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आज के अखबार : ‘विदेशी सहायता’ और पुराने मामले भूलकर हेडलाइन मैनेजमेंट का असर देखने लायक है

संजय कुमार सिंह

आज के अखबारों से पता चलता है कि इस सरकार ने भले ही छोटे गैर सरकारी संस्थाओं की मामूली आर्थिक सहायता रोक दी हो, सरकार यूएसएड से सहायता ले रही थी। यह वैसे ही है जैसे लाखों शेल कंपनियां बंद करवाकर भी अदाणी की कंपनी में 20,000 करोड़ रुपये का निवेश हो गया और उसकी जांच भी नहीं करानी है। आज खबर है कि, 2023-24 में 75 करोड़ डॉलर की सात परियोजनाओं की फंडिग की जा चुकी है। ट्रम्प ने भले कहा हो कि यह पैसा मतदाताओं की संख्या बढ़ाने के लिए दिया गया था पर दैनिक जागरण ने वित्त मंत्रालय के हवाले से कहा है कि राजनीतिक फंडिंग नहीं हुई है। यह अलग बात है कि इलेक्टोरल बांड जैसी राजनीतिक फंडिंग को अवैध करार दिये जाने के बावजूद उसके लिए किसी को सजा नहीं हुई और ना जबरन वसूली के आरोपों की जांच की जरूरत समझी गई। यह भी दिलचस्प है कि इस विवादास्पद मामले में सरकारी बयान को हेडलाइन मैनेजमेंट के बावजूद सिर्फ जागरण ने प्रमुखता दी है। दूसरी ओर, टाइम्स ऑफ इंडिया की एक खबर का शीर्षक है, ट्रम्प ने यूएसएड का मुद्दा फिर उठाया, कहा बाइडेन प्रशासन ने भारत को चुनावों में सहायता के लिए 18 मिलियन डॉलर दियेटाइम्स ऑफ इंडिया ने दो कॉलम की अपनी इस मूल खबर के साथ वित्त मंत्रालय का ‘स्पष्टीकरण’ भी छापा है। यह दि हिन्दू की खबर के साथ भी है। द टेलीग्राफ ने पहले पन्ने की एक खबर से बताया है कि 5 में से 3 कैंसर मरीज समय से पहले मर जाते हैं। प्रधानमंत्री ने कहा है (और यह कई अखबारों में है) कि हर जिले में खुलेंगे कैंसर केयर सेंटर। अमर उजाला ने, पीएम ने बागेश्वर धाम मंदिर में शीश नवाया शीर्षक की एजेंसी की खबर के नीचे छापा है, हर जिले में कैंसर डे केयर खोलेंगेनवोदय टाइम्स में आज लीड क्रिकेट और पहले पन्ने पर तीन कॉलम की दो खबरें हैं। एक का शीर्षक है, अब दिल्ली में रखी जायेगी विकास की नई बुनियाद दूसरे की खबर है, खाद्य तेल के उपयोग में सभी 10 फीसदी की कटौती करें। यूएसएड पहले पन्ने पर नहीं है।   

दिल्ली पुलिस ने न्यूज़ वेबसाइट, न्यूज़क्लिक से जुड़े कई पत्रकारों के घर पर छापेमारी की थी। संपादक प्रबीर पुरकायस्थ महीनों जेल में रहे। संस्थान के लिए अपना काम करना और उसमें नौकरी करने वाले कई लोगों का वेतन महीनों संकट में रहै। सिर्फ इसलिए कि अगस्त 2023 में न्यूयॉर्क टाइम्स ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा था कि उसने चीनी प्रोपेगेंडा फैलाने के लिए एक अमेरिकी करोड़पति से फंडिंग ली है। मुझे नहीं लगता कि यह काम अगर घोषित तौर पर लिया-किया गया था तो इसमें कुछ गलत था। चोरी-छिपे किया जाता तो भी पैसे के लिए आदमी क्या नहीं करता है, प्रचार करना कैसे गलत हो सकता है जब लोग झूठा प्रचार कर रहे हैं। सच्चाई यह है कि इसके बावजूद वेबसाइट के ख़िलाफ़ पुलिस ने मामला दर्ज किया था। वह भी तब जब न्यूज़क्लिक ने इन सभी आरोपों का खंडन किया था। बाद में सुप्रीम कोर्ट की दो सदस्यों की पीठ ने न्यूज़ पोर्टल न्यूज़क्लिक के संस्थापक प्रबीर पुरकायस्थ को रिहा करने का आदेश दिया था। जस्टिस बीआर गवई की अगुआई वाली बेंच ने ये भी कहा कि पुरकायस्थ की गिरफ़्तारी और उसके बाद उन्हें हिरासत में रखे जाना क़ानून की नज़र में अवैध था।

राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली की पिछली आम आदमी पार्टी की सरकार पर कथित शराब घोटाले के लिए पीएमएलए का मामला बनाया गया और मुख्यमंत्री व उनके साथियों को महीनों जेल में रेखा गया। किसी मुख्यमंत्री को सरकारी काम करने के लिए पहली बार जेल जाना पड़ा और यह सब तब हो पाया था जब केंद्रीय गृह मंत्रालय ने दिल्ली शराब घोटाले से जुड़े कथित मनी लॉन्ड्रिंग मामले में अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया पर मुकदमा चलाने की मंजूरी दी थी। इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि ईडी को सरकारी कर्मचारियों (कर्मचारी और निर्वाचित जन प्रतिनिधि में फर्क होना चाहिये पता नहीं है या नहीं) पर मुकदमा चलाने से पहले अनुमति लेनी होगी और सरकार ने अनुमति दे दी। अब यूएसएड की सहायता से संबंधित आरोपों में जरा भी दम है तो सरकार इस बात की दोषी है ही कि उसे पता नहीं चला। न्यूजक्लिक और दिल्ली सरकार का मुकाबला धनराशि के लिहाज से इस यूएसएड घोटाले से बड़ा है और इस बार मामला चीन के प्रचार का नहीं, भारत के चुनावों को प्रभावित करने का है। अरविन्द केजरीवाल और मनीष सिसोदिया को जेल में रखने के लिए उनके खिलाफ मनी लांड्रिंग का केस बनाया गया जबकि इस कानून की वैधता पर ही विचार होना है और सरकारी रवैये के कारण विचार नहीं हो पाया है। अब जब विदेशी पैसे का मामला है तो सरकारी गंभीरता नजर नहीं आ रही है और अखबार भी निश्चिंत हैं। इस संबंध में इंडियन एक्सप्रेस की खबर और फिर फाइनेंशियल एक्सप्रेस के फैक्ट चेक को मानें तो डोनाल्ड ट्रम्प झूठ बोल रहे हैं। अगर ऐसा है भी तो मुद्दा यह होना चाहिये कि ट्रम्प झूठ क्यों बोल रहे हैं और भारत की विदेश नीति का क्या हाल है।

यह सब छोड़कर आज हिन्दुस्तान टाइम्स की लीड है, नई विधानसभा की बैठक के लिए भाजपा भ्रष्टाचार से हमले की तैयारी में। टाइम्स ऑफ इंडिया ने मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता के आरोप को लीड बनाया है। शीर्षक है, आप सरकार ने पूरे खजाने को खाली कर दिया है। (इसके बावजूद) इस खबर का इंट्रो है, लेकिन हम महिलाओं को 2500 रुपये महीना देने की योजना शुरू करेंगे। इंडियन एक्सप्रेस और अमर उजाला की लीड आज एक ही खबर है। शीर्षक भी एक जैसा है। अमर उजाला का शीर्षक है, “गुलाम मानसिकता वाले लोग उड़ा रहे हैं देश की धार्मिक आस्था का मजाक : मोदी”। आस्था की डुबकी लगाने के लिए देश की आम जनता जब मरने से भी नहीं डर रही है और हादसे हो चुके हैं तब देश के प्रधानमंत्री ऐसा कह रहे हैं। यह उनका विवेक है, राजनीति है। इसे प्रचार देकर कौन का देश हित या जन हित हो रहा है यह संपादक लोग ही जानें। हालांकि, चुनाव के लिए अमेरिकी सहायता से ध्यान हटाने के लिए तमाम प्रचारक सक्रिय हो गये हैं। कुछ लोग यह साबित करने में लगे हैं कि पैसा सरकार या प्रधानमंत्री ने तो नहीं ही लिया होगा किसी एनजीओ के जरिये लिया गया हो तो क्या गलत है। या पैसे विपक्ष को गये हैं। पर मुझे लगता है कि मुद्दा यह है कि सरकार वास्तविकता क्यों नहीं बता रही है। मीडिया सरकार से पूछ क्यों नहीं रहा है। खासकर इसलिए कि इस सरकार ने जनहित के काम करने वाले कई एनजीओ के दान पर रोक लगाई है और इससे कई लोग बेरोजगार भी हुए हैं। ऐसे में कोई भी जानना चाहिगा कि चुनाव को प्रभावित करने के लिए सहायता अगर दी गई है तो किसे या किसके जरिये और सरकार को समय रहते इसका पता क्यों नहीं चला।

ऐसी हालत में यूएस एड की खबर आज द हिन्दू में सेकेंड लीड है। इंडियन एक्सप्रेस ने बदलते बोल फ्लैग शीर्षक के तहत मुख्य शीर्षक लगाया है, ट्रम्प का नवीनतम भारत को 18 मिलियन अमेरिकी डॉलर चुनावों के लिये…. वे हमारा लाभ उठाते हैं। द हिन्दू का शीर्षक है, “डीओजीई के आरोप पर शंका के बीच ट्रम्प ने यूएसएड के ‘इंडिया ग्रांट’ पर फिर हमला बोला”। आज के शीर्षक से अगर आपको लग रहा है कि ट्रम्प झूठ बोल रहे हैं या बांग्लादेश का पैसे ‘फ्रेंड मोदी’ के नाम बताकर मोदी या भारत को परेशान करना चाहते हैं। हो सकता है, ऐसा हो भी। लेकिन मुद्दा तो यह होना ही चाहिये कि ‘अबकी बार ट्रम्प सरकार’ के बावजूद यह सब क्यों हो रहा है। आज के अखबारों में पहले पन्ने पर मुझे इसका कोई जवाब नजर नहीं आया। हेडलाइन मैनेजमेंट का हाल यह है कि प्रधानमंत्री ने कहा है और दि एशियन एज ने लीड बनाया है। यही शीर्षक दैनिक जागरण में छह कॉलम में टॉप की खबर है। यहां लीड का शीर्षक है, “खाली मिला सरकारी खजाना सीएम”। दैनिक जागरण में यूएसएड से संबंधित एक खबर पहले पन्ने पर है। वित्त मंत्रालय के हवाले से विदेश मंत्री जयशंकर की फोटो के साथ छपी इस खबर का शीर्षक है, यूएसएड से कोई राजनीतिक फंडिंग नहीं। दैनिक भास्कर की साइट पर यह खबर एक दिन पहले की है। इस खबर के अनुसार, ट्रम्प भारत में वोटर टर्नआउट के नाम पर 182 करोड़ रुपए देने के बयानों को दोहरा रहे हैं, वहीं भारत में यूनाइटेड स्टेट्स एजेंसी फॉर इंटरनेशनल डेवलपमेंट (यूएसएड) से अभी 7 प्रोजेक्ट के लिए 840 करोड़ रुपए मिल रहे हैं लेकिन इसमें वोटर टर्नआउट के नाम पर किसी प्रोजेक्ट में फंड नहीं मिल रहा है। जो भी हो, तथ्य यह है कि तमाम गैर सरकारी संगठनों को छोटी सहायता नहीं लेने देने के बाद सरकार ने खुद 840 करोड़ रुपये की सहायता ली है और यह प्रधानमंत्री राहत कोष के रहते बनाये गये पीएम केयर्स के अलावा है। कुल मिलाकर, मुझे लगता है कि सरकार और अखबार सच्चाई बताने की बजाय लीपा पोती में लगे हैं।

प्रधानमंत्री शीर्षक लगाने के लिए सुर्खियां दे रहे हैं और यह इस तथ्य के बावजूद है कि सरकार ने नोटबंदी से लेकर गैर सरकारी संस्थाओं की विदेशी सहायता रोकने तक काला धन और भ्रष्टाचार पर नियंत्रण के लिये जो उपाय किये हैं उसका अपेक्षित लाभ नहीं हुआ है और नुकसान स्पष्ट है। इसमें खराब आर्थिक स्थिति से लेकर बेरोजगारी तक शामिल है और फिर भी हम विश्व गुरु बनने की ओर बढ़ रहे हैं। इसी तरह, दावा किया जा रहा है कि अभी तक 62.06 करोड़ लोगों ने कुम्भ स्नान कर लिया है। मेरा मानना है कि इनमें वो नहीं होंगे और होंगे तो बहुत कम जो मुफ्त राशन लेते हैं। जितने भी हों, 80 और 62 करोड़ मिलकर देश की वयस्क आबादी से ज्यादा हो जा रही है? वैसे इसका मतलब यह भी है कि मुफ्त राशन लेने वालों को पास आस्था की डुबकी लगाने के लिए पैसे हैं या वे कर्ज लेकर ऐसा कर रहे हैं या फिर घर जमीन बेचकर। हिन्दुओं की सरकार को इसकी भी चिन्ता करनी चाहिये। दैनिक ट्रिब्यून ऑनलाइन डॉट कॉम की खबर के अनुसार, सरकार द्वारा जारी बयान में कहा गया कि अनुमान के मुताबिक दुनिया में कुल 120 करोड़ सनातनी हैं। महाकुंभ में दुनिया के आधे से अधिक सनातनी गंगा और त्रिवेणी संगम में स्नान कर चुके हैं। मुझे लगता है कि मुफ्त राशन लेने वाले हिन्दुओं के लिए मुफ्त स्नान की व्यवस्था सरकार को करनी चाहिये और जिन लोगों ने इसके लिए कर्ज लिया हो उन्हें आर्थिक सहायता दी जानी चाहिये। एक तथ्य यह भी है कि ये सरकारी आंकड़े हैं और हम चाहते हैं कि ट्रम्प के आंकड़े बिल्कुल स्पष्ट हों। भले हमारी सरकार ने कुम्भ में मरने वालों की अधिकृत सूची अभी तक जारी नहीं की हो और एक बाबा कह रहे हों कि कुम्भ में मरने वालों को मोक्ष मिला है। अगर ऐसा है तो मोक्ष पाने वालों की सूची सार्वजनिक की जानी चाहिये और हिन्दू हित में इस बात का हिसाब रखा जाना चाहिये कि मोक्ष पाने वालों के वंशजों का जीवन बेहतर है या भाजपा की राजनीति करने वालों के वंशजों का। या फिर पढ़ लिखकर देश-विदेश में अच्छी नौकरी करने वालों का। इससे आगे के लिए रणनीति तय करने में सहूलियत होगी और यह हिन्दू राष्ट्र में भी काम आयेगा।

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