
चंदन पांडेय-
हाल में मध्य प्रदेश के उच्च न्यायालय ने एक फैसला सुनाया। अजीब फैसला था लेकिन अगर ध्यान से देखेंगे तो उसमें एक पसरती हुई विचारधारा का प्रतिबिंब है।
फैसला एक बलात्कार से जुड़ा है। एक पुरुष ने एक चार वर्षीय बच्ची का बलात्कार किया। बच्ची का शरीर बर्बाद हो गया। उसके मन, विचार और संवेदना के विनाश के बारे में लिखने के लिए भाषा अपर्याप्त है। उस पुरुष ने जघन्य अपराध किया। अदालत ने कहा है कि अपराध जघन्य अवश्य है लेकिन जघन्यता से किया नहीं गया है इसलिए सजा कम कर दी। बहुत पहले थॉमस बर्नहार्ड ने पोस्टमैन नामक कहानी में लगभग यही लिखा है, पोस्टमैन अदालत में कहता है कि उसने एक गर्भवती महिला की हत्या जरूर की लेकिन बड़े एहतियात से किया। वह ‘ऐज केयरफुली ऐज पॉसिबल’ पद का प्रयोग करता है और इतनी बार करता है कि अदालत उसे बरी कर देती है। यह कहानी बर्नहार्ड के दी वॉइस इमिटेटर नामक संकलन है।
‘स्त्री द्वेष’ एक विचारधारा का स्वरूप ले चुका है। जैसे जाति एक विचारधारा है। इस विचारधारा से लोग संचालित होते हैं-जैसे दक्षिणपंथ से, फ़ासिज्म से, दलित उत्पीड़न से वैसे ही स्त्री द्वेष से। अदृश्य तौर पर सांगठनिक हो जाना और स्त्री विरोधी अपराधियों की मदद करना इस विचारधारा का प्रमुख लक्षण है।
महज़ इस फैसले तक सीमित रहकर न देखें, समाज के हर क्षेत्र में स्त्री द्वेष से आप समूहों को संचालित होते देख सकते हैं। बुद्धिजीवियों में इसके लक्षण देखे जा सकते हैं और वहाँ यह आत्माभिमान भी है कि वे जो कर रहे हैं सही कर रहे हैं। पिछले दिनों कृष्ण कल्पित प्रकरण के सामने आने से इन बातों को फिर सोचने समझने का मौका मिला।
इस विचारधारा के एक अनुयायी ने लिखा है जिसमें उन्होंने अंततः उस स्त्री में ही कमी निकाला है कि उसे शराब नहीं पीनी चाहिए थी। भाई किसने बताया आपको कि वह शराब पी रही थी? जिसने बताया उसने क्या इतना ही बताया अथवा अपने अपराध भी बताए? यह उनका दुस्साहस है जो व्यक्त कर दिया है। एक जने व्यग्र हो रहे हैं कि बहाने से ही कुछ कुछ ऐसा लिख रहे हैं जिससे इस मामले को दूसरा स्वरूप दिया जा सके। वे कह रहे हैं कि संस्था को बदनाम किया जा रहा है।
यह सिर्फ कल्पित तक का मामला होता तो शायद मैं नहीं लिखता क्योंकि पिछले दिनों उन्होंने जो मुझे लेकर लिखा था उसमें यही लगेगा कि कोई निजी खुन्नस है। जबकि कल्पित का स्त्री द्वेषी स्वरूप दशकों से जाहिर है। गगन गिल और अनामिका पर उनकी टिप्पणियां हिंदी समाज को याद होंगी।
वास्तव में इस समाज में स्त्री द्वेष एक प्रवृत्ति की तरह था जो अब विचारधारा का रूप ले चुका है। यह 2014 के बाद बड़ी तेजी से प्रसारित हुआ है। चौदह को नैतिकता दहन वर्ष के बतौर भी याद रखना चाहिए।
स्त्री द्वेष नामक विचारधारा के समर्थक और अनुयायियों के बीच आप कुछ साझा लक्षण देख पायेंगे कि वे आवश्यक नैतिकता को ‘पॉलिटिकली करेक्टनेस’ कहकर ख़ारिज करते हैं। ऐसे जैसे पॉलिटिकली करेक्ट होना कोई खामी हो।
दरअसल बदलते समय में स्त्रियों को मिल रहे मौकों और उपलब्धियों ने पुरुषों के बड़े वर्ग के अभिमान को ठेस पहुंचाया है। ये लोग मानते ही नहीं कि स्त्रियां भी आगे चल सकती हैं। बड़ी बड़ी कवयित्रियों को लेकर ऐसी ही बात होती है कि उनके पति उनकी कविताएँ लिखते हैं। भले ही पति ख़ुद कुछ न लिखते हों! आप स्त्री द्वेषियों का दुस्साहस देखिए! यह एक भीड़ हैं! बहुत बड़ी भीड़।
कुछेक तो किसी दंभ में यह स्वीकार भी करते हैं कि क्या हुआ जो वे स्त्री विरोधी हैं! अपने पूर्ववर्ती रचनाकारों का नाम लेकर बताते हैं कि बड़े रचनाकारों में भी स्त्री विरोध है! वे अपने लिए ज़मीन तलाश चुके हैं। किसी मुद्दे पर इनके स्वयं की जानकारी भले ही शून्य या उससे कम हो लेकिन स्त्री से बहस करते हुए उसका स्त्रीत्व याद दिलाते रहते हैं।
इनमें जो बुजुर्ग हैं उन्हें हमेशा लगता है कि स्त्रियों को कविता सिखाने की ज़िम्मेदारी उनकी है। अक्सर देर रात जब हार्मोन्स सक्रिय होते हैं तब वे स्त्रियों को फ़ोन करते हैं, मैसेज करते हैं और उन्हें कविता सिखाने हेतु आमंत्रण करते रहते हैं। इनकी फ़ेहरिस्त है और खासी लंबी है। ये अन्य विचारधारा के साधकों की तरह लामबंद रहते हैं। अभी हिंदी के इन कथितों में इतना साहस नहीं है कि साफ़ साफ़ ख़ुद को स्त्री विरोधी घोषित कर दें इसलिए वे मित्रता की ओट लिए रहते हैं। आप देखेंगे कि इनकी शक्ति सांप्रदायिक शक्तियों की ही तरह है और इनकी सीमाएँ भी।
इनमें से ज्यादातर भोजपुरी तथा अन्य भाषाओं के फूहड़ गानों से अपनी विचारधारा माँजते हैं। उसे लगातार साझा करते हैं। वहाँ से वे कहानियाँ और कविताई सीखते हैं। स्त्री को स्त्री तक न समझने वाले ये गीत इन्हें स्वतंत्रता का प्रतीक मालूम होते हैं।
अगर एक स्त्री द्वेषी किसी जगह फँसता दिखे तो बाकी के समर्थक उसकी रचनाओं की तारीफ शुरू कर देते हैं। संस्थाओं में बैठे स्त्री द्वेषी अधिकारी पुरस्कार और सम्मान से नवाजने लगते हैं। पत्रिकाएँ और अखबार में बैठे अधिकारी संपादकीय और ऑप एड लिखवाने का करार कर लेते हैं। चतुर्दिक महिमामंडन होता है।
यह सब एक दिन खत्म होगा। आख़िर आज चाहकर भी कोई रचनाकार धर्म और जाति की आलोचना नहीं कर सकता क्योंकि उसे वहाँ पिट जाने का और अदालत जाने का फिर जेल जाने का डर है! इसी तरह स्त्रियों पर होने वाले अपराध ख़त्म होंगे, अनाधिकार चेष्टाओं का अंत होगा।
पुनः मध्य प्रदेश की घटना की तरफ लौटते हैं जिसका जिक्र ऊपर किया है। वर्षों पहले की बात है, घनघोर अत्याचार के एक दूसरे मामले में नागपुर की अदालत से एक अपराधी बरी हो रहा था। उस दिन स्त्रियों ने निंदनीय कार्य किया, उस अपराधी को अदालत में ही मार डाला। वह दिन दूर नहीं जब स्त्रियां समूह में आकर, स्त्रियों से जोर जबरदस्ती करने वालों को घेरेंगी, उनके घर पहुंचकर उन्हें शर्मसार करेंगी, उनके दफ्तर पहुंचकर उनकी पिटाई करेंगी, अदालत जायेंगी, सजा दिलवायेंगी लेकिन तब तक शायद कुछ देर हो चुकी रहेगी। इसे मैं देख पा रहा हूँ।
स्पष्ट देख पा रहा हूँ। स्त्रियां अब वापस नहीं जाने वाली। अपनी कामनाओं और हार्मोनल उदंडताओं की कमान आप संभाल कर रखें। साथी नागरिकों को सम्मान देने की आदत डाल लें।
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