आशुतोष कुमार-
आज वीरेनियत का आगाज़ हुआ मंगलेश दा को याद करते हुए । प्रदीप तरकश ने वीरेन दा की रात गाड़ी कविता पढ़ी, जो मंगलेश और वीरेन की नायाब दोस्ती का काव्यात्मक दस्तावेज हैं। पुण्यतिथि पर मंगलेश दा को भावांजलि दी गई ।
फ़िलहाल तो यही हाल है मंगलेश
भीषणतम मुश्किल में दीन और देश।
संशय ख़ुसरो की बातों में
ख़ुसरो की आँखों में डर है
इसी रात में अपना घर है।
इस बार वीरेनियत की संक्रांति थी। इंडिया हैबिटेट सेंटर के सवा सौ की क्षमता वाले गुलमोहर हॉल से जवाहर भवन के पांच सौ की क्षमता वाले ऑडिटोरियम में आना कोई सामान्य बदलाव न था। लेकिन आपके भरपूर प्यार ने जलथल कर दिया।
लेकिन महत्व संख्या का नहीं तालियों की लय, खामोशियों की गरज, आंखों की नमी और होंठों की मुस्कान का है।



भदोही से आए बच्चा लाल उन्मेष ने आज दिल्ली लूट ली। ज़ुबैर सैफ़ी ने दिल लूट लिया। अब्बास क़मर और रवि प्रकाश ने स्तब्ध किया। संध्या नवोदिता, देवयानी भारद्वाज, निर्मला गर्ग और अब्बास क़मर ने शायरी लूट ली।
आप भी लिखिए। समीक्षा कीजिए । आप ही तो वीरेनियत के सुपर स्टार हैं।
अँग्रेज़ों को गए बरस दस बीत चुके थे
लेकिन क़ायम था तब भी सब रुतबा उनका
रेलवई का आंग्ल भारती एक डिराइवर
मेरे लिए देश का दूजा महापुरुष था
पहले तो थे ख़ैर जवाहरलाल नेहरू
अख़बारों में जिन्हें कहा जाता था चाचा
चाचा जैसे तो न कभी हमको वे सूझे
देव पुरुष अवतारी किंतु लगा करते थे
अक्सर मिलते थे सुनने को उनके क़िस्से
बहुत बड़े हेकड़ हैं तनिक न परवा करते
जनता यदि हल्ला करती घपला करती हो
भरी भीड़ में घुसकर उसे चुपा देते हैं…..
(वीरेन दा की के कविता ‘अब बात हुई प्राचीन’ का एक अंश)
डॉ जयंत जिज्ञासु-
तब वीरेन डंगवाल जी हमारे बीच थे। शायद गांधी शांति प्रतिष्ठान में आख़िरी बार उन्हें देखा, तब भी उन्हें चाहने वाला सहृदय समाज उनके जीवन और साहित्य-सफ़र को सेलेब्रेट कर रहा था। कितनी प्यारी बात है कि कोई इतने अस्वस्थ हों, तो दोस्त उनके जीते जी उन्हें महसूस कराएं कि वे हमारे लिए कितने अहम हैं!
और कई वर्षों बाद आज उनकी ग़ैर मौजूदगी में चारों तरफ़ उनकी मौजूदगी महसूस की!
शुक्रिया सर, वीरेनियत की महक को बिखेरने के लिए!
आपने जब कहा, “आज हमें उनके आगे नागरिकता सिद्ध करनी पड़ रही है जिनकी मनुष्यता भी संदिग्ध है!”, ओह, आपने हमेशा के लिए दिल में घर कर लिया! क़ायल तो हम आपके 2012 से रहे हैं जब रामविलास शर्मा पर दिल्ली विश्वविद्यालय में आयोजित एक सेमिनार में आपको सुना था। और फिर गोदावरी ढाबे पर विद्रोही जी के नहीं रहने पर 2015 में!
रवि प्रकाश भाई को पहली बार सुना, इतने दिनों से उन्हें नहीं पढ़ना एक तरह से गहरी कविताओं के सुख से वंचित होना रहा! बच्चा लाल ‘उन्मेष’ जी को बड़े प्रेम से पढ़ता रहा हूं, पर रूबरू पहली बार सुना। वाक़ई, उनके पास अनुभूति के बयान का अनूठापन है। ज़ुबैर सैफ़ी पढ़ते गये, रुलाते गये! संध्या जी को सुनना आज का हासिल रहा। देवयानी जी के पास साफ़-सुथरी भाषा और अहसास की नफ़ासत है, बहुत प्रभावित हुआ। अब्बास क़मर पसंद आए।
अफ़सोस, निर्मला गर्ग जी को सुन नहीं पाया। बाद में रिकॉर्डिंग सुनूंगा चाव से।
इस बहाने बहुत-से प्रिय साथियों से बहुत दिनों बाद मिलना हो पाया।
वीरेनियत यूं ही क़ायम रहे!


