Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

प्रिंट

आज के अखबार : एसआईआर मामले में आदेश वही है जो होना था, कुछ शीर्षक केंचुआ की लाज बचाने वाले हैं  

संजय कुमार सिंह

बिहार में मतदाताओं के विशेष सघन पुनरीक्षण से संबंधित मामले की सुनवाई के बाद सुप्रीम कोर्ट ने जो कहा है उसे अखबारों ने मतदाता सूची पुनरीक्षण जारी रहेगा…. (अमर उजाला) जैसे शीर्षक से छापा है। कोर्ट ने इसे सांविधानिक प्रक्रिया माना है और कहा है कि इसपर रोक नहीं लगा सकते। लेकिन आधार, राशन कार्ड को भी पहचान पत्र मानने के लिए कहा है। वोटर वेरीफिकेशन की टाइमिंग पर भी सवाल उठाया है। तो जारी क्या रहेगा? शिकायत क्या थी और वह दूर हो गई कि नहीं? चुनाव आयोग मनमानी कर रहा था। उससे कहा गया है कि नागरिकता तय करना उसका काम नहीं है। पहले भी कई लोगों ने कहा है। ऐसे में पुनरीक्षण भले जारी रहे, समस्याएं खत्म हो गई हैं। ऐसी खबर भी है। लेकिन कुछ अखबारों में खबर ऐसे छपी है जैसे चुनाव आयोग को मनमानी जारी रखने का लाइसेंस मिल गया है। सच्चाई यह है कि आयोग ने कहा है कि बिना पक्ष सुने किसी भी मतदाता का नाम नहीं हटेगा। यह तर्क भले दिया गया है कि आधार किसी की नागरिकता का प्रमाण नहीं है लेकिन मतदाता सूची में नाम होना भी नागरिकता का प्रमाण नहीं है। नागरिकता का प्रमाण तो पासपोर्ट ही होगा। इसलिये चुनाव आयोग जो पहले कह या कर रहा था वह गलत था और अब उसे बता दिया गया है कि सही क्या है। ऐसे में यह कहना कि बिहार में एसआईआर जारी रहेगा भ्रामक है (नवोदय टाइम्स)। कहा यह जाना चाहिये कि, सुधार के साथ जारी रहेगा एसआईआर। इसमें बिहार में छोड़ा जा सकता था क्योंकि सबको पता है कि एसआईआर बिहार में चल रहा है और कल इसी पर सुनवाई थी। 

देशबन्धु में फ्लैग शीर्षक है, बिहार में वोटर वेरिफिकेशन पर रोक से सुप्रीम कोर्ट का इनकार, कहा (मुख्य शीर्षक) – आधार, राशन कार्ड को भी पहचान पत्र मानें। मुझे लगता है कि यही मांग थी और सुप्रीम कोर्ट ने मांग पूरी कर दी है। अगर आधार, राशन कार्ड को भी पहचान पत्र माना जायेगा तो जो नाम पहले से हैं उनपर कोई संकट नहीं है। मनमानी करते हुए हटा दिया जाये तो अलग मामला होगा। और होगा तब उसपर बात होगी। अभी तो पुराने मतदाता (हटाने का कारण नहीं हो तो) पहले की तरह रहेंगे। नये लोग आधार कार्ड से बन सकेंगे और इसमें कोई दिक्कत है नहीं। इसलिए जनता जो चाहती थी वह हो चुका है भले खबर है कि, सुप्रीम कोर्ट ने बिहार में मतदाता सूची को पुनरीक्षण को जारी रहने दिया (दि एशियन एज)। यहां शीर्षक में, ‘लेकिन चुनाव आयोग की टाइमिंग को लेकर सवाल किया’ भी है। यहां फ्लैग शीर्षक से बताया गया है कि सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि चुनाव आयोग के पास विशेष सघन पुनरीक्षण का अधिकार है। मुझे लगता है कि यह मुद्दा ही नहीं था। चुनाव आयोग को नागरिकता तय करने का अधिकार नहीं है। और इसके लिए आधार को नहीं मानने का अधिकार भी नहीं है। भले आधार नागरिकता का प्रमाणपत्र न हो क्योंकि चुनाव आयोग को नागरिकता तय करने का अधिकार भी नहीं है। उसे नागरिकों को ही वोटर बनाना है और किसी नागरिक (यानी आम तौर पर किसी चुनाव क्षेत्र में रहने वाले) को वोटर नहीं बनाना हो तो उसका काम है कि वह उसे विदेशी या गैर नागरिक साबित करे।

इस तरह सुप्रीम कोर्ट का आदेश स्पष्ट है और इसीलिए कांग्रेस ने कहा है कि बिहार मामले पर फैसला राहत देने वाला है। देशबन्धु ने लीड के साथ यह खबर छापी है। एक खबर यह भी है कि एसआईआर नियमों को दरकिनार करके किया जा रहा है और वोटर की नागरिकता जांची जा रही है। ये कानून के खिलाफ है। द टेलीग्राफ का शीर्षक ही है, पहचान की राहत, टाइमिंग को लेकर सवाल। अखबार ने याचिकाकर्ताओं में से एक, योगेन्द्र यादव के हवाले से छापा है कि यह (अदालत का आदेश) वोटबंदी के खिलाफ लोकतांत्रिक संघर्ष की पहली जीत है। कायदे से आज इस फैसले पर याचिका दायर करने वालों की प्रतिक्रिया होनी चाहिये थी और ऐसे एक-दो नहीं 11 लोग हैं। सबके वकील अलग से। फिर भी याचिका दायर करने वालों की टिप्पणी ढूंढ़नी पड़ रही है। नवोदय टाइम्स के अनुसार पीठ ने कहा, “हम किसी संवैधानिक संस्था को वह करने से नहीं रोक सकते जो उसे करना चाहिये। साथ ही, हम उन्हें वह भी नहीं करने देंगे जो उन्हें नहीं करना चाहिये”। स्पष्ट है कि सुप्रीम कोर्ट ने अपना काम किया है और चुनाव आयोग को वह करने से रोक दिया है जो उसका काम नहीं है। यही मुद्दा था, यही मुकदमा था।      

द हिन्दू के उपशीर्षक में कहा गया है, मतदाताओं की जांच के लिए 11 दस्तावेजों की सूची पूरी नहीं है। कल आपने पढ़ा था कि आधार इन दस्तावेजों में नहीं है लेकिन आधार से बनने वाला डोमिसाइल सर्टिफिकट है और इस कारण एक दिन में 70,000 आवेदन आ रहे हैं और खबर थी कि नौ लाख आवेदन लंबित थे। अब अगर आधार से नाम दर्ज हो जाये तो डोमिसाइल सर्टिफिकेट की जरूरत ही नहीं पड़ेगी और जो भिन्न कारणों से अपना यह सर्टिफिकेट नहीं बनवा सकते थे वे अब इस कारण मतदाता बनने से नहीं चूकेंगे। इंडियन एक्सप्रेस का शीर्षक है, सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग के पुनरीक्षण को चलने दिया और कहा दस्तावेजों की सूची में आधार, राशन कार्ड और वोटर कार्ड को भी शामिल किया जाये। उपशीर्षक के अनुसार पीठ ने चुनाव आयोग से कहा है, अगर आप इन तीन दस्तावेजों को नहीं मानना चाहते हैं तो कारण बतायें। अगली सुनवाई 28 को है और चुनाव आयोग को 21 तक जवाब देना है। यानी 28 को स्पष्ट हो जायेगा कि इन दस्तावेजों को माना जायेगा कि नहीं और नहीं माना जायेगा तो क्यों। इसमें यह स्पष्ट हो चुका है कि नागरिककता साबित करने वाले दस्तावेजों की जरूरत मतदाता सूची में नाम शामिल करने के लिए नहीं है।

इंडियन एक्सप्रेस ने एक अलग खबर से बताया है कि सुप्रीम कोर्ट ने  चुनाव आयोग के लिए टाइमिंग, वाजिब प्रक्रिया और नागरिकता जैसे प्रमुख मुद्दे रेखांकित किये। यही नहीं, अखबार ने यह भी बताया है कि सुप्रीम कोर्ट के सुझाये तीन दस्तावेज क्यों मतदाता बनाने के आधार का विस्तार करते हैं और डर कम होता है। दूसरी ओर, हिन्दुस्तान टाइम्स की एक खबर का शीर्षक है, बिहार में बहुत सारे लोगों को ऐसे कागज की तलाश थी जो कभी बने ही नहीं। इस खबर में बताया गया है कि मांगे गये 11 दस्तावेजों में कई कभी बने ही नहीं और ग्रामीण आबादी के लिए तो इनका अस्तित्व ही नहीं है क्योंकि जन्म घर में हुआ, स्कूल गये नहीं और जमीन का औपचारिक स्वामित्व भी नहीं है। टाइम्स ऑफ इंडिया ने जो अंश हाईलाइट किये हैं उनमें एक न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया के हवाले से है। उन्होंने जो कहा वह इस प्रकार है, अगर आप मुझसे मांगेंगे तो मैं (भी) ये (जो एसआईआर के लिए सूचीबद्ध हैं) दस्तावेज नहीं दे पाउंगा। आप कानून की बात कर रहे हैं पर मैं व्यावहारिकता की बात कर रहा हूं। 

CosmoQuick: AI Recruitment For Media Jobs
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास लीगल टीम : Bhadas Legal Team

भड़ास मेल: [email protected]

Latest 100 भड़ास

विज्ञापन