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UNI पर लिखते हुए फोटो जर्नलिस्ट मित्र चंद्रू मीरचंदानी का ज़िक्र करना जरूरी है!

विवेक शुक्ला-

यूएनआई न्यूज एजेंसी के एडिटर जयंत राय चौधरी मेरे बहुत पुराने मित्र हैं। तीन-चार महीने पहले उन्होंने मुझसे कहा था कि मैं यूएनआई के लिए नियमित रूप से लिखूं। उनके आग्रह पर मैंने हफ्ते में दो-तीन स्टोरी लिखनी शुरू कीं। वे चाहते थे कि मैं रोज़ कम से कम एक स्टोरी तो लिखूं ही, लेकिन यह मेरे लिए संभव नहीं था।

यूएनआई में मेरी स्टोरीज़ प्रकाशित होने पर अगले दिन देश भर के बहुत से अखबारों में छपतीं। ये खबरें यूएनआई की हिंदी और उर्दू सेवाओं से भी प्रसारित होने लगीं। यह सब देखकर बहुत अच्छा लग रहा था।

यूएनआई से जुड़कर गर्व भी हो रहा था, क्योंकि इस एजेंसी में विनोद शर्मा, आलोक तोमर, महेंद्र वेद, हरपाल सिंह बेदी जैसे असंख्य प्रतिष्ठित पत्रकारों ने काम किया है। ये नाम भारतीय पत्रकारिता में सबसे सम्मानित हैं। इन सबसे हमने बहुत कुछ सीखा है और सीखते रहते हैं।

कल खबर आई कि यूएनआई के रफी मार्ग स्थित मुख्यालय से पत्रकारों और अन्य कर्मचारियों को पुलिस की मौजूदगी में जबरन बाहर निकाल दिया गया। मैं मानता हूं कि यह घटना भारतीय मीडिया के इतिहास में एक काला अध्याय है। कई पत्रकारों—खासकर महिला पत्रकारों—के साथ कथित रूप से दुर्व्यवहार हुआ; उन्हें कुर्सियों से घसीटा गया, व्यक्तिगत सामान लेने का समय नहीं दिया गया और बाहर निकाले गए लोगों को वापस अंदर जाने भी नहीं दिया गया।

यूएनआई देश की सबसे पुरानी बहुभाषी समाचार एजेंसियों में से एक है। इसका न्यूज़रूम अचानक ठप हो जाना सैकड़ों परिवारों के भविष्य को अनिश्चितता में डाल देता है।

दिल्ली पुलिस की इस आक्रामक कार्रवाई ने गंभीर सवाल खड़े किए हैं—क्या अदालती आदेश के नाम पर मीडिया संस्थानों के साथ ऐसा व्यवहार उचित है? क्या प्रेस की स्वतंत्रता अब महज़ कागजी घोषणा बनकर रह गई है? अब यही लग रहा है।

यूएनआई पर लिखते हुए मैं अपने फोटो जर्नलिस्ट मित्र चंद्रू मीरचंदानी का ज़िक्र करना चाहता हूँ। चंद्रू के पिता श्री जी.जी. मीरचंदानी ने यूएनआई के जनरल मैनेजर के पद पर रहते हुए एजेंसी को मजबूती प्रदान की और इसका विस्तार किया। उनके प्रयासों से ही दिल्ली के प्रभावशाली सिंधी समाज के लोगों को साउथ दिल्ली के मेफेयर गार्डन में अपने घर बनाने के लिए ज़मीन मिली।

मीरचंदानी जी की वहां 300 गज की कोठी थी, जहां चंद्रू अपने परिवार के साथ रहते थे। इधर ही मैं चंद्रू से मिलने जाया करता था। बाद में इस कोठी को यूनिटेक बिल्डर्स के मैनेजिंग डायरेक्टर संजय चंद्रा ने खरीद लिया था।

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