बनारस में महिला पत्रकार को घर से बेदख़ल कर भूमाफ़िया करवा रहा अवैध निर्माण, पुलिस-प्रशासन मौन!

सुमन द्बिवेदी-

मेरे लिए कानून कहां खड़ा है? मेरे घर पर पिछले तीन महीने से भूमाफिया का ताला बंद है। पिछले तीन महीने से अपने ही घर से बाहर कर दी गई हूं। घर पर भूमाफिया का ताला बंद है जबकि कहा जा रहा है कि कानून का राज है, इसीलिए मैं अपनी 76 साल की बूढ़ी मां के साथ अपने घर तक में नहीं घुस सकती। जिसने ताला बंद कर रखा है वो शान से उसी घर में काबिज है।

उसके साथ सत्ता का हाथ है और इसीलिए प्रधानमंत्री जी के संसदीय क्षेत्र में मैं और मेरी मां के साथ हो रहे नाइंसाफी पर स्थानीय पुलिस प्रशासन मौनी बाबा की भूमिका में है।

मेरे दर्जनों प्रार्थना पत्र के साथ मेरी फरियाद, मिन्नतें, इल्तिजा , रोना-गिरगिराना सब बेअसर है। शायद इसलिए कि मैं और मेरी मां दोनो अकेले हैं।

एक सामान्य नागरिक की क्या हैसियत और अधिकार है मेरे साथ हुए घटना के बाद मुझे समझ में आ रहा है। अभी कुछ दिनों पहले ही एक बार फिर जिले में आए नये पुलिस अधीक्षक को पांच गज की दूरी से अपना प्रार्थना पत्र देकर लौट आई हूं। उनका जवाब था आपकी शिकायत भेलूपुर थाने भेज रहा हूं। एक बार फिर मैं इतंजार कर रही हूं न्याय के लिए पर शायद ये कभी न खत्म होने वाला इंतजार है जो मेरे जैसे लोग उम्र भर करते हैं।

गलत करने वालों को कभी इतंजार नहीं करना पड़ता क्यों कि एक पूरी सत्ता और उसका तंत्र उनके साथ खड़ा दिखता है। सारे सवाल पीड़ित से पूछे जाते हैं जैसे मेरे मामले में।

घर से जुड़े सारे कागजात पुलिस प्रशासन को सौंपने के बाद मुझसे ही पूछा जाता है कैसे मान लें आप उसी घर में रहती थी? लेकिन क्या जबरन ताला बंद करने वाले, मुझसे बदतमीजी करने वाले उस भूमाफिया से एक बार भी पुलिस प्रशासन ने पूछा तुम यहां कैसे और किस हैसियत से हो? या किस कानून के तहत तुमने ताला बंद किया?

इधर बीच मेरे बंद कमरे से मेरा समान हटाया जा रहा है। मेरे घर के अंदर कुछ जलाया भी जा रहा है। मैंने इसकी सूचना भी पुलिस प्रशासन को दी लेकिन मौनी बाबा लोग मौन है। संभवत आने वाले दिनों में मेरे कमरे में कुछ भी न बचे। रातों-रात नहीं दिन के उजाले में मेरे घर का अस्तित्व ही मिटा दिया जाए। इतनी अराजकता और प्रशासन का इतना नाकारात्मक रवैया किस के हित में है।

मैं अकेली महिला अपनी बूढ़ी मां के साथ खड़ी हूं लेकिन मेरे लिए न्याय कहा कहां खड़ा है? कहां खड़ा है न्याय?

मेरी 72 साल की मां और मैं बस इतनी सी दुनिया है मेरी। सन 2014 में पापा दुनिया को अलविदा कह गए और उस दिन से हमारी जिंदगी में एक अधूरापन एक खालीपन जिसे मां और मैं हम दोनों महसूस करती हूं। पापा के जाने के बाद से ही मां बीमार रहने लगी इन दिनों बिस्तर पर है।

मैं और मेरी मां अक्सर सोचती हैं, हम मां और बेटी ही नहीं, दो महिलाएं भी हैं शायद इसीलिए इस पुरूष वर्चस्ववादी समाज में असुरक्षित महसूस करती हूं। मेरी बुर्जुग मां को मेरी चिंता रहती है कि वो लोग जिन्होंने मेरे स्मृतियों में रचे-बसे घर में ताला बंद कर रखा है मुझे आफिस आते-जाते रास्ते में कुछ कर न दे और मुझे इस बात का डर है अगर मुझे कुछ हो गया तो मेरी मां को कौन देखेगा।

आपको पता है डर-डर कर जीना मरने से बदतर होता है।

सुमन द्बिवेदी

वरिष्ठ उपसंपादक

आज अखबार

वाराणसी



 

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