दुर्योधन, दुशासन, रावण, कंस का साझा घोषणापत्र

हे भारतभूमि के वीर बलात्कारियों

हम चारों का आपको सादर प्रणाम

अब टीवी चैनलों पर जब आपके सुकृत्यों के बखान के साथ हम लोग अपना नाम सुनते हैं तो हमें बड़ी शर्म आती है, लेकिन थोड़ा गौरव भी होता है। शर्म इस नाते क्योंकि हम युगों पुराने विलेन होकर भी, तमाम शक्तियों से लैस होकर भी वो नहीं कर पाए, वहां तक नहीं पहुंच पाए, जहां तक आप पहुंच गए। गौरव इस बात का होता है कि आप जैसे महावीरों की उपमा हम लोगों के नाम से दी जाती है। वो भी तब जबकि हमारे युग में कानून नाम की कोई चिड़िया नहीं होती थी। जो हम कहते-करते थे वही कानून होता था, लेकिन आप महारथियों के युग में तो कानून नाम का प्राणी भी है, फिर भी आपके प्रचंड तेज के आगे ये कानून हमेशा घुटने के बल बैठा मिलता है। बलि-बलि जाऊं।

हे वीर शिरोमणि, अभी आप लोगों ने लखनऊ के पास मोहनलालगंज में जो किया, उससे हम चारों का कलेजा गदगद हो गया। हमारे तो हाथ कांप जाते, लेकिन आप तो निर्विकार हैं। हम तो आपके पराक्रम के परम जिज्ञासु हैं, जानना चाहते हैं कि जब वो महिला आपसे जान की भीख मांग रही होगी, तो आपने उसे चाकुओं से कैसे गोदा होगा। बलात्कार के दौरान जब वो चीख रही होगी तो आपने कैसे ठहाके लगाए होंगे। अच्छा उसके प्राइवेट पार्ट को चाकुओं से गोदकर तो आपको बहुत मजा आया होगा। क्यों है ना..। वो यहां से वहां भाग रही होगी, आप लोग जहां भी पकड़ पाए होंगे, उसे वहीं चाकुओं से गोदने लगते होंगे। क्योंकि पांच जगह तो उसके खून मिले हैं। अच्छा हैंड पाइप के पास सबसे ज्यादा खून बिखरा था, वहां आप लोगों ने क्या वीरता दिखाई थी, जरा बताइए ना.. ये दुशासन भाई ज्यादा बेकरार हैं जानने के लिए। और हां, जिस हाल में आपने उस महिला को छोड़ा, तन पर एक भी वस्त्र नहीं छोड़ा, उसकी तस्वीर देखकर तो दुर्योधन भाई ने दुशासन को करारा थप्पड़ जड़ा था। बोले-देख बे, तुझसे हुआ नहीं, जो तू द्रौपदी के साथ नहीं कर पाया, वो इन परमवीरों ने कर दिखाया। और सबसे बड़ी बात तो ये कि ये सब आप लोगों ने सरस्वती के मंदिर यानी पाठशाला में किया। अहो विद्या, अहो शौर्य।

ऐसा ही पराक्रम उस निर्भया के साथ भी आप वीर शिरोमणियों ने दिखाया था। उसके साथ आप लोगों ने जो किया था, उसे देेखकर भारतवर्ष रो रहा था, लेकिन हम लोग मन मसोस रहे थे। हम लोग तो सोच भी नहीं सकते थे, आप लोगों ने कर दिखाया। हां जब आपको फांसी की सजा हमने सुनी तो बहुत दुख हुआ, रात में खाना भी नहीं खाये, लेकिन जिस तरह मुलायम भाई ने आपकी पीठ पर हाथ रखा, जिस तरह कई लोग आपके पक्ष में आए ये कहते हुए कि बलात्कारी मासूमों को फांसी नहीं होनी चाहिए, हमें आस जगी। जिस दिन ये पता चला कि आप लोगों को फांसी नहीं होगी। हम लोगों ने यहां मिठाई बांटी।

अपने युगों के हम चारों खलनायक प्रतिनिधि बैंगलोर के उन मास्टर साहब को शत शत नमन करते हैं, जिन्होंने छह साल की बच्ची को भी नहीं बख्शा। हम लोग तो अपने जमाने में सोच भी नहीं सकते थे। हां कंस भाई एक छोटी सी बच्ची को जमीन पर पटककर मारना चाहते थे, लेकिन उसके पीछे डर था कि देवकी की आठवीं संतान उनका वध करेगी। हां तो मास्टर साहब, जब उस बच्ची को आपने पकड़ा था तो आपको अपनी बेटी याद नहीं आई थी क्या..। नहीं कुछ नहीं, बस यूं ही जानना चाहते थे। वो बच्ची कितना चीखी होगी, लेकिन आपने अपने कान सुन्न कैसे किए थे गुरुवर।

हे वीर पुरुषों, हम चारों ने तो महिलाओं के साथ कुछ उल्टा-पुल्टा करने के लिए बहाने भी खोज लिए थे। रावण भाई सीता को उठा लाए थे, क्योंकि उनके देवर लक्ष्मण ने रावण की बहन सूपर्णखा के नाक कान काट लिए थे। दुर्योधन-दुशासन के पास भी वजहें थीं कि उन्हें द्रौपदी ने अंधे का बेटा अंधा कह दिया था, लेकिन गुरु हमारी हिम्मत नहीं पड़ी कि वो कर पाएं जो आप कर पाए। वो भी तब जब हमारा मामला सकारण था, तुम्हारा अकारण।

बलात्कारी भाइयों, जरा वो हुनर तो बताइए, एक मासूम सी बच्ची को देखकर भाई हवस कैसे पैदा होती है…. मदिरा तो हम लोग भी पीते थे, लेकिन हमारे मन में ऐसा विचार कभी आया नहीं, कैसे कर लेते हैं आप सब। यहां तक कि आप लोग अपनी बेटियों को भी अपनी हवस का शिकार बना लेते हैं, कहां से लाए ये प्रताप। हम लोग तो मुफ्त में बदनाम हुए, असली वीरता तो आपने ही दिखाई है।

हम चारों आप बलात्कारियों को एक बार फिर से प्रणाम करते हुए देश के अखबारों, टीवी चैनलों से गुजारिश करना चाहते हैं कि कृपया इन वीर महापुरुषों के साथ हम चारों का नाम न जोड़ें, क्योंकि हम तो जर्रा हैं इनके आगे, ये आफताब हैं। इनके सुकृत्यों के आगे हमारी क्या बिसात। हम तो इसी में खुश हैं कि हमारी परंपरा को ये महापुरुष इतना आगे ले जा रहे हैं। और आभार तो हम उन सरकारों, कानून और कानून के रखवालों का भी जताना चाहेंगे, जिनकी सरपरस्ती में ऐसे वीरों को अपनी शूरता दिखाने का अवसर मिल जाता है।

आप सभी बलात्कारी भाइयों के हम

दुर्योधन, दुशासन, कंस और रावण।

(द्वापर और त्रेता युग के इन महानुभावों की ये चिट्ठी मुझे राह में कहीं पड़ी मिली, सोचा कि छाप दूं, क्या पता किसी के काम आ जाए)

आजतक न्यूज चैनल में वरिष्ठ पद पर कार्यरत पत्रकार विकास मिश्र के फेसबुक वॉल से.


 

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