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आज के अखबार : सोनम वांगचुक को जेल में रखकर एनएसए हटा लेने की सरकारी कार्रवाई ‘खबर’ नहीं है  

संजय कुमार सिंह 

खाड़ी युद्ध की सच्चाई यही है कि अमेरिका ने जितना आसान समझा था वैसा दिख नहीं रहा है। इसकी खबर तो है ही लेकिन सोनम सोनम वांगचुक को जेल में रखकर एनएसए हटा लेने की सरकारी कार्रवाई जैसी मनमानी है वैसी ‘खबर’ नहीं है। कहने की जरूरत नहीं है कि एनएसए के कारण ही मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट में चलती रही और जब सबूत पेश करने की स्थिति आई और सरकारी साजिश की पोल खुलने वाली थी तो एनएसए हटा लिया गया। इस चक्कर में सोनम को तो जो परेशानी हुई सो हुई ही, सुप्रीम कोर्ट का भी काफी समय जाया हुआ जो दूसरे जरूरी काम में लग सकता था। ठीक है कि सुप्रीम कोर्ट की चिन्ता मीडिया का काम नहीं है लेकिन सोनम को जेल में रखने का आधार कमजोर था – यह खबर जैसी है वैसे छपी नहीं। युद्ध के मामले में भारत ने अगर जीतने वालों का साथ चुना था तो उसे ईरान से मदद मांगनी पड़ी। ऐसे में आज हिन्दुस्तान टाइम्स की लीड का शीर्षक है, द्वीप पर बम गिराने के जवाब में ईरान के पलटवार का शिकार अमेरिकी दूतावास हुआ। इस खबर का इंट्रो है, टकराव तीसरे वर्ष में पहुंचा तो ट्रम्प ने स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को सुरक्षित करने के लिए दूसरे देशों से अपील की। द हिन्दू की लीड दूसरा पक्ष बताती है। इसका शीर्षक है, अमेरिका ने ईरान के खर्ग द्वीप पर बम गिराया; तेहरान ने पलटवार किया। युद्ध में यही होता है। दोनों खबरें सही हैं या होंगी। लेकिन द हिन्दू की खबर से लग रहा है कि अमेरिका अभी भी भारी है, हमले कर रहा है और ईरान का पलटवार मजबूरी है। आप इसे सामान्य प्रतिक्रिया भी मान सकते हैं और शीर्षक से पता नहीं चल रहा है कि कौन ज्यादा बड़ा या नुकसानदेह या प्रभावी है। दूसरी ओर, हिन्दुस्तान टाइम्स की लीड अमेरिकी दूतावास पर हमले की है। ठीक है कि अमेरिकी दूतावास का मतलब किसी और देश में अमेरिका का दूतावास है और यहां हमले का मतलब अमेरिका पर हमला है। अमेरिका अगर युद्ध लड़ रहा है तो अपने दूतावासों की रक्षा उसकी पहली प्राथमिकता होनी चाहिए वरना यह आसान निशाना होता है। हिन्दुस्तान टाइम्स की आज की खबर के अनुसार, ट्रंप ने सोशल मीडिया पर उम्मीद जताई है कि चीन, फ्रांस, जापान, दक्षिण कोरिया, यूके और अन्य देश होर्मुज़ स्ट्रेट (जलडमरूमध्य) को “खुला और सुरक्षित” रखने के लिए अपने युद्धपोत भेजेंगे।

आप जानते हैं कि अमेरिका और इजराइल ने मिलकर ईरान पर हमला बोला है और ईरान जोरदार टक्कर दे रहा है। इसके तहत वह होर्मुज स्ट्रेट से जहाजों के गुजरने पर नियंत्रण रख रहा है और इस (मुख्य रूप से इसी) कारण अमेरिका को रूस से तेल खरीदने की अनुमति भारत को देनी पड़ी है। जाहिर है, इस नियंत्रण से अमेरिका को युद्ध के अपेक्षित परिणाम नहीं मिल रहे हैं और वह चाहता है कि दूसरे देश भी इस मामले में कूद जाएं। दूसरी ओर, उसने चेतावनी दी है कि अगर तेहरान इस जलडमरूमध्य से जहाज़ों के गुज़रने में दखल देना जारी रखता है, तो वह खर्ग द्वीप पर मौजूद ईरान के तेल इंफ्रास्ट्रक्चर पर हमला कर सकते हैं। दुनिया भर की कुल तेल आपूर्ति का पाँचवाँ हिस्सा इस जलडमरूमध्य से गुज़रता है। संभव है यही ईरान की मजबूती का आधार हो। इसपर हमला करना और इसकी सुरक्षा रणनीतिक मामला है। खबर के अनुसार, ट्रम्प ने दूसरे देशों से मदद या सहयोग की उम्मीद के साथ यह चेतावनी भी दी है कि वह खुद इस मामले में कार्रवाई करेगा। मुझे लगता है कि युद्ध अमेरिका ने छेड़ा है और वह भारत पर दबाव डालकर वेनेजुएला तथा दूसरे देशों से तेल खरीदने पर मजबूर कर रहा है। भारत भी इस पर कुछ साफ कहने के मुकाबले बीच-बीच में लग रहा है। ऐसे में दोनों अखबारों के शीर्षक रेखांकित करने लायक है।

द हिन्दू की खबर के अनुसार, इराक के बगदाद में अमेरिकी दूतावास परिसर के अंदर एक हेलीपैड पर एक मिसाइल हमला हुआ है। शनिवार को एक ईरानी ड्रोन को बीच में ही रोक दिए जाने से उसका मलबा संयुक्त अरब अमीरात में एक तेल संयंत्र पर जा गिरा। वहीं, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने दावा किया कि एक द्वीप पर मौजूद सैन्य ठिकाने नष्ट कर दिए गए हैं, जो ईरान के तेल नेटवर्क के लिए बेहद अहम थे। ट्रंप ने कहा कि शुक्रवार को अमेरिकी सेना ने ईरान के खर्ग द्वीप पर मौजूद ठिकानों को “पूरी तरह से तबाह” कर दिया। इसी द्वीप पर वह मुख्य टर्मिनल स्थित है, जहाँ से देश के तेल निर्यात का काम संभाला जाता है। इस बीच, एक अमेरिकी अधिकारी ने बताया कि पश्चिम एशिया में 2,500 और मरीन सैनिक तथा एक एम्फीबियस असॉल्ट शिप (जल-थल युद्धपोत) भेजे जा रहे हैं। ईरानी संसद के स्पीकर मोहम्मद बाघर ग़ालिबफ़ ने गुरुवार को सोशल मीडिया पर चेतावनी दी थी कि ईरान की दक्षिणी समुद्री सीमा पर स्थित द्वीपों पर हमला होने की स्थिति में ईरान “संयम की सारी सीमाएँ तोड़ देगा।” उन्होंने इस बात पर ज़ोर दिया कि ये द्वीप देश की अर्थव्यवस्था और सुरक्षा के लिए कितने ज़्यादा महत्वपूर्ण हैं। शनिवार को, ईरान की संयुक्त सैन्य कमान ने अपनी उस चेतावनी को फिर से दोहराया कि यदि इस्लामिक गणराज्य के तेल बुनियादी ढाँचे पर हमला किया जाता है, तो वह इस क्षेत्र में अमेरिका से जुड़े तेल और ऊर्जा संयंत्रों पर हमला करेगा।

यही नहीं, न्यूज़ एजेंसी रॉयटर्स ने शनिवार को बताया कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन ने पश्चिमी एशियाई सहयोगियों की उन कोशिशों को ठुकरा दिया है, जिनका मकसद ईरान युद्ध को खत्म करने के लिए कूटनीतिक बातचीत शुरू करना था। यह सब तब हुआ जब अमेरिका ने एक रणनीतिक द्वीप पर मौजूद सैन्य ठिकानों पर हमला किया—जिस द्वीप से ईरान के ज़्यादातर तेल का निर्यात होता है—और इसके जवाब में तेहरान ने बगदाद में अमेरिकी दूतावास और यूएई के एक बड़े तेल केंद्र पर हमले कर दिए, जिससे यह संघर्ष और भी ज़्यादा बढ़ गया। जाहिर है, अमेरिका अपनी जिद्द पर अड़ा है और ईरान झुकने को तैयार नहीं है। दूसरी ओर, युद्ध का असर दुनिया के काफी बड़े हिस्से पर पड़ रहा है। ज्यादातर मीडिया संस्थाओं की खबर ईधर या उधर की है। ऐसे में पाठकों और नागरिकों के लिए भी सही निर्णय लेना मुश्किल है। ऐसा भारत सरकार और भारत की जनता के मामले में भी है। इसलिए, मीडिया संस्थानों से उनके अपने और अंतरराष्ट्रीय स्तर की पत्रकारिता में निष्पक्षता की अपेक्षा है। पर ऐसा होता दिख नहीं रहा है। भारत में ऐसा न सिर्फ अंतरराष्ट्रीय मामलों बल्कि देसी राजनीति से संबंधित कवरेज में भी है। आज युद्ध से संबंधित इन खबरों के अलावा कुछेक अखबारों ने सोनम वांगचुक को जमानत मिलने की खबर को लीड बनाया है।  यह खबर अमर उजाला और टाइम्स ऑफ इंडिया में लीड है जबकि हिन्दुस्तान टाइम्स और इंडियन एक्सप्रेस में सेकेंड लीड है। इंडियन एक्सप्रेस में एक खबर का शीर्षक है, सुप्रीम कोर्ट में हार के डर से केंद्र ने एनएसए वापस लिया। यह शीर्षक सिंगल इनवर्टेड कॉमा में है और इसका मतलब हुआ कि यह खबर नहीं, किसी का आरोप है लेकिन आरोप निराधार नहीं होते हैं और जो दिखाई दे रहा है वह यही है। (जारी)  

लेखक संजय कुमार सिंह से [email protected] के जरिए संपर्क हो सकता है।

अगली किस्त पढ़िए – दिल्ली में बंगाल चुनाव और रैली की सरकारी खबरों को ही पहले पन्ने पर जगह मिली है।लिंक यह रहा –  https://www.bhadas4media.com/delhi-mein-bengal-chunav-aur-rally-kee/

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