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सियासत

विदेशी रिपोर्टर सवाल पूछ रही है लेकिन MEA सचिव सिबि जार्ज अपनी नौकरी और मोदी को बचा रहे हैं! देखें वीडियो

विदेश मंत्रालय (MEA) की एक प्रेस कॉन्फ्रेंस का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। करीब 12 मिनट से ज्यादा लंबे इस वीडियो में एक विदेशी पत्रकार और MEA प्रवक्ता के बीच मौलिक अधिकारों, प्रेस की स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक अधिकारों को लेकर तीखी बहस होती दिखाई दे रही है।

वीडियो के मुताबिक पत्रकार ने सवाल किया कि “जब भारत में मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के आरोप लगते हैं, तो नॉर्वे जैसे देश भारत पर भरोसा क्यों करें?” इसके जवाब में MEA की ओर से कहा गया कि भारत महात्मा गांधी की धरती है, एक प्राचीन सभ्यता है और यहां का संविधान नागरिकों को मौलिक अधिकार देता है।

इस पर पत्रकार ने पलटकर कहा, “मुझे पता है कि भारत में मौलिक अधिकार हैं, इसलिए तो मैंने उनके उल्लंघन पर सवाल पूछा।”

बातचीत के दौरान MEA की ओर से कहा गया कि अगर किसी के अधिकारों का उल्लंघन होता है तो वह अदालत जा सकता है। इस पर पत्रकार ने फिर सवाल किया कि “यही तो मुद्दा है, लोगों को अपने बुनियादी अधिकारों के लिए अदालत क्यों जाना पड़ता है?”

वीडियो में माहौल उस समय और गर्म हो गया जब पत्रकार ने प्रधानमंत्री से सीधे प्रेस के सवाल लेने को लेकर प्रश्न पूछा। इस पर जवाब आया, “यह मेरी प्रेस कॉन्फ्रेंस है, मैं तय करूंगा।” बाद में MEA की ओर से “नेक्स्ट क्वेश्चन” कहकर आगे बढ़ने की कोशिश की गई।

सोशल मीडिया पर यह वीडियो तेजी से शेयर किया जा रहा है। कई यूजर्स इसे सरकार से असहज सवाल पूछे जाने का उदाहरण बता रहे हैं, जबकि कुछ लोगों का कहना है कि प्रेस कॉन्फ्रेंस में भारत की संस्थाओं और संवैधानिक व्यवस्था का पक्ष रखा गया।


स्मिता शर्मा-

2014 से अब तक देश में प्रधानमंत्री की एक भी खुली प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं हुई है। सिर्फ चुनिंदा इंटरव्यू दिए गए हैं, जिनमें पहले से तय और फिल्टर किए गए सवाल पूछे जाते हैं।

यह दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है और यहां की प्रेस को अपने चुने हुए प्रधानमंत्री से सीधे सवाल पूछने का अधिकार है। एकतरफा ‘मन की बात’ प्रेस कॉन्फ्रेंस का विकल्प नहीं हो सकती।

राजनयिकों, नौकरशाहों और मंत्रियों द्वारा सवालों के जवाब देना, लोकतंत्र में राष्ट्राध्यक्षों और सरकार प्रमुखों द्वारा मीडिया के सवालों का जवाब देने जैसा नहीं होता। इसे जवाबदेही और जिम्मेदारी कहा जाता है।

दुनिया में कई ऐसे देश हैं जहां प्रेस की आजादी को गंभीरता से लिया जाता है। लेकिन भारत में यह परंपरा लगभग खत्म हो गई है कि दिल्ली में औपचारिक वार्ता के बाद विदेशी राष्ट्राध्यक्ष और सरकार प्रमुख प्रधानमंत्री के साथ संयुक्त प्रेस बयान के बाद मीडिया के सवाल लें।

इसी तरह अमेरिका को छोड़कर—जहां प्रधानमंत्री को दो सवाल लेने पड़ते हैं (वो भी भारतीय पक्ष की ओर से तय)—और 2015 की शुरुआती ब्रिटेन यात्रा को छोड़ दें, तो बाकी विदेशी राष्ट्राध्यक्षों और सरकार प्रमुखों ने भी संयुक्त बयान के बाद अपनी प्रेस से सवाल लेना बंद कर दिया है। इसकी वजह भारतीय सरकारी पक्ष की शर्तें बताई जाती हैं।

यह स्थिति बदलनी चाहिए। आखिर इतनी मजबूत जनादेश वाली सरकार के प्रधानमंत्री वैध और जरूरी सवालों से कब तक बचते रहेंगे? दूसरे लोग उनकी ओर से जवाब दें, उसका वही महत्व नहीं होता जो खुद प्रधानमंत्री के जवाब का होता है।


नॉर्वे का हाल देखें। झगड़ा हो गया। लेकिन विदेश मंत्रालय का बाबू अपनी नौकरी और पीएम को बचा रहा है।
रिपोर्टर – जब भारत में मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हो रहा है, तो नॉर्वे भारत पर भरोसा क्यों करे?
MEA – हमारे पास गांधी हैं, प्राचीन सभ्यता है, और एक संविधान है जो मौलिक अधिकारों की गारंटी देता है।
रिपोर्टर – बिल्कुल। मुझे पता है कि भारत में मौलिक अधिकार हैं। इसलिए तो मैंने उनके उल्लंघन पर सवाल पूछा।
MEA – अगर अधिकारों का उल्लंघन होता है, तो लोग कोर्ट जा सकते हैं।
रिपोर्टर – यही तो मुद्दा है। लोगों को अपने बुनियादी अधिकारों के लिए कोर्ट जाने पर मजबूर क्यों होना पड़ता है?
MEA – यह मेरी प्रेस कॉन्फ्रेंस है। मैं तय करूंगा।
रिपोर्टर – पीएम प्रेस से खुले सवाल कब लेंगे?
MEA – अगला सवाल।
यह तो हुई नॉर्वे की बात, जो प्रेस की आज़ादी में नंबर 1 है।
नॉर्वे की प्रेस को भारत की गोदी मीडिया से सीखना चाहिए कि सत्ता के आगे हड्डी पाने के लिए कैसे डांस किया जाता है।
भारत में सत्ता थेथरई और बकैती कर चली जाती है। फिर गोदी मीडिया के कुकुर उसे जस्टिफाई करते हैं।
भारत वह तानाशाह देश है, जहां इथेनॉल से पानी बर्बाद करने वाला जल संरक्षण की बकैती करता है।
अगर इस पर सवाल पूछें तो अंदर करवाने की धमकी देता है।
ये वही नागपुर का मीडिया है, जिसे मैं देख चुका हूं। रिपोर्टर अगले दिन का अखबार गडकरी के ऑफिस ले जाकर थैली बटोर लाता है।
यही भारत का लोकतंत्र है, जिसे जनता बार–बार चुनती है। -सौमित्र राय


प्रकरण पर बीबीसी हिंदी लिखता है-

नॉर्वे के प्रधानमंत्री जोनास स्टोर से मीटिंग के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से एक नॉर्वेजियन पत्रकार सवाल पूछती नज़र आईं जबकि प्रधानमंत्री वहां से जाते दिखाई दे रहे हैं.

वीडियो में पत्रकार हेले लिंग को यह कहते हुए सुना जा सकता है, “प्रधानमंत्री मोदी, आप दुनिया की सबसे स्वतंत्र प्रेस के सवालों को क्यों नहीं लेते?”

बाद में हेले लिंग ने वीडियो शेयर करते हुए लिखा, “भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मेरे सवाल का जवाब नहीं दिया. मुझे इसकी उम्मीद भी नहीं थी. वर्ल्ड प्रेस फ़्रीडम इंडेक्स में नॉर्वे पहले स्थान पर है और भारत 157वें स्थान पर है.”

इसी के बाद उनके इस पोस्ट का जवाब देते हुए नॉर्वे में भारतीय दूतावास ने एक्स पर पोस्ट किया था कि दूतावास एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस का आयोजन कर रहा है जिसमें वो आकर अपना सवाल पूछ सकती हैं.

भारतीय विदेश मंत्रालय की प्रेस कॉन्फ़्रेंस में नॉर्वे की एक पत्रकार ने सवाल पूछा, ‘भारत और नॉर्वे एक दूसरे के साथ मज़बूत साझेदारी कर रहे हैं. लेकिन हम आप पर भरोसा क्यों करें? क्या आप वादा करते हैं कि अपने देश में हो रहे मानवाधिकार उल्लंघन को रोकेंगे. आपके प्रधानमंत्री मुश्किल सवालों का जवाब देना कब शुरू करेंगे.”

जब विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा कि हमने आपका सवाल सुन लिया है और इसका जवाब देंगे तो नॉर्वे की उस पत्रकार ने कहा कि मुझे इसका जवाब फ़ौरन चाहिए.

बाद में उसी प्रेस कॉन्फ़्रेंस में भारत के विदेश मंत्रालय में सचिव (पश्चिम) सीबी जॉर्ज ने इस सवाल के जवाब में कहा, “भारत बेहद प्राचीन सभ्यता है. क़रीब पांच हजार साल पुरानी सभ्यता. हमने ज़ीरो का आविष्कार किया. हमने योगा का आविष्कार किया.”

जब सीबी जॉर्ज ये कह रहे थे तब पत्रकार ने उन्हें फिर टोककर कहा कि आप सीधे मेरे सवाल का जवाब दीजिए.

इस पर सीबी जॉर्ज ने कहा, “ये मेरी प्रेस कॉन्फ़्रेंस है. आपने सवाल किया है. अब आपको मेरा जवाब सुनने का धैर्य होना चाहिए.”

पत्रकार ने फिर कहा कि आप योगा वगैरह की बात ना करके सीधे सवाल का जवाब दें.

सीबी जॉर्ज ने तब फिर कहा, “मैं भरोसे की ही बात कर रहा हूं. जब पूरी दुनिया कोविड महामारी से जूझ रही थी. तब हमने दुनिया के 150 से ज़्यादा देशों को वैक्सीन और दवा दी. पूरी दुनिया को हमने संकट से उबारने में मदद की. दुनिया ने हम पर विश्वास जताया. ये होता है भरोसा.”

पत्रकार बार-बार टोकती रहीं कि मानवाधिकार उल्लंघन के बारे में पूछे उनके सवाल का सीधा जवाब दिया जाए.

सीबी जॉर्ज ने इसके जवाब में भारत में आयोजित जी20 सम्मिट का ज़िक्र करते हुए कहा कि रूस-यूक्रेन युद्ध जैसे मुश्किल हालात में भारत की मेज़बानी में सभी देश एक ही प्लेटफॉर्म पर आए. भारत ने सबको एक किया और पहली बार अफ़्रीकन यूनियन को हम जी20 का स्थाई सदस्य बनाने में सफल रहे.

उन्होंने कहा, “अफ़्रीकी देशों की चिंताओं को भारत ने मंच दिया. ये होता है भरोसा.”

सीबी जॉर्ज के जवाब देने के दौरान ही वो पत्रकार प्रेस कॉन्फ़्रेंस छोड़कर चली गईं.


एक वैश्विक शर्मिंदगी का पल…! ओस्लो, नॉर्वे।
नॉर्वे जो ‘विश्व प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक’ में पहले स्थान पर है—एक भारतीय प्रतिनिधिमंडल और एक पत्रकार के बीच तीखी बहस छिड़ गई। यह तब हुआ जब भारतीय विदेश सेवा (IFS) के अधिकारियों ने, पत्रकार Helle Lyng के सवाल का जवाब देने के बजाय, बस वहाँ से चले जाने की कोशिश की—जिस आचरण को वहां की महिला पत्रकार ने चुनौती दी।
-MEA सचिव (पश्चिम) सिबी जॉर्ज ने नॉर्वे पत्रकारों से बात कर रहे थे
सवाल- “हम आप पर भरोसा क्यों करें?” “क्या प्रधानमंत्री मोदी भारतीय प्रेस के सच्चे तीखे सवालों का जवाब देंगे?”
-जवाब में सचिव भारत का इतिहास और सभ्यता बताने लगे। -अजय शुक्ला, वरिष्ठ पत्रकार

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