दया शंकर शुक्ल सागर-
कर्ज की पीते थे मय लेकिन समझते थे कि हां
रंग लाएगी हमारी फाकामस्ती एक दिन
मिर्जा गालिब का यह शेर बचपन से सुनता आ रहा था। इतना तो अंदाजा था कि गालिब शराब के बेइंतिहा शौकीन रहे होंगे। बाद में यह भी समझ में आ गया कि वह हमारे जफर भाई और तमाम तरक्कीपसंद मुस्लिम दोस्तों की तरह अधूरे मुस्लिम संस्कारों और धार्मिक बंधनों से आजाद थे।
अपनी दिलचस्प डायरी दस्तम्बू में उन्होंने लिखा कि रात के वक्त वह सिवाए विलायती शराब के और कुछ नहीं पीते थे। जिस दिन नहीं मिलती थी उन्हें नींद नहीं आती थी। 1857 के उस दौर में दिल्ली में अंग्रेजी शराब बला की महंगी हो गई थी और हमारे गालिब साहिब फक्कड़ थे। ऐसे में उन्हें महेश दास नाम का एक दोस्त मिल गया।
देखिए गालिब साहेब उनके लिए क्या लिखते हैं- ‘अगर ईश्वर से प्रेम करने वाला और दूसरों पर लुटाने वाला समन्दर जैसे दिल वाला महेश दास देशी शराब, जो रंग में विलायती शराब की तरह और खुशबू में उससे ज्यादा बेहतर शराब मेरे लिए नहीं भेजते तो न जाने मेरा क्या होता। मैं जिन्दा न रहता और इसी प्यास में अल्लाह को प्यारा हो जाता। …ज्ञानी महेश दास ने मुझे वह अमृत मुहैया करा दिया है जिसे सिकन्दर ने अपने लिए खोजा था।’
गदर के वक्त मुसलमानों को वैसे भी शक की नजर से देखा जाता था। एक अंग्रेज अफसर ने गालिब को बुलवा लिया। टूटी फूटी हिन्दी में पूछा- तुम मुसलमान है? गालिब हंस कर बोले-आधा। अंग्रेज अफसर हैरत में पड़ गया। बोला-ये क्या बात है। मिर्जा बोले-शराब पीता हूं सुअर नहीं खाता। अफसर ने हंस कर उन्हें छोड़ दिया।
यह सब पढ़कर मुझे एक और किस्सा याद आ गया जो फिराक गोरखपुरी साहेब सुनाया करते थे। यह किस्सा मैंने इलाहाबाद में फिराक के दोस्त अकील रिजवी साहेब से सुना था। ८० साल के रिजवी साहब ने इलाहाबाद की गंगा यमुनी तहजीब पर एक गजब किताब लिखी है। गालिब से एक मौलाना ने कहा-शराब पीना गुनाह है।
गालिब का सेंस आफ ह्यूमर गजब था। वह बोले-पीएं तो क्या होता है? मौलाना ने कहा-सबसे बड़ी बात यह कि उसकी दुआ कबूल नहीं होती। मिर्जा बोले आप जानते हैं शराब कौन पीता है? अव्वल तो वह कि जिसके सामने ओल्ट टाम (ब्रिटिश राज में मशहूर शराब) की बोतल बा-सामान सामने हाजिर हो। दूसरे जिन्दगी बे-फिक्र हो और तीसरी सेहत अच्छी हो। अब आप फरमाइए जिसके पास ये तीनों चीजें हों उसे और क्या चाहिए जिसके लिए वह दुआ करे?


