में रहना पड़ सकता है!
इस बात की प्रबल सम्भावना है कि यूपी पुलिस गिरफ़्तार किये गए सभी 7 एक्टिविस्टों — जिनमें आदित्य आनंद, रूपेश रॉय, मनीषा चौहान, सृष्टि गुप्ता और हिमांशु ठाकुर भी शामिल हैं — पर रासुका लगाएगी। यह स्पष्ट है कि ऐसा इसलिए किया जा रहा है ताकि इन एक्टिविस्टों को जमानत पर रिहा न होने दिया जाये, और सभी न्यायप्रिय लोगों को यह संदेश दिया जा सके कि मज़दूर आंदोलनों का समर्थन करने पर, यहाँ तक कि ऑनलाइन समर्थन करने पर भी, कठोर दमन का सामना करना पड़ेगा। नोएडा में विरोध प्रदर्शन शुरू होने के बाद से यूपी पुलिस द्वारा उठाया गया हर क़दम साफ़ संकेत देता है कि वे मज़दूरों को अपनी माँगें उठाने से डराना चाहते हैं और उनके समर्थन में उठने वाली आवाज़ों को दबाना चाहते हैं। रासुका लगाया जाना शायद अब तक का सबसे चरम और सबसे दमनकारी कदम है। लेकिन हम यह दोहराना चाहते हैं कि ये कोशिशें सफल नहीं होंगी।
ऐसे आन्दोलनों के ख़िलाफ़ सबसे चौंकाने वाले दमन के बावजूद, देश के अलग-अलग हिस्सों में हर दिन मज़दूर बेहतर मज़दूरी, बेहतर कार्य परिस्थितियों और इस असहनीय महँगाई के संकट के ख़िलाफ़ लड़ने के लिए सड़कों पर उतर रहे हैं। और हर दिन उनकी माँगों के साथ खड़ी होने वाली और न्याय के पक्ष में उठने वाली आवाज़ों की संख्या बढ़ती ही जाएगी।


