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सुख-दुख

यह उत्सवी देश परम पीड़ा से गुजर रहा है : यशवंत सिंह

मैंने कई कारपोरेट घरानों के बड़े लोगों से निजी तौर पर बात की. सबको छह माह पहले से पता था कि हजार और पांच सौ के नोट खत्म किए जाने हैं. मुझसे किसी एक ने संपर्क नहीं किया कि उसके यहां करोड़ दो करोड़ काला धन सड़ रहा है, उसे ह्वाइट कर दे. मैंने तमाम संभावित काले धनियों को फोन किया कि अगर कुछ हो तो बताओ, अपन लोगों के पास बहुते एकाउंट है खपाने के लिए, सबने कहा- सब सेटल हो गया.

मैंने कई कारपोरेट घरानों के बड़े लोगों से निजी तौर पर बात की. सबको छह माह पहले से पता था कि हजार और पांच सौ के नोट खत्म किए जाने हैं. मुझसे किसी एक ने संपर्क नहीं किया कि उसके यहां करोड़ दो करोड़ काला धन सड़ रहा है, उसे ह्वाइट कर दे. मैंने तमाम संभावित काले धनियों को फोन किया कि अगर कुछ हो तो बताओ, अपन लोगों के पास बहुते एकाउंट है खपाने के लिए, सबने कहा- सब सेटल हो गया.

यानि इस देश के भ्रष्टाचारियों, कारपोरेट घरानों, नेताओं, अफसरों सबने पैसे सेटल कर लिए थे. थोड़े बहुत जो बड़े लोगों के पास काला धन है तो उसे ह्वाइट करने के लिए दस परसेंट पर दो हजार के नोट होम डिलीवरी करने वाले पैदा हो गए हैं. विदेश में लाखों करोड़ रुपये पड़े काले धन को लाने में नाकाम और देश के सैकड़ा के करीब बड़े लोगों को जिनने हजारों करोड़ बैंक लोन गटक रखा है, को सुप्रीम कोर्ट में बचाने वाली मोदी सरकार अपने इस नोटबंदी की करतूत से जो लाभ हासिल करना चाहती है, उसके मुकाबले नुकसान बहुत ही ज्यादा है.

जाने कितने हजार करोड़ का वर्किंग हावर खत्म हुआ. जगह जगह काम ठप है. लोग आत्महत्याएं कर रहे हैं. करीब दो दर्जन लोग जान दे चुके हैं. जाने कितने लोग मानसिक अवसाद में हैं. जिस योजना से सिर्फ मिडिल क्लास, लोअर मिडिल क्लास, बेहद गरीब आदि को ही परेशानी हो रही है तो उस योजना को आखिर किसके फायदे के लिए लाया गया है?

अपनी अंतरात्मा में झांकिए, कुछ देर के लिए कस्बों में निकलिए. शादी ब्याह श्मशान जीवन मरण उत्सव को देख आइए, सब कुछ स्थगित-सा है या अवसाद का शिकार है.. यह उत्सवी देश परम पीड़ा से गुजर रहा है. क्या जीने का अधिकार सिर्फ बडे़ लोगों को ही है? क्योंकि उनके पास तेज दिमाग और जबरदस्त लायजनिंग क्षमता है? कितने बड़े लोगों ने जान दी? कितने बड़े लोगों ने आपसे अपना धन सफेद करने के लिए संपर्क किया? उपर वालों को सब बता दिया गया था इसलिए उन्हें कोई कष्ट नहीं.

और आखिर में, अपना पक्ष हमेशा आम जनता के दुखों सुखों को ध्यान में रखकर बनाना चाहिए, न कि तकनीकी आंकड़े और जुमलों के आधार पर..

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह की फेसबुक वॉल से साभार.

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