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शराब पीकर पत्रकारिता कोई नई बात नहीं है!

जे सुशील-

शराब पीकर पत्रकारिता कोई नई बात नहीं है. एक बहुत सम्मानित संपादक अपनी मेज की दराज़ में छोटी सी बोतल रखा करते थे और बीच बीच में एक एक घूंट लिया करते थे. जब बोतल न हो तो वो कॉपी देख नहीं पाते थे. वो एक बेहद जहीन संपादक थे इसमें किसी को कोई शक नहीं था लेकिन शराब के बिना वो काम नहीं कर पाते थे. लगातार पान खाते रहना भी उनका शगल था और वो बिना किसी से कुछ बोले चुपचाप कॉपियां संपादित किया करते थे. बाकी पत्रकारों को हड़काने का काम वो दिन में करते थे जब उन्होंने पी नहीं होती थी. कॉपियां देखना वो शाम के चार बजे दो घूंट के साथ शुरू करते थे.

इसी तरह एक और महान पत्रकार हुए जिन्हें किसी चैनल में सुबह का एक कार्यक्रम करना होता था. ऐसा उस चैनल के इतिहास में दर्ज है कि अक्सर वो पत्रकार सुबह का कार्यक्रम करने नहीं आते थे. कारण जाहिर था कि रात को ज्यादा हो जाया करती थी. कम से कम गनीमत थी कि वो पीकर कार्यक्रम में नहीं आते थे.

मेरे पुराने दफ्तर में एक पत्रकार पार्ट टाइम काम करने आता था जिसे चंपादक जी ने रखवाया था. वो शराब पीकर ही आता और पूरी शिफ्ट के दौरान दो कॉपी बनाकर लड़कियों को घूरता रहता. दफ्तर की हर लड़की त्रस्त थी इस आदमी से लेकिन कोई चंपादक को कहने को तैयार नहीं था क्योंकि चंपादक जी बदतमीज थे.

एक दिन मैं इस पत्रकार को एक कॉपी देने गया तो शराब का भभका लगा. मुझे पता था कि ये बीबीसी की गाइडलाइन्स में खतरनाक बात है. चंपादक से मेरी लड़ाई जगजाहिर थी. मैंने सीधे सीधे जाकर कहा- ये लड़का शराब पीकर आया है. ये काम करने लायक नहीं है.

चंपादक ने कहा- ठीक है यार. एकाध बीयर लगा कर तो सब काम करते हैं. मैं आधिकारिक शिकायत करता तो बवाल हो सकता था लेकिन मुझे पता था कि चंपादक उसके बाद मेरी बजाएगा.

तीन दिन के बाद अचानक इस शराबी पत्रकार को दौरा पड़ा और वो जमीन पर गिर गया. आनन फानन में लोग जुटे. उसके मुंह से झाग निकलने लगा था. कोई उसे छूने को तैयार नहीं था. दफ्तर के एक कर्मचारी ने कहा कि मिर्गी है और जूता सुंघाने लगा. हम लोगों ने मना किया और किसी तरह पानी वानी पिलाकर उसे सामान्य किया गया.एचआर के लोग आए और उसे उठाने की कोशिश में सबने पाया कि उसके मुंह से शराब का भभका आ रहा है.

जब इस पत्रकार से अपने रूम मेट या परिवार के किसी सदस्य का नंबर मांगा गया तो उसने बहुत मुश्किल से दिया.

जिसका नंबर दिया उसे जब हमारे दफ्तर से फोन किया गया तो सामने वाले का पहला सवाल था- चेक कीजिए उसने शराब पी रखी होगी.

शराबी पत्रकार को अस्पताल ले जाया गया लेकिन पता चला कि उसने ड्राइवर से कह कर गाड़ी घर की तरफ मुड़वा ली. शाम होते होते एचआर ने चंपादक को सूचित किया कि ऐसे लोगों को काम पर न बुलाया जाए.

ऐसी कई कहानियां हर दफ्तर की हैं. कुछ साल पहले एक पत्रकार ने शराब के नशे में (नए साल की पूर्व संध्या पर) किसी पर गाड़ी चढ़ा दी थी.

शराब पीना बुरी बात नहीं है. शराब पीकर पत्रकारिता करना भी बुरा नहीं है. बुरा ये है कि पूरी दुनिया को पता लग जाए कि आप शराब पीकर काम कर रहे हैं.

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