नई दिल्ली। देश की पुरानी समाचार एजेंसी United News of India (UNI) के दफ्तर पर Delhi Police की कार्रवाई ने सिर्फ एक प्रशासनिक कदम नहीं, बल्कि मीडिया की स्वतंत्रता और सत्ता के साथ उसके रिश्तों पर भी तीखी बहस छेड़ दी है।
रफी मार्ग स्थित UNI दफ्तर को सील किए जाने के बाद सोशल मीडिया पर एक सवाल तेजी से उठ रहा है— “अगर UNI के नाम में ‘U’ (United) की जगह ‘A’ (Adani) होता, तो क्या पुलिस कार्रवाई की जगह प्रोत्साहन मिलता?”
यह सवाल महज व्यंग्य नहीं, बल्कि उस धारणा को सामने लाता है जिसमें बड़े कॉरपोरेट और सत्ता के करीबी संस्थानों को अलग तरह का व्यवहार मिलने की बात कही जाती है, जबकि स्वतंत्र या अपेक्षाकृत कम प्रभावशाली मीडिया संस्थानों पर सख्ती दिखती है।
पुलिस का कहना है कि यह कार्रवाई Delhi High Court के आदेश और जमीन आवंटन रद्द होने के बाद की गई है। लेकिन UNI ने इसे “प्रेस की स्वतंत्रता पर हमला” बताया है और आरोप लगाया है कि कर्मचारियों को जबरन बाहर निकाला गया, यहां तक कि महिला पत्रकारों के साथ बदसलूकी भी हुई।
गौर करने वाली बात यह भी है कि UNI का मालिकाना हक उसी समूह के पास है जो अंग्रेज़ी अखबार The Statesman भी प्रकाशित करता है—एक ऐसा अखबार जिसकी ऐतिहासिक पहचान स्वतंत्र और आलोचनात्मक पत्रकारिता रही है।
यही वजह है कि इस कार्रवाई को सिर्फ एक संपत्ति विवाद से जोड़कर नहीं देखा जा रहा, बल्कि इसे उस बड़े परिप्रेक्ष्य में रखा जा रहा है जहां मीडिया संस्थानों के साथ व्यवहार उनके “स्वर” और “सत्ता से दूरी” के आधार पर तय होने का आरोप लगता रहा है।
कानूनी कार्रवाई बनाम चयनात्मक सख्ती—यही इस पूरे विवाद का असली केंद्र बन गया है।
सवाल अब सिर्फ यह नहीं है कि जमीन किसकी थी, बल्कि यह भी है कि— क्या सभी मीडिया संस्थानों के साथ कानून का व्यवहार एक जैसा है?
UNI के न्यूजरूम में U की जगह A लिखा होता तो पुलिस की जगह प्रोत्साहन आता। -मुकेश माथुर, संपादक, दैनिक भास्कर राजस्थान
उर्मिलेश-
देश की एक प्रमुख न्यूज एजेंसी UNI के दिल्ली स्थित मुख्यालय भवन को कल पुलिस बल ने जबरन खाली कराया. खबर में कहा गया है कि पुलिस ने ऐसा करने के लिए ‘कोर्ट ऑर्डर’ का हवाला दिया पर संस्थान के अधिकारियों-संपादकों को ऑर्डर की प्रति नहीं दिखाई गई. स्टॉफ में अनेक लोगों को अपना निजी सामान लेने का वक्त भी नहीं दिया गया!
इस बारे में UNI द्वारा जारी खबर इस प्रकार है:
New Delhi, (UNI) In an unprecedented development in the history of independent India’s media, the premises of the country’s prestigious news agency United News of India were forcibly vacated on Friday evening without any prior notice, with a heavy deployment of Delhi Police and paramilitary forces.
The news agency has been operating for several decades from its premises at 9 Rafi Marg, New Delhi.
Some government officials entered the premises along with about 300 personnel and officers of the Delhi Police and paramilitary forces, as well as some lawyers, and began pressuring employees to immediately vacate the newsroom and leave the premises.
They said the action was being taken under a court order, but they failed to show any written order. They warned that if employees did not leave peacefully, force would be used.
When employees requested for some time and asked to wait for company management to arrive, and demanded to see a notice, some employees—including women—were forcibly dragged and pushed out of their seats and removed from the newsroom. They were also subjected to verbal abuse.
The police personnel took control of the gate of the premises and did not allow journalists who had gone out for news coverage, as well as management officials, to enter. They were also unable to retrieve their personal belongings.
It is unclear why employees were evicted in this manner without any prior notice and in the absence of senior management of the news agency.
Due to the sudden evacuation of the premises, the transmission of news to more than 500 subscribers of United News of India’s English, Hindi, and Urdu services came to an abrupt halt.
This has also put the existence of the historic news agency and the future of hundreds of employees and their families at risk.
हिंदी में पढ़ें-
UNI दफ्तर खाली कराने का आरोप: “बिना नोटिस, भारी फोर्स के साथ कार्रवाई”, सेवाएं ठप
नई दिल्ली, 20 मार्च। देश की प्रतिष्ठित समाचार एजेंसी United News of India (UNI) ने आरोप लगाया है कि उसके रफी मार्ग स्थित दफ्तर को शुक्रवार शाम एक अभूतपूर्व कार्रवाई में बिना किसी पूर्व सूचना के जबरन खाली कराया गया। एजेंसी के मुताबिक, यह घटना स्वतंत्र भारत के मीडिया इतिहास में एक असामान्य और गंभीर विकास है।
UNI ने कहा कि वह पिछले कई दशकों से 9, रफी मार्ग स्थित अपने परिसर से संचालन कर रही थी। शुक्रवार शाम अचानक बड़ी संख्या में सरकारी अधिकारी, करीब 300 कर्मियों के साथ Delhi Police और अर्धसैनिक बलों के साथ परिसर में दाखिल हुए। उनके साथ कुछ वकील भी मौजूद थे।
एजेंसी के अनुसार, अधिकारियों ने कर्मचारियों पर तत्काल न्यूज़रूम खाली करने का दबाव बनाना शुरू कर दिया। जब कर्मचारियों ने अदालत के आदेश की लिखित प्रति दिखाने और प्रबंधन के आने तक समय देने की मांग की, तो कथित तौर पर उन्हें नजरअंदाज किया गया।
UNI का आरोप है कि इस दौरान कुछ कर्मचारियों—जिनमें महिलाएं भी शामिल थीं—को जबरन सीटों से खींचकर बाहर निकाला गया, धक्का-मुक्की की गई और अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया गया।
कार्रवाई के दौरान पुलिस ने परिसर के गेट पर नियंत्रण कर लिया और बाहर गए पत्रकारों व प्रबंधन अधिकारियों को अंदर प्रवेश नहीं करने दिया। कई कर्मचारी अपने निजी सामान तक नहीं ले पाए।
एजेंसी ने सवाल उठाया है कि बिना किसी पूर्व नोटिस और वरिष्ठ प्रबंधन की गैरमौजूदगी में इस तरह की कार्रवाई क्यों की गई।
इस अचानक खाली कराए जाने का सीधा असर एजेंसी की सेवाओं पर पड़ा। UNI के अंग्रेज़ी, हिंदी और उर्दू सेवाओं के जरिए 500 से अधिक सब्सक्राइबर्स तक खबरों का प्रसारण तुरंत ठप हो गया।
एजेंसी का कहना है कि इस कार्रवाई से न सिर्फ उसकी ऐतिहासिक विरासत पर खतरा मंडरा रहा है, बल्कि सैकड़ों कर्मचारियों और उनके परिवारों का भविष्य भी अनिश्चित हो गया है।
दशक था 80s. मैं 5-7 साल का था। तब से याद है यह ऑफ़िस। पिताजी यहाँ काम किया करते थे। यूनिवार्ता में। एजेंसी का हिंदी विभाग।
डॉट मैट्रिक्स प्रिंटर पर ख़बर फैक्स की आवाज़ आज भी कानों में ताज़ा है। पिताजी के दो अज़ीज़ मित्र मेरे ताऊ और चाचा यहीं बने। राजीव पांडे अंकल और अशोक शर्मा अंकल।
रफ़ी मार्ग के इस ऑफ़िस में पीछे टेंट में कैंटीन भी थी। बताया जाता था बड़े बिजनेसमैन सरकार से मीटिंग कर यहीं खाना खाने आते थे। बड़े मतलब बहुत बड़े।
कैंटीन की साउथ इंडियन नमकीन का स्वाद आज भी मुँह में है। और रवा केसरी का तो पूछिये ही मत। सीलन भरी दीवारों से लेकर कूलर के झूले खस के पैड तक, इस ऑफिस में एक इतिहास था।
इतिहास बहुत ग़ुरबत में भी शक्तिशाली लोगों की ऐंठ कम करने का। इसी ऑफिस में बैठे पत्रकार से मिलने सत्ता के प्रतिनिधि घंटों इंतज़ार करते थे।
आज उसी इतिहास को धकिया कर बाहर फेंक दिया गया है। औक़ात दिखाने का प्रयास। पत्रकारों को इस ग़फ़लत से बाहर निकालने की कोशिश की वह ज़रूरी हैं। हवाला कोर्ट के आदेश का है। -संकेत उपाध्याय, वरिष्ठ पत्रकार
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12 मार्च को भड़ास पर प्रकाशित खबर…


