दुश्मन से भी विनम्रतापूर्वक संवाद कायम करना शिवराज की दुर्लभ शैली!

मध्यप्रदेश से कमलनाथ के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार का तो जाना पहले दिन से ही तय था, पर इसकी कल्पना तक न थी कि नये मुख्यमंत्री ऐसे भुतहे सन्नाटे में शपथ लेंगे जब पंडाल के ऊपर करोना महामारी भय बनकर बैठी होगी। शिवराजसिंह चौहान की यह चौथी पारी इसी सन्नाटे और मौत के भय से पार पाने की चुनौती के साथ शुरू होती है।

शेक्सपीयर के नाटक का एक संवाद है- शो मस्ट गो आन! मध्यप्रदेश की राजनीति में यह फलित हो रहा है। महामारी के साए में सरकार गिरी, पुराने मुख्यमंत्री ने इस्तीफा दिया, नए ने कमान सँभाली। अब विश्वास मत भी हाँसिल हो गया। आज नहीं तो कल मंत्रिपरिषद गठित हो जाएगी..राजकाज पहले की ही भाँति शुरू हो जाएगा। यह कोई असंगत भी नहीं, चाहे राजतंत्र रहा हो या अब लोकतंत्र हर हाल में शासनतंत्र का रहना जरूरी माना गया है, चाहे धरती फटे या आसमान टूट कर गिर जाए।

पहले चुनौतियों की बात करते हैं। संकट के समय शिवराज सिंह चौहान अपने जुनूनी तेवर के लिए जाने जाते रहे हैं। करोना महामारी को उन्होंने चुनौतियों में सर्वोच्च रखा है। पहला आदेश उसी को लेकर जारी किया है अब पलप्रतिपल उसी की मानीटरिंग कर रहे हैं। मुसीबतें कभी-कभी अनजाने में ही मददगार बन जाती हैं। सो यह मानकर चलते हैं कि अगले कुछ दिनों तक उन्हें राजनीति के गुणाभाग से नहीं गुजरना होगा।

ऐसा पहली बार हो रहा है जब मीडिया विश्लेषक यह जानने की बजाय कि कैबिनेट में कौन-कौन मंत्री बनेगा यह जानने को आतुर हैं कि कांग्रेस से बगावत कर और अब भाजपा में शामिल उन 22 पूर्व विधायकों का क्या होगा? कमलनाथ की कैबिनेट में जो छह मंत्री थे क्या उन्हें छह महीने के भीतर उप चुनाव जीतने की प्रत्याशा में मंत्री बनाया जाएगा? इसका जवाब राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्ढा, गृहमंत्री अमित शाह और ज्योतिरादित्य सिंधिया के बीच हुई डील में जज्ब है। इन्हें मंत्री बनाया जाए या नहीं इसपर नरेन्द्र सिंह तोमर और शिवराज सिंह चौहान भी अपडेट होंगे।

मुझे लगता है कि ज्योतिरादित्य जी ने ऐसी कोई शर्तें नहीं ही रखीं होंगी जिससे नई सरकार पहले ही दिन से असहज हो जाए। लेकिन भाजपा के शीर्ष नेतृत्व में उनके अहसान का अहसास हर वक्त रहेगा कि कहीं ज्योतिरादित्य व उनके समर्थक भाजपा को लेकर आरंभ से ही न असहज व निराश न हो जाएं।

मुझे लगता है संतुलन बनाने की इसी खूबी और शानदार संप्रेषण शक्ति की वजह से ही शिवराजसिंह चौहान को चौथी बार मौका दिया गया। दुश्मन से भी विनम्रतापूर्वक संवाद कायम करना शिवराज जी की वह दुर्लभ शैली है जो उन्हें राजनीति में सबसे अलग खड़ा करती है। सरकार की उठापटक और तल्ख बयानबाजी के बीच भी वे कमलनाथ से अपनी सौजन्यता को बचाए रखा। कमलनाथ उनके शपथ समारोह में भी उपस्थित रहे। और कुछ ऐसी ही स्थिति ज्योतिरादित्य के साथ भी ऐसा ही। 2018 के चुनाव में मध्यप्रदेश भाजपा ने नारा दिया था- माफ करना महाराज, हमारा नेता शिवराज। इस तल्ख नारे के बीच भी शिवराजसिंह जी ने इतनी गुंजाइश बनाए रखी कि बकौल डा. बशीर बद्र- जब कभी हम दोस्त बन जाएं तो शर्मिंदा न हों! इसका प्रत्युतर उसदिन प्रदेश भाजपा कार्यालय में ज्योतिरादित्य ने दिया- कि प्रदेश में दो ही ऐसे नेता हैं जो अपने कार की एसी नहीं चलाते एक मैं और दूसरे शिवराज जी, हम दोनों अब एक और एक ग्यारह बनकर काम करेंगे।

अच्छे पत्रकार की भाँति शिवराज में भी गजब की ध्राणशक्ति है। अगले तीसरे महीने क्या होने वाला है..शिवराज जी ने इसे जनवरी में ही सूँघ लिया था और ज्योतिरादित्य से सौजन्य भेंट करने पहुंच गए।

एक जिग्यासा और- कि चौथी बार शिवराज ही क्यों जबकि इन परिस्थितियों में नरेन्द्र सिंह तोमर का नाम चंग पर चढ़ा रहा हो..? इसका जवाब खुद तोमर ही हैं। तोमर को साफ सुथरी और शांत राजनीति के लिए जाना जाता है। पंद्रह साल की पिछली भाजपा सरकार में शायद ही ऐसा कोई दृष्टांत हो जब तोमर जी ने अपनी इच्छा थोपने का कोई दवाब बनाया हो। शिवराजसिंह जी ने उन्हें छोटी सी छोटी बात में साझीदार बनाए रखा और हर छोटे बड़े राजनीतिक फैसले उन्हें विश्वास में लेकर किए।

इस संदर्भ में एक छोटी सी घटना का जिक्र करूँगा। अप्रैल 2016 में सतना जिले के मुकुंदपुर में विश्व की पहली ह्वाइट टाइगर सफारी के उद्घाटन समारोह में.. शिवराज जी, तोमरजी और केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर आए थे। सफेद बाघों के संरक्षण का श्रेय रीवा के महाराजा मार्तण्ड सिंह को जाता है। सफारी भी उन्हीं के नाम से है। स्वर्गीय महाराज के सुपुत्र पुष्पराज सिंह इस समारोह में बढ़चढ़कर आगे पीछे थे। एक तरह से उन दिनों पुष्पराज सिंह हर मंचों से शिवराज जी और भाजपा सरकार का गुनगान कर रहे थे।

शिवराज जी को ख्याल आया कि क्यों न पुष्पराज सिंह को विंध्य विकास प्राधिकरण का अध्यक्ष बना दिया जाए। यह बात उन्होंने तोमरजी से साझा की। तोमरजी ने जवाब में कहा- पुष्पराज जी तो जनाधार वाले प्रतिनिधि हैं ऐसे पदों पर तो उन साधारण कार्यकर्ताओं को बैठाना चाहिए जिन बेचारों को टिकट नहीं मिल पाती। और फिर पुष्पराज जी अगले चुनाव तक आपके साथ टिके भी रहते हैं यह भी देखना चाहिए। एक सेंकड में पुष्पराज सिंह का नाम खारिज। और फिर 2018 के चुनाव में वे कांग्रेस का झंडा थामें नजर आए। तोमर जी सही निकले।

तोमर और चौहान भाजपा की राजनीति में उसी तरह एक सिक्के के दो पहलू हैं जैसे कि फिल्म शोले के जय और बीरू। दोनों एक दूसरे के मनोभाव भी समझते हैं व एक दूसरे के करियर की हिफाज़त के लिए बलिदान भावना को भी। याद करिए 2018 में भाजपा सरकार के पतन के बाद चौतरफा यह घोषणा होने लगी थी कि शिवराज जी को अब केंद्र की राजनीति में ले जाया जाएगा। उन्हें संगठन में राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया गया, पूरे देश की सदस्यता अभियान के संयोजक की जिम्मेदारी दी गई। इसके बावजूद शिवराज जी ने सार्वजनिक तौर पर कहा कि मध्यप्रदेश ही मेरा मंदिर है और यहां की जनता हमारी भगवान।

शिवराजसिंह को यह मालूम था कि उन्हें फिलहाल एक साधारण विधायक की ही भूमिका मिलने वाली है। क्या कोई दूसरा नेता मोदी के तिलिस्म में लोकसभा चुनाव और फिर केंद्रीय मंत्री की हैसियत छोड़ता शायद नहीं… यही बलिदानी भावना का नाम तोमर और चौहान की युति है। चौहान के केंद्र में जाने से निश्चित ही तोमर असहज होते क्योंकि दोनों एक प्रदेश के एक जैसी ही प्रोफाइल वाले। यही समझ दोनों की सफलता की कुंजी है।

शिवराजजी आज भी अफसोस करते हैं कि काश 2018 में चुनाव के वक्त प्रदेश अध्यक्ष के रूप में नरेन्द्र सिंह तोमर का साथ होता तो ये पंद्रह महीने यूँ ही जाया नहीं होते। जो लोग यह तर्क रख रहे थे कि 2018 का जनादेश मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के खिलाफ है नरेन्द्र सिंह तोमर ने ही इस तर्क पर पलीता फेर दिया।

तोमरजी आज नरेन्द्र मोदी की कैबिनेट में शीर्ष पाँच में से एक की हैसियत में हैं और यदि वे चाहते तो इन परिस्थितियों में मध्यप्रदेश की कमान सँभालने में उन्हें कोई दिक्कत नहीं होती। सो शिवराजसिंह चौहान ने चौथीबार मुख्यमंत्री की शपथ ली उसके पीछे कुलमिलाकर यही कथा समझिए।

शिवराजसिंह चौहान को लेकर मीडिया और जनमानस में एक शंका है कि क्या इस बार फिर वे नौकरशाही के चक्रव्यूह में घिरकर किसी प्रमुख सचिव के कहने पर तमतमाते हुए पंडाल में पहुंच जाएंगे और..वही ‘माई के लाल’ वाली चुनौती दोहरा देंगे। मुझे लगता है कि अब ऐसा नहीं होगा। अपनी गलतियों और भूल-चूक से सबक लेने वाला ही राजनीति में निरंतरता बनाए रखता है नहीं तो वह विश्वनाथ प्रताप सिंह जैसी गुमनामी को प्राप्त होता है।

शिवराज सिंह जी समय के प्रवाह और परिस्थिति की नब्ज को और भी अच्छी तरह पहचानने लगे हैं। ‘माई के लाल’ प्रकरण के बाद उन्हें अफसोस हुआ, परिणामस्वरूप एक कमेटी गठित की थी जिसके सदस्य शेजवार, राजेंद्र शुक्ल व अन्य थे। सरकारी और गैर सरकारी स्तर पर एक अभियान भी चला था जिसका काम पुजारियों व जाँतिपाँति को लेकर फैले भ्रम व अफवाहों को दूर करना था। लेकिन उनकी जुबां से एक घातक शब्दतीर तो निकल ही चुका था जिसकी सफाई के लिए आज भी कोई शब्द नहीं। प्रमोशन में आरक्षण को लेकर यह गुस्सा आज भी वैसे ही शाश्वत है। इस बार भी शिवराजसिंहजी को इससे दो चार होना पड़ेगा।

इसमें कोई संदेह नहीं कि जनता व भाजपा कार्यकर्ताओं के बीच शिवराजसिंह जी का सिक्का चलता है। अपने चेहरे मोहरे, हाव-भाव संवाद के चलते वे जनसाधारण में ऐसे घुलमिलकर जाते हैं जैसे कि पानी में मिसरी की डली। इतनी बड़ी खूबी के बावजूद वे पिछले कार्यकाल के आखिरी तीन सालों में नौकरशाही की ऐसी गिरफ्त में आए कि साधारण आदमी भी यह यह कहने लगा था मामा में अब वो बात कहां।

स्वार्थी नौकरशाहों ने जनसरोकार ही नहीं राजनीति के आयोजनों को भी इवेंट्स में बदल दिया था। कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों की भूमिका अप्रसागिक हो गई। कई आयोजनों में हमने देखा कि पार्टी के विधायक पदाधिकारी भी इवेंट्स मैनेजरों के आगे अपनी उपस्थिति दर्शाने के लिए गिड़गिड़ाते थे। मुझे लगता है कि इस भूल चूक से जरूर ही वे सबक लेंगे।

प्रशासनिक जमावट और काम के अधिकारियों को चिंन्हित करके सरकार की शुभेच्छा को जनजन तक पहुँचाना पहला काम होगा। तबादलों से पस्त अधिकारी-कर्मचारी यह जरूर उम्मीद करेंगे कि उन्हें ताश के पत्तों की तरह अब और न फेंटा जाए। दो और बड़े मसले हैं एक हनीट्रेप और दूसरा ईओडब्ल्यू के मामलों का। प्रदेश की जनता की अपेक्षा होगी कि निष्पक्षता से सबकुछ सामने आए।

कांग्रेस के लोग इस बात से सहमें होंगे कि नई सरकार बदले की कार्रवाई करेगी। जिन्होंने गलत किया उन्हें सहमना जरूरी भी है। पंद्रह महीनों के कामकाज का लेखाजोखा भी लेना जरूरी है और जनता को यह बताना भी कि ‘वक्त है बदलाव के नाम’ पर वह कहाँ कहां ठगी गई।

24 सीटों के उप चुनाव और उसमें सफलता की बड़ी चुनौती है। चुनौती इसलिए भी कि इन बाइसों ने भाजपा के उम्मीदवारों को हराया था। ये अब भाजपा के उम्मीदवार होंगे तो उन पुरानों का क्या व्यवहार होगा। उनके पुनर्वास के बारे में सोचना होगा। इन बाइसों में से जितने भी मंत्री बनेंगे एक तरह से वे पुराने भाजपा विधायकों के अधिकारों को स्थानापन्न करेंगे इस असंतोष को भी द्रवीभूत करने की एक चुनौती होगी।

अभी कांग्रेस के लोग कह रहे हैं.कि अगले पंद्रह अगस्त को कमनाथ ही ध्वजारोहण करेंगे..ऐसा कहने वालों के निशाने पर वही होंगे जो मंत्री पद की दौड़ में रहते हुए मंत्री नहीं बन पाएंगे। वे तो होंगे ही उपचुनाव में जिनकी टिकटें काटकर कांग्रेस से आए बागियों को दी जानी है। संभव है इनमें से कई कांग्रेस की टिकटों पर लड़ें भी। यही सब चुनौतियां अगले छह महीनों की होंगी। परिश्रम की पराकाष्ठा.. शिवराज जी के व्यक्तित्व का पर्यायवाची है.. यह यथार्थ के धरातल पर कितना सत्य साबित होता है..धैर्य धारण करके छह महीने..इंतजार करिए।

लेखक जयराम शुक्ला मध्य प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं. संपर्क: 8225812813

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