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विचारधारा की लड़ाई और चुनाव जीतने में फर्क है, मीडिया से लड़ना और मुश्किल है

खासकर तब जब अखबार कांग्रेस की हार का कारण बतायें, भाजपा की जीत का राज नहीं

संजय कुमार सिंह

आज के अखबारों में चुनाव नतीजे ही छाये रहने थे, छाये हुए हैं। लेकिन हेडलाइन मैनेजमेंट पर यह कॉलम शीर्षकों और सुर्खियों का है तो आज की खबरें हैं

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  1. भारत ने सीओपी28 स्वास्थ्य और जलवायु घोषणापत्र पर हस्ताक्षर नहीं किया।
  2. चुनाव नतीजों पर सीताराम येचुरी ने कहा है, इन चुनाव नतीजों से यह तथ्य रेखांकित होता है कि जनता की आजीविका और भारतीय गणराज्य के धर्म निरपेक्ष लोकतांत्रिक चरित्र की रक्षा के लिए धर्मनिरपेक्ष ताकतों को अपने प्रयासों को फिर से दूना करने की जरूरत है।
  3. यही नहीं चुनाव नतीजों से यह भी पता चलता है कि भाजपा हिन्दी पट्टी में सिमटती जा रही है और बाकी राज्यों में कांग्रेस व दूसरे दलों का कब्जा है। गुजरात अपवाद है।
  4. ईडी ने आरोप लगाया है कि तमिलनाडु के खुफिया अधिकारियों ने संवेदनशील दस्तावेज चुरा लिये।

चर्चा इन सब पर होनी चाहिये। मैं पहला पन्ना ही देखता हूं पर आप देखिये कि इन मुद्दों पर चर्चा कहां है, है भी कि नहीं। कहने की जरूरत नहीं है कि अखबार भाजपा और नरेन्द्र मोदी का जरूरत से ज्यादा प्रचार कर रहे हैं और इसमें देश के लोकतांत्रिक चरित्र की भी चिन्ता नहीं की जा रही है और इसे ही देशभक्ति बता दिया जाता है। यह वैसे ही है कि पत्रकारों से निष्पक्षता के नाम पर संतुलन बनाए रखने की अपेक्षा की जाती है जबकि सरकार का विरोध एकतरफा ही किया जाना चाहिये। इसके लिए जरूरी नहीं है कि विपक्ष का भी विरोध किया जाए। पर इसके लिए सत्तारूढ़ दल के पास ट्रोल सेना है जो सोशल मीडिया पर भी सरकार विरोधियों को हर तरह से ठीक करने में लगी है। पर वह अलग मुद्दा है।     

आज छपी प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया की हिन्दी सेवा भाषा की एक खबर के अनुसार, भारत ने रविवार को जलवायु और स्वास्थ्य को लेकर सीओपी28 घोषणा पर हस्ताक्षर नहीं किया। आप इस खबर को महत्व दें या नहीं पर मुद्दा यह है कि सिल्कयारा टनल में 41 मजदूरों के फंसे होने के दौरान जब यह चर्चा चल रही थी और चलनी चाहिये थी कि चार धाम यात्रा मार्ग के निर्माण में पारिस्थिकी और जलवायु की चर्चा नहीं की गई है तब यह खबर प्रमुखता से छपी थी कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सीओपी 28 शिखर सम्मेलन में सीओपी33 की मेजबानी करने का प्रस्ताव रखा। जनसत्ता की खबर के अनुसार “भारत जलवायु परिवर्तन के लिए संयुक्त राष्ट्र ढांचे के लिए प्रतिबद्ध है। इसीलिए मैं इस मंच से प्रस्ताव पेश करता हूं कि 2028 में सीओपी 33 शिखर सम्मेलन भारत में आयोजित किया जाए।” खबर में कहा गया था, मोदी सीओपी 28 के अध्यक्ष सुल्तान अल जाबेर और संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन के अध्यक्ष साइमन स्टिल के साथ उद्घाटन पूर्ण सत्र में शामिल होने वाले एकमात्र नेता थे। उन्होंने कहा कि भारत ने विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाकर दुनिया के सामने एक बेहतरीन उदाहरण पेश किया है। पूर्व केंद्रीय पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने इसका विरोध किया था पर यह सब हिन्दी अखबारों में कितना छपा आप बेहतर जानते हैं।

इसके अलावा एक और खबर है जो इन दिनों खूब चर्चा में है और वह यह कि तमिलनाडु में ईडी के अफसर को रिश्वत लेते गिरफ्तार किया गया है। अब ईडी ने आरोप लगाया है कि तमिलनाडु के खुफिया अधिकारियों ने संवेदनशील दस्तावेज चुरा लिये। यह खबर आज द हिन्दू में छपी है और कहने की जरूरत नहीं है कि सरकारों की लड़ाई है तथा जहां डबल इंजन की सरकार नहीं है वहां इस तरह के विवाद होते रहते हैं। भाजपा कैसा प्रशासन देती है यह उसका उदाहरण है पर अखबार नहीं बतायेंगे तो आपको नहीं पता चलेगा और इसमें यह तथ्य शामिल है कि 2014 की लोकप्रियता तथा कांग्रेस मुक्त भारत के दावे के बाद भाजपा हिन्दी पट्टी में सिमटती जा रही है तो इसका कारण हिन्दी के अखबार और व्हाट्सऐप्प मैसेज तो नहीं है। यह भी समझना आपका काम है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि भाजपा चुनाव जीतने की अपनी रणनीतियों से जीत गई और कांग्रेस अपनी राजनीति के कारण हार गई। इसका मतलब यह नहीं है कि भाजपा की राजनीति अच्छी है या कांग्रेस की बुरी है। भाजपा की राजनीति देश देख रही है और कांग्रेस की राजनीति को लोग जानते हैं। लेकिन प्रचार माध्यमों और सीधे, साफ झूठ बोलने की योग्यता के कारण छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की हार पर अमर उजाला ने लिखा है, सत्ता विरोधी लहर और घोटाले बघेल पर पड़े भारी।

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यहां गौर तलब है कि ऐन चुनाव से पहले बघेल पर महादेव ऐप्प के मामले में आरोप लगागे गये, उसे प्रचारित किया गया जो मतदान के बाद गलत या झूठ साबित हो गया। उस झूठ या तथ्य को कितना प्रचारित किया गया वह तो मुद्दा ही नहीं है, ना केंद्रीय मंत्री के बेटे के करोड़ों के लेन-देन का वीडियो। यही नहीं, किसी तरह चुनाव जीतने की कोशिश में केंद्रीय मंत्रियों को विधान सभा चुनाव लड़ाने का मुद्दा भी महत्वपूर्ण नहीं है और अखबारों ने यह प्रमुखता से नहीं बताया है कि उनमें कौन जीते कौन हारे। नवोदय टाइम्स ने बताया है कि तीन जीते और एक हारे। जीतने वालों में वीडियो वाले मंत्री हैं। हारने वाले हैं, फग्गन सिंह कुलस्ते। जीतने वालों को अब इनमें किसी एक का चुनाव करना होगा और चूंकि मध्य प्रदेश में भाजपा की सीटें पर्याप्त हैं इसलिए तीनों इस्तीफा दे सकते हैं और वहां फिर से चुनाव होंगे। यह एक देश एक चुनाव के नारे या तथाकथित कोशिशों के बावजूद होगा। बंगाल में आजमाये जाने के बाद आजमाया गया था। और तब तो मनोनीत सदस्य से इस्तीफा भी करवाना पड़ा था और उन्हें फिर मनोनीत भी करवा दिया गया। गारंटी वाली इस राजनीति की चर्चा मीडिया नहीं करता है और आज शीर्षक है, “गारंटी तो मोदी की ही …. हिन्दी हार्टलैंड में हर मोर्चे पर भारी पड़ी भाजपा”। इस विश्लेषण का उपशीर्षक है, रणनीति से लेकर बूथ प्रबंधन तक ने दिलाई बड़ी जीत, वहीं अंतर्विरोध में उलझी रही कांग्रेस। (अमर उजाला)

इंडियन एक्सप्रेस ने इसका कारण बघेल पर निरंतर आरोप और 47 नए चेहरे उतारना बताया है। राजस्थान की लाल डायरी प्रचार में तो थी, खबरों में कम दिखी। ऐसा नहीं है कि भाजपा में अंतर्विरोध नहीं थे और वह मध्य प्रदेश या राजस्थान में नहीं था या दिख नहीं रहा था लेकिन उसकी चर्चा नहीं है। गारंटी भारी पड़ी लेकिन 50 दिन में सपनों का भारत, 100 दिन में काला धन की गारंटी याद नहीं है। अदाणी ही नहीं केंद्रीय मंत्री के आर्थिक घोटाले पर कान फाड़ू चुप्पी साधे रहने वाले वाशिंग मशीन पार्टी के नेता भ्रष्टाचार दूर करने की गारंटी दें मीडिया उसका प्रचार करे और कहे कि कांग्रेस अंतर्विरोध में उलझी रही। और बात इतनी ही नहीं है। तेलंगाना में कांग्रेस की जीत साधारण नहीं है। वहां बीआरएस अगर एंटी इनकमबेंसी के कारण हारी तो भाजपा का प्रदर्शन इतना खराब क्यों रहा और कांग्रेस उससे आगे कैसे निकल गई। भाजपा ने तो तेलंगाना को एक तरह से छोड़ ही दिया था। इसपर कोई शीर्षक या टिप्पणी आज के अखबारों में आपको दिखी क्या?

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मध्य प्रदेश के मामले में दुनिया जानती है कि पिछली बार कांग्रेस जीती थी और भाजपा ने विधायक खरीदकर सरकार बनाई थी। इसमें ज्योतिरादित्य सिंधिया की महत्वपूर्ण भूमिका थी। उन्हें राज्यसभा का सदस्य और मंत्री बनाया गया और उन्हें लोक सभा चुनाव हराने वाले को कोई जानता भी नहीं है। अगर यह पार्टी की राजनीति है और बड़े नेताओं का अहंकार, या किसी भी कारण सरकार बनाने की रणनीति है तो इसमें सिंधिया को लोकसभा चुनाव हराने वाले का गौण रहना, सिंधिया को मंत्री बना देना, वंशवाद का विरोध भी करना – कौन सी राजनीति है जिसकी चर्चा भी नहीं होती है। यही नहीं, इसके बावजूद उनका पार्टी में बने रहना विचारधारा का मामला है। जिसका विरोध राहुल गांधी कर रहे हैं और जाहिर है वे भी यही सब करें तो विचारधारा का विरोध वैसे होगा? इसकी चर्चा नहीं हो, अंतर्विरोध कहा जाये तो जनता सच कैसे जानेगी? व्हाट्सऐप्प यूनिवर्सिटी का हाल और बुरा है हालांकि वह यहां चर्चा का विषय नहीं है।

सिंधिया के सहयोग से मध्य प्रदेश में भाजपा की सरकार बनने और महाराष्ट्र में जो सब हुआ और चल रहा है उसके मद्देनजर भाजपा को वोट मिलना ही नहीं चाहिये था। और अगर खेल नहीं हुआ है तो जनता ने दिये हैं क्योंकि कांग्रेस कभी सनातन का अपमान करती है तो कभी महादेव का। ये मुद्दे कैसे बनाये गये और कैसे प्रचारित किये गये इसपर जाने की जरूरत नहीं है। लेकिन रणनीति है तो रेखांकित करना जरूरी है। इसके साथ यह बताना भी कि, बजरंगबली कर्नाटक में तो नहीं चले लेकिन मध्य प्रदेश में खेल हो गया था। बाद में जो हुआ उसका नतीजा आज छपा है क्योंकि बहुसंख्यक जनता नहीं समझ रही हो और समझ कर वोट दे रही हो तो भी प्रचार यह किया जा सकता है कि कांग्रेस अपने पुराने भ्रष्ट नेताओं को नियंत्रित नहीं कर रही है, वे अंहकारी हैं आदि आदि। पर जहां अहंकार साफ दिखता है उसके खिलाफ बोलने की हिम्मत ही नहीं है। मध्य प्रदेश के मामले में मैं समझ रहा था कि जनादेश का अपमान करने के कारण भाजपा और सिंधिया को सजा मिलेगी। भाजपा को तो नहीं मिली, सिंधिया विधानसभा चुनाव लड़े नहीं और राज्यसभा के सदस्य हैं इसलिए लोकसभा चुनाव लड़ना नहीं है।

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इसका कारण आप जो समझिये और इसमें एक यह हो सकता है कि जनता ने भाजपा को हराया तो कांग्रेस ने पुराने और बजुर्ग कमलनाथ को ही मुख्यमंत्री बना दिया। यही राजस्थान में भी हुआ था। वहां सचिन पायलट विरोध कर रहे थे और यहां माधव राव सिंधिया। सिंधिया ने दल बदल कर ली पर पायलट ने नहीं किया या कर पाये। इस मामले में कांग्रेस और भाजपा ने जो किया वह उनकी राजनीति है लेकिन इसमें विचारधारा भी है और मीडिया का काम उसे रेखांकित करना था तो वह भाजपा का प्रचार करता रहता है। कहने की जरूरत नहीं है कि पार्टी सत्ता में आती है तो तमाम लाभ कार्यकार्ताओं को मिलते हैं, दिये जाते हैं और यही उनके राजनीति में रहने का लाभ या नतीजा है। पर कोई भी दल अगर इन पदों और सुविधाओं का उपयोग सरकार बनाने चुनाव जीतने के लिए करने लगे तो कार्यकर्ता वंचित रहेंगे और यह राजनीति की शुचिता नहीं है। मीडिया का काम इसपर ध्यान देना भी है। अव्वल तो विचारधारा की भी चर्चा जरूरी है पर आज के समय में यह बड़ी उम्मीद है।

आज के अखबारों में एक और खासियत है। कांग्रेस विधानसभा चुनाव जीतती है तो यह सवाल महत्वपूर्ण हो जाता है कि मुख्यमंत्री कौन। यह भाजपा की राजनीति का हिस्सा है। इस बार मध्य प्रदेश और राजस्थान दोनों में मुख्यमंत्री का कोई चेहरा नहीं था और नरेन्द्र मोदी चुनाव प्रचार कर रहे थे। पर यह सवाल नहीं उठा कि मुख्यमंत्री कौन। आज भी अखबारों में यह चिन्ता नहीं है। लेकिन कांग्रेस जीती होती तो जरूरी होती। वैसे भी भाजपा ने कुछ राज्यों में जैसे मुख्यमंत्री बदले हैं उसपर चर्चा को मीडिया में प्रमुखता कम ही मिलती है। कहने की जरूरत नहीं है कि अखबारों के अनुसार इस जीत के बाद भाजपा 2024 जीतने के लिए नई ऊर्जा पा चुकी है।

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