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सुख-दुख

थोड़ी भी शर्म नहीं आई इन्हें सुब्रत राय की तारीफ में लेख लिखते हुए!

चरण सिंह राजपूत-

भड़ास फॉर मीडिया पर सहारा के चैयरमेन सुब्रत राय के बारे में एक लेख पढ़ा। सिद्धार्थ ताबिश नाम के किसी सज्जन ने सहारा के चैयरमेन सुब्रत राय को निर्दोष बताते हुए सहारा के डूबने के जिम्मेदार सहारा इंडिया के एजेंटों और विशेषकर के क्रांतिकारी पत्रकार को बता रखा है।

इन सज्जन के इस लेख का हेडिंग ये है-

सुब्रत राय अपनी जगह एकदम सही थे, इसीलिए वो भारत छोड़ के भागे नहीं!

लिंक ये है-

https://www.bhadas4media.com/subrat-roy-sahi-ya-galat/

निश्चित रूप से सिद्धार्थ ताबिश जैसे ऐसे कितने लोग होंगे जो सुब्रत राय के हितैषी हैं। वैसे मैं इन सज्जन को जानता नहीं हूं पर जिस लहजे में इन्होंने लिखा है ये व्हाट्सएप यूनिवर्सिटी के पत्रकार लगते हैं। वैसे मैं इस तरह के लेख पर किसी तरह की टिप्पणी करने से बचता हूं पर भड़ास फॉर मीडिया जैसे धारधार पोर्टल पर यह लेख ऐसे समय लिखा गया है जब पूरे देश में सहारा से भुगतान लेने के लिए हाहाकार मचा हुआ है। ऐसे पारिस्थिति में भी भाई यशवंत जी ने इन सज्जन की भावनाओं का ख्याल रखा और इनके लेख को तवज्जो दी। 

 मैं इन सज्जन से पूछना चाहता हूं कि भाई,  सुब्रत राय के बारे में कितना जानते हो ? क्या सेबी गलत है ? देशभर में आत्महत्या कर चुके सैकड़ों एजेंट गलत थे ? देशभर में अपना पैसा मांग रहे करोड़ों लोग गलत हैं ? सही तो बस सुब्रत राय हैं, जिंदगी भर जनता के पैसे पर अय्याशी करता रहा। सिद्धार्थ जी जरा बताइये कि सुब्रत राय का फायदा का धंधा क्या था ? कहां से इन महाशय ने अपने बेटों की शादी में हजारों करोड़ रुपये लगाए ? कहां से बाबा राम देव को 100 करोड़ रुपये दिए ? कहां से अमिताभ बच्चन को 100 करोड़ रुपए दिए ? राजा महाराजाओं जैसे जिंदगी किसके दम पर जीता रहा है इनका परिवार ? 

बस कुछ भी दिमाग में आया और लिख दिया। हां यह लिख सकते थे कि यूपीए सरकार में कांग्रेस सुब्रत राय के पीछे पड़ गई थी। वह भी तब जब सुब्रत राय सोनिया गांधी के प्रधानमंत्री बनने के मामले में अपनी टांग अड़ा रहे थे। इन सज्जन ने सहारा की बर्बादी का जिम्मेदार एक क्रांतिकारी पत्रकार को बताते हुए के बाद ज्यादा गिरकर लिख दी है कि इस पत्रकार को सुब्रत  राय का अहसान मानना चाहिए नहीं तो वह कुछ भी करा सकते थे। मतलब कोई पत्रकार किसी के काले कारनामों को इसलिए उजागर न करे क्योंकि उसे मरवा भी दिया जा सकता है। भाई अमर कोई है क्या ? मरना तो सभी को है। कुछ करके मर जाओ। 

दरअसल सुब्रत राय मीडिया के क्षेत्र में आया था ही अपने काले कारनामों को छिपाने के लिए। सुब्रत राय अपने कर्मचारियों और एजेंटों को इमोशनल ब्लैकमेल किया है। शायद ये सज्जन भी सुब्रत राय के इसी हथियार की चपेट में आये हैं। 

सिद्धार्थ जी, मैंने देखा है सुब्रत राय का असली चेहरा, तिहाड़ जेल में। जब सहारा मीडिया में वेतन को लेकर आंदोलन हुआ था तो मैं सहारा मीडिया में ही था। आंदोलन की अगुआई कर रहे हम लोगों को सुब्रत राय ने तिहाड़ जेल में बुलाया था। पहले तो सुब्रत राय ने हम लोगों को धमकी देने के लहजे में कहा कि कोई सहारा में नेता बनने की कोशिश न करे। सहारा में बस एक ही नेता है और वह मैं हूं। हालांकि जब हम लोग उनकी किसी धमकी में न आये तो उन्होंने अंत में कहा था कि मेरा सिर काटकर ले जाओ। मेरे पास पैसे नहीं है। 

क्या सुब्रत राय को ऐसा हम लोगों से कहना चाहिए था। मैंने तो उनसे इतना भी कह दिया था कि मीडिया हम लोग चला लेंगे आपसे सेलरी भी नहीं मांगेंगे पर आप अपने महंगे अधिकारियों को अपने पास रखिये। पर सुब्रत राय ने मुस्करा कर मेरी बात टाल दी थी। हमें पता चला था कि भले ही कर्मचारियों को पैसा न मिल रहा हो पर तिहाड़ जेल में सुब्रत राय का सारा खर्चा मीडिया के पैसे से उठाया जा रहा था। इतना नहीं जब सहारा मीडिया में कर्मचारियों को वेतन नहीं मिल रहा था तो नोएडा स्थित सहारा परिसर में इनकम टैक्स के छापे में डेढ़ सौ करोड़ रुपए मिले थे। जहां तक भागने की बात है तो उनके विदेश जाने पर सुप्रीम कोर्ट के प्रतिबंध लगाने की वजह से वह विदेश नहीं भाग पाए हैं। हां यदि उनके सारे रास्ते बंद हो गए तो नेपाल के रास्ते भाग सकते हैं। 

सिद्धार्थ के अनुसार सुब्रत राय को कुछ क्रांतिकारियों ने चोर साबित करके जेल भिजवा है। इनके अनुसार सहारा में लूट सुब्रत राय ने नहीं बल्कि एजेंटो ने मचाई है। इनके अनुसार एजेंटो ने गरीब  लोगों से पैसे लिए और उन्हें फ़र्ज़ी रसीदें दी और सारा पैसा अपने पास रख लिया और एक भी सहारा में जमा नहीं किया। इनके अनुसार उत्तर भारत के हर शहर में आपको ऐसे लोग मिलेंगे जिन्होंने अपने रिश्तेदारों, मोहल्ले वालों और गरीबों का पैसा खा लिया। भतीजा अपने चाचा चाची का पैसा खा गया और बेटा अपने बाप का.. ये बोल के कि आपका पैसा मैं सहारा में जमा कर रहा हूँ। शायद इन सज्जन को पता ही नहीं है कि सहारा इंडिया में सुब्रत राय के प्रति इतनी भक्ति थी कि एजेंटों ने तो अपने घर का पैसा ही सहारा में जमा कर दिया। गड़बड़झाला करने वाले लोगों को तो सहारा में रखा जाता था ही नहीं। सुब्रत राज्य 12-14 तक एजेंटों को ब्रैनवॉश करते थे। सब सुब्रत राय के एक इशारे पर जान छिड़कते थे। जब सुब्रत राय ने जेल से छुड़ाने के लिए अपने कर्मचारियों को  मदद करने के लिए एक पत्र लिखा तो सहारा से कर्मचारियों की ओर से साढ़े बारह सौ करोड़ रुपए जमा हुए थे। पता है ये पैसे कर्मचारियों ने उस समय दिए थे जब मीडिया में वेतन नहीं मिल रहा था। पैसे देने में एजेंट भी शामिल थे। 

इन सज्जन के अनुसार ये पूरा घोटाला मध्यम और निम्न वर्गीय परिवार के लोगों का था। जाली रसीद छपवा के उन्होंने ये किया। इन महाशय के अनुसार एक क्रांतिकारी “पत्रकार” सुब्रत राय के पीछे पड़ गया था और उसे जेल भिजवा दिया। इनको तो यह भी नहीं पता है कि सुब्रत राय जेल में नहीं बल्कि पैरोल पर बाहर घूम रहा है। इनके अनुसार जो यह पत्रकार दो टके का दलाल पत्रकार था पर इन्होंने यह नहीं बताया कि सुब्रत राय को फंसा कर वह यह पत्रकार दलाली खा किससे रहा था ?  इन सज्जन ने ढाई से तीन लाख सहारा में नौकरी करने वाले कर्मचारियों और उनके बच्चों के भविष्य को लेकर चिंता तो जताई है पर इनको संकट में डालने के लिए ये सुब्रत राय  या सहारा के प्रबंधन को जिम्मेदार नहीं मानते बल्कि एजेंटो और एक क्रांतिकारी पत्रकार को मानते हैं। इन महाशय के अनुसार क्रांतिकारी पत्रकार दो कौड़ी के और शातिर होते हैं। मतलब गणेश शंकर विद्यार्थी और भगत सिंह जैसे क्रांतिकारी पत्रकार भी दो कौड़ी के और शातिर थे। मतलब एक पत्रकार किसी पर भी केस लगवा सकता है। मतलब सुब्रत राय जैसे मक्कारों के यहां उनके काले कारनामों को छिपाने के लिए काम करते रहो। 

वैसे इन सज्जन की घटिया सोच को दाद देने होगी कि इन्होंने लिखा है कि सुब्रत राय चाहते तो उस पत्रकार का नामोनिशान नहीं मिलता। इनकी राय में सुब्रत राय जैसे लोगों को बेनकाब करने वाले लोगों को मरवा देना चाहिए। इन्होंने तो और गिरकर सुब्रत राय को एक सच्चा और ईमानदार आदमी भी बता दिया। 

यह सज्जन कम से कम यह तो मान रहे हैं कि ये ऐसे लोगों से मिल रहे हैं, जिनका हंसता खेलता परिवार बिखर गया है। वो सब बहुत अच्छी और संपन्न ज़िन्दगी जी रहे थे सहारा इंडिया में। जॉब करके और एकदम से सब ख़त्म हो गया। लोग पूरी तरह से बर्बाद हो गए और अभी तक संभल नहीं पाए हैं। इन्होंने यह नहीं लिखा कि कैसे हो गए ? यह नहीं लिखा कि इसी सुब्रत राय ने वेतन मांगने पर सहारा मीडिया से 49 लोगों की नौकरी ले ली थी। किसी कर्मचारी को कोई पैसा देने को तैयार नहीं। अभी भी सुब्रत राय और उनका परिवार राजा महाराजाओं वाली जिंदगी जी रहे हैं। खुद सुब्रत राय 8  साल से पैरोल पर है। 

इन सज्जन की नजरों में क्रांति करना गलत है। इनकी नजरों में आजादी की लड़ाई भी गलत होगी। ये तो कहते हैं कि इतने लोग आजादी की लड़ाई में क्यों शहीद हो गए ? ऐसे ही लोग तो अंग्रेजों के शासन की पैरवी करते हैं। ऐसे लोगों की वजह से तो गलत लोग मनमानी करते हैं और नौकरीपेशा लोग दम तोड़ते रहते हैं। इनकी नजरों में तो सहारा मीडिया में जो आंदोलन हुआ है या फिर जो निवेशकों और एजेंट अपने भुगतान के लिए आंदोलन कर रहे हैं वे गलत हैं। सही तो बस सुब्रत राय हैं।

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