यशवंत की कोरोना डायरी (3) : महाप्रयाण के लिए माध्यम यही बीमारी तय है तब जिंदा रहने को यूं परेशां क्या होना!

यशवंत सिंह-

धरती, ब्रह्मांडों और जीवन को अब तक बूझा नहीं जा सका है. कहां से आए हैं. कहां को जाते हैं. चार हजार साल बाद तक अगर मनुष्य धरती पर रह गया तो उस वक्त जो इतिहास लिखा जाएगा उसमें हम लोगों के इस दौर को को भी हड़प्पा काल में जोड़ लिया जाएगा. लिखा जाएगा कि आदमी बेचारे तब तक नहीं जानते थे कि वे कहां से आते हैं और कहां को जाते हैं. आदमी तब तक जिंदा रहने के लिए भकर भकर रोटी दाल चावल बकरा बकरी जीव जानवर फल फूल घास फूस सब खाता था. तब तक बिना खाए हवा से विटामिन खींचकर उम्र दो सौ साल करने वाला ये कैप्सूल इजाद नहीं हुआ था…

चाइल्ड पीजीआई अस्पताल नोएडा के चौथे तल्ले के कमरा नंबर आठ के एक बेड पर पड़े पड़े अक्सर मैं अपनी मौत के बारे में सोचता था. सोचता था कि क्या मुझे प्रसन्नचित्त होकर मौत को आने देना चाहिए या अभी जीने के लिए जद्दोजहद करना चाहिए. उधेड़बुन का क्रम तब टूटता जब फोन बजता या खांसी आती या कमरे में कोई दैत्य प्रवेश करता…. खाना बांटने वाले सही लोग थे. नाश्ता फिर भोजन फिर चाय बिस्किट फिर डिनर…. वक्त पर दे देते… लेकिन भूख की मौत तो पहले ही हो चुकी थी… ये सोचकर एकाध रोटी खा लेता कि न खाएंगे तो दवाइयां मार डालेंगी… मतलब आदमी चाहे न चाहे, जिंदा रहने के लिए संघर्ष उसके अवचेतन में फीड है… अगर वह मानसिक रूप से टूटा हुआ न हो तो बचने, जीने का पूरा प्रयास करता है…

जीने की कोशिशों की फिर से शुरुआत करते हुए पहले तय किया कि यहां रहकर नहीं मरना है. मल्टी स्टोरी बिल्डिंग वाले बहुप्रसिद्ध अस्पताल चाइल्ड पीजीआई से फौरन निकलन लेना है वरना यहां रहे तो यूं ही मर जाएंगे… घर जाने से पहले ये तय कर लेते हैं कि क्या घर के अलावा किसी अन्य जगह पर जाया जा सकता है?

ये सब सोचते सोचते फोन उठाया, अपने उच्च पदस्थ परिचितों को फोन करने के लिए. पर फोन उठाते ही देखा कुछ नए मैसेज आए हुए हैं. चेक करने लगा. आज दूसरे दिन भी आलोकजी और अजयजी ने अस्पताल द्वारा भेजे गए स्वास्थ्य बुलेटिन को मुझ तक फारवर्ड किया हुआ है.

मतलब मैं वीवीआईपी पेशेंट था! मेरा स्वास्थ्य बुलेटिन जारी किया जा रहा था! गज्जब!

चार पांच लाइनों वाले इस स्वास्थ्य बुलेटिन में मरीज का स्वास्थ्य संतोषजनक होने, आक्सीजन लेवल सही होने आदि की जानकारी दी जाती थी. आज इस मैसेज का दूसरा दिन था.

मन में सोचने लगा कि देखो ये अस्पताल वाले कितना सूतिया बना रहे हैं बाहर की पब्लिक को. यहां नरक जैसे हालात हैं. बाहर स्वास्थ्य बुलेटिन भेजकर इंप्रेशन झाड़ रहे हैं कि सब कुछ बहुत बढ़िया है और मरीज का अच्छे से केयर हो रहा है… एक दिन साला ऐसे ही मैसेज भेज देगा कि मरीज मर गया… खेल खत्तम!

एक जुबान में सरपट अस्सी पचासी गाली तेज तेज निकालना शुरू किया. मेरा पड़ोसी मरीज चौंक उठ बैठ गया. मैंने उसे आश्वस्त किया, अभी तक पागल नहीं हुआ हूं मेरे भाई, बस ऐसे ही गरिया कर मन हल्का कर रिया था, डरो नहीं, सो जाओ बच्चे.

मुझे भी खुद का व्यवहार अजीब लगा. क्या कर रहा हूं सनकियों जैसी हरकत.

हुआ ये होगा कि पुलिस कमिश्नर आलोक जी और पूर्व सीएमओ अजय अग्रवाल जी द्वारा लगातार चाइल्ड पीजीआई के डायरेक्टर को फोन किए जाने से उसने एक सिस्टम बना दिया होगा कि फलां पेशेंट का हेल्थ डिटेल रोज भेज दिया करो. डाक्टर लोग डायरेक्टर को भेजते और डायरेक्टर इसे आलोक जी, अजय जी तक फारवर्ड करते. वो लोग मुझे भेजते. मैं इसे पढ़कर अपना बीपी बढ़ा लेता और रिप्लाई में दोनों लोगों को थैंक्यू शुक्रिया आभार टाइप कर रहा होता.

दिल्ली सरकार के मंत्री गोपाल राय जी, यूपी सीएम के मीडिया सलाहकार शलभमणि त्रिपाठी जी, टीवी9 वाले हेमंत शर्मा जी, सहारा वाले उपेंद्र राय जी, वरिष्ठ पत्रकार भाई प्रसून शुक्ला जी… समेत करीब आधा दर्जन परिचित लोगों को फोन किया. सबने अपने अपने हिसाब से यथोचित मदद की. एक सज्जन ने नीम की पत्ती का धुआं लेने का निर्देश दिया. दूसरे सज्जन ने उल्टे पेट लेट कर आक्सीजन लेवल बढ़ाने की सलाह दे डाली. साथ ही वाट्सअप पर योगासन और कोरोना से लड़ने के टिप्स भेज दिए. एक भाई ने दूसरे अस्पतालों की बेहद खराब हालत और वहां भारी भीड़ व एक भी आक्सीजन बेड न होने का हवाला देकर यहीं बने रहने को समझाया.

एक अन्य ने बताया कि उनके एक रिश्तेदार यूपी के एक जिले में अस्पताल के सर्वेसर्वा हैं, उनसे बात कर ली है, वहां पहुंचिए, सारी सुविधा उपलब्ध होगी. मैंने इस प्रस्ताव को क्रासचेक किया. हर तरह से तौला. कई सवाल किए जिनके प्रापर जवाब मिले. मुझे यह सबसे सही लगा. इसके लिए प्रयास करना शुरू कर दिया.

बड़ा सवाल था कि कैसे जाऊंगा वहां. एंबुलेंस से? कार से? आक्सीजन युक्त एंबुलेंस की व्यवस्था न हो पा रही थी. कार से जाने का विकल्प उपलब्ध था. एंबुलेंस और कार के लिए कुछ लोगों को फोन किया कराया. इधर मेरा आक्सीजन लेवल 90 से 93 के बीच फ्लक्चुएट कर रहा था. बहुत ज्यादा कमजोरी महसूस हो रही थी. खांसी और बुखार दाबे पड़े थे. कुल मिलाकर अशक्त और बेहाल-निढ़ाल.

कुछ घंटे की भयानक माथापच्ची के बाद हथियार डाल दिया. अब कहीं न जाना. अब घर चलना है. सब छोड़ दो नियंता पर. अगर उसके द्वारा मेरे लिए बनाई गई महायोजना में मेरी मौत इसी बीमारी के दौरान लिखी है तो वो होकर रहेगी. फिर खुद की योजना बनाकर जिंदा रहने के लिए इतना परेशां क्या होना, इतना महाप्रयास क्या करना. महाप्रयाण अगर सामने है तो चिंता क्यों. चलो फिलहाल तो घर के लिए प्रयाण करते हैं.

लंबी सांस लेकर इसे धीरे धीरे रिलीज किया. खुद को शांत किया. फोन स्विचआफ किया. आंख बंद कर लेट गया. बहुत सहजता और शांति महसूस हुई. बंद आंख को कसकर दबाते हुए बंद बंद ही खोलना शुरू किया, धीरे धीरे. एक सफेद गुफा सा दिखा जिसके भीतर एक सफेद वर्तुल तेजी से आगे भागा जा रहा था. फिर रोशनी, आसमान, बादल के बीच से खुद को तेजी से भागता पाया.. राकेट की तरह… आनंदित होता रहा यह सब देखकर…. बहुत छोटी ये धरती है… और इस धरती पर बहुत मामूली, बहुत छोटा हूं मैं… इस ‘मैं’ को खत्म करो…

इस तरह खुद को सीमित से व्यापक कर ले गया… शांत हो गया. निश्चिंत हो गया. अब कोई उलझन न थी. अब कोई योजना न थी. सीधे घर जाना था. मन ही मन सब कुछ तय कर चुका था.

छाती में जकड़न बढ़ती जा रही थी. खांसी बार बार निकलने को आतुर पर मैं उसे रोके रखने की कोशिश करूं क्योंकि अगर एक बार खांसी आ जाए तो रोक न रुके और छाती शरीर सब हिल जाए…. रात वहीं बीती, खांसते हाय हाय करते. जब भी खांसते हांफते बाथरूम की तरफ भागूं तो दूसरे कमरों के बाथरूमों से खांसने की भयंकर आवाजें आती मिलती… मेडिकल स्टाफ का अता पता नहीं… मरीज खांसते हांफते क्रंदन करते जीते मरते बने गिरे रहते… बस सबसे पहले सुबह पीपीई किट पहने लौंडे स्ट्रेचर लिए रूम रूम देखते झांकते चलते कि कहां मरीज निपट चला है… उसे लादते और निकल लेते…

अगली सुबह दर चाधड़मोद डाक्टर आया पीपीई किट पहने, दो लाठी दूर खड़े खड़े फार्मल्टिी पूरी की और फिर निकलते हुए बोला- तुम लोग जा सकते हो, स्लिप बनवा देता हूं.

हमने अपना सामान बटोरा. फोन किया बेटे को कि ओला कार लेकर आ जाओ.

थोड़ी देर में डिस्चार्ज स्लिप पकड़ा दी गई. इसमें सोभड़ी वालों ने सब कुछ झूठ भर रखा था. लिख रखा है कि मेरी बहुत सारी यहां जांचें की गईं. बहुत सी दवाइयां दी गईं. जाते वक्त भी बहुत सी दवाइयां दी जा रही हैं. सब झूठ. वो झूठ का पुलिंदा डिस्चार्ज स्लिप मिलते ही बिजली की गति से हम दोनों ने सामान पैक करना शुरू किया.

मेरे पड़ोसी के पास सामान ज्यादा था, उनका घर भी डासना के पास था, सो उनके परिजन के आने में वक्त लग रहा था. मैंने डिस्चार्ज स्लिप मिलते ही बेटे को फोन कर दिया था इसलिए वह दस मिनट में ओला कार पर सवार हो चला आया.

दो झोलों में अपना सामान समेटे मैं हांफते कंहरते खांसते लिफ्ट की ओर चल पड़ा. मास्क लगाने से सांस लेने में ज्यादा दिक्कत हो रही थी और घबराहट होने लग रही थी लेकिन मजबूरी थी. लिफ्ट से नीचे उतरा. मेन गेट पा कर सड़क की तरफ जाने लगा. चलते हुए सांस फूल रही थी. खांसी आ रही थी. मास्क लगाने से लग रहा था दम घुट जाएगा. इसी अवस्था में पैदल चलते हुए नीचे सड़क पर पहुंचा. सामने आयुष दिख गया. वो ओला कार ड्राइवर की बगल वाली सीट पर बैठा और मैं खुद पीछे पसर गया…

जारी….

इसके पहले के पार्ट पढ़ें-

यशवंत की कोरोना डायरी (1) : साले ये कहीं जिंदा ही न मुझे सिल दें!

यशवंत की कोरोना डायरी (2) : हर तरफ हल्ला हो गया- रूम नंबर 8 वाले भागने के लिए कह रहे हैं!

कोरोना से जूझे यशवंत ने लिखना शुरू किया संस्मरण

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Comments on “यशवंत की कोरोना डायरी (3) : महाप्रयाण के लिए माध्यम यही बीमारी तय है तब जिंदा रहने को यूं परेशां क्या होना!

  • विजय सिंह says:

    रंगीन आकर्षक पैकेट के अंदर रखे घटिया उत्पाद की आपने बेहतरीन पोल खोली है। यही हकीकत कमोबेश सभी जगह है।
    जल्दी स्वस्थ होने की कामना।

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