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उत्तर प्रदेश

अवैध खनन घोटाले में सपा के कई नेताओं पर शिकंजा

चन्द्रकला का बयान सामने लायेगा अखिलेश का कारनामा, चचा शिवपाल भी बोले भतीजा बेदाग नहीं, ईडी का अखिलेश के मंत्री रहे प्रजापति पर भी शिकंजा

अजय कुमार, लखनऊ

उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने अपने पांच वर्षो के शासनकाल में मिस्टर क्लीन की जो छवि बनाई थी, वह उनके ऊपर अवैध खनन घोटाले के दाग लगने के बाद बदरंग नजर आने लगी है। अखिलेश, उनकी पार्टी के लोग और बसपा सुप्रीमों मायावती भले ही इसे मोदी-योगी सरकार की साजिश और सपा-बसपा गठबंधन से भाजपा के डर को जोड़कर देख रहीं हों लेकिन यह नेता जानते हैं कि इस मामले में मोदी-योगी सरकारे के हाथ में ज्यादा कुछ नहीं है। इलाहाबाद हाईकोर्ट के दिशा-निर्देश में अवैध खनन मामले की जांच चल रही है और इस जांच को रूकवाने के लिये सीएम रहते अखिलेश ने सुप्रीम कोर्ट तक का दरवाजा खटखटाया था,लेकिन वहां भी वह इसमें कामयाब नहीं हो पाए थे। सुप्रीम कोर्ट ने 12 जनवरी 2017 को सरकार की याचिका खारिज कर दी थी।

अवैध खनन मामले की जांच के खिलाफ जब अखिलेश सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था,तब तक आमजन में किसी को भी अखिलेश के अवैध खनन घोटाले में शामिल होने का संदेह नहीं था,लेकिन अब ऐसा सोचने वालों की संख्या काफी कम हो गई है। इसकी वजह है आईएएस चन्द्रकला के यहां पड़े छापे के बाद सामने आई खबरें। ताज्जुब होता है मिस्टर क्लीन अखिलेश एक दिन में खनन के 13 पट्टे कैसे आवंटित कर सकते थे। कहा जा रहा है कि आईएएस चन्द्रकला जांच एजेंसियों को इस संबंध में बयान देने को राजी हो गई हैं। इससे पूर्व चन्द्रकला के हवाले से यह भी खबर आई थी उन्होंने तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को भूतत्व एवं खनिकर्म मंत्री भी होने के नाते उनको तथा मुख्यमंत्री सचिवालय को खनन पट्टों के संबंध में पत्र लिखा था।

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हाईकोर्ट के आदेश पर सीबीआई तो जांच कर ही रही थी,अब प्रवर्तन निदेशालय(ईडी) भी इसमें आ गई है। ईडी ने भी मनी लॉड्रिंग एक्ट के तहत अवैध खनन आरोपियों के खिलाफ मामला दर्ज किया है। बताया जा रहा है कि ईडी उन 14 खनन टेंडर की जांच कर रही है, जिनको तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने 2012-13 में मंजूरी दी थी। सूत्रों की माने तो ईडी अखिलेश यादव से भी अवैध खनन टेंडर मामले में पूछताछ कर सकती है। उत्तर प्रदेश की तत्कालीन सरकार ने साल 2012 से 2016 के दौरान कुल 22 टेंडर पास किए थे, जिनमें से 14 टेंडर अखिलेश यादव के खनन मंत्री रहते जारी किए गए थे। इसके अलावा बाकी टेंडर गायत्री प्रजापति के खनन मंत्री रहने के दौरान मंजूर किए गए थे। आरोप है कि इस दौरान खनन पर रोक के बावजूद टेंडर जारी किए और कानूनों की धज्जियां उड़ाई गई थीं।

इस केस में पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का नाम भी सामने आया है, वहीं आइएएस अधिकारी बी. चंद्रकला, खनिक आदिल खान, भूवैज्ञानिक खनन अधिकारी मोइनुद्दीन, समाजवादी पार्टी (सपा) के नेता रमेश कुमार मिश्रा, उनके भाई दिनेश कुमार मिश्रा, राम आश्रय प्रजापति, हमीरपुर के खनन विभाग के पूर्व क्लर्क संजय दीक्षित, उनके पिता सत्यदेव दीक्षित और रामअवतार सिंह के नाम प्राथमिकी में शामिल हैं। संजय दीक्षित ने 2017 विधानसभा चुनाव बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के टिकट पर लड़ा था। बताया जा रहा है कि चंद्रकला के खिलाफ कार्रवाई से इस सिंडीकेट में शामिल कई स्थानीय नेताओं की भी नींद उड़ी हुई है।

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अवैध खनन का ये मामला अखिलेश सरकार में वर्ष 2012 से 2016 के बीच का है। अवैध खनन के इस खेल का भंडाफोड़ करने के लिए 2016 में इलाहाबाद हाईकोर्ट में दो याचिकाएं दायर की गईं थीं। इन पर 28 जुलाई 2016 को हाईकोर्ट ने सीबीआई को जांच के आदेश दिए थे। सीबीआइ ने मामले की जांच शुरू की तो उसे वर्ष 2012 से 2016 तक हमीरपुर जिले में बड़े पैमाने पर अवैध खनन के सबूत मिले। अवैध खनन से सरकार को बड़े पैमाने पर राजस्व की क्षति हुई थी। उस वक्त आइएएस बी चंद्रकला हमीरपुर की जिलाधिकारी थीं। उन पर भी अवैध खनन में शामिल होने और मनमाने तरीके से खनन के पट्टे बांटने का आरोप लगे थे।

सूत्र बताते हैं सीबीआइ ने चन्द्रकला के यहां छापेमारी से पहले वर्ष 2017 में चंद्रकला तथा तब प्रमुख सचिव (खनन) रहे डॉ गुरुदीप सिंह से भी मामले में पूछताछ की थी। हाईकोर्ट पूरे मामले की सीबीआइ से जांच की निगरानी कर रही है। समय-समय पर हाईकोर्ट जांच की प्रगति देखती रहती है। हाईकोर्ट ने ही सीबीआई से अवैध खनन में अधिकारियों की मिलीभगत पर भी रिपोर्ट मांगी थी। इसी के बाद से जांच एजेंसी अधिकारियों के रडार पर यूपी के कुछ नौकरशाह और अधिकारी आ गये थे।

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यहां याद दिला देना जरूरी है कि मिस्टर क्लीन की छवि वाले तत्कालीन मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने अवैध खनन में तत्कालीन खनन मंत्री गायत्री प्रजापति का नाम आने पर उन्हें कैबिनेट से बाहर कर दिया था। इसके बाद ये प्रभार उनके पास चला गया था। हालांकि, बाद में प्रजापति की कैबनिट में वापसी हो गई, लेकिन उन्हें खनन मंत्रालय नहीं दिया गया था। बात सुप्रीम कोर्ट में अखिलेश सरकार द्वारा याचिका दायर किए जाने के मकसद की कि जाये तो तत्कालीन अखिलेश सरकार इस केस में फंसी आईएएस बी चंद्रकला समेत अन्य आरोपियों के खिलाफ जांच रुकवाना चाहती थी। अब आरोप यह लग रहे हैं कि अधिकारियों की आड़ में अखिलेश अपना दामन बचाना चाहते थे। क्योंकि उस वक्त खनन मंत्रालय अखिलेश यादव के पास था। ऐसे में सीबीआइ जांच की आंच उन तक भी पहुंच सकती थी।

अखिलेश ने अपने खिलाफ उठी उंगलियों को बड़ी चालाकी के साथ मोदी/योगी सरकार की तरफ मोड़ दिया।दरअसल, सीबीआई ने जिस दिन आईएएस चंद्रकला समेत इस मामले के 11 अन्य आरोपियों के ठिकानों पर छापा मारा, उसी दिन यूपी में सपा और बसपा के गठबंधन की खबर सामने आयी थी। यही इस केस का राजनीतिक पहलू भी है। अब प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) द्वारा मामले में बी चंद्रकला समेत अन्य आरोपियों के खिलाफ मनी लॉड्रिंग की एफआइआर दर्ज करने के बाद एक बार फिर इस केस को लेकर राजनीति शुरू हो चुकी है।

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गौरतलब हो, उत्तर प्रदेश में अवैध खनन का कारोबार अरबों-खरबों रुपये का है। इसमें भूमाफिया, अफसरों, नेताओं, स्थानीय दबंगों से लेकर कई प्रभावशाली लोगों की भागीदारी होती है। सबकी मिलीभगत होने की वजह से ही ये अवैध कारोबार प्रदेश में फलता-फूलता रहा है। अनुमान है कि यूपी में अवैध खनन के लिए मशहूर कुछ जिलों से ही सालाना 2500 करोड़ रुपये का अवैध खनन कारोबार होता है। इसमें कई लोग जान से हाथ भी छो चुके हैं। यूपी के ब्यूरोक्रेसी और कई छोटे-बड़े अधिकारी भी हमेशा खनन माफियाओं के दबाव में अक्सर नफा-नुकसान उठाते रहते हैं।

समाजवादी सरकार के समय ही वर्ष 2013 में आईएएस दुर्गा नागपाल को भी खनन माफियाओं के चलते साम्प्रदायिक सौहार्द की एक घटना को आधार बनाकर निलंबित कर दिया गया था। उन पर आरोप लगा था कि उन्होंने एक मस्जिद की दीवार को गिरा दिया था। आइएएस दुर्गा के निलंबन को सांप्रदायिक सद्भाव खराब करने की कोशिश करार देने के बयानों को उस वक्त करारा झटका लगा जब खुद यूपी एग्रो के चेयरमैन नरेंद्र भाटी के भाई कैलाश भाटी ने एक निजी चौनल द्वारा किए स्टिंग ऑपरेशन में इस मामले की पूरी सच्चाई उगल दी। उन्होंने कहा कि दुर्गा द्वारा अवैध खनन माफिया के खिलाफ अंकुश लगाने के बाद सपा नेताओं ने उनकी काफी शिकायतें सीधे सूबे के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव से की गई थीं। इसके बाद ही उन्हें हटाया गया है। कैलाश की बातों से सपा सरकार और रेत माफिया के बीच रिश्तों की गहराई का भी पता चल रहा है।

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उधर, दुर्गा शक्ति नागपाल मामले में दखल देते हुए सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखी है। सोनिया ने कहा कि किसी अधिकारी के साथ अन्याय ना हो इस बात का ख्याल रखा जाना चाहिए। दूसरी ओर ईमानदारी और कर्मठता का सिला निलंबन से चुका रही आइएएस अधिकारी दुर्गा शक्ति नागपाल के समर्थन में तमाम राजनीतिक दल और संगठन खड़े हो गए हैं, लेकिन कांग्रेस को मुस्लिम वोट बैंक की भी चिंता है। यही कारण है कि मस्जिद की दीवार गिराए जाने का मामला बनाकर निलंबित की गईं दुर्गा के पक्ष में खुलकर आने में पार्टी परहेज कर रही है। उत्तर प्रदेश में सपा से मुस्लिम वोटों की होड़ में लगी कांग्रेस ने दुर्गा के निलंबन का विरोध किया है, लेकिन उसने स्पष्ट किया कि वह मस्जिद की दीवार गिराए जाने के खिलाफ है।

बहरहाल, अखिलेश को मायावती,अरविंद केजरीवाल,तेजस्वी यादव जैसे तमाम नेताओं का साथ जरूर मिल रहा है,लेकिन भाजपा नेता और अखिलेश के चचा शिवपाल यादव भतीजे अखिलेश को बेदाग मानने को तैयार नहीं हैं। शिवपाल तो यहां तक कहते हैं कि उनके पास जब तक यह विभाग रहा,कई कोई गड़बड़ी नहीं हुई। एक महिला की शिकायत और खनन घोटाले के चलते ही अखिलेश के मंत्री गायत्री प्रजापति लम्बे समय से जेल की सलाखों के पीछे हैं।उन पर भी ईडी का शिकंजा कस गया है।सीबीआइ दिल्ली ने शामली में हुए खनन घोटाले को लेकर अगस्त 2017 में सपा के पूर्व खनन मंत्री गायत्री प्रसाद प्रजापति के दो करीबियों समेत नौ आरोपितों के खिलाफ एफआइआर दर्ज की थी।

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लेखक अजय कुमार लखनऊ के वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं.

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