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आज के अखबार : जेएनयू-जमानत के मामले में सुप्रीम कोर्ट का तो पता नहीं, ज्यादातर पक्षपाती लग रहे हैं

सुप्रीम कोर्ट, जेएनयू की खबरों के बीच आज इन खबरों को कम महत्व मिला

1. ऑपरेशन सिन्दूर के समय व्यापार, द्विपक्षीय संबंधों पर चर्चा के लिए भारतीय दूतावास ने ट्रम्प के सहायक की फर्म की सेवाएं लीं। इसमें लाखों खर्च हुए। (द हिन्दू)

2. ट्रम्प ने कहा है कि अमेरिकी टैरिफ के कारण मोदी मुझसे पहले जैसे खुश नहीं हैं (इंडियन एक्सप्रेस)

3. कांग्रेस ने अंकिता भंडारी मामले में सीबीआई जांच की मांग की (देशबन्धु)।

4. ममता बनर्जी ने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग एसआईआर में भाजपा के आईटी सेल ऐप्प का उपयोग कर रहा है। भाजपा ने इससे इनकार किया है। चुनाव आयोग की चर्चा इस खबर में नहीं है लेकिन भाजपा नेता सुवेन्दु अधिकारी ने चुनाव आयोग से अपील की है कि चाय बगानों के नियुक्ति रिकार्ड को मान्यता दें। मुझे लगता है कि तृणमूल के आरोप, भाजपा के इनकार, चुनाव आयोग की चुप्पी और उससे अपील गठबंधन को उजागर कर देता है। 

संजय कुमार सिंह

अखबारों के पहले पन्ने की खबरों से लग रहा है कि देश की न्याय व्यवस्था गंभीर रूप से बीमार है या भयंकर रूप से पक्षपाती है। मेरी चिन्ता सुप्रीम कोर्ट या उसके फैसले नहीं हैं। कानून मैं नहीं जानता, मेरा विषय नहीं है लेकिन खबरों से लग रहा है अखबार जबरदस्त पक्षपात कर रहे हैं। कल मैंने यहां लिखा था, उमर खालिद को जमानत नहीं मिलना और अदालत द्वारा उसके कारण बताना आज अखबारों में उसका प्रमुखता से छपना – बताता है कि फैसला सामान्य नहीं है और जो स्थितियां हैं उसमें यह सरकार की चाहत की पूर्ति लगती है। …. अखबारों ने सरकार के पक्ष में स्पष्टीकरण को प्रमुखता दी है सरकार की कमजोरी या असामान्यताओं को छिपा लिया है। आज टाइम्स ऑफ इंडिया की सेकेंड लीड है, सुप्रीम कोर्ट ने कहा, अपराध की प्रकृति की परवाह किए बिना जल्द सुनवाई का अधिकार, 16 महीने से जेल में बंद  एमटेक चेयरमैन को जमानत दी। यहां यह बता दूं कि एमटेक के चेयरमैन, अरविन्द धाम के खिलाफ ई़डी की कार्रवाई चल रही है और उनपर फंड डायवर्ट करने के लिए 500 के करीब शेल कंपनियां स्थापित करने का आरोप है। द प्रिंट में प्रकाशित खदीजा खान की खबर के अनुसार, इन शेल कंपनियों का स्वामित्व 15 भिन्न स्तर का है। टाइम्स ऑफ इंडिया में अमित आनंद चौधरी ने अपनी खबर में कहा है, वैसे तो करीब छह साल जेल में काट चुके उमर खालिद और शरजील इमाम पर यूएपीए के तहत आतंकवादी गतिविधियों के लिए मुकदमा चलाया जा रहा है लेकिन गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम की धारा 43 डी(5) और मनी लॉन्ड्रिंग रोकथाम अधिनियम की धारा 45 के तहत जमानत के प्रावधान एक जैसे हैं। दोनों में कहा गया है कि किसी आरोपी को जमानत पर रिहा नहीं किया जा सकता, अगर यह मानने के लिए उचित आधार हैं कि उस व्यक्ति के खिलाफ आरोप पहली नज़र में सच हैं और आरोपी पर पहली नज़र में बेगुनाही साबित करने की शर्त लगाई जाती है।

अखबार ने अंग्रेजी में जो लिखा है उसका मतलब यही है कि एमटेक ग्रुप के पूर्व चेयरमैन अरविंद धाम को जमानत देने का कोर्ट का आदेश एक्टिविस्ट छात्रों की जमानत याचिका खारिज करते समय दिए गए आदेश के विपरीत है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के पहले के आदेशों के अनुरूप है। इसीलिए कल जमानत नहीं दिए जाने के फैसले को अखबारों में महत्व मिला था। इसमें सुप्रीम कोर्ट की दलीलें खास थीं और उन्हें भी अखबारों ने पूरा प्रचार दिया। आज की खबर उस लिहाज से बिल्कुल अलग है और पहले की खबर के संदर्भ में इसका खास महत्व है। इसलिए इसे भी उतनी ही प्रमुखता मिलनी चाहिए थी। कम से कम टाइम्स ऑफ इंडिया जैसी तो होनी ही चाहिए थी। लेकिन नहीं है और मेरे लिए यही रेखांकित करने वाली बात है। अखबार ने अपनी खबर में दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और तमिलनाडु के मंत्री सेंथिल बालाजी के मामलों की भी चर्चा की है। साफ है कि इन मामलों में सुप्रीम कोर्ट के रुख में असंगति है। मेरा मुद्दा यह है कि यह खबर जब टाइम्स ऑफ इंडिया के लिए महत्वपूर्ण है तो बाकी अखबारों के लिए क्यों नहीं? ऐमटेक चेयरमैन के मामले में आदेश इतना स्पष्ट है कि खबर के दूसरे हिस्से का शीर्षक ही है, सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि राज्य के पास अगर द्रुत ट्रायल सुनिश्चित करने की व्यवस्था नहीं है तो जमानत का विरोध नहीं किया जाए। खबर के इस अंश के साथ हाईलाइट किया गया है, अदालत ने नोट किया कि एमटेक ट्रायल के निकट भविष्य में पूर्ण होने की कोई संभावना नहीं है क्योंकि इस मामले में 210 गवाहों से जिरह की जानी है। दूसरी ओर, आप जानते हैं कि उमर खालिद और शरजिल इमाम के मामले में आदेश है कि वे जमानत की अगली अपील एक साल बाद ही कर सकते हैं। आइए, टाइम्स ऑफ इंडिया की आज की खबर देख लें। अनुवाद गूगल से किया है हालांकि उसे और आसान बनाने के लिए थोड़ा संपादन मैंने किया है। टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर इस प्रकार है, सुप्रीम कोर्ट ने एक्टिविस्ट उमर खालिद और शरजील इमाम की जमानत याचिका यह कहते हुए खारिज कर दी थी कि ट्रायल में देरी और लंबे समय तक जेल में रहना राहत देने का एकमात्र आधार नहीं हो सकता। इसके एक दिन बाद मंगलवार को कोर्ट की एक और बेंच ने कहा कि आरोपी को जल्द सुनवाई का मौलिक अधिकार है और यह अपराध की प्रकृति से प्रभावित नहीं होता है। कोर्ट ने कहा कि ट्रायल में देरी जमानत देने का एक वैध आधार है और इसी आधार पर मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में पिछले 16 महीनों से जेल में बंद एमटेक ग्रुप के पूर्व चेयरमैन अरविंद धाम को राहत दी।

न्यायमूर्ति संजय कुमार और आलोक अराधे की बेंच ने कहा, “संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जल्द सुनवाई का अधिकार, अपराध की प्रकृति से प्रभावित नहीं होता है।” कोर्ट ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने कई मामलों में जमानत देने के लिए लंबे समय तक जेल में रहने को आधार बनाया है, जब जेल की अवधि 3-17 महीने थी। अखबार ने सुप्रीम कोर्ट की पीठ के इस कथन को हाईलाइट किया है, यह अच्छी तरह से तय है कि यदि राज्य या कोई भी अभियोजन एजेंसी, इसमें कोर्ट शामिल है…के पास किसी आरोपी को जल्द सुनवाई का मौलिक अधिकार प्रदान करने या उसकी रक्षा करने का कोई उपाय नहीं है …तो राज्य या कोई अन्य अभियोजन एजेंसी इस आधार पर जमानत की याचिका का विरोध नहीं कर सकती कि किया गया अपराध गंभीर है। कानून की शून्य समझ वाले एक पाठक के रूप में मैं यही समझ रहा हूं कि अपराध जब साबित ही नहीं हुआ है तो हुआ कहां हैं और हुआ भी है तो दोषी अभियुक्त ही है यह कहां तय है और जब कुछ तय नहीं है तो उसे अभियुक्त को अपराधी क्यों माना जाए। यही नहीं, राज्य जब मनमानी करता है तो ऐसे मामले आम होते हैं यह तो सुप्रीम कोर्ट को ही समझना है या उसी से अपेक्षित है कि वह इस बात का भी ख्याल रखे। राज्य को यह अधिकार कैसे दिया जा सकता है कि वह किसी पर आरोप भर लगाकर महीनों जेल में रखे। हद तो यह है कि सरकार ऐसा कानून बनाना चाहती है जिसमें वह मुख्यमंत्री को भी ऐसे कानून और ऐसे आरोप के तहत बंद कर दे और एक महीने से ज्यादा जेल में रहने पर उसका पद चला जाए। और राज्य सत्ता सुप्रीम कोर्ट के सहयोग से मनमानी करे जबकि सुप्रीम कोर्ट का काम राज्य पर नजर रखना भी है। राज्य के अत्याचार से नागरिकों की रक्षा करना तो है ही। (जारी)

लेखक संजय कुमार सिंह से संपर्क [email protected] के जरिए हो सकता है।

अगली किस्त पढ़ें – नागरिकता की पुष्टि के नाम पर संसाधनों की बर्बादी और परेशान करने की छूट?। लिंक यह रहा- https://www.bhadas4media.com/nnagrikta-kee-pushtee-ke-naam-par-sansadhano-kee/

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