सुप्रीम कोर्ट की ये लाउड और क्लियर आवाज और अखबार प्रबंधन का बहरापन

जिसे लाउड और क्लियर आवाज न सुनाई दे, उसे आप क्‍या कहेंगे। यह आवाज दैनिक जागरण के वकीलों को सुनाई दे रही है पर दैनिक जागरण प्रबंधन को नहीं। ऐसे ही लोग दुर्घटना के शिकार होते हैं। कोई कान में म्‍यूजिक की लीड लगाकर दुर्घटना को बुलावा देता है तो कोई अहंकार की लीड के शिकंजे में है। सुप्रीम कोर्ट में मजीठिया वेज बोर्ड मामले पर सुनवाई आज यानि 12 जनवरी दिन मंगलवार को हुई। न्यायाधीश रंजन गोगोई की अदालत मामले की सुनवाई हुई।

लंबे समय बाद सुनवाई होने से देश भर के प्रिंट मीडियाकर्मियों में उम्मीद जगी है। जैसा कि अनुमान लगाया जा रहा था कि इस बार कुछ बड़ा फैसला हो सकता है, हुआ कुछ वैसा ही। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि अधिकतर मीडिया संस्‍थानों ने मजीठिया वेज बोर्ड लागू नहीं किया है। कई राज्‍यों ने अभी तक सुप्रीम कोर्ट को अपने यहां मजीठिया वेज बोर्ड लागू किए जाने की स्थिति की रिपोर्ट दाखिल नहीं की है। सुप्रीम कोर्ट ने इस संबंध में रिपोर्ट दाखिल करने के लिए दो हफ्ते का वक्‍त दिया है। सुप्रीम कोर्ट की अगली सुनवाई 6 हफ्ते बाद होगी। इस पर सुप्रीम कोर्ट में दैनिक जागरण के वकील कपिल सिब्‍बल ने कहा है कि सुप्रीमकोर्ट की इस सुनवाई के दौरान अखबार मालिकों को लाउड और क्लियर मेसेज मिल गया है।

मीडिया मालिकों में अदालतों और कानूनों की लगातार अवमानना की प्रवृत्ति को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने  अपने सख्‍त रुख का संकेत दे दिया है। ज्यादातर राज्यों के श्रम विभागों ने मीडिया मालिकों के अनुकूल रिपोर्ट भेजकर एक तरह से सुप्रीम कोर्ट की आंख में धूल झोंकने का काम किया है। ऐसे में निराश मीडियाकर्मियों के लिए एकमात्र उम्मीद की किरण सुप्रीम कोर्ट ही है। मीडिया मालिक लगातार 20जे का भुलावा देते रहे हैं, लेकिन वे अब ऐसा नहीं कर पाएंगे।

अखबार मालिकान 20जे की आड़ में सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवमानना से नहीं बच सकते हैं। एक बार को हम 20जे के मुद्दे को एक एकरतफ भी रख दें, तो भी अखबार मालिकान ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवमानना तो की ही है। मजीठिया वेजबोर्ड के अनुसार स्‍थायी के साथ-साथ ठेका और अंशकालिक कर्मचारियों को भी वेजबोर्ड के लाभ मिलने हैं। ऐसे में 1 दिसंबर 2011 के बाद किसी भी संस्‍थान एवं न्‍यूज एजेंसी में भर्ती सभी साथी चाहे वे स्‍थायी हों या ठेके पर या अंशकालिक सभी के सभी मजीठिया वेजबोर्ड के तहत वेतनमान लेने के अधिकारी हैं। ज्‍यादातर समाचार-पत्रों ने 20जे की आड़ में इनको भी मजीठिया वेजबोर्ड की सिफारिशों के अनुसार वेतनमान से वंचित कर रखा है, जबकि यह सभी साथी 20जे की परिधि से बाहर हैं। जो कि सीधे-सीधे सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवहेलना है।

अब हम आते हैं मूल मुद्दे 20जे पर जिसकी आड़ में मालिकान अपने को बचाने की कोशिश में लगे हुए हैं। 20जे की मूल अवधारणा आपके वेतनमान को कतई कम करने की नहीं है। बल्कि इसका उद्देश्‍य उन साथियों के हितों की रक्षा के लिए था जो मजीठिया वेजबोर्ड की सिफारिशों के तहत मिलने वाले वेतनमान से अधिक वेतन ले रहे थे। उदाहरण 1. समाचार संपादक के पद पर कार्यरत संजय जोशी का वेतन मजीठिया वेजबोर्ड की सिफारिशें लागू होने के समय 2 लाख रुपये था। वेजबोर्ड की सिफारिशें लागू होने से उसका वेतन 1,05,445 रुपये हो जाता। ऐसे में 20जे में प्रदत्‍त अधिकार के तहत वह अपना पुराना वेतन (2लाख रुपये) कायम रख सकता है।

उदाहरण 2. एक अन्‍य अखबार में समाचार संपादक के पद पर कार्यरत नवीन कोठारी का वेतन मजीठिया वेजबोर्ड की सिफारिशें लागू होने के समय 50 हजार रुपये था। वेजबोर्ड की सिफारिशें लागू होने से उसका वेतन 1,05,445 रुपये हो जाएगा। ऐसे में उसके ऊपर 20जे लागू नहीं हो सकता, क्‍योंकि यह केवल वेजबोर्ड से ऊपर वेतन पाने वालों के हितों की रक्षा के लिए हैं, न कि उससे कम वेतन पाने वालों के लिए। यानि नवीन कोठारी को वेजबोर्ड के अनुसार 1,05,445 रुपये वेतन के रुप में मिलने ही है। इसके अलावा हम आपको पहले भी बता चुके हैं कि वर्किंग जर्नलिस्‍ट एक्‍ट 1955 में भी स्‍पष्‍ट है कि कोई भी संस्‍थान आपको वेजबोर्ड की सिफारिशों से कम वेतन नहीं दे सकता।

[धारा 13- धारा 12 के अधीन केंद्रीय सरकार के आदेश के प्रवर्तन में आने पर, प्रत्‍येक श्रमजीवी पत्रकार इस बात का हकदार होगा कि उसे उसके नियोजक द्वारा उस दर पर मजदूरी दी जाए जो आदेश में विनिर्दिष्‍ट मजदूरी की दर से किसी भी दशा में कम न होगी। Sec. 13- Working journalists entitled to wages at rates not less than those specified in the order – On the coming into operation of an order of the Central Government under section 12, every working journalist shall be entitled to be paid by his employer wages at the rate which shall in no case be less than the rate of wages specified in the order.]

फोर्थ पिलर ब्लाग से साभार.

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अखबार मालिकों की गुंडई और दुस्साहस पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, कई आदेश दिए



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